हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९६० ⇒ कदर जाने ना ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “कदर जाने ना।)

?अभी अभी # ९६० ⇒ आलेख – कदर जाने ना ? श्री प्रदीप शर्मा  ? 

हम सभी की भावनाओं का ख्याल रखते हैं, और महिलाओं का सम्मान ही नहीं, कद्र भी करते हैं। साहित्य ने भले ही हमारी कद्र ना की हो, हम संगीत के कद्रदान हैं, और फिल्मी संगीत सुन सुनकर ही आज कानसेन बन बैठे हैं।

हमें ना तो कोई शिकायत जमाने से है और न ही कोई शिकायत अपनी पत्नी से। जिस तरह संगीत ने पिछले सत्तर सालों से हमारा साथ निभाया है, हमारी धर्मपत्नी भी पचास वर्षों से हमारा साथ निभाती चली आ रही है।

चले थे साथ मिलकर, चलेंगे साथ मिलकर। तुम्हें रुकना पड़ेगा, मेरी आवाज सुनकर।।

संगीत की हमारी शिक्षा दीक्षा केवल रेडियो सीलोन सुनने तक ही सीमित रही। आप चाहें तो हमें एक अच्छा श्रोता कह सकते हैं। हुस्न, इश्क, जुल्फ और दामन जैसे शब्द हमने यहीं से सीखे हैं। सहगल का दौर निकल चुका था और अनारकली, बैजू बावरा, मुगले आजम और मेरे महबूब का जमाना था। सुरैया, शमशाद, नूरजहां और खुर्शीद के साथ लता, आशा, रफी, तलत, किशोर और राजकपूर की आवाज मुकेश, के तराने लोग गुनगुनाते रहते थे।

जब जीवन में कोई कद्रदान मिलता है, तो आपकी लाइफ बन जाती है। आप किसी के हसबैंड बन जाते हैं, कोई आपकी वाइफ बन जाती है। आपने, अपना बनाया, मेहरबानी आपकी! हम तो इस काबिल ना थे, है कद्रदानी आपकी।।

मदनमोहन ही तो लाए थे वह खूबसूरत नगमा हमारे लिए!

आपकी नज़रों ने समझा, प्यार के काबिल हमें, और, जी हमें मंजूर है, आपका हर फैसला।

हर नजर कह रही, बंदा परवर शुक्रिया।

गृहस्थी की गाड़ी बस ऐसे ही तो चल निकली थी हमारी भी। सारे तीज, त्योहार और उत्सव कितने उत्साह से संपन्न होते थे। हरताली तीज हो अथवा करवा चौथ! तुम्हीं मेरे मंदिर, तुम्हीं मेरी पूजा। तुम्हीं देवता हो, तुम्हीं देवता। हमें अपने आप पर भरोसा नहीं होता था जब ऐसे गीत कानों में पड़ते थे; मैं तो भूल चली बाबुल का देस, पिया का घर प्यारा लगे।।

हमारे गीतकार वर्मा मलिक भी कम नहीं आग में घी डालने में! तेरी दो टकियां दी नौकरी, मेरा लाखों का सावन जाए। हाय हाय ये मजबूरी, ये मौसम और ये दूरी। लेकिन हमारी धर्मपत्नी बहुत समझदार निकली। छोड़ दें सारी दुनिया, किसी के लिए। ये मुनासिब नहीं आदमी के लिए। प्यार से जरूरी कई काम हैं, प्यार सब कुछ नहीं आदमी के लिए।

लेकिन किसे पता था, उम्र के इस पड़ाव पर आकर हमें भी मदन मोहन का ही यह गीत भी सुनना पड़ेगा ;

कदर जाने ना

मोरा बालम, बेदर्दी

कदर जाने ना …

हम संगीत प्रेमी तरानों और पत्नी के तानों को बराबर का महत्व और सम्मान देते हैं। आखिर इन ५० बरसों में ऐसा क्या बदल गया कि बालम, बेदर्दी हो गए। हमने तो कभी नहीं कहा, सजनवा बैरी हो गए हमार। कुछ तो गड़बड़ है।।

उम्र के साथ अगर महिलाएं धार्मिक होती चली जाती हैं तो पुरुष पॉलिटिकल! जिस टीवी पर कभी पूरा परिवार बैठकर दूरदर्शन देखता था, आजकल धर्मपत्नी में आस्था और सत्संग के संस्कार जाग गए हैं। न्यूज, शेयर मार्केट और कॉमेडी शो के लिए पति को मोबाइल और लैपटॉप का सहारा लेना पड़ता है। घर, घर नहीं, राज्यसभा लोकसभा टी वी हो चला है।

