हिन्दी साहित्य- लघुकथा ☆ लाठी ☆ डॉ. कुंवर प्रेमिल

डॉ कुंवर प्रेमिल

(डॉ कुंवर प्रेमिल जी  जी को  विगत 50 वर्षों  से लघुकथा, कहानी, व्यंग्य में लगातार लेखन का अनुभव हैं। अब तक दस पुस्तकें प्रकाशित। 2009 से प्रतिनिधि लघुकथाएं (वार्षिक) का सम्पादन एवं ककुभ पत्रिका का प्रकाशन और सम्पादन। वरिष्ठतम नागरिकों ने उम्र के इस पड़ाव पर आने तक कई महामारियों से स्वयं की पीढ़ी  एवं आने वाली पीढ़ियों को बचाकर वर्तमान तक का लम्बा सफर तय किया है। आज प्रस्तुत है  उनकी एक अतिसुन्दर  एवं सार्थक लघुकथा “ लाठी ”। )

☆ लघुकथा – लाठी ☆  

“यह किसकी लाठी है?”

“मेरे दादाजी की  है जी.”

“और यह लाठी ?”

“दादाजी के दादाजी की है जी. ”

“और उस कोने में  रखी वह लाठी?”

“दादा जी के दादाजी के दादाजी की है जी.”

“अजीब देश है तुम्हारा जी, जहां देखो जिसके हाथ में देखो, लाठी मिलेगी. बिना लाठी यहां के लोग चल नहीं सकते है क्या? ”

“ठीक कहा है जी आपने, इन सभी लाठियों के ऊपर है गांधी बाबा की लाठी.”

“वही पुरानी सी पतली सी लाठी!”

“हां वही पुरानी पतली सी लाठी, जिसने अंग्रेजों की कमर तोड़ दी थी…… अरे एक युग हांक दिया था उस लाठी ने जी. ”

“वह तो मैंने अखबारों में पढ़ा था. लाठियों की  पीढ़ियां देखने मिल गई. कभी कुछ लिखने लायक हुआ तो लाठियों पर पी.एच.डी. जरूर करूंगा. काश! गांधी बाबा हमारे देश में पैदा हुए होते, मेरे ऊपर एक कृपा करना, देश लौटते समय एक लाठी मुझे भी भेंट कर देना.”

एक विदेशी पर्यटक इस देश का मेहमान बना था. जाते समय वह एक लाठी लेकर अपने देश चला गया.

 

© डॉ कुँवर प्रेमिल
एम आई जी -8, विजय नगर, जबलपुर – 482 002 मोबाइल 9301822782

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ चलो ननिहाल  चलें ☆ श्रीमति हेमलता मिश्र “मानवी“

श्रीमति हेमलता मिश्र “मानवी “

(सुप्रसिद्ध, ओजस्वी,वरिष्ठ साहित्यकार श्रीमती हेमलता मिश्रा “मानवी” जी  विगत ३७ वर्षों से साहित्य सेवायेँ प्रदान कर रहीं हैं एवं मंच संचालन, काव्य/नाट्य लेखन तथा आकाशवाणी  एवं दूरदर्शन में  सक्रिय हैं। आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय स्तर पर पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित, कविता कहानी संग्रह निबंध संग्रह नाटक संग्रह प्रकाशित, तीन पुस्तकों का हिंदी में अनुवाद, दो पुस्तकों और एक ग्रंथ का संशोधन कार्य चल रहा है। आज प्रस्तुत है श्रीमती  हेमलता मिश्रा जी  की  एक भावप्रवण कविता  चलो ननिहाल  चलें ।इस अतिसुन्दर रचना के लिए आदरणीया श्रीमती हेमलता जी की लेखनी को नमन। )

☆ चलो ननिहाल  चलें ☆ 

(ननिहाली दोहे)

दुखती रग पर रख दिया,

फिर से तुमने बान!

अब कैसा ननिहाल औ

कैसी रैन विहान!!

 

वो चौपाल चबूतरा

वो इमली अमराई!

अब भी मन भीतर बसी

नदिया की गहराई!!

 

जंगल में वो टिटहरी

टिहु टिहु ढूंढे गोह!

कबसे पुरानी बात हुईं

गुइयां सखी बिछोह!!

 

अब नाना नानी नहीं

ना मामा के  बोल!

रिश्ते राग अनुराग के

तोल मोल संग झोल!!

 

अनचीन्हीं सी अब लगें

वो गलियां वो शाम!

ना आल्हा उदल कहीं

ना अब सीताराम!!

 

अँसुवन धुंधली आंख हुईं

ले ननिहाल की प्यास!

अब इस जनम में ना मिले

अगले जन्म की आस!!

 

बिटिया ना जायी सखी

फिर फिर आए ख्याल!

बेटी जन्म लेती अंगन

मेरा घर ननिहाल!!

 

नातिन के प्रिय बोलों में

मैं हो जाती निहाल

उसकी मधुर अठखेलियाँ

घर बनता ननिहाल!!

 

© हेमलता मिश्र “मानवी ” 

नागपुर, महाराष्ट्र

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि ☆ अहं ब्रह्मास्मि ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) 

☆ संजय दृष्टि  ☆  अहं ब्रह्मास्मि

 

अहं ब्रह्मास्मि।…सुनकर अच्छा लगता है न!…मैं ब्रह्म हूँ।….ब्रह्म मुझमें ही अंतर्भूत है।

ब्रह्म सब देखता है, ब्रह्म सब जानता है।

अपने आचरण को देख रहे हो न!…अपने आचरण को जान रहे हो न!

बस इतना ही कहना था।

थोड़े लिखे को अधिक बाँचना, सर्वाधिक आत्मसात करना।

# दो गज की दूरी, है बहुत ही ज़रूरी।

©  संजय भारद्वाज, पुणे

28.5.2020, प्रात: 10 बजे

# निठल्ला चिंतन

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 
मोबाइल– 9890122603

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ बाज़ार ☆ डॉ. अनिता एस. कर्पूर ’अनु’

डॉ. अनिता एस. कर्पूर ’अनु’

डॉ. अनिता एस. कर्पूर ’अनु’ जी  बेंगलुरु के जैन महाविद्यालय में सह प्राध्यापिका के पद पर कार्यरत हैं एवं  साहित्य की विभिन्न विधाओं की सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में मन्नू भंडारी के कथा साहित्य में मनोवैज्ञानिकता, स्वर्ण मुक्तावली- कविता संग्रह, स्पर्श – कहानी संग्रह, कशिश-कहानी संग्रह विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इसके अतिरिक्त आपकी एक लम्बी कविता को इंडियन बुक ऑफ़ रिकार्ड्स 2020 में स्थान दिया गया है। आप कई विशिष्ट पुरस्कारों /अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आज ससम्मान  प्रस्तुत है आपकी एक बेबाक कविता  बाज़ार।  इस बेबाक कविता के लिए डॉ. अनिता एस. कर्पूर ’अनु’ जी की लेखनी को सादर नमन।)  

☆ कविता – बाज़ार ☆ 

 

बिका हर इन्सान

बचा न सका स्वयं को

मर गई आत्मा उसकी

न मुडा पीछे वह

आगे बढने की चाह में

किए अनेक गलत काम

संवेदनहीन हुआ आदमी

बाज़ार के चकाचौंध में

गलियारों में खो गया वह

पूरा विश्व बना बाज़ार

बदले जीवन मूल्य

आत्मीय संबंधों को भी बेचा बेटे ने

आत्मीय संबंधों का भी किया कत्ल

किए झगड़े संपत्ति की खातिर

भाई-भाई के बीच हुई होड़

बहिन को भी न बचाया

किया व्यापार पत्नी का भी

आत्मीय संबंधों की हत्या कर

क्या पाना चाहता था वह?

