हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ “श्री हंस” साहित्य # २०१ ☆ मुक्तक – ।। समाज राष्ट्र का सजग सतर्क प्रहरी पत्रकार ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

श्री एस के कपूर “श्री हंस”

 

☆ “श्री हंस” साहित्य # २०१ ☆

☆ मुक्तक ।। समाज राष्ट्र का सजग सतर्क प्रहरी पत्रकार ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

=1=

कभी बोल मीठे तो कभी चीत्कार लिखता है।

कभी विपक्ष  तो  कभी सरकार लिखता है।।

यह कलम  का  सिपाही रुकता नहीं  कभी।

सही बात हो   तो  वह बार – बार लिखता है।।

=2=

कभी आर -पार तो कभी कारोबार लिखता है।

कभी विसंगति और कभी  प्रचार लिखता है।।

समाज राष्ट्र के  हर एक बिंदु को छूती कलम।

हर विषय को  छूता  वह सरोकार लिखता है।।

=3=

कभी ओज तो कभी  रस श्रृंगार   लिखता है।

कभी खिजा तो कभी खूब बहार   लिखता है।।

खुशी गम के   हर   एक पहलू को छूता वह।

कभी जीत तो कभी  कोई हार  लिखता   है।।

=4=

कभी व्यंग तो कभी बन के हास्यकार लिखता है।

कभी शांति  तो कभी वह अंगार  लिखता  है।।

छू जाती है कलम उसकी दिल  को    कभी।

जब भावनाओं का  पूरा ही संसार लिखता है।।

=5=

सब पढ़ते हैं   कि  बहुत जोरदार  लिखता है।

कभी दब के या  बन कर असरदार लिखता है।।

हर हालात को   लिखता वह खूब समझ कर।

सब कोई   और नहीं बस पत्रकार लिखता है।।

© एस के कपूर “श्री हंस”

बरेली ईमेल – Skkapoor5067@ gmail.com, मोब  – 9897071046, 8218685464

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ काव्य धारा #२६४ ☆ कविता – भगवान हमें प्यार का वरदान दीजिये… ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

(आज प्रस्तुत है गुरुवर स्व  प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  द्वारा रचित – “कविता  – भगवान हमें प्यार का वरदान दीजिये। हमारे प्रबुद्ध पाठकगण स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी  काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।) 

☆ काव्य धारा # २६४

☆ भगवान हमें प्यार का वरदान दीजियेस्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

भगवान हमें प्यार का वरदान दीजिये ।

औरों के कष्ट का सही अनुमान दीजिये ॥

*

दुनिया में भाई-भाई से हिलमिल के सब रहें

है द्वेष जड़ लड़ाई की – यह ज्ञान दीजिये ॥

*

होता नहीं लड़ाई से कुछ भी कभी भला

सुख-शांति के निर्माण का अरमान दीजिये ॥

*

निर्दोष मन औ’ शुद्ध भावनाओं के लिये

हर व्यक्ति को सबुद्धि औ’ सद्ज्ञान दीजिये ॥

*

दुनिया सिकुड़ के  आज हुई एक नीड़ सी

इस नीड़ के कल्याण का विज्ञान दीजिये ॥

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

साभार – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

ए २३३ , ओल्ड मीनाल रेजीडेंसी  भोपाल ४६२०२३

मो. 9425484452

vivek1959@yahoo.co.in

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९७५ ⇒ पनघट और जमघट ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “पनघट और जमघट।)

?अभी अभी # ९७५ ⇒ आलेख – पनघट और जमघट ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

कुछ यादें भी बड़ी नटखट होती हैं। कहाँ गाँव की गोरी, घूंघट, पीपल की छांव और पनघट और कहां, शहर के हर चौराहे पर भीड़भाड़, धक्का मुक्की और जमघट ! पनघट पर सखियों में कोई भेदभाव नहीं होता, कोई रंगभेद की नीति भी नहीं होती, फिर भी जहां पनघट है, वहां सब गोरी, गोरी ही होती है, और काला मात्र एक घनश्याम। और जहां काले गोरे, वृद्ध युवा, बेकार, कामकाजी और आम जरूरतमंद इंसानों का जमघट हो, वहां, अप्रैल मई की गर्मी ही गर्मी, परेशानी और पसीना ही पसीना।

यमुना के तट पर अथवा किसी पनघट पर कभी गोरी मटकी लेकर पानी भरने जाती होगी, हमने तो सरकारी नल और ट्यूब वेल पर स्त्री, पुरुष और बच्चों को, हंडा, बाल्टी और मटके लिए, कतार लगाते देखा है। अब आप इसे पनघट कहें अथवा जमघट। पानी के लिए ही हर घट है, और हर घट में जल से ही जिंदगानी है।।

सुबह की सैर सबके नसीब में नहीं होती। कैसे कैसे नजारे देखने को मिलते हैं, मॉर्निंग वॉक के बहाने। स्मार्ट सिटी बनता, मेट्रो सुविधा के लिए आतुर, स्वच्छता का छक्का लगा चुका, मेरे शहर का एक व्यस्ततम चौराहा ! जब नेताओं के नामों की सूची समाप्त हो जाती है तो चहुंमुखी विकास के लिए मुंह फैलाते शहर में आगरा बॉम्बे रोड से काम नहीं चलता। रिंग रोड और बायपास तक बात पहुंच जाती है। जहां जगमगाती स्ट्रीट लाइट और सौंदर्यीकरण के साथ साथ सड़क को डिवाइडर से बांटा जाकर दोनों ओर सर्विस रोड से भी आवागमन जारी रहता है।

आप अपनी सुरक्षा के लिए खुली सड़क पर नहीं, सर्विस रोड पर ही अपना सीना ताने निकल पड़ते हैं। इस बार जूता जापानी नहीं, बाटा, एडिडास अथवा स्वदेशी भी हो सकता है।

अगर आप आत्म निर्भर हैं तो पांच छ: हजार का जूता भी पहन सकते हैं। पतलून भी इंग्लिस्तानी नहीं, देसी जीन्स की हो सकती है।।

घर से निकलते ही, कुछ दूर चलते ही, मैं उस चौराहे पर पहुंच जाता हूं जहां मेरा वास्ता पनघट और जमघट से एक साथ पड़ने वाला है। चौराहे के पास ही, नगर निगम का एक चलित झोनल कार्यालय है, जहां स्वच्छता के लिए मुस्तैद वाहन और सफाई कर्मचारी सड़क पर गंभीर वार्तालाप करते देखे जा सकते हैं। पास ही पानी के टैंकर भरने के लिए भी नलों की व्यवस्था है जिस कारण बिना गोरी के पनघट सा दृश्य उपस्थित हो जाता है। टैंकर को आप कौन सा घट कहेंगे।

