हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच – #58 ☆ 15 अगस्त के सूर्योदय पर ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।

श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली  कड़ी । ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)
☆ संजय उवाच –15 अगस्त के सूर्योदय पर ☆
आज 15 अगस्त का सूर्योदय होने को है। 15 अगस्त यानि हमारी राजनीतिक स्वतंत्रता का दिन, स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में भारत के उदय का दिन। स्वतंत्रता, व्यक्ति और देश के प्रवास और विकास में महती भूमिका निभाती है। सहज है कि इसका उत्सव मने।

दुखद और विसंगत स्थिति यह है कि एक वर्ग 15 अगस्त को ‘फलां देश में ये है, फलां देश में ये है जबकि इस देश में…’ ( मानो वह इस देश का नागरिक न हो) जैसी अव्यवहार्य तुलना से हीनभावना का शिकार हो रहा होता है। अपने ही देश की खामियों को इंगित करने वाली कविताओं की 15 अगस्त और 26 जनवरी के आसपास सोशल मीडिया पर बाढ़ आ जाती है। जैसे हमारा देश दुनिया का ऐसा टापू हो जिसे सूर्य ने छुआ न हो और सब तरफ अंधेरा पसरा हो।

किसी भी देश की व्यवस्था में चाहे वह कितना ही उन्नत क्यों न हो, कुछ कमियाँ अवश्य होती हैं। दुनिया को सबसे ज़्यादा  हथियार बेचने वाला महाशक्ति अमेरिका, हथियारों के  जंजाल में ऐसा फँसा है कि उसके विद्यालयों में उसीके छात्र, लाइसेंसशुदा बंदूकों से एक-दूसरे का रक्त बहा रहे हैं और व्यवस्था लाचार है। इसी तरह किसी देश की, चाहे वह कितना ही पिछड़ा हुआ क्यों न हो, कुछ अच्छाइयाँ अवश्य होती हैं।  पाकिस्तान जैसे पिछड़े देश में सड़क दुर्घटना या भावावेश में हुए कुछ अपराधों में पीड़ित पक्ष को परस्पर सहमति के आधार पर  ‘एलिमनी’ या हर्जाना देकर अपराध से मुक्त होने का प्रावधान है। पीढ़ियों के वैमनस्य और अनंत न्यायिक प्रक्रिया से तो कुछ मायनों में यह बेहतर है।

खामियाँ गिनाने से नहीं, उसके लिए साधे जाने वाले समय से असहमति है। 364 दिन दरकिनार कर  एक दिन ही देश की कमियाँ याद आना क्या इंगित करता है? सनद रहे कि सोहर के समय मर्सिया नहीं बाँचा जाता।

स्वाधीनता दिवस सोहर गाने का दिन है। इस सोहर के नए बोल प्रसिद्ध साहित्यकार अमृता प्रीतम ने लिखे थे। अमृता ने विदेश से इमरोज़ को लिखे ख़त में कहा था, ”यदि एक वाक्य में बताना हो कि मेरी ज़िंदगी में तुम्हारी अहमियत क्या है तो मैं कहूँगी- इमरोज़, तू 15 अगस्त है मेरी ज़िंदगी की।”

15 अगस्त यानि स्वाधीन देश में  वैचारिक स्वाधीनता के उन्मुक्त गगन में विचरण कर सकने के अधिकार पर अधिकृत मोहर। एक व्यक्ति से कहा गया कि कल्पना करो कि तुम रोटी और प्याज खा रहे हो। उसने कहा, कल्पना ही करनी है तो मैं पूड़ी और राजभोग की करुँगा। ‘मेन इज़ अ प्रॉडक्ट ऑफ हिज़ थॉट्स।’ देश के नागरिकों की जो सोच होगी, वही देश की सोच बनेगी। युद्ध के मैदान में सेना की टुकड़ी के हर जवान की सोच होती है कि सबसे पहले देश, सबसे अंत में मैं। यही सोच मनोबल बढ़ाती है, लक्ष्य को बेधती है, सेना को अजेय बनाती है। सेना की टुकड़ी एक उदाहरण है। इस मॉडेल को देश पर लागू करने में आने वाली कठिनाइयाँ गिनाना इसका हल नहीं है। कठिनाइयाँ कहाँ नहीं हैं? अपने कलेजे के टुकड़े को ममत्व से स्तनपान कराने वाली माँ को भी बच्चे के काटने से कठिनाई है। घर्षण न हो तो वाहन चलाने में कौनसा कौशल बचा रहेगा? गुरुत्वाकर्षण न हो तो आकाश में उड़ने का साहस किस काम का रहेगा?  कठिनाई न होगी तो पराक्रम का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जायेगा। पराक्रम से ही मिलती है स्वाधीनता।

स्वाधीनता दिवस देश की आबादी का सामूहिक जन्मदिन है। आइए, सामूहिक जन्मोत्सव मनाएँ, सबको साथ लेकर मनाएँ। इस अनूठे जन्मोत्सव का सुखद विरोधाभास यह कि जैसे-जैसे एक पीढ़ी समय की दौड़ में पिछड़ती जाती है, उस पीढ़ी के अनुभव से समृद्ध होकर देश अधिक शक्तिशाली और युवा होता जाता है।

देश को निरंतर युवा रखना देशवासी का धर्म और कर्म दोनों हैं। चिरयुवा देश का नागरिक होना सौभाग्य और सम्मान की बात है। हिंद के लिए शरीर के हर रोम से, रक्त की हर बूँद से ‘जयहिंद’ तो बनता ही है।

जयहिंद!

