(डॉ प्रदीप शशांक जी द्वारा रचित एक समसामयिक विषय पर आधारित सार्थक एवं प्रेरणास्पद लघु व्यंग्य कथा “लाखों में एक”. )
☆ लघु व्यंग्य कथा – लाखों में एक ☆
वे व्यंग्यात्मा हैं, वे व्यंग्य ओढ़ते, बिछाते हैं तथा दिन रात व्यंग्य की ही जुगाली करते हैं । वे हमारे पास आये तो हमने उनसे सहज भाव से पूछ लिया कि ‘अब तक 75 ‘(व्यंग्य संकलन), ‘सदी के 100 व्यंग्यकार’ (व्यंग्य संकलन)’ एवं ‘131 श्रेष्ठ व्यंग्यकार ‘ (व्यंग्य संकलन) प्रकाशित हो चुके हैं लेकिन इनमें आप शामिल नहीं हैं ऐसा क्यों ?
उन्होंने (मन ही मन खिसियाते हुए ) कहा -‘अभी तो संख्या 131 पर ही पहुंची है, और आपको तो मालूम ही है कि हम 100, पांच सौ, या हजार में एक नहीं हैं, हम तो लाखों में एक हैं ।’
(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि। संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आचार्य जी की एक रचना। )
हम ई-अभिव्यक्ति पर एक अभियान की तरह प्रतिदिन “संदर्भ: एकता शक्ति” के अंतर्गत एक रचना पाठकों के लिए लाने जा रहे हैं। लेखकों से हमारा आग्रह है कि इस विषय पर अपनी सकारात्मक एवं सार्थक रचनाएँ प्रेषित करें। हम सहयोगी “साहित्यम समूह” में “एकता शक्ति आयोजन” में प्राप्त चुनिंदा रचनाओं से इस का प्रारम्भ कर रहे हैं। आज प्रस्तुत है श्री अमरेंद्र नारायण जी की कविता “ भारतवासी ”।
(आज “साप्ताहिक स्तम्भ -आत्मानंद साहित्य “ में प्रस्तुत है कशी निवासी लेखक श्री सूबेदार पाण्डेय जी द्वारा लिखित आलेख “काशी महिमा–काशी तीन लोक से न्यारी भाग–२”)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आत्मानंद साहित्य – काशी महिमा–काशी तीन लोक से न्यारी भाग–२☆
(दो शब्द लेखक के— काशी को मोक्षदायिनी नगरी कहा जाता है, हर व्यक्ति मोक्ष की कामना ले अपने जीवनकाल में एक बार काशी अवश्य आना चाहता है।आखिर ऐसा क्या है? कौन सा आकर्षण है जो लोगों को अपनी तरफ चुंबक सा खींचता है? लेखक इस आलेख के द्वारा काशी, काशीनाथ, गंगा, अन्नपूर्णा तथा भैरवनाथ की महिमा से प्रबुद्ध पाठक वर्ग को अवगत कराना चाहता है। आशा है आपका स्नेह प्रतिक्रिया के रूप में हमें पूर्व की भांति मिलता रहेगा । – सूबेदार पाण्डेय )
पिछले अंक में इस शोधालेख में आपने काशी तथा गंगा के पौराणिक कथाओं मान्यताओं के आधार पर उसकी जीवन शैली पौराणिक महत्व तथा विभूतियों के बारे लेखक की राय जानी, अब क्रमशःअगले भाग में काशी के बारे जनश्रुति तथा लोक मानस में व्याप्त ऐतिहासिक महत्त्व का अध्ययन करेंगे, तथा अपनी अनमोल प्रतिक्रिया से अभिसिंचित करेंगे। जी हां ये वही काशी है, जहां आज भी लोग विश्व के कोने-कोने से शिक्षा संस्कृति तथा अध्यात्म की गहराई को नजदीक से जानने समझने की कामना लेकर आते हैं। तथा अध्यात्मिक सांस्कृतिक जीवन शैली की गहराई में डूबकर यहीं के होकर रह जाते है।
