मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कवितेच्या प्रदेशात # 52 – गझल – ना इथे ना राहते आहे तिथे ☆ सुश्री प्रभा सोनवणे

सुश्री प्रभा सोनवणे

(आज प्रस्तुत है सुश्री प्रभा सोनवणे जी के साप्ताहिक स्तम्भ  “कवितेच्या प्रदेशात” में  एक  अत्यंत भावप्रवण  गझल  “ना इथे ना राहते आहे तिथे।  सर्वव्याप्त अदृश्य ईश्वर का साथ और पृथ्वी  पर उसकी अपेक्षाओं  पर आधारित एक अप्रतिम रचना । सुश्री प्रभा जी द्वारा रचित संवेदनशील रचना के लिए उनकी लेखनी को सादर नमन ।  

मुझे पूर्ण विश्वास है  कि आप निश्चित ही प्रत्येक बुधवार सुश्री प्रभा जी की रचना की प्रतीक्षा करते होंगे. आप  प्रत्येक बुधवार को सुश्री प्रभा जी  के उत्कृष्ट साहित्य को  साप्ताहिक स्तम्भ  – “कवितेच्या प्रदेशात” पढ़ सकते  हैं।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – कवितेच्या प्रदेशात # 52 ☆

☆ गझल – ना इथे ना राहते आहे तिथे ☆ 

 

सोसला  दुष्काळ हा, आता तरी,

पावसाच्या बरसु दे झरझर सरी

 

जातिधर्माचे कशाला दाखले

वाढते आहे विषमतेची दरी

 

तू किती नाकारल्या काळ्या मुली

भांडते रात्रंदिनी गोरी परी

 

कष्ट करणे टाळले वरचेवरी

देत आहे कोण भाजी भाकरी ?

 

ना इथे ना राहते आहे तिथे

भेटला मज विश्वव्यापी तो हरी

 

© प्रभा सोनवणे

“सोनवणे हाऊस”, ३४८ सोमवार पेठ, पंधरा ऑगस्ट चौक, विश्वेश्वर बँकेसमोर, पुणे 411011

मोबाईल-९२७०७२९५०३,  email- sonawane.prabha@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि ☆ नुक्कड़ नाटक – जल है तो कल है – 1 ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) 

☆ संजय दृष्टि  ☆ नुक्कड़ नाटक – जल है तो कल है – 1 ☆

(प्रसिद्ध पत्रिका ‘नवनीत ‘के जून 2020 के अंक में श्री संजय भारद्वाज जी के नुक्कड़ नाटक जल है तो कल है का प्रकाशन इस नाटक के विषय वस्तु की गंभीरता प्रदर्शित करता है। ई- अभिव्यक्ति ऐसे मानवीय दृष्टिकोण के अभियान को आगे बढ़ाने के लिए कटिबद्ध है। हम इस लम्बे नाटक को कुछ श्रृंखलाओं में प्रकाशित कर रहे हैं। आपसे विनम्र अनुरोध है कि कृपया इसकी विषय वस्तु को गंभीरता से आत्मसात करें ।)

(लगभग 10 पात्रों का समूह। समूह के प्रतिभागी अलग-अलग समय, अलग-अलग भूमिकाएँ निभाएंगे। इन्हें क्रमांक 1,  क्रमांक 2 और इसी क्रम में आगे संबोधित किया गया है। सुविधा की दृष्टि से 1, 2, 3… लिखा है।)

(पथ के एक ओर से समूह का गाते बजाते नाचते आना। ‘…घनन घनन घिर घिर आए बदरा। घन घनघोर छाये बदरा।’  दो या तीन पात्र गा रहे हैं। संभव हो तो एक या दो पात्र वाद्य बजाएँ। शेष बारिश में भीगने का अभिनय कर रहे हैं।)

(एकाएक समूह का एक पात्र आगे आता है। वह तेजी से चक्र घुमाने का अभिनय करता है। गायन, वादन, नृत्य करते सभी पात्र अपने स्थान पर स्थिर मुद्रा में खड़े हो जाते हैं।)

(अब हर पात्र अलग-अलग भूमिका निभाना आरंभ करेगा।)

1-अखबार विक्रेता- आज की ताज़ा ख़बर,  आज की ताज़ा ख़बर। शहर में पानी की बोतलों की चोरी बढ़ी। पानी की चोरी बढ़ी।