 

संस्कृति भी बिक गई

सभ्यता के बाज़ार में

अर्थ कमाने की खातिर

किए अनेक कुकर्म

दान, दया औ’ धर्म छोडकर

मात्र मांग रहा अर्थ स्वयं

नहीं चाहिए उसे राशनकार्ड

आज तो मात्र क्रेडिट कार्ड

अपनी पैनी दृष्टि डाली उसने

तो खड़ा विश्व बाज़ार में स्वयं

आगे की राह ताक रहा,

विश्व बाज़ार में देखे

सुनहरे सपने स्त्री ने भी

केश कटवाकर…

छोटे कपडे पहनकर

नग्न नृत्य प्रस्तुत कर

कर रही स्वयं का विज्ञापन

पुरुष के साथ समानता

रहा मात्र उसका ध्येय

न पता चला उसे

यह तो विश्व बाज़ार है

जहाँ वह खड़ी है

नहीं खड़ी रह सकती

वह पुरुष के साथ

मात्र बात करती रह गई

हर जगह प्रताड़ित हुई

शोषित किया गया उसे

कभी विज्ञापन में तो कभी सिनेमा

अत्याचार होते रहे उसके साथ

देखनेवालों को लगा खुश है वह

अंदर ही अंदर टूटती चली गई

न बता पाई खुलकर अपना दर्द

मुस्कुराती रही  हमेशा

समाज में खुले रुप से

नग्न होती चली गई

जब अहसास हुआ तब

वह बन चुकी थी सर्वभोग्या

कुछ गणिका के तो घर होते है

लेकिन इस स्त्री का

कोई ठिकाना नहीं था

कोई देश नहीं था

आज भी विज्ञापनों में

नहीं दिखाये जाते पुरुष  अर्धनग्न

नहीं दिखाये जाते सिनेमा में भी

बेआबरु होती है मात्र स्त्री

लोगों को नज़र आता है

देह उसका सबसे सुंदर,

यह वैश्वीकरण है कहते हुए

महत्वांकांक्षा की आड़ में

बिन आग जल रही स्त्री

नाम की चाहत में हुई बर्बाद स्त्री

खत्म हुआ वजूद उसका

विश्वबाज़ार में खुद भी बिक गई

लिए अनेक स्त्री के उदाहरण

किया स्वयं को सही साबित

सही अर्थों में मध्यमवर्ग

नहीं रहा कहीं का भी

स्त्री की बढती इच्छा

सपनों को साकार करने

निकल पडी स्वयं बाज़ार में

एक ओर बहुराष्ट्रीय कंपनी

तो दूसरी ओर स्त्री स्वयं

देश बढ रहा है या देह व्यापार

अनजान है, अनभिज्ञ है स्त्री

घुट घुट कर मर जायेगी स्त्री।

 

किन्तु,

अब भी हैं

असंख्य स्त्री- पुरुष अपवाद

जो जी रहे हैं निर्विवाद

वसुधैव कुटुम्बकम की मशाल लिए

वैश्विक ग्राम के बाज़ार में।

 

संपर्क:

डॉ. अनिता एस. कर्पूर ’अनु’

लेखिका, सहप्राध्यापिका, हिन्दी विभाग, जैन कॉलेज-सीजीएस, वीवी पुरम्‌, वासवी मंदिर रास्ता, बेंगलूरु।

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हिंदी साहित्य – फिल्म/रंगमंच ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – हिंदी फिल्मों के स्वर्णिम युग के कलाकार # 6 – पृथ्वीराज कपूर ☆ श्री सुरेश पटवा

सुरेश पटवा 

 

 

 

 

 

((श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं।  अभी हाल ही में नोशन प्रेस द्वारा आपकी पुस्तक नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास)  प्रकाशित हुई है। इसके पूर्व आपकी तीन पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी एवं पंचमढ़ी की कहानी को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है।  आजकल वे  हिंदी फिल्मों के स्वर्णिम युग  की फिल्मों एवं कलाकारों पर शोधपूर्ण पुस्तक लिख रहे हैं जो निश्चित ही भविष्य में एक महत्वपूर्ण दस्तावेज साबित होगा। हमारे आग्रह पर उन्होंने  साप्ताहिक स्तम्भ – हिंदी फिल्मोंके स्वर्णिम युग के कलाकार  के माध्यम से उन कलाकारों की जानकारी हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा  करना स्वीकार किया है  जो आज भी सिनेमा के रुपहले परदे पर हमारा मनोरंजन कर रहे हैं । आज प्रस्तुत है  हिंदी फ़िल्मों के स्वर्णयुग के अभिनेता : पृथ्वीराज कपूरपर आलेख ।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – हिंदी फिल्म के स्वर्णिम युग के कलाकार # 6 ☆ 

☆ हिंदी फ़िल्मों के स्वर्णयुग के अभिनेता : पृथ्वीराज कपूर ☆ 

पृथ्वीराज कपूर (3 नवंबर 1906 – 29 मई 1972) हिंदी सिनेमा जगत एवं भारतीय रंगमंच के प्रमुख स्तंभों में गिने जाते हैं। पृथ्वीराज ने बतौर अभिनेता मूक फ़िल्मो से अपना करियर शुरू किया। उन्हें भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) के संस्थापक सदस्यों में से एक होने का भी गौरव हासिल है। पृथ्वीराज ने सन् 1944 में मुंबई में पृथ्वी थिएटर की स्थापना की, जो देश भर में घूम-घूमकर नाटकों का प्रदर्शन करता था। इन्हीं से कपूर ख़ानदान की भी शुरुआत भारतीय सिनेमा जगत में होती है।

ब्रिटिश भारत के खैबर पख्तूनख्वा, (वर्तमान पाकिस्तान) के पेशावर में एक गली में क़िस्सा ख्वानी बाज़ार था, जहाँ दोपहर से रात दस बजे तक गप्पों का लम्बा दौर चलता था जिसमें ज़ुबान के फ़नकार  और याददाश्त के धनी क़िस्साग़ो मौजूदा लोगों को रामायण-महाभारत, अरेबियन-नाइट, ब्रितानी-रानी और ईरानी-बादशाहों के साथ दिल्ली और लाहौर के क़िस्से मसाला लगाकर  सुनाया करते थे।