© संजय भारद्वाज

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

writersanjay@gmail.com

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English Literature – Poetry ☆ Anonymous litterateur of Social Media# 16 ☆ गुमनाम साहित्यकारों की कालजयी रचनाओं का भावानुवाद ☆ कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम्

कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम्

(हम कैप्टन प्रवीण रघुवंशी जी द्वारा ई-अभिव्यक्ति के साथ उनकी साहित्यिक और कला कृतियों को साझा करने के लिए उनके बेहद आभारी हैं। आईआईएम अहमदाबाद के पूर्व छात्र कैप्टन प्रवीण जी ने विभिन्न मोर्चों पर अंतरराष्ट्रीय स्तर एवं राष्ट्रीय स्तर पर देश की सेवा की है। वर्तमान में सी-डैक के आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और एचपीसी ग्रुप में वरिष्ठ सलाहकार के रूप में कार्यरत हैं साथ ही विभिन्न राष्ट्र स्तरीय परियोजनाओं में शामिल हैं।

स्मरणीय हो कि विगत 9-11 जनवरी  2020 को  आयोजित अंतरराष्ट्रीय  हिंदी सम्मलेन,नई दिल्ली  में  कैप्टन  प्रवीण रघुवंशी जी  को  “भाषा और अनुवाद पर केंद्रित सत्र “की अध्यक्षता  का अवसर भी प्राप्त हुआ। यह सम्मलेन इंद्रप्रस्थ महिला महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय, दक्षिण एशियाई भाषा कार्यक्रम तथा कोलंबिया विश्वविद्यालय, हिंदी उर्दू भाषा के कार्यक्रम के सहयोग से आयोजित  किया गया था। इस  सम्बन्ध में आप विस्तार से निम्न लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं :

हिंदी साहित्य – आलेख ☆ अंतर्राष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन ☆ कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम्

☆ Anonymous Litterateur of Social Media # 16/सोशल मीडिया के गुमनाम साहित्यकार # 16 ☆ 

आज सोशल मीडिया गुमनाम साहित्यकारों के अतिसुन्दर साहित्य से भरा हुआ है। प्रतिदिन हमें अपने व्हाट्सप्प / फेसबुक / ट्विटर / यूअर कोट्स / इंस्टाग्राम आदि पर हमारे मित्र न जाने कितने गुमनाम साहित्यकारों के साहित्य की विभिन्न विधाओं की ख़ूबसूरत रचनाएँ साझा करते हैं। कई  रचनाओं के साथ मूल साहित्यकार का नाम होता है और अक्सर अधिकतर रचनाओं के साथ में उनके मूल साहित्यकार का नाम ही नहीं होता। कुछ साहित्यकार ऐसी रचनाओं को अपने नाम से प्रकाशित करते हैं जो कि उन साहित्यकारों के श्रम एवं कार्य के साथ अन्याय है। हम ऐसे साहित्यकारों  के श्रम एवं कार्य का सम्मान करते हैं और उनके कार्य को उनका नाम देना चाहते हैं।

सी-डैक के आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और एचपीसी ग्रुप में वरिष्ठ सलाहकार तथा हिंदी, संस्कृत, उर्दू एवं अंग्रेजी भाषाओँ में प्रवीण  कैप्टन  प्रवीण रघुवंशी जी ने  ऐसे अनाम साहित्यकारों की  असंख्य रचनाओं  का कठिन परिश्रम कर अंग्रेजी भावानुवाद  किया है। यह एक विशद शोध कार्य है  जिसमें उन्होंने अपनी पूरी ऊर्जा लगा दी है। 

इन्हें हम अपने पाठकों से साझा करने का प्रयास कर रहे हैं । उन्होंने पाठकों एवं उन अनाम साहित्यकारों से अनुरोध किया है कि कृपया सामने आएं और ऐसे अनाम रचनाकारों की रचनाओं को उनका अपना नाम दें। 

कैप्टन  प्रवीण रघुवंशी जी ने भगीरथ परिश्रम किया है और इसके लिए उन्हें साधुवाद। वे इस अनुष्ठान का श्रेय  वे अपने फौजी मित्रों को दे रहे हैं।  जहाँ नौसेना मैडल से सम्मानित कैप्टन प्रवीण रघुवंशी सूत्रधार हैं, वहीं कर्नल हर्ष वर्धन शर्मा, कर्नल अखिल साह, कर्नल दिलीप शर्मा और कर्नल जयंत खड़लीकर के योगदान से यह अनुष्ठान अंकुरित व पल्लवित हो रहा है। ये सभी हमारे देश के तीनों सेनाध्यक्षों के कोर्स मेट हैं। जो ना सिर्फ देश के प्रति समर्पित हैं अपितु स्वयं में उच्च कोटि के लेखक व कवि भी हैं। वे स्वान्तः सुखाय लेखन तो करते ही हैं और साथ में रचनायें भी साझा करते हैं।

☆ गुमनाम साहित्यकार की कालजयी  रचनाओं का अंग्रेजी भावानुवाद ☆

(अनाम साहित्यकारों  के शेर / शायरियां / मुक्तकों का अंग्रेजी भावानुवाद)

❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ 

क्या करेगा रौशन उसे आफ़ताब बेचारा

लबरेज़ हो जो खुद अपने ही रूहानी नूर से

जब चाँद ही हो आफ़ताब से ज़्यादा नूरानी 

तो उसे क्या ताल्लुक़ात अंधेरे या उजाले से

 

How can poor sun illumine him 

Who is self-effulgent with spiritual light

When moon itself is brighter than sun

Then what’s its concern with darkness or light

 

❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ 

 

गुफ़्तुगू करे हैं अक्सर

उंगलियां ही अब तो..

ज़बां तरसती है

कुछ कहने के लिए..

 

Fingers only chat 

these days now ..

