हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ पत्रकारिता दिवस विशेष ☆ पत्रिका समूह के संस्थापक कर्तव्य परायण पत्रकार….श्री कर्पूर चंद्र कुलिश ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ 

(प्रस्तुत है गुरुवर प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  द्वारा  रचित एक समसामयिक विशेष रचना “पत्रिका समूह के संस्थापक कर्तव्य परायण पत्रकार….श्री कर्पूर चंद्र कुलिश। ) 

 

☆ पत्रिका समूह के संस्थापक कर्तव्य परायण पत्रकार….श्री कर्पूर चंद्र कुलिश ☆

 

जनतांत्रिक शासन के पोषक जनहित के निर्भय सूत्रधार

शासन समाज की गतिविधि के विश्लेषक जागृत पत्रकार

 

लाते है खोज खबर जग की देते नित ताजे समाचार

जिनके सब से, सबके जिनसे रहते हैं गहरे सरोकार

जो धड़कन हैं अखबारो की जिनसे चर्चायें प्राणवान

जो निगहवान है जन जन के सब सुखदुख से रह निर्विकार

कर्तव्य परायण पत्रकार….

 

आये दिन बढते जाते है उनके नये नये कर्तव्य भार

जब जग सोता ये जगते हैं कर्मठ रह तत्पर निराहार

औरो को देते ख्याति सदा खुद को पर रखते हैं अनाम

सुलझाने कोई नई उलझन को प्रस्तुत करते नये सद्विचार

कर्तव्य परायण पत्रकार…

पत्रिका समाचार पत्र समूह के संस्थापक कर्पूर चंद्र कुलिश ऐसे ही कर्तव्य परायण, स्वतंत्र, निष्पक्ष व जुझारू पत्रकार हैं. कलम के धनी, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी सास्कृतिक मूल्यों के संरक्षक,वेद विज्ञान के अध्येता श्रद्धेय कुलिश जी के अप्रतिम सामाजिक योगदान के चलते ही भारत सरकार ने उनकी स्मृति को अक्षुण्य बनाने के लिये ५ रुपये का डाकटिकिट भी जारी किया है.

पत्रकारिता के संदर्भ में पौराणिक संदर्भो का स्मरण करें तो नारद मुनि संभवतः पहले पत्रकार कहे जा सकते हैं, इसी तरह  युद्ध भूमि से लाइव रिपोर्टिंग का पहला संदर्भ संजय द्वारा धृतराष्ट्र को महाभारत के युद्ध का हाल सुनाने का है. माना गया है कि  “पत्रकारिता पांचवां वेद है, जिसके द्वारा हम ज्ञान-विज्ञान संबंधी बातों को जानकर अपना बंद मस्तिष्क खोलते हैं ।”

वर्तमान युग में  विश्व में पत्रकारिता का आरंभ सन् 131 ईसा पूर्व रोम में माना जाता है. तब  वहाँ “Acta Diurna” (दिन की घटनाएं) किसी बड़े प्रस्तर पट  या धातु की पट्टी  पर वरिष्ठ अधिकारियों की नियुक्ति, नागरिकों की सभाओं के निर्णयों और ग्लेडिएटरों की लड़ाइयों के परिणामों के बारे में सूचनाएं व  समाचार अंकित करके रोम के मुख्य स्थानों पर रखी जाती थीं.मध्यकाल में यूरोप के व्यापारिक केंद्रों में ‘सूचना-पत्र ‘ निकाले जाने लगे जिनमें कारोबार, क्रय-विक्रय और मुद्रा के मूल्य में उतार-चढ़ाव के समाचार लिखे जाते थे.  ये सारे ‘सूचना-पत्र ‘ हाथ से ही लिखे जाते थे. 15वीं शताब्दी के मध्य में योहन गूटनबर्ग ने छापने की मशीन का आविष्कार किया. असल में उन्होंने धातु के अक्षरों का आविष्कार किया. फिर समाचार पत्रो का मुद्रण शुरू हुआ.   दुनिया के पहले मुद्रित समाचार-पत्र का नाम था ‘रिलेशन’ ऐसा माना जाता है.

हिंदी पत्रकारिता का उद्भव सन् 1826 से 1867 माना जाता है. 1867 से 1900 के समय को हिंदी पत्रकारिता के विकास का प्रारंभिक समय कहा गया है. 1900 से 1947 के समय को हिंदी पत्रकारिता के उत्थान का समय निरूपित किया गया है. 1947 से अब तक के समय को स्वातंत्र्योत्तर पत्रकारिता कहा जाता है. स्वातंत्र्योत्तर पत्रकारिता में अखबार, पत्रिकायें, रेडियो तथा २० वीं सदी के अंतिम दो दशको में टी वी पत्रकारिता का उद्भव हुआ. २१वी सदी के आरंभ के साथ इंटरनेट तथा सोशल मीडीया का विस्तार हुआ. पत्रिका समूह को गौरव प्राप्त है कि प्रौद्योगिकी के इन परिवर्तनो के साथ वह अपने पाठको से कदम से कदम मिलाकर बढ़ रहा है, पत्रिका की वेबसाइट, ईपेपर इसके सजीव उदाहरण हैं.

देश की आजादी में पत्रकारो एवं समाचार पत्रो का अद्वितीय स्थान रहा है. स्वयं तिलक जी, महात्मा गांधी, व क्रांतिकारियो ने भी समय समय पर अनेक समाचार पत्र प्रकाशित किये, व उनके माध्यम से जन जागरण तथा सूचना का प्रसार किया. सूचना और साहित्य किसी भी सभ्य समाज की बौद्धिक भूख मिटाने के लिये अनिवार्य जरूरत है.  सामाजिक बदलाव में सर्वाधिक महत्व विचारों का ही होता है.लोकतंत्र में विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका के तीन संवैधानिक स्तंभो के बाद पत्रकारिता को  चौथे स्तंभ के रूप में मान्यता दी गई क्योकि पत्रकारिता वैचारिक अभिव्यक्ति का माध्यम होता है, आम आदमी की नई प्रौद्योगिकी तक  पहुंच और इसकी  त्वरित स्वसंपादित प्रसारण क्षमता के चलते सोशल मीडिया व ब्लाग जगत को लोकतंत्र के पांचवे स्तंभ के रूप में देखा जा रहा है.

