हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ तन्मय साहित्य # 69 – अभी हम आधे पौने हैं……. ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

(अग्रज  एवं वरिष्ठ साहित्यकार  श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी  जीवन से जुड़ी घटनाओं और स्मृतियों को इतनी सहजता से  लिख देते हैं कि ऐसा लगता ही नहीं है कि हम उनका साहित्य पढ़ रहे हैं। अपितु यह लगता है कि सब कुछ चलचित्र की भांति देख सुन रहे हैं।  आप प्रत्येक बुधवार को श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’जी की रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज के साप्ताहिक स्तम्भ  “तन्मय साहित्य ”  में  प्रस्तुत है आपकी एक अतिसुन्दर भावप्रवण रचना  अभी हम आधे पौने हैं…….। )

☆  साप्ताहिक स्तम्भ – तन्मय साहित्य  # 69 ☆

☆ अभी हम आधे पौने हैं…….☆  

 

हम चाबी से चलने वाले, मात्र खिलौने हैं

बाहर से हैं भव्य, किन्तु अंदर से बौने हैं।

 

बाहर से हैं भव्य, किन्तु अंदर से बौने हैं।

बीच फसल के, पनप रहे हम खरपतवारों से

पहिन मुखौटे लगा लिए हैं, चित्र दीवारों पे

भीतर से भेड़िये, किन्तु बाहर मृगछौने हैं।….

 

नकली मुस्कानें और मीठे बोल रटे हमने

सभा समूहों में, नीति के जाप लगे जपने

हम सांचों में ढले, बिकाऊ पत्तल दोने हैं।…..

 

शिलान्यास-उदघाटन-भाषण, राशन की बातें

दिन में उजले काम, कुकर्मों में बीते रातें

कर के नमक हरामी, कहते फिरें अलोने हैं…..

 

कई योजनाएं हमने, गुपचुप उदरस्थ करी

भेड़ों के बहुमत से, तबियत रहती हरी-भरी

बातें शुचिता की, नोटों के बिछे बिछौने हैं।….

 

इत्र-फुलेल सुवासित जल से,तन को साफ किया

मन मलिन ही रहा, न इसका चिंतन कभी किया

दिखें सुशिक्षित-शिष्ट,नियत से निपट घिनोने हैं..…

 

बाहर – बाहर जाप, पाप भीतर में सदा किया

चतुराई से दोहरा जीवन, सब के बीच जिया

फिर भी पूरे नहीं, अभी हम आधे-पौने हैं।……

 

© सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

जबलपुर/भोपाल, मध्यप्रदेश

मो. 9893266014

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – संस्मरण ☆ तलवार की धार: सैद्धान्तिक नेतृत्व की साहसिक दास्तान ☆ – श्री सुरेश पटवा 

☆ तलवार की धार: सैद्धान्तिक नेतृत्व की साहसिक दास्तान – श्री सुरेश पटवा ☆

Talwar Ki Dhar (तलवार की धार): सैद्धान्तिक नेतृत्व की साहसिक दास्तान (Hindi Edition) by [Suresh Patwa]

अमेज़न लिंक >>>> तलवार की धार: सैद्धान्तिक नेतृत्व की साहसिक दास्तान

संविधान सभा में विचार किया गया था कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में व्यापक लोकहित सुनिश्चित करने हेतु संस्थाओं की स्वायत्तता सबसे महत्वपूर्ण कारक होगी ताकि संस्थाएँ सम्भावित तानाशाही पूर्ण राजनीतिक दबाव और मनमानेपन से बचकर जनहित कारी नीतियाँ बनाकर पेशेवराना तरीक़ों से लागू कर सकें। इसीलिए भारतीय स्टेट बैंक का निर्माण करते समय सम्बंधित अधिनियम में संस्था को स्वायत्त बनाए रखने की व्यवस्था की गई थी।

तलवार साहब की अध्यक्षता में स्टेट बैंक ने स्वायत्तता पूर्वक संचालन से लाभ में दस से बीस प्रतिशत प्रतिवर्ष की वृद्धि दर्ज की थी। उनके कार्यकाल के दौरान शाखाओं की संख्या जो 1921 में इंपीरियल बैंक बनाते समय से 1969 तक 48 वर्षों में मात्र 1800 थी, जो सिर्फ़ 07 सालों (1969-1976) में बढ़कर 4000 हो गई। यह उपलब्धि किसी एक भौगोलिक क्षेत्र में नहीं बल्कि पूरे देश में हासिल की गई थी। उन्होंने 21 अगस्त 1976 को नागालैंड के मोन में स्टेट बैंक की 4000 वीं शाखा का उद्घाटन किया था। 13 फ़रवरी 1979 को बिहार के सतबारा में 5000 वीं शाखा खुलने के साथ ही स्टेट बैंक शाखाओं के साथ-साथ कार्मिकों की संख्या के मामले में भी दुनिया का सबसे बड़ा बैंकिंग नेटवर्क बन चुका था।

तलवार साहब ने भारतीय दर्शन के रहस्यवादी आध्यात्म की परम्परा को अपने जीवन में उतारकर सिद्धांत आधारित प्रबन्धन तरीक़ों से प्रशासकों की एक ऐसी समर्पित टीम बनाई जिसने स्टेट बैंक को कई मानकों पर विश्व स्तरीय संस्था बनाने में सबसे उत्तम योगदान दिया।

नेतृत्व के सैद्धांतिक तरीक़ों पर अमल करते हुए तलवार साहब का राजनीतिक नेतृत्व से टकराव हुआ। आपातकाल के दौरान उन्होंने ग़ैर-संवैधानिक शक्ति के प्रतीक बने सर्व शक्तिशाली संजय गांधी से मिलने तक से मना करके स्टेट बैंक के स्वायत्त स्वरुप की रक्षा करने में अध्यक्ष पद दाँव पर लगा दिया था।

