अध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता ☆ पद्यानुवाद – षोडश अध्याय (9) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता

हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

दैवासुर संपद्विभाग  योग

(आसुरी संपदा वालों के लक्षण और उनकी अधोगति का कथन)

एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः।

प्रभवन्त्युग्रकर्माणः क्षयाय जगतोऽहिताः।।9।।

दुष्टात्मा, अतिमंदमति, करने सतत विनाश

होते पैदा, लोक को करने दुखी, निराश ।।9।।

 

भावार्थ :  इस मिथ्या ज्ञान को अवलम्बन करके- जिनका स्वभाव नष्ट हो गया है तथा जिनकी बुद्धि मन्द है, वे सब अपकार करने वाले क्रुरकर्मी मनुष्य केवल जगत्‌ के नाश के लिए ही समर्थ होते हैं।।9।।

 

Holding this view, these ruined souls of small intellects and fierce deeds, come forth as enemies of the world for its destruction.।।9।।

 

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

ए १, शिला कुंज, विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, नयागांव,जबलपुर ४८२००८

vivek1959@yahoo.co.in

मो ७०००३७५७९८

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि ☆ पुनर्पाठ – आज़ादी मुबारक ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) 

☆ संजय दृष्टि  ☆ पुनर्पाठ – आज़ादी मुबारक ☆

(15 अगस्त 2016 को लिखा संस्मरण)

मेरा कार्यालय जिस इलाके में है, वहाँ वर्षों से सोमवार की साप्ताहिक छुट्टी का चलन है। दुकानें, अन्य व्यापारिक प्रतिष्ठान, यों कहिए  कमोबेश सारा बाजार सोमवार को बंद रहता है। मार्केट के साफ-सफाई वाले कर्मचारियों की भी साप्ताहिक छुट्टी इसी दिन रहती है।

15 अगस्त को सोमवार था। स्वाभाविक था कि सारे  छुट्टीबाजों के लिए डबल धमाका था। लॉन्ग वीकेंड वालों के लिए तो यह मुँह माँगी मुराद थी।

किसी काम से 15 अगस्त की सुबह अपने कार्यालय पहुँचा। हमारे कॉम्प्लेक्स का दृश्य देखकर सुखद अनुभूति हुई।  रविवार के आफ्टर इफेक्ट्स झेलने वाला हमारा कॉम्प्लेक्स कामवाली बाई की अनुपस्थिति के चलते अमूमन सोमवार को अस्वच्छ रहता है है। आज दृश्य सोमवारीय नहीं था। पूरे कॉम्प्लेक्स में झाड़ू- पोछा हो रखा था। दीवारें भी स्वच्छ! पूरे वातावरण में एक अलग अनुभूति, अलग खुशबू।

पता चला कि कॉम्प्लेक्स में काम करनेवाली बाई सीताम्मा, सुबह जल्दी आकर पूरे परिसर को झाड़-बुहार गई है। लगभग दो किलोमीटर पैदल चलकर काम करने आनेवाली इस निरक्षर लिए 15 अगस्त किसी तीज-त्योहार से बढ़कर था। तीज-त्योहार पर तो बख्शीस की आशा भी रहती है, पर यहाँ तो बिना किसी अपेक्षा के अपने काम को राष्ट्रीय कर्तव्य मानकर अपनी साप्ताहिक छुट्टी छोड़ देनेवाली इस  सच्ची नागरिक के प्रति गर्व का भाव जगा। छुट्टी मनाते सारे बंद ऑफिसों पर एक दृष्टि डाली तो लगा कि हम तो  धार्मिक और राष्ट्रीय त्योहार केवल पढ़ते-पढ़ाते रहे, स्वाधीनता दिवस को  राष्ट्रीय त्योहार, वास्तव में सीताम्मा ने  ही समझा।

आज़ादी मुबारक सीताम्मा, तुम्हें और तुम्हारे जैसे असंख्य कर्मनिष्ठ भारतीयों को!

सभी मित्रों को, भारत के हम सब नागरिकों को देश के स्वाधीनता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ।

©  संजय भारद्वाज 

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ काव्य धारा # 4 ☆ पंद्रह अगस्त अति पुनीत पर्व है प्यारा ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ 

( स्वतंत्रता दिवस के शुभ अवसर पर प्रस्तुत है गुरुवर प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  की  रचना पंद्रह अगस्त अति पुनीत पर्व है प्यारा। अब हमारे प्रबुद्ध पाठक गण  प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी  काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे।  ) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ काव्य धारा # 4 ☆

☆ पंद्रह अगस्त अति पुनीत पर्व है प्यारा ☆

पंद्रह अगस्त अति पुनीत पर्व है प्यारा
आजाद हुआ था इसी दिन देश हमारा
फहराता तिरंगा इसी दिन आसमान में
सूरज ने नई रोशनी दी थी विहान में
मन को मिली खुशी और आंखों को एक चमक
सबकी जुबां पर चढ़ा जय हिंद का नारा

आजाद हुआ देश आजाद ही रहेगा
सदियों ने किया बर्बाद अब आबाद रहेगा
आई बहार कैसे यह सपने चमन में
ये लंबी कहानी है इतिहास है सारा
फिर मिलकर कसम आज यहां साथ में खाएं
मेहनत के बल पर देश को मजबूत बनाएं

