मराठी साहित्य – चित्रकाव्य ☆ चांदणीचे रूप हिचे… ☆ रेणुका धनंजय मार्डीकर ☆

रेणुका धनंजय मार्डीकर

?️?  चित्रकाव्य  ?️?

? चांदणीचे रूप हिचे… ? रेणुका धनंजय मार्डीकर ☆

(वर्णसंख्या सोळा, यती आठव्या अक्षक्षरावर)

(भावगीत)

येता बकुळ फुलोरा सुगंधाची मांदियाळी 

गंध वारा पिंगा देतो ओघळती सायंकाळी ||ध्रु||

*

मन जाते माझे तेथे ताटव्यात सुगंधाच्या 

किती देखणे लावण्य ओटी मध्ये  वसंताच्या

कोणी इळन्नी म्हणती कोणी म्हणती बकुळी 

गंध वारा पिंगा देतो ओघळती सायंकाळी ||१||

*

कधी ओवळ होऊन वेळेसरात गुंफले

कुंतलास गंधाळतं दान त्याने हो शिंपले

फुले उमलु येताना गोड मधुकण गाळी 

गंधवारा पिंगा देतो ओघळती सायंकाळी ||२||

*

कवितेचे शब्द झाली लावणीला शोभा आली

कोणी रमणी देखणी बकुळीचा साज ल्याली  

चांदणीचे रूप हिचे तारकांची हो झळाळी

गंध वारा पिंगा देतो ओघळती सायंकाळी ||३||

*

हिच्या सुगंधाची भूल मनाला लागले  पिसे

बरसोळी ओघळता हिमवर्षावच दिसे

बासरीची धून गातो गोकुळचा वनमाळी

गंध वारा पिंगा देतो ओघळती सायंकाळी ||४||

*

बकुळीच्या गंधकोशी अत्तराचा फाया झाला

सा रे ग म प ध नी सा स्वर माझा आला आला 

बकुळीची गोड बिंदी लावली मी काव्यभाळी

गंध वारा पिंगा देतो ओघळती सायंकाळी ||५||

© रेणुका धनंजय मार्डीकर

औसा.

मोबा. नं.  ८८५५९१७९१८

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर ≈

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मराठी साहित्य – चित्रकाव्य ☆ भावनाशून्य प्रगती ! ☆ श्री प्रमोद वामन वर्तक ☆

श्री प्रमोद वामन वर्तक  

?️?  चित्रकाव्य  ?️?

? भावनाशून्य प्रगती ! ?  श्री प्रमोद वामन वर्तक ☆

चाणक्य कृत्रिम बुद्धिमत्तेतले  

‘भारत मंडपात’ जगातून जमले, 

जो तो दावा करी तयाला 

भावी विश्वाचे कोडे उलगडले !

*
काम सोपे करण्या मानवाचे

येथे तयार कित्येक यंत्र मानव,

त्या भावना विरहित यंत्रामध्ये 

सर्व भाव भावनांचा अभाव !

*

डोळे बोलती भाव हृदयातले 

थेट भिडता नजरेला नजर,

भावनाशून्य ‘त्या’ यंत्रामध्ये 

दिसे आज्ञा पालनांचे काहूर !

*

प्रगती सारी भावना विरहित 

बनवेल ‘कठपुतळी’ मानवा,

हात जोडूनी देवा विनवितो 

या अरिष्टातूनी जगा वाचवा !

या अरिष्टातूनी जगा वाचवा !