वर्तमान समय में काशी के उत्तरी छोर पर बसा सारनाथ बौद्ध महातीर्थ यात्रा परिपथ है, यहीं से बौद्ध धर्म चक्र प्रवर्तन चला था, उसके उत्तर में जिले के अंतिम सीमा पर बसे कैथी ग्राम में गंगा गोमती के पावन संगम तट पर बसा महाभारत कालीन मार्कण्डेय महादेव का ऐतिहासिक अतिप्राचीन मंदिर तथा तपस्थली है जिसके बारे में पौराणिक मान्यता है कि अपनी तपस्या के प्रताप से उन्होंने भगवान शिव को प्रसन्न कर अपने आयु बल की पुनर्समीक्षा कर नवजीवन प्रदान करने के लिए देवताओं को बाध्य कर दिया था।
काशी के दक्षिण में महामना की ज्ञान बगिया भारतीय हिंदू युनिवर्सिटी है।
काशी के पूर्वी छोर पर गंगा के उस पार राजा बनारस का रामनगर का किला है, जहां आज भी राजसी आन बान शान के साथ एक माह तक अनवरत चलने वाला रामलीला का सांस्कृतिक मंचन तथा आयोजन होता है जो काशी के इतिहास की सांस्कृतिक धरोहर है। तथा सारे विश्व में राजपरिवार के मुखिया की पहचान भगवान शिव के सांस्कृतिक प्रतिनिधि के रुप में होती है। रामनगर किले के पास से बहने वाली गंगा अर्धचंद्राकार स्वरूप में बहती है जिसके जल में पड़ने वाले द्वीप समूहों तथा प्रकाश स्तंभों का झिलमिल प्रकाश शिव के मस्तक पर चंद्रमा के होने का मृगमरीचिका का भ्रम पैदा कर देता है। वहीं पश्चिमी छोर पर पंचकोसी परिक्रमा पथ पर बसा महाभारत कालीन भगवान शिव का रामेश्वर महादेव स्वरूप काशी क्षेत्र को अभिनव गरिमा से भर देता है।
काशी में गंगा घाट पर उगते सूर्य के साथ सुबह बनारस, तथा लखनवी शामें अवध अपनी अद्भुत छवि के लिए सारे विश्व में प्रसिद्ध है, सबेरे की गंगा घाट की सुर साधना तथा सायंकालीन गंगा आरती काशी के आध्यात्मिक सौंदर्य को नवीन आभा मंडल प्रदान करती है। यह काशी के आध्यात्मिक वातावरण का प्रभाव ही है, जो लोगों को बार बार काशी भ्रमण के लिए प्रेरित करता है।
राष्ट्रीय स्वतंत्रता के इतिहास में काशी वासियों का अभूतपूर्व योगदान रहा है। यहां के निवासियों का “अतिथि देवो भव” का सेवाभाव भक्ति साधनायुक्त जीवन-शैली से ओत-प्रोत फक्कडपन भरा खांटी देशी अंदाज की जीवन शैली लोगों के जीवन काल का अंग बन गई है। यहां रहनेवाला हर समुदाय तथा संप्रदाय का व्यक्ति उत्सवधर्मी है। यहां साल के तीसों दिन बारहों महीने कोई न कोई उत्सव चलता ही रहता है। जो काशी वासियों के हृदय में उमंग उत्साह का सृजन तो करता ही है, यात्रीसमूहों को आकर्षित भी करता है।तभी तो काशी की महिमा से आश्वस्त कबीर कहते हैं – जौ काशी तन तजें कबीरा,रामै कौन निहोरा रे।