उस गली से थोड़ी दूर पर दो दोस्तों के मकान थे, एक घर लाला ग़ुलाम सरवार और दूसरा घर दीवान बशेस्वरनाथ सिंह कपूर का था। दोनों दोस्त फलों के बाग़ानों के मालिक और भरपूर परिवार के मुखिया थे। लाला ग़ुलाम सरवार के चार बच्चे थे, असलम खान, नासिर ख़ान, यूसुफ़ खान, एहसान खान।

पृथ्वीराज कपूर का जन्म 3 नवंबर 1906 को समुंद्री, समुंद्री तहसील, लायलपुर जिला, पंजाब के खत्री परिवार में हुआ था। उनके पिता, बागेश्वरनाथ कपूर, पेशावर शहर में भारतीय इंपीरियल पुलिस में एक पुलिस अधिकारी के रूप में कार्य करते थे जबकि उनके दादा केशवमल कपूर समुंद्री में एक तहसीलदार थे। बॉलीवुड के मशहूर निर्माता और अभिनेता अनिल कपूर के पिता सुरिंदर कपूर पृथ्वीराज कपूर के चचेरे भाई थे।

दीवान बशेस्वरनाथ सिंह कपूर के दो बच्‍चे त्रिलोक कपूर और पृथ्वीराज कपूर के अलावा पृथ्वीराज कपूर की जल्दी शादी हो जाने  से उनके बच्चे राज कपूर, शशि कपूर, शम्मी कपूर, उर्मिला कपूर और सिआल कपूर, सब हम उम्र थे। क़िस्सा वाली गली में क़िस्सा-कहानी सुनने जमे रहते थे, उनमें यूसुफ़ और राज सबसे आगे बैठते थे, एक आज़ाद भारत का अदाकारी सम्राट और दूसरा सबसे बड़ा क़िस्सागो “शो मेन” बनने वाला था।

पृथ्वीराज कपूर का जन्म 3 नवम्बर 1906 को समुंद्री, फैसलाबाद, पंजाब (ब्रिटिश भारत), अब पाकिस्तान का पंजाब में हुआ था। वे ख्याति नाम फ़िल्म अभिनेता, निर्देशक, निर्माता, लेखक थे। जब वे 17 साल के तब उनका विवाह 19 वर्षीय  रामसरनी मेहरा (1923–1972)  से हुआ और राजकपूर, शम्मी कपूर और शशि कपूर उनके सुपुत्र थे। पृथ्वीराज कपूर को कला क्षेत्र में भारत सरकार द्वारा सन 1969 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था। 1972 में उनकी मृत्यु के पश्चात उन्हें दादा साहब फाल्के पुरस्कार से भी नवाज़ा गया।

पृथ्वीराज ने पेशावर पाकिस्तान के एडवर्ड कालेज से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की। उन्होंने एक साल तक कानून की शिक्षा भी प्राप्त की जिसके बाद उनका थियेटर की दुनिया में प्रवेश हुआ। 1928 में उनका मुंबई आगमन हुआ। कुछ एक मूक फ़िल्मों में काम करने के बाद उन्होंने भारत की पहली बोलनेवाली फ़िल्म आलम आरा में मुख्य भूमिका निभाई।

पृथ्वीराज लायलपुर और पेशावर में थियेटर में अभिनय करते थे। वे अपनी चाची से क़र्ज़ लेकर 1928 बम्बई आकर इम्पीरीयल फ़िल्म कम्पनी में नौकरी करने लगे जहाँ उन्होंने “दो धारी तलवार” मूक फ़िल्म में एक्स्ट्रा की भूमिका की, जिससे प्रभावित होकर उन्हें 1929 में “सिनेमा गर्ल” में मुख्य भूमिका मिल गई। उन्होंने कुल 9 मूक फ़िल्मों में काम किया जिनमे शेर ए अरब और प्रिन्स विजय कुमार धसमिल थीं। फिर उन्हें पहली सवाक् फ़िल्म आलमआरा में काम करने का मौक़ा मिला।

आलमआरा (विश्व की रौशनी) 1931 में बनी हिन्दी भाषा और भारत की पहली सवाक (बोलती) फिल्म है। इस फिल्म के निर्देशक अर्देशिर ईरानी हैं। ईरानी ने सिनेमा में ध्वनि के महत्व को समझते हुये, आलमआरा को और कई समकालीन सवाक फिल्मों से पहले पूरा किया। आलम आरा का प्रथम प्रदर्शन मुंबई (तब बंबई) के मैजेस्टिक सिनेमा में 14 मार्च 1931 को हुआ था। यह पहली भारतीय सवाक इतनी लोकप्रिय हुई कि “पुलिस को भीड़ पर नियंत्रण करने के लिए सहायता बुलानी पड़ी थी”। मास्टर विट्ठल, जुबैदा और पृथ्वीराज कपूर मुख्य कलाकार थे।

1937 में पृथ्वीराज की फ़िल्म विद्यापति आई जो एक  बंगाली बायोपिक फिल्म है, जिसे देबकी बोस ने न्यू थियेटर्स के लिए निर्देशित किया है।  इसमें विद्यापति के रूप में पहाड़ी सान्याल ने अभिनय किया। फ़िल्म में उनके साथ कानन देवी, पृथ्वीराज कपूर, छाया देवी, लीला देसाई, के. सी. डे  और केदार शर्मा थे। संगीत आर. सी. बोरल का था और गीत केदार शर्मा ने लिखे थे। देबकी बोस और काजी नजरूल इस्लाम ने कहानी, पटकथा और संवाद लिखे। कहानी मैथिली कवि और वैष्णव संत विद्यापति के बारे में है। फिल्म के गीत लोकप्रिय हो गए। इसने सिनेमाघरों में 1937 की बड़ी सफलता हासिल करने वाली भीड़ को सुनिश्चित किया।

उन दिनों की फिल्मों में नायिका-केंद्रित होने का चलन था और हालांकि इस फिल्म को विद्यापति कहा जाता था, लेकिन फिल्म की मुख्य कलाकार कानन देवी थीं। एक मजबूत स्क्रिप्ट के साथ फिल्म का मुख्य प्रदर्शन उनका मुख्य प्रदर्शन बन गया।

पृथ्वीराज कपूर के प्रदर्शन को फिल्मइंडिया के संपादक बाबूराव पटेल ने उच्च दर्जा दिया, जबकि “नवागंतुक” मोहम्मद इशाक की भी सराहना की। उन्होंने देबकी बोस के निर्देशन को “कला की बेहतरीन कविता” और बोस को “वास्तव में एक महान निर्देशक” कहा।

इस फिल्म का उपयोग गुरुदत्त ने अपनी फिल्म कागज़ के फूल (1959) में थिएटर युग की बालकनी में फ़िल्म के किरदार सुरेश को श्रद्धांजलि के रूप में प्रस्तुत किया, जहाँ विद्यापति को दर्शकों द्वारा देखा जा रहा है।