2-भोर समाचार- भोर समाचार- अब घर में भी सुरक्षित नहीं पानी की बोतल। घर में भी सुरक्षित नहीं पानी।

3- समाचारवाचक- नमस्कार। प्रस्तुत हैं शहर में घटी मुख्य घटनाएँ। शहर के पश्चिमी भाग से कल देर रात पानी की 17 बोतलें चोरी हो गईं। एक रोज पहले ही दक्षिणी भाग से 19 बोतलें चोरी हुई थी। सूत्रों के अनुसार सप्ताह भर में शहर से पानी की कुल 216 बोतलें चोरी हुई हैं। इन घटनाओं को लेकर आम जनता में भारी रोष है।

4- क्रॉनिकल न्यूज़- बड़ी खबरें- शहर में पेयजल को लेकर दो गुटों ने जमकर बवाल काटा। हुआ यूँ  कि पानी की सरकारी दुकान में पानी की केवल 7 बोतलें बची थीं। दोनों पक्षों का कहना था कि दुकान पर पहले वे पहुँचे थे, इसलिए पानी उनको मिलना चाहिए।

5- अरे सुनती हो, अखबार में लिखा है कि कल पड़ोस की कॉलोनी में जरूरत से ज्यादा पानी संग्रह करने के आरोप में पानी इंस्पेक्टर ने 4 घरों का चालान काटा है। हमारे पास अतिरिक्त पानी तो नहीं है ना?

6- वृद्ध क्र.-1क्या जमाना आ गया है! हमारे समय में भुखमरी से किसी का मरना तो सुनते थे,अब तो ‘प्यासमरी’ से लोग मर रहे हैं।

7- वृद्ध क्रमांक 2-  रोटी नहीं होने पर पानी पीकर कुछ वक्त गुजारा हो जाता था, अब तो पानी भी मयस्सर नहीं।

8- इंटरनेट समाचार- पानी की तस्करी कर रहे गिरोह के एक टेंपो को कल इलाके के लोगों ने धर दबोचा। टेंपो में 20 लीटर क्षमता वाले पानी से भरे तीन कैन मिले। पुलिस के पहुँचने से पहले 2 कैन का पानी भीड़ ने लूट लिया था। छीना-झपटी में तीसरा कैन फट गया जिससे उसमें रखा पानी बहकर बर्बाद हो गया। बाजार में इस पानी का मूल्य लगभग साठ हज़ार रुपये है।

9- (चक्रवाले लड़के से)- तुम कौन हो? हम सबको यह क्या दिखा रहे हो?

10-  मैं समय हूँ। 50 वर्ष आगे की तस्वीरें दिखा रहा हूँ। तस्वीर समाप्त होते जल की, तस्वीर अंत की ओर बढ़ते कल की।

क्रमशः  —— 2

(यह नुक्कड़ नाटक संकल्पना, शब्द, कथ्य, शैली और समग्र रूप में संजय भारद्वाज का मौलिक सृजन है। इस पर संजय भारद्वाज का सर्वाधिकार है। समग्र/आंशिक/ छोटे से छोटे भाग के प्रकाशन/ पुनर्प्रकाशन/किसी शब्द/ वाक्य/कथन या शैली में परिवर्तन, संकल्पना या शैली की नकल, नाटक के मंचन, किसी भी स्वरूप में अभिव्यक्ति के लिए नाटककार की लिखित अनुमति अनिवार्य है।)

(नोट– घनन घनन घिर घिर आए बदरा,  गीत श्री जावेद अख्तर ने लिखा है।)

©  संजय भारद्वाज, पुणे

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 
मोबाइल– 9890122603

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ सस्ते का चक्कर ☆ डॉ विजय तिवारी ‘किसलय’

डॉ विजय तिवारी ‘किसलय’

