हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिव्यक्ति # 18 ☆ कविता – बेरिकेड्स ☆ हेमन्त बावनकर

हेमन्त बावनकर

(स्वांतःसुखाय लेखन को नियमित स्वरूप देने के प्रयास में इस स्तम्भ के माध्यम से आपसे संवाद भी कर सकूँगा और रचनाएँ भी साझा करने का प्रयास कर सकूँगा।  आज प्रस्तुत है  एक कविता  “बेरिकेड्स”।  अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दीजिये और पसंद आये तो मित्रों से शेयर भी कीजियेगा । अच्छा लगेगा ।)  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – अभिव्यक्ति # 18

☆  बेरिकेड्स ☆

जिंदगी की सड़क पर

खड़े हैं कई बेरिकेड्स

दोनों ओर खड़े हैं तजुर्बेकार

वरिष्ठ पहरेदार

करने सीमित नियति

सीमित जीवन की गति

 

कभी कभी तोड़ देती हैं

जिंदगी की गाडियाँ

बेरिकेड्स और सिगनल्स

भावावेश या उन्माद में

कभी कभी कोई उछाल देता है

संवेदनहीनता के पत्थर

भीड़तंत्र में से

बिगाड़ देता है अहिंसक माहौल

तब होता है – शक्तिप्रयोग

नियम मानने वाले से

मनवाने वाला बड़ा होता है

अक्सर प्रशासक विजयी होता है

 

आखिर क्यों खड़े कर दिये हमने

इतने सारे बेरिकेड्स

जाति, धर्म, संप्रदाय संवाद के

ऊंच, नीच और वाद के

कुछ बेरिकेड्स खड़े किए थे

अपने मन में हमने

कुछ खड़े कर दिये

तुमने और हितसाधकों नें

घृणा और कट्टरता के

अक्सर

हम बन जाते हैं मोहरा

कटवाते रह जाते हैं चालान

आजीवन नकारात्मकता के

 

काश!

तुम हटा पाते

वे सारे बेरिकेड्स

तो देख सकते

बेरिकेड्स के उस पार

वसुधैव कुटुंबकम पर आधारित

एक वैश्विक ग्राम

मानवता-सौहार्द-प्रेम

एक सकारात्मक जीवन

एक नया सवेरा

एक नया सूर्योदय।

 

© हेमन्त बावनकर, पुणे 

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि ☆ ऊँचाई ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) 

☆ संजय दृष्टि  ☆ ऊँचाई ☆

 

बहुमंजिला इमारत की

सबसे ऊँची मंजिल पर

खड़ा रहता है एक घर,

गर्मियों में इस घर की छत

देर रात तक तपती है,

ठंड में सर्द पड़ी छत

दोपहर तक ठिठुरती है,

ज़िंदगी हर बात की कीमत

ज़रूरत से ज्यादा वसूलती है,

छत बनाने वालों को ऊँचाई

अनायास नहीं मिलती है..!

 

# दो गज की दूरी, है बहुत ही ज़रूरी।

©  संजय भारद्वाज, पुणे

(रात्रि 3:29 बजे, 20 मई 2019)

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 
मोबाइल– 9890122603

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ मैं भी पोते का दादा हूँ ☆ श्री रमेश सैनी

श्री रमेश सैनी

(हम आभारी है  व्यंग्य को समर्पित  “व्यंग्यम संस्था, जबलपुर” के जिन्होंने  30 मई  2020 ‘ की  गूगल  मीटिंग  तकनीक द्वारा आयोजित  “व्यंग्यम मासिक गोष्ठी'”में  प्रतिष्ठित व्यंग्यकारों की कृतियों को  हमारे पाठकों से साझा करने का अवसर दिया है।  इसी कड़ी में  प्रस्तुत है सुप्रसिद्ध लेखक/व्यंग्यकार श्री रमेश सैनी जी का  एक समसामयिक एवं विचारणीय भावप्रवण व्यंग्य – “मैं भी पोते का दादा हूँ”।  कृपया  रचना में निहित मानवीय दृष्टिकोण को आत्मसात करें )