The tongue  longs

To say something…

 

❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ 

तेरी बात को यूँही…

 खामोशी से मान लेना

 ये भी एक अंदाज़ है,

मेरी  नाराज़गी  का…

 

Just simply accepting

your  words  quietly…

Is  also  my  way  of

expressing resentment…

 

❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ 

रूबरू  होने   की  तो  छोड़िये,

गुफ़्तगू से  भी  क़तराने  लगे हैं,

ग़ुरूर ओढ़ते  हैं  रिश्ते  अब तो,

हैसियत पर अपनी इतराने लगे हैं…

 

Leave apart being face to face,

They’ve begun  to avoid talking,

Relations are so conceited now,

Proudly unmask their haughtiness

❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ 

 

© Captain Pravin Raghuvanshi, NM

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – स्वतंत्रता संग्राम के अनाम सिपाही  -लोकनायक रघु काका-1 ☆ श्री सूबेदार पाण्डेय “आत्मानंद”

श्री सूबेदार पाण्डेय “आत्मानंद”


(आज  “साप्ताहिक स्तम्भ -आत्मानंद  साहित्य “ में प्रस्तुत है  एक धारावाहिक कथा  “स्वतंत्रता संग्राम के अनाम सिपाही  -लोकनायक रघु काका ” का प्रथम भाग।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आत्मानंद साहित्य – स्वतंत्रता संग्राम के अनाम सिपाही  -लोकनायक रघु काका-1

अलाव घास फूस तथा‌ लकडी  के उस ढेर को कहते हैं जो जाड़े के दिनों में दरवाजों पर जलाया जाता है, जिससे लोग हाथ सेकते हैं जिसके अलग अलग भाषाओं में अनेक नाम हैं, जैसे कौड़ा, तपनी,  तपंता, धूनी आदि। यही वो जगह है जहां  कथा-कहानियों की अविरल धारा बहती थी। यहीं गीता,  रामायण, महाभारत की कथाओं  का आकर्षण खींच लाता था। अगर अलाव न होते तो आज सारी दुनियां मुंशी प्रेमचंद की कालजयी रचनाओं से  वंचित ही‌ रहती और कफ़न जैसी काल जयी रचना का जन्म न हो पाता। शायद  इस कथा का जन्म भी यहीं हुआ था। इसका उद्गम स्थल भी अलाव ही है। ‌– सूबेदार पाण्डेय

हमारे बगल वाले गांव के ही रहने वाले थे रघु काका। उन्होंने अपने जीवन में बहुत सारे उतार चढ़ाव देखे थे। हमारे दादा जी जब कभी अलाव के पास बैठ रघु काका के बहादुरी की चर्चा छेड़ते तो लगता जैसे वे उनके साथ बीते दिनों की स्मृतियों में कहीं खो जाते। क्योंकि वे उनके विचारों के प्रबल समर्थक थे और इसके साथ हम बच्चों के ज़ेहन में रघू काका का व्यक्तित्व तथा उनके निष्कपट व्यवहार की यादें बस‌ जाती। तभी वे हमारे लोक कथा के नायक बन उभरे।

यद्यपि आज वो हमारे बीच नहीं रहे। दिल की लगी गहरी भावनात्मक चोट ने उन्हें विरक्ति के मार्ग पर ढकेल दिया। लेकिन वे और उनका चरित्र हमारी स्मृतियों में बसा हुआ आज भी कहानी बन कर पल रहा है।अब जब कभी स्मृतियों के झरोखे खुलते हैं, तो उनकी यादें  बरबस ही ताजा हो उठती हैं। उनके द्वारा बचपन में सुनाये गये गीतों के स्वर लहरियों की ध्वनितरंगे  कानों में मिसरी सी घोलती गूँज उठती है। उनका प्रेम पगा व्यवहार संस्मरण बन जुबां ‌पे मचल उठता है।

रघू काका ने पराधीन भारत माता की अंतरात्मा की पीड़ा, बेचैनी की  छटपटाहट को बहुत ही नजदीक से अनुभव किया था। वे भावुक हृदय इंसान थे। वो उस समुदाय से आते थे, जो अब भी यायावरी करता जरायम पेशा से जुड़ा हुआ है। जहां आज भी अशिक्षा, नशाखोरी, देह व्यापार गरीबी तथा कुपोषण के जिन्न का नग्नतांडव देखा जा सकता है। सरकारों द्वारा उनके विकास की बनाई गई हर योजना उनके दरवाजे पहुँचने के पहले ही दम तोड़ती नजर आती हैं। उनके कुनबों के लोगों का जीवन आज भी आज यहाँ तो कल वहाँ सड़कों के किनारे सिरकी तंबुओं में बीतता है। ढोल बजाकर, गाना गाकर, भीख मांग कर खाना तथा आपराधिक गतिविधियों का संचालन ही उस समुदाय का पेशा था। उसी समुदाय की उन्हीं परिस्थितियों से धूमकेतु बन उभरे थे रघू काका जिनका स्नेहासिक्त  जीवन व्यवहार उन्हें औरों से अलग स्थापित कर देता है। वे तो किसी और ही मिट्टी के बने थे। वे भी अपनी रोजी-रोटी की तलाश में वतन से दूर साल के आठ महीने टहला करते। बहुत दूर दूर तक उनका जाना होता।

लेकिन वे बरसात के दिनों का चौमासा अपने गांव जवार में ही बिताते। वो बरसात के दिनों में गांवों-कस्बों में घूम घूम आल्हा कजरी गाते सुनाते। ईश्वर ने उन्हें अच्छे स्वास्थ्य का मालिक बनाया था। शरीर जितना स्वस्थ्य हृदय उतना ही कोमल चरित्र बल उतना ही निर्मल। बड़ी बड़ी सुर्ख आंखें, घुंघराले काले बाल  रौबदार घनी काली मूंछें, चौड़ा सीना लंबी कद-काठी, मांसल ताकतवर भुजाओं का मालिक बनाया था उन्हें। बांये कांधे पर लटकती ढोल थामें दांये कांधे पर अनाज की गठरी ही उनकी पहचान थी। वे बहुत ज्यादा की चाह न रख बहुत थोड़े में ही संतुष्ट रहने वाले इंसान थे। वे भले ही चौपालों में गीत गा कर पेट भरते रहे हो, लेकिन हृदय दया से परिपूर्ण था और हम बच्चों के तो वो महानायक हुआ करते थे।  लोकगायक होने के नाते वे भावुक हृदय के मालिक थे।