जहां भी भीड़ होगी, जमघट होगा, पनघट होगा, यातायात तो बाधित होगा ही। वहीं खाली स्थान को और उपयोगी बनाने के लिए दिहाड़ी श्रमिकों के लिए अस्थायी शेड का निर्माण भी किया गया है। रोजाना रोजगार की तलाश में वहां सुबह सुबह इन्हें इंतजार करते देखा जा सकता है। जहां इतना सब कुछ हो, वहां चाय और गुटका नहीं हो, यह हो नहीं सकता। बस आप मान लीजिए, राहगीरों के आवागमन के लिए बना यह सर्विस रोड इन सेवाभावी महानुभावों की उपस्थिति के कारण, सुबह सवेरे ही, ट्रैफिक जाम का दृश्य उपस्थित कर देता है।।

एक बड़ी सी कार, कहीं से आकर रुकती है। भवन निर्माण के लिए श्रमिकों की आवश्यकता है। छंटनी और भाव ताव सड़क पर ही तय हो जाता है। एक झुंड जाता है, दूसरा झुंड उसकी जगह ले लेता है। किसका नसीब खुलेगा, इंतजार ही एकमात्र विकल्प है।

कोरोना के कहर के कारण पिछले कुछ समय से समय की गति रुक सी गई थी।

यह जमघट यूं ही नहीं है। बहुत पीड़ा है, बड़ा अभाव है, तुम नहीं समझोगे रमेश बाबू ! बच्चों के स्कूल के वाहन भी अब इन्हीं सड़कों पर दौड़ेंगे। आज का अमर पनघट से भले ही बच जाए, जमघट से नहीं बच सकता। बहुत हुआ ऑनलाइन, अब अमर, तेरी बस आ गई, इस्कूल चल ..!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ चैत्र पालवी… ☆ सुश्री उज्वला सुहास सहस्रबुद्धे ☆

सौ. उज्वला सुहास सहस्रबुद्धे

☆ चैत्र पालवी ☆ सुश्री उज्वला सुहास सहस्रबुद्धे ☆

 चैत्र पालवी खुलून आली,

वठलेल्या त्या झाडावरती!

ग्रीष्म झळांनी सुकून गेल्या,

करड्या पिवळ्या फांद्यांवरती!.

*

आकाशातून रवी ओकतो,

सहस्त्र किरणांनी ती आग!

प्रतीक्षेत त्या येईल कधी,

सृष्टीतील सृजनाला जाग !..

*

नभात दिसती चुकार ढग हे,

शामल शुभ्र न् विखुरलेले!

अंतर ते क्षणी भरून येईल,

जलथेंबांनी ओथंबलेले !..

*

एक दिवस अन् नक्कीच येईल

विंझणवारा घालीत सृष्टीवरी

तहानलेला भवताल सारा,

अधीर प्राशण्या जल अधरावरी!

*

शांत सजल हे रूपदेखणे,

सृष्टीस मिळण्या वाट पाहते!

चैत्र पालवी आतुरलेली,

गंधीत रंगीत फुलून येते !

© सुश्री उज्वला सुहास सहस्रबुद्धे

वारजे 

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ मारिया मॉन्टेसरी ☆ शालिनी जोशी ☆

शालिनी जोशी

? विविधा ?

☆ मारिया मॉन्टेसरी ☆ शालिनी जोशी

मारिया मॉन्टेसरी

 मॉन्टेसरी म्हटलं की आपल्यासमोर येते पहिलीच्या आधीची शाळा. हे एका व्यक्तीचे, स्त्रीचे आडनाव आहे हे सहसा कुणाला माहीत नसतं. मारिया मॉन्टेसरी इटलीतील ॲलेस्सॅड्रो आणि रेनिल्देला या दाम्पत्याची मुलगी होती. जन्म ३१ ऑगस्ट १८७०. वडील सरकारी नोकरीत आणि आई घरकाम करणारी. असे हे सुखी मध्यमवर्गीय कुटुंब होते. त्या काळात स्त्री शिक्षणाला स्थान नव्हतं. तरीही मारियाला नवीन काही शिकवावं अशी इच्छा तिच्या आईची होती. मुलींच्या शिक्षणात शिवणकाम, विणकाम यावर भर असे. तेथे बुद्धिमत्तेला वाव नव्हता. मुला मुलींच्या शाळा वेगवेगळ्या असत. शिक्षक सांगतील ते ऐकायचं आणि पाठ करायचं. ही घोकंपट्टी मारियाला कंटाळवाणी वाटे. तिला सुरुवातीला गणितात गती होती. पण मुलींसाठी ते अनावश्यक अशी समाजाची समजूत होती. तरीही शेवटी आईच्या प्रोत्साहनाने ती वैद्यकशास्त्राकडे वळली.

 उभ्या इटलीत कोण्या स्त्रीने या शास्त्राचा विचार केला नव्हता. वडिलांनाही पसंत नव्हतं. पण त्यानी विरोध केला नाही. अनेक जाचक चालीरीती सांभाळून मारियाने शिक्षणात प्रगती केली. उदाहरणार्थ वर्गातील सर्व मुलांनी आपापल्या जागेवर बसल्याशिवाय मारियाला वर्गात प्रवेश नव्हता. कारण पुरुषांना ओलांडून जाणं शिष्ट संमत नव्हतं. खोडसाळ मुलानी बसायला जागाच ठेवली नाही तर दोन तीन तास सुद्धा उभे राहावे लागे. पण मारीयाने जिद्द सोडली नाही. बालकांचा विशेष अभ्यास केला. तिच्या शेवटच्या वर्षीच्या भाषणाने सर्व भारावून गेले. मानसशास्त्राचा संशोधनात्मक प्रबंध सर्वमान्य झाला. तिला डॉक्टर पदवी बहाल करण्यात आली. इटलीतील पहिली महिला डॉक्टर ती ठरली. पुरुषांच्या साठी असलेल्या पदवी सर्टिफिकेट मध्ये खाडाखोड करून तिच्यासाठी सर्टिफिकेट तयार करावे लागले.

 मारिया देखण्या होत्या. काळेभोर गनदाट केस, नीटनेटका पोशाख, वागण्यात मार्दव, आकर्षक व्यक्तिमत्व, बुद्धिमत्ता आणि धाडसी स्वभाव यामुळे मारिया रस्त्याने निघाली की लोकांच्या नजरा तिच्यावर खिळत. समाजाने तिला डॉक्टर म्हणून मान्यता दिली. स्त्रियांच्या हक्काविषयी त्यांची भाषणे उत्स्फूर्त असत. त्यामुळे वृत्तपत्रांचा कुतुहुलाचा विषय झाली. बालरोग तज्ञ म्हणून कीर्ती वाढू लागली.