सपना जो शहीदों का था साकार करें हम
अब चाहता है हमसे यह कर्तव्य हमारा
गांधी ने, शहीदों ने जो पौधे थे लगाए
होकर बड़े अब आज फलने को आए
हम इनको सींच देश को खुशहाल रखे अब
लू की लपट इनको नहीं होती है गवारा

जिस देश की धरती ने हमें इतना दिया है
उसके लिए अब तक भला हमने क्या किया है
हम खुद से करें सवाल और जवाब दें
हम से ही तो बनता है सदा देश हमारा

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ 

ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी , रामपुर , जबलपुर

vivek1959@yahoo.co.in

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हिन्दी साहित्य – कथा-कहानी ☆ स्वतंत्रता दिवस विशेष – लघुकथा – सन्देश ☆ श्री विजय कुमार, सह सम्पादक (शुभ तारिका)

श्री विजय कुमार 

( स्वतंत्रता दिवस के शुभ अवसर पर आज प्रस्तुत है सुप्रसिद्ध एवं प्रतिष्ठित पत्रिका शुभ तारिका के सह-संपादक   श्री विजय कुमार जी  की एक विचारणीय लघुकथा “सन्देश”। )

☆ स्वतंत्रता दिवस विशेष – लघुकथा – सन्देश ☆

स्वतंत्रता दिवस अर्थात 15 अगस्त को जैसे ही प्रातः उसने अपने मोबाइल पर व्हाट्सएप्प खोला, स्वतंत्रता दिवस की बधाई और शुभकामनाओं के तरह-तरह के संदेश आने आरंभ हो गए। उसने एक-एक कर सभी को देखा और उत्तर देने में लग गया। उसे व्यस्त देखकर पत्नी उठी और बोली, “आप मोबाइल चलाइए, मैं चाय बना कर लाती हूं।”

थोड़ी ही देर में पत्नी चाय लेकर आ गई।

“अरे, बड़ी जल्दी फुर्सत पा ली मुए मोबाइल से”, पत्नी ने मजाक में कहा।

“तुम्हें पता तो है सुलोचना, मैं कितना मोबाइल चलाता हूं। आवश्यक होता है, तभी प्रयोग करता हूं।” दर्शन ने कहा।

“हां, पर आज स्वतंत्रता दिवस है, तो मैंने सोचा खूब सारे बधाई संदेश आए होंगे, तो जवाब देते-देते देर तो लग ही जाएगी।” सुलोचना ने चाय पकड़ाते हुए कहा।

“आए तो बहुत हैं, पर मैंने सभी को उत्तर नहीं दिया।” दर्शन चाय की चुस्की लेता हुआ बोला।

“क्यों? किसको दिया और किसको नहीं दिया?” सुलोचना सोचते हुए बोली।

“जिन्होंने हिंदी में बधाई और शुभकामनाएं दीं, उनको किया है, और जिन्होंने अंग्रेजी में संदेश भेजे हैं, उनको नहीं किया।” दर्शन ने खुलासा किया।

“ऐसा क्यों?” सुलोचना ने पूछा।

“अब तुम ही बताओ सुलोचना कि आज ‘स्वतंत्रता दिवस’ है या ‘इंडिपेंडेंस डे’? जिन अंग्रेजों के हम गुलाम रहे, जिनकी दी गयी यातनाएं और प्रताड़नाएँ सहन कीं, जिनके खिलाफ लड़ कर हमारे लाखों वीरों और नौजवानों ने अपना खून बहाकर स्वतंत्रता प्राप्त की; भारत में रहकर भारतवासी होकर अपने स्वतंत्रता दिवस पर उन्हीं की बोली यानी अंग्रेजी में संदेश भेजकर कौन सी स्वतंत्रता मना रहे हैं लोग”, दर्शन आक्रोश से भर कर बोला, “भारत को इंडिया बना दिया है सभी ने मिलकर। और तो और, त्योहारों पर भी हैप्पी होली, हैप्पी दिवाली, हैप्पी ईद, हैप्पी फलाना, हैप्पी ढिमकाना के संदेश आते रहते हैं। यह बधाई, शुभकामनाएं, मुबारकें या विशुद्ध क्षेत्रीय या मातृभाषा में सन्देश भेजना तो भूलते ही जा रहे हैं लोग। यह हैप्पी कब हमारी संस्कृति से चिपक गया, हमें पता ही नहीं चला। अफसोस की बात यह है कि लोग अपनी संस्कृति, अपनी विरासत को भूल कर आंखें बंद कर यह सब अपना रहे हैं। इस तरह अपने हाथों, अपने ही घर में अपनी ही बेकद्री करवा रहे हैं लोग।”

“बात तो आपकी सोलह आने सही है जी”, सुलोचना ने हामी भरी, “पारंपरिक तौर से अपने देश के तीज- त्यौहार और पर्व मनाने में जो उत्साह, जो आनंद आता है, वह पश्चिमी तौर तरीकों में कहां है। पर आजकल की पीढ़ी यह सब समझे और माने तब ना।”