वो बरसात में जब हमारे चौपालों में आल्हा या कजरी गीतों के सुर भरते तो मीलों दूर से लोग उनकी आवाज़ सुन उसके आकर्षण से बंधे खिंचे चले ‌आते और  चौपालों में भीड़ मच जाती। वे भावों के प्रबल चितेरे थे। कभी आल्हा-ऊदल केशौर्य चित्रण करते जोश में भर नांच उठते तो कभी कजरी गीतों में राम की विरह वेदना का चित्रण करते रो पड़ते। अथवा सुदामा द्रोपदी के चीर हरण कथा सुना लोगों को रोने पर विवश कर देते। वे जब कभी रामचरितमानस की चौपाइयों में बानी जोड़ ‌गाते———–

लछिमन कहां जानकी होइहै, ऐसी विकत अंधेरिया ना।
घन घमंड बरसै चहुओरा, प्रिया हीन तरपे मन मोरा।
ऐसी विकट अंधेरिया ना।।

(अरण्यकांड रामचरित मानस )से

तो उनकी भाव विह्वलता से सबसे ज्यादा प्रभावित महिला ‌समाज ही‌ होता और उसके ‌बाद चौपालों में बिछी चादर पर कुछ पलों में ही अन्नपूर्णा और लक्ष्मी दोनों ही बरस पड़ती। गांवों घरों की‌ महिलाएं अन्न के रूप में स्नेह वर्षा से उनकी झोली भर देती। जिसे बाजार में बेच वे नमक तेल लकड़ी तथा आंटे का प्रबंध कर लेते और उनकी गृहस्थी की गाड़ी ‌आराम से चल जाती। वे जब भी बाजार से लौटते तो हम बच्चों के लिए रेवड़ियाँ तथा नमकीन का उपहार लाना कभी भी नहीं भूलते। हम बच्चों से मिलने का उनका अपना खास अंदाज था। वे जब हमारे झुण्डों के करीब होते तो खास अंदाज में ‌ढ़ोलक पर थाप देते।  हम बच्चों का झुंड उस ढ़ोलक की चिर परिचित आवाज के ‌सहारे आवाज की दिशा में दौड़ लगा देते,उनकी तरफ कोई गले का हार बन उनसे लिपट जाता तो कोई पांवों में जंजीर बन।  इसी बीच शरारती बच्चा उनके हाथ का थैला छीन भागता तो दौड़ पड़ते उसके पीछे पीछे और नमकीन का थैला ले सबको बराबर बराबर बांट देते ।

क्रमशः …. 2

© सुबेदार पांडेय “आत्मानंद”

संपर्क – ग्राम जमसार, सिंधोरा बाज़ार, वाराणसी – 221208, मोबा—6387407266

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अटल स्मृति विशेष – चलते चलते ☆ सुश्री स्वप्ना अमृतकर

सुश्री स्वप्ना अमृतकर 

(सुप्रसिद्ध युवा कवियित्रि सुश्री स्वप्ना अमृतकर जी का अपना काव्य संसार है । आपकी कई कवितायें विभिन्न मंचों पर पुरस्कृत हो चुकी हैं।  आप कविता की विभिन्न विधाओं में  दक्ष हैं और साथ ही हायकू शैली की सशक्त हस्ताक्षर हैं। आज प्रस्तुत है पूर्व प्रधानमंत्री स्व. अटल बिहारी वाजपेयी जी को श्रद्धांजलि अर्पित करती हुई उनकी एक कविता “ चलते  चलते ”। )

चलते चलते  ☆ 

कर्तव्य पथ पर

चलते चलते,

यादों का बसेरा

संभालते संभालते,

जिंदगी की कश्ती

सँवारते सँवारते,

किनारों से दोस्ती

निभाते निभाते,

आपकी कविताऐं

पढ़ते पढ़ते,

आपको दिल मे

बसाये बसाये,

बढ रहें है हम

हँसते हँसते,

कर्तव्य पथ पर

चलते चलते….

© स्वप्ना अमृतकर , पुणे

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ व्यंग्य – परिवर्तन ☆ श्री श्याम खापर्डे

श्री श्याम खापर्डे 

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं । सेवारत साहित्यकारों के साथ अक्सर यही होता है, मन लिखने का होता है और कार्य का दबाव सर चढ़ कर बोलता है।  सेवानिवृत्ति के बाद ऐसा लगता हैऔर यह होना भी चाहिए । सेवा में रह कर जिन क्षणों का उपयोग  स्वयं एवं अपने परिवार के लिए नहीं कर पाए उन्हें जी भर कर सेवानिवृत्ति के बाद करना चाहिए।  आज प्रस्तुत है एक प्रासंगिक व्यंग्य कविता   “परिवर्तन”।  ) 

☆  व्यंग्य कविता – परिवर्तन ☆ 

 

स्वाधीनता के पावन पर्व पर

अपनी संपन्नता पर गर्व कर

कुर्ता धारी नेता ने

कार में बैठते हुए

शान से अपनी

गर्दन ऐंठते हुए

कार चालक से कहा-

क्यों भाई ?

हमने इस देश को

कितना आगे बढ़ाया है

गरीबों का जीवन स्तर

कितना ऊपर उठाया है

अपना खून पानी की

तरह बहाकर

इस देश में,

कितना परिवर्तन लाया है

कार चालक ने

अल्प बुद्धि से

कुछ सोचते हुए

फटी कमीज़ से माथे का

पसीना पोंछते हुए कहा-

नेताजी,हम तो बस

इसी सत्य को मानते हैं

हम तो बस

इसी परिवर्तन को जानते है

कि-

आज से साठ साल पहले

आप के पूज्यनीय पिताजी

आज ही के दिन

तिरंगा झंडा फहराया

करते थे

और हमारे पिताजी

उन्हें वहां पहुंचाया करते थे

और आज साठ साल बाद

आप झंडा फहराने जा रहें है

और हम आपको

वहां तक पहुंचा रहे हैं

 

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़)

मो  9425592588

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ उठ उठ पांडुरंगा ☆ सुश्री नीलम माणगावे