 मनोरुग्ण बालकांचे विशेष निरीक्षण त्यांनी केले. तेव्हा लक्षात आलं ही मुलं जेवण झाल्यावर जमिनीवर पडलेले अन्नकण शोधून खातात. यात त्यांचा खाणे हा हेतु नसून हाताने काही कृती करावी वाटते. ती मूर्ख नाहीत तर बुद्धीचा वापर करायची संधी त्यांना मिळत नव्हती. याशिवाय जंगलातील मुलगा, मुक व कर्णबधीर मुले, अविकसित मुले यावर त्यांनी विशेष अभ्यास केला. अशा मुलांसाठी वेगळी शिक्षण व्यवस्था असावी. नाहीतर ते गुन्हेगारी प्रवृत्तीच्या आहारी जातील. येथे शिक्षेचा उपयोग नाही. डॉक्टर आणि प्रशिक्षित शिक्षक हवेत. हा विचार लोकांना पटला. बालरोगतज्ञ, मानसशास्त्रज्ञ, मानवंशशास्त्र अभ्यासक, शिक्षणशास्त्र अभ्यासक अशी महिला डॉक्टर अशी त्यांची ओळख निर्माण झाली.

 स्त्रियांविषयी त्यांची मते स्पष्ट होती. स्त्रियांना दुय्यम ठरविण्याला त्यांचा विरोध होता. विवाह आणि मातृत्व स्त्रियांवरती लादू नये. ते त्यांनी स्वेच्छेने स्विकारावे. अतिरिक्त कामामुळे बायका अशक्त व कमकुवत होतात. त्यामुळे तशीच मुले जन्माला येतात. नव स्त्री ही शुद्ध सामाजिक पर्यावरण निर्माण करेल. तिथे युद्ध नसतील. गुन्हेगारी नसेल. न्यायव्यवस्थेची गरज पडणार नाही. असे त्या आर्जवून सांगत. दु:खाला तोंड देण्यासाठी धर्मादाय काम, अशी समाजाची धारणा बदलून दुःख निर्माण होणार नाही यासाठी विज्ञानाच्या साह्याने प्रतिबंधात्मक प्रयत्न व्हावे. रोग आजार दुरुस्त करण्यापेक्षा निर्माण होणार नाहीत असे प्रयत्न असावे. त्यामुळे समस्या निवारार्थ होणारा पैशाचा भार कमी होईल. असे त्यांचे ठाम मत होते. अशा प्रकारे स्त्रीवादी म्हणून इटलीत त्या ओळखल्या जाऊ लागल्या.

 अक्षम, मतिमंद मुलेही योग्य शिक्षणाने सर्वसामान्य मुलांच्या शाळेत जाऊ शकतात. हे त्यांनी सिद्ध करून दाखवले. त्यासाठी योग्य शैक्षणिक साधने आणि मुलांच्या पातळीवर येऊन मुलांत दडलेल्या माणसाला शोधणारे शिक्षक हवेत. शिक्षक हा मार्गदर्शक असावा. साधने कशी वापरावी याचे स्वातंत्र्य मुलांना असावे. यासाठी निरनिराळ्या आकाराचे, रंगाचे ठोकळे व अक्षरे हवीत. कृतिशील शिक्षणावर त्यांनी भर दिला. मुलांच्या वर्तनाला, शिस्त व स्वच्छतेला त्यांनी महत्त्व दिले. शारीरिक व्यायामासाठी साधने तयार केली. गैरवर्तनाला शिक्षा म्हणजे गप्प बसायला लावणे. बेघर, झोपडपट्टीतील रोगराईग्रस्त कुपोषित मुलांसाठीही अशा शाळांचा चांगला परिणाम दिसून आला. पुढे हीच पद्धत सामान्य मुलांसाठी उपयोगात आली. सर्व साहित्याने युक्त शाळा आणि शिक्षकाची केवळ निरीक्षकाची भूमिका, अशीही स्वयंशिक्षण पद्धत क्रांतिकारी ठरली. खेळण्याच्या मुक्त आनंदातून प्रशिक्षण अशी ही डॉक्टर मॉन्टेसरी शिक्षण पद्धती एक चळवळ झाली. इंग्लंड, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, अर्जेंटिना, चीन, रशिया येथेही अशा शाळा निघाल्या. डॉक्टर मारियाने वैद्यकीय व्यवसाय बंद केला. सर्व देशात भेटी व व्याख्याने होऊ लागली. ‘मॉन्टेसरी मेथड’ नावाचे पुस्तक निघाले. प्रशिक्षण वर्ग व त्यातून मॉन्टेसरी महाविद्यालयही इटलीत निघालं.

 भारतातही ॲनी बेझंट यांनी १९१४ मध्ये पहिली मॉन्टेसरी शाळा काढली. रवींद्रनाथ टागोर व डॉक्टर मारिया यांचा पत्र व्यवहार असे. महात्मा गांधींनी इंग्लंडला त्यांची भेट घेतली होती. गिजूभाई बघेका नावाचे वकील होते. त्यांनाही पद्धत जीवन दृष्टी वाटली. त्यांनी ताराबाई मोडक यांच्या मदतीने ही पद्धत गुजराथ, सौराष्ट्र मुंबई येथे वाढवली. त्यांच्या निमंत्रणाने डॉक्टर मारिया भारतात आल्या. येथे त्या सात वर्षे राहिल्या. सर्व देशात मान्यता मिळत असूनही त्यांचे पाय जमिनीवर होते. १९४६ मध्ये त्या परत भारतात आल्या. ताराबाई मोडक यांनी बालशिक्षण नगर भरवले. त्या परिषदेच्या उद्घाटनासाठी त्या आल्या होत्या. कमलाबाई काकोडकर, अनुताई वाघ यांनी या पद्धतीचा अवलंब केला. अजूनही ही पद्धत सुरू आहे. काळानुसार नवीन बदल झाले असतील.

 अशा प्रकारे इटलीची मारिया कार्याच्या वैश्विकतेमुळे सर्व जगाची झाली. अशा या स्त्री शक्तीला सलाम! १९५२ मध्ये वयाच्या ८१ व्या वर्षी त्यांची प्राणज्योत मालवली. पण मॉन्टेसरी रूपाने अमर झाल्या.

©  शालिनी जोशी

संपर्क – फ्लेट न .3 .राधाप्रिया  टेरेसेस, समर्थपथ, प्रतिज्ञा मंगल कार्यालयाजवळ, कर्वेनगर, पुणे, 411052.

मोबाईल नं.—9850909383

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ.मंजुषा मुळे/सौ.गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – जीवनरंग ☆ व्यथा तिची, कथा माझी… – लेखिका : प्रतिभा परांजपे ☆ प्रस्तुती – सौ. मीनल केळकर ☆

सौ. मीनल केळकर

🌸 जीवनरंग 🌸

☆ व्यथा तिची, कथा माझी… – लेखिका : प्रतिभा परांजपे ☆ प्रस्तुती – सौ. मीनल केळकर ☆

सुमनने नाश्ता टेबलावर ठेवून मुलांना आवाज दिला.

कालच मुलांची परीक्षा संपली होती त्यामुळे घरी सगळं रिलॅक्स्ड झालं होतं.

मागचे दहा-बारा दिवस मुलांच्या अभ्यासापुढे सुमनला काही सुचत नव्हतं. घर काम पटापट आवरून ती मुलांना अभ्यासाला बसवी. आता घराकडे लक्ष द्यायला हवे आहे, उन्हाळा ही सुरू होतो आहे.

