(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी हिन्दी, दूर शिक्षा ,पत्रकारिता व जनसंचार, मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित । 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘जहाँ दरक कर गिरा समय भी’ ( 2014) कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज पस्तुत है उनका अभिनव गीत “धैर्यवान पीढ़ियाँ“ ।)
(आदरणीय अग्रज एवं वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री शांतिलाल जैन जी विगत दो दशक से भी अधिक समय से व्यंग्य विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी पुस्तक ‘न जाना इस देश’ को साहित्य अकादमी के राजेंद्र अनुरागी पुरस्कार से नवाजा गया है। इसके अतिरिक्त आप कई ख्यातिनाम पुरस्कारों से अलंकृत किए गए हैं। इनमें हरिकृष्ण तेलंग स्मृति सम्मान एवं डॉ ज्ञान चतुर्वेदी पुरस्कार प्रमुख हैं। श्री शांतिलाल जैन जी के साप्ताहिक स्तम्भ – शेष कुशल में आज प्रस्तुत है उनका एक सार्थक व्यंग्य “कोरोना काल में चैलेंजेस….जाने भी दो यारों”। इस साप्ताहिक स्तम्भ के माध्यम से हम आपसे उनके सर्वोत्कृष्ट व्यंग्य साझा करने का प्रयास करते रहते हैं । श्री शांतिलाल जैन जी के व्यंग्य में वर्णित सारी घटनाएं और सभी पात्र काल्पनिक होते हैं ।यदि किसी व्यक्ति से इसकी समानता होती है, तो उसे मात्र एक संयोग कहा जाएगा। हमारा विनम्र अनुरोध है कि श्री शांतिलाल जैन जी के प्रत्येक व्यंग्य को हिंदी साहित्य की व्यंग्य विधा की गंभीरता को समझते हुए सकारात्मक दृष्टिकोण से आत्मसात करें। )
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – शेष कुशल #5 ☆
☆ कोरोना काल में चैलेंजेस….जाने भी दो यारों ☆
इस समय का सबसे बड़ा चैलेंज कौन सा है ?
आईये पता करते हैं.
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“हलो, मिसेज जुनेजा इस समय का सबसे बड़ा चैलेंज कौनसा है ?”
“ए-फोर वेस्ट चैलेंज. थ्वानू नी पता! आज सेकण्ड डे है और असि जीतने दा चांस नज़र नी आ रिया.”
“थोडा डिटेल में बताईये”
“सोश्यल मीडिया में कितना तो ट्रेंड कर रहा है जी. देक्खो, साड्डा ग्रुप है ना. उना दी सारी लेडीज को अपनी अपनी कमर के आगे ए-फोर साईज का पेपर रख के सेल्फी अपलोड करनी है. मेरी कमर ना 2 सेंटीमीटर तो बाहर निकल रही है.”
“ओफ्फ!, अब क्या करेंगी आप ?”
“डाईटिंग पर हूँ. चैलेंज जीत के रहूंगी. चार दिन भूख्या ही तो रेना पड़ेगा, होर कि ? उस मटकू रजनी की कम्मर से घट ही है साड्डी.”
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“इस समय का सबसे बड़ा चैलेंज कौनसा है मिसेज विश्वनाथन ?”
“साड़ी का चैलेंज. अमको ना एथनिक वियर में साड़ी पहन के फोटो अपलोड करने का ….वो चैलेंज का बोला.”
बताते हुवे वे पसीना पसीना हो गईं. उनके दामाद ने तुरंत उन्हें रक्तचाप नियंत्रित करने की गोली दी. उनकी घबराहट बता रही है कि चैलेंज काफी मुश्किल है.
“इसमें प्रोब्लेम क्या है ?”
“अमारा पंचम्पामपल्ली सिल्क साड़ी. एक दम बेस्ट…फस्ट क्लास. टोंटी टू थाउजंड में खरीदा. उदर विजयवाड़ा में रक्खा है फोल्ड करके और अम इदर लॉकडाउन में भोपाल में पड़ा है …फूल अन फोल्ड….. मेचिंग ब्लाऊज भी उदर को है वो ड्राय कलीन है. अबी क्या करेगा हम, चैलेंज तो ले लिया है.” उन्होंने स्मरण किया – “भक्तवत्सल गोविंदा…गोविंदा.”
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“हलो रोहित, इस समय का सबसे बड़ा चैलेंज कौनसा है ?”
“यस ब्रो, चैलेंज ट्रेडिशनल ड्रेस पहनने का दिया है फ्रेंड्स ने. वीडियो डालना है. कमीने हैं साले, उनको मालूम है आई कांट वियर सिली ओल्ड फैशंड धोती यार. …..एनी वे, उपरवाले अंकल से मिल तो गई मगर बंध नहीं रही. बार बार खुल जाती है. यू नो, ग्रुप में पियूषा भी है. क्या सोचेगी – आई कांट डू दिस मच ओनली. शिट यार.”
“नेक्स्ट चैलेंज आपको देना है, वो भी ग्रुप की गर्ल्स को. क्या सोचा है ?”
“बेली बटन चैलेंज. ग्रुप में कोई नहीं जीत पायेगी, एक्सेप्ट माय लव पियूषा. एक दम जीरो फिगर. ये इन्स्टाग्राम वाला केस मीडिया में नहीं आता तो ब्रेस्ट ग्रेबिंग चैलेंज देता. वैसे चैलेंज गर्ल्स के शॉपिंग बैग पहनकर फोटो खिंचवाने का भी जोरदार है ब्रो. देखते हैं.”
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“आप तो जनप्रतिनिधि हैं, इस समय का सबसे बड़ा चैलेंज कौनसा है ?”
“गमछा बांधना. देखा नहीं जननायक कैसे गमछा लपेट के आ रहे हैं फोटो में. सारे कार्यकर्ताओं को चैलेंज दिया है गमछा मुंह पे बांध के फोटो अपलोड करने का.”