आज भारत को हरमधारी साधु-संतो की ज़रूरत नहीं है अपितु आध्यात्मिक चेतना से आप्लावित तलवार साहब जैसे निष्काम कर्मयोगी नेतृत्व की आवश्यकता है जो भारतीय संस्थाओं को विश्व स्तरीय प्रतिस्पर्धा में खरी उतरने योग्य बनाने में सक्षम हों।

ऐसे निष्काम कर्मयोगी के कार्य जीवन की कहानी आपके हाथों में है। जो आपको यह बताएगी कि मूल्यों से समझौता किए बग़ैर सफल, सुखद और शांत जीवन यात्रा कैसे तय की जा सकती है।   – श्री सुरेश पटवा 

श्री सुरेश पटवा 

(मनुष्य के जीवन में कभी कुछ ऐसा घटित होता है जो भविष्य की नींव रखता है। संभवतः जब अदरणीय श्री सुरेश पटवा जी वर्षों पूर्व अद्भुत व्यक्तित्व के धनी स्व राज कुमार तलवार जी से पॉण्डिचेरी स्थित स्वामी अरविंद आश्रम में अनायास ही मिले तब उन्होने यह नहीं सोचा होगा कि भविष्य में वे स्व तलवार जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर आधारित पुस्तक “तलवार की धार” की रचना करेंगे।

वे नहीं जानते थे कि वे इस श्रेणी की पुस्तकों में एक इतिहास रच रहे हैं। वे एक ऐसी पुस्तक की रचना कर रहे हैं जो न सिर्फ स्टेट बैंक के वर्तमान और सेवानिवृत्त बैंक कर्मी अपितु, समस्त बैंकिंग समुदाय, राजनीति, अर्थशास्त्र, इतिहास के छात्र एवं प्रबुद्ध पाठक पढ़ना चाहेंगे।

इस अद्वितीय पुस्तक के आगमन पर मुझे श्री सुरेश पटवा जी द्वारा लिखित एक संस्मरण याद आ रहा है जो संभवतः इस पुस्तक की नींव रही होगी। इस अवसर पर आप सबसे साझा करना चाहूँगा।)

ई-अभिव्यक्ति परिवार की ओर से श्री सुरेश पटवा जी को उनकी पुस्तक की अद्वितीय सफलता के लिए अशेष हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं      

गुरु चरण समर्पण

सुरेश को नौकरी लगते समय पता चला कि स्टेट बैंक की नौकरी में हर दो या चार साल में एक बार भारत में तय दूरी तक कहीं भी घोषित स्थान पर घूमने के लिए जाने-आने का रेल किराया मिलता है। सुरेश को किताब पढ़ने और पर्यटन का शौक़ बचपन से था। उसने जब होश सम्भाला तो बुजुर्गों को रामायण, गीता, महाभारत पढ़ते देखकर सोचता था कि यदि इन्होंने बचपन या जवानी में इन शास्त्रों को पढ़ा होता तो सीख जीवन में काम आती। उसने राममंदिर के पंडित जी से रामायण, गीता, महाभारत लेकर पढ़ी तो उसे हिंदू धर्म की आस्तिक अवधारणा और भक्ति साधना के ज्ञान से अधिक उनकी कहानियों की रोचकता और दार्शनिकता से पैदा होती आध्यात्मिकता पसंद आई।

उसने तय किया कि यात्रा अवकाश सुविधा का उपयोग भक्ति-ज्ञान, योग-साधना और ध्यान की जानकारी वर्तमान सिद्ध संस्थाओं से सीधे प्राप्त करने में करेगा। उसने पहले योग विद्यालय मुंगेर जाकर पंद्रह द्विवसीय पतंजलि योग शिविर में योग सीखा उसके बाद सात दिवसीय शिविर हेतु पांडीचेरी स्थित स्वामी अरविंद के दार्शनिक आश्रम गया।  अंत में ध्यान के दस दिवसीय शिविर हेतु विश्व विपाशयना केंद्र इगतपुरी गया।

अरविंद आश्रम पांडीचेरी में उसे एक विलक्षण व्यक्ति के दर्शन हुए। वे सुबह पाँच बजे उठकर दो कमरों की सफ़ाई करते, व्यायाम करते, ध्यान करते और किताबों का अध्ययन करके छः बजे समुन्दर किनारे घूमने निकल जाते। उनके चेहरे की चमक और विद्वता से प्रभावित होकर सुरेश उनके पीछे हो लिया। उन्होंने एक बार मुड़कर देखा कि कोई पीछा कर रहा है। वे थोड़े आगे चलकर रुक गए। सुरेश से पूछा क्या चाहते हो। सुरेश उस समय आश्रम द्वारा अहंकार विषय पर एक छोटी पुस्तक पढ़ रहा था।

उसने कहा “अहंकार के विषय में जानना चाहता हूँ।”

उन्होंने पूछा “तुम अहंकार के बारे में क्या जानते हो।”

सुरेश ने कहा “अहंकार दूसरों से श्रेष्ठ होने का दृढ़ भाव है।”

उन्होंने कहा “स्थूल उत्तर है, परन्तु ठीक है, यहीं से आगे बढ़ते हैं। जब बच्चे को बताया जाता है कि वह दूसरों से अधिक ज्ञानी है, सुंदर है, बलवान है, गोरा है, ऊँचा है, ताकतवर है, धनी है, विद्वान है, इसलिए दूसरों से श्रेष्ठ है। यहीं अहंकार का बीज व्यक्तित्व के धरातल पर अंकुरित होता है। आदमी के मस्तिष्क में रोपित श्रेष्ठताओं का अहम प्रत्येक सफलता से पुष्ट होता जाता है। अहंकार श्रेष्ठता के ऐसे कई अहमों का समुच्चय है। अहंकार स्थायी भाव एवं अकड़ संचारी भाव है। जब अकारण श्रेष्ठता के कीड़े दिमाग़ में घनघनाते हैं तब जो बाहर प्रकट होता है, वह घमंड होता है, क्रोध उसका प्रकटीकरण है।”