गरम कपडे धुवायला काढून ते धुवून सुमन बाल्कनीत वाळत टाकायला गेली.

बाल्कनीत खाली खूपसा कचरा काड्या, पिसं पडलेली होती. तिने कपडे वाळत टाकून कचरा गोळा करून टाकला.

उद्यापासून एक एक खोली आवरायची असं ठरवून कामाला लागली.

दुपारी जरा झोपली तो चिवचिवाटाने तिला जाग आली.

 

काय बाई कल -कल आहे म्हणत ती बाल्कनीत आली. खाली परत कचरा पडला होता. सुमनने वर पाहिलं, बाल्कनीत एक विंड चाईम लावलेलं होतं त्यावर चिमणीने घरटे बांधले होते. “आता इथे ही घरटं ! बाई -बाई आणखीन कुठे जागा नाही का गं तुला मिळाली??” सुमन चिमणीकडे पहात बडबडली.

 

अचानक चिमणी खिडकीत येऊन बसली. सुमनला वाटले चिमणी तिच्याकडे पाहून बोलतिये.

“मग कुठे बांधू?? एक तरी झाड सोडल कां तुम्ही आमच्यासाठी? तुम्ही आमच्या जागेवर आपलं घर बांधलं, मग आता आम्ही तुमच्या घरात घरट बांधतोय.

अचानक घर मोडणं आणि त्यानंतर कुठे जायचं हे माहित नसल्यावर काय स्थिती होते हे तुम्हा माणसांना कसे समजणार??”

चिमणीचे बोलणे ऐकून सुमनच्या डोळ्यासमोर तिचे चाळीतले घर आले.

लग्न होऊन ती उदय बरोबर चाळीतल्या घरात आली होती. वर्षभरात अंकिताचा जन्म झाला. एक दिवस कुजबुज सुरू झाली येथे हायवे बनणार आहे तेव्हा त्यांची चाळ मोडून इथून हायवेचा पूल बनणार. तेव्हा ही जागा रिकामी करायची ऑर्डर आहे असे ऐकायला येत होते. मालकांनी आम्ही प्रयत्न करतो असे खोटे आश्वासन दिले. पण अचानक एक दिवस बुलडोजर घेऊन कामगार आले आणि एकच गोंधळ उडाला. कसेबसे सामान बाहेर काढून लोक बाहेर येऊन बसले.

 

उदयच्याएका मित्राने एका खोलीचे घर रिकामे असल्याचे सांगितले. भाडं जरा जास्त होतं, पण मागचा पुढचा विचार न करता उदयने ते घर घेतले. पैशांसाठी तिने सोन्याच्या बांगड्याही विकल्या.

पुढे उज्वल झाला. नशीब पालटले. उदयला बढती मिळाली आणि त्यांनी हा दोन बेडरूमचा फ्लॅट विकत घेतला. फ्लॅट नवीनच बांधलेले होते.

रस्ता पक्का करण्यासाठी बरीच झाडे कापली गेली होती. हे सर्व आठवून सुमनला तो दिवस आठवला आणि चिमणीची व्यथा जाणवली.

मुलांचा रिझल्ट लागला दोघे छान पास झाली म्हणून दोन दिवसासाठी चौघे गावी देवदर्शनाला जाऊन परत आली.

 

इकडे आता चिमणा चिमणीच्या घरट्यात चिवचिवाट वाढलेला होता. अंड्यांतून पिल्लं बाहेर आली होती. चिमणी चिमणा पोरांसाठी किडे, धान्य गोळा करून आणत होती.

 

सुमनही एका ताटलीत भात, पोळीचा चुरा ठेवायची. हळूहळू बाळ मोठे होत गेली.

काही दिवसांनी चिमणबाळे फुर्र– फुर्र उडू ही लागली आणि अचानक त्यांचं येणं बंद झालं.

चिमणी ही फारशी दिसत नव्हती.

आता सुमनला दुपार रिकामी रिकामी वाटू लागली.

चिमणी घर सोडून गेली वाटतं. ती विचार करू लागली. अचानक तिला चिऊ चिऊ चा आवाज आला. वाटलं चिमणी तिला बाय-बाय करायला आली आहे.

 

“पुढच्या वर्षी इथेच घरटं बांधायला ये हं!” सुमन चिमणीला म्हणाली.

“मी असेल कि नाही माहित नाही पण ही माझी बाळ त्यांच काय होणार??”

सुमनला जाणवले चिमणीला काय सांगायचे आहे! तिने मनाशी ठरवले बाल्कनीत कुंडीत लावलेले वडाचे व आंब्याचे रोप समोरच्या पार्कमध्ये नेऊन लावूया. चिमणीच्या पुढच्या पिढ्यांसाठी तरी घराची सोय होईल.

लेखिका : प्रतिभा परांजपे

प्रस्तुती : मीनल केळकर

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ टीका : एक अदृश्य मार्गदर्शक – –  ☆ सुश्री सुरेखा चिखलकर ☆

सुश्री सुरेखा चिखलकर

? मनमंजुषेतून ?

☆ टीका : एक अदृश्य मार्गदर्शक – –  ☆ सुश्री सुरेखा चिखलकर

जेव्हा कोणी आपल्यावर टीका करतं, तेव्हा सुरुवातीला मनाला थोडं वाईट वाटणं स्वाभाविक आहे. पण याच टीकेकडे जर आपण वेगळ्या नजरेने पाहिलं, तर ती आपल्याला खचवण्यासाठी नाही तर सावरण्यासाठी आलेली असते हे लक्षात येतं.

शांतपणे विचार केला तर जाणवेल की ज्याच्याकडे काहीतरी विशेष आहे जो प्रवाहाच्या विरुद्ध पोहण्याचा प्रयत्न करतोय त्याच्यावरच लोक बोट उचलतात. संथ पाण्यात कोणी खडा मारत नाही खडा तिथेच मारला जातो जिथे काहीतरी हालचाल होत असते. त्यामुळे टीका होत असेल. तर समजावं की आपली दखल घेतली जातेय आणि आपण कुठेतरी प्रगतीच्या वाटेवर आहोत.

कधीकधी हीच टीका आपल्याला आरसा दाखवण्याचं काम करते. आपल्यातल्या उणिवा शोधून त्या सुधारण्याची एक सुवर्णसंधीच जणू समोर उभी असते. जर आपण टीकाकारांच्या शब्दांतून राग बाजूला काढून फक्त त्यातला ‘सार ‘ घेतला तर आपल्याला स्वतःला घडवणं अधिक सोपं जातं.

– – जगातील मोठ्या माणसांचा इतिहास पाहिला तर एक गोष्ट प्रकर्षाने जाणवते ती म्हणजे त्यांना मिळालेली निंदा आणि टीका त्यांनी कधीच मनाला लावून घेतली नाही तर ती पोटात पचवून स्वतःच्या ध्येयाकडे जाण्यासाठी इंधन म्हणून वापरली.