“कुछ तो और भी होगा. आप बता नहीं रहे.”
“वे धीरे से मुस्कराये और लगभग कान में बोले महीना वसूली बड़ा चैलेंज है बॉस. सरकारी दफ्तर ज्यादातर बंद चल रहे हैं. अफसरों से दो महीने का मंथली ड्यू हो गया है. साले बाद में देंगे नहीं. चैलेंज-रिकवरी.”
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“हलो मि. सिस्टम, इस समय का सबसे बड़ा चैलेंज कौनसा है ?”
“मैं चैलेंज लेता नहीं, देता हूँ. लाखों लोगों ने स्वीकार किया है ये चैलेंज.”
“किसी से मिलवायेंगे”
“ओके, इनसे मिलिये. नाम बताईये आपका ?”
“जयराम”
“कहाँ से निकले हो, कहाँ जा रहे हो ?”
“दिल्ली से निकले हैं साब, मोतिहारी जा रहे हैं, बिहार में. बरवा गाँव है उहाँ. वहीं जायेंगे.”
“पैदल जायेंगे ?”
“हाँ साब, घर तो जाना ही परेगा. खाये-पिये का कुछ नहीं है पास में. बीच बीच में कोई कुछ दे देता है तो खा पी लेते हैं. पईसा भी सब ख़तम हो गया बस किसी तरह गाँव घर पहुँच जायें साब.”
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सरोकार में मि. सिस्टम के फेंके चैलेंजेस तो और भी हैं, बट फ़िलवक्त ….जाने भी दो यारों.
(श्री जयप्रकाश पाण्डेय जी की पहचान भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी के अतिरिक्त एक वरिष्ठ साहित्यकार की है। वे साहित्य की विभिन्न विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। उनके व्यंग्य रचनाओं पर स्व. हरीशंकर परसाईं जी के साहित्य का असर देखने को मिलता है। परसाईं जी का सानिध्य उनके जीवन के अविस्मरणीय अनमोल क्षणों में से हैं, जिन्हें उन्होने अपने हृदय एवं साहित्य में सँजो रखा है । प्रस्तुत है साप्ताहिक स्तम्भ की अगली कड़ी में व्यंग्य – दचक्का संस्कृति। आप प्रत्येक सोमवार उनके साहित्य की विभिन्न विधाओं की रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे ।)
☆ जय प्रकाश पाण्डेय का सार्थक साहित्य # 49 ☆
☆ व्यंग्य – दचक्का संस्कृति ☆
पहले हम दिल्ली से अपने शहर लौटते थे तो हमारा शहर गांव जैसा लगता था बेहद आत्मीयता लिए पोहा – जलेबी सुबह और इमरती शाम को। हरि पान वाला तत्कालीन कपड़ा मंत्री की उधारी का हिसाब लगाता मिलता। दचका भरी सड़कों के जंजाल में अस्पताल पहुंचने के पहले रिक्शे में नार्मल डिलेवरी हो जाती, इत्ता प्यारा था हमारा अपना शहर। तीन साल पहले इसे स्मार्ट सिटी बनाने हेतु घोषित किया गया, तीन साल गुजर गए पर सड़कों के गड्ढेे दिलेरी से सड़क पर कब्जा जमाये हुए हैं ऐसे में सड़क पर चलते हुए अचानक स्मार्ट सिटी का नाम याद आ जाता है।
क्या आप किसी ऐसे शहर की कल्पना कर सकते हैं जिसकी सड़कें चमचमाती सपाट सजी हुई हों, सड़कों पर हर खम्भे पर झकास बल्ब लगे हों, रात में पैदल यात्री के उपस्थित होने पर बल्ब स्वत: जल जाऐं अन्यथा डिम हो जाएं। सूर्य की रोशनी के अनुरूप घरों की लाइटें घटाई-बढ़ाई जा सकें, स्वच्छ पर्यावरण सुंदर परिवहन व्यवस्था, बिजली पानी की 24 घंटे उपलब्धता, स्मार्ट कूड़ेदान… आदि…. ये सब स्मार्ट सिटी की बातें दचके खाते हुए याद करने में मजा तो आता है। हमारे शहर की किच्च पिच्च गड्ढेदार सड़कों में चलते चलते इतने दचक्के पड़ जाते हैं कि हड्डी के डाक्टर के पास जाना मजबूरी हो जाती है। खपरैल अस्पताल इन्हीं कारणों से कई मंजले में तब्दील हो गए। जब हड्डी के डाक्टर के पास ज्यादा पैसा बढ़ जाता है तो उसका मन राजनीति की हड्डी खाने की तरफ लपलपाने लगता है। दचक्का लगने से कई फायदे हैं पंचर की दुकानें खूब चलतीं हैं, अस्थि रोग विशेषज्ञ के पास मरीजों की रेलमपेल भीड़ पहुंचती है दचके खाने से महिलाओं में समय पूर्व प्रसव पीड़ा उठ बैठती है। एक अस्थि रोग विशेषज्ञ ने अपनी एक्सरे मशीन में ऐसा इंतजाम किया है कि हड्डी भले न टूटी हो एक्सरे रिपोर्ट में हड्डी में क्रेक जरुर दिखेगा।
पान की दुकान में जाओ तो वहां भी गड्ढों और स्मार्ट सिटी की चर्चा होती है, सड़क का ठेकेदार सड़कों की दशा और दिशा पर कहता है कि यहां की जमीन में लफड़ा है ऊपर से डामल पोतो तो गड्ढा छुपा बैठा रहता है पानी गिरा और गड्ढा फन काड़ के बाहर निकला। ठेकेदार का ये भी कहना जायज है कि सड़क में ज्यादा गड्ढे रहने से ट्रैफिक कन्ट्रोल रहता है और स्पीड ब्रेकर बनाने के झंझट से मुक्ति मिलती है। सड़क की बात बदलते हुए ठेकेदार पान की पीक से पास के पोल को रंग देता है और स्वच्छता अभियान के बैनर में हिज्जे की गलती दिखा देता है।