उन्होंने कहा “अहंकार व्यक्ति के निर्माण के लिए आवश्यक होता है। अहंकार को शासक का आभूषण कहा गया है। उम्र के चौथे दौर में निर्माण से निर्वाण की यात्रा में अहंकार भाव का तिरोहित होना अनिवार्य है।”

तब तक आसमान का सूर्य दमक कर सर पर चढ़ने लगा था। वे आश्रम लौट आए।

सुरेश उस दिन शाम को भी समुंदर किनारे पहुँचा कि शायद वे सज्जन मिल जाएँ तो कुछ और ज्ञान मिले, लेकिन वे नहीं दिखे। वह पश्चिम में डूबते सूर्य के मंद पड़ते प्रतिबिम्ब को सागर की लहरों पर झिलमिलाता देखता हुआ सोच रहा था।

अहंकार आभूषण कब है? राम का विवेक सम्मत परिमित अहंकार जब वे इसी समुंदर को सुखा डालने की चेतावनी देते हैं:-

“विनय न मानत जलधि जड़, गए तीन दिन बीत,

बोले राम सकोप तब, भय बिनु होय न प्रीत।”

दूसरी तरफ़ रावण का अविवेकी अपरिमित अहंकार है, जो दूसरे की पत्नी को बलात उठा लाकर भोग हेतु प्रपंच रचता है। वहाँ अहंकार और वासना मिल गए हैं, जो मनुष्य को अविवेकी क्रोधाग्नि में बदलकर मूढ़ता की स्थिति में पहुँचा उसका यश, धन, यौवन, जीवन सबकुछ हर लेता हैं।

सोचते-सोचते सुरेश को पता ही न चला, तब तक समुंदर की लहरों पर साँझ अपना साया फैला चुकी थी। साँझ की लहरों का मधुर स्वर रात के डरावने कोलाहल में बदलने लगा था। वह आश्रम लौट आया।

अगले दिन सुरेश फिर उनके पीछे हो लिया। उन्होंने सुरेश से परिचय पूछा। सुरेश ने गर्व से कहा की वह स्टेट बैंक में क्लर्क है। उन्होंने उसे ध्यान से देखा। सुरेश ने उनसे उनका नाम पूछा तो वे ख़ामोश रहे। फिर अहंकार के तिरोहित करने पर उन्होंने कहा:- “आपका व्यक्तित्व मकान की तरह सफलता की एक-एक ईंट से खड़ा होता है। एक बार मकान बन गया फिर ईंटों की ज़रूरत नहीं रहती। क्या बने हुए भव्य भवन पर ईंटों का ढ़ेर लगाना विवेक़सम्मत है। यदि आपको अहंकार भाव से मुक्त होना है तो विद्वता, अमीरी, जाति, धर्म, रंग, पद, प्रतिष्ठा की ईंटों को सजगता पूर्वक ध्यान क्रिया से निकालना होगा। यही निर्माण से निर्वाण की यात्रा है।” सुरेश ने उनसे परिचय जानना चाहा, परंतु वे फिर मौन रहे।

शिविर के दौरान जब भी वे दिखते सुरेश को लगता कोई चुम्बकीय शक्ति उसे उनकी तरफ़ खींच रही है। वह उन्हें दूर से निहारते रहता। सात दिन का शिविर पूरा होने पर आठवें दिन सुरेश को ग्रांड ट्रंक एक्सप्रेस पकड़ने हेतु पांडीचेरी से बस द्वारा चेन्नई पहुँचना था।

वह आश्रम के गेट पर बैग लेकर खड़ा था तभी वे सज्जन वहाँ आए, सुरेश से कहा “मैं आर.के.तलवार हूँ।”

सुरेश भौंचक होकर उन्हें नम आँखों से अवाक देखता रहा। काँपते हाथों से उनके चरण छूकर प्रणाम किया, तब तक आटो आ गया, सुरेश उस चेहरे को जहाँ तक दिखा, देखता रहा। अंत में वह चेहरा धुंधला होकर क्षितिज में विलीन हो गया।

उसे पता चला था कि तलवार साहब संजय गांधी की नाराज़गी के चलते स्टेट बैंक से ज़बरिया अवकाश पर भेज दिए गए थे। वे दो कमरों का फ़्लेट किराए पर लेकर पत्नी शक्ति तलवार सहित पांडीचेरी में बस गए थे। उसे क्या पता था कि उस महामानव से ऐसी मुलाक़ात होगी। वह लम्बी रेलयात्रा में समय काटने के लिहाज़ से “कबीर-समग्र” किताब साथ रखे था। कबीर की साखियाँ पढ़ते-पढ़ते एक साखी से आगे नहीं बढ़ सका:-

कबीरा जब पैदा हुए,जग हँसा तुम रोए,

ऐसी करनी करा चल, तू हँसे जग रोए।

पढ़ते-पढ़ते उसकी नींद लग गई, उठकर बाहर देखा एक पट्टी पर पीले रंग से लिखा था “वर्धा” गांधी आश्रम के लिए यहाँ उतरिए। गाँधी-तलवार-गांधी-तलवार, उसके दिमाग़ में गड्डमड्ड हो गए। दोनों सच्चाई, ईमानदारी और सादगी के मूल्यों को संजोए भारतीय आध्यात्मिक जीवन दर्शन के सजग प्रहरी थे।