टेबल पर पत्नी चाय रखकर चली गई है, सीहोर वाले लाइव आ रहे हैं। नाश्ता कब का ठंडा हुआ पड़ा है। कानों में कुछ गर्मागर्म शब्द प्रवेश कर रहे हैं। पूरी जिंदगी इनके लिए खपा दी, लेकिन इन्होंने हमारी कभी कद्र ही नहीं की।।

लेकिन शब्द मोम बनकर नहीं पिघल रहे। लता का मधुर स्वर याद आ रहा है ;

लाख जतन करूं

बात न माने जी

बात न माने

मेरा दरद न जाने जी।

कदर जाने ना

हो कदर जाने ना

मोरा बालम बेदर्दी

कदर जाने ना …

सोचता हूं, अगर अभी भी कद्र नहीं जानी, तो बहुत देर हो जाएगी। घर घर की यही कहानी है। जागो बेदर्दी बालमों, अब तो जागो।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # २९२ ☆ भक्ति गीत – हे! मेरे करुणानिधे! ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘चक्र

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मानबाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान  के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंतउत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत। 

आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।

आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # २९२ ☆ 

☆ भक्ति गीत – हे! मेरे करुणानिधे! ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ 

योगमय जीवन बना दो।

प्रेम  की   गंगा  बहा दो।

वेदमय जीवन बना दो।

हे!मेरे करुणानिधे!

हे! मेरे करुणानिधे!

राह पकड़ूँ सत्य की मैं,

हौसला हर बार दो।

ताप भौतिक दूर होवें,

ज्ञान की पतवार दो।

 *

देह-मन निर्मल बना दो।

हे! मेरे करुणानिधे!

 **

पाप से सबको बचाओ,

हर तरफ ही आग है।

बाग को माली उजाड़े,

डस रहा अब नाग है।

 *

सत्य-पथ हम को दिखा दो।

हे! मेरे करुणानिधे!

 **

हर तरफ व्यभिचार का ही,

आवरण फैला हुआ।

आचरण अब हर मनुज का,

हर तरह मैला हुआ।

 *

देश-दुनिया को बचा दो।

हे! मेरे करुणानिधे!

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २४४ – पुस्तक समीक्षा – वर्ष 2021 का हिंदी बाल साहित्य: एक आकलन – लेखक/संपादक: राजकुमार जैन ‘राजन’ ☆ समीक्षक – श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है श्री राजकुमार जैन राजनजी द्वारा संपादित पुस्तक – “वर्ष 2021 का हिंदी बाल साहित्य : एक आकलनकी समीक्षा।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २४४

☆ पुस्तक समीक्षा – वर्ष 2021 का हिंदी बाल साहित्य: क आकलन – लेखक/संपादक: राजकुमार जैन राजन ☆ समीक्षक – श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’

पुस्तक का नाम: वर्ष 2021 का हिंदी बाल साहित्य : एक आकलन

लेखक/संपादक: राजकुमार जैन राजन

विधा: बाल साहित्य समीक्षा

प्रकाशक: ज्ञान मुद्रा पब्लिकेशन, भोपाल

समीक्षक: ओमप्रकाश क्षत्रिय प्रकाश

☆ बाल साहित्य की परख और पहचान का नया दस्तावेज़ ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

आज के डिजिटल युग में जब बच्चों का अधिकांश समय मोबाइल और इंटरनेट के बीच बीतने लगा है, तब अच्छी और संस्कारप्रद पुस्तकों की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक महसूस की जा रही है। किंतु समस्या यह है कि बाजार में उपलब्ध असंख्य पुस्तकों के बीच से बालकों के लिए उपयोगी और गुणवत्तापूर्ण साहित्य का चयन कैसे किया जाए। इसी प्रश्न का सार्थक समाधान प्रस्तुत करती है राजकुमार जैन ‘राजन’ की महत्वपूर्ण कृति वर्ष 2021 का हिंदी बाल साहित्य : एक आकलन। यह पुस्तक न केवल बालसाहित्य की श्रेष्ठ कृतियों का परिचय कराती है, बल्कि पाठकों, अभिभावकों और शिक्षकों को सही पुस्तक चयन की दिशा भी दिखाती है।