अर्थात् काशी में महाप्रयाण करने पर तो मोक्ष अवश्यंभावी है, इसमें राम का कैसा एहसान है, और अंतिम समय में अपने सत्कर्मो के परीक्षण के लिए मगहर चले जाते हैं। अनेक लोक कहावतें भी काशी को महिमा मंडित करती हैं, तथा उसकी महत्ता दर्शाती है, लोक मानस में ये उक्ति प्रचलित है ———–
ये कहावत काशी वासियों के हृदय का उद्गगार है। जिसमें आत्मसंतुष्टि से ओत-प्रोत जीवन की अलग ही छटा दीखती है। जिस काशी की महिमा पुराणों तथा लोक मानस ने गाई है, उस काशी के बारे में यह भी किंवदंती है कि इसी काशी में बाबा विश्वनाथ ने मां अन्नपूर्णा से भिक्षा स्वरूप वरदान मांगा था कि यहां भूखा भले ही कोई उठे, पर सायंकाल कोई भी व्यक्ति भूखा न सोये। काशी में मां गंगा तथा मां अन्नपूर्णा पेट भरने के लिए भोजन तथा पीने के लिए पवित्र गंगा जल हमेशा उपलब्ध कराती हैं। इस क्षेत्र में मां अन्नपूर्णा की कृपा सदैव बरसती है। यहां रहनेवाला कोई भी जीव चाहे पशु-पक्षी ही क्यों न हो, वह मां अन्नपूर्णा के आंचल की छांव तले सुखी शांत जीवन यापन करता है। यहां का धर्मप्राण चेतना युक्त जनसमूह पशुओं पंछियों बीमारों अपाहिजो सबका ध्यान रखता है। नर सेवा नारायण सेवा के कथन में विश्वास रखता है, बाबा विश्वनाथ को अवढरदानी भी कहते हैं। वह अपना सब कुछ लुटा कर लोगों का दुख हरते हैं। इसी विश्वास और भरोसे पर तो रामबनवास के समय अयोध्या में महाराज दशरथ का आकुल व्याकुल आर्तमन पुकार उठता है।
यही कारण है कि काशी में विश्वनाथ, मां अन्नपूर्णा, मां गंगा तथा काशी कोतवाल भैरवनाथ प्रात: स्मरणीय तथा पूजनीय है। जिनके स्मरण मात्र से जीव स्थूल शरीर त्याग स्वयं शिवस्वरूप हो जाता है। इसी भरोसे तथा विश्वास के पुष्टि में कबीर लिख देते हैं———
हेरत हेरत हे सखी ,रहा कबीर हेराइ।
बूंद समानी समझ में अरु किछु कहा न जाइ।।
संभवतः यही कारण बना होगा इस कहावत के पीछे कि – काशी तीन लोक से न्यारी।
☆ जीवनरंग ☆ कथा –गोटूचे भावविश्व ☆ सौ.दीपा पुजारी☆
संध्याकाळचे पाच वाजले होते. आजोबांच्या बरोबर गोटू बाल्कनीत बसला होता . समोरच्या पिंपळाच्या झाडावरील कावळे एकदम उडाले. “काव काव”, “काव काव” करत सगळे थव्या थव्यांनी ऊडत इकडेतिकडे गेले. गोटूनं आजोबांना विचारलं,
“आजोबा, कित्ती कावळे?” त्याचे इवले हात पसरले होते. भाबडे डोळे मोठे झाले होते.
आजोबा म्हणाले, ” गोटू, शाळा सुटली कावळ्यांची. आता घरी चाललेत ते.”
“घरी?”, गोटूनं विचारलं.” पण आजोबा, कावळ्यांच घर असतं?”
आजोबा थोडे विचारात पडले. थोड्या वेळानं म्हणाले,”बाळा,कावळीणीला अंडी घालायची असतात ना; फक्त तेंव्हाच कावळा घरटं बांधतो. कसंही ओबडधोबड, काट्याकुट्या किंवा मिळेल ते साहित्य वापरुन बांधलं जातं.”
गोटू, “हो? आजोबा मला दाखवाल एकदा?”
“दाखवेन हं बाळ.”