तकनीक के विकास के साथ इस आवश्यकता को पूरा करने के संसाधन बदलते जा रहे हैं.हस्त लिखित अखबार और पत्रिकायें, फिर टंकित तथा साइक्लोस्टायल्ड अथवा फोटोस्टेट पत्रिकायें, न्यूज लैटर या पत्रक, एक एक अक्षर को फर्मे पर कम्पोज करके तथा फोटो सामग्री के ब्लाक बनाकर मुद्रित अखबार की तकनीक, विगत कुछ दशको में तेजी से बदली है और अब बड़े तेज आफसेट मुद्रण की मशीने सुलभ हैं, जिनमें ज्यादातर  कार्य वर्चुएल साफ्ट कापी में कम्प्यूटर पर होता है. समाचार संग्रहण व उसके अनुप्रसारण के लिये  टेलीप्रिंटर की पट्टियो को अभी हमारी पीढ़ी भूली नही है. आज हम इंटरनेट से  ईमेल पर पूरे के पूरे कम्पोज अखबारी पन्ने ही यहाँ से वहाँ ट्रांस्फर कर लेते हैं. कर्पूर चंद्र कुलिश जी ने पत्रिका समूह में सदैव नये परिवर्तनो को सहज भाव से स्वीकार करने का जो व्यवसायिक वातावरण बनाया तथा युवा पत्रकारो को जो काम करने की स्वतंत्रता तथा छत्रछाया दी उसका ही परिणाम है कि आज पत्रिका समूह के देश के विभिन्न भागो से ढ़ेरो संस्करण प्रकाशित हो रहे हैं और एक विशाल टीम समूह इससे जुड़ी हुई है.

वास्तव में पत्रकारिता भी साहित्य की भाँति समाज में चलने वाली गतिविधियों एवं हलचलों की डायरी  है । वह हमारे परिवेश में घट रही प्रत्येक सूचना को हम तक पहुंचाती है । देश-दुनिया में हो रहे नए प्रयोगों और कार्यों को हमें बताती है । इसी कारण विद्वानों ने पत्रकारिता को प्रतिदिन लिखा जाने वाला  इतिहास भी कहा है । वस्तुतः आज की पत्रकारिता सूचनाओं और समाचारों का संकलन मात्र न होकर मानव जीवन के व्यापक परिदृश्य को अपने आप में समाहित किए हुए है । यह शाश्वत नैतिक मूल्यों, सांस्कृतिक मूल्यों को समसामयिक घटनाचक्र की कसौटी पर कसने का साधन बन गई है । पत्रकारिता जन-भावना की अभिव्यक्ति, सद्भावों की अनुभूति और नैतिकता की पीठिका है । संस्कृति, सभ्यता और स्वतंत्रता की वाणी होने के साथ ही यह पत्रकारिता क्रांति की अग्रदूतिका है । ज्ञान-विज्ञान, साहित्य-संस्कृति, आशा-निराशा, संघर्ष-क्रांति, जय-पराजय, उत्थान-पतन आदि जीवन की विविध भावभूमियों की मनोहारी एवं यथार्थ छवि के दर्शन हम युगीन पत्रकारिता के दर्पण में कर सकते हैं । पत्रिका समूह के समाचार पत्र व पत्रिकायें इन मूल्यो के प्रहरी हैं. इसकी नींव के पत्थर संस्थापक कर्पूर चंद्र कुलिश जी ही हैं.

कर्पूरचंद्र कुलिश (केसीके) की स्मृति में  11 हजार डॉलर का अंतरराष्ट्रीय पत्रकारिता पुरस्कार स्थापित किया गया है, यह पत्रिका समूह की पत्रकारिता के पुरोधा को विनम्र श्रद्धांजली है यह प्रतिष्ठित  अवॉर्ड खोजी पत्रकारिता के लिए देश-दुनिया के श्रेष्ठ पत्रकारों को दिया जाता है।.  कर्पूरचंद्र कुलिश जी ने जाने कितनो की जीवनियां पत्रिका के माध्यम से प्रकाशित की पर स्वयं उनकी जीवनी और उन पर विस्तृत सामग्री  कम ही है. यह उनकी आत्म श्लाघा से दूर समर्पित भाव से कार्य करने की प्रवृति दर्शाती है. जरूरत है कि उन पर विशद विवेचनायें हो, उनके पत्रकार स्वरूप, साहित्यिक पक्ष , जैन संस्कृति को वेद विज्ञान से जोड़ते आध्यात्मिक पक्ष, समाज सेवी भाव , राजनैतिक पक्ष, स्वतंत्रता सेनानी स्वरुप तथा सफल व्यवसायिक पक्ष पर शोध कार्य किये जावें जिससे उनके अनुकरणीय जीवन से नई पीढ़ी के युवा पत्रकार  प्रेरणा पा सकें.

 

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ 

ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी , रामपुर , जबलपुर

vivek1959@yahoo.co.in

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच – #50 ☆ सन्मति ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।

श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली  कड़ी । ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच # सन्मति ☆

यात्रा पर हूँ। एक भिक्षुक भजन गा रहा है, ‘रघुपति राघव राजाराम…..सबको सम्पत्ति दे भगवान।’

संभवतः यह उसका भाषाई अज्ञान है। अज्ञान से विज्ञान पर चलें। विज्ञान कहता है कि सजीवों में वातावरण के साथ अनुकूलन या तालमेल बिठाने की स्वाभाविक क्षमता होती है।

इस क्षमता के चलते स्थूल शरीर का भाव सूक्ष्म तक पहुँचता है। जो वाह्यजगत में उपजता है, उसका प्रतिबिंब अंतर्जगत में दिखता है।

आज वाह्यजगत भौतिकता को ‘त्वमेव माता, च पिता त्वमेव’ मानने की मुनादी कर चुका। संभव है कि इसके साथ मानसिक अनुकूलन बिठाने की जुगत में अंतर्जगत ने ‘सन्मति’ को ‘सम्पत्ति’ कर दिया हो।

क्या हम सब भी ‘सन्मति’ से ‘सम्पत्ति’ की यात्रा पर नहीं हैं? सन्मति के लोप और सम्पत्ति के लोभ का क्या कोई प्रत्यक्ष या परोक्ष सम्बंध है? इनके अंतर्सम्बंधों की  पड़ताल शोधार्थियों को संभावनाओं के अगणित आयाम दे सकती हैं।

 

