हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आत्मानंद साहित्य – यही बाकी निशां होगा ☆ श्री सूबेदार पाण्डेय “आत्मानंद”

श्री सूबेदार पाण्डेय “आत्मानंद”


(आज  “साप्ताहिक स्तम्भ -आत्मानंद  साहित्य “ में प्रस्तुत है महान स्वतंत्रता सेनानी स्व मंगल पांडे एवं उनकी वर्तमान पीढ़ी की जानकारी देता एक देशभक्ति से ओतप्रोत  ओजस्वी आलेख  –yahi बाकी निशान होगा। भारत सरकार ने स्व मंगल पण्डे जी के सम्मान में एक डाक टिकट भी जारी किया था।  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आत्मानंद साहित्य –  यही बाकी निशां होगा ☆

स्व जगदम्बा प्रसाद मिश्रा जी द्वारा 1916 में रचित कालजयी रचना आज भी उतनी ही प्रासंगिक है – –

शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले।
वतन पर मरने वालों का‌ यही बाकी निशां होगा ।।

इस कथन को सत्य साबित होते देखना वास्तव में हृदय को सुखद अनुभूति कराता है। घाघरा और गंगा की पावन गोद में बसे बलिया जिले के माटी की तासीर ही ऐसी है, जहां की मातायें सिंह शावकों को जन्म देती है जिनकी घनगर्जना से दुश्मनों की छाती फटती है। वतन की आन बान शान के लिए अपनी आत्माहुति देना यहां के रणबांकुरों का शौक तो है ही, यहां की मिट्टी के इतिहास में हमारी सांस्कृतिक सभ्यताओं के ध्वजवाहक ऋषि मुनियों की गौरवगाथा भी समाहित है।

यहीं की मिट्टी से जन्म लेता है, मंगल पाण्डेय नामक रणबांकुरा फौजी  जिसका जन्म  १९ जुलाई सन १८२७ में बलिया जिले के नगवां में हुआ था।  जिन्होंने अपने युवा काल में ३४वी बटालियन नेटिव इन्फैंट्री बैरकपुर बंगाल की पैदल सेना में सैनिक नं १४४६ के रूप में नौकरी की।  अंग्रेज गोरों के खिलाफ  स्वतंत्रता आंदोलन के बगावत  का इतिहास रचने का श्रेय इनके हिस्से जाता है।  जिन्होंने बगावत का इतिहास लिखते हुए अंग्रेज अफसरों पर धावा बोल दिया।  जिसके चलते सारे भारत में  स्वतंत्रता आंदोलन की चिंगारी धधक कर जल उठी।

अंग्रेज सरकार घबरा गई औरउन्हें आनन फानन में ८अप्रैल १८५७ को फांसी दे दी गई , लेकिन वह जवान मरते मरते अपनी शहादत के  बल पर अपने पदचिन्हों के बाकी निशान छोड़ गया तथा अपने कर्मों से स्वतंत्रता आंदोलन का प्रथम अध्याय स्वर्ण अक्षरों में लिख गया।  उसी कुल में स्व० पदुमदेव पाण्डेय जी का जन्म  हुआ , जिन्हें अदम्य शौर्य साहस कर्मनिष्ठा  वंशानुगत विरासत में मिली थी।  अपने कुल की उसी अक्षुण्ण परंपराको कायम रखते हुए  उन्होंने  सन् १९६४ स्पोर्ट्स कोटे से फौज की नौकरी की  और सन् १९६५ में पाकिस्तान भारत के युद्ध में अद्म्य शौर्य  साहस तथा विपरित परिस्थितियों में  युद्ध लड़ कर  शत्रु का संहार ही नहीं किया, बारूद खत्म होने पर भी रण नहीं छोड़ा, बल्कि अदम्य साहस का परिचय देते हुए दुश्मन की निगाहें बचा अपने अनेक घायल साथियों को पीठ पर लाद उन्हेंअस्पताल तक ला उनकी प्राण रक्षा की।  जिसके बदले उन्हें भारत सरकार द्वारा  स्वर्ण पदक दे सम्मानित किया गया।