गोटू एकदम ऊठला. “आजोबा मला आजीनं काऊ-चिऊची गोष्ट सांगितली आहे.
ती हो s s ती हो, ती नाही का, पाऊस पडतो
आणि काऊचं घर जातं वाहून. “आजोबा,” तो पुढं म्हणाला ,” हा काऊ एकदमच बुद्दु दिसतोय.”
“का रे बाबा? असं का वाटलं तुला . . . . .
” बघा नं आजोबा; शाळेला जातो तरी घरटं बांधता येत नाही. चिऊताई मात्र एकदम स्मार्ट . . . . . . .
“ती रे कशी?”
“शाळेला कुठं जाते? तरीही घरटं बांधते. . ते ही पावसात वाहून न जाणारं . . . ”
आजोबा नातवाचा आविर्भाव बघून हसले खरे. पण थोडेसे विचारात पडले. सगळ्याच गोष्टी शिक्षणामुळं, पदवी घेतल्यामुळं मिळतात असं नाही. बर्याचशा गोष्टी केवळ निरिक्षणातून, विवेकबुद्धीनं समजून घेता येतात. घरटं बांधणं हे कौशल्य आहे, जे चिमणीकडं आहे; सुगरणींकडं आहे.
कावळा, कबूतर असे काही पक्षी घरटं बांधताना दिसत नाहीत. कावळा वीणीच्या हंगामापुरतं का होईना घरटं बांधतो आणि फसतो. कोकीळकंठी पिल्लांचं गायन सुरु झाल्यावरच जागा होतो. आता काव काव आणि फडफड करत बसण्यापलिकडं काहीच पंखात उरत नाही. कोकीळेच्या रियाजात अंडी उबवण्यामुळं खंड पडत असावा कदाचित. कावळ्यालाही थोडी कमी अक्कल असते हे ही बरच म्हणायचं. तेव्हढ्यात गोटूच्या हाका कानावर आल्या . . .
” आजोबा . . . . आजोबा. . . . . .
कावकाव थांबली होती. पिंपळ शांत ऊभा होता. गोटू आजोबांना बॅट बॉल खेळायला बोलवत होता.
निवृत्ति नंतर मराठी लेखनास सुरवात. अनेक कविता प्रकाशनाच्या मार्गावर, दिवाळी अंकांमधून कथा, कविता प्रकाशित. वाचन लिखाण यांची आवड.
‘स्मृति कलश’ या ज्योती देशपांडे यांच्या पुस्तकाचे शब्दांकन, संपादन.
☆ विविधा ☆ ल्क्ष्मण रेषा☆ सौ. अमृता देशपांडे ☆
प्रभु श्रीराम कस्तुरीमृगामागे गेले, रामाची ‘धाव लक्ष्मणा धाव’ अशी आरोळी ऐकून सीता घाबरली. तिने लक्ष्मणाला रामाच्या मदतीसाठी जाण्यास भाग पाडले. सीतेच्या सुरक्षिततेसाठी लक्ष्मणाने आश्रमाभोवती आपल्या बाणाच्या टोकाने एका रेषेचे कुंपण घातले आणि त्या बाहेर पाऊल न टाकण्याचा इशारा सीतामाईला देऊन तो रामाच्या आवाजाच्या दिशेने गेला.
पुढे काय झाले, हे आपण सर्वचजण जाणतो. त्याचे कारणही जाणतो. तेव्हापासून हेच कुंपण ‘लक्ष्मणरेषा’ म्हणून ओळखलं जाऊ लागलं. तिथे सीतामाई होती, तिचं अपहरण झालं, म्हणून लक्ष्मणरेषा फक्त स्त्रियांसाठीच असते, असा सोयीस्कर अर्थ नोंदवला गेला.
लक्ष्मणरेषा ही एकदाच ओढली गेली आणि तिचे उल्लंघन केल्याने जो अनर्थ घडला, त्यामुळे पुराणातील एक शिकवण किंवा एक इशारा म्हणून ती अजरामर झाली.