☆ मैं भी पोते का दादा हूँ ☆

कोरोना का लाकडाउन चालू है.. बाजार बंद हैं. चारों तरफ मातमी सन्नाटा है. पुलिस जगह जगह मुस्तैद है. आवाजाही पूर्णतया बंद है. कुछ बहादुर लोग नियमों को तोड़ने के लिए सड़क पर घूमते नज़र आ रहे हैं. ये लोग शेखी बघारने निकलते हैं. पुलिस के पास भी इनका इंतजाम है. कहीं पर ऊठक बैठक हो रही है, कहीं पर कान पकड़कर कसरत कराई जा रही है. कहीं पर लोग अपने पिछवाड़े पर हाथ रखकर दौड़ते नजर आ रहे हैं और जो लोग बच जाते हैं. वे फोन पर परिचितों को आँखों देखा हाल सुना रहे हैं. ये सब किस्से घरों में आम है. मै भी घर पर बैठा बैठा बोर हो रहा हूँ. बाहर घूमने की तलब बढ़ गई है. मुझे याद है, शहर में दंगे फसाद के समय दुस्साहस कर घुस जाता था. मुझे रोमांच लगता था. अभी भी मेरा मन बाहर जाने के लिए भड़भड़ा रहा है. सोचा चौराहे तक का चक्कर लगा आऊं. जैसे ही बाहर निकलने के लिए कदम बढ़ाए कि पीछे से आवाज आई.

“आप कहाँ चल दिए”-बेटे ने टोंका

” वैसे ही! थोड़ा माहौल का जायजा ले लूँ.”

“ठीक है, बाहर दुनिया ठीक चल रही है. सरकार ने जायजे के लिए पुलिस का बढ़िया इंतजाम कर रखा है. आप बिलकुल चिंता न करें. आपको अपनी उम्र का ख्याल रखना चाहिए. सरकार आप लोगों की चिंता में परेशान है. इतनी चेतावनी और एडवाइजरी जारी कर रही है पर आप लोग मानते ही नहीं.” – बेटे ने चिड़चिड़ा कर कहा.

“बेटा! अपनी उम्र का ख्याल रखता हूँ. यह इंडिया है दूसरे लोग भी हमारे बालों का ख्याल रखते हैं.” मैंने कहा.

तब उसने कहा- “आप लोग भी अपने बालों से बेज़ा फायदा उठाने में बाज नहीं आते” उसकी बात सुनकर मन खिन्न हो गया मैं वापस आकर सोफे पर बैठ गया. मुझे उदास बैठा देखकर बेटे ने फिर कहा “देखिए ! आपको मैं रोक तो नहीं पाऊंगा. अत: आप पूरी सावधानी के साथ चौराहे तक जाएं और दस मिनट में लौट के आज जाएं.” मैं खुश हो गया और जाने के लिए बाहर निकलने लगा. पीछे से आवाज आई – “दादू आप कहां जा रहे हैं. मेरे लिए कुछ फल ले आना. यह आवाज मेरे पोते कृष्णा की थी. मैं खुश था और इशारे से कहा-” हां ठीक ले आऊंगा”

मैं स्कूटी से चौराहे के पास पहुंचा है. सामने पुलिस ही पुलिस नजर आ रही थी. मुझे दूर से ही देख कर एक जवान पुलिस वाले ने इशारा किया. “रुक जाओ”. मैं उसके पास जाकर रुक गया. मुझे पास आते देख, वह पीछे हट गया. फिर उसने दूर से ही मेरा ऊपर से नीचे तक मुआयना  किया.  उसकी नजर मेरे सर पर गई. सिर पर पूरे सफेद बाल  देखते ही उसने हाथ जोड़कर कहा -“अंकल कहां जा रहे हैं?”

“बेटा ! पोते के लिए फल लेने निकला हूँ” मैंने कहा.

“आप भी अंकल! अरे मोहल्ले में फल वाले निकलते होंगे” उसकी मिठास भरी आवाज मुझे अंदर तक ठंडा कर गई. पुलिस का यह रूप देखकर मैं चकित हो गया. मैंने सोचा यह करोना  किसी से कुछ भी करवा सकता है. पुलिस वालों के सामने गरीब, अमीर ,जवान और बुड्ढे सब बराबर है. सच्चा समाजवाद यहीं है. ये लोग सिर्फ मनीपावर से डरते हैं.