उसके ठीक  छह साल बाद सन् १९७१ में फिर एक बार शत्रुओं ने युद्ध थोपा ।  इस बार फिर उस वीर जवान  ने अपनी टुकड़ी के साथ अदम्य साहस का परिचय देते हुए रण में दुश्मन का मानमर्दन करते हुए  विजय श्री का वरण कर विजेता बन रण से लौटे। सन् १९७३ में उन्हें एक बार फिर ‌उत्कृष्ट  सेवा के बदले कांस्य पदक हेतु चुना गया,जो उनके समर्पण कर्तव्यपरायणता  का सम्मान है और अंत में अपना सेवा काल  सकुशल  पूरा कर  सन् १९८० में सेवा  निवृत्त हो गये । सकुशल जीवन यापन करते हुए २६ अगस्त सन् २०१७ को परलोक गमन करते हुए  अपने त्याग तपस्या  मानव सेवा की उत्कृष्ट मिसाल पेश कर अपने पदचिन्हों का निशान बाकी छोड़ गये जो सदियों सदियों तक लोगों की ज़ेहन में बसा रहेगा, अपनी लेखनी के माध्यम से हम मां भारती के उस लाल को भावभीनी विनम्र श्रद्धांजली अर्पित करते हैं।

© सुबेदार पांडेय “आत्मानंद”

संपर्क – ग्राम जमसार, सिंधोरा बाज़ार, वाराणसी – 221208

मोबा—6387407266

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मराठी साहित्य – कविता ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – स्वप्नपाकळ्या # 17 ☆ यामिनी ☆ श्री प्रभाकर महादेवराव धोपटे

श्री प्रभाकर महादेवराव धोपटे

ई-अभिव्यक्ति में श्री प्रभाकर महादेवराव धोपटे जी  के साप्ताहिक स्तम्भ – स्वप्नपाकळ्या को प्रस्तुत करते हुए हमें अपार हर्ष है। आप मराठी साहित्य की विभिन्न विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। वेस्टर्न  कोलफ़ील्ड्स लिमिटेड, चंद्रपुर क्षेत्र से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं। अब तक आपकी तीन पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं जिनमें दो काव्य संग्रह एवं एक आलेख संग्रह (अनुभव कथन) प्रकाशित हो चुके हैं। एक विनोदपूर्ण एकांकी प्रकाशनाधीन हैं । कई पुरस्कारों /सम्मानों से पुरस्कृत / सम्मानित हो चुके हैं। आपके समय-समय पर आकाशवाणी से काव्य पाठ तथा वार्ताएं प्रसारित होती रहती हैं। प्रदेश में विभिन्न कवि सम्मेलनों में आपको निमंत्रित कवि के रूप में सम्मान प्राप्त है।  इसके अतिरिक्त आप विदर्भ क्षेत्र की प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्थाओं के विभिन्न पदों पर अपनी सेवाएं प्रदान कर रहे हैं। अभी हाल ही में आपका एक काव्य संग्रह – स्वप्नपाकळ्या, संवेदना प्रकाशन, पुणे से प्रकाशित हुआ है, जिसे अपेक्षा से अधिक प्रतिसाद मिल रहा है। इस साप्ताहिक स्तम्भ का शीर्षक इस काव्य संग्रह  “स्वप्नपाकळ्या” से प्रेरित है ।आज प्रस्तुत है उनकी एक  श्रृंगारिक कविता “यामिनी“.) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – स्वप्नपाकळ्या # 17 ☆

☆ यामिनी

 

यामिनी गं कामिनी,तू गं माझी साजणी

ये जरा,जवळी अशी ये जरा

ये गं मिठीत राहू, स्वप्नगीत गाऊ

ये जरा,जवळी अशी ये जरा!!