#घर में रहें। सुरक्षित रहें।

©  संजय भारद्वाज

मंगलवार 30 मई 2017, प्रात: 8:35 बजे

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

writersanjay@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ पत्रकारिता दिवस विशेष ☆ जबलपुर की वेब पत्रकारिता और साहित्य तथा समाज में उसका योगदान ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ”  में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, अतिरिक्त मुख्यअभियंता सिविल  (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) में कार्यरत हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है।  उनका कार्यालय, जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। आज प्रस्तुत है श्री विवेक जी का  इंटरनेट की  दुनिया में वेब  / ई -पत्रिकाओं  की भूमिका पर एक शोधपरक आलेख  “जबलपुर की वेब पत्रकारिता और साहित्य तथा समाज में उसका योगदान ।   30 मई को पत्रकारिता दिवस पर इस आलेख के माध्यम से ई -पत्रिकाओं के योगदान को जन जन तक पहुंचने के लिए श्री विवेक जी का हार्दिक आभार । श्री विवेक जी की लेखनी को इस अतिसुन्दर आलेख के  लिए नमन । )

☆ पत्रकारिता दिवस विशेष ☆ 

☆ जबलपुर की वेब पत्रकारिता और साहित्य तथा समाज में उसका योगदान ☆

पौराणिक संदर्भो का स्मरण करें तो नारद मुनि संभवतः पहले पत्रकार कहे जा सकते हैं, इसी तरह  युद्ध भूमि से लाइव रिपोर्टिंग का पहला संदर्भ संजय द्वारा धृतराष्ट्र को महाभारत के युद्ध का हाल सुनाने का है.

वर्तमान युग में  विश्व में पत्रकारिता का आरंभ सन् 131 ईसा पूर्व रोम में माना जाता है. तब  वहाँ “Acta Diurna” (दिन की घटनाएं) किसी बड़े प्रस्तर पट  या धातु की पट्टी  पर वरिष्ठ अधिकारियों की नियुक्ति, नागरिकों की सभाओं के निर्णयों और ग्लेडिएटरों की लड़ाइयों के परिणामों के बारे में सूचनाएं समाचार अंकित करके रोम के मुख्य स्थानों पर रखी जाती थीं.मध्यकाल में यूरोप के व्यापारिक केंद्रों में ‘सूचना-पत्र ‘ निकाले जाने लगे जिनमें कारोबार, क्रय-विक्रय और मुद्रा के मूल्य में उतार-चढ़ाव के समाचार लिखे जाते थे.  ये सारे ‘सूचना-पत्र ‘ हाथ से ही लिखे जाते थे. 15वीं शताब्दी के मध्य में योहन गूटनबर्ग ने छापने की मशीन का आविष्कार किया. असल में उन्होंने धातु के अक्षरों का आविष्कार किया.   फलस्वरूप किताबों का ही नहीं, अखबारों का भी प्रकाशन संभव हो सका. 16वीं शताब्दी के अंत में, यूरोप के शहर स्त्रास्बुर्ग में, योहन कारोलूस नाम का कारोबारी धनवान ग्राहकों के लिये सूचना-पत्र लिखवा कर वितरित करता था,  पर हाथ से बहुत सी प्रतियों की नक़ल करने का काम महंगा  और धीमा था. अतः वह छापे की मशीन ख़रीद कर 1605 में समाचार-पत्र छापने लगा.  समाचार-पत्र का नाम था ‘रिलेशन’,  यह विश्व का प्रथम मुद्रित समाचार-पत्र माना जाता है.

हिंदी पत्रकारिता का तार्किक और वैज्ञानिक आधार पर काल विभाजन करना कुछ कठिन कार्य है. हिंदी पत्रकारिता का उद्भव सन् 1826 से 1867 माना जाता है. 1867 से 1900 के समय को हिंदी पत्रकारिता के विकास का समय कहा गया है. 1900 से 1947 के समय को हिंदी पत्रकारिता के उत्थान का समय निरूपित किया गया है. जबलपुर में इसी अवधि में पत्रकारिता विकसित हुई. 1947 से अब तक के समय को स्वातंत्र्योत्तर पत्रकारिता कहा जाता है. स्वातंत्र्योत्तर पत्रकारिता में अखबार, पत्रिकायें, रेडियो तथा २० वीं सदी के अंतिम दो दशको में टी वी पत्रकारिता का उद्भव हुआ. २१वी सदी के आरंभ के साथ इंटरनेट तथा सोशल मीडीया का विस्तार हुआ और जब हम हिन्दी के  परिदृश्य में इस प्रौद्योगिकी परिवर्तन को देखते हैं तो हिंदी  पर इसके प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखते हैं. 21 अप्रैल, 2003 की तारीख वह स्वर्णिम तिथि है जब  रात्रि  22:21 बजे हिन्दी के प्रथम ब्लॉगर, मोहाली, पंजाब निवासी आलोक ने अपने ब्लॉग ‘9 2 11’ पर अपना पहला ब्लॉग-आलेख हिन्दी वर्णाक्षरों में इंटरनेट पर पोस्ट किया था. इस तारीख को हिन्दी वेब पत्रकारिता का प्रारंभ कहा जाना चाहिये.

पत्रकारिता  आधुनिक सभ्यता का एक प्रमुख व्यवसाय है जिसमें समाचारों का एकत्रीकरण, समाचार लिखना, रिपोर्ट करना, सम्पादित करना और समाचार तथा साहित्य का सम्यक चित्रांकन व प्रस्तुतीकरण आदि सम्मिलित हैं.

सूचना और साहित्य किसी भी सभ्य समाज की बौद्धिक भूख मिटाने के लिये अनिवार्य जरूरत है. तकनीक के विकास के साथ इस आवश्यकता को पूरा करने के संसाधन बदलते जा रहे हैं.हस्त लिखित अखबार और पत्रिकायें, फिर टंकित तथा साइक्लोस्टायल्ड अथवा फोटोस्टेट पत्रिकायें, न्यूज लैटर या पत्रक, एक एक अक्षर को फर्मे पर कम्पोज करके तथा फोटो सामग्री के ब्लाक बनाकर मुद्रित अखबार की तकनीक, विगत कुछ दशको में तेजी से बदली है और अब बड़े तेज आफसेट मुद्रण की मशीने सुलभ हैं, जिनमें ज्यादातर  कार्य वर्चुएल साफ्ट कापी में कम्प्यूटर पर होता है. समाचार संग्रहण व उसके अनुप्रसारण के लिये  टेलीप्रिंटर की पट्टियो को अभी हमारी पीढ़ी भूली नही है. आज हम इंटरनेट से  ईमेल पर पूरे के पूरे कम्पोज अखबारी पन्ने ही यहाँ से वहाँ ट्रांस्फर कर लेते हैं.