दूसरा ठेकेदार पान में बाबा चटनी चमनबहार और चवन्नी डालने की फरमाइश कर रहा है पान खाने का जो मजा इहां है वो कहीं नहीं….. और अपना शहर राष्ट्रीय एकता की मिसाल है इहां व्हीकल स्टेट में बंगाली, गोरखपुर प्रेमनगर में सरदार जी, मदार टेकरी में भाई जान, गढ़ा में बम्हना, और इहां जे और उहां बे….।शहर से खुश होकर एक कह गए संस्कारधानी तो दूसरे कह गए गुंडाधानी। अभी स्मार्ट सिटी मामले में भी अपना शहर सातवें पायदान पर बैठ गया है और सड़क के गड्ढे हैं कि हटने का नाम ही नहीं ले रहे हैं। रिमझिम पानी गिर रहा है गड्ढे लबालब भर गए हैं थोड़ी थोड़ी देर में मोटरसाइकिल वाले गड्ढे में दचक्का खाके पलटी मार रहे हैं और ऐसे में पान की दुकान के बाजू में खड़ा शराबी खूब मजा ले रहा है ज्यादा लग गई है इसलिए स्मार्ट सिटी पर बक बक कर रहा है बीच बीच में देश की दुर्दशा पर रोने लगता है कहता है बड़े बाबू दौड़ दौड़ चीन काहे को जाते हैं, चीन मिलाके मारेगा तो सब समझ में आ जायेगा।
पान की दुकान टाइम पास करने का अच्छा अड्डा होता है तरह-तरह के लोग आते जाते रहते हैं उस तरफ से मस्ती में चूर एक शराबी पान की दुकान की तरफ गाना गाते हुए बढ़ रहा है
“जिंदगी ख्बाब है… ख्बाब में सच है क्या.. और भला झूठ है क्या……..”
सबका ध्यान उसी की तरफ हो जाता है, सड़क के गड्ढे में पैर पड़ जाने से गिरकर उठता है फिर पास खड़े लोगों को गलियाने लगता है पान की दुकान पर खड़े लोगो सड़क के गड्ढों को दोष नहीं देना, मेरा शहर स्मार्ट सिटी बन रहा है……. बाजू वाले भाई ने आंख मारकर ईशारा किया इहां से बढ़ लेओ, ये आदमी लफड़ेबाज है जेब में कट्टा रखे है।
हम लोग डरते हुए, दचक्के खाते हुए और स्मार्ट सिटी की खूबियों पर बहस करते हुए आगे बढ़ ही रहे थे कि अचानक मोटर साइकिल वाले ने गड्ढे को बचाने के चक्कर में हमारी टांग तोड़ दी, अस्पताल पहुंचे तो नर्स झपकियां ले रही थी और हम लुटे लुटे दर्द से पिटे पिटे टूटा पैर लिए हुए नर्स को पुकारते रहे …………।
(प्रस्तुत है संस्कारधानी जबलपुर ही नहीं ,अपितु राष्ट्रीय स्तर ख्यातिलब्ध साहित्यकार -कवि पंडित मनीष तिवारीजी की पत्रकारिता दिवस के अवसर पर समस्त पत्रकारों को हार्दिक शुभकामनाओं के साथ समर्पित एक विनोदात्मक कविता “पत्रकार का प्रेम – पत्र”। श्री मनीष तिवारी जी की लेखनी को सादर नमन। )
☆ पत्रकारिता दिवस विशेष – पत्रकार का प्रेम – पत्र ☆
(Dr. Nidhi Jain is an assistant professor at Bharti Vidyapeeth, College of Engineering, Pune. She selected teaching as her profession, but it was a dream to be a litterateur. Her first book कुछ लम्हे is a culmination of her interest. Her time management of family, profession (Teaching in engineering science) and literature is exemplary. Today we present her poem “Chemistry teacher “.)
☆ Weekly Column ☆ From Nidhi’s Pen #10 ☆
☆ Chemistry teacher ☆
Though I am a chemistry teacher,
but I never understand the chemical bond acting between the friendship.
Though I am a chemistry teacher,
but I never understand the mechanism of relationship.
Though I am a chemistry teacher,
but I never understand the fusion of thoughts that trigger anger.
Though I am a chemistry teacher,
but I never understand the catalyst that that makes people happy.
Though I am a chemistry teacher,
but I never understand magnetism that holds the bond of marriage.
Though I am a chemistry teacher,
but I never understand the physical and chemical reaction in human brains that brings war among human being.
Though I am a chemistry teacher,
but I never understand the enzymatic reaction why God implanted corona virus on human being
(कवी राज शास्त्री जी (महंत कवी मुकुंदराज शास्त्री जी) का ई- अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत है। आप मराठी साहित्य की आलेख/निबंध एवं कविता विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। मराठी साहित्य, संस्कृत शास्त्री एवं वास्तुशास्त्र में विधिवत शिक्षण प्राप्त करने के उपरांत आप महानुभाव पंथ से विधिवत सन्यास ग्रहण कर आध्यात्मिक एवं समाज सेवा में समर्पित हैं। विगत दिनों आपका मराठी काव्य संग्रह “हे शब्द अंतरीचे” प्रकाशित हुआ है। ई-अभिव्यक्ति इसी शीर्षक से आपकी रचनाओं का साप्ताहिक स्तम्भ आज से प्रारम्भ कर रहा है। आज प्रस्तुत है उनकी भावप्रवण कविता “व्यथा साहित्यिकांच्या…”)
इस वीडियो में है आनंद की विज्ञान सम्मत व्याख्या और खुशहाली की राह की ओर इशारा..
आनंद का वैज्ञानिक आधार क्या है?