© प्रमोद वामन वर्तक

संपर्क – दोस्ती इम्पिरिया, ग्रेशिया A 702, मानपाडा, ठाणे (प.) 400610 

मो – 9892561086 ई-मेल – pradnyavartak3@gmail.com

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश के नवगीत # १४० ☆ कहती है गौरैया ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “कहती है गौरैया” ।)       

✍ जय प्रकाश के नवगीत # १४० ☆

☆ कहती है गौरैया ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

कहती है गौरैया

आँगन हुए प्रदूषित

मैं क्यों आऊँ द्वार तुम्हारे।

जहाँ-तहाँ बैठाए पहरा

रोते हो रोना

नहीं कहीं खाली छोड़ा है

कोई भी कोना

अपनी मर्ज़ी के

मालिक हैं यह कहना

बैठे बंद किए गलियारे ।

कभी फुदकती घर के भीतर

कभी खिड़कियों पर

कभी किताबों पर मटकाती

आँख झिड़कियों पर

बनकर भोली उड़े

फुर्र से जब चिचियाकर

फिर बतलाती दोष हमारे।

देख हमे फुरसत में अपना

नीड़ सँवारे गुपचुप

चोंच दबाए तिनका रखती

रोशनदान में छुप-छुप

भरे सकोरे पर हक

जतलाती है हरदम

रोज जगाती है भिनसारे।

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # २१८ – महावीर जयंती विशेष – जैन धर्म में है बसा… ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “महावीर जयंती विशेष – जैन धर्म में है बसा… । आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २१८ ☆

? महावीर जयंती विशेष – जैन धर्म में है बसा… ? श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

जैन धर्म में है बसा, जीवों का कल्यान।

संस्कृति ने सबको दिया, जीने का वरदान।।

राम कृष्ण गौतम हुए, महावीर की भूमि।

योग धर्म अध्यात्म से, कौन रहा अनजान।।

 *

धर्मों की  गंगोत्री, का है  भारत केन्द्र।

जैन बौद्ध ईसाई सँग, मुस्लिम सिक्ख सुजान।

 *

ज्ञान और विज्ञान का, भरा यहाँ भंडार।

सबको संरक्षण मिला, हिन्दुस्तान महान।। 

 *

चैत्र शुक्ल त्रयोदशी को, जन्मे कुंडल ग्राम।

वैशाली के निकट ही, मिला हमें वरदान।।

 *

राज पाट को छोड़कर, वानप्रस्थ की ओर।

सत्य धर्म की खोज कर, किया जगत कल्यान।।

 *

सन्यासी का वेषधर, निकल चले अविराम।

छोड़ पिता सिद्धार्थ को, कष्टों का विषपान।। 

 *

प्राणी-हिंसा देख कर, हुआ बड़ा संताप।

मांसाहारी छोड़ने, शुरू किया अभियान।।

 *

अहिंसा परमोधर्म का, गुँजा दिया जयघोष।

जीव चराचर अचर का, लिया नेक संज्ञान।।

 *

मूलमंत्र सबको दिया , पंचशील सिद्धांत।

दया धर्म का मूल है, यही धर्म की जान।

 *

हिंसा का परित्याग कर, अहिंसा अंगीकार।

प्रेम दया सद्भाव को, मिले सदा सम्मान।।

 *

चौबीसवें  तीर्थंकर, माँ त्रिशला के पुत्र।

महावीर स्वामी बने, पूजनीय भगवान।।

 *

वर्धमान महावीर जी, बारम्बार प्रणाम ।

त्याग तपस्या से दिया, सबको जीवन दान।।

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – केंद्र ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – केंद्र ? ?

खींचकर एक वृत्त

बीचोंबीच बिठा दी गई औरत

घोषित कर दिया गया उसे केंद्र,

बताया गया,

वृत्त, केंद्र के इर्द-गिर्द घूमता है,

भूल गए ताली बजानेवाले हाथ

राउंडर की नोक पर

छिदने-गुदने से बनता है केंद्र,

वृत्त की परिधि छोटी-बड़ी

करता है परकार

केंद्र की नाभि पर होकर सवार,

हाँ, परकार के कृत्य का

विवश, मूक माध्यम भर बनता है केंद्र,

केंद्र आनंदित है

परिधि को विस्तृत कर दिया गया है,

केंद्र दमित है

परिधि को लगभग समेट दिया गया है,

अपने ही वृत्त में कैद औरत

आजीवन मनाती रहती है जश्न

मिलती-छिनती आज़ादी का,

उस रोज़ कोई मंच से कह रहा था

देखो हम इंसानों ने

औरत को कितनी आज़ादी दी है,

जरा मुझे बताना भाई

औरत इंसान नहीं होती क्या?