सामाजिक बदलाव में सर्वाधिक महत्व विचारों का ही होता है.लोकतंत्र में विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका के तीन संवैधानिक स्तंभो के बाद पत्रकारिता को  चौथे स्तंभ के रूप में मान्यता दी गई क्योकि पत्रकारिता वैचारिक अभिव्यक्ति का माध्यम होता है, आम आदमी की नई प्रौद्योगिकी तक  पहुंच और इसकी  त्वरित स्वसंपादित प्रसारण क्षमता के चलते सोशल मीडिया व ब्लाग जगत को लोकतंत्र के पांचवे स्तंभ के रूप में देखा जा रहा है. वैश्विक स्तर पर पिछले कुछ समय में कई सफल जन आंदोलन इसी सोशल मीडिया के माध्यम से खड़े हुये हैं. हमारे देश में भी बाबा रामदेव, अन्ना हजारे के द्वारा भ्रष्टाचार के विरुद्ध  तथा दिल्ली के नृशंस सामूहिक बलात्कार के विरुद्ध बिना बंद, तोड़फोड़ या आगजनी के चलाया गया जन आंदोलन, और उसे मिले जन समर्थन के कारण सरकार को विवश होकर उसके सम्मुख किसी हद तक झुकना पड़ा. इन  आंदोलनो में विशेष रुप से नई पीढ़ी ने इंटरनेट, मोबाइल एस एम एस और मिस्डकाल के द्वारा अपना समर्थन व्यक्त किया.तब से होते निरंतर प्रौद्योगिकी विकास के साथ हिन्दी के महत्व को स्वीकार करते हुये ही बी बी सी, स्क्रेचमाईसोल, रेडियो जर्मनी,टी वी चैनल्स, तथा देश के विभिन्न अखबारो तथा न्यूज चैनल्स ने भी अपनी वेबसाइट्स पर पाठको के ब्लाग के पन्ने बना रखे हैं.बदलते तकनीकी परिवेश के चलते अब हर हाथ में एंड्रायड मोबाइल आता जा  रहा है, समाचार के लिये एप्प उपलब्ध करवाये जा रहे हैं.

ब्लागर्स पार्क दुनिया की पहली ब्लागजीन के रूप में नियमित रूप से मासिक प्रकाशित हो रही है. यह पत्रिका ब्लाग पर प्रकाशित सामग्री को पत्रिका के रूप में संयोजित  करने का अनोखा कार्य कर रही है.मुझे गर्व है कि मैं इसके मानसेवी संपादन मण्डल का सदस्य हूं.  अपने नियमित स्तंभो में  प्रायः समाचार पत्र ब्लाग से सामग्री उधृत करते हैं. हिन्दी ब्लाग के द्वारा जो लेखन हो रहा है उसके माध्यम से साहित्य, कला समीक्षा, फोटो, डायरी लेखन आदि आदि विधाओ में विशेष रूप से युवा रचनाकार अपनी नियमित अभिव्यक्ति कर रहे हैं. वेब दुनिया, जागरण जंकशन, नवभारत टाइम्स  जैसे अनेक हिन्दी पोर्टल ब्लागर्स को बना बनाया मंच व विशाल पाठक परिवार सुगमता से उपलब्ध करवा रहे हैं.और उनके लेखन के माध्यम से अपने पोर्टल पर विज्ञापनो के माध्यम से धनार्जन भी करने में सफल हैं. हिन्दी और कम्प्यूटर मीडिया के महत्व को स्वीकार करते हुये ही अपने वोटरो को लुभाने के लिये राजनैतिक दल भी इसे प्रयोग करने को विवश हैं. हिन्दी न जानने वाले राजनेताओ को हमने रोमन हिन्दी में अपने भाषण लिखकर पढ़ते हुये देखा ही है.

‘महर्षि जाबालि की तपोभूमि,  नर्मदांचल,  संस्कारधानी जबलपुर  सारस्वत संपदा से सदैव सम्पन्न रही है. वसुधैव कुटुम्बकम् की वैचारिक उद्घोषणा वैदिक भारतीय संस्कृति की ही देन है. वैज्ञानिक अनुसंधानो, विशेष रूप से संचार क्रांति  तथा आवागमन के संसाधनो के विकास ने तथा विभिन्न देशो की अर्थव्यवस्था की परस्पर प्रत्यक्ष व परोक्ष निर्भरता ने इस सूत्र वाक्य को आज मूर्त स्वरूप दे दिया है. हम भूमण्डलीकरण के युग में जी रहे हैं. सारा विश्व कम्प्यूटर चिप और बिट में सिमटकर एक गांव बन गया है. लेखन, प्रकाशन, पठन पाठन में नई प्रौद्योगिकी की दस्तक से आमूल परिवर्तन होते जा रहे हैं. नई पीढ़ी अब बिना कलम कागज के कम्प्यूटर पर ही  लिख रही है,प्रकाशित हो रही है, और पढ़ी जा रही है. ब्लाग तथा सोशल मीडीया वैश्विक पहुंच के साथ वैचारिक अभिव्यक्ति के सहज, सस्ते, सर्वसुलभ, त्वरित साधन बन चुके हैं. वेब-मीडिया सर्वव्यापकता को चरितार्थ करता है जिसमें ख़बरें दिन के चौबीसों घंटे और हफ़्ते के सातों दिन उपलब्ध रहती हैं.