आनंद के आधुनिक विज्ञान (The Science of Happiness, Positive Psychology) के अनुसार, आनंद के पांच तत्त्व हैं:
The Five Elements of Happiness:
Positive Emotion
Engagement or flow
Relationships
Meaning
Accomplishment
सरल हिंदी में इन्हें कह सकते हैं:
सुखद अनुभूति
किसी काम में गहरे डूब जाना
आत्मिक सम्बन्ध
जीवन का अर्थ या मायने
उपलब्धि
इस वीडियो में इन तत्वों की व्याख्या की गयी है, इन्हें समझाया गया है। इन्हें समझने के बाद आप अपने आनंद को और विस्तृत कर सकते हैं और खुशहाली की ओर अपने कदम बढ़ा सकते हैं।
आनंदमय जीवन के वैज्ञानिक सूत्र: खुशहाली की ओर पहला कदम: – जगत सिंह बिष्ट
The Five Elements of Well-Being:
Happiness is a thing and well-being is a construct. The five elements of well-being are positive emotion, engagement, relationships, meaning, and accomplishment.
Positive Emotion: Positive Emotion includes the feelings of joy, excitement, contentment, hope and warmth. There may be positive emotions relating to the past, present or future.
Engagement: Engagement denotes deep involvement in a task or activity. One does not experience the passing of time. One experiences flow in sports, music and singing but one may also experience it in work, reading a book or in a good conversation.
Relationships: We feel happy when we are among family and friends. The quality and depth of relationships in one’s life make it rich.
Meaning: It’s connecting to something larger than life.
Accomplishment: One strives for achievements in life as a source of happiness.
Each of these elements contributes to well-being. The good news is that each one of the above may be cultivated and developed to enhance level of well-being.
A Pathway to Authentic Happiness, Well-Being & A Fulfilling Life! We teach skills to lead a healthy, happy and meaningful life.
The Science of Happiness (Positive Psychology), Meditation, Yoga, Spirituality and Laughter Yoga. We conduct talks, seminars, workshops, retreats and trainings.
Please feel free to call/WhatsApp us at +917389938255 or email lifeskills.happiness@gmail.com if you wish to attend our program or would like to arrange one at your end.
Jagat Singh Bisht : Founder: LifeSkills
Master Teacher: Happiness & Well-Being; Laughter Yoga Master Trainer
Past: Corporate Trainer with a Fortune 500 company & Laughter Professor at the Laughter Yoga University.
Areas of specialization: Behavioural Science, Positive Psychology, Meditation, Five Tibetans, Yoga Nidra, Spirituality, and Laughter Yoga.
हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’
त्रयोदश अध्याय
(ज्ञानसहित क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ का विषय)
बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च ।
सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञयं दूरस्थं चान्तिके च तत् ।।15।।
बाहर भीतर सबों के चर औ” अचर समान
सूक्ष्म अतः अज्ञेय हैं,दूर पास का ज्ञान ।।15।।
भावार्थ : वह चराचर सब भूतों के बाहर-भीतर परिपूर्ण है और चर-अचर भी वही है। और वह सूक्ष्म होने से अविज्ञेय (जैसे सूर्य की किरणों में स्थित हुआ जल सूक्ष्म होने से साधारण मनुष्यों के जानने में नहीं आता है, वैसे ही सर्वव्यापी परमात्मा भी सूक्ष्म होने से साधारण मनुष्यों के जानने में नहीं आता है) है तथा अति समीप में (वह परमात्मा सर्वत्र परिपूर्ण और सबका आत्मा होने से अत्यन्त समीप है) और दूर में (श्रद्धारहित, अज्ञानी पुरुषों के लिए न जानने के कारण बहुत दूर है) भी स्थित वही है।।15।।
Without and within (all) beings, the unmoving and also the moving; because of His subtlety, unknowable; and near and far away is That.।।15।।
(आपसे यह साझा करते हुए हमें अत्यंत प्रसन्नता है कि वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय डॉ कुन्दन सिंह परिहार जी का साहित्य विशेषकर व्यंग्य एवं लघुकथाएं ई-अभिव्यक्ति के माध्यम से काफी पढ़ी एवं सराही जाती रही हैं। हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहते हैं। डॉ कुंदन सिंह परिहार जी की रचनाओं के पात्र हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं। उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं। आज प्रस्तुत है व्यंग्य ‘भाग्य से मिला मानुस तन ’। यह सच है कि मानव जीवन भाग्य से मिलता है। किन्तु, जीवन मिलने के आगे भी तो बहुत कुछ है……..। ऐसे अतिसुन्दर व्यंग्य के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार # 52 ☆