 

रात्र जशी झाली ,तसा चंद्रही निघाला

तारीके तू दूर नको,जवळी ये म्हणाला

इश्यऽऽ म्हणुनी,लाजुनिया चूर चूर झाली

ये जरा जवळी अशी………!!

 

मध्यरात्र झाली,काम जागृत ही झाला

रती मदन तृप्तीचा, क्षण जवळी आला

एक होऊ एक राहू, एक वेळ एकदा

ये जरा जवळी अशी………!!

 

पहाटेस थंडगार,झुळुक जशी आली

तृप्तीच्या सागरात, डुंबुनिया गेली

देहातुनी गोड अशी शिरशिरी निघाली

ये जरा जवळी अशी …….!!

 

©  प्रभाकर महादेवराव धोपटे

मंगलप्रभू,समाधी वार्ड, चंद्रपूर,  पिन कोड 442402 ( महाराष्ट्र ) मो +919822721981

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आध्यत्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता ☆ पद्यानुवाद – चतुर्दश अध्याय (8) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता

हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

चतुर्दश अध्याय

गुणत्रय विभाग योग

(सत्, रज, तम- तीनों गुणों का विषय)

 

तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम् ।

प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत ।।8।।

तमगुण रचता देह में प्रबल मोह का जाल

जो अज्ञान, प्रमाद में जीव को देता डाल ।।8।।

भावार्थ :  हे अर्जुन! सब देहाभिमानियों को मोहित करने वाले तमोगुण को तो अज्ञान से उत्पन्न जान। वह इस जीवात्मा को प्रमाद (इंद्रियों और अंतःकरण की व्यर्थ चेष्टाओं का नाम ‘प्रमाद’ है), आलस्य (कर्तव्य कर्म में अप्रवृत्तिरूप निरुद्यमता का नाम ‘आलस्य’ है) और निद्रा द्वारा बाँधता है।।8।।

 

But know thou Tamas to be born of ignorance, deluding all embodied beings; it binds fast, O Arjuna, by heedlessness, sleep and indolence! ।।8।।

 

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

ए १, शिला कुंज, विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, नयागांव,जबलपुर ४८२००८

vivek1959@yahoo.co.in

मो ७०००३७५७९८

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हिन्दी साहित्य – सस्वर लघुकथा ☆ पूर्वाभ्यास – डॉ कुंवर प्रेमिल ☆ स्वरांकन एवं प्रस्तुति श्री जय प्रकाश पाण्डेय

डॉ कुंवर प्रेमिल

( संस्कारधानी जबलपुर के वरिष्ठतम साहित्यकार डॉ कुंवर प्रेमिल जी को  विगत 50 वर्षों  से लघुकथा, कहानी, व्यंग्य में लगातार लेखन का अनुभव हैं। अब तक दस पुस्तकें प्रकाशित। 2009 से प्रतिनिधि लघुकथाएं (वार्षिक) का सम्पादन एवं ककुभ पत्रिका का प्रकाशन और सम्पादन। वरिष्ठतम  साहित्यकारों ने  उम्र के इस पड़ाव पर आने तक जीवन की कई  सामाजिक समस्याओं से स्वयं की पीढ़ी  एवं आने वाली पीढ़ियों को बचाकर वर्तमान तक का लम्बा सफर तय किया है,जो कदाचित उनकी रचनाओं में झलकता है। हम लोग इस पीढ़ी का आशीर्वाद पाकर कृतज्ञ हैं।  अग्रज श्री जय प्रकाश पाण्डेय जी ने आपकी एक  कालजयी लघुकथा  ” पूर्वाभ्यास” का स्वरांकन प्रेषित किया है, जिसे हम अपने प्रबुद्ध पाठकों के साथ साझा कर रहे हैं। )