सुश्री नीलम माणगावे

संक्षिप्त परिचय:  कथा, कविता,कादंबरी, लोकसाहित्य,सामाजिक,वैचारिक लेख,संपादकीय,समीक्षणात्मक,संपादन – संशोधन,आत्मकथन,माहितीपर,बालसाहित्य, कुमार साहित्य वगैरे माध्यमातून विपुल लेखन। एकूण 61 पुस्तके प्रकाशित

सदर लेखन – केसरी, लोकमत, जनस्वास्थ्य, श्राविका,रानपाखरं, रोहिणी, ऋग्वेद वगैरेमधून सहा महिने सदर लेखन

सहसंपादक – प्रगती आणि जिनविजय,तीर्थंकर सल्लागार – मासिक इंद्रधनुष्य

अनेक साहित्य संमेलनांमधून कथाकथन, कवितावाचन,संमेलन अध्यक्ष म्हणूनही अनेक वेळा सहभाग

आकाशवाणी सांगली,कोल्हापूर, सोलापूर, औरंगाबाद कथा, कविता वाचन. कौटुंबिक श्रुतिका लेखन

पुरस्कार

राज्य पुरस्कार – डॉलीची धमाल, शांती: तू जिंकलीस, निर्भया लढते आहे, यशवंतराव चव्हाण मुक्त विद्यापीठ नाशिक – बाबुराव बागूल पुरस्कार, महाराष्ट्र साहित्य परिषद पुणे – कुसुमाग्रज पुरस्कार, याशिवाय इतर महत्वाचे 42 पुरस्कार

विशेष समावेश-

कर्नाटक राज्य दहावी पाठ्यपुस्तकांमध्ये ‘सत्कार ‘कथेचा समावेश, महाराष्ट्र राज्य बारावी पाठ्यपुस्तकांमध्ये ‘स्पर्श’, कथेचा समावेश, डॉक्टर बाबासाहेब आंबेडकर विद्यापीठ औरंगाबाद बीए भाग एक ‘प्रसाद’ कथेचा समावेश, महाराष्ट्र स्टेट बोर्ड इयत्ता पाचवी लोअर मराठी ‘कोणापासून काय घ्यावे’ समावेश, मुंबई विद्यापीठ भाग-2 ‘जसं घडलं तसं’या आत्मकथनाचा अभ्यासक्रमात समावेश, महाराष्ट्र राज्य अकरावी पाठ्यपुस्तकांमध्ये ‘पैंजण ‘कवितेचा समावेश, कविता आणि कादंबरीवर दोन प्राध्यापकांनी एम फिल केले आहे.

‘जसं घडलं तसं’ या आत्मकथनाचा कानडी अनुवाद प्रकाशित

☆ कवितेचा उत्सव : उठ उठ पांडुरंगा – सुश्री नीलम माणगावे☆

तुझ्या चिपळ्यांचा नाद

इथं फुंकणीची साद

तिथं भक्तीचा सोहळा

इथं उपाशी प्रल्हाद

 

तुझ्या पोथी पुराणात

समतेची वाहे गंगा

इथं चौकाचौकात

रोज रडतो तिरंगा

 

ऊठ ऊठ पांडुरंगा

वीट सोडून ये आता

इंद्रायणीच्या डोहातून

चल उचलुया गाथा

 

उभा आडवा डोह

घालूया पालथा

आता तरी उचलून

टाकू या ना सत्ता

 

आता तरी कुणब्यांना

मिळूदे भाकर

नाहीतर निवदाची

कडू होईल साखर

 

©  सुश्री नीलम माणगावे

जयसिंगपूर, जिल्हा कोल्हापूर

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मराठी साहित्य – कविता ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – स्वप्नपाकळ्या # 21 ☆ बोचरे शब्द ☆ श्री प्रभाकर महादेवराव धोपटे

श्री प्रभाकर महादेवराव धोपटे

(श्री प्रभाकर महादेवराव धोपटे जी  मराठी साहित्य की विभिन्न विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। वेस्टर्न  कोलफ़ील्ड्स लिमिटेड, चंद्रपुर क्षेत्र से सेवानिवृत्त अधिकारी । अब तक आपकी तीन पुस्तकें प्रकाशित । दो काव्य संग्रह एवं एक आलेख संग्रह (अनुभव कथन) प्रकाशित । एक विनोदपूर्ण एकांकी प्रकाशनाधीन । कई पुरस्कारों /सम्मानों से पुरस्कृत / सम्मानित। समय-समय पर आकाशवाणी से काव्य पाठ तथा वार्ताओं का प्रसारण। प्रदेश में विभिन्न कवि सम्मेलनों में आपको निमंत्रित कवि के रूप में सम्मान प्राप्त । विदर्भ क्षेत्र की प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्थाओं के विभिन्न पदों पर सेवाएं  प्रदत्त । हाल ही में  काव्य संग्रह – स्वप्नपाकळ्या, संवेदना प्रकाशन, पुणे से प्रकाशित । इस साप्ताहिक स्तम्भ का शीर्षक इस काव्य संग्रह  “स्वप्नपाकळ्या” से प्रेरित है ।आज प्रस्तुत है  उनकी एक भावप्रवण कविता   “बोचरे शब्द“.) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – स्वप्नपाकळ्या # 21 ☆

☆ बोचरे शब्द

 

टोचणी मनाला,चरे हृदयाला

पाझर फुटला,द्वय नयनाला ।।

 

शब्दांचे ते तीर,भिडे काळजाला

वाहू लागे मनी,जखम भळभळा ।।

 

तिरस्कारयुक्त ,नजरेचा भाला

जिव्हारी लागला,पूर आसवाला ।।

 

अंतरी गर्भातून,करुण स्वर आला

क्षतविक्षत भावना,घाव वेदनेला ।।

 

खोटे नातेगोते,बोलवू कुणाला

वाटे संपवून टाक,दुःखी जीवनाला ।।

 