सर्वात महत्त्वाचं म्हणजे टीकाकारांना शब्दांनी उत्तर देण्यापेक्षा आपल्या शांततेने आणि कर्तृत्वाने उत्तर देणं जास्त प्रभावी असतं. जेव्हा आपण टीकेला उत्तर न देता आपल्या कामात अधिक झोकून देतो तेव्हा तीच टीका आपल्यासाठी एक ‘चॅलेंज ‘बनून उभी राहते. “ तुला हे जमणार नाही ” असं म्हणणाऱ्यांच्या समोर ‘ हे मी करून दाखवलंय ‘ असं सिद्ध करणं हीच खरी विजयाची पावती असते.

टीका ही धार लावणाऱ्या दगडासारखी आहे तो दगड तुम्हाला जखम करणार की तुमच्या व्यक्तिमत्त्वाला पैलू पाडणार. हे सर्वस्वी तुमच्या दृष्टिकोनावर अवलंबून आहे.

– – त्यामुळे इथून पुढे जेव्हा कोणी तुमच्यावर टीका करेल तेव्हा डगमगून जाऊ नका. उलट मनात म्हणा बरं झालं मला अजून चांगलं व्हायची प्रेरणा मिळाली ही वृत्ती एकदा अंगी बाणली की टीका तुमचं खच्चीकरण करू शकत नाही तर तुम्हाला अधिक कणखर आणि प्रगल्भ बनवते.

– – आयुष्याच्या या खेळात टीकाकार हे तुमचे शत्रू नसून तुम्हाला खेळात टिकून राहण्यासाठी आणि अधिक जोमाने खेळण्यासाठी प्रोत्साहन देणारे अदृश्य मार्गदर्शकच असतात.

मित्रांनो काळजी घ्या…

 © सुरेखा चिखलकर

 

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ “महिलांकडून शिकण्यासारखे…” ☆ श्री सुधीर करंदीकर ☆

श्री सुधीर करंदीकर

? मनमंजुषेतून ?

☆ “महिलांकडून शिकण्यासारखे…” ☆ श्री सुधीर करंदीकर

महिलांकडून खरंच खूप काही शिकण्यासारखे असते…

८ मार्चला आपण सगळ्यांनीच जागतिक महिला दिन खूप उत्साहात आणि आनंदाने साजरा केला.

महिलांकडून खूप काही शिकण्यासारखे असते, त्यांचे खूप काही गुण घेण्यासारखे असतात, हे आपण सगळे जाणतोच आणि याचा आपण अनुभव पण घेत असतो (मी तरी नक्कीच घेत असतो). देवाने पण आई, बहीण, बायको, मुलगी, आजी, पणजी, आत्या, मावशी, हे सगळे छान छान रोल पण बायकांकडेच दिले आहेत.

बायकांचा एक आगळावेगळा आणि चांगला गुण म्हणजे – 

बायका एकत्र जमल्या, कि, मनमोकळेपणाने खुल्या दिलाने फूल व्हॉल्युम मधे गप्पा मारणे आणि त्या पण फुल व्हॉल्युम मध्ये हसत हसत. यामुळे त्यांचं मन नेहमीच एकदम मोकळं आणि नितळ असतं. आणि तब्येत एकदम मस्त असते. 

परवा असंच मित्रांबरोबर या विषयावर गप्पा मारताना माझी एक जुनी आठवण ताजी झाली.

– – रिटायर झाल्यानंतर आम्ही दोघं मुलीकडे अमेरिकेला San Jose येथे गेलो होतो. अमेरिकेतली सगळी महत्त्वाची ठिकाणे बघण्याकरता तिने आम्हाला संपूर्ण ट्रॅव्हल ची बाय एअर / बाय रोड बुकिंग करून दिली होती, साईट सिईंग करण्याकरता तिथल्या एजन्सीची बुकिंग करून दिली होती, प्रत्येक ठिकाणी राहण्याकरता हॉटेल बुकिंग करून दिली होते, आणि बहुतेक ठिकाणी तिच्या ओळखीचे मित्र/ मैत्रिणी होते, त्यांचे फोन नंबर दिले होते. आणि या सगळ्यामुळे अमेरिकेसारखा अनोळखी देश आम्ही एकदम मजेत बघितला.

एकेक ठिकाण बघत बघत आमचा प्रवास छान सुरू होता.

एक महत्वाचे ठिकाण होते, नायगरा फॉल. जवळच्या एअरपोर्ट पर्यंत आमचे विमानाचे बुकिंग होते व तिथून साईट सिईंग करणारी टुरिस्ट बस पकडायची होती.

एअरपोर्टहून आम्ही टुरिस्ट बसच्या स्टार्टिंग पॉइंटला वेळेवर जाऊन पोहोचलो. भारतातून पुण्याची एक टुरिस्ट कंपनी लेडीजचा ग्रुप घेऊन तिथे आली होती. निरनिराळ्या देशातली पण काही स्त्री पुरुष मंडळी आली होती. बरोबर वेळेवर बस हजर झाली. दिलेल्या सीट नंबरप्रमाणे आम्ही सगळे बसमध्ये चढलो. तिथले लोकल गाईड पण जॉईन झाले. आणि नायगरा फॉलकडे आमचा प्रवास सुरु झाला.

गाईडनी सगळ्या प्रवाशांना कानाला लावायला इयरफोन दिले आणि स्वतः त्यांच्याकडे इयरफोन आणि माईक हे दोन्ही होते. गाईड जे माईक मध्ये जे बोलतील / ज्या सूचना देतील, ते सगळ्यांना तुम्ही जवळपास कुठेही हिंडत फिरत असाल तरी ऐकू येणार अशी कम्युनिकेशनची व्यवस्था होती. काही अंतर अलीकडेच एका ठिकाणी बस थांबली. शॉर्ट ब्रेकमध्ये चहापाणी – कोल्ड्रिंग झाले. नंतर गाईडने थोडे प्रास्ताविक केले.

गाईड : मी तुम्हाला नायगरा फॉलविषयी सगळी माहिती इथेच सांगणार आहे. कारण तिथे इतक्या उंचीवरुन आणि इतक्या मोठ्या प्रमाणात पाणी खाली पडतं असते, कि त्याच्या आवाजात जवळून दोन-तीन जेट विमाने गेली, तरी फॉलच्या आवाजामुळे विमानांचा आवाज ऐकू येत नाही. गाईडने नायगरा फॉल ची सगळी माहिती सांगितली, काही प्रश्नोत्तरे झाली, आणि आमची बस नायगरा फॉल कडे निघाली.

फॉल बघण्यासाठी आणि तो आवाज ऐकण्यासाठी आम्ही जास्तच उत्सुक होतो. तिथे पोचलो, नायगरा फॉल चे दृश्य एकदमच अप्रतिम आहे. मी व्हिडिओ काढत होतो पण फॉलचा म्हणावा तेवढा मोठा आवाज येत नव्हता. तेवढ्यात काही परदेशी प्रवाशांनी गाईडला हाताने खुणा करून सुचवले, की तुम्ही म्हणता तसा फॉलचा आवाज ऐकू येत नाहीये. गाईड च्या पण हे लक्षात आले आणि त्यांची ट्युब पेटली.