( डॉ विजय तिवारी ‘ किसलय’ जी संस्कारधानी जबलपुर में साहित्य की बहुआयामी विधाओं में सृजनरत हैं । आपकी छंदबद्ध कवितायें, गजलें, नवगीत, छंदमुक्त कवितायें, क्षणिकाएँ, दोहे, कहानियाँ, लघुकथाएँ, समीक्षायें, आलेख, संस्कृति, कला, पर्यटन, इतिहास विषयक सृजन सामग्री यत्र-तंत्र प्रकाशित/प्रसारित होती रहती है। आप साहित्य की लगभग सभी विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी सर्वप्रिय विधा काव्य लेखन है। आप कई विशिष्ट पुरस्कारों / अलंकरणों से पुरस्कृत / अलंकृत हैं।  आप सर्वोत्कृट साहित्यकार ही नहीं अपितु निःस्वार्थ समाजसेवी भी हैं। 

☆ व्यंग्य – सस्ते का चक्कर

(हम आभारी है  व्यंग्य को समर्पित  “व्यंग्यम संस्था, जबलपुर” के जिन्होंने  30 मई  2020 ‘ की  गूगल  मीटिंग  तकनीक द्वारा आयोजित  “व्यंग्यम मासिक गोष्ठी’”में  प्रतिष्ठित व्यंग्यकारों की कृतियों को  हमारे पाठकों से साझा करने का अवसर दिया है।  इसी कड़ी में  प्रस्तुत है सुप्रसिद्ध लेखक/व्यंग्यकार डॉ विजय तिवारी ‘ किसलय’ जी का  बुंदेली भाषा का पुट लिए एक  विचारणीय व्यंग्य – “सस्ते का चक्कर”।  कृपया  रचना में निहित मानवीय दृष्टिकोण को आत्मसात करें )

 

काय बड्डे, जो का हो गओ?

कल तक तो बड़ी-बड़ी डींगें हाँकत रहे! आज इते दुबके बैठे हो। रामू ने जगदीश से कहा।

जगदीश बोला: कुछ मत पूछो रामू। किस्सू भैया का दाँव उल्टा पड़ गया। जिस नेता को ये अपना सगा समझते थे, उन्होंने ही कन्नी काट ली। जिनकी दम पर ये उछल कूद मचाते रहते थे, उन्होंने ही अपना हाथ खींच लिया, बस इतना पता चलते ही अगले दिन बजरंगी महाराज ने चढ़ाई कर दी। चार-छह लठैत-कट्टाधारी साथ में लाये और चौराहे वाला मकान खाली करवा दिया। किस्सू भैया की एक न चली। भीगी बिल्ली बने सिकुड़े खड़े रहे।

रामू बोला: हमाई जा समझ में नईं आबे कि जब लड़बे-झगड़बे की औकातई नैयाँ तो औरों के दम पे।  जे किस्सू भैया काय इतरात रहे। कछु अपनी भी दम  भी भओ चहिए।

जगदीश बोले: बात तो आपने सही कही रामू , लेकिन किस्सू भैया पार्षद की टिकिट के जुगाड़ में लगे हैं। अपना दबदबा बढ़ाने के चक्कर में मौका पाकर अपने से कमजोरों पर रौब झाड़ने लगते हैं। अब इस बार जब इनके नेता जी ने खुद ही पार्टी बदल ली तो सारे समीकरण बदल गए।  भला ऐसे समय में किस्सू जैसे छुटभैयों के चक्कर में कोई अपनी लुटिया क्यों डुबोयेगा। आखिर किस्सू भैया के नेता जी को भी तो नई पार्टी में अपनी साख जमाना है। वैसे सही बात तो ये है कि किस्सू के पास कोई दमदारी या धन-दौलत तो है नहीं। जीवन भर चमचागिरी ही करते आये हैं। दो-चार बड़े नेताओं से परिचय क्या हो गया, टिकट की दावेदारी ठोकने लगे।

रामू बोला: तो अब का बचो है इनके पास?

किस्सू भैया ने पानी पी-पीकर जितनो कोसो है दूसरी पार्टी वालों खें, अब वे इन्हें अपने पास तक नें बिठेंहें, टिकट की बात तो बहुत दूर की है। इनकी ओछीं हरकतें, चाहे जब मार-पीट, लड़ाई-झगड़े और जा कलई की बेइज्जती कम है का। इनकी पार्टी वाले भी इन्हें टिकट देबे की पहलऊँ सौ बार सोचहें। बेचारे किस्सू भैया। का सोचत रयै और का हो गओ। अब तो तुम्हाये किस्सू न घर के रहे नें घाट के, तुम्हईं बताओ हम सही कै रये की नईं।

जगदीश: अरे भाई, मैं क्या बताऊँ। मैं कोई नेता-वेता तो हूँ नहीं। पड़ोसी होने के नाते साथ में उठना-बैठना तो पड़ता ही है न। अब कल से सीधे दुकान ही जाया करूँगा और अपना धंधा में अपना ध्यान लगाऊँगा।

रामू: और जो किस्सू भैया ने तुम्हें ओई चौरस्ते बारे मकान खें सस्ते में दिलाबे की बात कही ती, अब ओ को का करहो?