“कोई माने या ना माने पर समझाना तो हमारा कर्तव्य है। कम से कम मैं तो हर वर्ष इन मूल्यों और उच्च आदर्शों का पालन अवश्य करता रहूंगा। हो सकता है देर-सवेर अपने आप या ठोकर खाकर दूसरों को भी समझ आ ही जाए, और वह इन बातों को मानना शुरू कर दें।” दर्शन ने स्वर में दृढ़ता लाते हुए कहा।

“चलो अब मेरी तरफ से स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं तो ले लो।” सुलोचना ने कहा तो दर्शन के मुख पर भी मुस्कुराहट छा गई, “तुम्हें भी…।”

©  श्री विजय कुमार

सह-संपादक ‘शुभ तारिका’ (मासिक पत्रिका)

संपर्क – 103-सी, अशोक नगर, अम्बाला छावनी-133001, मो.: 9813130512

ई मेल- urmi.klm@gmail.com

 

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हिंदी साहित्य – फिल्म/रंगमंच ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – हिंदी फिल्मों के स्वर्णिम युग के कलाकार # 14 – व्ही शांताराम-1 ☆ श्री सुरेश पटवा

सुरेश पटवा 

 

 

 

 

 

((श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं।  अभी हाल ही में नोशन प्रेस द्वारा आपकी पुस्तक नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास)  प्रकाशित हुई है। इसके पूर्व आपकी तीन पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी एवं पंचमढ़ी की कहानी को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है।  आजकल वे  हिंदी फिल्मों के स्वर्णिम युग  की फिल्मों एवं कलाकारों पर शोधपूर्ण पुस्तक लिख रहे हैं जो निश्चित ही भविष्य में एक महत्वपूर्ण दस्तावेज साबित होगा। हमारे आग्रह पर उन्होंने  साप्ताहिक स्तम्भ – हिंदी फिल्मोंके स्वर्णिम युग के कलाकार  के माध्यम से उन कलाकारों की जानकारी हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा  करना स्वीकार किया है  जिनमें कई कलाकारों से हमारी एवं नई पीढ़ी  अनभिज्ञ हैं ।  उनमें कई कलाकार तो आज भी सिनेमा के रुपहले परदे पर हमारा मनोरंजन कर रहे हैं । आज प्रस्तुत है  हिंदी फ़िल्मों के स्वर्णयुग के कलाकार  : व्ही शांताराम पर आलेख ।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – हिंदी फिल्म के स्वर्णिम युग के कलाकार # 14 ☆ 

☆ व्ही शांताराम…1 ☆

शांताराम राजाराम वनकुर्डे जिन्हें व्ही शांताराम या शांताराम बापू या अन्ना साहब के नाम से भी जाना जाता है का जन्म 18 नवम्बर 1901 को कोल्हापुर रियासत के ख़ास कोल्हापुर में हुआ था। वे हिंदी-मराठी फ़िल्म निर्माता, और अभिनेता के रूप में जाने जाते हैं। उन्होंने ड़ा कोटनिस की अमर कहानी, झनक-झनक पायल बाजे, दो आँखें बारह हाथ, नवरंग, दुनिया न माने, और पिंजरा जैसी अमर फ़िल्म बनाईं थीं।

डॉ. कोटनीस की अमर कहानी हिंदी-उर्दू के साथ-साथ अंग्रेजी में निर्मित 1946 की भारतीय फिल्म है। इसकी पटकथा ख़्वाजा अहमद अब्बास ने लिखी है और इसके निर्देशक वी शांताराम थे। अंग्रेजी संस्करण का शीर्षक “द जर्नी ऑफ डॉ. कोटनीस” था। दोनों ही संस्करणों में वी शांताराम डॉ॰कोटनीस की भूमिका में थे। फिल्म एक भारतीय चिकित्सक द्वारकानाथ कोटनीस के जीवन पर आधारित है, जिन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध में जापानी आक्रमण के दौरान चीन में अपनी सेवाएँ दी थीं।

फिल्म ख्वाजा अहमद अब्बास की कहानी “एंड वन डिड नॉट कम बैक” पर आधारित थी, जो खुद भी डॉ.द्वारकानाथ कोटनीस के बहादुर जीवन पर आधारित है। डा. कोटनीस को द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान येनान प्रांत में जापानी आक्रमण के खिलाफ लड़ने वाले सैनिकों को चिकित्सा सहायता प्रदान करने के लिए चीन भेजा गया था। चीन में रहते हुए उन्होंने जयश्री द्वारा अभिनीत एक चीनी लड़की चिंग लान से मुलाकात की। उनकी मुख्य उपलब्धि एक विपुल प्लेग का इलाज ढूँढना थी, लेकिन बाद में वे स्वयं इससे ग्रस्त हो गए। वे एक जापानी पलटन द्वारा पकड़े भी गए, किंतु वहाँ से भाग निकले। आखिरकार बीमारी ने उनकी जान ले ली।