☆ लघुकथा – पूर्वाभ्यास ☆  

श्री जय प्रकाश पाण्डेय जी के ही शब्दों में  
संस्कारधानी के ख्यातिलब्ध वरिष्ठतम साहित्यकार डॉ कुंवर प्रेमिल जी का  लघुकथाकार के रूप में हिंदी साहित्य में एक विशेष स्थान है। आपने 350 से अधिक लघुकथाओं की रचना की है। यह अत्यंत गर्व का विषय है कि आपकी लघुकथा “पूर्वाभ्यास” को उत्तरी महाराष्ट्र के जलगांव विश्विद्यालय के पाठ्यक्रम वर्ष 2019-2020 में स्थान मिला है।
आप परम आदरणीय डॉ कुंवर प्रेमिल जी की कालजयी लघुकथा “पूर्वाभ्यास” उनके चित्र अथवा यूट्यूब लिंक पर क्लिक कर उनके ही स्वर में सुन सकते हैं।

 

आपसे अनुरोध है कि आप यह कालजयी रचना सुनें एवं अपने मित्रों से अवश्य साझा करें। ई- अभिव्यक्ति इस प्रकार के नवीन प्रयोगों को क्रियान्वित करने हेतु कटिबद्ध है।

 

© डॉ कुँवर प्रेमिल

एम आई जी -8, विजय नगर, जबलपुर – 482 002 मोबाइल 9301822782

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि ☆ सत्य ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) 

☆ संजय दृष्टि  ☆ सत्य 

प्रलय के बाद

बचा रहता है सत्य,

सृजन के पूर्व

विद्यमान होता है सत्य,

सत्य आदिबिंदु है,

सत्य इतिबिंदु है,

अपरंपार ही सत्य

संसार भी सत्य,

ईश्वर ही सत्य

नश्वर भी सत्य,

ज्ञान ही सत्य

विज्ञान भी सत्य,

यथार्थ ही सत्य

कल्पना भी सत्य,

सूक्ष्म ही सत्य

स्थूल भी सत्य,

एक ही सत्य

अनेक भी सत्य,

सत्य अनादि

सत्य अनंत,

सत्यं परं धीमहि

एकं सद् विप्रा बहुधा वदंति!

©  संजय भारद्वाज

(प्रातः 9.55 बजे, 17.6.19)

# सजग रहें, स्वस्थ रहें।#घर में रहें। सुरक्षित रहें।

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

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हिन्दी साहित्य – सस्वर व्यंग्य पाठ ☆ हम कान हैं ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय

श्री जय प्रकाश पाण्डेय

(श्री जयप्रकाश पाण्डेय जी   की पहचान भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी के अतिरिक्त एक वरिष्ठ साहित्यकार की है। वे साहित्य की विभिन्न विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। उनके  व्यंग्य रचनाओं पर स्व. हरीशंकर परसाईं जी के साहित्य का असर देखने को मिलता है। परसाईं जी का सानिध्य उनके जीवन के अविस्मरणीय अनमोल क्षणों में से हैं, जिन्हें उन्होने अपने हृदय  एवं  साहित्य में  सँजो रखा है । आज प्रस्तुत है  आपके नवीन व्यंग्य “हम कान हैं “ का सस्वर पाठ। ) 

☆ व्यंग्य – हम कान हैं

श्री जय प्रकाश पाण्डेय जी का यह व्यंग्य वास्तव में एक प्रयोग है। इस व्यंग्य की रचना अभी हाल ही में की गई है जो कि अप्रकाशित है। हमें पूर्ण विश्वास है कि आप व्यंग्य विधा की इस रचना को सुनकर कदापि निराश नहीं होंगे और अपने मित्रों से अवश्य साझा करेंगे।

आप आदरणीय श्री जय प्रकाश पाण्डेय जी के नवीनतम व्यंग्य  ” हम कान हैं “ उनके चित्र अथवा यूट्यूब लिंक पर क्लिक कर उनके ही स्वर में सुन सकते हैं।

 

आपसे अनुरोध है कि आप यह कालजयी रचना सुनें एवं अपने मित्रों से अवश्य साझा करें। ई- अभिव्यक्ति इस प्रकार के नवीन प्रयोगों को क्रियान्वित करने हेतु कटिबद्ध है।