☆ व्यंग्य – भाग्य से मिला मानुस तन ☆
गोसाईं जी बहुत सही लिख गये हैं——‘बड़े भाग मानुस तन पावा,सुर दुरलभ सब ग्रंथनि गावा।’ यानी यह मनुष्य का चोला बड़े भाग्य से मिलता है और यह देवताओं के लिए भी दुर्लभ है।
मनुष्य-जन्म मिला तो रीढ़ सीधी हुई, आँखों के सामने संसार बड़ा हो गया और हाथों को चलने के काम से मुक्ति मिली। आदमी के स्वतंत्र हाथों ने दुनिया को बदल कर रख दिया।रीढ़ की अहमियत के बारे में आचार्य विश्वनाथ तिवारी की एक कविता है—–
‘रीढ़ न हो सीधी तो कैसे बनेगा आदमी,
रीढ़ झुकी है तो हाथ बँथे हैं,
हाथ बँथे हैं तो बँधी हैं आँखें,
आँखें बँधी हैं तो बँधा है मस्तिष्क,
मस्तिष्क बँधा है तो बँधी है आत्मा।’
यानी हाथ मुक्त हुए तो मस्तिष्क और आत्मा भी मुक्त हो गये। निःसंदेह यह मनुष्य-जन्म की बड़ी उपलब्धि है।
लेकिन शंका यह उठती है कि क्या मात्र मनुष्य-जन्म पाने से संसार-सागर में अपनी नैया पार हो जायेगी? विचार करने पर बहुत से प्रश्न और सन्देह कुलबुलाने लगते हैं।
ज़ाहिर है कि सिर्फ मनुष्य का जन्म लेने से काम नहीं चलेगा। जन्म लेते ही देखना होगा कि आप किस जाति में अवतरित हुए हैं।यदि ऊँची जाति में जन्म नहीं हुआ तो मनुष्य-जन्म अकारथ हो जायेगा। ऊँची जाति में अवतरित होते ही ज़िन्दगी की आधी मुश्किलें हल हो जाती हैं।यदि दुर्भाग्य से नीची जाति में जन्म हो गया तो पुराने दागों को छुड़ाते ही उम्र बीत जायेगी।न मन्दिर की सीढ़ियाँ चढ़ने को मिलेंगी, न गाँव के सार्वजनिक कुएँ से पानी नसीब होगा।न घोड़ी पर बारात निकलेगी, न चढ़ी- पनहियाँ गाँव के दबंगों के घर के सामने से निकलना हो पायेगा।कभी कभी ताज्जुब होता है कि क्या ‘इनको’ और ‘उनको’ बनाने वाला भगवान एक ही है? एक ही होता तो हज़ारों साल तक इतना ज़ुल्म कैसे होने देता?सारे कानूनों और सरकारी वीर-घोषणाओं के बावजूद निचली जातियों का एक बड़ा तबका अभी भी अपने पुराने, गंदे धंधों में लिथड़ने के लिए अभिशप्त है जहाँ आगे अँधेरे के सिवा कुछ नहीं है।
दूसरे, मनुष्य-जन्म तभी सार्थक हो सकता है जब घर में इतना पैसा-कौड़ी हो कि पढ़-लिख कर मुकम्मल आदमी बना जा सके। अब शिक्षा इतनी मँहगी हो गयी है कि खर्च उठाने की कूवत न हुई तो मनुष्य-जन्म प्राप्त करने के बाद भी ‘साक्षात पशु, पुच्छ विषाण हीना’ बने रहने की नौबत आ सकती है। शिक्षा प्राप्त करने के बाद कुछ बचे तो कुछ पैसा ‘रिश्वत फंड’ के लिए रखना ज़रूरी होगा अन्यथा काबिलियत के बाद भी नौकरी और रोज़गार पाने में अनेक ‘दैवी’ अड़चनें पैदा हो सकती हैं।
दर असल मनुष्य-जन्म को सार्थक बनाने के लिए कुछ ‘पावर’ होना ज़रूरी है, अन्यथा मनुष्य-जन्म बिरथा हो जाएगा। ‘पावर’ पालिटिक्स का हो सकता है या पैसे का या पद का। ये तीनों अन्योन्याश्रित हैं। पैसा पालिटिक्स में घुसने की राह हमवार करता है। पैसे से पद और पद से पैसा प्राप्त होने का सुयोग बनता है। पालिटिक्स में सफलता मिल जाए तो पैसा और पद सब सुलभ हो जाता है। आजकल एक और पावर धर्म का है जो मनुष्य-जीवन को बड़ी ऊँचाइयाँ प्रदान करता है। धर्म का पावर सब पावर से बढ़ कर है। यह पावर मिल जाए तो लक्ष्मी अपने आप खिंची चली आती है। साथ ही राजनीतिज्ञ,थनकुबेर और बड़े पदाधिकारी सभी धर्म की शक्ति वालों के आगे नतमस्तक होते हैं। धर्म का चमत्कार देखना हो तो धार्मिक पावर वालों के जीवन पर दृष्टि डालें।
किस्सा-कोताह यह कि मनुष्य-जन्म की सार्थकता तभी है जब ऊपर दी हुई शर्तें भी पूरी हों, अन्यथा कोरा मनुष्य-जन्म साँसत में गुज़र सकता है।
फिलहाल खबर यह है कि हमारे देश में कई लोग अपने शरीर में रीढ़ की उपस्थिति से परेशान हैं। उनका कहना है कि पालिटिक्स और नौकरी में सफलता के लिए रीढ़ को बार बार झुकाना पड़ता है और मनुष्य के रूप में उन्हें जैसी रीढ़ मिली है उसमें पर्याप्त लचक नहीं है।इसलिए वे डाक्टरों से मिलकर संभावना तलाश कर रहे हैं कि उनकी रीढ़ अलग करके उन्हें केंचुए जैसा बना दिया जाए ताकि उनका जीवन सरल और सफल हो सके।
☆ ई- अभिव्यक्ति का विशेष आलेख ☆ “व्यंग्यम स्मृतियाँ” – व्यंग्य विधा : एक ऐतिहासिक सन्दर्भ ☆