व्ही शांताराम कोल्हापुर में बाबूराव पेंटर की महाराष्ट्र फ़िल्म कम्पनी में फुटकर काम करते थे। उन्हें 1921 में मूक फ़िल्म “सुरेखा हरण” में सबसे पहले काम करने का अवसर मिला। उन्होंने महसूस किया कि फ़िल्म सामाजिक बदलाव का सशक्त माध्यम हो सकता है। उन्होंने एक तरफ़ मानवता और मानव के भीतर अंतर्निहित अच्छाइयों को सामने लाते  हुए अन्याय और बुराइयों का प्रतिकार प्रस्तुत किया, वहीं संगीत के प्रभाव से मनोरंजन का संसार रचा। सात दशक तक उनकी फ़िल्म संसार में सक्रियता रही। उनमें संगीत की समझ थी इसलिए वे संगीतकारों से विचारविमर्श करके कलाकारों से कई बार रिहर्सल करवाते थे। चार्ली चैप्लिन ने उनकी मराठी फ़िल्म मानूस की प्रशंसा की थी

उन्होंने विष्णुपंत दामले, के.आर. धैबर, एस. फट्टेलाल और एस. बी. कुलकर्णी के साथ मिलकर 1929 में प्रभात फ़िल्म कम्पनी बनाई जिसने नेताजी पालेकर फ़िल्म का निर्माण किया और 1932 में “अयोध्याचे राजा” फ़िल्म बनाई। उन्होंने 1942 में प्रभात फ़िल्म कम्पनी छोड़कर राजकमल कलामंदिर की स्थापना की, जो कि अपने समय का सबसे श्रेष्ठ स्टूडियो था।

शांताराम की सृजनात्मकता उनके प्रेम प्रसंगों और उनकी तीन शादियों से जुड़ी थी। उन्होंने 1921 में पहली शादी अपने से 12 साल छोटी विमला बाई से की थी। उनका पहला विवाह उनके बाद के दो विवाहों के वाबजूद पूरे जीवन चला, पहली शादी से उनके चार बच्चे हुए। प्रभात, सरोज, मधुरा और चारूशीला। मधुरा का विवाह प्रसिद्ध संगीतज्ञ पंडित जसराज से हुआ था।

शांताराम की एक  नायिका जयश्री कमूलकर थी, जिनके साथ उन्होंने कई मराठी फ़िल्म और एक हिंदी फ़िल्म शकुंतला की थी, दोनों ने प्रेम में पड़ कर 22 अक्टूबर 1941 को शादी कर ली। जयश्री से उनको तीन बच्चे हुए, मराठी फ़िल्म निर्माता किरण शांताराम, राजश्री (फ़िल्म हीरोईन) और तेजश्री। शांताराम ने राजश्री को बतौर हीरोईन और जितेंद्र को हीरो के रूप में  साथ-साथ “गीत गाया पत्थरों में” अवसर दिया था।

दो आँखे बारह हाथ, झनक-झनक पायल बाजे, जल बिन मछली नृत्य बिन बिजली, सेहरा और नवरंग की नायिका संध्या के साथ काम करते-करते शांताराम और संध्या में प्रेम हो गया तो 1956 में उन्होंने शादी कर ली।

जब “झनक-झनक पायल बाजे” और “दो आँखे बारह हाथ” बन रही थी तब शांताराम के पास के सभी आर्थिक संसाधन चुक गए इसलिए उन्होंने विमला बाई और जयश्री से उनके ज़ेवर गिरवी रखकर बाज़ार से धन लेने माँगे। विमला बाई ने तुरंत अपने ज़ेवर निकालकर दे दिए, संध्या ने शांताराम की प्रेमिका और फ़िल्म की नायिका होने के नाते भी शांताराम के माँगे बिना अपने सभी ज़ेवर शांताराम को सौंप दिए लेकिन जयश्री ने अपने ज़ेवर दुबारा माँगने पर भी नहीं दिए। इस बात को लेकर शांताराम और जयश्री के सम्बंधों में खटास पड़ गई। जयश्री को जब बाद में संध्या द्वारा दिए गए ज़ेवरों के बारे में पता चला तो उसने कुछ ज़ेवर उसे देना चाहे लेकिन संध्या ने यह कहकर कि उसने ज़ेवर पहनना छोड़ दिया है, ज़ेवर लेने से मना कर दिया।

 

© श्री सुरेश पटवा

भोपाल, मध्य प्रदेश

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English Literature ☆ Stories ☆ Weekly Column – Samudramanthanam -3 Manifestation of Goddess ☆ Mr. Ashish Kumar

Mr Ashish Kumar

(It is difficult to comment about young author Mr Ashish Kumar and his mythological/spiritual writing.  He has well researched Hindu Philosophy, Science and quest of success beyond the material realms. I am really mesmerized.  I am sure you will be also amazed.  We are pleased to begin a series on excerpts from his well acclaimed book  “Samudramanthanam” .  According to Mr Ashish  “Samudramanthanam is less explained and explored till date. I have tried to give broad way of this one of the most important chapter of Hindu mythology. I have read many scriptures and take references from many temples and folk stories, to present the all possible aspects of portrait of Samudramanthanam.”  Now our distinguished readers will be able to read this series on every Saturday.)    

Amazon Link – Samudramanthanam 

 ☆ Weekly Column – Samudramanthanam -3  Manifestation of Goddess ☆ 

After creation was completed sage Bhrigu and his wife Khyati went to meet the Lord Vishnu. Lord Vishnu was sitting on Sheshnaga and Goddess Lakshmi was sitting beside him.