“बेटा बहुत दिन से नहीं आया है. बच्चे जिद करने लगे तो निकलना पड़ा.”

” आपको अपना ख्याल रखना चाहिए करोना सबसे ज्यादा आप बुजुर्गों को असर करता है.”

मैं शर्मिंदा होगया  उसकी बात सुनकर कहा”आप ठीक कह रहे हो।“

“अच्छा ऐसा करो! अंकल आप यहां से दाएं मुड़ जाइए और आगे फलों के ठेले मिल जाएंगे

“मैंने उसे धन्यवाद कहा आगे से दायें मुड़ गया. थोड़ा आगे बढ़ने पर दो-तीन फलों के ठेले दिखने लगे. मैं पहले ही ठेले पर रुक गया. ठेले पर पहले से ही तीन-चार लोग खड़े थे. मैं थोड़ी दूरी पर सोशल डिस्टेसिंग बना कर खड़ा हो गया. मैं देखा एक ने फलों को चुनकर अलग किया और उससे पूछा-” क्या भाव है ?” भाव सुनकर वह ठिठका और फलों को छोड़कर आगे बढ़ गया. ठेले वाले ने आवाज लगाई- “कुछ कम कर दूंगा”  पर वह नहीं रुका. दूसरा भी उसको देख कर आगे बढ़ गया. उसने फिर आवाज लगाई-” ले लो यह सब ताजे हैं” वे दोनों आगे बढ़ गए और अगले के पास रुक गए. इस बीच तीसरे ने कुछ फल चुन लिए थे. जैसे ही उसने भाव पूछा. उसका  भी मूड बदल गया और कहा- “अभी नहीं लेना है” यह कह वह भी आगे बढ़ गया. उन सब के जाने से ठेला वाला निराश और हताश हो गया.

मैंने कुछ तरबूज और अच्छे फल चुनकर उससे कहा -“तौल दो” उसने तौलने के लिए तराजू और बांट उठाएं. उसके गले में लटका चांद तारा वाला लॉकेट दिख गया. मुझे बिजली का करंट सा लग गया. टी व्ही पर आती हुई खबरें दिमाग में घूम गई .जमाती लोग बसों में यहां वहां थूक रहे हैं. कोई ठेला वाला थूक लगाकर फल और सब्जी बेच रहा है. तो कोई दरवाजे और हैंडलों में थूक लगा रहा है. ठेले वाले को देख मुझे टी व्ही वाले चित्र नज़र आने लगे. मैं सहम गया. मन में भय व्याप्त हो गया. अनेक विचार आने लगे. और कुछ सोच कर आगे बढ़ गया. मुझे बढ़ता देख ठेले वाले ने आवाज लगाई -“बाबू जी ! क्या हो गया? बाबू जी, सब ताजे फल हैं. उसकी आवाज सुनकर, मैं रुक गया, कहां -“हां ताजे हैं, मैं अभी लौट कर आता हूँ. और आगे बढ़ गया. ठेला वाला मेरा चेहरा देखता रहा फिर कुछ पल रुक कर कहा- “कोई बात नहीं बाबू जी”, फिर हाथ जोड़कर कहा- “बाबू जी जय श्रीराम”. जय श्रीराम सुनकर मैं भीतर तक कांप गया. मुझे जय श्रीराम का जवाब देते नहीं बना. मैं अपनी गाड़ी वहीं खड़ी कर  ठेले वाले के पास आया. मैं कुछ देर उसे देखता रहा. फिर उससे पूछा- “कब से यह काम कर रहे हो” व्हाट्सएप और सोशल मीडिया से खबरें आ रही थी कि कुछ लोग मजबूरी के चलते अपना धंधा बदलकर फल और सब्जियों का ठेला लगाने लगे हैं, क्योंकि लाकडाउन में इन्हीं चीजों को बेचने की अनुमति थी. उसने कहा- “बाबूजी मैं अच्छा टेलर हूँ. मेरी छोटी दुकान है. पर लाकडाउन की वजह से वह बंद है. पेट पालने के लिए कुछ काम तो करना था. यह ठेला किराए पर लेकर फल बेचने लगा. मैं कुछ कहता, उसके पहले वह फिर बोला – बाबूजी ! यह नया धंधा है. मुझे कुछ समझ में नहीं आता. टेलर हूँ. इसलिए आदमी को नाप लेता हूँ. पर आदमी को तौल नहीं पाता. मैं कुछ देर उसे देखता रहा. फिर कहा-” तुम तो मुसलमान हो, फिर जय श्रीराम. मेरी बात सुनकर उसकी आंखें पनीली हो गई. -” हां! मुसलमान हूँ और एक इंसान भी. साथ में दो छोटे बच्चों का बाप भी हूँ. मैं उनको भूखा भी नहीं देख सकता. उसकी आंखें और बातें मुझे अंदर तक गीला कर गयीं. मैंने फल उठाएं उसे दो सौ का नोट दिया और आगे बढ़ गया. उसने पीछे से आवाज लगाई  -“बाबूजी बाकी पैसे” मैंने कहा -“तुम रख लो. मैं भी पोते का दादा हूँ.