लिखते हुए गर्व होता है कि श्री हेमन्त बावनकर जी ने अकेले दम पर सीनियर सिटीजन होते हुए भी स्वयं के दम पर अपने ही व्यक्तिगत संसाधनों से न्यूनतम समय मे 2 लाख से अधिक हिट्स पाने वाली हिंदी, मराठी व अंग्रेजी साहित्य की अत्यंत उच्च स्तरीय वेबसाइट   www.e-abhivyakti.com बनाकर प्रतिदिन सुबह नियमित प्रकाशन का बीड़ा उठाया हुआ है । दुनियाभर के पाठकों को हर सुबह इसके नए अंक की उत्सुकता से प्रतीक्षा रहती है ।

इंडिया बुक्स आफ रिकॉर्डस ने उनके इस महत्वपूर्ण कार्य को रिकार्ड में लेकर उन्हें सम्मानित भी किया है ।

जबलपुर वेब मीडीया की पत्रकारिता में पीछे नहीं है, श्री चैतन्य भट्ट समाचार विचार नामक पोर्टल चला रहे हैं जिसमें साहित्य, सामयिक आलेख कवितायें तथा समाचार नियमित रूप से अपडेट किये जाते हैं. इसकी हिट १००० से उपर प्रतिदिन है. वेब पता है http://samachar-vichar.com/. इसी तरह http://www.palpalindia.com के वेब पते से पलपलइंडिया नामक पोर्टल जबलपुर से चलाया जा रहा है जिसमें आशुतोष असर व अन्य मित्र बढ़िया वेब पत्रकारिता कर रहे हैं. जबलपुर पर वेब साइट्स में http://www.jabalpur.astha.net/ जबलपुर आस्थानेट का भी जिक्र जरूरी है. “दिव्य नर्मदा” जिसके मुद्रित अंक भी पहले प्रकाशित होते रहे हैं, तथा उसके नियमित प्रकाशन में आरही आर्थिक कठिनाईयो के चलते, जिसे वेब पत्रिका बनाने में मेरा विचार, तकनीकी सहयोग व योगदान ही मूल में रहा है. इसके संपादक मण्डल में भी मुझे ड़खा गया है, भाई संजीव सलिल इसे बेहद गंभीरता से चला रहे हैं और इस साहित्यिक वेब पत्रिका के हिट सारी दुनिया से मिल रहे हैं इसका वेब पता divyanarmada.blogspot.com है. प्रतिवाद डाट काम, वेबदुनिया, जागरण जंक्शन, नवभारत टाइम्स ब्लाग, रेडियो मिर्ची ब्लाग्स, स्क्रेच माई सोल ब्लागर्स पार्क, दैनिक भास्कर, आदि सामूहिक ब्लाग्स पर भी जबलपुर से प्रतिदिन विविध सामग्री पोस्ट की जा रही है. हिन्दी साहित्य संगम नाम से वेब डोमेन पर विजय तिवारी किसलय नियमित लिख रहे हैं तथा जबलपुर के साहित्य जगत की विविध हलचलें वेब पर एक सर्च में सुलभ हैं. फेसबुक इन दिनो सबसे लोकप्रिय सोशल मीडिया है. हिन्दी एक्सप्रेस का पेज https://www.facebook.com/pages/Madhya-Pradesh-Hindi-Express एवं जबलपुर न्यूज का पन्ना https://www.facebook.com/Jabalpur.News समाचारो का लोकप्रिय पेज है. इसके सिवा अनेक युवा समूहो ने जबलपुर, पर केंद्रित ग्रुप बना रखे हैं. जबलपुर विभिन्न शासकीय व गैर शासकीय संस्थानो की वेब साइटें, फेसबुक पेज आदि भी सूचना  प्रसारण का महत्वपूर्ण योगदान समाज को दे रहे हैं. मेरे फेसबुक पेज पर जिन भी आयोजनो में मैं उपस्थित हो पाता हूं उनका संक्षिप्त विवरण तथा चित्र कार्यक्रम स्थल से ही पोस्ट करना मेरी आदत में है, जिसके परिणाम यह होते हैं कि मुझसे फेसबुक पर जुड़े तथा मेरे फालोअर लगभग ५००० लोगो तक वह आयोजन तुरंत पहुंच जाता है और उसकी त्वरित प्रतिक्रिया भी मिलती है. यही त्वरित स्वसंपादित प्रकाशन वेब की सबसे बड़ी विशेषता है. यूं तो जबलपुर से ज्योतिष, कुकरी, टूरिज्म, नौकरी, फाइनेस आदि विषयो पर अनेक लोग वेब पर अपने व्यवसायिक हितो के लिये लिख रहे हैं पर जो सार्वजनिक हित के लिये सक्रिय हैं उनमें http://mahendra-mishra1.blogspot.in/ महेंद्र मिश्र, समय चक्र http://sanskaardhani.blogspot.in/ गिरीश बिल्लौरे मिस फिट, http://nomorepowertheft.blogspot.in/ विवेक रंजन श्रीवास्तव “बिजली चोरी के विरुद्ध जन जागरण”, “संस्कृत का मजा हिन्दी में”, मेरी कवितायें, तथा नमस्कार ब्लाग के साथ चर्चा योग्य हैं.

http://hindisahityasangam.blogspot.in/http://mymaahi.blogspot.in/ महेश ब्रम्हेते “माही “, http://apnajabalpur.blogspot.in/ नितिन पटेल “शेष अशेष”, http://chakreshsurya.blogspot.in/ चक्रेश सूर्या “सूर्या “, http://www.janbharat.blogspot.in/ अजय गुप्ता जनभारत, http://swapniljain1975.blogspot.in सवप्निल जैन हमारा जबलपुर एवं अंग्रेजी में जबलपुर डायरी http://www.jabalpurdiary.com/blogs.php आदि भी प्रमुख ब्लाग हैं.

बहुत जरुरी है कि कम से कम जबलपुर के सभी निजी ब्लाग व वेब पन्ने एक दूसरे को ब्लागरोल पर जोड़ें जिससे उनका व जबलपुर का व्यपक हित ही होगा.

यह सही है कि अभी ब्लाग लेखन नया है, पर जैसे जैसे नई कम्प्यूटर साक्षर पीढ़ी बड़ी होगी, इंटरनेट और सस्ता होगा तथा आम लोगो तक इसकी पहुंच बढ़ेगी यह वर्चुएल लेखन  और भी ज्यादा सशक्त होता जायेगा, एवं  भविष्य में  लेखन क्रांति का सूत्रधार बनेगा. जैसे जैसे वेब की पठनीयता बढ़ेगी वेब पत्रकारो को विज्ञापन मिलेंगे और वेब पत्रकारिता कोरी लफ्फाजी या हाई प्रोफाइल बनने के स्वांग से बढ़कर आजीविका का संसाधन भी बन सकेगी. फिलहाल जबलपुर की वेब पत्रकारिता विकास के युग में है और नियमित रूप से समाज और साहित्य को अपना सामग्री योगदान तथा इससे जुड़े लोगो को एक सशक्त मंच दे रही है.