जगदीश: अरे रामू भैया, अब छोड़ो उस बात को, अब जो पैसे हमने उन्हें दिए थे, वे तो डूबे ही समझ लो, कोई लिखा पढ़ी तो की नहीं थी। और फिर किस्सू जैसे लोगों से पैसे वापस लेना टेढ़ी खीर है।

हमें तो इस विपदा की घड़ी में  कोई रास्ता ही सुझाई नहीं दे रहा है।

रामू: अच्छा तुम्हईं बताओ जगदीश भैया कि हमनें तुम्हें कितनी बार समझाओ रहो कि अपनी दुकान की तरफ ध्यान लगाओ लेकिन तुमने लालच के चक्कर में एकऊ नें मानी। अब खुदई भुगतो और घर बारों को भी अलसेट में डालो। अब हमारी एक सलाह मानो, आज के बाद तुम भूल खें भी बो किस्सू के पास नें जईयो, गए तो बो उल्टे चार-छह लात-घूँसे मार खें भगा देहे और यदि तुमने थाने में रिपोट लिखबा भी दई तो ओ के डर से तुम्हें कोई गवाह तक नें मिलहे।

जगदीश: अरे भाई, आप भी न, सांत्वना और समझाने की जगह हमें डरा रहे हो। कोई उपाय हो तो वह बताओ।

रामू: सुनो जगदीश भैया, किस्सू को पैसा देने के पहले  तुमने हमसे पूछी रही का? कोई सलाह लई रही का? अब तुम उनके चंगुल में फँस गए हो तो अब हम का बताएँ तुम्हें। अब तो बस उन पैसों खें भूलई जाओ और भगवान के ऊपर छोड़ दो। कायसें के कभऊ किस्सू खें  सद्बुद्धि आई तो बो लौटा भी सकत है।

जगदीश: काश रामू, मैंने अपनी घरवाली की बात मान ली होती तो ये दिनन देखना न पड़ते। अब तो वो महीनों रोज सौ-सौ सुनाएगी। पैसों की अलग चिंता और अब बीवी के दिनरात ताने, कहाँ फँस गया मैं रामू!

रामू: और ले लो सस्ते में मकान। सस्ते का चक्कर होता ही ऐसा है जिसमें अक्सर लुटिया डूबतई है। भैया हम भले और हमारी मजदूरी भली। हम तो घरें जात हें, पेट में चूहे कूद रयै हें।

और  बैठ लो अपने किस्सू भैया के संगे। हमारी मानो तो अब ओ से सौ गज दूरई रहियो!!! जाते जाते एक और सलाह दे गया रामू..

यहाँ जगदीश के दिमाग में किस्सू भैया, नेता जी, बजरंगी महाराज, मकान, डूबे पैसे, रामू के कटाक्ष, और बीवी के ताने चलचित्र की भाँति दिखाई दे रहे थे। जगदीश अब किंकर्तव्यविमूढ़ की स्थिति में था।

 

© डॉ विजय तिवारी ‘किसलय’

पता : ‘विसुलोक‘ 2429, मधुवन कालोनी, उखरी रोड, विवेकानंद वार्ड, जबलपुर – 482002 मध्यप्रदेश, भारत
संपर्क : 9425325353
ईमेल : vijaytiwari5@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ गांधी चर्चा # 31 – बापू के संस्मरण-5 मैं तुझसे डर जाता हूं ☆ श्री अरुण कुमार डनायक

श्री अरुण कुमार डनायक

(श्री अरुण कुमार डनायक जी  महात्मा गांधी जी के विचारों केअध्येता हैं. आप का जन्म दमोह जिले के हटा में 15 फरवरी 1958 को हुआ. सागर  विश्वविद्यालय से रसायन शास्त्र में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त करने के उपरान्त वे भारतीय स्टेट बैंक में 1980 में भर्ती हुए. बैंक की सेवा से सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृति पश्चात वे  सामाजिक सरोकारों से जुड़ गए और अनेक रचनात्मक गतिविधियों से संलग्न है. गांधी के विचारों के अध्येता श्री अरुण डनायक वर्तमान में गांधी दर्शन को जन जन तक पहुँचानेके लिए कभी नर्मदा यात्रा पर निकल पड़ते हैं तो कभी विद्यालयों में छात्रों के बीच पहुँच जाते है. 