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ आपदां अपहर्तारं साधना संपन्न हुई। अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र दी जावेगी। 🕉️ 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ मराठी कविता  – कविता तुम्हारे लिए… – उज्ज्वला केळकर ☆ हिन्दी भावानुवाद – श्री भगवान वैद्य ‘प्रखर’ ☆

श्री भगवान वैद्य प्रखर

? मराठी कविता ?

कविता तुम्हारे लिए… – उज्ज्वला केळकर ☆ हिन्दी भावानुवाद – श्री भगवान वैद्य ‘प्रखर’

उज्ज्वला केळकर

यह कविता तुम्हारी 

तुम्हारे लिए

सामने बरसता धुआंधार पानी

सम्पुष्ट कर रहा है

रोम-रोम में बोया गया

तुम्हारा स्पर्श …

घर ने कब का नकार दिया मुझे

मंदिर भी नहीं कोई निगाह में

या कोई धर्मशाला, जर्जर ही सही

 

नीला आकाश

रूठकर दूर चला गया है मुझसे

धूप का छोटा-सा टुकड़ा भी नहीं

उष्मा के लिए

इस दिशाहीन सफर में साथ हैं

तुम्हारी अनगिनत यादें

और…अब…

उनकी छितरी हुईं कविताएं…।

** 

 मूल कविता – -उज्ज्वला  केळकर

संपर्क – निलगिरी, सी-५ , बिल्डिंग नं २९, ०-३  सेक्टर – ५, सी. बी. डी. –  नवी मुंबई , पिन – ४००६१४ महाराष्ट्र

भावानुवाद  श्री भगवान वैद्य ‘प्रखर’

30, गुरुछाया कालोनी, साईंनगर, अमरावती  444607

संपर्क : मो. 9422856767, 8971063051  * E-mailvaidyabhagwan23@gmail.com *  web-sitehttp://sites.google.com/view/bhagwan-vaidya

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १४५ ☆ वो तज़ुर्बों के मदरसे का पढ़ा है… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “वो तज़ुर्बों के मदरसे का पढ़ा है“)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १४५ ☆

✍ वो तज़ुर्बों के मदरसे का पढ़ा है… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे 