© जय प्रकाश पाण्डेय

416 – एच, जय नगर, आई बी एम आफिस के पास जबलपुर – 482002  मोबाइल 9977318765

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हिंदी साहित्य – फिल्म/रंगमंच ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – हिंदी फिल्मों के स्वर्णिम युग के कलाकार # 10 – अर्देशिर ईरानी : पहली बोलती फ़िल्म आलमआरा ☆ श्री सुरेश पटवा

सुरेश पटवा 

 

 

 

 

 

((श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं।  अभी हाल ही में नोशन प्रेस द्वारा आपकी पुस्तक नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास)  प्रकाशित हुई है। इसके पूर्व आपकी तीन पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी एवं पंचमढ़ी की कहानी को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है।  आजकल वे  हिंदी फिल्मों के स्वर्णिम युग  की फिल्मों एवं कलाकारों पर शोधपूर्ण पुस्तक लिख रहे हैं जो निश्चित ही भविष्य में एक महत्वपूर्ण दस्तावेज साबित होगा। हमारे आग्रह पर उन्होंने  साप्ताहिक स्तम्भ – हिंदी फिल्मोंके स्वर्णिम युग के कलाकार  के माध्यम से उन कलाकारों की जानकारी हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा  करना स्वीकार किया है  जिनमें कई कलाकारों से हमारी एवं नई पीढ़ी  अनभिज्ञ हैं ।  उनमें कई कलाकार तो आज भी सिनेमा के रुपहले परदे पर हमारा मनोरंजन कर रहे हैं । आज प्रस्तुत है  हिंदी फ़िल्मों के स्वर्णयुग के कलाकार  : अर्देशिर ईरानी : पहली बोलती फ़िल्म आलमआरा पर आलेख ।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – हिंदी फिल्म के स्वर्णिम युग के कलाकार # 10 ☆ 

☆ अर्देशिर ईरानी : पहली बोलती फ़िल्म आलमआरा ☆

खान बहादुर अर्देशिर ईरानी (5 दिसंबर 1886 – 14 अक्टूबर 1969) शुरुआती भारतीय सिनेमा के मूक और ध्वनि युग में एक लेखक, निर्देशक, निर्माता, अभिनेता, फिल्म वितरक, फिल्म शोमैन और छायाकार थे। वे हिंदी, तेलुगु, अंग्रेजी, जर्मन, इंडोनेशियाई, फारसी, उर्दू और तमिल में फिल्में बनाने के लिए प्रसिद्ध थे। सफल उद्यमी होने के नाते उनके पास फिल्म थियेटर, एक ग्रामोफोन एजेंसी और एक कार सेल्स एजेंसी थी।

अर्देशिर ईरानी का जन्म बॉम्बे प्रेसीडेंसी के पूना नगर में 5 दिसंबर 1886 को एक पारसी परिवार में हुआ था। वे 1905 में ईरानी यूनिवर्सल स्टूडियोज के भारतीय प्रतिनिधि बन गए और उन्होंने बंबई में “अलेक्जेंडर सिनेमा” को अब्दुल एस्सोल्ली के साथ चालीस साल तक चलाया। अर्देशिर ईरानी ने अलेक्जेंडर सिनेमा में फिल्म निर्माण की कला के नियमों को सीखा और फ़िल्म माध्यम पर मोहित होकर पूरे जीवन फ़िल्म व्यवसाय को समर्पित रहे।  ईरानी ने 1917 में फिल्म निर्माण के क्षेत्र में प्रवेश करके 1920 में अपनी पहली मूक फीचर फिल्म, नल-दमयंती का निर्माण किया।

उन्होंने 1922 में दादासाहेब फाल्के के “हिंदुस्तान फिल्म्स” के पूर्व प्रबंधक भोगीलाल दवे से जुड़कर “स्टार फिल्म्स” की स्थापना की। उनकी दूसरी मूक फीचर फिल्म “वीर अभिमन्यु” 1922 में रिलीज़ हुई न्यूयॉर्क स्कूल ऑफ फोटोग्राफी के स्नातक दवे ने फिल्मों की शूटिंग की, जबकि ईरानी ने उन्हें निर्देशित और निर्मित किया। ईरानी और दवे की साझेदारी में स्टार फिल्म्स ने सत्रह फिल्मों का निर्माण किया।