(यह बात सन 2011 की है जब आदरणीय एवं अग्रज सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार श्री श्रीराम अयंगार जी ने अपने ब्लॉग को अपनी प्रिय पत्रिका “व्यंग्यम” के नाम से शीर्षक दिया। मैं कल्पना करता हूँ कि यदि यह पत्रिका जीवित रहती तो हिन्दी साहित्य में व्यंग्य विधा की दिशा कुछ और ही होती। यह हमारा दुर्भाग्य है कि जिन पुरोधाओं ने 70 के दशक में अपने श्रम, परिकल्पना और स्वप्नों की आहुती दी उन्हें हिन्दी साहित्य में उचित स्थान सम्मान देना तो दूर, अपितु, इस तिकड़ी के दो जीवित पुरोधाओं को भी हमने भुला दिया। उनके कार्य को उन्हें जानने वाली समवयस्क और वरिष्ठ पीढ़ियों के अतिरिक्त शायद ही कोई जानता है। इस शोधपरक आलेख के लिए अग्रज आदरणीय श्री जय प्रकाश पाण्डेय जी के सहयोग के लिए आभार । इस आलेख के माध्यम से मैं आपको व्यंग्य विधा के लिए समर्पित उन तीन नवयुवकों द्वारा रचे इतिहास से अवगत कराने का प्रयास कर रहा हूँ। )
संस्कारधानी जबलपुर के तीन नवयुवक श्री महेश शुक्ल, स्व रमेश शर्मा ‘निशिकर’ एवं श्री श्रीराम आयंगर ने जनवरी 1977 में संभवतः मध्य प्रदेश की प्रथम व्यंग्य पत्रिका ‘व्यंग्यम’ का प्रथम अंक प्रकाशित किया होगा तब वे नहीं जानते थे कि वे इतिहास रच रहे हैं।
आज श्री महेश शुक्ल जी सेंट्रल बैंक से सेवानिवृत होकर बिलासपुर में बस गए एवं श्री श्रीराम आयंगर जी इलाहाबाद बैंक से सेवानिवृत होकर बेंगलुरु में बस गए हैं। स्व निशिकर जी का देहांत लगभग 20-25 वर्ष पूर्व हो चुका है।
श्री महेश शुक्ल जी उस समय की याद करते हुए पुराने दिनों में खो जाते हैं। वे गर्व से बताते हैं कि उन्हें जी एस कॉलेज जबलपुर में डॉ कुन्दन सिंह परिहार जी ने अङ्ग्रेज़ी और श्री ज्ञानरंजन जी ने हिन्दी की शिक्षा दी थी। आज डॉ कुन्दन सिंह परिहार जी एवं श्री ज्ञानरंजन जी आज भी साहित्य सेवा में रत हैं। डॉ परिहार जी बाद में जी एस कॉलेज से प्राचार्य हो कर सेवानिवृत्त हुए एवं उम्र के इस पड़ाव में आज भी लघुकथा तथा व्यंग्य विधा में सतत लेखन जारी है। मैं स्वयं को भाग्यशाली समझता हूँ जो ई-अभिव्यक्ति के माध्यम से मुझे भी उनका आशीर्वाद प्राप्त है। श्री ज्ञानरंजन जी अपनी पत्रिका ‘पहल’ का सतत सफल सम्पादन कर रहे हैं।
अग्रज श्री श्रीराम आयंगार जी के शब्दों में “कुछ करने की जिजीविषा झलकती है और साथ ही असफलता हमें निराश करती है।” वे आज भी उसी ऊर्जा के साथ साहित्य एवं समाज सेवा में लिप्त हैं। जब मैंने उनसे इस बारे में चर्चा करनी चाही तो उन्होने अपने ब्लॉग का एक लिंक प्रेषित किया जो उनके पत्रिका के प्रति आत्मीय जुड़ाव एवं उन मित्रों के संघर्ष की कहानी बयां करती है।
श्री श्रीराम आयंगर जी अपने ब्लॉग के 6 जनवरी 2011 के अंक में लिखते हैं –
“31 वर्षों के बाद मैं अपने इस ब्लॉग को ’व्यंग्यम’ के लिए पुनः समर्पित कर रहा हूँ। आपने मेरे ब्लॉग के टेम्प्लेट और शीर्षक में बदलाव देखा होगा। अब एक शब्द “वयंग्यम” प्रत्यय दिया है। 2011 की यह पहली पोस्ट हिंदी में एक त्रैमासिक लघु पत्रिका “व्यंग्यम” को समर्पित है, जो पूरी तरह से व्यंग्य लेखन के लिए ही समर्पित थी। इस पत्रिका का सम्पादन मैं और मेरे जैसी मानसिकता वाले दो लेखक मित्र रमेश शर्मा ‘निशिकर’ और श्री महेश शुक्ला मिलकर करते थे। निशिकार जी का घर ही उनका कार्यालय हुआ करता था।
हिंदी में ‘व्यंग्य’ मेरे दिल के बहुत करीब है, जैसा कि मैं अपने कॉलेज के दिनों से पहले और बाद में अंग्रेजी में व्यंग्य लिख रहा हूं। अक्सर पाठक हास्य विधा को व्यंग्य विधा समझने की गलती करते हैं, लेकिन हम व्यंग्यकार के रूप में दोनों के बीच एक रेखा खींचते हैं। जबकि हास्य विशुद्ध रूप से हंसी और मनोरंजन के लिए है, व्यंग्य हास्य के स्पर्श के साथ गंभीर विचार प्रक्रिया है जो पाठक को सामाजिक और राजनीतिक रूप से और आसपास के समाज में विसंगतियों से अवगत कराता है।
यदि हम 70 या 80 का दशक देखें तो पाएंगे कि व्यंग्य को किसी भी हिन्दी पत्र पत्रिका में अनियमित रूप से फिलर की तरह उपयोग में लाया जाता था। उस दौरान मुंबई से राम अवतार चेतन द्वारा प्रकाशित ‘रंग चकल्लस’ के अतिरिक्त हिन्दी की कोई भी पत्रिका नहीं थी जो व्यंग्य विधा में कार्य कर रही हो। यह पत्रिका भी हास्य और व्यंग्य का मिला जुला स्वरूप थी। मध्य प्रदेश उन दिनों देश के दो शीर्ष व्यंग्यकारों के लिए एक घर था, जैसे श्री हरि शंकर परसाई, जबलपुर में और भोपाल में श्री शरद जोशी। वे मेरे जैसे अन्य कई युवा लेखकों के प्रेरणा स्तम्भ थे।