त्यानी कमरेला लावलेल्या माईक वरून सगळ्यांचे लक्ष आपल्याकडे वेधले आणि अनाउन्समेंट केली. गाईड चक्क तुटक् – तुटक् मराठीमधे बोलत ह़ोते..

गाईड : मी सर्व भारतीय भगिनींना सौजन्य पूर्ण विनंती करतो कि, आपण इथे आहोत, तोपर्यंत त्यांनी आपापसातील गप्पा आणि मोठमोठ्याने हसणे थांबवावे, आणि शांतता पाळावी. भारतीयांच्या भाषेत तुम्ही तोंडावर बोट ठेवावे, फक्त कान आणि डोळे पूर्ण उघडे ठेवून या स्थळाचा आनंद घ्यावा आणि आपल्या सहकाऱ्यांना पण तो मनसोक्त घेऊ द्यावा.

गाईड काय बोलले हे परदेशी माणसांना समजले नाही, पण गाईडच्या बोलण्याचा अपेक्षित परिणाम झाला हे समजले. फॉलचा खरा आवाज आता ऐकू यायला लागला.

फॉलचा आवाज ऐकून सगळ्यांनी जोरदार टाळ्या वाजवून आपला आनंद व्यक्त केला. सगळ्यांनी व्हिडिओ शूटिंग केले. दिलेली वेळ संपल्यानंतर गाईडने सगळ्यांना परत फिरण्याची खूण केली. सगळे बस जवळ जमा झालो. गाईडने अनाउन्समेंट केली – आता स्त्रियांनी तोंडावरचे बोट काढायला हरकत नाही…

© श्री सुधीर करंदीकर

मो. 9225631100 – ईमेल – srkarandikar@gmail. com

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक २७ आणि २८ ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

श्री विश्वास देशपांडे

? इंद्रधनुष्य ?

☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक २७ आणि २८ ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

श्लोक क्र. २७ – – – 

भवाच्या भये काय भीतोस लंडी ।

धरी रे मना धीर धाकासि सांडी ।

रघुनायका सारिखा स्वामि शीरी ।

नुपेक्षी कदा कोपल्या दंडधारी ।।२७।।

अर्थ : हे मना, एखाद्या भित्र्या माणसासारखा तू प्रपंचाला का घाबरतोस? भीती सोडून धैर्य धारण कर. कारण तुझ्या पाठीशी रघुनायकासारखा स्वामी असताना घाबरण्याचे काहीच कारण नाही. अगदी यमाचा कोप झाला तरी तो तुला कधीही सोडणार नाही, तुझी उपेक्षा करणार नाही.

(भव – प्रपंच, लंडी – भित्रा/कमजोर मनाचा, दंडधारी – यम)

विवेचन : मानवी जीवन हे अनेक अनिश्चिततांनी भरलेले आहे. उद्या काय होईल याची चिंता, नोकरीची काळजी, मुलाबाळांचे भविष्य, आरोग्य, आर्थिक स्थिती अशा असंख्य विचारांनी मन व्यापलेले असते. त्यामुळे माणूस आतून अस्वस्थ आणि भयग्रस्त होतो.

प्रपंचाची काळजी वाटणे स्वाभाविक आहे, पण त्या भीतीने खचून जाणे योग्य नाही. म्हणून समर्थ या ठिकाणी आपल्या मनाला धीर देतात…

“धरी रे मना धीर, धाकासि सांडी”

… हे मना, तू भीती झटकून टाक आणि धैर्याने उभा रहा.

आपले जीवन हे जर एक रणांगण मानले, तर या रणांगणावर शूरवीराप्रमाणे लढणे आवश्यक आहे. हातात तलवार किंवा बंदूक आहे पण हात पाय कापताहेत, तर लढाई कशी लढणार ? शत्रूसाठी मग तुम्ही सोपे लक्ष्य असाल. मनात भीती असेल तर विजय शक्य नाही.

संकटेही अशीच असतात. आपण त्यांना जेवढे घाबरतो, तेवढी ती अधिक मोठी वाटतात. धैर्याने सामना केला, तर ती हळूहळू नाहीशी होतात.

या संदर्भात स्वामी विवेकानंद यांच्या बालपणातील प्रसंग अत्यंत बोलका आहे. त्यांचे बालपणीचे नाव नरेंद्र. ते अत्यंत अवखळ आणि खोडकर होते. ते झाडावर चढत. आईला असे वाटले की झाडावर चढून हा खाली पडला तर त्याला इजा होईल. त्यामुळे त्यांच्या आईने त्यांना झाडावर चढू नकोस. तिथे ब्रह्मराक्षस राहतो असे सांगितले. पण नरेंद्राने आईला विचारले, “ब्रह्मराक्षस ? कुठे आहे तो मला त्याला पाहायचेच आहे. ?” ब्रह्मराक्षस प्रत्यक्षात नव्हताच. आपली मनच अशा गोष्टींची निर्मिती करते. म्हणूनच भित्यापाठी ब्रह्मराक्षस असे आपण म्हणतो.

समर्थ पुढे आपल्याला एक मोठा आधार देतात…

… रघुनायकासारखा स्वामी आपल्या पाठीशी आहे.

राम म्हणजे केवळ एक ऐतिहासिक किंवा पौराणिक पात्र नाही, तर तो धैर्य, धर्मनिष्ठा आणि संरक्षणाचे प्रतीक आहे. वाल्यासारख्या बलाढ्याला संपवणारा, रावणासारख्या अहंकारी व्यक्तीचा नाश करणारा हा राम सज्जनांचा त्राता आहे. म्हणूनच समर्थ म्हणतात 

प्रत्यक्ष यम जरी कोपला, तरी राम तुला कधीही सोडणार नाही. तुझी उपेक्षा करणार नाही. याचा अर्थ असा नाही की की श्रीरामांना शरण जाण्यामुळे आपला मृत्यू टळणार आहे. मृत्यू तर अटळ आहे परंतु श्रीराम आपल्या पाठीशी आहेत हा विश्वास जेव्हा आपल्या मनात निर्माण होतो तेव्हा मृत्यूची भीती कमी होते. संकटांना सामोरे जाण्याचे धैर्य मिळते.

शेवटी, भय, आनंदी आणि धैर्याचे जीवन जगण्यासाठी समर्थांचा स्पष्ट संदेश आहे की श्रीरामावर (भगवंतावर) श्रद्धा ठेवा, धैर्य धरा आणि निर्भयपणे जगायला शिका. श्रीराम तुमच्या पाठीशी आहेतच.