लक्ष्मणरेषा म्हणजे आत्मसंयमन, लक्ष्मणरेषा म्हणजे स्वत्वाचे रक्षण, लक्ष्मणरेषा म्हणजे आचारविचारांसाठी एक नियम, लक्ष्मणरेषा म्हणजे चारित्र्य, शील यांचे जतन आणि संवर्धन करण्यासाठी एक सुरक्षित कवच.
चारित्र्य आणि शील यांचे जतन आचार-विचार, आहार-विहार, याच्या माध्यमातून व्यक्त होते. आचार म्हणजे आपले वागणे,बोलणे, समाजात वावरणे, पोषाख, दुस-याला मान देणे, आदर करणे.
विचार म्हणजे पूर्वकाळातील अनुभव आणि संस्कार यातून आपल्याला झालेले ज्ञान व त्याचा सद्यः परिस्थिती साधलेला समन्वय.
आहार म्हणजे शरीराला आवश्यक, प्रकृतीला अनुरूप असा आणि गरजेपुरताच करावयाचा अन्नपुरवठा.
विहार म्हणजे शरीर व मनाला उत्साह, आनंद, तरतरी देणारा अनुभव. तो व्यायाम असेल, पर्यटन असेल किंवा स्थलपालट असेल.
वरील चारही गोष्टी करत असताना, सृष्टीवर त्या जगन्नियंत्याचे अधिपत्य आहे, हे जाणून कर्म करणे. चांगले- वाईट दोन्ही कर्मे तो पहात आहे, याची जाणीव सतत ठेवणे. हे संस्कार मनावर असावे लागतात. यश, आनंद, समाधान ही चांगल्या कामाची फलश्रुती असते तर वाईट कृतीची शिक्षा ही भोगावीच लागते. हे ध्यानात ठेवून चांगले कर्म करणे हे सुसंस्कृतपणाचे लक्षण आहे.
भारतीय संस्कृतीचा हा अलिखित पण अधोरेखित नियम आहे. समाजात वावरताना देहबोली ही महत्त्वाची असते. ही एक अलिखित बोली आहे.ती व्यक्तीच्या व्यवहारातून, चालण्या बोलण्यातून राहणीमानातून, पोषाखावरून, व्यक्त होते. ही संयमाची लक्ष्मणरेषा अतिशय काटेकोरपणे पाळावी लागते. जरासं सुद्धा रेषेबाहेर पडलेलं पाऊल पाय घसरायला कारणीभूत ठरू शकते. हे केवळ नीतीमत्तेच्या संदर्भात नाही तर सर्व बाबतीत आहे.
हा नियम स्त्री-पुरूष, गरीब-श्रीमंत, लहान-मोठे, सर्वांना लागू असतो. स्थलकाल, वर्णजाती, याचे परिमाण न राखता, पृथ्वीवरच्या मनुष्याला सर्व समान लागू असतो. प्रत्येकाचे वर्तन, उपजीविकेचे व्यवहार यासाठी ही आहे.
ह्याची जाणीव घराघरातून वडीलधा-यांनी स्वतः सांभाळावी, तरूण वर्गाला करून द्यावी. शिक्षण संस्थांनी याबाबतीतले नियम कडक केले पाहिजेत. अनेक संस्थांनी अशी पावले उचलली आहेतही.
प्रत्येकानेआपल्या मनात लक्ष्मणरेषेचे भान ठेवलेच पाहिजे. प्रत्येक वेळी, प्रत्येक ठिकाणी आपले रक्षण करण्यासाठी आईवडील, भाऊ,दीर, मित्रमैत्रिणी, पोलिस बरोबर असतीलंच असं नाही, पण मनातली लक्ष्मणरेषा आपल्याला संरक्षण नक्कीच देते.