संपल्या अपेक्षा,अर्थ ना जगण्याला

आता एकच सरण,हवे विसाव्याला ।।

 

©  प्रभाकर महादेवराव धोपटे

मंगलप्रभू,समाधी वार्ड, चंद्रपूर,  पिन कोड 442402 ( महाराष्ट्र ) मो +919822721981

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मराठी साहित्य – जीवनरंग ☆ लघुकथा – बाई – सुश्री नरेन्द्र कौर छाबड़ा – अनुवाद – सुश्री माया महाजन

सुश्री नरेन्द्र कौर छाबड़ा

☆ जीवनरंग : लघुकथा – बाई – भावानुवाद सुश्री माया महाजन ☆

शहरातील झाडून सर्व महिला समित्यांनी एकत्र येऊन आयोजन केले. खूप मोठ्या संख्येने महिला एकत्रित झाल्या. कलेक्टर कमिशनर, मेयर यांच्या बायकांबरोबरच काही नेत्यांच्या पत्नीदेखील आमंत्रित होत्या.

महिलांवर होणार्‍या अत्याचारांविरोधात मोकळेपणी, स्पष्टपणे चर्चा झडल्या ज्यात हुंडा, कुटुंबाकडून होणारे शोषण, नोकरदार महिलांना सहकारी पुरुषांकडून होणारा त्रास, स्त्री भ्रूणहत्या इत्यादी मुद्यांवर भरपूर चर्चा झाली. या मुद्यांवर काही प्रस्तावदेखील मंजूर करण्यात आले.

दिवसभराच्या या व्यस्ततेनंतर माधुरी जेव्हा घरी पोहोचली तेव्हा रात्र झाली होती. जेवणे वगैरे उरकल्यानंतर ती थकलेली अशी पलंगावर पडली की नवर्‍याने तिला जवळ ओढले. माधुरी म्हणाली, ‘‘आज मी खूप थकून गेलेय…’’ नवरा एकदम चवताळून म्हणाला, ‘‘सगळा दिवस भाषणबाजी, घोषणाबाजी करताना स्टेजवर नाचताना थकवा नाही आला आणि आता मला पाहताच थकवा जाणवायला लागला का? समजतेस कोण स्वत:ला.’’

नवर्‍याची मारझोड सहन करून त्याची हवस पूर्ण करून जेव्हा ती पलंगावर मूक अश्रू गाळत पडली तेव्हा विचार करत होती, ‘हाच तर मुद्दा आज आपण मांडला होता, नवर्‍याकडून शोषण, उपेक्षा, मानहानी शेवटी बायकोने कसे तोंड द्यावे या सर्वाला! कुठपर्यंत हे सगळे सहन करावे तिने?

यातून सोडवणूक कधी? तिने मांडलेल्या या मुद्यावर प्रस्ताव मंजूर केला गेला. त्यांनी सर्वांनी अभिनंदन केले होते तिचे.

आता तिला वाटायला लागले की अभिनंदन करणारे जणू आता तिला टोमणे मारत आहेत, तिची चेष्टा करताहेत. पाह्यलं? चालली होती मोठी क्रांतिकारी बनायला.

विसरू नकोस तू बाई आहेस बाई…

 

मूळ हिंदी कथा- औरत- नरेन्द्र कौर छाबड़ा, मो.- ९३२५२६१०७९  अनुवाद- माया महाजन, मो.-९८५०५६६४४२

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ स्फुट लेख – ताण (टेंशन) ☆ सुश्री अनुराधा फाटक

☆ विविधा: स्फुट लेख – सुश्री अनुराधा फाटक   ☆

संध्याकाळची वेळ होती.मी अंगणात तांदूळ निवडत बसले होते.

‘काय करताय काकू?’ म्हणतच शेजारची रमा माझ्याजवळ येऊन बसली .

‘रिकामा वेत्र आहे. दुसरं काही काम नाही म्हणून बषले आपली तांदूळ निवडत पण तू आता इथं कशी?’

‘उद्या दहावीचा रिझर्ल्ट असल्याचे आता बातम्यात सांगितले आणि एकदम टेन्शन आलं काही सुचेना आले तुमच्याकडं ‘ तांदळात हात घालत रमा म्हणाली.

‘इतकं कसलं टेन्शन घ्यायचं? तुम्ही अलिकडची मुलं म्हणजे..कशाचं टेन्शन घ्याल काही कळत नाही.

‘काकू, सध्या आमच्याकडंच प्रत्येकाचं लक्ष आहे. किती मार्कस मिळतील? पुढं काय करायचं ?याचा विचार आमच्यापूक्षा आमचे आईवडीलच करतात.आता बाबा ऑफिसमधून आले की तोच विषय घरात असणार’

रमा बोलत असतनाच रमाच्या आईची हाक आली. पटकन तांदळातला हात काढून रमा घरी गेली.मीही शरद येईपर्यंत स्वयंपाक व्हायला हवा म्हणत उठलेरात्रीची जेवणं झाली.सर्व आवराआवरी करून मिही अंथरुणाला पाठ टेकली. आणि रमा नजरेसमोर आली.

‘आमचा विचार आमच्यापेक्षा आमचे आईवडीलच करतात’

रमाचं ते वाक्य आठवलं आणि मला आमचं शालेय जीवन आठवलं शाळेत नाव घातलं की आईवडिलांची जबाबदारी संपायची. शाळेसाठी लागणारी वह्या पुस्तके, भरावयाची फी याची आठवण केली तरी वडील ओरडायचे. कधी जुनी पुस्तके मिळायची कधी तीही नसायची, वह्याचे तेच.. फी थकलेली असायची. सारखं विचारलं की, शाळा सोडा हे उत्तर ठरलेलं असायचं.मग आमचे प्रश्न आम्हीच सोडवायचो. कुणाची तरी पुस्तकं, पाठकोऱ्या वह्या वापरून अभ्यास व्हायचा, वरच्या वर्गात जायचो.. पण त्यामुळं आम्ही स्वावलंबी झालो.सुटीत काहीतरी उद्योग करून शाळेची तयारी व्हायची. परीक्षेचे तेच घरात परीक्षा झालेली कळायची नाही की निकाल लागलेला. तरीही आम्ही शिकलो. आता सर्वच बदलंल. मुलांच्या आधी पालकानाच सगळी घाई!