स्वसंवाद :: 

  • मी माझ्या आयुष्यातील समस्यांना धैर्याने सामोरे जातो का, की त्यांना घाबरून जातो?
  • माझी भीती वास्तव आहे की ती माझ्या मनाने निर्माण केली आहे ?
  • संकटांच्या वेळी मला ईश्वरावर खरोखर विश्वास वाटतो का?
  • माझ्या मनातील श्रद्धा आणि धैर्य वाढवण्यासाठी मी काही प्रयत्न करतो का?

– – – – 

श्लोक क्र. २८ – – – 

दिनानाथ हा राम कोदंडधारी |

पुढे देखता काळ पोटी थरारी |

जना वाक्य नेमस्त हे सत्य मानी |

नुपेक्षी कदा राम दासाभिमानी |२८|

अर्थ: श्रीराम हा दीनांचा कैवारी/रक्षणकर्ता आहे. धनुर्धारी रामाला समोर पाहिल्यानंतर प्रत्यक्ष काळ म्हणजे यमराजाला देखील धडकी भरते. हे वाक्य सत्य समजा की भगवंत आपल्या भक्ताचा अभिमान बाळगणारा आणि त्याचे रक्षण करणारा आहे. तो त्याची कधीही उपेक्षा करत नाही.

(कोदंडधारी म्हणजे धनुष्य धारण केलेला, वाक्य – वचन, नेमस्त – निश्चितपणे)

विवेचन : मागील श्लोकात समर्थ आपल्याला सांगतात की भवाच्या भये काय भीतोस लंडी म्हणजे प्रपंचाच्या भीतीने हे मानवा तू का घाबरतोस ? या श्लोकात ते भगवंत आपला रक्षणकर्ता कसा आहे आणि तो आपल्या भक्तांची उपेक्षा कशी करीत नाही हे समर्थ निरनिराळ्या प्रकारे आपल्या मनावर बिंबवतात. त्यासाठीच भगवंत आपल्या दासाची/भक्ताची उपेक्षा करीत नाही हे सांगणारे (नुपेक्षी कदा राम दासाभिमानी)हे पालुपद असलेले बरेच श्लोक आहेत.

मनुष्य अनेक अर्थाने दुबळा किंवा परावलंबी असतो. संकटप्रसंगी त्याला कोणाचा तरी आधार हवा असतो. कधी कधी हा आधार तो आपल्या नातलगांमध्ये किंवा मित्रांमध्ये शोधत असतो. परंतु या सगळ्याच गोष्टी बेभरवशाच्या असतात. परिस्थिती फिरली की ही मंडळी सुद्धा पाठ फिरवतात. पैसा सुद्धा सर्वप्रसंगी उपयोगी पडेलच असे नाही. म्हणून संत आपल्याला कळकळीने सांगतात की आधार हा एकमेव परमेश्वराचाच असला पाहिजे कारण सर्व परिस्थितीत तोच आपल्याला साथ देईल. तो दीनानाथ आहे.

आपल्याला नुसता कोणाचातरी आधार आहे ही जाणीव सुद्धा खूप मानसिक बळ देणारी असते. स्वामी समर्थांच्या फोटोखाली, ” भिऊ नकोस मी तुझ्या पाठीशी आहे” असे वचन लिहिलेले असते. हे वचन लाखो भक्तांना जगण्याची शक्ती देते. स्वामी प्रत्यक्ष आपल्या पाठीशी आहेत या भावनेतून भक्त कठीण प्रसंगातूनही तरुन जातो. गीतेतील नवव्या अध्यायात भगवान श्रीकृष्ण म्हणतात – – 

अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।

तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्।।

– – जो भक्त निष्ठेने आणि माझ्यावर श्रद्धा ठेवून माझी उपासना करील त्याचे मी रक्षण करतो.

आजकाल बरीच शिकलेली मंडळी माझा देवावर विश्वास नाही असे म्हणत असतात आणि त्याचे निरनिराळ्या प्रकारे समर्थन करीत असतात. आपण आस्तिक म्हणून जगायचे की नास्तिक म्हणून जगायचे हा ज्याच्या त्याचा प्रश्न आहे. परंतु अशा मंडळींनी आस्तिक लोकांचा बुद्धिभेद करून त्यांच्या जगण्याचा आधार काढून घेऊ नये. ईश्वराला विज्ञानाच्या कसोटीवर अनुभवता येत नाही. त्याची अनुभूती श्रद्धेच्या कसोटीवर घेता येते ही गोष्ट त्यांनी लक्षात घ्यावी. परमेश्वराची अनुभूती येण्यासाठी त्याच्यावर दृढ श्रद्धा असावी लागते, निष्ठा असावी लागते. त्या भावनेने जोपर्यंत आपण त्याची भक्ती करीत नाही तोपर्यंत त्याचा अनुभव येणार नाही.

समर्थांना प्रिय असलेला आणि त्यांचे आराध्य दैवत असलेला राम हा कोदंडधारी म्हणजे धनुष्य धारण केलेला आहे. त्याच्या नुसत्या धनुष्याच्या टणत्काराने काळ देखील थरारतो. तो दीनांचा, दुःखितांचा रक्षण करणारा आहे. तो आपल्या भक्तांची कधीही उपेक्षा करीत नाही. फक्त आपली त्याच्यावर दृढ श्रद्धा हवी.

संकटातून परमेश्वर आपले रक्षण करतो असे समर्थ जे म्हणतात त्याचा अर्थ संकटांशी सामना करण्याची शक्ती तो आपल्याला देतो आणि त्याच्या कृपेनेच हा भवसागर आपण तरुन जातो असा आहे. तेव्हा हे मना, तू अन्य सगळे आधार सोडून केवळ एका रामावर श्रद्धा ठेव. तोच तुझे कल्याण करील. जेव्हा आपल्याला आतून जाणवते की एक दिव्यशक्ती आपल्या सोबत आहे, तेव्हा चिंता, राग, भविष्याची भीती यासारख्या गोष्टी आपोआपच कमी होतात. परमेश्वर आपल्या हृदयात आहे, आपल्याजवळ आहे ही अनुभूती आली की माणूस कोणत्याही संकटांना सहजपणे तोंड देऊ शकतो.

स्वसंवाद :: 

१) मी खरोखरच परमेश्वराला अंतिम आधार मानतो का ? की पैसा, मित्र नातेवाईक हेच अंतिम प्रसंगी उपयोगी पडतील असे मला वाटते ?

२) संकटसमयी देवावरील माझा विश्वास डळमळतो का की अधिक दृढ होतो? 

३) “राम दासाभिमानी आहे” या गोष्टीवर माझी श्रद्धा आहे का ? 

४) मी परमेश्वराला केवळ सुखात आठवतो की दुःखातही त्याच्यावर भार टाकतो ? (क्रमशः)

– क्रमशः श्लोक २७ आणि २८.

© श्री विश्वास देशपांडे

चाळीसगाव

प्रतिक्रियेसाठी ९४०३७४९९३२

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ Contact आणि Connection – – –  – माहिती संग्राहक : अज्ञात ☆ प्रस्तुती – श्री अमोल अनंत केळकर ☆

श्री अमोल अनंत केळकर

? इंद्रधनुष्य ?