Sage Bhrigu and his wife Khyati do Namste, salute to Lord Vishnu and Goddess Lakshmi  and then Bhrigu said, “O! all preservation, the core essence of you and mother Lakshmi  is already manifested in different creatures of nature, but now it is our hearty wish that Goddess Lakshmi will take her incarnation in our home, to remove obstacles of  earthly creature.

Lord Vishnu smiles and said, “Bhrigu you are above me, and my duty is to help great sages to sustain and run universe as per decided cycles and if you wish to be then Goddess Lakshmi will definitely take incarnation from the womb of your wife ‘Khyati’.

Almost one year later, on the night of Sharad Purnima in the hut of sage Bhrigu smell of millions of roses arise and moon was showering his radiant white light over that place. All the beautiful and symmetrical aspects of universe are surrounding the Bhrigu hut. Around 12:00 a.m. Khyati has given birth to a girl child. That child was such a beautiful that all world come to see her in bhrigu home. Gajraj, king of elephants came with his companions and do showering of Khsirshagar milk of that born girl who was actually the incarnation of Goddess Lakshmi. The little girl was born with the cushion of lotus flowers. All the good sign of fortunate start happening around that place. Many types of treasures start flowing over there.

Sage Bhrigu and his wife Khyati were amaze from all these and both do the salute to new born child girl Goddess Lakshmi.

Sage Kashyapa has many wives name of few are Aditi, Diti, Kalika, Tamra, Krodhavasa, Anala, Arista, Khasa, Surabhi, Ira, Sursa etc.

Aditi has given birth to 12 Adityas, 8 Vasus and 11 Rudras. These all assign as demigods of nature and natural cycles as well as cosmos cycles of lower level. The twelve Adityas are Data, Aryaman, Mitra, Sakra, Varuna, Amsa, Bhaga, Vivasvan, Pusa, Savita, Tvasta and Vishnu (incarnation of maha Vishnu, one of the trimurti of hindus), 8 Vasus are Dhara, Dhruva, Soma, Ahas, Anila, Prabhasa and Anala, 11 Rudras, the incarnations of Lord Shiva are Ajaikapat, Ahirbudhnya, Virupaksa, Suresvara, Jayanta, Bahurupa, Aparajita, Savitra, Tryambaka, Vaivasvata and Hara.

Diti has given birth to many Daityas, few of which are Surapadma, Simhavaktra, Vajranga, Gomukha, Hiranyaksa, Hiranyakasipu, Simhika and Ajamukhi.

Kashyapa wife Krodhavasa has given birth to many different creatures of earths including, Mruga who was first creature of animals, Mrgamanda who given birth to Rksa, Srmara and Camara.

Krodhavasa also given birth to Hari from which lineage of Lions and Monkeys stated.

Bhadramata given birth to Iravati the mother of elephant Eiravata.

Other elephants were born from Matangi.

Krodhavasa also given birth to Saduli from which Tigers and leopards generated.

She also given birth to Sveta who given birth to eight elephants who hold the globe of earth from eight directions.

Surabhi given birth to Rohini mother of all cattle and Gandhavri, mother of all horses.

Surasa given birth to Nagas (Serpents)

Kadru given birth to all reptiles.

Sage Kasyapa other wife Tamra given birth to some other children, Kraunci responsible for owl family birth,

Bhasi for Bhasas, Syeni for Hawks and eagles, Dhrtarastri for Swans and ruddy geese

Suki given birth to Nata,

Vinata given birth to Aruna and Garuda.

So, platform was ready. Almost all creature has been created and role of Brahma in first cycle of life about to end and now task of Vishnu is ready.

Brahma married his daughter Shachi, to Indra and made Indra as kind of heaven and all Devtas. In fact, he was not deserving contender for king and inferior from Varuna in all counts. But it was done and now Varuna was very upset and decided to be spy of Asura or Danava whose location was fixed to under earth. Asura were also not happy with this arrangement.

Cycle of time is passing like always.

© Ashish Kumar

New Delhi

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ चांदणं – सुश्री मंजुषा मुळे

☆ कवितेचा उत्सव : चांदणं – सुश्री मंजुषा मुळे☆

 

चांदणे

आली पुनवेची रात

येई चांदवा डौलात

परी चांदणे कधीचे

उतरले या मनात ।।

 

बालपणासवे माझ्या

चांदणेही अवखळ

येण्या ओंजळीत माझ्या

सदा त्याची खळखळ।।

 

यौवनाच्या चाहुलीने

चांदणेही तेजाळले

हुरहूर अनामिक

चांदणेही बावरले।।

 

भेटे सखा तो जीवाचा

चांदणे नि मोहोरले

ओढ अनोळखी तरी

मन बहराला आले ।।

 

जोडीदाराच्या मागुनी

माझी चांदण पाऊले

आणि प्रेमळ चांदणे

पाठ राखणीस आले ।।

 

अंकुरता वंशवेल

तृप्त चांदणे हासले

दुडदुडती घरात

जणू त्याचीच पावले ||

 

असे चांदणे साजिरे

करी सोबत सतत

अंधारल्या वाटांचीही

मग भीती ना मनात ||

 

वाटे पुढचीही वाट

चांदण्यात चिंब व्हावी

ईशकृपेचे चांदणे,

त्याने पाखर धरावी ….