‘आई, झोपायचं नाही कां?’

शरदच्या आवाजाने भानावर आले घड्याळ बघितले.बराच उशीर झाला होता आज रमाचा रिझर्ल्ट! असं म्हणतच मीशरद ऑफिसला गेला तसं भरभर घरातलं आवरलं.केव्हा एकदा रमाला भेटत्येय असं मला झालं होतं.’ रमा नक्कीच चागल्या मार्कानी पास झाली असणार. तिला काहीतरी घेऊन जावं.. नको काय हवं ते तिलाच विचारावं. ‘स्वतःशी बोलतच मी रमाचं घर गाठलं. मी दरवाजाला हात लावताच नुसता पुढं ओढलेला दरवाजा लगेच उघडला.घरातलं वातावरण

एकदम शांत होतं. स्वयंपाक घरातल्या आवाजाने रमाची आई

स्वयंपाकघरात असल्याचे सांगितले आणि मी इकडंतिकडं न बघता स्वयंपाक घरातच गेले.

‘काय चाललयं?’

रमाची आई स्वयंपाक करताना दिसत असतानाही मी विचारलं.

तसं त्यानी माझ्याकडं वळून बघितलं. त्यांचा चेहरा उतरलेला होता.

‘काय झालं?’

रमाच्या आईजवळ जात मी विचारलं.

‘आमची रमा..’ डोळ्याला पदर लावत त्या म्हणाल्या.

‘कुठं आहे रमा?’ मी तिच्यासाठीच म्हणजे तिचं अभिनंदन करण्यासाठीच आले.’

‘कसलं अभिनंदन आणि कसलं काय? दार लावून बसली आहे ती आपल्या खोलीत. किती वेळ झाला. मी हाका मारल्या पण ती दारच उघडत नाही. काय करायचं हो शरदची आई? ‘मार्कस फार कमी पडले कां?’

नव्वद टक्के मिळाले. पण तिच्या वडिलांची तिच्याकडून यापेक्षा जास्त अपेक्षा होती. त्यांच्या ऑफिसमधल्या शिपायाच्या मुलाला नव्व्याण्णव टक्के मिळाले आहेत त्यामुळं त्याना ते कमी वाटले ‘

मी पटकन तिच्या खोलीजवळ जाऊन तिला हाक मारली. माझा आवाज ऐकताच तिनं दार उघडलं.रडूनरडून तिचे डोळे लाल झाले होते.

‘रमा, तुझे मार्कस चांगले आहेत मी तुला बक्षीसही देणार आहे’

मी असं म्हणताच रमा पटकन माझ्या गळ्यात पडून रडू लागली. थोडावेळ मी तिला रडू दिलं ती शांत होताच मी म्हणाले,

‘इतकं वाईट वाटून घ्यायचं नाही. तू लहान असल्यापासून तुझी हुशारी मी बघत आहे आणि मार्कसही वाईट नाहीत’

पण बाबा..’

‘मी सांगते बाबांना, तुझ्यामुळं तुझी आईही.. जा तोंड धू. दोघी जेवा. संध्याकाळी तुझे बाबा आल्यावर मी तुझे बक्षीस घेऊन येते’ रमाची समजूत काढून मी घरी आले पण रमाचेच विचार मनात होते.

रमा सर्व क्षेत्रात हुशार! शाळेतील सर्वांगीण विकासाचे बक्षीसही तिला मिळाले होते पण हल्ली मुलांच्याऐवजी मुलांच्या पालकांच्याच आपल्या मुलांकडून अपेक्षा वाढल्या आहे. मुलांची आवड, कुवत याचा विचारच केला जात नाही. दहावीत असतानाही स्वतःच्या इच्छेने रमाने वेगवेगळ्या स्पर्धात भाग घेतला होता, नंबरही मिळवले होते. ती केवळ पुस्तकातला किडा नव्हती. याचा विचार न करता  तिच्या वडालांनी कमी मार्क मिळाले म्हणून दुखवले होते. हे मलाही पटले नाही. दहावीची परीक्षा म्हणजे आयुष्याचे सर्वस्व नाही.पुढच्या शिक्षणासाठी कॉलेजला प्रवेश मिळण्यासाठी ते पुरेसे होते.शिपायाच्या मुलाचे मार्क नक्कीच कौतुकास्पद पण याचा अर्थ रमाचे मार्कस कौतुकास्पद नाहीत असे होत नाही. उलट अशा पालकांनी आपल्या मुलांचे अधिक कौतुक करून त्याना प्रोत्साहन दिले पाहिजे आताच्या काळात पुस्तकी शिक्षणाच्या बरोबरीने इतर कलांनाही महत्त्व प्राप्त झाले आहे. म्हणून आपल्या अपेक्षेपेक्षा मुलांची आवड महत्त्वाची समजून त्याना जे हवे ते द्यावे प्रत्येकवेळा आमच्यावेळी असे नव्हते म्हणून मुलांना नाराज करू नये. या विस्तारलेल्या जगात त्याना त्यांच्या पंखानी उडू द्यावे

© सुश्री अनुराधा फाटक

मोबाइल – 9011058658

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मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ आठवण : मोठी माणसं – प्रा. तुकाराम पाटील