अपने ईमान को कमजोर बनाता क्यूँ है

ख़ुद के किरदार को  इंसान गिराता क्यूँ है

 *

है ये अच्छा कि निकल जाए किनारा करके

दिल नहीं मिलता है तो हाथ मिलाता क्यूँ है

 *

बेचकर कोई पकौड़े न बना अंबानी

शेख चिल्ली के हमें ख़्वाब दिखाता क्यूँ है

 *

इस खराबात के रस्ते की तबाही मंज़िल

हर बशर जानता पर खुद को चलाता क्यूँ है

 *

हैसियत की हो जहाँ क़द्र हुनर से बढ़कर

ऐसी महफ़िल में ए फ़नकार तू जाता क्यूँ है

 *

वो तज़ुर्बों के मदरसे का पढ़ा है समझे

बाप को आज कोई पुत्र सिखाता क्यूँ है

 *

वस्वसा दिल से नहीं दूर हो तो जाँ ले लो

आज़मा के तू मुझे रोज़ सताता क्यूँ है

 *

सामने सबके नज़र भी न उठा के देखे

वक़्त बे वक़्त मुझे घर पे बुलाता क्यूँ है

 *

पान मुझको न दिया मान लिया हो गुस्सा

गैर को हाथ से तू अपने खिलाता क्यूँ है

 *

है बराबर के जो बेटे तो मदद ले उनकी

बोझ काँधों पे सभी घर का उठाता क्यूँ है

 *

भूलिए शौक़ वो तकलीफ़ दे मख्लूक़ को जो

मुर्ग तीतर व बटेरों को लड़ाता क्यूँ है

 *

हाथ सोने को लगाऊँ तो हो जाता माटी

इतना नाराज़ हुआ मुझसे विधाता क्यूँ है

 *

एक फक्कड़ से जरूरत जो वो सीखी न अरुण

दाँव पर ज़र के लिए जान लगाता क्यूँ है

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ हेमंत साहित्य # ५० – भरोसा… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – भरोसा।)

☆ हेमंत साहित्य # ५० ☆

✍ भरोसा… ☆ श्री हेमंत तारे  

बिजली की तार पर

या

पतली सी डगाल पर

सोते,

ऊंघते,

परिन्दे देखकर

लगता है ऐसा

 

कि

नही गिरेंगे वो

कभी भी नींद में

किसी भी तार से

किसी भी डगाल से ।

 

कि

भरोसा है उन्हें

उस पर

जो दिखता तो नही

पर है

यहाँ,

वहाँ,

सर्वत्र ।

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९५९ ⇒ ॥ गणगौर॥ ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “॥ गणगौर॥ ।)

?अभी अभी # ९५९ ⇒ आलेख – ॥ गणगौर॥ ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

लोग जब मुझसे जन्म तारीख पूछते हैं तो मेरा जवाब होता है 1 अप्रैल लेकिन जब कोई मुझे जन्म तिथि पूछता है तो मुझे गणगौर बोलना पड़ता है। ‌

वैसे व्रत तिथि और वार त्यौहार के बारे में मेरी जानकारी इतनी पुष्ट नहीं है लेकिन फिर भी केवल इतना याद है कि जिस दिन मेरा जन्म हुआ उस दिन गणगौर थी।

संयोग से आज ईद है और गणगौर भी, यानी मेरी जन्म तिथि भी आज ही है। बचपन में केवल मां को मेरा जन्मदिन याद रहता था। जब स्कूल में दाखिला लिया तब जन्म तारीख 1 अप्रैल लिखाई गई बस तब से रेकॉर्ड में 1 अप्रैल ही दर्ज है। अपनी खुशी के लिए आज भी मैं अपना जन्मदिन गणगौर के अवसर पर ही मनाना पसंद करता हूं, क्योंकि गणगौर से मेरी मां और ननिहाल की स्मृति जुड़ी हुई है।।

जन्मदिन के अवसर पर अगर कोई पर्व अथवा उत्सव भी हो तो सोने में सुहागा, एक तरह से हमारा जन्मदिन पूरी दुनिया मनाती है। तिथि और तारीख का यह अंतर हमेशा जन्मदिन को दो तारीखों में बांट देता है। क्या ऐसा कोई उपाय नहीं की हमारी जन्मदिन की तिथि और तारीख एक ही दिन कर दी जाएं।

वैसे दो दो बार पैदा होना, और दो विभिन्न दिनों पर जन्मदिन मनाना भी इतना बुरा नहीं। एक जन्मदिन पारिवारिक खुशी का और एक समाजिक, औपचारिक और व्यावहारिक जगत का। आज घर घर गणगौर की पूजा होती है, व्रत उपवास होते हैं, गुड़ के गुने के साथ साथ ही पकवान, मिष्ठान्न भी बनाए जाते हैं। नवरात्रि का उत्साह इस खुशी को और अधिक महत्वपूर्ण बना देता है।।

आप बधाई दें, अथवा ना दें, आज का दिन मेरे लिए विशेष है, क्योंकि ना फोन पर जन्मदिन की बधाई और ना ही फेसबुक, व्हाट्सएप पर जन्मदिन के शुभकामना संदेश। खुद ही अपना जन्मदिन मनाओ और खुश हो लो, अपने परिवार के बीच ..!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ५९ ☆ लघुकथा – अपने पराये… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख  – “अपने पराये“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ५९ ☆