नित्य पाखर धरावी ||.

 

© सुश्री मंजुषा मुळे

मो ९८२२८४६७६२

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मराठी साहित्य – जीवनरंग – लघुकथा ☆ तिरंगा – सुश्री मीरा जैन – अनुवाद – श्रीमती उज्ज्वला केळकर

सुश्री मीरा जैन 

☆ जीवनरंग : लघुकथा – तिरंगा ☆

त्या प्रौढ बाईच्या, वैजूच्या टोपलीत, दोन तासातच नोटांचा ढीग लागला. तिला कुणालाच काही सांगावं लागलं नाही की तिने कुणाची विनवणी पण केली नाही. तिच्या टोपलीत छोटे छोटे तिरंगी झेंडे होते. त्याच्याजवळ तिने एक पाटी लावली होती. त्यावर लिहिलेलं होतं, ‘तिरंगा विकू शकेल, अशी कुणाचीच हिम्मत नाही आणि तो विकत घेता येईल, अशी ताकदही कुणाची नाही. हा तिरंगा सगळ्या देशाचा रक्षणकर्ता आहे. त्याच्या राज्यात कोण, कसा उपाशी राहील? तो आज तत्परतेने माझ्याजवळ उभा आहे. आपण हा सन्मानपूर्वक घेऊन जा आणि स्वेच्छेने आपल्याला जे द्यायचं असेल, ते द्या.’

© मीरा जैन

उज्जैन, मध्यप्रदेश

मूळ कथा – मीरा जैन    अनुवाद – उज्ज्वला केळकर 

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मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ अनुभव : अंधशाळा – सुश्री सुलु जोशी

☆ मनमंजुषेतून : अनुभव : अंधशाळा – सुश्री सुलु जोशी☆

‘महाराष्ट्र राज्य विद्युत वितरण विभागाच्या बांद्रा, मुंबई येथील प्रकाशगड’मधून कार्यालयीन निवृत्ती घेतली. पुणे मुक्कामी परत. मुळातच गरजा कमी. ठरवलं की, आजवर मीच लोकांकडून मदत घेतलीय, त्याची परतफेड करायची. या कामातून पैसे नाही  मिळवायचे.  मग जूनमधे महात्मा सोसायटीपासून जवळ असलेल्या अंध मुलींच्या शाळेत गेले. ही निवासी शाळा आहे. महाराष्ट्राच्या कोनाकोप-यातून या मुली येतात. बहुतेकींची परिस्थिती अगदी बेताची. एकदम मोठ्या सुटीतच या मुली घरी जाणार. मात्र, तिथे कोणी ना कोणी सेवाभावी माणसं येऊन त्यांना शक्य आहे ती मदत करत असतात. मुख्याध्यापिकाबाईंना भेटले. म्हटलं, अवांतर वाचन, गृहपाठ करून घ्यायला आवडेल. त्यांनी इयत्ता पहिलीच्या वर्गाचा एक तास मुक्रर करून दिला.

शाळेत चार-पाच पाय-या चढून प्रवेश केला की एक मोठं दालन लागतं. या मजल्यावर मुख्य बाईंची खोली, शाळेचं ऑफिस, स्वयंपाकघर, जेवणाचं दालन आणि उजव्या हाताला वर जाणारा जिना होता. वरच्या मजल्यावर वर्ग होते.

शाळेच्या या तळमजल्यावरच्या दालनांत पाऊल टाकलं आणि समोरून खिदळत येणा-या  दोन-तीन मुली एकदम स्तब्ध झाल्या. माझी चाहूल त्यांना कशी कळली, या संभ्रमात मी! मधे किमान वीसएक पावलांचं अंतर होतं. मी पुढं होऊन विचारलं, “पहिलीचा वर्ग कुठेय गं?” त्या तिघींनी मला घेरलंच. माझे हात, खांदे चाचपत त्या म्हणाल्या, “बाई तुम्ही नवीन? रोज येणार?” मी “हो” म्हणताच त्यांनी माझा कब्जा घेतला आणि थेट मला पहिलीत पोहोचवलं. यानं मी थोडी बावचळले. पण मग लक्षांत आलं की ही तर त्यांची नवीन माणसाची ओळख करून घ्यायची रीत आहे. त्या माझ्या स्पर्शातून, माझ्या आवाजातून माझी नोंद घेत होत्या. काही दिवसांनी लक्षांत आलं की, कुणीही समोरून येतंय असं वाटलं की, त्यांचे हात पटकन् कोपरातून उचलले जात, हाताचे पंजे ताठ होत.