श्री राजकुमार जैन राजन

बचपन मानव जीवन का वह स्वर्णिम काल है, जिसमें अर्जित संस्कार जीवनभर साथ रहते हैं। किंतु वैश्वीकरण और आधुनिक जीवनशैली के कारण संयुक्त परिवारों का विघटन, माता-पिता की व्यस्तता और तकनीकी उपकरणों का बढ़ता प्रभाव बच्चों के प्राकृतिक बचपन को प्रभावित कर रहा है। माँ की लोरियाँ, नानी-दादी की कहानियाँ और दादाजी की पहेलियाँ अब लुप्त होती हुई धीरे-धीरे स्मृतियों में सिमटती जा रही हैं। ऐसे समय में बालसाहित्य बच्चों के संस्कार, ज्ञान, मनोरंजन और कल्पनाशीलता के विकास का महत्वपूर्ण माध्यम बनकर सामने आता है।

पुस्तकें सार्वकालिक हैं। वास्तव में वे प्रकाश-स्तंभ हैं, जिनकी रोशनी में बच्चे जीवन की समस्याओं का समाधान खोजते हैं और अपने व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं। इंटरनेट भले ही सूचनाओं का विशाल भंडार हो, किंतु पुस्तक से प्राप्त ज्ञान अधिक स्थायी और गहन होता है। इसलिए बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए पुस्तकों का कोई विकल्प नहीं है। पुस्तकें ही बच्चों में तर्कशीलता, चिंतन मनन और कल्पनाशीलता में  महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

इस महत्व को देखते हुए यहां पर बालसाहित्य समीक्षा का महत्व बढ़ जाता है। आज बड़ी संख्या में बालसाहित्य लिखा और प्रकाशित हो रहा है, परंतु उसकी समीक्षा अपेक्षाकृत कम देखने को मिल रही है। इस अभाव को दूर करने का महत्वपूर्ण कार्य राजकुमार जैन ‘राजन’ ने किया है। उनकी यह पुस्तक वर्ष 2021 में प्रकाशित लगभग साठ श्रेष्ठ हिंदी बाल पुस्तकों की समीक्षाओं का संकलन है। यह संकलन बालसाहित्य की विविध विधाओं—कविता, गीत, कहानी, उपन्यास, विज्ञान साहित्य, हाइकु और एकांकी—को समेटते हुए एक समृद्ध गुलदस्ते का रूप ले रहा है।

इस पुस्तक की विशेषता इसकी संतुलित और सकारात्मक समीक्षा दृष्टि है। लेखक ने कृतियों के छिद्रान्वेषण के बजाय उनके गुणों को रेखांकित करते हुए बालोपयोगिता पर विशेष ध्यान दिया है। उनकी समीक्षा शैली अत्यंत सरल, स्पष्ट और व्यवस्थित है। प्रत्येक समीक्षा में तीन प्रमुख आधार दिखाई देते हैं।

पहला आधार हैं संबंधित विधा का संक्षिप्त परिचय देना। दूसरा, कृतिकार के साहित्यिक व्यक्तित्व का उल्लेख करते हुए उसकी रचनाधार्मिता को सामने लाना है। तीसरा आधार है, कृति का समग्र मूल्यांकन करना। इसी पद्धति के आधार पर इन्होंने पुस्तक का मूल्यांकन किया है। इस पद्धति के कारण पाठकों को न केवल पुस्तक के विषय-वस्तु की जानकारी मिलती है, बल्कि उस साहित्यिक परंपरा और रचनाकार की दृष्टि को भी समझने का अवसर मिलता है।

पुस्तक में अनेक उल्लेखनीय कृतियों की समीक्षाएँ सम्मिलित हैं। जैसे “बिल्ली पढ़े किताब”, “अटकूँ-मटकूँ”, “मछुवारा का बेटा”, “जंगल का रहस्य”, “अंतरिक्ष में डायनासोर”, “इंद्र धनुष” तथा “विटामिनों से मुलाकात” आदि की समीक्षाएं सम्मिलित है। इन कृतियों के माध्यम से बच्चों के लिए मनोरंजन, ज्ञान, विज्ञान, नैतिक मूल्यों और कल्पनाशीलता का सुंदर समन्वय सामने आया है।

उसकी भूमिका लिखते हुए वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. उषा यादव और डॉ. नागेश पांडेय ‘संजय’ ने भी इस कृति को अत्यंत महत्वपूर्ण और उपयोगी बताया है। उनका मत है कि यह पुस्तक भविष्य में हिंदी बालसाहित्य के इतिहास लेखन में भी सहायक सिद्ध होगी। वास्तव में यह कृति अभिभावकों, शिक्षकों, शोधार्थियों, संपादकों और बालसाहित्य प्रेमियों आदि सभी के लिए उपयोगी होकर उनके लिए मार्गदर्शक का कार्य करेगी। ऐसी आशा की जा सकती है।