ईरानी ने 1924 में दो प्रतिभाशाली युवा बी.पी. मिश्रा और नवल गांधी को साथ लेकर “राजसी फ़िल्मस” की स्थापना की।  “राजसी फ़िल्मस” ने पंद्रह फिल्मों का निर्माण किया। इतनी सफलता के बावजूद राजसी फ़िल्मस बंद हो गईं।  उन्होंने “रॉयल आर्ट स्टूडियो” स्थापित किया हालांकि, वह एक निश्चित प्रकार की रोमांटिक फिल्मों के लिए प्रसिद्ध हो गया। ईरानी ने नई प्रतिभाओं का उपयोग करके फ़िल्म निर्माण तकनीक में सुधार किया।

ईरानी ने 1925 में “इम्पीरियल फिल्म्स” की स्थापना करके बासठ फिल्में बनाईं। ईरानी चालीस साल की उम्र तक भारतीय सिनेमा के एक स्थापित फिल्म निर्माता थे। अर्देशिर ईरानी 14 मार्च 1931 को अपनी सवाक् याने साउंड फीचर फिल्म “आलम आरा” की रिलीज के साथ टॉकी फिल्मों के जनक बन गए। उनके द्वारा निर्मित कई फिल्में बाद में उन्ही कलाकारों और दल के साथ टॉकी फिल्मों में बनाई गईं। उन्हें पहली भारतीय अंग्रेजी फीचर फिल्म नूरजहाँ (1931) बनाने के लिए भी जाना जाता है। उन्होंने भारत की पहली रंगीन फीचर फिल्म किसान कन्या (1937) बनाई। उनका योगदान सिर्फ़ मूक सिनेमा को आवाज़ देने और श्वेत-श्याम फ़िल्मों को रंग देने से नहीं ख़त्म होता। उन्होंने भारत में फिल्म निर्माण के लिए एक नया साहसी दृष्टिकोण अपनाया और फिल्मों में कहानियों के लिए इस तरह की एक विस्तृत श्रृंखला प्रदान की जिन पर आज तक फिल्में बनाई जा रही हैं।

ईरानी ने 1933 में पहली फारसी टॉकी, “दोख्तर-ए-लोर” का निर्माण और निर्देशन किया। पटकथा अब्दोलहोसिन सेपांता ने लिखी थी, जिन्होंने स्थानीय पारसी समुदाय के सदस्यों के साथ फिल्म में अभिनय भी किया था।

ईरानी की इंपीरियल फिल्म्स ने भारतीय सिनेमा में कई नए कलाकारों को पेश किया, जिनमें पृथ्वीराज कपूर और महबूब खान उल्लेखनीय थे। उन्होंने तेलुगु में गाने के साथ आलम आरा के सेट पर तमिल में कालिदास का निर्माण किया। इसके अलावा ईरानी ने साउंड रिकॉर्डिंग का अध्ययन करने के लिए पंद्रह दिनों के लिए लंदन, इंग्लैंड का दौरा किया और इस ज्ञान के आधार पर आलम आरा की आवाज़ को रिकॉर्ड किया। इस प्रक्रिया में उन्होंने अनजाने में एक नया चलन बनाया। उन दिनों रिफ्लेक्टर की मदद से सूरज की रोशनी में आउटडोर शूटिंग की जाती थी। जिसमें बाहरी अवांछनीय आवाज़ें उन्हें बहुत परेशान कर रही थीं। उन्होंने स्टूडियो में भारी रोशनी करके पूरे सीक्वेंस को शूट किया। इस प्रकार उन्होंने कृत्रिम प्रकाश के तहत शूटिंग की प्रवृत्ति शुरू की।