कहा जाता है कि आदमी के सज्जन से दिखते चेहरे के पीछे सात चेहरे छिपे होते हैं, सबसे ऊपर ईमानदार चेहरा बाक़ी अन्य चेहरों को छिपाए रखता है, बाक़ी चेहरे आजुबाजु से झांकते रहते हैं। बेइमानी, कुटिलता, निर्दयता, धोखेबाज़ी, लालच, खुशामदी और कामुकता के चेहरे पर ईमानदारी का मुखौटा वर्तमान जीवन जीने का तरीक़ा सा बन गया है क्योंकि सिर्फ़ ईमानदारी का चेहरा लेकर आज की दुनिया में जीना न सिर्फ़ दूभर हो चला है बल्कि तलवार की धार पर चलने जैसा है। यदि व्यक्ति का पद स्टेट बैंक के चेयरमेन जैसा बड़ा हो तो ईमानदार आदमी का तलवार की पैनी धार पर नंगे पैर चलने जैसा है। आधुनिक समय में ऐसे एक व्यक्ति हुए हैं, जिनका नाम राज कुमार तलवार था, वे जीवन को दिव्य-सत्ता से संचालित मानकर बाहर और भीतर ईमानदारी, सच्चाई और कर्तव्य परायणता के दिव्य-सत्य के साथ तलवार की धार पर नंगे पाँव चलते रहे, न झुके न टूटे, अपना जीवन जीकर दिव्य-चेतना में विलीन हो गए।

सामान्य आदमी का चेहरा भावों के अनुसार सात रंग बदलता है, ख़ुशी, उदासी, डर, क्रोध, घृणा, आश्चर्य और निन्दा की स्थिति में आँख, मुँह, नाक, कान, माँसपेशियाँ मिलकर अलग-अलग आकृतियाँ बनाते हैं। जो आदमी प्रत्येक घटना को दिव्य-सत्ता का प्रसाद मानकर प्रभाव ग्रहण करता है वह इन भावों से परे हो जाता है उसका चेहरा स्निग्ध होता है, रंग नहीं बदलाता। राज कुमार नाम का वह चेहरा ऐसा ही सौम्य चेहरा था। निर्दयी राजनीतिक सत्ता की प्रताड़नाओं से भी कुरूप नहीं हुआ।

© श्री सुरेश पटवा

भोपाल, मध्य प्रदेश

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि ☆ लिप्सा ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। )

☆ संजय दृष्टि  ☆ लिप्सा ☆

राजाओं ने

अपने शिल्प

बनवाये,

अपने चेहरे वाले

सिक्के ढलवाये,

कुछ ने

अपनी श्वासहीन देह

रसायन में लपेटकर

पिरामिड बनाने की

आज्ञा करवाई,

कुछ ने

जीते-जी

भव्य समाधि

की व्यवस्था लगवाई,

काल के साथ

तरीके बदले

आदमी वही रहा,

अब आदमी

अपने ही पुतले,

बनवा रहा है

खुद ही अनावरण

कर रहा है,

वॉट्स एप से लेकर

फेसबुक, इंस्टाग्राम,

ट्विटर पर आ रहा है,

अपनी तस्वीरों से

सोशल मीडिया

हैंग करा रहा है,

प्रवृत्ति बदलती नहीं है,

मर्त्यलोक के आदमी की

अमर होने की लिप्सा

कभी मरती नहीं है!

 

©  संजय भारद्वाज 

11:43, 4.10.2018

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ गांधी चर्चा # 43 – बापू के संस्मरण-23 – छात्रों में बड़ी ऊर्जा है ☆ श्री अरुण कुमार डनायक

श्री अरुण कुमार डनायक

(श्री अरुण कुमार डनायक जी  महात्मा गांधी जी के विचारों केअध्येता हैं. आप का जन्म दमोह जिले के हटा में 15 फरवरी 1958 को हुआ. सागर  विश्वविद्यालय से रसायन शास्त्र में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त करने के उपरान्त वे भारतीय स्टेट बैंक में 1980 में भर्ती हुए. बैंक की सेवा से सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृति पश्चात वे  सामाजिक सरोकारों से जुड़ गए और अनेक रचनात्मक गतिविधियों से संलग्न है. गांधी के विचारों के अध्येता श्री अरुण डनायक जी वर्तमान में गांधी दर्शन को जन जन तक पहुँचाने के  लिए कभी नर्मदा यात्रा पर निकल पड़ते हैं तो कभी विद्यालयों में छात्रों के बीच पहुँच जाते है.  लेख में वर्णित विचार  श्री अरुण जी के  व्यक्तिगत विचार हैं।  ई-अभिव्यक्ति  के प्रबुद्ध पाठकों से आग्रह है कि पूज्य बापू के इस गांधी-चर्चा आलेख शृंखला को सकारात्मक  दृष्टिकोण से लें.  हमारा पूर्ण प्रयास है कि- आप उनकी रचनाएँ  प्रत्येक बुधवार  को आत्मसात कर सकें। आज प्रस्तुत है “छात्रों में बड़ी ऊर्जा है ”)

☆ गांधी चर्चा # 43 – बापू के संस्मरण – 23 ☆

☆ छात्रों में बड़ी ऊर्जा है  ☆ 

1927 की बात है। मैसूर  मे  स्टूडेंट  वर्ल्ड  फ़ेड़रेशन  का  अधिवेशन  था। उसके  अंतेर्राष्ट्रीय  अध्यक्ष  रेवेरेंट  मार्ट    गांधी  जी  से  मिलने  अहमदाबाद  आए।

जब  उनकी  मुलाक़ात  गांधीजी से  हुई  तब  उन्होने  गांधीजी से  छात्र  समस्यायों  पर  बातें  की।गांधीजी ने  स्पष्ट  कहा  कि वे  छात्रो  को  अपने  छात्र  जीवन  मे  राजनीति  मे  प्रवेश  के  पक्षधर  नहीं  हैं। उन्हे  पहले  अपनी  पढ़ाई  पूरी  करनी  चाहिए। अगर  वे  चाहें  तो ग्रामो  मे  जाकर  उनके  बीच  सेवा   कार्य  कर  सकते  हैं। छात्रो  मे  बड़ी  ऊर्जा  है  लेकिन  उन्हे  अपनी ऊर्जा  का  दुरुपयोग  नहीं  करना  चाहिए।

मार्ट  ने  गांधीजी से पूछा  कि  “आपके  जीवन  मे  आशा  निराशा  के  कई  प्रसंग  आते  होंगे ,उनमे  आपको  किस  चीज़  से ज्यादा  आश्वासन  मिलता  है?”