☆ मनमंजुषेतून : आठवण : मोठी माणसं – प्रा. तुकाराम पाटील ☆

मनोहर शेरकर ९८च्या एम.पी.एस.सी.चा बेस्ट कंॅडिडेट.लगेचच पी.एस.आय बनला.आज तो खात्याच कर्तबगार आफिसर म्हणून  गाजतो आहे .वर्षा पूर्वीच तो बदलून इथे आला. आपल्या चोख कामगिरीने इथले बिघडलेले वातावरण नियंत्रणा खाली  आणले. आता सारा परिसर योग्य बंदोबस्तात सुरळीत झाला आहे .याही भागात कोरोना आला आणि पाठलाग करत आले लाॅकडाऊन.सगळ वातावरण तंग. जबर बंदोबस्त ठेवूनही मोकाट फिरणा-या टवाळखोरासाठी परिसरात सातत्यान दिवसरात्र गस्त घालावी लागत होती.लोक दारापर्यंत आलेल्या मरणालाही गांभिर्यान घेत नाहीत याची त्याला प्रचंड चीड आली होती.मग मात्र आदेश न पाळणारावर तो नाईलाजान कठोर कारवाई करत होता .उगाचच फिरणाराना दंडुक्याचा चांगलाच प्रसाद देत होता. त्याचा नाईलाज होता पण आता फिरणाराना याच भाषेत सांगाव लागत होत.

सकाळचे दहा वाजले असतील.मनोहरणे तीन शिपाई बरोबर घेतले.जीप स्टार्ट केली आणि  मेन चौकात येवून तो थांबला. दोन पोर बुलेट उडवत आली त्याना मनोहरन थांबवल .विचारपूस केली .पोरांची उडवाउडवीची उत्तर मिळताच त्याना दंडुके लगवून घरी पिटाळल.मग त्याच लक्ष दुकानांच्या रांगेकड गेल.सगळ्या दुकानांची दार बंद होती.पण कोप-यातल्या एका दुकानाच शटर उघड होत .एक म्हातारी खुर्ची टाकून दारात बसलेली दिसली त्याला.त्याचा पारा चढला. तो तणतणत त्या म्हातारी जवळ गेला .म्हणाला

“कशाला उघडं ठेवलय दुकान.सगळी दुकान बंद आहेत .तुझच तेवढ उघड कशाला ठेवलयस.”

म्हातारी गोंधळली. तिला कहीच बोलता येइना. तोवर मनोहर दुकानात गेला. ते दुकान नव्हत हे त्याच्या लक्षात आल. मग तो म्हातारीची विचारपुस करत ह्मणाला

“आजी कशाला शटर उघडून बसलाय. ते बंदकरून घ्या आधी नहीतर शिपाई येवून तुम्हाला त्रास देतील दुकानआहे अस समजून”. मग म्हातारी पडेल आवाजात म्हणाली

“साहेब  शटर बंदच होत इतकावेळ पण माझा म्हातारा म्हणाला उघड शटर लय उकाडा हाय, जीवाची तलकी व्हायला लागलीया. म्हणून उघडलय आत्ताच.”

“कुठ आहे  म्हातारा”

“आत बाजेवरवर पडलाय”

मनोहर आतल्या खोलीत गेला. म्हातारा टावेलान वार घेत बाजेवर बसला होता. मनोहरन बारीक नजरेन खोलीची पहाणी केली. त्या दोघाची हालत त्याच्या लक्षात आली. मनोहरन सहज विचारल.

कुणी पोरबाळ दिसत न्हाईत. म्हातारा हासत म्हणाला.”एकच पोरगा हाय. त्यो मिलिटरीत हाय.आम्ही नवरा बायको  दोघच असतो हितं.”

मनोहरला खूप काही कळून चुकल. तेवढ्यात म्हातारी  म्हणाली.” घरातल्या खाण्यापिण्याच्या सगळ्या वस्तू  कालच संपल्या.सकाळपसन काहीच नाही खायाला.सगळच बंद हाय कुठन काय आणाव काय कळना झालया.कस दिवस काढायच पुढच?”

मनोहर हे ऐकून लगेच बाहेर पडला.त्यान एका शिपायाला बोलावल.आपल्या जवळचे दोन हजर रूपये शिपायाच्या हातावर ठेवत तो म्हणाला.”जा पेठेत तुमच्या ओळखीच्या दुकानदाराकडून घरात लागणार वाणसामान लगेच घेवून या. तुम्ही येई पर्यंत मी आहे  इथेच.”

शिपाई  तातडीने गेला साहित्य घेवून लगेच परत आला .मनोहरने आणखी हजार रूपये शिपायाला दिले.आणि म्हणाला “हे त्या आजीला देवून या.” शिपाई गेला .त्याने सामान खाली  ठेवले आजीच्या हातावर हजार रुपये ठेवत तो म्हणाला.”आमच्या साहेबानी दिलेत” ‘शिपाई  आला मनोहरने जीप स्टेशनकडे पळवली. म्हतारा म्हातारी भरल्या डोळ्यनी एका मेकाकडे नुसती पहातच बसली.

दुसरा दिवस उजाडला

म्हातारीने पुन्हा शटर खोलले आणि ती दोघ पायरीवर बसून साहेबाची वाट बघू लागली. दहाच्या सुमारास जीप आली. थांबली. मनोहरला उतरलेला पाहून म्हातारा म्हातारी साहेब  साहेब करून हाका मारू लागले.मग मनोहर नाइलाजानेच त्यांच्या जवळ  गेला .म्हातारी म्हणाली “बाळा फार उपकार झाले  तुझे .हे बघ आता तू आमच ऐक .तू दिलेल वाणसामान आमच्या गरजेच हाय. तेवढ घेतो  आम्ही. पण हे पैसे नकोत. हे तू परत घे. आणि  आमच्या सारख्या गरजूला यातन मदत कर. देव तुला उदंड यश देवो.” आता आश्चर्य करायची पाळी  मनोहरची होती.त्याला वाटल जगात गरिबालाही माणूसकीची कणव जोपासता येते . मीच फार मोठा नही कुणी. माझ्या माझ्या पेक्षाही खूप मोठ्या मनाची माणस आहेत समाजात. जपल पाहिजे त्याना. नाहीतर वाळवंटच होईल सा-या जगण्याच.

© श्री तुकाराम पाटील

चिंचवड पुणे ३३

मो .९०७५६३४८२४

२/८/२०

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