आदरणीय श्री अरुण डनायक जी  ने  गांधीजी के 150 जन्मोत्सव पर  02.10.2020 तक प्रत्येक सप्ताह गाँधी विचार  एवं दर्शन विषयों से सम्बंधित अपनी रचनाओं को हमारे पाठकों से साझा करने के हमारे आग्रह को स्वीकार कर हमें अनुग्रहित किया है.  लेख में वर्णित विचार  श्री अरुण जी के  व्यक्तिगत विचार हैं।  ई-अभिव्यक्ति  के प्रबुद्ध पाठकों से आग्रह है कि पूज्य बापू के इस गांधी-चर्चा आलेख शृंखला को सकारात्मक  दृष्टिकोण से लें.  हमारा पूर्ण प्रयास है कि- आप उनकी रचनाएँ  प्रत्येक बुधवार  को आत्मसात कर सकें। आज प्रस्तुत है “बापू के संस्मरण – मैं तुझसे डर जाता हूं”)

☆ गांधीजी के 150 जन्मोत्सव पर  विशेष ☆

☆ गांधी चर्चा # 30 – बापू के संस्मरण – 5- मैं तुझसे डर जाता हूं☆ 

 

साबरमती-आश्रम में रसोईघर का दायित्व श्रीमती कस्तुरबा गांधी के ऊपर था । प्रतिदिन अनेक अतिथि गांधीजी सें मिलने के लिए आते थे बा बड़ी प्रसन्नता से सबका स्वागत-सत्कार करती थीं । त्रावनकोर का रहने वाला एक लड़का उनकी सहायता करता था एक दिन दोपहर का सारा काम निपटाने के बाद रसोईघर बन्द करके बा थोड़ा आराम करने के लिये अपने कमरे में चली गईं । गांधीजी मानो इसी क्षण की राह देख रहे थे बा के जाने के बाद उन्होंने उस लड़के को अपने पास बुलाया और बहुत धीमे स्वर में कहा, “अभी कुछ मेहमान आनेवाले हैं उनमें पंड़ित मोतीलाल नेहरु भी हैं उन सब के लिए खाना तैयार करना है बा सुबह से काम करते-करते थक गई हैं उन्हें आराम करने दे और अपनी मदद के लिए कुसुम को बुला ले और देख, जो चीज जहां से निकाले, उसे वहीं रख देना” ।

लड़का कुसुम बहन को बुला लाया और दोनो चुपचाप अतिथियों के लिए खाना बनाने की तैयारी करने लगे । काम करते-करते अचानक एक थाली लड़के के हाथ से नीचे गिर गई । उसकी आवाज से बा की आंख खुल गई सोचा रसोईघर में बिल्ली घुस आई है वह तुरन्त उठकर वहां पहुंची, लेकिन वहां तो और कुछ ही दृश्य था बड़े जोरों से खाना बनाने की तैयारियां चल रही थीं वह चकित भी हुईं और गुस्सा भी आया ऊंची आवाज में उन्होंने पूछा, “तुम दोनों ने यहां यह सब क्या धांधली मचा रखी हैं?”

लड़के ने बा को सब कहानी कह सुनाई इसपर वह बोलीं, “तुमने मुझे क्यों नहीं जगाया?” लड़के ने तुरन्त उत्तर दिया, “तैयारी करने के बाद आपको जगानेवाले थे आप थक गई थीं, इसलिए शुरु में नहीं जगाया” । बा बोलीं, “पर तू भी तो थक गया था क्या तू सोचता है, तू ही काम कर सकता हैं,मैं नहीं कर सकती ?” और बा भी उनके साथ काम करने लगीं ।

शाम को जब सब अतिथि चले गये तब वह गांधीजी के पास गईं और उलाहना देते हुए बोलीं, “मुझे न जगाकर आपने इन बच्चों को यह काम क्यों सौंपा?” गांधीजी जानते थे कि बा को क्रोध आ रहा है इसलिए हंसते-हंसते उन्होंने उत्तर दिया, “क्या तू नहीं जानती कि तू गुस्सा होती है, तब मैं तुझसे ड़र जाता हूं?” बा बड़े जोर से हंस पड़ीं, मानो कहती हों –“आप और मुझसे डरते हैं!”