गांधी  जी ने  उत्तर  दिया  कि  “हमारे  देश  की जनता  शांतिप्रिय  है। उससे  लाख छेडछाड़ की  जाये, वह  अहिंसा  का मार्ग  नहीं  छोड़ेगी।”

उनका  दूसरा  प्रश्न  था  कि – “आपको  कौन  सी  चीज़  ज्यादा  चिंतित  करती  है।”

तब गांधी जी  ने कहा  कि – “शिक्षित  लोगो  मे  दया  भाव सूख  रहा  है  और, वह मुझे  ज्यादा  चिंतित  कर  रही  है।”

©  श्री अरुण कुमार डनायक

42, रायल पाम, ग्रीन हाइट्स, त्रिलंगा, भोपाल- 39

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – मृग तृष्णा # 20 ☆ खुशियों का झरना ☆ श्री प्रह्लाद नारायण माथुर

श्री प्रहलाद नारायण माथुर

( श्री प्रह्लाद नारायण माथुर जी अजमेर राजस्थान के निवासी हैं तथा ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी से उप प्रबंधक पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। आपकी दो पुस्तकें  सफर रिश्तों का तथा  मृग तृष्णा  काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुकी हैं तथा दो पुस्तकें शीघ्र प्रकाश्य । आज से प्रस्तुत है आपका साप्ताहिक स्तम्भ – मृग तृष्णा  जिसे आप प्रति बुधवार आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता खुशियों का झरना) 

 

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☆ साप्ताहिक स्तम्भ – मृग तृष्णा # 20 ☆ खुशियों का झरना 

 

कभी खुशियों के झरनों की चाहत नहीं थी मुझे,

मुझे तो बस एक शीतल ओस की बूंद की दरकार थी ||

 

कभी खुशियों के खजाने की चाहत नहीं थी मुझे,

मुझे तो बस मोतियों सी रिश्तों की माला की दरकार थी ||

 

कभी खुशियों के समुन्द्र की चाहत नहीं थी मुझे,

मुझे तो बस मीठे पानी की झील सी जिंदगी की दरकार थी ||

 

कभी फूलों की बगिया की चाहत नहीं थी मुझे,

मुझे तो बस कांटों भरी जिंदगी में एक गुलाब की दरकार थी ||

 

जिंदगी हर हाल खुशनुमा हो ऐसी चाहत नहीं थी मुझे,

मुझे तो बस ग़मों भरी जिंदगी में एक ख़ुशी की दरकार थी ||

 

कभी आकाश छू लेने की जीवन में चाहत नहीं थी मुझे,

मुझे तो बस अपने पैर जमीं पर रहे बस यही दरकार थी ||

 

©  प्रह्लाद नारायण माथुर 

8949706002
≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कवितेच्या प्रदेशात # 71 – माणुसकी ☆ सुश्री प्रभा सोनवणे

सुश्री प्रभा सोनवणे

(आप  प्रत्येक बुधवार को सुश्री प्रभा सोनवणे जी  के उत्कृष्ट साहित्य को  साप्ताहिक स्तम्भ  – “कवितेच्या प्रदेशात” पढ़ सकते  हैं।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – कवितेच्या प्रदेशात # 71 ☆

☆ माणुसकी ☆

“माणुसकी हरवत चालली आहे”

हे वाक्य मी वाचते जेव्हा सर्वत्र,

तेव्हा मला ती सापडते,

माझा नातू सोसायटीतल्या भटक्या कुत्र्यांना लावतो लळा,

प्रेमाने खाऊ घालतो,बिस्किटे, अंडी, ताजी चपाती, चिकन, मटण!

त्याच्या भूतदयेत माणुसकी  दिसते मला!

माझ्या घरातल्या प्रत्येकातच सापडते ती कुठल्या कुठल्या प्रसंगात!

मी लहानपणी पेशवे पार्कात हरवले होते तेव्हा मला आईपर्यंत आणून सोडणा-या….

त्या कॅथलिक मुलीची आठवण काढायची आई नेहमीच…

मला तो प्रसंग आठवत नाही,

पण आईने केलेल्या पारायणातून

आठवते त्या मुलीतली माणुसकीच !

 

“मला काय त्याचे?”

या वृत्तीचे फारसे कोणी भेटलेच नाही

अशी माणसे दिसतात फक्त बातम्यात,सिनेमात, वर्तमानपत्रात, कथा कादंबरीत!

माझ्या अंतःवर्तुळातली सारीच माणसे माणुसकी जपणारी,

ती दिसते अवतीभवती,

नर्सेस डाॅक्टर्स, पोलीस कर्मचारी,

सेवाभावी संस्था, आणि विविध सेवा पुरविणा-या सर्वांमध्ये ,

देवालयात, पंडित-पुज-यामध्येही !

शिक्षक-प्राध्यापकांत,कवीकुळात,रसिकवर्गात अनुभवाला आली ती

उदंड माणुसकीच!

मी म्हणू शकत नाही, माझ्यापुरतं,

माणुसकी हरवत चालली आहे,

पण माझ्या विश्वा बाहेरच्या विश्वातूनही माणुसकी हरवू नये कदापिही—–यासाठी करते नित्य नियंत्याची  प्रार्थना…..

हिच असावी माझ्यातली ही माणुसकी!