© रमेश सैनी 

जबलपुर 

मोबा. 8319856044  9825866402

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # 52 ☆ व्यंग्य – मांगो सबकी खैर ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ”  में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, अतिरिक्त मुख्यअभियंता सिविल  (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) में कार्यरत हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है।  उनका कार्यालय, जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। आज प्रस्तुत है श्री विवेक जी का एक अतिसुन्दर एवं विचारणीय व्यंग्य   “मांगो सबकी खैर।  श्री विवेक जी का यह कथन अत्यंत सार्थक है – “हम फकीर कबीर पर डाक्टरेट करके अमीर तो बनना चाहते हैं किन्तु महात्मा कबीर के सिद्धांतों से नही मिलना चाहते.” यह कटु सत्य विश्व के सभी महात्माओं के लिए सार्थक लगता है। श्री विवेक जी की लेखनी को इस अतिसुन्दर  व्यंग्य के  लिए नमन । )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक साहित्य # 52 ☆ 

☆ व्यंग्य – मांगो सबकी खैर ☆

महात्मा कबीर बजार में खड़े सबकी खैर मांगते हैं  ! पर खैर मांगने से करोंना  करुणा करे तो क्या बात होती.

निर्भया को, आसिफा को,दामिनी को  खैर मिल जाती तो क्या बात थी.मंदसौर हो, दिल्ली हो बंगलौर हो मुम्बई हो ! ट्रेन हो उबर, ओला हो ! हवाई जहाज हो ! शापिंग माल हो हर कहीं जंगली कुत्ते तितलियों के पर नोंचने पर आमादा दिखते हैं. हर दुर्घटना के बाद केंडल मार्च निकाल कर हम अपना दायित्व पूरा कर लेते हैं, जिसे जिस तरह मौका मिलता है वह अपनी सुविधा से अपनी पब्लिसिटी की रोटी सेंक लेता है, जिससे और कुछ नही बनता वह ट्वीट करके, संवेदना दिखाकर फिर से खुद में मशगूल हो जाता है. जिसके ट्वीटर पर एकाउंट नही है वे भी व्हाट्सअप पर इसकी उसकी किसी न किसी की कविता को हरिवंशराय बच्चन की, जयशंकर प्रसाद  या अमृता प्रीतम की रचना बताकर कम से कम पोस्ट फारवर्ड करने का सामाजिक दायित्व तो निभा ही लेता है. पर स्त्री के प्रति समाज के मन में सम्मान का भाव कौन बोयेगा यह यक्ष प्रश्न अनुत्तरित ही रह जाता है.