धुंद होऊन जगताना संयम हवा. बोलताना संयम हवा.विचार करताना लक्ष्मणरेषेची जाणीव असावी. लक्ष्मणरेषा प्रत्येकाने आपल्या पुरती सीमित केली तरी खूप आहे.
छोटे-मोठे अनर्थ घडूच नयेत म्हणून लक्ष्मणरेषेचा आदर करावा, स्वतःच्या आणि दुस-यांच्याही.
नमस्कार मंडळी…जागतिक चमचा दिनाच्या हार्दिक शुभेच्छा… ‘सेम टू यू‘ तरी म्हणा.. निदान अंगठा तरी….. काय? तुम्हाला‘ चमचा दिन‘ माहितीच नाहीये? आत्ताच “स्वयंपाक दिन” नाही का साजरा झाला व्हॉटस् अप वर? ..म्हणजे माहिती असणारच… तरीही चमचा दिनाबद्दल नाही माहिती? आश्चर्य आहे. बरं ऐका …. हल्ली चमच्याशिवाय कुणाचेच पानही हलत नाही… बरोबर? विदेशी पदार्थ तर चमच्याशिवाय खाताच येत नाहीत अनेकदा. मग त्यांचे अनुकरण केलेच पाहिजे. म्हणून हल्ली घरोघरी “प्लेट-बाऊल-ग्लास” या जेवणाच्या सरंजामामध्ये चमचाही असतोच असतो. का काय?
आवडत्या आमटीची वाटीच उचलून तोंडाला लावणं आता अशिष्ट समजलं जातं. अळूच फतफत सगळ्या बोटांनी गोळा करून तोंडात घालून सूर्र् ss आवाज करत तृप्त व्हायचं, बासुंदी-खिरीच्या वाट्याच्या वाट्या मनसोक्त तोंडाला लावत मनमोकळी ढेकर द्यायची, हा तर चक्क गावंढळ पणाच ठरतो हल्ली. त्या ऐवजी बोटांची देखणी हालचाल करत चमचा हळूवारपणे अशा पदार्थांच्या अर्ध्या पाऊण भरलेल्या बाऊलमध्ये बुडवून, एकही थेंब न सांडता ओठाला लावायचा, आणि फूर्र.. बीर्रा असला कुठलाही असभ्य आवाज न करता जिभेवर रिकामा करायचा… तोपर्यंत तो पदार्थ गार होऊन जातो, चव कळत नाही, असले वायफळ आरोप अजिबात करायचे नाहीत. शेवटी sophisticated दिसणं महत्वाचं.
याचं बाळकडू आताशा लहानपणापासूनच पाजलं जातं. बाळाला बाटलीतून दूध पाजणे आरोग्याला घातक असल्याने ते चमच्याने पाजावे असा विचार पुन्हा प्रचलित झाला आहे. त्यामुळे तान्हेपणा पासूनच बाळाची चमच्याशी ओळख होते. पुढे त्याला “आत्मनिर्भर” करण्याच्या उदात्त हेतूने, “हायचेअर” वर बसवून, समोर पोळीचे तुकडे व भाजी ठेवली जाते. बाळ एक तुकडा महत्प्रयासाने चमच्यातउचलते. मग तो भाजीत टेकवून पुन्हा उचलण्याचे कष्ट करण्यापेक्षा ते हुशार पिढीतले मूल, फक्त पोळीचा तुकडा तोंडामध्ये कोंबून, मग चमच्यात भाजी घेतल्यासारखे करून तो तोंडाला लावतो. हीच — “आत्मनिर्भरता”. इथे पोटात भाजी किती जाते हा मुद्दा गौण ठरतो. पण चमच्याने जेवण्याच हे नाटक मुलं इतकं लांबवतात की शेवटी मम्मी वैतागून त्याला हाताने भरवून टाकते, हे इथे महत्वाचे नाही.