 

 

© विवेक रंजन श्रीवास्तव, जबलपुर

ए १, शिला कुंज, नयागांव,जबलपुर ४८२००८

मो ७०००३७५७९८

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विशाखा की नज़र से # 36 – धम्मम शरणम गच्छामि ☆ श्रीमति विशाखा मुलमुले

श्रीमति विशाखा मुलमुले 

(श्रीमती  विशाखा मुलमुले जी  हिंदी साहित्य  की कविता, गीत एवं लघुकथा विधा की सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी रचनाएँ कई प्रतिष्ठित पत्रिकाओं/ई-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती  रहती हैं.  आपकी कविताओं का पंजाबी एवं मराठी में भी अनुवाद हो चुका है। आज प्रस्तुत है  एक भावप्रवण रचना  ‘धम्मम शरणम गच्छामि । आप प्रत्येक रविवार को श्रीमती विशाखा मुलमुले जी की रचनाएँ  “साप्ताहिक स्तम्भ – विशाखा की नज़र से” में  पढ़  सकते हैं । )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # 36 – विशाखा की नज़र से

☆  धम्मम शरणम गच्छामि  ☆

 

अगर यह कलयुग है तो

उसकी देहरी पर बैठी है मानवता

और यह है साँझ का वक्त

देहलीज के उस पार

धीरे – धीरे बढ़ रहा है अंधकार

हो न हो कलयुग का यही है मध्यकाल

अर्थ जिसका कि ,

अभी और गहराता जाएगा अंधकार

 

देहरी के इस ओर है धम्म का घर

जहां किशोरवय संततियां

एक – एक कक्ष में फैला रहीं है प्रकाश

अभी शेष है समय

चलो ! कलयुग को पीठ दिखा

हम लौट चले धर्म से धम्म की ओर

 

© विशाखा मुलमुले  

पुणे, महाराष्ट्र

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English Literature – Poetry ☆ Anonymous litterateur of Social Media# 9 ☆ गुमनाम साहित्यकारों की कालजयी रचनाओं का भावानुवाद ☆ कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम्

कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम्

(हम कैप्टन प्रवीण रघुवंशी जी द्वारा ई-अभिव्यक्ति के साथ उनकी साहित्यिक और कला कृतियों को साझा करने के लिए उनके बेहद आभारी हैं। आईआईएम अहमदाबाद के पूर्व छात्र कैप्टन प्रवीण जी ने विभिन्न मोर्चों पर अंतरराष्ट्रीय स्तर एवं राष्ट्रीय स्तर पर देश की सेवा की है। वर्तमान में सी-डैक के आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और एचपीसी ग्रुप में वरिष्ठ सलाहकार के रूप में कार्यरत हैं साथ ही विभिन्न राष्ट्र स्तरीय परियोजनाओं में शामिल हैं।

स्मरणीय हो कि विगत 9-11 जनवरी  2020 को  आयोजित अंतरराष्ट्रीय  हिंदी सम्मलेन,नई दिल्ली  में  कैप्टन  प्रवीण रघुवंशी जी  को  “भाषा और अनुवाद पर केंद्रित सत्र “की अध्यक्षता  का अवसर भी प्राप्त हुआ। यह सम्मलेन इंद्रप्रस्थ महिला महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय, दक्षिण एशियाई भाषा कार्यक्रम तथा कोलंबिया विश्वविद्यालय, हिंदी उर्दू भाषा के कार्यक्रम के सहयोग से आयोजित  किया गया था। इस  सम्बन्ध में आप विस्तार से निम्न लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं :

हिंदी साहित्य – आलेख ☆ अंतर्राष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन ☆ कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम्

☆ Anonymous Litterateur of Social Media # 9/सोशल मीडिया के गुमनाम साहित्यकार # 9 ☆ 

आज सोशल मीडिया गुमनाम साहित्यकारों के अतिसुन्दर साहित्य से भरा हुआ है। प्रतिदिन हमें अपने व्हाट्सप्प / फेसबुक / ट्विटर / यूअर कोट्स / इंस्टाग्राम आदि पर हमारे मित्र न जाने कितने गुमनाम साहित्यकारों के साहित्य की विभिन्न विधाओं की ख़ूबसूरत रचनाएँ साझा करते हैं। कई  रचनाओं के साथ मूल साहित्यकार का नाम होता है और अक्सर अधिकतर रचनाओं के साथ में उनके मूल साहित्यकार का नाम ही नहीं होता। कुछ साहित्यकार ऐसी रचनाओं को अपने नाम से प्रकाशित करते हैं जो कि उन साहित्यकारों के श्रम एवं कार्य के साथ अन्याय है। हम ऐसे साहित्यकारों  के श्रम एवं कार्य का सम्मान करते हैं और उनके कार्य को उनका नाम देना चाहते हैं।

सी-डैक के आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और एचपीसी ग्रुप में वरिष्ठ सलाहकार तथा हिंदी, संस्कृत, उर्दू एवं अंग्रेजी भाषाओँ में प्रवीण  कैप्टन  प्रवीण रघुवंशी जी ने  ऐसे अनाम साहित्यकारों की  असंख्य रचनाओं  का कठिन परिश्रम कर अंग्रेजी भावानुवाद  किया है। यह एक विशद शोध कार्य है  जिसमें उन्होंने अपनी पूरी ऊर्जा लगा दी है। 

इन्हें हम अपने पाठकों से साझा करने का प्रयास कर रहे हैं । उन्होंने पाठकों एवं उन अनाम साहित्यकारों से अनुरोध किया है कि कृपया सामने आएं और ऐसे अनाम रचनाकारों की रचनाओं को उनका अपना नाम दें। 

कैप्टन  प्रवीण रघुवंशी जी ने भगीरथ परिश्रम किया है और इसके लिए उन्हें साधुवाद। वे इस अनुष्ठान का श्रेय  वे अपने फौजी मित्रों को दे रहे हैं।  जहाँ नौसेना मैडल से सम्मानित कैप्टन प्रवीण रघुवंशी सूत्रधार हैं, वहीं कर्नल हर्ष वर्धन शर्मा, कर्नल अखिल साह, कर्नल दिलीप शर्मा और कर्नल जयंत खड़लीकर के योगदान से यह अनुष्ठान अंकुरित व पल्लवित हो रहा है। ये सभी हमारे देश के तीनों सेनाध्यक्षों के कोर्स मेट हैं। जो ना सिर्फ देश के प्रति समर्पित हैं अपितु स्वयं में उच्च कोटि के लेखक व कवि भी हैं। वे स्वान्तः सुखाय लेखन तो करते ही हैं और साथ में रचनायें भी साझा करते हैं।