प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध के बीच ईरानी ने पच्चीस वर्षों के लंबे और शानदार कैरियर में एक सौ अट्ठाईस फिल्में बनाईं। उन्होंने 1945 में अपनी आखिरी फिल्म पुजारी बनाई। ईरानी को दादासाहेब फाल्के की तरह जीविका ने मजबूर नहीं किया था इसलिए उन्होंने महसूस किया कि युद्धकाल पश्चात फिल्म व्यवसाय के लिए उपयुक्त नहीं था और इसलिए उन्होंने उस दौरान अपने फिल्म व्यवसाय को निलंबित कर दिया। 14 अक्टूबर 1969 को मुंबई, में तिरासी साल की उम्र में उनका निधन हो गया।

 

© श्री सुरेश पटवा

भोपाल, मध्य प्रदेश

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हिन्दी साहित्य – कविता – ☆ कोरोना क्या बिगाड़ लेगा? ☆ – सुश्री चंद्रकांता सिवाल “चंद्रेश”

सुश्री चंद्रकांता सिवाल “चंद्रेश”

(आदरणीया  सुश्री चंद्रकांता सिवाल “चंद्रेश” जी  कई राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों / अलंकरणों  से  पुरस्कृत / अलंकृत हैं। आपकी रचनाएँ कई  राष्ट्रीय / अंतरराष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं  में सतत प्रकाशित होती रहती हैं। समय समय पर आकाशवाणी से रचनाओं का प्रसारण। आप “भाषा सहोदरी हिन्दी” – की महासचिव हैं एवं गत वर्षो से “भाषा सहोदरी हिन्दी” द्वारा हिन्दी के प्रचार व प्रसार में निरंतर प्रयासरत  हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक लघुकथा “कोरोना क्या बिगाड़ लेगा?“। ) 

☆कोरोना क्या बिगाड़ लेगा ?☆ 

चाहे बड़का “विहान” कॉलिज से घर लौटता हो,चाहे छुटकू “ईशान” स्कूल से पसीने से सराबोर आता हो, या फिर कोचिंग क्लास से “इशिता” बाहर से जब भी जो आये सीधा फ्रिज की ओर ही भागना और अपनी-अपनी चिल्ड बॉटल, निकालना और गट गट कर एक ही साँस में पी जाना…

माँ का अक्सर बोलते ही रह जाना “सर्द गरम हो जाएगा खांसी जुखाम पीड़ा देगा.. पर सुनता कौन है… माँ” कब बोलती चली गई, पानी की घूंट के साथ माँ की परवाह भी घटक घटक… संगीता को अक्सर यूँ ही बच्चों के साथ जूझना पड़ता था।

मगर आजकल कोरोना काल में परिस्थिति कुछ बदली सी है, ठंडे पानी से ऐसा परहेज तो पहले देखने को नहीं मिला पीना तो दूर की बात अब कोई अपनी बॉटल भी नहीं संभालता…

गरम पानी से बच्चों का अथाह प्रेम संगीता को सकून तो देता था पर गरमी का कोप भी उसके मन मस्तिष्क पर हावी था।  पर संगीता मन ही मन आश्वस्त थी कि चलो अच्छा है, बच्चे स्वयं को सयंम बरतते हुए “दादी माँ” की कही बात का कड़ाई से पालन तो कर रहें हैं कि “कोरोना काल” में खांसी जुखाम को होने ही मत देना बस फिर देखना।

कोरोना क्या बिगाड़ लेगा।

 

© चंद्रकांता सिवाल “चंद्रेश”

5 ए / 11040 गली नम्बर -9 सत नगर डब्ल्यू ई ए करौल  बाग़ न्यू दिल्ली – 110005

8383096776, 9560660941

ई मेल आई डी– chandrasiwal@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कोहरे के आँचल से # 41 ☆ पत्थर में एक किरदार ☆ सौ. सुजाता काळे