संगीत निर्देशक आर. सी. बोराल ने अपने संगीत निर्देशन में पियानो का उपयोग करके पश्चिमी प्रभाव में लाए।  यह प्रभाव लोकप्रिय होने के साथ-साथ क्लासिक धुनों में भी सफल रहा और गीतों को काफी सराहा गया। अनुराधा की भूमिका जिसे कानन देवी ने अधिनियमित किया था, उसे नाज़रुल इस्लाम ने बनाया था। उनके गीत “मोर अंगना में आयी आली” और के. सी डे के साथ उनके युगल गीतों ने उन्हें न्यू थियेटर्स में के. एल. सहगल के साथ शीर्ष महिला गायन स्टार बना दिया। केदार शर्मा ने अपने और देबकी बोस के बीच मतभेदों के बाद न्यू थियेटर्स को छोड़ दिया।

पृथ्वीराजकी 1941 में एक बहुत बेहतरीन फ़िल्म “सिकंदर” आई, जिसके निर्देशक सोहराब मोदी थे। इस फ़िल्म में पृथ्वीराज कपूर ने सिकंदर महान का किरदार निभाया है।

कहानी 326 ई.पू. फिल्म सिकंदर महान के फारस और काबुल घाटी पर विजय के बाद  भारतीय अभियान से शुरू होती है, सिकंदर की सेना  झेलम में भारतीय सीमा तक पहुंचती है। वह अरस्तू का सम्मान करता है और फारसी रुखसाना से प्यार करता है। सोहराब मोदी भारतीय राजा पुरु (यूनानियों के लिए पोरस) की भूमिका में हैं। पुरु पड़ोसी राज्यों से एक सामान्य विदेशी दुश्मन के खिलाफ एकजुट होने का अनुरोध करता है। विश्वासघाती आम्भी राजा की भूमिका में के.एन.सिंग थे।

जब सिकंदर ने पोरस को हराया और उसे कैद किया, तो उसने पोरस से पूछा कि उसका इलाज कैसे किया जाएगा। पोरस ने उत्तर दिया: “जिस तरह एक राजा दूसरे राजा द्वारा व्यवहार किया जाता है”। सिकंदर उनके जवाब से प्रभावित हुए और उन्हें आज़ाद कर दिया। पृथ्वीराज  और सोहराब मोदी के लम्बे-लम्बे संवाद फ़िल्म की जान थे। बाद में एक फ़िल्म “सिकंदरे आज़म भी बनी थी जिसमें दारासिंह सिकंदर और पृथ्वीराज राजा पोरस बने थे।

पृथ्वीराज को थियेटर का बचपन से शौक़ था। बम्बई में सोहराब मोदी पारसी थियेटर से जुड़े थे। उनकी संवाद अदायगी और भूमिका निर्वाह में थियेटर की महत्वपूर्ण भूमिका रहती थी। पृथ्वीराज को भी थियेटर की ललक जागी तो उन्होंने बम्बई की एंडरसन थियेटर कम्पनी में शौक़िया जाना शुरू किया। उन्हें नियमित रूप से नाटकों में भूमिका मिलने लगी। एंडरसन थियेटर कम्पनी इंग्लिश-यूरोपियन थियेटर के शेक्सपियर के नाटकों  प्रभावित था। पृथ्वीराज नाटकों और फ़िल्मों के मंजे हुए कलाकार के रूप में उभरने लगे। पृथ्वीराज पर थियेटर का ऐसा रंग चढ़ा कि उन्होंने 1944 में बम्बई में पृथ्वी थियेटर स्थापित कर दिया हालाँकि वे 1942 से कालिदास का अभिज्ञान शकुन्तलम नाटक प्रस्तुति कर रहे थे।

पृथ्वीराज 1946 तक अपने भरे पूरे परिवार के एकमात्र कमाने वाले मुखिया थे। जब राजकपूर फ़िल्मों में काम करने लगे और आग फ़िल्म से निर्माता-निर्देशक के रूप में उभरने लग गए तो पृथ्वीराज पूरी तरह थियेटर को समर्पित हो गए।

उन्होंने आज़ादी की थीम पर पूरे देश में घूमकर नाटक मंचन करना शुरू कर दिया। उन्होंने दो सालों में 2662 नाटक मंचित किए। उनका एक बहुत प्रसिद्ध नाटक पठान था जो हिंदू मुस्लिम एकता ओर केंद्रित था, जिसे बम्बई में 600 बार मंचित किया। उनके थिएटर ग्रुप में 80 कलाकार थे। 1950 तक फ़िल्मे अधिक बनने लगीं और छोटे शहरों में भी टाक़ीज खुलने से घुमंतू थिएटर का ज़माना लदने लगा। उनके ग्रुप के अधिकांश कलाकार भी फ़िल्मों की तरफ़ मुड़ गए तब उन्होंने भी 1951 से राजकपूर की फ़िल्म आवारा से फ़िल्मों में काम करना शुरू कर दिया। पृथ्वी थिएटर बम्बई में काम करता रहा। वे फ़िल्मों से जितना भी कमाते थियेटर में लगा देते थे।

उन्होंने 1960 में मुग़ल-ए-आज़म, 1963 में हरीशचंद्र तारामती, 1965 में सिकंदर-ए-आज़म और 1971 में कल आज और कल में काम किया था।

उन्होंने पंजाबी फ़िल्मों नानक नाम जहाज़ है (1969) नानक दुखिया सब संसार (1970) और मेले मित्तरां दे (1972) में भी काम किया था।

उन्हें 1954 में साहित्य अकादमी अवार्ड, 1969 में पद्म भूषण पुरस्कार और 1971 में दादा साहिब फाल्के अवार्ड से सम्मानित किया  गया था। वे 9 सालों तक राज्य सभा के सदस्य भी रहे थे।

वे उनकी पत्नी दोनों कैंसर से पीड़ित होकर आठ दिनों के अंतर से स्वर्ग सिधार गए, पृथ्वीराज की मृत्यु 29 मई 1972 को बम्बई में हुई थी।

 

© श्री सुरेश पटवा

भोपाल, मध्य प्रदेश

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मराठी साहित्य – कविता ☆ स्वप्नात   आलं   झाड ☆ सुश्री मीनाक्षी सरदेसाई

सुश्री मीनाक्षी सरदेसाई

(वरिष्ठ मराठी साहित्यकार सुश्री मीनाक्षी सरदेसाई जी मराठी साहित्य की विभिन्न विधाओं की सशक्त हस्ताक्षर हैं। कई पुरस्कारों/अलंकारों से पुरस्कृत/अलंकृत सुश्री मीनाक्षी सरदेसाई जी का जीवन परिचय उनके ही शब्दों में – “नियतकालिके, मासिके यामध्ये कथा, ललित, कविता, बालसाहित्य  प्रकाशित. आकाशवाणीमध्ये कथाकथन, नभोनाट्ये , बालनाट्ये सादर. मराठी प्रकाशित साहित्य – कथा संग्रह — ५, ललित — ७, कादंबरी – २. बालसाहित्य – कथा संग्रह – १६,  नाटिका – २, कादंबरी – ३, कविता संग्रह – २, अनुवाद- हिंदी चार पुस्तकांचे मराठी अनुवाद. पुरस्कार/सन्मान – राज्यपुरस्कारासह एकूण अकरा पुरस्कार.)

आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता स्वप्नात   आलं   झाड। हम भविष्य में भी आपकी सुन्दर रचनाओं की अपेक्षा करते हैं।

 

☆ स्वप्नात   आलं   झाड ☆

 

एकदा   स्वप्नात  आलं   झाड

बोलू    लागलं    फाडफाड.

फांद्यांचे    हिरवे     हात

हलवत     होतं     जोरजोरात..

 

“आम्ही   सुध्दा     तुमच्या सारखी

ह्या    धरतीची    मुलं    आहोत.

तुमचा    छळ    आणि   जुलूम

मुकेपणाने    सोसतो    आहोत

आमचं    जीवन   आणि   मरण

तुमच्या    हातात   घेतलत   तुम्ही

तुमच्यासाठी    करतो    त्याग

तो     तुम्हाला   कळत   नाही.

रस्ते    रुंद    हवेत   म्हणून

तिथून    आम्हाला    उखडता

घरात    अंधार      येतो   सांगून

सरळ    फांद्या    छाटून    टाकता.

करू    नका    आमची    पूजा ,

उगिचच     करता    गाजावाजा

तुमचे    सण,     तुमचे   उत्सव

आम्ही    भोगत    असतो    सजा

आमचा    बहर,   आमचं    वैभव

तुम्ही    करता    बेचिराख

न  हलण्याचा,   न  बोलण्याचा

आम्हाला    आहे   ना   शाप.

जंगलात   आहे    आमचं   राज्य

तिथे   तरी    येऊ    नका

प्राणी,  पक्षी   आमचे    मित्र

त्यांना    बेघर   करू    नका.”

 

© मीनाक्षी सरदेसाई

‘अनुबंध’, कृष्णा हास्पिटलजवळ, पत्रकार नगर, सांगली.४१६४१६.

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आशीष साहित्य # 45 – तंत्र, शिव और शक्ति ☆ श्री आशीष कुमार

श्री आशीष कुमार

(युवा साहित्यकार श्री आशीष कुमार ने जीवन में  साहित्यिक यात्रा के साथ एक लंबी रहस्यमयी यात्रा तय की है। उन्होंने भारतीय दर्शन से परे हिंदू दर्शन, विज्ञान और भौतिक क्षेत्रों से परे सफलता की खोज और उस पर गहन शोध किया है। अब  प्रत्येक शनिवार आप पढ़ सकेंगे  उनके स्थायी स्तम्भ  “आशीष साहित्य”में  उनकी पुस्तक  पूर्ण विनाशक के महत्वपूर्ण अध्याय।  इस कड़ी में आज प्रस्तुत है  एक महत्वपूर्ण  एवं  ज्ञानवर्धक आलेख  “तंत्र, शिव और शक्ति । )

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☆ साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ आशीष साहित्य # 45 ☆

☆ तंत्र, शिव और शक्ति 

जैसा कि मैंने पहले ही कहा है कि तंत्रवाद में सभी दृश्य वस्तुएँ या रूप या अवधारणाएँ भगवान शिव और शक्ति के संयोजन के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं हैं। हमारा जीवन शिव और शक्ति के बीच अलगाव के कारण ही है । शक्ति हमेशा व्यक्तिगत और ब्रह्मांड के विकास को पूरा करने के लिए शिव के साथ एकजुट होने का प्रयत्न करती है । जब शक्ति भगवान शिव के साथ मिलती है तो वैश्विक खेल समाप्त होता है और विश्राम का समय आ जाता है । आप इससे ऐसे सोच सकते हैं कि शिव एक अपरिवर्तिनीय चेतना या स्थितिज ऊर्जा है और शक्ति सक्रिय चेतना या गतिज ऊर्जा है ।

चेतना के गुणों की अंतः क्रिया से सीमित आयाम प्रकट होते हैं, और यह सीमित अभिव्यक्ति आयाम उन गुणों को प्राप्त करते हैं जिन्हें यह नाद, बिंदू और कला से ग्रहण करते हैं। शुद्ध अव्यक्त ऊर्जा के तीन गुण नाद, कला और बिंदू हैं । जबकि प्रकट ऊर्जा के तीन गुण सत्त्व, राजास और तामस हैं, स्पष्ट रूप से नाद कंपन है, बिंदू एक नाभि या केंद्र है और कला एक किरण या बल है जो नाभिक या बिंदू से उत्पन्न होता है ।

प्रत्येक नाद या कंपन में चार आवृत्तियाँ हैं जिनके विषय में मैंने कई बार बताया है, वे परा या ब्रह्मांडीय, पश्यन्ती या आकाशीय, मध्यमा या सूक्ष्म और विखारी या सकल या स्थूल हैं । क्या आप जानते हैं कि हमारे शरीर की हर कोशिका का नाभिक वही बिंदू है । इसमें गुणसूत्र होते हैं जो पूरी स्मृति और प्रजातियों की विकासवादी क्षमता को सांकेतिक शब्दों में बदलते (encode) हैं । यह बिंदू वास्तव में पदार्थ, ऊर्जा और चेतना के बीच एक कड़ी है ।

मनुष्य का वीर्य, जो सृजन के लिए ज़िम्मेदार है वास्तव में इस बिंदू और शुक्राणुजनों का संयोजन है। निषेचित अंडा एक सचेत जीवित ऊतक है । जब शुक्राणु अंडाशय में प्रवेश करता है, तो यह चेतना की एक सूक्ष्म गतिशील जगह बनाता है। उस जगह को आकश रहित आकाश कहा जाता है, जो चेतना का बिंदू है और बिना साँस के हिलता और धड़कता रहता है। उर्वरित अंडाशय में, जीव-व्यक्तिगत चेतना, ब्रह्म-सार्वभौमिक चेतना से अलग होती है। नाद-ध्वनिहीन ध्वनि, बिंदू-स्पंदनात्मक चेतना, और कला-झिल्लीदार संरचना, सभी युग्मनज (zygote) में उपस्थित होते हैं । यह गर्भ में बढ़ने वाला एक मृत ऊतक नहीं होता । एक कोशिका का दो, चार, और सोलह कोशिकाओं में विभाजन प्राण वायु द्वारा पूर्ण किया जाता है । इस प्रकार, शरीर का आकार प्राण वायु द्वारा ही निर्धारित होता है । कफ प्रत्येक कोशिका को पोषित करने में सहायता करता है और पित्त युग्मनज के मूल में अपरिपक्व कोशिका को परिपक्व कोशिका में परिवर्तित करता है । उर्वरित अंडाशय का यह कोश विभाजन भ्रूण को विकास की ओर ले जाता है ।