 

सा-याच प्रवृत्ती मानवी मनात कमी जास्त प्रमाणात निर्माण करणा-या विश्वनिर्मात्याला हे पक्के ठाऊक आहे, माणुसकीला काळीमा फासणा-या घटना घडत आहेत युगानुयुगे…………

पण माणुसकी टिकून राहणार आहे विश्वाच्या अंतापर्यंत !!

 

© प्रभा सोनवणे

“सोनवणे हाऊस”, ३४८ सोमवार पेठ, पंधरा ऑगस्ट चौक, विश्वेश्वर बँकेसमोर, पुणे 411011

मोबाईल-९२७०७२९५०३,  email- sonawane.prabha@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित  ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ दरवळ ☆ सौ.मनिषा रायजादे पाटील

☆ कवितेचा उत्सव ☆ दरवळ ☆ सौ.मनिषा रायजादे पाटील ☆

 

आठवणींचा सुटला दरवळ

देहांमध्ये  होते खळबळ

 

श्वासांमध्ये श्वास मिसळता

जुन्या ऋतूंची व्हावी हिरवळ

 

बाग मनाची अशी बहरली

सुगंधामधे भिजली ओंजळ

 

दुःख मनाचे विसरुन सगळे

हसत रहा तू केवळ खळखळ

 

बंध गुलाबी जपेन मीही

तु पण जप हे नाते प्रेमळ

 

© सौ. मनीषा रायजादे-पाटील

सांगली

9503334279

 ≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित  ≈

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मराठी साहित्य – जीवनरंग ☆ समर्पण (अनुवादीत कथा) – क्रमश: भाग 3 ☆ श्रीमती उज्ज्वला केळकर

श्रीमती उज्ज्वला केळकर

☆ जीवनरंग ☆ समर्पण  (अनुवादीत कथा) –  क्रमश: भाग 3 ☆ श्रीमती उज्ज्वला केळकर

डॉक्टर, नर्सेस यांच्या सुरक्षिततेबरोबरच, घाबरलेल्या, निराश झालेल्या रुग्णांचा आक्रोश तत्परतेने हुशारीने थांबवणं हेही एक जरुरीचं काम होऊन बसलं होतं. जीव वाचवणार्‍या त्या देवदूतांनाही शिव्या दिल्या जात होत्या. एकीकडे मानव आपलं क्रूरतम रूप दाखवत होता, तर दुसरीकडे उदात्तता आणि मानवता यांची परीक्षा होती. प्रेतं उचलायलाही लोक मिळत नव्हते. जिवंत लोक उपचाराची प्रतीक्षा करत होते, तर हॉस्पिटलच्या प्रांगणात पडलेला प्रेतांचा ढीग आपल्या गंतव्याकडे जाण्याची प्रतीक्षा करत होता. पहिल्या दिवसाच्या प्रकोपानांतर व्हॅनमधून प्रेतं जात होती. आता व्हॅन छोट्या पडू लागल्या होत्या. मोठे कार्गो ट्रक बोलावले गेले. आता प्रेतं ट्रकपर्यन्त नेणं हेही मुश्किल होऊ लागलं होतं. हॉस्पिटलच्या इमारतीच्या प्रत्येक मजल्यावरून  ट्रकमध्ये पोचणार्‍या प्रेतांना हॉस्पिटलच्या अनेक दरवाजातून बाहेर पडावं लागत होतं. यामुळे प्रेतं घेऊन जाणार्‍यांसाठी, रस्त्यात येणार्‍या रुग्णांसाठी, सगळ्यांसाठी धोका होता. आता उघडे कार्गो ट्रक अशा तर्‍हेने उभे केले गेले की प्लास्टिकमध्ये गुंडाळलेली प्रेतं वरच्या मजल्यांवरून थेट ट्रकमध्ये टाकता येतील. हा कुठल्याही प्रकारे मानवतेचा तिरस्कार नव्हता. हे म्हणजे जिवंत असलेल्या उरलेल्या लोकांना वाचवण्याचा प्रयत्न होता.  जिवंत लोकांना सन्मान देण्याचा एक प्रकारचा प्रयत्न होता.

तास न तास इकडून तिकडे ढकललं गेल्यानंतर रोझाला कॅरिडॉरमध्ये ठेवलं गेलं. खोल्यांची कमतरता, बिछान्यांची कमतरता, मास्कची कमतरता, संसाधनांची कमतरता,  सगळ्यात जास्त म्हणजे व्हेंटिलेटर्सची कमतरता, अशा प्रकारे अनेक गोष्टींच्या कामातरतेमुळे प्रत्येक जण वैतागलेला होता. कामाच्या बोजामुळे, मृत्यूच्या भीतीमुळे आणि दु:खित मन:स्थितीमुळे सगळे त्रासलेले होते. सर्वसंपन्न माणसाची सारी ताकद या वायरसने खोटी पाडली होती. असं वाटत होतं, माणसाच्या विवशतेची टर उडवत कोरोंना व्हायरस खदाखदा हसतोय.

रोझाचा नंबर आला. पलंग आणि त्याचबरोबर कॅरिडॉरमध्ये जागा मिळाली, याचा अर्थ असा होता की आता उपचारांना लवकरच सुरुवात होईल. तिचा बेड आरामदायी होता. प्रत्येक बेडमध्ये आवश्यक तेवढं अंतर होतं. समोरची कॅरिडॉरची लाईनही पूर्ण भरलेली होती. रोझाच्या बरोबर समोर एक रुग्ण आपली वेळ येण्याची वाट पाहत होता. मधल्या रस्त्यातून जाणारे – येणारे डॉक्टर्स, नर्सेस जसा काही संकेत देत होते, की तिथे खूप काही चालू आहे.