खैर मांगने से किसान के इंजीनियर बेटे को नौकरी मिल जाती तो क्या बात थी. खैर मांगने से मजदूर की मजबूरी मिट जाती तो क्या बात थी ।खैर मांगने से रामभरोसे को जीवन यापन की न्यूनतम सुविधायें मिल जातीं तो क्या बात थी.और तो और खैर मांगने से नेता जी को वोट ही मिल जाते तो क्या बात होती. वोट के लिये भी किसी को गरीबी हटाओ के नारे देने पड़े, किसी को फुल पेज विज्ञापन देना पड़ा कि हम सुनहरे कल की ओर बढ़ रहे हैं, किसी को फील गुड का अहसास टी वी के जरिये करवाना पड़ा तो किसी को पंद्रह लाख का प्रलोभन देना पड़ा. अच्छे दिन आने वाले हैं यह सपना दिखाना पड़ा. सलमान की तरह शर्ट भले ही न उतारनी पड़ी हो पर सीने का नाप तो बताना ही पड़ा, चाय पर चर्चा करनी पड़ी तो खटिये पर चौपाल लगानी पड़ी. वोट तक इतनी मशक्कत के बाद मिलते हैं, खैर मांगने से नहीं. दरअसल अबकी बार जब महात्मा कबीर से मेरी मानसिक भेंट होगी तो मुझे उन्हें बतलाना है कि आजकल  बिन मांगे मोती मिले मांगे मिले न खैर.

सच तो यह है कि हम महात्मा कबीर से एकांत में मिलते ही तो नही. जिस दिन महात्मा कबीर से हम अलग अलग अकेले में गुफ्तगू करने लगेंगे, सबको हर व्यंग्यकार में महात्मा कबीर नजर आने लगेगा. जिस दिन हर बंदा महात्मा कबीर के एक दोहे को भी चरित्र में उतार लेगा उस दिन महात्मा कबीर फिर प्रासंगिक हो जायेंगे. पर हम फकीर कबीर पर डाक्टरेट करके अमीर तो बनना चाहते हैं किन्तु महात्मा कबीर के सिद्धांतों से नही मिलना चाहते.

क्योकि महात्मा कबीर ढ़ाई अक्षर प्रेम के  पढ़वा देगे, वे हमारे साथ बुरा देखने  निकल पड़ेगे और हमें अपना दिल खोजने को कह देगे. यदि कहीं महात्मा कबीर ने याद दिला दिया कि जाति न पूछो साधु की तब तो चुनाव आयोग के ठीक सामने धर्मनिरपेक्ष देश में  जाति के आधार पर सरे आम जीतते हारते हमारे कैंडिडेट्स का क्या होगा ? इसलिये  हमें तो महात्मा कबीर के चित्र पसंद है जिसका इस्तेमाल हम अपनी सुविधा से अपने लिये करके प्रसन्न बने रह सकें.महात्मा कबीर पर पीएचडी की जाती है, महात्मा कबीर के नाम पर सम्मान दिया जाता है, महात्मा कबीर पर गर्व किया जाता है उन पर भाषण  और निबंध लिखा  जाता है.हमने उन्हें पाठो में सहेजकर प्रश्न पूंछने उत्तर देने और नम्बर बटोरने का टापिक बना छोड़ा है.  सब करियेगा पर उससे पहले मेरे कहने से ही सही कभी एकांत में महात्मा कबीर के विचारों से अपनी एक मीटिंग फिक्स कीजीये. उनके विचार मालुम न हो तो गूगल से निसंकोच पूछ लीजियेगा.

 

© विवेक रंजन श्रीवास्तव, जबलपुर

ए १, शिला कुंज, नयागांव,जबलपुर ४८२००८

मो ७०००३७५७९८

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # 49 – कविता – ॐ निनाद में शून्य सनातन ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। । साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य  शृंखला में आज प्रस्तुत हैं उनकी  एक अप्रतिम कविता  “ॐ निनाद में शून्य सनातन ।  इस आध्यात्मिक रचना का शब्दशिल्प अप्रतिम है। इस सर्वोत्कृष्ट  रचना के लिए श्रीमती सिद्धेश्वरी जी को हार्दिक बधाई।

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी  का साहित्य # 48 ☆

☆ कविता  – ॐ निनाद में शून्य सनातन

ॐ निनाद में शून्य सनातन

है ब्रह्मांड समस्त समाहित।

 

देवगणो ने मिलकर किया

नव सृष्टि का विस्तार

विष्णु पद से निकली गंगा

शिव जटा पर रही सवार

ब्रह्मांड सदा गुंजित मान

स्वर ॐ निरंतर प्रवाहित।

 

आदि अनंत के कर्ता शिव

अनंत कोटि प्रतिपालक

कण कण रूप अजय अक्षुण

नाद करत मृदंग संग ढोलक

शिव तांडव नित जनहित।

सोहे नटराज रुप जनहित

 