पहिलीचा वर्ग सुरू झाला. हळूहळू सगळ्यांची नावे पाठ झाली. कधी त्यांना अंक, पाढे म्हणायची हुक्की येई. तर कधी चालू पुस्तकातले धडे किंवा कविता. कधी मी घरून गोष्टीची पुस्तके नेई, त्यातल्या गोष्टी आवाजी अभिनयाने वाचून दाखवी. “श्यामची आई”तील प्रकरणे त्यांना आवडत. माझ्या प्राथमिक शाळेत कविता शिकवतांना बाई एखाद्या धिटुकलीला पुढे उभं करून तिच्याकडून साभिनय नाचत-गात करून घेत, ते आठवलं. – “उठा उठा चिऊताई, सारीकडे उजाडले, डोळे तरी मिटलेले, अजूनही..” ही कविता म्हणून दाखवतांना तर आवंढाच आला घशाशी. – “उजाडले, डोळे उघडले आणि मिटले”, ही कल्पना त्या कशा करत असतील? कवितेचा अर्थ समजावून सांगतांना मनाचे हाल झाले. मग मला वर्गातून आजूबाजूला काय काय दिसते, त्याचं वर्णन करतांना बाग, फुले, उंच झाडे, पक्षी – माझी कसोटी लागली. रंग तर कसे सांगणार? आपल्या नेमस्त बुद्धीला बाजूला सारून मी हे अंधपण अनुभवू लागले आणि कुठे ना कुठे वाट दिसू लागली. सहजसोपी, त्यांच्या वयाला झेपतील अशी उत्तरे सुचू लागली. “छान किती दिसते फुलपाखरू..” ही कविता प्रत्येकीच्या बाकाजवळ जाऊन, दोन्ही पंजे अंगठ्यांनी गुंफून हालचाल शिकवली आणि ह्या नविन कल्पनेत रमलेली हाताच्या पंजांची अनेक फुलपाखरे उडू लागली. पक्षी उडतात कसे? तर प्रत्येकीच्या मागे जायचं, दोन्ही हात पसरायला लावायचे आणि खांद्यातून हलवायचे. मग समजावून द्यावे लागे की आपण हात हलवले म्हणजे उडणार नाही आहोत. पंख वजनाला हलके असतात, म्हणून पक्षी उडून शकतात. आपण त्यांच्या हालचालीची नक्कल करतोय.

अधूनमधून काही मुली पेंगताहेत, असं माझ्या ध्यानी आलं. मी एका वर्गशिक्षिकेपाशी याचा उल्लेख करत म्हटलं, “का हो, या मुली वेळेवर झोपतात ना? यांची झोप पुरी होत नाही का?” त्या बाई म्हणाल्या, “अहो, अंधार पडला की झोपायची वेळ झाली, अशी नोंद आपला मेंदू घेतो. यांना मुळी अंधार काय तेच ठाऊक नाही.” चर्रकन् चटका बसला मनाला! आपले ज्ञानचक्षु आपल्याला केवढी जाणीव पुरवतात, हे कळलं.

हा अवांतर वर्ग संपला की शाळा सुरू व्हायला मधे थोडा वेळ असे. वर्गापासून फाटकापर्यंत दोन्ही हातांना लगडलेल्या मुलींना घेऊन मी फाटकाशी येई. माझा अगदी ‘विठु माझा लेकुरवाळा’ व्हायचा. किती वेळ माझ्या अंगाखांद्यावरचे हात दूर होत नसत. मग गाडीत बसले रे बसले की तिचे दार दणकन् लावण्यांत त्यांना मोठी मजा येई. त्यांचे खेळ, कार्यक्रम, गाणी, स्वातंत्र्यदिनाची परेड, यात कसा वेळ जाई, कळत नसे. ब्रेल लिपी शिकायला सुरुवातही केली होती, पण मला ती फार जमली नाही.

राखीपौर्णिमेच्या आधी काही मुलींनी येऊन विचारलं, “बाई, आमची पत्रे टाकाल का पोस्टाच्या पेटीत?” होकार भरत त्यांना विचारलं, “काय गं, अगदी जाडजूड पत्रे लिहिलीत एवढी?” त्या खुषीत हसत म्हणाल्या, “बाई, राखी पाठवतेय भावाला.” एक मात्र कबूल केलं पाहिजे की, या मुलींचे रूसवेफुगवे असत, नाही असं नाही. पण त्या आनंदी असत. मला निरोप दिला की हातात हात गुंफून शाळेतील ठरलेल्या  पायवाटेवरून गरागरा चालत सुटत.

एकदा एक मोठी मुलगी हातात टेपरेकॉर्डर घेऊन भिरीभिरी फिरतांना दिसली. मी विचारलं, “तुला कुठे जायचंय का? सोडायला येऊ का?” ती म्हणाली, “नाही हो. माझा टेप बिघडलाय. तो कसा दुरूस्त करून आणावा, कळत नाही.” मी तो ताब्यात घेऊन फिलिप्सचा ग्राहक-कक्ष शोधून काढला, दुरूस्त करून घेतला आणि तिला नेऊन दिला. तिला प्रचंड आनंद झाला. या टेपवर या मुली व्याख्याने रेकॉर्ड करून घेतात आणि ती ऐकून ऐकून अभ्यास करतात.

सुरूवातीला मोठ्या मुलींना रस्ता ओलांडणे, बस-स्टॉपची माहिती देणे, चढाय-उतरायच्या जागांची माहिती देणे, हे शिकवले जाते. मग त्यांना एकट्याने चालणे, प्रवास करणे ह्याची सवय करायला लावतात. पाठोपाठ शाळा काही नेमलेली माणसे लक्ष ठेवायला पाठवतात. सरावल्या की त्या त्यांच्या त्यांच्या जाऊ-येऊ लागतात.