या महामारीत कुणालाही आपल्या परिवारातील कुणालाही जवळ ठेवण्याची परवानगी नव्हती. रुग्णांनी घेरलेले स्वास्थ्यकर्मी जसे काही मृत्यूला आपल्या शरिरात घुसण्याचं निमंत्रण देत होते. अंतर ठेवून काम करायचं असलं, तरी जवळीक साधावी लागतच होती. ब्लड प्रेशर घेणं, रक्ताची तपासणी, व्हेंटिलेटर लावणं, ही सारी कामं स्पर्श केल्याशिवाय करणं शक्य नव्हतं. कुठे जाणार बिचारे? जीवन-भराच्या आपल्या कठोर परिश्रमाच्या बदल्यात त्यांना डॉक्टरचा सन्माननीय पेशा मिळाला होता. आज ते त्यापासून पळून जाऊ इच्छित होते. आपल्या निर्णयाबद्दल त्यांना पश्चात्तापही होत असेल कदाचित. त्यांच्या सगळ्या योग्यतेला, लायकीला नाकारत त्यांच्या पेशामुळे मृत्यू जसा त्यांच्या मागे लागला होता॰

रोझाच्या समोरच्या पलंगासमोर एक तरुण गंभीर परिस्थितीत होता. आत्तापर्यंत तिला वाटत होतं की साठ वर्षावरील लोकच या आजाराने त्रस्त आहेत.  हा तरुण तर पंचवीस – सव्वीस वर्षाचाच असेल. रोझाला पाहणारी नर्स त्याचीही देखभाल करत होती. त्याची परिस्थिती गंभीर होती. व्हेंटिलेटर रिकामे नव्हते. डॉक्टरांच्या कुजबुजीनंतर ठरवण्यात आलं की या दोघांना क्रमाक्रमाने व्हेंटिलेटरवर ठेवावं. गरजेप्रमाणे कधी रोझाला, कधी डिरांगला.

दिवसभर ती नर्स हेच करत राहिली. तिची ड्यूटी बदलल्यावर दुसरी नर्स आली. ती संगत होती, की डिरांगची परिस्थिती वाईट होत चाललीय. डॉक्टरांना बोलावलं गेलं दोघांच्या कुजबुजीतून स्पष्ट झालं की त्याला व्हेंटिलेटरची जास्त वेळ गरज आहे, नाही तर तो वाचू शकणार नाही. वस्तुस्थिती अशी होती की वारंवार व्हेंटिलेटर बदलल्याने कुणालाच फायदा होत नव्हता. रोझा आणि डिरांग व्हेंटिलेटर लावला की ठीक होत आणि काढताच त्यांना श्वास घेणं मुश्कील होत असे. डोक्टरांची अडचण रोझाच्या लक्षात येत होती. आपल्या बिछान्यावरून ती डिरांगचा चेहरा नीटपणे बघू शकत होती. मोठा मनमोहक युवक होता तो. डोक्यावरचे दाट काळे केस, हलकीशी दाढी, चेहरा कोमेजलेला असूनही आकर्षक होता.

मूळ लेखिका – सुश्री हंसा दीप

भावानुवाद – श्रीमती उज्ज्वला केळकर

176/2 ‘गायत्री’, प्लॉट नं 12, वसंत साखर कामगार भवन जवळ, सांगली 416416 मो.-  9403310170

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित  ≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ आरसा ☆ सुश्री दीप्ती कुलकर्णी

सुश्री दीप्ती कुलकर्णी

☆ विविधा ☆ आरसा ☆ सुश्री दीप्ती कुलकर्णी☆ 

आरसा ज्याला दर्पण ‘असेही म्हणतात, तो आरसा सर्वांचाच एक आपुलकीचा-जिव्हाळ्याचा विषय आहे. ‘

सांग दर्पणा दिसे मी कशी? असं गुणगुणत दर्पणात पाहणार्या या फक्त युवतीच असतात असं नाही बरं का!

तर अगदी दुडुदुडु चालायला शिकलेली बालके, जगातील अनेक किंवा अगदी सर्व ठिकाणच्या सर्व वयोगटातील लोकांसाठी अर्थातच आबालवृद्धांसाठी आरसा ही एक आवश्यक बाब ठरते.

तयार होऊन शाळेला जाण्यापूर्वी किंवा इतर कोणत्याही ठिकाणी जाण्यापूर्वी आपली केशभूषा, पआपली वेशभूषा ठीकठाक आहे कि नाही हे आरसाच सांगतो. कांही शाळात अगदी दर्शनी भागात आरसा टांगलेला असतो कारण विद्यार्थ्यांने गणवेश, केस वर्गात प्रवेश करण्यापूर्वी व्यवस्थित आहेत कि नाहीत हे पाहिल्यानंतरच पुढे व्हावे,नसेल तर व्यवस्थित हो असे आरसा सांगतो. सण-समारंभ,लग्नकार्य अशावेळी तरी  या आरशाची खूपच मदत होते.

पण मित्र हो,आपले बाह्यांग,आपले बाह्यव्यक्तिमत्व जसे आरशात पाहून कळते तसा आणखीहीएक आरसा आपल्या जवळ सतत असतो . तो आरसा म्हणजे मनाचा आरसा. ज्या मनाचा तळ लागत नाही असे म्हणतात त्या मनातील भाव-भावनांचे प्रगटीकरण चेहरारुपी आरशाद्वारे प्रगट होते. मनातील आनंदी,दुःखी, प्रसन्न, काळजीपूर्ण, रागीट, भयभीत असे सर्व भाव चेहरारुपी आरसा स्पष्ट करतो. म्हणूनच म्हंटले जाते.

चित्तं प्रसन्नं भुवनं प्रसन्नं

चित्तं विषण्णं भुवनं विषण्णं।

आपलं आपल्या मनावर नियंत्रण असणं गरजेचं असतं कारण त्यामुळेच आपण व्यक्तिगत भावना लपवून बाहेर ील व्यवहार सुरळीतपणे पार पाडू शकतो. पण याउलट काही वेळा मनाचा आरसा जर चेहर्यावर प्रगट झाला तर त्याचा फायदाही होतो. म्हणजे चेहर्यावर दुःख दिसल्यानंतर जवळच्या व्यक्तीने आपली विचारपूस केली तर दुःख निम्मे  हलके होते.