कल कल वेग निरंतर बहती

निर्झर झर झर वन उपवन

गूँज पर्वतों पर बिखराई

ऋषि मुनियों का तपोवन

स्वर लहरी जन जन प्रेरित

श्रंग नाद शिवम हिताहित।

 

देवो के महादेव सुशोभित

हिमगिरि सूता संग वास

भस्मी भूत लगाए रुद्रगण

पाए निरंकारी विश्वास

जन जन के प्रतिपालक शंभू

ॐ सत्य शिवम पर मोहित।

 

ॐ निनाद में शून्य सनातन

है ब्रह्मांड समस्त समाहित।

 

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ उत्सव कवितेचा # 6 – संदेश ☆ श्रीमति उज्ज्वला केळकर

श्रीमति उज्ज्वला केळकर

(सुप्रसिद्ध वरिष्ठ मराठी साहित्यकार श्रीमति उज्ज्वला केळकर जी  मराठी साहित्य की विभिन्न विधाओं की सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपके कई साहित्य का हिन्दी अनुवाद भी हुआ है। इसके अतिरिक्त आपने कुछ हिंदी साहित्य का मराठी अनुवाद भी किया है। आप कई पुरस्कारों/अलंकारणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपकी अब तक दस पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं एवं 6 उपन्यास, 6 लघुकथा संग्रह 14 कथा संग्रह एवं 6 तत्वज्ञान पर प्रकाशित हो चुकी हैं।  हम श्रीमति उज्ज्वला केळकर जी के हृदय से आभारी हैं कि उन्होने साप्ताहिक स्तम्भ – उत्सव कवितेचा के माध्यम से अपनी रचनाएँ साझा करने की सहमति प्रदान की है। आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता  ‘संदेश’ ।आप प्रत्येक मंगलवार को श्रीमति उज्ज्वला केळकर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – उत्सव कवितेचा – # 6 ☆ 

☆ संदेश 

आपल्या

आकांती हिमवर्शावाने

अवघं जीवन

उध्वस्त करण्याच्या

उन्मादात

शिशिराने

थैमान मांडला होता.

त्याच वेळी,

झाडांचा संदेश घेऊन

निघालेली पाने

मातीच्या कानी लागत

म्हणाली-

माते, आता तरी वाहू दे

तुझ्या काळजातील अमृतधारा

मिळू दे थेंब…थेंब ….

झाडांच्या शिखा-शेंड्यांना

उमटू देत पुन्हा

शाश्वताच्या खाणा-खुणा

त्यांच्या कटी-खांद्यावर

 

© श्रीमति उज्ज्वला केळकर

176/2 ‘गायत्री ‘ प्लॉट नं12, वसंत साखर कामगार भवन जवळ , सांगली 416416 मो.-  9403310170

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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # 51 ☆ ईश्वरी प्रकाश ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

(वरिष्ठ मराठी साहित्यकार श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे जी का अपना  एक काव्य  संसार है । आप  मराठी एवं  हिन्दी दोनों भाषाओं की विभिन्न साहित्यिक विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आज साप्ताहिक स्तम्भ  –अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती  शृंखला  की अगली  कड़ी में प्रस्तुत है एक अत्यंत मार्मिक, ह्रदयस्पर्शी एवं भावप्रवण कविता  “ईश्वरी प्रकाश।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # 51 ☆

☆ ईश्वरी प्रकाश☆

हातात काहीच नसताना

कवितेच्या अंगणात

शब्दांची रांगोळी काढण्याची कला

ईश्वराने मला बहाल केली…

एवढेच नव्हे तर

त्या रांगोळीची छबी

कायम स्मरणात राहावी म्हणून

मेंदूच्या कॕमेऱ्यात ती टिपण्याची

क्षमताही दिली…

काल सहस्तचंद्र दर्शन सोहळ्यात

काढलेली रांगोळी

पुसून टाकलेली पाहिली

आणि मला

मी शब्दांच्या काढलेल्या रांगोळ्याची

आठवण झाली…

त्या रांगोळ्यांचे रंगही

आता पुसट होत चालले आहेत

डोळ्यांवरचा पडदा सरकतो आहे

डोळ्यांच्या बाहुल्या झाकण्यासाठी

आणि मी पापण्या ताणून पहातोय

अंधाराच्या पलिकडचा तो

ईश्वरी प्रकाश…

 

© अशोक श्रीपाद भांबुरे

धनकवडी, पुणे ४११ ०४३.

ashokbhambure123@gmail.com

मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८

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योग-साधना LifeSkills/जीवन कौशल ☆  Creating your happiness: What-went-well Exercise – Shri Jagat Singh Bisht

Shri Jagat Singh Bisht

(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker.)