सौ. सुजाता काळे

(सौ. सुजाता काळे जी  मराठी एवं हिन्दी की काव्य एवं गद्य विधा की सशक्त हस्ताक्षर हैं। वे महाराष्ट्र के प्रसिद्ध पर्यटन स्थल कोहरे के आँचल – पंचगनी से ताल्लुक रखती हैं।  उनके साहित्य में मानवीय संवेदनाओं के साथ प्रकृतिक सौन्दर्य की छवि स्पष्ट दिखाई देती है। आज प्रस्तुत है  सौ. सुजाता काळे जी  द्वारा  प्राकृतिक पृष्टभूमि में रचित एक अतिसुन्दर भावप्रवण  कविता  “पत्थर में एक किरदार। )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कोहरे के आँचल से # 41 ☆

☆ पत्थर में एक किरदार ☆

 

हर पत्थर में एक चेहरा दिखता है

कोई हरा, कोई नीला

और कोई लाल दिखता है।

कोई श्वेत, कोई श्याम

और कोई पीला दिखता है।

हर पत्थर में एक चेहरा दिखता है।

 

हर चेहरा ओढ़े हैं एक मुखौटा

मुझे हर पत्थर में एक किरदार दिखता है।

कुछ अजीब सा नशा है रंगीन पत्थरों में

‘सांज’ हर किरदार मुझे अपना सा लगता है।

हर पत्थर में एक चेहरा दिखता है।

 

© सुजाता काळे

पंचगनी, महाराष्ट्र, मोबाईल 9975577684

sujata.kale23@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आशीष साहित्य # 49 – अंतिम ज्ञान ☆ श्री आशीष कुमार

श्री आशीष कुमार

(युवा साहित्यकार श्री आशीष कुमार ने जीवन में  साहित्यिक यात्रा के साथ एक लंबी रहस्यमयी यात्रा तय की है। उन्होंने भारतीय दर्शन से परे हिंदू दर्शन, विज्ञान और भौतिक क्षेत्रों से परे सफलता की खोज और उस पर गहन शोध किया है। अब  प्रत्येक शनिवार आप पढ़ सकेंगे  उनके स्थायी स्तम्भ  “आशीष साहित्य”में  उनकी पुस्तक  पूर्ण विनाशक के महत्वपूर्ण अध्याय।  इस कड़ी में आज प्रस्तुत है  एक महत्वपूर्ण  एवं  ज्ञानवर्धक आलेख  “अंतिम ज्ञान। )

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☆ साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ आशीष साहित्य # 49 ☆

☆ अंतिम ज्ञान 

मनुष्यों में, उम्र का बढ़ना मानव शरीर में परिवर्तन का प्रतिनिधित्व होता है, जिसमें शारीरिक, मनोवैज्ञानिक और सामाजिक परिवर्तन शामिल होता है । लेकिन अभी भी उम्र बढ़ने का कारण वैज्ञानिकों के लिए अज्ञात है । उम्र बढ़ने का सबसे करीबी सिद्धांत बाहरी रूप से DNA विभाजन या ऑक्सीकरण होता है, जो जैविक प्रणाली को विफल कर सकता है या आंतरिक प्रक्रिया जैसे DNA टेलीमीटर के छोटे होने का कारण बन सकता है । कुछ प्रजातियों को अमर माना जा सकता है, उदाहरण बैक्टीरिया जो पुत्री कोशिकाओं के उत्पादन करने के लिए जिम्मेदार है या जानवरों में जीनस हाइड्रा, जिनकी पुनर्जागरण क्षमता होती है जिससे वे बुढ़ापे से बचते हैं ।

संक्षेप में, बस इतना समझें ले कि सामान्य मानव कोशिका लगभग 50 कोशिका विभाजन के बाद मर जाती है । अगर किसी भी तरह से हम इसे अनंत बना सके या क्षतिग्रस्त कोशिका की मरम्मत करके इसे जैसी थी वैसी ही बना सके, तो व्यक्ति की उम्र रुक जाएगी ।

 

© आशीष कुमार 

नई दिल्ली

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