शक्ति त्रिगुणात्मक होती है, और ये इच्छा शक्ति – इच्छा की शक्ति, क्रिया शक्ति – कार्य की शक्ति, और ज्ञान शक्ति – ज्ञान की शक्ति है । ज्ञान शक्ति सात्विक होती है, क्रिया राजस्विक एवं इच्छा शक्ति तामसिक होती है । ज्ञान शक्ति शरीर का वात दोष, क्रिया पित्त दोष और इच्छा कफ दोष का सूक्ष्म रूप है । सामान्य मनुष्यों के लिए सरल शब्दों में ज्ञान शक्ति स्वयं या आत्मा और बुद्धि का मिश्रित रूप है, क्रिया शक्ति आत्मा और चित्त का मिश्रित रूप है और इच्छा शक्ति आत्मा और मन का मिश्रित रूप है ।

तंत्रवाद के शब्दों में बिंदू शिव है, कला शक्ति है (तीन मुख्य कला : क्रिया, ज्ञान और इच्छा) और नाद शिव और शक्ति का युग्मन है ।

सृजन के तीन बिन्दु सूर्य बिंदू, चंद्र बिंदू और अग्नि बिंदू हैं । अगर हम सूर्य बिंदू से अग्नि बिंदू को मिलाते हैं, तो मिलाने वाली रेखा को क्रिया शक्ति, जो की तीनों शक्तियों में सबसे बड़ी है कहा जायेगा । चंद्र बिंदु और अग्नि बिंदु को मिलाने वाली रेखा तामस प्रकृति की इच्छा शक्ति है और सूर्य बिंदु और चंद्र बिंदु को मिलाने वाली रेखा में ज्ञान शक्ति है जिसकी सात्विक प्रकृति है ।

क्रिया शक्ति रेखा वर्णमाला के साथ शुरू होने वाले संस्कृत के 16 स्वर हैं । यह भी स्पष्ट है कि क्रिया शक्ति का अर्थ भौतिक कार्यों से है जिसे संस्कृत के स्वरों द्वारा प्रकृति में नामित किया गया है जैसा कि चक्रों के विषय में बताते समय मैंने पहले ही बताया था । इच्छा शक्ति रेखा के 16 व्यंजन हैं जो ‘थ’ से शुरू होते हैं एवं ज्ञान शक्ति के 16 व्यंजन हैं जो ‘क’ से शुरू होते हैं ।  संस्कृत वर्णमाला के शेष तीन अक्षर ‘ह’, ‘ल’ और ‘क्ष’ इस त्रिभुज के शिखर हैं । अब इन तीन शक्तियों से उत्पन्न ध्वनि को समझें ।

आत्मा के प्राण वायु के माध्यम से कार्य करते हुए इच्छा शक्ति के आवेग से मूलाधार चक्र में परा नामक ध्वनि शक्ति उत्पन्न होती है, जो अन्य चक्रों के माध्यम से अपने आरोही आंदोलन में अन्य विशेषताओं और नामों (पश्यन्ती और मध्यमा) से जाती है, और जब मुँह से प्रकट होती है तो बोलने वाले अक्षरों के रूप में विखारी का रूप ले लेती है जो चक्रों में ध्वनि के सकल या स्थूल पहलू हैं । जब तीन गुण सत्त्व, राजस और तामस संतुलन (साम्य) की स्थिति में होते हैं, तो उस अवस्था को परा कहा जाता है । पश्यन्ती वह अवस्था है जब तीनों गुण असमान हो जाते हैं । अब कुछ और अवधारणाएं स्पष्ट हुई?”

 

© आशीष कुमार 

नई दिल्ली

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योग-साधना LifeSkills/जीवन कौशल ☆  The Science of Happiness#4 -Happiness Activity – Beyond Happiness-I ☆ Shri Jagat Singh Bisht

Shri Jagat Singh Bisht

(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker.)

☆ Happiness Activity – Beyond Happiness-I ☆ 

Topic: Beyond Happiness: A new understanding of happiness and well-being and how to achieve them (Part I);

Speaker: Jagat Singh Bisht;

Forum: ASK Talks (attitude, skills and knowledge for the young minds);

Conducted by: State Bank Foundation Institute (Chetana), Indore;

Date: 07 February 2013.

This is an excerpt from the inaugural ASK Talk. It is based on the PERMA model (Positive Emotion, Engagement, Relationships, Meaning, Accomplishment) propounded by the renowned Positive Psychologist Dr Martin Seligman, author of ‘Learned Optimism’, ‘Authentic Happiness’ and ‘Flourish.

Mr Bisht is a Behavioural Science trainer with the State Bank of India (a global Fortune 500 corporate), Laughter Yoga teacher, Life Skills coach, Author and Blogger. The views expressed in this talk are personal.

(Part II of this talk is also available on YouTube)

 

A Pathway to Authentic Happiness, Well-Being & A Fulfilling Life! We teach skills to lead a healthy, happy and meaningful life.

The Science of Happiness (Positive Psychology), Meditation, Yoga, Spirituality and Laughter Yoga. We conduct talks, seminars, workshops, retreats and trainings.

Please feel free to call/WhatsApp us at +917389938255 or email lifeskills.happiness@gmail.com if you wish to attend our program or would like to arrange one at your end.

Jagat Singh Bisht : Founder: LifeSkills

Master Teacher: Happiness & Well-Being; Laughter Yoga Master Trainer
Past: Corporate Trainer with a Fortune 500 company & Laughter Professor at the Laughter Yoga University.
Areas of specialization: Behavioural Science, Positive Psychology, Meditation, Five Tibetans, Yoga Nidra, Spirituality, and Laughter Yoga.

Radhika Bisht ; Founder : LifeSkills  
Yoga Teacher; Laughter Yoga Master Trainer

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आध्यत्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता ☆ पद्यानुवाद – त्रयोदश अध्याय (13) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता

हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

त्रयोदश अध्याय

(ज्ञानसहित क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ का विषय)

 

सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम्‌ ।

सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ।।13।।

उसके हाथ औ” पांव, सिर आँख, कान सब ओर

मुख उसका चहुँ ओर है, देख रहा चहुँ ओर ।।13।।

भावार्थ :  वह सब ओर हाथ-पैर वाला, सब ओर नेत्र, सिर और मुख वाला तथा सब ओर कान वाला है, क्योंकि वह संसार में सबको व्याप्त करके स्थित है। (आकाश जिस प्रकार वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी का कारण रूप होने से उनको व्याप्त करके स्थित है, वैसे ही परमात्मा भी सबका कारण रूप होने से सम्पूर्ण चराचर जगत को व्याप्त करके स्थित है) ।।13।।

 

With hands and feet everywhere, with eyes, heads and mouths everywhere, with ears everywhere, He exists in the worlds, enveloping all.।।13।।