 

©  श्री अरुण कुमार डनायक

42, रायल पाम, ग्रीन हाइट्स, त्रिलंगा, भोपाल- 39

(श्री अरुण कुमार डनायक, भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं  एवं  गांधीवादी विचारधारा से प्रेरित हैं। )

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – मृग तृष्णा # 1 – फलसफा जिंदगी का ☆ – श्री प्रह्लाद नारायण माथुर

श्री प्रहलाद नारायण माथुर

( श्री प्रह्लाद नारायण माथुर जी  अजमेर राजस्थान के निवासी हैं तथा ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी से उप प्रबंधक पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। आपकी दो पुस्तकें  सफर रिश्तों का तथा  मृग तृष्णा  काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुकी हैं तथा दो पुस्तकें शीघ्र प्रकाश्य । आज से प्रस्तुत है आपका साप्ताहिक स्तम्भ – मृग तृष्णा  जिसे आप प्रति बुधवार आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता फलसफा जिंदगी का

 

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☆ फलसफा जिंदगी का ☆

फलसफा जिंदगी का लिखने बैठा था,

कलम स्याही और कुछ खाली पन्ने रखे थे पास में ||

 

सोच रहा था आज फुर्सत में हूँ,

उकेर दूंगा अपनी जिंदगी इन पन्नों में जो रखे थे साथ में ||

 

कलम को स्याही में डुबोया ही था,

एक हवा का झोंका आया पन्ने उड़ने लगे जो रखे थे पास में ||

 

दवात से स्याही बाहर निकल गयी,

लिखे पन्नों पर स्याही बिखर गयी जो रखे थे पास में ||

 

हवा के झोंके ने मुझे झझकोर दिया,

झोंके से पन्ने इधर-उधरउड़ने लगे जो स्याही में रंगे थे ||

 

कागज सम्भालने को उठा ही था,

दूर तक उड़ कर चले गए कुछ पन्ने जो पास में रखे थे ||

 

उड़ते पन्ने कुछ मेरे चेहरे से टकराए,

चेहरे पर कुछ काले धब्बे लग गए लोग मुझ पर हंसने लगे थे ||

 

नजर उठी तो देखा लोग मुझे देख रहे थे,

लोगों ने मेरी जिंदगी स्याही भरे पन्नों में पढ़ ली जो बिखरे पड़े थे ||

© प्रह्लाद नारायण माथुर 

8949706002

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हिन्दी साहित्य- लघुकथा ☆ दो-दो नाकें ☆ डॉ. कुंवर प्रेमिल

डॉ कुंवर प्रेमिल

(डॉ कुंवर प्रेमिल जी  जी को  विगत 50 वर्षों  से लघुकथा, कहानी, व्यंग्य में लगातार लेखन का अनुभव हैं। अब तक दस पुस्तकें प्रकाशित। 2009 से प्रतिनिधि लघुकथाएं (वार्षिक) का सम्पादन एवं ककुभ पत्रिका का प्रकाशन और सम्पादन। वरिष्ठतम नागरिकों ने उम्र के इस पड़ाव पर आने तक जीवन की कई  सामाजिक समस्याओं /महामारियों से स्वयं की पीढ़ी  एवं आने वाली पीढ़ियों को बचाकर वर्तमान तक का लम्बा सफर तय किया है,जो कदाचित उनकी रचनाओं में झलकता है। आज प्रस्तुत है  उनकी एक सार्थक लघुकथा “ दो-दो नाकें”। )

☆ लघुकथा – दो-दो नाकें ☆  

एक आदमी एक  साथ आधा दर्जन बकरियाँ खरीद लाया. घास पत्ती खाकर बकरियां अपना परिवार बढ़ाने लगी. मोहल्ले के बच्चे बकरियों के छौने खिलाने लगे. पड़ोसी के घर घी – दूध की नदी बहने लगी. सुबह-सुबह महंगे दामों पर बकरी का शुद्ध दूध खरीदने वालों की कतारें लगने लगीं.