Contact आणि Connection – – – – माहिती संग्राहक : अज्ञात ☆ प्रस्तुती – श्री अमोल अनंत केळकर

Contact आणि Connection मध्ये नेमका काय फरक…?

घटना न्यूयार्कमधील आहे. एका भारतीय साधूचे तिथे व्याख्यान झाले.

त्यानंतर पत्रकारांनी त्यांना गाठले.

त्यातील एकाने साधूला विचारलं,

“साधू महाराज, तुम्ही आताच्या व्याख्यानात संपर्क (Contact) आणि लगाव (Connection) यावर बोलला.

पण ते गोंधळात टाकणार आहे. या दोन्हीमध्ये फरक काय ?”

 

साधुने मंद स्मित केले अन उत्तर देण्याऐवजी वेगळेच प्रश्न त्यांनी त्या पत्रकाराला विचारणे सुरु केले.

साधू : “तुम्ही न्यूयार्कचे रहिवासी का ?”

पत्रकार : “येस !! का हो ?”

साधू : “घरी कोण कोण असत?”

आपल्या प्रश्नाचे उत्तर टाळण्यासाठी साधूबाबा असं काहीतरी वेगळं विचारत आहेत असं त्या पत्रकाराला वाटलं… कारण त्याचा प्रश्न सार्वजनिक होता अन साधू तर खाजगी काहीतरी विचारत होते.

 – – तरी मूळ प्रश्नाचे “उत्तर” मिळण्याच्या आशेने तो पत्रकार उत्तर देत गेला.

तो म्हणाला : “माझी आई आता नाहीये. वडील व आम्ही तिघे भाऊ बहीण ! सगळ्यांची लग्न झाली आहेत. सेपरेट बंगले असून सर्व सेटल आहेत. “

साधू : “तुम्ही तुमच्या वडिलांशी बोलत असता का ?”

(आता मात्र त्या पत्रकाराला थोडा राग यायला लागला.)

साधू : “तुमच्या वडिलांशी शेवटचे तुम्ही कधी बोलला ? काही आठवतंय का ?”

पत्रकाराने राग आवरत सांगितलं : “बहुतेक एक महिना झाला असावा.

साधू : “तुमच्या बहीण भावाशी नेहमी भेटीगाठी करता का ? एक कुटुंबीय म्हणून शेवटचे तुम्ही कधी एकत्र भेटले?”

(आता पत्रकाराच्या कपाळावर घाम यायला लागला, की मुलाखत कोण कुणाची घेतेय?)

तरी त्याने उत्तर दिले : “गेल्या वर्षीच्या ख्रिसमसमध्ये भेटलो”

साधू : “त्यावेळी किती दिवस एकत्र होता?”

पत्रकार (हळवा होत) : “तीन दिवस होतो”

साधू : “तुम्ही बहीण भावांनी त्या काळात किती वेळ वडिलांच्या अगदी जवळ बसून घालवला ?”

(पत्रकार आता थोडा लाजिरवाणा होऊन, मान खाली घालून कागदावर काहीतरी रेघोट्या मारत बसला.)

साधू : “तुम्ही तुमच्या वडिलांसोबत नाश्ता, दुपारचं जेवण किंवा रात्रीचे जेवण केले का ? वडिलांना विचारलं का ? की कसे आहात? आईच्या निधनानंतर ते एकटे जगत होते तर वेळ कसा घालवला?”

– – (असं म्हणत त्या साधूने पत्रकाराला आपुलकीने जवळ घेतलं).

साधू : “बेटा, नाराज होऊ नको, लाजिरवाणा पण होऊ नको. तुला असं नकळत दुखावल्याबद्दल उलट मी माफी मागतो. पण तुझ्या मूळ प्रश्नाचे उत्तर यात होते… 

… तू तुझ्या वडिलांच्या फक्त Contact मध्ये आहेस. मात्र तुझं त्यांच्याशी कोणतेही Connection नाहीये….. You are not connected to him. आणि वडील संपर्कात असणं वेगळं अन त्यांच्याशी “लगाव” असणं वेगळं. कारण Connection हे नेहमी आत्म्याचे आत्म्याशी होत असते.

एकत्र बसणे, भोजन सहवास, एकमेकांची काळजी घेणं, डोळ्यांनी संपर्कात नव्हे तर डोळ्याची भाषा ओळखून त्यानुसार प्रतिसाद देणे, आपुलकीचा स्पर्श, हात हातात घेणं… हे सगळं Connection मध्ये येत. Contact मध्ये नाही…

– – तुम्ही तुमची भावंडं, वडील यांच्या Contact मध्ये आहात पण कोणतेच Connection आपसात नाही. ”

आता पत्रकाराच्या डोळ्यात पाणी आलं.

एक चांगला धडा गिरवून दिल्याबद्दल आभार मानून, पत्रकार त्यांना नमस्कार करून निघाला.

आज आपल्या भोवताली बहुतेक असंच दिसतयं… 

… आपण आपले सख्खे नातेवाईक, आपले मित्र, आपले शेजारी, सहकारी, समाज… सर्व फक्त contact मधे ठेवतो आणी गरज पडली की लगेच connection जोडतो…

सर्व एकमेकांच्या Contact मध्ये आहेत पण कुणाशी Connection (लगाव असा) काही नाही…

कसला संवाद नाही, कसल्या चर्चा नाहीत, सगळे स्वमग्न झालेत… !

– – – आपण वरचेवर बदलत चाललोय… हेच खरं आहे.. !

इतक्या वर्षाचे आपले संस्कार, आईवडील गुरुजींनी शिकवलेले ते सगळं विसरलं जातंय…

कुणाला जवळ करायचं, कधी जवळ करायचं, हे चांगलच समजायला लागलयं…

प्राधान्य कशाला द्यायचं हा भावनिक व्यवहार आपण चांगलाच अंगीकारला आहे…

गरज पडेल तेव्हा बघू ही वृत्ती आपण चांगलीच जोपासली आहे…

वाटलं तर प्रतिसाद द्यायचा नाहीतर मोबाईल सायलेंटवर होता म्हणून सोयीचं व ठेवणीतलं ऊत्तर तयार ठेवायचं… !

– – दाहक असलं… तरी सत्य हेच आहे… 

संपर्क, संवाद वाढवणं, एकमेकांना समजून घेणं, जाणून घेणं म्हणजेच connection.. 

वरील घटनेतील “साधू” म्हणजे दुसरे तिसरे कोणी नसून ते आपले होते… * स्वामी विवेकानंद. * 

 

माहिती संग्राहक : अज्ञात 

प्रस्तुति : श्री अमोल केळकर 

बेलापूर, नवी मुंबई, मो ९८१९८३०७७९

poetrymazi.blogspot.in, kelkaramol.blogspot.com

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ.मंजुषा मुळे/सौ.गौरी गाडेकर≈

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