सहा महिने गेले आणि मला व्हायरल फीव्हर आणि सायटिकाचा अटॅक आला. एक इंचभर सुद्धा हलता येईना. नाईलाजाने सुट्टी घ्यावी लागली. बरं वाटायला लागल्यावर एकदा शाळेत जाऊन पाहिलं, पण जिना चढता येईना. मोठ्या नाईलाजाने हे काम थांबवले.

या सहा महिन्यांनी मला खूप काही शिकवले. आजही त्या चिमण्या आठवल्या की जीव भरून येतो. त्यांचे चेहरे नाही, पण अंगाखांद्यावरचे स्पर्श कायम स्मरणांत राहतील.

 

© सुश्री सुलू जोशी

मो 9421053591

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ ललित – आठवणींच असच असतं… ☆ श्री सुहास रघुनाथ पंडित

श्री सुहास रघुनाथ पंडित

☆ विविधा: ललित – आठवणींच असच असतं…☆

संपादकांचा फोन आला आणि नाही म्हटलं तरी मी सुखावलोच. दिवाळी अंकासाठी काही ना काही लिहून पाठवल्याशिवाय ते काही गप्प बसणार नाहीत,हे माहित होत मला. आता मस्त एखादी दीर्घकथा लिहावी आणि द्यावी पाठवून अशा विचारात मी होतो. पण यंदाचा दिवाळी अंक अगदी छोटासा निघणार आहे, त्यामुळे काहीतरी छोटंसं पाठवा, एखादी जुनी आठवणही चालेल असं जेव्हा ते म्हणाले तेव्हा मी जरा हिरमुसलोच. तरी त्यांना होकार दिला आणि फोन ठेवला.

आता छोटंस काय बरं लिहावं? जुनी एखादी आठवण लिहायची म्हटलं तरी ते सोपं नव्हतं. कारण थोडं जरी मागे वळून बघितलं तरी आठवणी कशा झुंडीन पुढं येतात. त्यातली नेमकी कोणती सांगायची हे ठरविणं खूप अवघड असतं.  प्रत्येक आठवणीच महत्व,सौंदर्य वेगळंच असतं. खर तर,सगळ्या आठवणी डोळ्यासमोर आल्या की जरा गोंधळायलाच होतं. अशा वेळी आठवणी या स्त्री सारख्या वाटू लागतात.

खरंच, आठवणी या स्त्री सारख्याच असतात. स्त्रीची जशी अनेक रुपं पहायला मिळतात,तशीच आठवणींनाही विविध रुपं असतात. अल्लडपणानं बागडणारी बालिका,उमलत्या कळीप्रमाणे षोडशा,यौवनाने बहरलेली युवती, तारुण्याच्या उंबरठ्यावरून सौख्याचं माप ओलांडून संसारात पदार्पण करायला उत्सुक असणारी नवोढा, मातृत्वाने तृप्त झालेली माता, सर्व काही सोसून प्रौढपणाची जबाबदारी संयमाने पेलणारी गृहिणी आणि वृद्धत्वाकडे झुकत असताना नातवंडांच्या आगमनाने उल्हासित होणारी आजी ! स्त्रीची किती ही विविध रूप!

आठवणींचही असच असतं. त्यांच प्रत्येक रूप मोहविणारच असतं. बालपणीच्या आठवणींनी मन बागडत नाही असं कधी झालय का ? तारूण्यातल्या आठवणी त्यावेळच्या स्वप्नांना घेऊन येत असतात. तुमची स्वप्न सत्यात उतरलेली असोत किंवा नसोत, त्यांच्या नुसत्या आठवणींनी सुद्धा तुम्ही पुन्हा त्या काळात जाऊन पोहोचता. तुम्हाला यशाकडे घेऊन जाणारी एखादी आठवण असेल तर तुमच्या मनाला नव्याने बहर येईल. तुमच्या कर्तृत्वाच्या आठवणी, तुम्ही भोगलेलं, तुम्ही सोसलेलं, तुम्ही मिळवलेलं आणि काही वेळेला तुम्ही अगदी गमावलेलं सुद्धा ! सगळं सगळं तुम्हाला जेव्हा आठवायला लागतं तेव्हा त्या त्या काळातंल ते ते चित्रच तुमच्या डोळ्यासमोर उभं राहिल्याशिवाय राहणार नाही. तुमचं वय जसं वाढत जाईल तशी या आठवणींची किंमत वाढतच जाईल. म्हणून तर या आठवणी मनाच्या खोल कप्प्यात अगदी नाजूकपणे जपून ठेवायच्या असतात. सौख्याच्या आठवणी सर्वांना वाटाव्यात तर सोसलेलं सारं आपल्यासाठी ठेवावं.

आणि हो, या आठवणी आणखी एका बाबतीत अगदी स्त्री सारख्या असतात बरं का !

तुमची खरीखुरी सखी जशी तुमच्यापासून दूर जात नाही तशाच या आठवणी सुद्धा तुम्हाला कधी अंतर देत नाहीत. अगदी शेवटपर्यंत तुमच्याच होऊन राहिलेल्या असतात. आणि मग ? मग आपल्यानंतर आपण स्वतः दुसर्यासाठी आठवण बनून जातो. आठवणी जपण्याचा वारसा पुढे चालवण्यासाठी. !

© श्री सुहास रघुनाथ पंडित

सांगली
मो 9421225491

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