 

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर

vivek1959@yahoo.co.in

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # 48 ☆ ज़िंदगी…लम्हों की किताब ☆ डॉ. मुक्ता

डॉ.  मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं  माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं।  साप्ताहिक स्तम्भ  “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक  साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी का  एक अत्यंत विचारणीय आलेख ज़िंदगी…लम्हों की किताब।  वास्तव में  ज़िन्दगी लम्हों की किताब ही है। एक एक लम्हा किताब के पन्नों की तरह गुज़रता है, फर्क सिर्फ इतना कि आप उसे पलट कर पढ़ नहीं सकते। आपके हाथों में सिर्फ अगले अगले लम्हे ही हैं। हाँ मन के पन्नों को पलटा कर कभी भी  खुद को पढ़ा जा सकता है। इस आलेख के कई महत्वपूर्ण कथन हमें विचार करने के लिए उद्वेलित करते हैं। यह डॉ मुक्ता जी के  जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन।  कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें। )     

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # 48 ☆

☆ ज़िंदगी…लम्हों की किताब

लम्हों की किताब है जिंदगी/ सांसों व ख्यालों का हिसाब है ज़िंदगी/ कुछ ज़रुरतें पूरी, कुछ ख्वाहिशें अधूरी/ बस इन्हीं सवालों का/ जवाब है जिंदगी।’ प्रश्न उठता है–ज़िंदगी क्या है? ज़िंदगी एक सवाल है; लम्हों की किताब है; सांसों व ख्यालों का हिसाब है; कुछ अधूरी व कुछ पूरी ख्वाहिशों का सवाल है। सच ही तो है, स्वयं को पढ़ना सबसे अधिक कठिन कार्य है। जब हम खुद के बारे में नहीं जानते; अनजान हैं खुद से… फिर ज़िंदगी को समझना कैसे संभव है? ‘जिंदगी लम्हों की सौग़ात है/ अनबूझ पहेली है/ किसी को बहुत लंबी लगती/ किसी को लगती सहेली है।’ ज़िंदगी सांसों का एक सिलसिला है। जब कुछ ख्वाहिशें पूरी हो जाती हैं, तो इंसान प्रसन्न हो जाता है; फूला नहीं समाता है– मानो उसकी ज़िंदगी में चिर-बसंत का आगमन हो जाता है और जो ख्वाहिशें अधूरी रह जाती हैं; टीस बन जाती हैं; नासूर बन हर पल सालती हैं, तो ज़िंदगी अज़ाब बन जाती है। इस स्थिति के लिए दोषी कौन? शायद! हम…क्योंकि ख्वाहिशें हम ही मन में पालते हैं और यह सिलसिला अनवरत चलता रहता है। एक के बाद दूसरी प्रकट हो जाती है और ये हमें चैन से नहीं बैठने देतीं। अक्सर हमारी जीवन-नौका भंवर में इस क़दर फंस जाती है कि हम चाह कर उस चक्रवात से बाहर नहीं निकल पाते। परंतु इसके लिए दोषी हम स्वयं हैं, इसीलिए उस ओर हमारी दृष्टि जाती ही नहीं और न ही हम यह जानते हैं कि हम कौन हैं? कहां से आए हैं और इस संसार में आने का हमारा प्रयोजन क्या है? संसार व समस्त प्राणी-जगत् नश्वर है और माया के कारण सत्य भासता है। यह सब जानते हुए भी हम आजीवन इस मायाजाल से मुक्त नहीं हो पाते।

सो! आइए, खुद को पढ़ें और ज़िंदगी के मक़सद को जानें; अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण रखें और बेवजह ख्वाहिशों को मन में विकसित न होने दे। ख्वाहिशों अथवा आकांक्षाओं को आवश्यकताओं तक सीमित कर दें, क्योंकि आवश्यकताओं की पूर्ति तो सहज रूप में संभव है; इच्छाओं की नहीं, क्योंकि वे तो सुरसा के मुख की भांति बढ़ती चली जाती हैं और उनका अंत कभी नहीं होता। जिस दिन हम इच्छा व आवश्यकता के गणित को समझ जाएंगे; ज़िंदगी आसान हो जाएगी। आवश्यकता के बिना तो ज़िंदगी की कल्पना ही बेमानी है, असंभव है। परमात्मा ने प्रचुर मात्रा में वायु, जल आदि प्राकृतिक संसाधन जुटाए हैं… भले ही मानव के बढ़ते लालच के कारण  हम इनका मूल्य चुकाने को विवश हैं। सो! इसमें दोष हमारी बढ़ती इच्छाओं का है। इसलिए इच्छाओं पर अंकुश लगाकर उन्हें सीमित कर; तनाव-रहित जीवन जीना श्रेयस्कर है।

ख्वाहिशें कभी पूरी नहीं होती और कई बार हम पहले ही घुटने टेक कर पराजय स्वीकार लेते हैं; उन्हें पूरा करने के निमित्त जी-जान से प्रयत्न भी नहीं करते और स्वयं को झोंक देते हैं– चिंता, तनाव, निराशा व अवसाद के गहन सागर में; जिसके चंगुल से बच निकलना असंभव होता है। वास्तव में ज़िंदगी सांसों का सिलसिला है। वैसे भी ‘जब तक सांस, तब तक आस’ रहती है और जिस दिन सांस थम जाती है, धरा का, सब धरा पर, धरा ही रह जाता है। मानव शरीर पंच-तत्वों से निर्मित है…सो! मानव अंत में पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि तथा आकाश में विलीन हो जाता है।

‘आदमी की औक़ात, बस! एक मुट्ठी भर राख’ यही जीवन का शाश्वत सत्य है। मृत्यु अवश्यंभावी है; भले ही समय व स्थान निर्धारित नहीं है। इंसान इस जहान में खाली हाथ आया था और उसे सब कुछ यहीं छोड़, खाली हाथ लौट जाना है। परंतु फिर भी वह आखिरी सांस तक इसी उधेड़बुन में लगा रहता है और अपनों की चिंता में लिप्त रहता है। वह अपने आत्मजों व प्रियजनों के लिए आजीवन उचित- अनुचित कार्यों को अंजाम देता है…उनकी खुशी के लिए, जबकि पापों का फल उसे अकेले ही भुगतना पड़ता है, क्योंकि ‘सुख के सब साथी, दु:ख में न कोय’ अर्थात् सुख-सुविधाओं का आनंद तो सभी लेते हैं, परंतु वे पाप के प्रतिभागी नहीं होते। आइए! हम इससे निजात पाने की चेष्टा करें और हर पल को अंतिम पल मानकर निष्काम कर्म करें। ‘पल में प्रलय हो जाएगी, मूरख करेगा कब?’ जी हां! कल अर्थात् भविष्य अनिश्चित है; केवल वर्तमान ही सत्य है। इसलिए जो भी करना है; आज ही नहीं, अभी करना बेहतर है। कबीर जी का यह संदेश उक्त भाव को अभिव्यक्त करता है। क़ुदरत ने तो हमें आनंद ही आनंद दिया है, दु:ख तो हमारी स्वयं की खोज है। इससे तात्पर्य है कि प्रकृति दयालु है; मां की भांति  हर आवश्यकता की पूर्ति करती है। परंतु मानव स्वार्थी है; उसका अनावश्यक दोहन करता है;