मोहल्ले वालों में फिर शीघ्र ही बकरी मालिक से मतभेद बढ़ने लगा. उसकी  संपन्नता मोहल्ले वालों से देखी नहीं जा रही थी.

वे सब बकरी मालिक से बोले- भाई जी, बकरियों ने हमारी नींदे खराब कर दी है. उनके मल मूत्र की गंध ने हमारा सुख चैन छीन  लिया है. आप शीघ्र ही इसका कोई उपाय कीजिए.

बकरी वाला पूरी निडरता से बोला-  बकरियां तो गांधी बाबा के पास भी थीं. उनकी बकरियों से तो किसी को भी शिकायतें  नहीं रहीं. मेरी बकरियों की दुर्गंध आपको कैसे आने लगी. आपके पास दो दो नाकें है क्या?

बकरी मालिक और पड़ोसियों के बीच एकाएक गांधीजी आ खड़े हुए तो सबकी बोलती बंद हो गयी.

आज भी गांधी बाबा इसी तरह हरिजनों -गिरीजनों के बीच उनकी लाठी बनकर खड़े हो जाएं तो क्या कीजिएगा?

 

© डॉ कुँवर प्रेमिल
एम आई जी -8, विजय नगर, जबलपुर – 482 002 मोबाइल 9301822782

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हिन्दी साहित्य ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – कृष्णा साहित्य # 30 ☆ बँधी प्रीति की डोर ☆ श्रीमती कृष्णा राजपूत ‘भूमि

श्रीमती कृष्णा राजपूत ‘भूमि’  

श्रीमती कृष्णा राजपूत ‘भूमि’ जी  एक आदर्श शिक्षिका के साथ ही साहित्य की विभिन्न विधाओं जैसे गीत, नवगीत, कहानी, कविता, बालगीत, बाल कहानियाँ, हायकू,  हास्य-व्यंग्य, बुन्देली गीत कविता, लोक गीत आदि की सशक्त हस्ताक्षर हैं। विभिन्न पुरस्कारों / सम्मानों से पुरस्कृत एवं अलंकृत हैं तथा आपकी रचनाएँ आकाशवाणी जबलपुर से प्रसारित होती रहती हैं। आज प्रस्तुत है  एक भावप्रवण कविता बँधी प्रीति की डोर  । 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – कृष्णा साहित्य # 30 ☆

☆ बँधी प्रीति की डोर  ☆

 

भीनी -भीनी खुश्बू ने भरमाया है.

मेरे मन की सांकल को खटकाया है

 

छेड़ा अपना राग समय ने अलबेला

जीवन की उलझन को फिर उलझाया है.

 

बँधी प्रीती की डोर, खो गई मैं देखो

प्रीतम ने ऐसा बादल बरसाया है.

 

पानी का बुलबुला एक जीवन अपना

क़ूर समय से पार न कोई पाया है.

 

मौन है जिन्दगी भटकती राहों में

देर हो गयी अब न कोई आया है।

 

© श्रीमती कृष्णा राजपूत  ‘भूमि ‘

अग्रवाल कालोनी, गढ़ा रोड, जबलपुर -482002 मध्यप्रदेश

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योग-साधना LifeSkills/जीवन कौशल ☆ The Wheel of Happiness and Well-Being ☆ Shri Jagat Singh Bisht

Shri Jagat Singh Bisht

(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker.)

☆ The Wheel of Happiness and Well-Being☆ 

Video Link >>>>

The Wheel of Happiness and Well-Being

The faculty of the Acropolis Institute of Technology and Research, Indore loved participating in ‘The Wheel of Happiness and Well-Being’ program conducted in their campus in February 2017.

The Director of the Institute and the Heads of Departments were also present in the program facilitated by Radhika Bisht and Jagat Singh Bisht, Founders of LifeSkills.

“The Wheel of Happiness and Well-Being” is an activity based, multi dimensional program for health, happiness, peace and well-being. The components of the program include Positive Psychology, Meditation, Yoga, Spirituality and Laughter Yoga.

A Pathway to Authentic Happiness, Well-Being & A Fulfilling Life! We teach skills to lead a healthy, happy and meaningful life.