☆ Creating your happiness: Positive Psychology Exercises that work: What-went-well Exercise ☆ 

Video Link >>>>

Creating your happiness: Positive Psychology Exercises that work: What-went-well Exercise

Happiness consists in activity. It is a running stream, not a stagnant pool.

Action may not always bring happiness but there is no happiness without action.

Positive Psychologists have chosen only evidence-based happiness-increasing strategies whose practice is supported by scientific research.

HAPPINESS ACTIVITY: WHAT WENT WELL

“Every night, for the next week, set aside 10 minutes before you go to sleep.

WRITE DOWN 3 THINGS THAT WENT WELL AND WHY THEY WENT WELL.

You may use a journal or your computer to write about the events, but it is important that you have a physical record of what you wrote.”
Martin Seligman/ FLOURISH

 

A Pathway to Authentic Happiness, Well-Being & A Fulfilling Life! We teach skills to lead a healthy, happy and meaningful life.

The Science of Happiness (Positive Psychology), Meditation, Yoga, Spirituality and Laughter Yoga. We conduct talks, seminars, workshops, retreats and trainings.

Please feel free to call/WhatsApp us at +917389938255 or email lifeskills.happiness@gmail.com if you wish to attend our program or would like to arrange one at your end.

Jagat Singh Bisht : Founder: LifeSkills

Master Teacher: Happiness & Well-Being; Laughter Yoga Master Trainer
Past: Corporate Trainer with a Fortune 500 company & Laughter Professor at the Laughter Yoga University.
Areas of specialization: Behavioural Science, Positive Psychology, Meditation, Five Tibetans, Yoga Nidra, Spirituality, and Laughter Yoga.

Radhika Bisht ; Founder : LifeSkills  
Yoga Teacher; Laughter Yoga Master Trainer

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आध्यत्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता ☆ पद्यानुवाद – त्रयोदश अध्याय (16) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता

हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

त्रयोदश अध्याय

(ज्ञानसहित क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ का विषय)

अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम्‌ ।

भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च ।।16।।

अविकल एक अनंत पर, हर प्राणी में वास

पोषक पालक जगत का करता सृष्टि विनास ।।16।।

 

भावार्थ :  वह परमात्मा विभागरहित एक रूप से आकाश के सदृश परिपूर्ण होने पर भी चराचर सम्पूर्ण भूतों में विभक्त-सा स्थित प्रतीत होता है (जैसे महाकाश विभागरहित स्थित हुआ भी घड़ों में पृथक-पृथक के सदृश प्रतीत होता है, वैसे ही परमात्मा सब भूतों में एक रूप से स्थित हुआ भी पृथक-पृथक की भाँति प्रतीत होता है) तथा वह जानने योग्य परमात्मा विष्णुरूप से भूतों को धारण-पोषण करने वाला और रुद्ररूप से संहार करने वाला तथा ब्रह्मारूप से सबको उत्पन्न करने वाला है।।16।।

 

And undivided, yet He exists as if divided in beings; He is to be known as the supporter of beings; He devours and He generates also.।।16।।

 

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर

vivek1959@yahoo.co.in

 

 

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि ☆ चुप्पियाँ – 11 ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) 

☆ संजय दृष्टि  ☆ चुप्पियाँ – 11 ☆

 

चुप्पी, निरंतर

सिरजती है विचार,

‘दूधो नहाओ,

पूतो फलो’

का आशीर्वाद

चुप्पी को

फलीभूत हुआ है!

 

# दो गज की दूरी, है बहुत ही ज़रूरी।

©  संजय भारद्वाज, पुणे

 8:11 बजे, 2.9.18

( कवितासंग्रह *चुप्पियाँ* से)

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 
मोबाइल– 9890122603

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