तर अशा रीतीने “चमचा” आपल्या आयुष्यात लहानपणापासूनच महत्वाची भूमिका बजावायला लागतो. आणि हे महत्त्व लक्षात घेऊनच त्याच्याप्रती कृतज्ञता म्हणून हा “चमचा डे” साजरा केला जातो…. बरोब्बर…. Mother‘s डे, father‘s डे कसे वर्षातून एकदा साजरे केले की इतिकर्तव्यता होते.. तसंच. पण एक फरक आहे. मदर-फादर प्रत्येकाला एकेकच असतात. पण चमचे?…. प्रत्येक घरात इतके वेगवेगळ्या प्रकारांचे, आकारांचे आणि उपयोगाचे चमचे असतात की, “माझ्याकडे सगळे मिळून इतके चमचे आहेत”, असं कमालीची गृहकृत्यदक्ष स्त्रीही १००% खात्रीने सांगू शकणार नाही हे मी खात्रीने सांगू शकते.
याशिवाय घराबाहेरही कित्ती चमचे असतात. शेजारच्या दारापासूनच त्यांची जी रांग सुरू होते, ती थेट फक्त दिल्लीपर्यंतच नाही, तर आता आंतरराष्ट्रीय स्तरावर जाऊन पोहोचलेली आहे. आणि त्यांचं काम इतकं वैशिष्ट्यपूर्ण असतं की ” चमचेगिरी” हा शब्द त्यांच्यासाठी पुरेसा नसतो. विशेष म्हणजे हे चमचे अदृश्य असतात. त्यांचे रंग-रूप- आकार आणि कामाचा आवाका, अगदी मुरब्बी मातब्बरांनाही समजू शकत नाही. तरीही सगळ्याच प्रकारच्या कार्यक्षेत्रात ते सतत वापरले जातात. अहो घरातले चमचे एकवेळ चिकाटीने नेमके मोजता येतील, पण हे घराच्या बाहेरचे चमचे?….ते चमचे आहेत हेच मुळात कितीदा समजत नाही, मग मोजणं तर लांबच… म्हणजे बघा, चमचा कुठल्याही प्रकारचा असला , तरी त्याचं काम कुणासाठी तरी गरजेचं आणि महत्वाचं असतंचना? मग त्याच्याबद्दल जाहीर कृतज्ञता व्यक्त करणं हा औपचारिक रिवाज पाळायला हवाच …. पटतंय ना? मग म्हणा तर ….”जागतिक चमचा दिनाच्या सर्वांना हार्दिक शुभेच्छा ” …….
ती आईला आणि नातवाला भेटायला निघालीय. म्हातारपण लहान मुलासारखं अस तं म्हणून आईला काय खाऊ न्यायचा, नातवाला काय न्यायचा याचा ती विचार करते. आता तीही थकलीय पण दोन्ही ठिकाणी काळजाचे घड होते. त्यांच्यासाठी काहीही करण्यासाठी तिला उत्साह येतोच. नवऱ्याच्या रिटायरमेंटनंतर ते गावाजवळ राहत होते। मुलगा नोकरिमित्त शहरात। माहेर जवळच होतं तिथून. आईला भेटून तसंच मुलाकडे जायचं. दोघांनाही काहीतरी न्यायला हवं हे सतत आतून वाटतं. मोकळं जाणं बरं वाटत नाही. विकतचे खाण्याचे पदार्थ घेणे पटत नाही. भले ही भेट महिन्या दोन महिन्यातून का असेना. विकतचे काही नेणं तिला आवडतच नाही. विकत त्याचं ते घेऊ शकतातच की. आपलं माया, प्रेम त्यात उतरणार आहे का?