हम तीन मित्रों ने व्यंग्य पर एक पत्रिका प्रारम्भ कर इस अंतर को भरने का विचार और फैसला किया। हम तीनों उस समय लिपिकीय ग्रेड में थे। बिना किसी वित्तीय सहायता और कैनवसिंग या मार्केटिंग के अनुभव के केवल दृढ़ निश्चय और जुनून के बल पर अपनी योजना को आगे बढ़ाने का फैसला किया। यह वह समय था जब हमारा देश 1976 में ‘आपातकाल’ नामक इतिहास के एक काले दौर से गुजर रहा था। मीडिया पर पूर्ण सेंसरशिप थी; ‘अभिव्यक्ति का अधिकार’ दमनकारी था, विपक्षी नेता या तो जेल में थे या भूमिगत थे और सत्ता में मौजूद लोग रेंग रहे थे। व्यंग्य और हास्य पहली बार आपातकाल में हताहत हुआ था। ‘Shankar’s Weekly’ जैसी हास्य व विनोदी अंग्रेजी पत्रिका को बंद करने के लिए मजबूर किया गया क्योंकि इसने घुटने टेकने से इनकार कर दिया था। ऐसे आपातकाल के घने बादलों के साये में हमारी पत्रिका की परिकल्पना की गई थी और हमने जनवरी 1977 में ‘व्यंग्यम’ नाम से 500 प्रतियों प्रकाशित की जिनका मूल्य दो रुपये रखा।
प्रकाशन की अपनी पूरी अवधि में हम तीनों मित्रों ने संपादक, प्रूफ रीडर, लेआउट डिजाइनर, ऑफिस बॉय, चाय वाले, डिस्पैचर और फेरीवाले, सभी रोल अदा किए। वर्ष 77-78 के दौरान, त्रैमासिक पत्रिका के आठ अंकों का नियमित रूप से प्रकाशन किया गया था। पत्रिका को लेखकों के मुफ्त योगदान के माध्यम से सभी प्रसिद्ध और नवोदित लेखकों से पूर्ण समर्थन मिला किन्तु निरंतर वित्तीय सहायता के अभाव में 10वें अंक के प्रकाशित होते तक पत्रिका ने थकान और बीमारी का संकेत देना शुरू कर दिया। इसकी कम लागत के बावजूद, दुर्भाग्य से पत्रिका अपेक्षित बिक्री या सदस्यता प्राप्त नहीं कर सकी ।”
महेश शुक्ला जी बताते हैं कि “यह उन सबके लिए सदैव अविस्मरणीय रहेगा कि प्रिंटिंग प्रैस के मालिक श्री नटवर जोशी जी जिनकी प्रेस हनुमानताल में हुआ करती थी, ने हमें भरपूर सहयोग दिया। जब हमारे पास प्रकाशनार्थ पैसे नहीं होते थे तो भी वे हम पर विश्वास कर पत्रिकाएँ विक्रय के लिए सौंप देते थे और कहते थे – “जब भी बिक्री से पैसे आ जाएँ तो दे देना।”
श्री आयंगर जी बताते हैं कि “धन जुटाने के उद्देश्य से हमने दो पुस्तकें और श्री राम ठाकुर दादा का एक उपन्यास ’24 घंटे ‘ शीर्षक से भी प्रकाशित किया, लेकिन सारे प्रयास व्यर्थ हो गए ।”
वे आगे बताते हैं कि – “जल्द ही हम 1979 में पत्रिका को बंद करने के लिए मजबूर हो गए। “व्यंग्यम” को फिर से पुनर्जीवित नहीं किया जा सका। पत्रिका के बंद होने से हमारे कई मित्र लेखकों और शुभचिंतकों ने भी अपने असली रंग दिखाये और चुपचाप किनारा कर लिया।”
ये उस भाग्यशाली व्यंग्यकर पीढ़ी के सदस्य हैं, जिन्हें स्व हरीशंकर परसाईं जैसी विशिष्ट विभूति का सानिध्य एवं मार्गदर्शन मिला। इन्होने उस समय अपनी पत्रिका में श्री आयंगार जी द्वारा लिया गया परसाईं जी का साक्षात्कार भी प्रकाशित किया था । बाद में श्री जयप्रकाश पाण्डेय जी ने परसाईं जी का सबसे लंबा एवं अतिम साक्षात्कार लिया था जो काफी चर्चित रहा और अब भी बतौर ऐतिहासिक सन्दर्भ स्मरण किया जाता है ।
श्री महेश शुक्ला जी बताते हैं कि – उस दौरान नवभारत टाइम्स ने पत्रिका कि समीक्षा प्रकाशित की थी जिसका शीर्षक “आपातकाल में मुरझाया व्यंग्यम” था।
मुझे इन दोनों विभूतियों से मिलाने का अब तक सौभाग्य तो नहीं मिला किन्तु फोन पर बातचीत करते हुए ऐसा लगता ही नहीं कि मैं इनसे अनजान हूँ । दोनों ने बड़ी संजीदगी से मुझसे संवाद किया और प्रेरित किया। दोनों बेहद जिंदादिल इंसान हैं । मुझे इन दोनों में एक अंतरंग समानता दिखाई दी जो साझा करना चाहता हूँ । दोनों को ही संगीत से प्रेम है। अग्रज श्री श्रीराम जी बेहद सुरीले स्वर में गाते हैं और श्री महेश शुक्ल जी संगीत की धुन पर थिरकने से स्वयं को रोक नहीं पाते।
व्यंग्यम” के दुखद अध्याय पर आज भी चर्चा करते हुए इनके नेत्र नम हो जाते हैं।
हम अपने पाठकों के लिए तीनों वरिष्ठतम व्यंग्यकारों के सस्वर व्यंग्यपाठ आप तक पहुंचाने का प्रयास कर रहे हैं। आशा है आपका स्नेह मिलेगा।
आप सम्मानित व्यंग्यकारों के चित्र अथवा नाम (अंग्रेजी वर्णमाला के क्रम में) पर क्लिक कर उनकी रचना आत्मसात कर सकते हैं ।
☆ व्यंग्यम स्मृतियाँ ☆ व्यंग्य रचना : किचन में मेरे कदम ☆ व्यंग्यकार एवं स्वर : श्री महेश शुक्ला ☆
जन्म – 13 सितंबर 1942 जबलपुर (म प्र )
भूतपूर्व कर्मी मध्यप्रदेश विद्युत मण्डल जबलपुर, मध्यप्रदेश प्रकाशन – साप्ताहिक हिंदुस्तान / कंचन प्रभा / माधुरी / मायापुरी / राष्ट्रधर्म / हास्यम आदि प्रमुख पत्र पत्रिकाओं में .