The Science of Happiness (Positive Psychology), Meditation, Yoga, Spirituality and Laughter Yoga. We conduct talks, seminars, workshops, retreats and trainings.

Please feel free to call/WhatsApp us at +917389938255 or email lifeskills.happiness@gmail.com if you wish to attend our program or would like to arrange one at your end.

Jagat Singh Bisht : Founder: LifeSkills

Master Teacher: Happiness & Well-Being; Laughter Yoga Master Trainer
Past: Corporate Trainer with a Fortune 500 company & Laughter Professor at the Laughter Yoga University.
Areas of specialization: Behavioural Science, Positive Psychology, Meditation, Five Tibetans, Yoga Nidra, Spirituality, and Laughter Yoga.

Radhika Bisht ; Founder : LifeSkills  
Yoga Teacher; Laughter Yoga Master Trainer

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आध्यत्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता ☆ पद्यानुवाद – त्रयोदश अध्याय (17) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता

हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

त्रयोदश अध्याय

(ज्ञानसहित क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ का विषय)

ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते ।

ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम्‌ ।। 17।।

अंधकार से दूर नित, वह है सतत प्रकाश

वही जानने योग्य है, हर मन उसका वास।। 17।।

 

भावार्थ :  वह परब्रह्म ज्योतियों का भी ज्योति (गीता अध्याय 15 श्लोक 12 में देखना चाहिए) एवं माया से अत्यन्त परे कहा जाता है। वह परमात्मा बोधस्वरूप, जानने के योग्य एवं तत्वज्ञान से प्राप्त करने योग्य है और सबके हृदय में विशेष रूप से स्थित है।। 17।।

 

That, the Light of all lights, is beyond darkness; it is said to be knowledge, the Knowable and the goal of knowledge, seated in the hearts of all.।। 17।।

 

 

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर

vivek1959@yahoo.co.in

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी का काव्य संसार # 38 ☆ मशाल ☆ सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा

सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा

(सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी  सुप्रसिद्ध हिन्दी एवं अङ्ग्रेज़ी की  साहित्यकार हैं। आप अंतरराष्ट्रीय / राष्ट्रीय /प्रादेशिक स्तर  के कई पुरस्कारों /अलंकरणों से पुरस्कृत /अलंकृत हैं । हम आपकी रचनाओं को अपने पाठकों से साझा करते हुए अत्यंत गौरवान्वित अनुभव कर रहे हैं। सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी का काव्य संसार शीर्षक से प्रत्येक मंगलवार को हम उनकी एक कविता आपसे साझा करने का प्रयास करेंगे। आप वर्तमान में  एडिशनल डिविजनल रेलवे मैनेजर, पुणे हैं। आपका कार्यालय, जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है।आपकी प्रिय विधा कवितायें हैं। आज प्रस्तुत है आपकी  कविता “ मशाल ”।  यह कविता आपकी पुस्तक एक शमां हरदम जलती है  से उद्धृत है। )

आप निम्न लिंक पर क्लिक कर सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी के यूट्यूब चैनल पर उनकी रचनाओं के संसार से रूबरू हो सकते हैं –

यूट्यूब लिंक >>>>   Neelam Saxena Chandra

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी का काव्य संसार # 38 ☆

☆ मशाल   ☆

रेगिस्तान सी तन्हाई है मुझमें-

बहुत चली हूँ नंगे पाँव

तपती हुई बालू पर,

बहुत खोजा है मेरे बेचैन दिल ने

पानी की तरह ख़ुशी को

जो किसी मृगतृष्णा की तरह

मेरी उँगलियों से फिसलती रही,

बहुत सहा है मैंने

उबलती हुई हवाओं को

जो मेरे बदन पर वार करती रहीं

और छालों से ढक दिया…

 

हाँ,

रेगिस्तान सी तन्हाई है मुझमें,

पर मुझमें एक अलाव की लौ भी है-

और यह लौ

सीने पर लाख ज़ख्म होने पर भी

मुझे बुझने नहीं देती

और शायद इसीलिए मैं रुदाली नहीं बनी,

मैं बन गयी एक मशाल

जो राहगीरों को रौशनी दिखाती है!

 

© नीलम सक्सेना चंद्रा

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