आईसाठी बिनतिखटाची चार थालीपीठ केली. नातवाला एक घेतल. खजूर आईसाठी तर काजू बदाम नातवासाठी खडीसाखर दोघांना आवडते. रव्याचे लाडू लेकासाठी बेसनाचे सुनेला आवडतात. माहेरी भाऊभवजयीला, भाचरांना लाडू. असा सगळा हिशोब करत तिची आवरा आवरी चाललेली. नवऱ्याचा दोन्ही वेळेचा सैपाक करायचा. उद्यासाठी मदतनि
साला सांगायचं कसा कसा सैपाक कर… नवऱ्याला बजावलं, चारदा जेवण झालं की, नीट झाकून ठेवा। चपतीचा डबा पाण्याच्या ताटात ठेवा, नाहीतर मुंग्यांनी लगेच भरतो। वेळेत गोळी खा आणि तसा मेसेज करा. हे सगळं करुन नऊच्या गाडीने निघायला हवं. नाहीतर गाडी चुकली कीं बारालाच एकदम. तिची घाई चाललेली.
नवऱ्याच्या सूचना ऐकयला लागत होत्याच. परवा लवकर निघ. वगैरे, वगैरे…
तिला आईजवळ दोन दिवस आणि नातवाजवळ चार दिवस राहावं वाटत होतं, पण नवऱ्याला एकटं सोडून नकोही वाटत होतं. ती म्हणायची आपण मुलाजवळच राहू पण नवऱ्याला हे पटत नाही. स्वातंत्र हवं प्रत्येकाला.
एकत्र राहून नाही का मिळत???? कुणाच्या जगण्यात ढवळाढवळ नाही करायची. आपापली कामे करायची.
तिला मात्र एकत्र राहण्यामुळे सुरक्षित वाटतं. तसं एकेकट नाही वाटत. आतापासून सवय लागली एकमेकांची तर पुढे सेवा करतील. तिला मुलांपासून दूर राहणं पटतच नाही. मुलांच्या स्वातंत्र्याच्या गप्पा करणाऱ्या नवऱ्याला बायकोच्या भावना का कळू नयेत???
ती एसटीत बसली तेव्हा तिला विसावा मिळाला. शांतपणे ती डोळे मिटून बसली. काय घेतलं, काय राहिलं तर नाही ना याची मनोमन उजळणी करत असताना तिचं मन भरून आलं. का कुणास ठाऊक तिला रडावस वाटलं. दुःख नाही राग नाही तरी असं का व्हावं????
ती विचार करत असताना जाणवलं, आपली आई असच सगळ करायची. नको म्हटलं तरी ऐकायची नाही. तिचा त्रास बघून रागवायचेही, तरी ती करत राहायची॰ एकदा दिवाळी झाल्यावर आम्ही गेलो होतो आणि तिचे लाडू संपलेले. लेक आली आणि लाडू नाहीत म्हणजे काय….
आम्हाला लगेच दुसऱ्या दिवशी परतायचे होते. ती पहाटे उठली, जात्यावर डाळ दळली. कारण बेसनही संपले होते। आम्ही उठायच्या आत तिचे लाडू तयार झाले होते. किती वाजता उठली होतीस असं विचारलं तर म्हणाली, झोपले कुठे होते ?…
आत्ता कळू लागलंय ती हे सगळं का करत होती? हे करण्यात तिला केवढी ऊर्जा मिळत होती. कष्टाचं तिला काहीच वाटत नव्हतं. यालाच तर प्रेम माया जिव्हाळा म्हणतात.
हे प्रेम एकत्र राहून नातवाला शिकवायला हवं. सहवासातील प्रेम त्याला नाही मिळालं तर तो माणूसघाणा होईल, असं तिला वाटायचं. पण नवरा ऐकत नाही.
तिला नातवापासून दूर राहावं लागतं. त्यामुळे तिला वाईट वाटतं….
आई फोनसाठी जीव तोडते. सतत फोन कर म्हणते, तेव्हा कळते की आपल्या माणसाचा आवाज ऐकण्यासाठी जीव किती आसुसलेला असतो.
ही असोशी कशानेही मिटत नाही. नातवाचा आवाज ऐकण्यासाठी तीही अशीच व्याकुळ होते. आत्ता तिला आईचं मन कळू लागलंय. ती आजी झाल्यानंतर……