☆ गुमनाम साहित्यकार की कालजयी  रचनाओं का अंग्रेजी भावानुवाद ☆

(अनाम साहित्यकारों  के शेर / शायरियां / मुक्तकों का अंग्रेजी भावानुवाद)

 

दीदार की तलब हो तो

नज़रें जमाये रखिये,

क्योंकि नक़ाब हो या नसीब, 

सरकता  तो  जरूर है…

 

If urge of her glimpse is there

Then keep an eye on it patiently

Coz whether it’s the  mask or

luck , it moves for sure…

 

❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃

 

चलो अब ख़ामोशियों 

की गिरफ़्त में चलते हैं…

बातें गर ज़्यादा हुईं तो 

जज़्बात खुल जायेंगे..!!

  

Let’s get arrested now in

the regime of silence …

If we kept talking anymore

Emotions may get revealed…!!

 

❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃

 

बादलों का गुनाह नहीं कि 

वो  बेमौसम  बरस  गए!! 

दिल  हलका  करने का 

हक  तो  सबको हैं ना!!

 

 It’s not the crime of clouds

If they rained unseasonably!

After all everyone is entitled 

To lighten burdened sorrows

 

❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃

 

काश नासमझी में ही

 बीत जाए ये ज़िन्दगी

समझदारी ने तो हमसे बहुत कुछ छीन लिया…

 

Wish  life could pass 

In  imprudence only

Wiseness alone 

did snatch a lot…

 

❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃

 

© Captain Pravin Raghuvanshi, NM

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # 10 ☆ दोहा सलिला ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपके दोहा सलिला

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # 10 ☆ 

☆ दोहा सलिला ☆ 

कर अव्यक्त को व्यक्त हम, रचते नव ‘साहित्य’

भगवद-मूल्यों का भजन, बने भाव-आदित्य

.

मन से मन सेतु बन, ‘भाषा’ गहती भाव

कहे कहानी ज़िंदगी, रचकर नये रचाव

.

भाव-सुमन शत गूँथते, पात्र शब्द कर डोर

पाठक पढ़-सुन रो-हँसे, मन में भाव अँजोर

.

किस सा कौन कहाँ-कहाँ, ‘किस्सा’-किस्सागोई

कहती-सुनती पीढ़ियाँ, फसल मूल्य की बोई

.

कहने-सुनने योग्य ही, कहे ‘कहानी’ बात

गुनने लायक कुछ कहीं, कह होती विख्यात

.

कथ्य प्रधान ‘कथा’ कहें, ज्ञानी-पंडित नित्य

किन्तु आचरण में नहीं, दीखते हैं सदकृत्य

 

व्यथा-कथाओं ने किया, निश-दिन ही आगाह

सावधान रहना ‘सलिल’, मत हो लापरवाह

 

‘गल्प’ गप्प मन को रुचे, प्रचुर कल्पना रम्य

मन-रंजन कर सफल हो, मन से मन तक गम्य

 

जब हो देना-पावना, नातों की सौगात

ताने-बाने तब बनें, मानव के ज़ज़्बात

 

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आत्मानंद साहित्य – प्यारी‌ कविता ☆ – श्री सूबेदार पाण्डेय “आत्मानंद”

श्री सूबेदार पाण्डेय “आत्मानंद”


(आज आपके “साप्ताहिक स्तम्भ -आत्मानंद  साहित्य “ में प्रस्तुत है आपकी एक अत्यंत भावप्रवण एवं परिकल्पनाओं से परिपूर्ण रचना  –  प्यारी‌ कविता।  

 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आत्मानंद साहित्य –  प्यारी‌ कविता ☆

 

मृगनयनी ‌से‌ नयनां कजरारे,

तेरी ‌मदभरी आंखों की‌‌ चितवन ।

तेरी ‌पायल की‌ रूनक झुनक,

अब मोह रही है मेरा‌ मन।

तेरे अधरो की‌ हल्की‌ लाली,

चिटकी गुलाब की कलियों ‌सी।

तेरी जुल्फों का‌ रंग देख,

भ्रम‌ होता काली ‌रातों की।

तेरा  मरमरी बदन  छूकर ,

मदमस्त हवा में होती है।

जिन राहों ‌से‌ गुजरती हो तुम,

अब वे राहें महका करती हैं।

तुम जिस महफ़िल‌ से गुजरती हो,

सबको दीवाना करती हों

पर तुम तो प्यारी कविता हो,

बस‌ प्यार‌  मुझी से करती‌ हो ।।1।।

तुम मेरे ‌सपनों की शहजादी,

मेरी‌ कल्पना से ‌सुंदर‌ हो ।

ना तुमको देख‌ सके‌ कोइ,

तुम मेरी स्मृतियों के ‌भीतर हो ।

मैंने तुमको इतना चाहा,

मजनूं फरहाद से  भी बढ़कर।

तुम मेरी जुबां से बोल पड़ी,

मेरे दिल की‌‌ चाहत बन कर।

तुम कल्पना मेरे मन की‌‌ हो ,

एहसास मेरे जीवन की‌ हो।

तुम ‌संगीतों का गीत‌ भी‌ हो ,

तुम‌ मेरे मन का मीत भी हो

तुम मेरी अभिलाषा हो,

मेरी जीवन परिभाषा हो ।

अब‌ मेरा अरमान हो तुम ,

मेरी पूजा और ध्यान हो तुम।

मैं शरीर तुम आत्मा हो ,

मेरे ख्यालों का दर्पण हो।

अब तो मैंने संकल्प लिया,

ये जीवन धन तुमको अर्पण हो

जब कभी भी तुमको याद किया,

तुम पास मेरे आ जाती हो ।

मेरे ‌सूने निराश मन को,

जीवन संगीत सुनाती हो

मैं राहें तकता रहता हूं,

अपने आंखों के ‌झरोखों से ।

तुम हिय में ‌मेरे‌ समाती हो,

शब्दों संग हौले हौले ‌से

जब याद तुम्हारी आती है,

कल्पना लोक में खोता हू

शब्दों  भावों के गहनों से,

मै  तेरा बदन पिरोता  हूं।

तुम जब‌ जब आती हो ख्यालों में,

तब मन में मेरे मचलती हो ।

शब्दों का प्यारा‌ रूप पकड़,

लेखनी से मेरी निकलती हो,

चलो आज  बता दें दुनिया को,

तुम मेरी प्यारी कविता हो मेरी प्यारी कविता हो।।

 