☆ व्यंग्यम स्मृतियाँ ☆ व्यंग्य रचना : जागरूक पीढ़ी ☆ व्यंग्यकार एवं स्वर : श्री श्रीराम आयंगर ☆
जन्म – 27 अप्रैल 1950 दुर्ग म प्र प्रकाशन – सारिका, हास्यम, रंग, नवभारत टाइम्स। कहानीकार, कंचनप्रभा, मुक्ता, मायापुरी, यूथ टाइम्स, सन, अरुण, नवभारत एवं अनेक लघु पत्रिकाएं । आकाशवाणी से रचनाएँ प्रसारित। समांतर लघु कथाएं / काफिला / पाँच व्यंग्यकार / श्रेष्ठ व्यंग्य रचनाएँ संकलनों में रचना प्रकाशित। व्यंगयम पत्रिका का जबलपुर से संयुक्त संपादन ( वर्तमान में स्थगित)। पुस्तक एक बीमार सौ अनार १९८५। व्यंगयम शीर्षक से ब्लॉग 2011 से ।
लिम्का बुक ऑफ रेकॉर्ड 2009 में उन सभी स्थानों पर विजिट करने के लिए जहां 50 वर्ष पूर्व रहे थे
एन जी ओ श्री मिशन के लिए ई पत्रिका मास्टर का सम्पादन
☆ व्यंग्यम स्मृतियाँ ☆ चलते चलते – श्री महेश शुक्ला जी एवं श्री जयप्रकाश पाण्डेय जी का एक महत्वपूर्ण संवाद ☆
श्री जय प्रकाश पाण्डेय
आदरणीय श्री महेश शुक्ल जी के विगत जबलपुर यात्रा के समय श्री महेश शुक्ल जी को व्यंग्यम गोष्ठी में सम्मानित किया गया एवं श्री जयप्रकाश पाण्डेय जी ने उनसे संक्षिप्त संवाद को अपने मोबाईल में कैद कर लिया जिसे हम आपसे साझा कर रहे हैं –
“व्यंग्यम” पत्रिका की स्मृति में विगत 34 माह से जबलपुर में मासिक व्यंग्यम गोष्ठी का आयोजन होता रहा है । व्यंग्यम को पुनर्जीवित करने के उद्देश्य से “व्यंग्यम गोष्ठी” की श्रृंखला का आयोजन सतत जारी है और भविष्य में व्यंग्यम पत्रिका की योजना भी विचाराधीन है।
विगत 34 माह पूर्व जबलपुर में मासिक व्यंग्यम गोष्ठी की श्रंखला चल रही है जिसमें व्यंग्यकार हर माह अपनी ताजी रचनाओं का पाठ करते हैं। 34 महीने पहले इस आयोजन को प्रारम्भ करने का श्रेय जबलपुर के सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार डाॅ कुंदन सिंह परिहार, श्री रमेश सैनी, श्री जय प्रकाश पाण्डेय, श्री द्वारका गुप्त आदि व्यंग्यकारों को जाता है। इस गोष्ठी की विशेषता यह है अपने नए व्यंग्य का पाठ इस गोष्टी में करते हैं। इसके अतिरिक्त प्रत्येक तीसरे माह किसी प्रतिष्ठित अथवा मित्र व्यंग्यकारों के व्यंग्य संग्रह की समीक्षा भी की जाती है।
कोरोना समय और लाॅक डाऊन के नियमों के तहत सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए और घर की देहरी के अंदर रहते हुए अप्रैल माह की व्यंग्यम गोष्ठी इंटरनेट पर सोशल मीडिया के माध्यम से सूचना एवं संचार तकनीक का प्रयोग करते हुए आयोजित करने का यह एक छोटा सा प्रयास किया गया था ।इस गोष्ठी के लिए सूचना तकनीक के कई प्रयोगों के बारे में विचार किया गया जैसे कि व्हाट्सएप्प और वीडियो कॉन्फ़्रेंसिंग। किन्तु, प्रत्येक की अपनी सीमायें हैं साथ ही हमारे वरिष्ठतम एवं कई साहित्यकार इन तकनीक के प्रयोग सहजतापूर्वक नहीं कर पाते। इस सन्दर्भ में ई- अभिव्यक्ति ने एक अभिनव प्रयोग किया था । इस प्रयास को आप निम्न लिंक पर देख सुन सकते हैं –
इस ऐतिहासिक प्रयोग के पश्चात मई2020 माह की “व्यंग्यम गोष्ठी” को गूगल मीट तकनीक से कल 30 मई 2020 को आयोजित की गई। सभी प्रतिभागी व्यंग्यकारों को उनके उत्साह के लिए अभिनंदन ।
ई–अभिव्यक्ति की ओर से तीनों मित्रों को व्यंग्य विधा में उनके अभूतपूर्व ऐतिहासिक कार्यों के लिए साधुवाद।
वर्तमान में हमारे बीच उपस्थित श्री महेश शुक्ला जी एवं श्री श्रीराम आयंगर जी का हम पुनः हार्दिक अभिनंदन करते हैं ।
हमें पूर्ण आशा एवं विश्वास है कि इस शोधपरक आलेख को आप सबका स्नेह एवं प्रतिसाद मिलेगा। आदरणीय अग्रज श्री जयप्रकाश पाण्डेय जी का आभार एवं आप सब का पुनः हृदय से आभार। नमस्कार ।
अपने घरों में रहें, स्वस्थ रहें। आज का दिन शुभ हो।