जिसके कारण अपेक्षित संतुलन व सामाजिक- व्यवस्था बिगड़ जाती है तथा उसके कार्य-व्यवहार में अनावश्यक हस्तक्षेप करने का परिणाम है… सुनामी, अत्यधिक वर्षा, दुर्भिक्ष, अकाल, महामारी आदि… जिनका सामना आज पूरा विश्व कर रहा है। मुझे स्मरण हो रही हो रहा है… भगवान महाबीर द्वारा निर्दिष्ट–’जियो और जीने दो’ का सिद्धांत, जो अधिकार को त्याग कर्तव्य-पालन व संचय की प्रवृत्ति का त्याग करने का संदेश देता है। सृष्टि का नियम है कि ‘एक सांस लेने के लिए मानव को पहली सांस को छोड़ना पड़ता है।’ सो! जीवन में ज़रूरतों की पूर्ति करो; व्यर्थ की ख्वाहिशें मत पनपने दो, क्योंकि वे कभी पूरी नहीं होतीं और उनके जंज़ाल में फंसा मानव कभी भी मुक्त नहीं हो पाताता। इसलिए सदैव अपनी चादर देख कर पांव पसारने अर्थात् संतोष से जीने की सीख दी गयी है… यही अनमोल धन है अर्थात् जो मिला है, उसी में संतोष कीजिए, क्योंकि परमात्मा वही देता है, जो हमारे लिए आवश्यक व शुभ होता है। सो! ‘सपने देखिए! मगर खुली आंख से’…और उन्हें साकार करने की पूर्ण चेष्टा कीजिए; परंतु अपनी सीमाओं में रहते हुए, ताकि उससे दूसरों के अधिकारों का हनन न हो।

संसार अद्भुत स्थान है। आप दूसरे के दिल में, विचारों में, दुआओं में रहिए। परंतु यह तभी संभव है, जब आप किसी के लिए अच्छा करते हैं; उसका मंगल चाहते हैं; उसके प्रति मनोमालिन्य का दूषित भाव नहीं रखते। सो! ‘सब हमारे, हम सभी के’ –इस सिद्धांत को जीवन में अपना लीजिए…यही आत्मोन्नति का सोपान है। ‘कर भला, हो भला’ तथा ‘सबका मंगल होय’ अर्थात् इस संसार में हम जैसा करते हैं; वही लौटकर हमारे पास आता है। इसीलिए कहा गया है कि रूठे हुए को हंसाना; असहाय की सहायता करना; सुपात्र को दान देना आदि सब आपके पास ही प्रतिदान रूप में लौट कर आता है। वक्त सदा एक-सा नहीं रहता। ‘कौन जाने, किस घड़ी, वक्त का बदले मिज़ाज’ तथा ‘कल चमन था, आज एक सह़रा हुआ/ देखते ही देखते यह क्या हुआ’– यह हक़ीक़त है। पल-भर में रंक राजा व राजा रंक बन सकता है। क़ुदरत के खेल अजब हैं; न्यारे हैं; विचित्र हैं। सुनामी के सम्मुख बड़ी-बड़ी इमारतें ढह जाती हैं और वह सब बहा कर ले जाता है। उसी प्रकार घर में आग लगने पर कुछ भी शेष नहीं बचता। कोरोना जैसी महामारी का उदाहरण आप सबके समक्ष है। आप घर की चारदीवारी में क़ैद हैं… आपके पास धन-दौलत है; आप उसे खर्च नहीं कर सकते; अपनों की खोज-खबर नहीं ले सकते। कोरोना से पीड़ित व्यक्ति राजकीय संपत्ति बन जाता है। यदि बच गया, तो लौट आएगा,अन्यथा उसका विद्युत्-दाह भी सरकार द्वारा किया जाएगा। हां! आपको सूचना अवश्य दे दी जाएगी।

लॉक-डाउन में सब बंद है। जीवन थम-सा गया है। सब कुछ मालिक के हाथ है; उसकी रज़ा के बिना तो एक पत्ता भी नहीं हिल पाता…फिर यह भागदौड़ क्यों? अधिकाधिक धन कमाने के लिए अपनों से छल क्यों? दूसरों की भावनाओं को रौंद कर महल बनाने की इच्छा क्यों? सो! सदा प्रसन्न रहिए। ‘कुछ परेशानियों को हंस कर टाल दो, कुछ को वक्त पर टाल दो।’ समय सबसे बलवान् है; सबसे बड़ी शक्ति है; सबसे बड़ी नियामत है। जो ठीक होगा, वह तुम्हें अवश्य मिल जाएगा। चिंता मत करो। जिसे तुम अपना कहते हो; तुम्हें यहीं से मिला है और तुम्हें यहीं सब छोड़ कर जाना है। फिर चिंता और शोक क्यों?

रोते हुए को हंसाना सबसे बड़ी इबादत है; पूजा है; भक्ति है; जिससे प्रभु प्रसन्न होते हैं। सो! मुट्ठी खुली रखना सीखें, क्योंकि तुम्हें इस संसार से खाली हाथ लौटना है। अपने हाथों से गरीबों की मदद करें; उनके सुख में अपना सुख स्वीकारें, क्योंकि ‘क़द बढ़ा नहीं करते, एड़ियां उठाने से/ ऊंचाइयां तो मिलती है, सर को झुकाने से।’ विनम्रता मानव का सबसे बड़ा गुण है। इससे बाह्य धन-संपदा ही नहीं मिलती; आंतरिक सुख, शांति व आत्म-संतोष भी प्राप्त होता है और मानव की दुष्प्रवृत्तियों का स्वत: अंत हो जाता है। वह संसार उसे अपनाव खुशहाल नज़र आता है। सो! ज़िंदगी उसे दु:खालय नहीं भासती; उत्सव प्रतीत होती है, जिस में रंजोग़म का स्थान नहीं; खुशियां ही खुशियां हैं; जो देने से, बांटने से विद्या रूपी दान की भांति बढ़ती चली जाती हैं। इसलिए कहा जाता है–’जिसे इस जहान में आंसुओं को पीना आ गया/ समझो! उसे जीना आ गया।’ सो! जो मिला है, उसे प्रभु-कृपा समझ कर प्रसन्नता से स्वीकार करें, ग़िला-शिक़वा कभी मत करें। कल, भविष्य जो अनिश्चित है; कभी आएगा नहीं…उसकी चिंता में वर्तमान को नष्ट मत करें… यही ज़िंदगी है और लम्हों की सौग़ात है।

© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत।

पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी,  #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com

मो• न•…8588801878

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