ब्युटीपार्लर, केशकर्तनालय या ठिकाणी तरी आरसा पाहिजेच. याखेरीज सपाट आरसे आणि गोलीय आरसे प्रकाशाच्या अभ्यासात ,प्रतिमा मिळविण्यासाठी महत्वपूर्ण ठरतात. गोलीय आरशांचा उपयोग काही ठिकाणी प्रदर्शनात अशा प्रकारे केला जातो कि आपली छबी कधी जाड व बुटकी दाखविली जाते तर कधी उभट व लांब दिसते. त्यामुळे आपली करमणुक होते.

म्हणूनच आरसा हा आपला एक जवळचा मित्र आहे असे म्हंटले तर ते वावगे ठरणार नाही.  उभा,आडवा,चौकोनी, गोल,षटकोनी असे सर्व प्रकारचे आरसे आपण पाहतो. पर्समध्ये किंवा अगदी पावडरच्या डबीत मावणार्या छोट्या आरशापासून मोठ्यात मोठे,प्रचंड आरसे असतात. मोठे आरसे आपण राजवाड्यात, आरसेमहालात किंवा वस्तुसंग्रहालयात आपण पाहू शकतो.

गावाकडील आमच्या जुन्या घरात मी भिंतीत बसविलेले आरसे पाहिले। आहेत. चित्रपट स्रुष्टीतही आरशांचा उपयोग अगदी लाजवाब पणे केलेला दिसतो. चला तर, आपणही आरसा बाळगुया नि व्यवस्थित, नीटनेटके राहू या.

© सुश्री दीप्ती कुलकर्णी

कोल्हापूर

भ्र. 9552448461

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित ≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ आळी मिळी गुप चिळी ☆ सौ. राधिका भांडारकर

☆  विविधा ☆ आळी मिळी गुप चिळी ☆ सौ. राधिका भांडारकर ☆ 

लहानपणी छोटेमोठे कित्येक गुन्हे केले आणि ते लपवण्यासाठी आळी मिळी गुप चिळी हे शस्त्र बिनबोभाट वापरले.घड्याळ फुटलं,बरणीतला खाऊ संपवला,कधी शाळा सुटल्यावर परस्पर मैत्रीणीकडे खेळायला गेलो,कधी वहीत लाल रंगातला शेरा मिळाला, कधी वर्गाच्या बाहेर ऊभं राहण्याची शिक्षाही भोगावी लागली…पण सगळे अपराध कबुल करायलाच हवेत कां?  काही अवश्यकता नाही .”आळी मिळी गुपचिळी..” हेच मस्त. मला वाटते ,अभिनयकला ही जन्मजात देणगी प्रत्येकालाच मिळालेली असते. म्हणूनच “मला काय माहीत?” “मी काय केले.?.”असे निरागस भाव चेहर्‍यावर वागवून आळी मिळी गुप चिळी यशस्वी करता येते… पण एक प्रसंग मात्र खूप कठीण होता.

माझे आजोबा म्हणजे अतिशय शिस्तीचे.नीटनेटके.  स्वच्छता ,टापटीप वाखाणण्यासारखी असली तरी अत्यंत त्रासदायक. वस्तुंच्या जागा ठरलेल्या. एक पेन्सील जरी इकडची तिकडे झाली तरी त्यांच्या चाणाक्ष नजरेतून सुटायचे नाही. मग त्यांच्या कोर्टात आरोपी म्हणून आम्हाला ऊभं रहावं लागायचं… किरकोळ शिवणकामासाठी लागणारी आजोबांची एक सुई होती.सांगितलं तर खोटं वाटेल, अतिशयोक्ती वाटेल! ती एकच सुई ते ३३वर्ष वापरत होते..वापरुन झाल्यावर लहानशा दोर्‍यासकट ते सुताच्या गुंड्यात टोचून ठेवत. त्याचीही विशीष्ट पद्धत होती आणि विशीष्ट जागाही…

एक दिवस मला काय बुद्धी झाली कोण जाणे! आजोबा घरात नसताना मी रूमाल शिवण्यासाठी ती सुई घेतली.

माझा मावसभाऊ रंजन होताच तिथे. त्याने मला फटकारलेही. भांडणच ऊकरुन काढलं आणि त्याच्याशी वाद घालता घालता ती सुई तुटुनच गेली…बाप रे!!

आता काय होणार? खालच्या मजल्यावर माझी मैत्रीण रहायची .तिच्याकडे धावत गेले.तिला सर्व सांगितले.

ती म्हणाली ,”हात्तीच्या! इतकी काय घाबरतेस..ही घे सुई.

आणि ठेवून दे तिथे..सुयांसारख्या सुया…काही कळणार नाही आजोबांना..आळी मिळी गुप चिळी…

रंजनने जमेल तशी ती गुंड्यात खोचून जागच्या जागी ठेवलीही..तेव्हढे बंधुप्रेम दाखवले त्याने….

ही आळी मिळी गुप चिळी मात्र आजोबांच्या मृत्युपर्यंत टिकून राहिली.मैत्रीणीच्या सुईने ३३वर्षांची परंपरा सांभाळली…

पण आज आठवण झाली तरी वाईट वाटतं. अपराधीही वाटतं. महत्व वस्तुचं नसतं.शिकवणीचं असतं.

संस्काराचं असतं. सांभाळणं, जपणं, बारीकसारीक गोष्टींबाबतही निष्काळजी नसणं,जबाबदारी जाणणं, हा मौल्यवान संस्कार आजोबांच्या वागणुकीतून ,अगदी सहज रुजला होता….

धन्यवाद!

© सौ. राधिका भांडारकर

पुणे

१६/१०/२०२०

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित  ≈

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