© सुबेदार पांडेय “आत्मानंद”

संपर्क – ग्राम जमसार, सिंधोरा बाज़ार, वाराणसी – 221208

मोबा—6387407266

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मराठी साहित्य – कविता ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – स्वप्नपाकळ्या # 13 ☆ दिवाने ☆ श्री प्रभाकर महादेवराव धोपटे

श्री प्रभाकर महादेवराव धोपटे

ई-अभिव्यक्ति में श्री प्रभाकर महादेवराव धोपटे जी  के साप्ताहिक स्तम्भ – स्वप्नपाकळ्या को प्रस्तुत करते हुए हमें अपार हर्ष है। आप मराठी साहित्य की विभिन्न विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। वेस्टर्न  कोलफ़ील्ड्स लिमिटेड, चंद्रपुर क्षेत्र से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं। अब तक आपकी तीन पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं जिनमें दो काव्य संग्रह एवं एक आलेख संग्रह (अनुभव कथन) प्रकाशित हो चुके हैं। एक विनोदपूर्ण एकांकी प्रकाशनाधीन हैं । कई पुरस्कारों /सम्मानों से पुरस्कृत / सम्मानित हो चुके हैं। आपके समय-समय पर आकाशवाणी से काव्य पाठ तथा वार्ताएं प्रसारित होती रहती हैं। प्रदेश में विभिन्न कवि सम्मेलनों में आपको निमंत्रित कवि के रूप में सम्मान प्राप्त है।  इसके अतिरिक्त आप विदर्भ क्षेत्र की प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्थाओं के विभिन्न पदों पर अपनी सेवाएं प्रदान कर रहे हैं। अभी हाल ही में आपका एक काव्य संग्रह – स्वप्नपाकळ्या, संवेदना प्रकाशन, पुणे से प्रकाशित हुआ है, जिसे अपेक्षा से अधिक प्रतिसाद मिल रहा है। इस साप्ताहिक स्तम्भ का शीर्षक इस काव्य संग्रह  “स्वप्नपाकळ्या” से प्रेरित है ।आज प्रस्तुत है उनकी एक  भावप्रवण कविता “दिवाने“.) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – स्वप्नपाकळ्या # 13 ☆

☆ दिवाने

मी उलगडीत गेलो,कोड्यातले उखाणे

रीतेच राहिले परी,जीवनातले रकाने !!

 

लावूनी वर्ख लिलया,मी चमकविली पाने

किताब जिंदगीचे ,तरी राहिले पुराने !!

 

जिंकीत सर्व गेलो,अगदी क्रमाक्रमाने

सर्वस्व हारलो मी, एकाच नकाराने!!

 

वाटीत सुखे गेलो, तुडवीत किती राने

नामाभिदान दिधले,त्यांनी मला दिलाने !!

 

©  प्रभाकर महादेवराव धोपटे

मंगलप्रभू,समाधी वार्ड, चंद्रपूर,  पिन कोड 442402 ( महाराष्ट्र ) मो +919822721981

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योग-साधना LifeSkills/जीवन कौशल ☆  The Science of Happiness#5 -Happiness Activity – Beyond Happiness II☆ Shri Jagat Singh Bisht

Shri Jagat Singh Bisht

(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker.)

☆ Happiness Activity – Beyond Happiness-II ☆ 

Topic: Beyond Happiness: A new understanding of happiness and well-being and how to achieve them (Part II);

Speaker: Jagat Singh Bisht;

Forum: ASK Talks (attitude, skills and knowledge for the young minds);

Conducted by: State Bank Foundation Institute (Chetana), Indore;

Date: 07 February 2013.

This is an excerpt from the inaugural ASK Talk. It is based on the PERMA model (Positive Emotion, Engagement, Relationships, Meaning, Accomplishment) propounded by the renowned Positive Psychologist Dr Martin Seligman, author of ‘Learned Optimism’, ‘Authentic Happiness’ and ‘Flourish.

Mr Bisht is a Behavioural Science trainer with the State Bank of India (a global Fortune 500 corporate), Laughter Yoga teacher, Life Skills coach, Author and Blogger. The views expressed in this talk are personal.

(Part II of this talk is also available on YouTube)

 

A Pathway to Authentic Happiness, Well-Being & A Fulfilling Life! We teach skills to lead a healthy, happy and meaningful life.

The Science of Happiness (Positive Psychology), Meditation, Yoga, Spirituality and Laughter Yoga. We conduct talks, seminars, workshops, retreats and trainings.

Please feel free to call/WhatsApp us at +917389938255 or email lifeskills.happiness@gmail.com if you wish to attend our program or would like to arrange one at your end.

Jagat Singh Bisht : Founder: LifeSkills

Master Teacher: Happiness & Well-Being; Laughter Yoga Master Trainer
Past: Corporate Trainer with a Fortune 500 company & Laughter Professor at the Laughter Yoga University.
Areas of specialization: Behavioural Science, Positive Psychology, Meditation, Five Tibetans, Yoga Nidra, Spirituality, and Laughter Yoga.

Radhika Bisht ; Founder : LifeSkills  
Yoga Teacher; Laughter Yoga Master Trainer

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आध्यत्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता ☆ पद्यानुवाद – त्रयोदश अध्याय (14) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता

हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

त्रयोदश अध्याय

(ज्ञानसहित क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ का विषय)

 

सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम्‌ ।

असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च ।।14।।

इंद्रिय रहित भी है मगर, सब इंद्रिय गुण भास

निर्गुण सब गुण भोक्ता, जग पोषक नित पास ।।14।।

 

भावार्थ :  वह सम्पूर्ण इन्द्रियों के विषयों को जानने वाला है, परन्तु वास्तव में सब इन्द्रियों से रहित है तथा आसक्ति रहित होने पर भी सबका धारण-पोषण करने वाला और निर्गुण होने पर भी गुणों को भोगने वाला है।।14।।

 

Shining by  the  functions  of  all  the  senses,  yet  without  the  senses;  unattached,  yet supporting all; devoid of qualities, yet their experience.।।14।।

 

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर

vivek1959@yahoo.co.in

 

 

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