✍ लघुकथा – अपने पराये… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

सुभाष और मनोज बचपन से दोस्त हैं।  हालांकि सुभाष मनोज से तीन चार साल बड़े हैं पर दोस्ती में कोई फ़र्क नहीं । पढाई में भी दो साल का अंतर रह। यह अंतर आखिर तक बना ही रहा क्योंकि पढाई में दोनों एक जैसे थे। पोस्ट ग्रेजुएट होने के बाद सुभाष की पोस्ट ऑफिस में नौकरी लग गई और पोस्टिंग आगरा में हुई। 

सुभाष का विवाह हो गया।  मनोज सुभाष की पत्नी को बड़े आदर के साथ भाभीजी कहा करता।

मनोज ने एम.ए. करते ही  मुंबई में एक कंपनी में मैनेजर के पद पर नौकरी लग गई। दोनों दोस्तों का संपर्क ऑनलाइन बना रहा लेकिन दोनों गृहस्थी के चक्कर में फँसते गए। दोनों के बच्चे भी हुए, उनकी शादी भी हो गई। और उनकी बातचीत में अंतराल बढ़ गया, मिलने जुलने का तो सवाल ही नहीं।

एक दिन मनोज दादर में सब्जी खरीद रहे थे कि उन्हें सुभाष दिखाई दिए।  लेकिन बाल पक गए थे तो विश्वास नहीं हो रहा था। इसलिए वह उनके पास गए और पहचान कर पुकारा, “सुभाष भाई”। सुभाष ने मुड़कर देखा तो मनोज को तुरंत पहचान गए। मनोज ने कहा,”आप मुंबई में, कब और कैसे?” सुभाष ने कहा कि मुझे एक्साइज में डेपुटेशन मिल गया तो मुंबई आ गया। दो साल हो गए। आओ, तुम्हें तुम्हारी भाभी से मिलाता हूँ, वह यहीं एक दूकान में कुछ खरीद रही है।” मनोज ने भाभी पुकारते हुए प्रणाम किया तो उन्होंने चौंक कर देखा, बोली,”मनोज, अरे तुम यहाँ?” सुभाष और मनोज बड़े अरसे के बाद मिलकर बहुत खुश हुए। भाभी ने अपना पता लिखवाते हुए कहा, “दीपावली आ रही है, घर  जरूर आना। और हाँ भोजन हमारे साथ ही करना। मनोज खुशी के मारे “जी हाँ ” ही कह पाए।

दीपावली की जगमगाहट में मनोज अपने परिवार के साथ सुभाष के घर खुशी खुशी पहुंचे। दरवाजा एक युवती ने खोला। मनोज सकपकाये कि कहीं गलत घर में न आ गए हों। वह युवती बोली, “आप मनोज अंकल, मम्मी पापा ने बताया था, मैं उनकी बहू सुप्रिया, आइए अंदर आइए।”  आवाजें सुन कर सुभाष और उनकी पत्नी ड्राइंग रूम में आए। दोनों गले मिले। बहू सुप्रिया बोली, “आप लोग बात कीजिए, मैं पानी पूरी लेकर आती हूँ। आज हमारे यहाँ पानी पूरी का कार्यक्रम है।” सुभाष और उनकी पत्नी तथा मनोज और उनकी पत्नी एक दूसरे का मुंह देखने लगे। भाभी जी ने मनोज को सपरिवार दीपावली के उपलक्ष्य में खाने पर बुलाया था। सुप्रिया की बात सुनकर एकदम गंभीर हो गई। मुंह से बोल नहीं फूटा। भोजन प्रश्न चिह्न बना रहा और अपने पराए दोनों दोनों अवाक् ।

© डॉ सत्येंद्र सिंह

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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