निष्कर्ष रूप में कह सकते हैं कि राजकुमार जैन ‘राजन’ की यह पुस्तक हिंदी बालसाहित्य की गुणवत्ता और व्यापकता को सिद्ध करती है। यह कृति बताती है कि हिंदी में आज भी उत्कृष्ट बालसाहित्य लिखा जा रहा है, आवश्यकता केवल उसे पहचानने और पाठकों तक पहुँचाने की है। अपने समर्पण, परिश्रम और निष्पक्ष दृष्टि के माध्यम से लेखक ने बालसाहित्य समीक्षा के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण योगदान दिया है। साथ ही इस पुस्तक में अलका जैन आराधना की भी पुस्तकों की समीक्षाएं सम्मिलित की गई है। उनका योगदान भी उल्लेखनीय है।

यह पुस्तक न केवल जानकारी प्रदान करती है, बल्कि बालसाहित्य के प्रति नई जागरूकता भी उत्पन्न करती है। निश्चित ही वर्ष 2021 का हिंदी बाल साहित्य : एक आकलन हिंदी बालसाहित्य की परख और पहचान का एक महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ सिद्ध होगी। इसके लिए लेखक को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ।

——–

© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

16-07-2024

संपर्क – 14/198, नई आबादी, गार्डन के सामने, सामुदायिक भवन के पीछे, रतनगढ़, जिला- नीमच (मध्य प्रदेश) पिनकोड-458226

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com मोबाइल – 9424079675 /8827985775

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ कर्म… ☆ श्री अनिल वामोरकर ☆

श्री अनिल वामोरकर

? कवितेचा उत्सव ?

☆ कर्म… ☆ श्री अनिल वामोरकर ☆

आपुलकीच्या

नात्याने

स्नेह जपावा

मनामध्ये

अन् चुकू नये कधी

कर्तव्यामध्ये…

 

नकोत केवळ

विटांच्या भिंती

स्वार्थ विरहीत

प्रेम असावे चित्ती…

 

येणा-याचे अगत्याने

स्वागत करु या

जाणा-याच्या मनात

ओढ वाटावी परतण्याची तया…

 

आज आहोत

उद्या नसू हयात

ओठी प्रत्येकाच्या

नामोल्लेख असावा तयात…

© श्री अनिल वामोरकर

अमरावती

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ तो आणि मी…! – भाग ९८ ☆ श्री अरविंद लिमये ☆

श्री अरविंद लिमये

? विविधा ?

☆ तो आणि मी…! – भाग ९८ ☆ श्री अरविंद लिमये

(पूर्वसूत्र- माझी स्वेच्छानिवृत्ती आणि त्याचे मंजुरीपत्र हे विषय माझ्यापुरते मी पुसूनच टाकले होते. पण ते खोटं ठरवणारं, मला अचंबित करणारं वास्तव वखरेसाहेबांच्या केबिनमधे माझी वाट पहातेय याची मला पुसटशीही कल्पना नव्हती.

 आज इतक्या वर्षांनंतरही त्यातला थरार मी विसरू शकलेलो नाहीय.

 मी त्यांच्या केबिनमधे जाताच वखरेसाहेबांनी माझं हसतमुखानं स्वागत केलं होतं.

 “यु आर व्हेरी लकी मिस्टर लिमये. गेम वॉज व्हेरी टफ. बट यू हॅव वन इट.” ते म्हणाले होते.)

आज दिवसभर काय घडत होतं ते त्यांच्याकडून ऐकताना माझा माझ्या कानांवर विश्वासच बसेना. ‘अतर्क्य’ म्हणजे काय याचा प्रत्यय मला प्रत्येक क्षणी येत होता. सहजासहजी घडूच न शकणारं बरंच कांही दिवसभरात घडून गेलं होतं !!

माझ्या कथासंग्रहाचा प्रकाशन समारंभ, त्यात व्यत्यय आणण्यासाठीच अचानक ठरली असावी अशी आमच्या जी.एम्. मॅडमची ती व्हिजीट, त्यादरम्यान मॅडमनी सूतोवाच केलेली नव्याने येऊ घातलेली ‘स्वेच्छानिवृत्ती’ची गोल्डन शेकहॅंड स्कीम आणि त्याच अनुषंगाने माझ्या आयुष्यांत येऊ पहाणारी अनोखी वळणं न् पुढे त्यात प्रत्येकवेळी निर्माण होत गेलेली अनिश्चितता…!

वखरेसाहेब सांगत होते ते ऐकताना हे सगळंच अधांतर अतिशय अनपेक्षितपणे हळूहळू विरून गेलंय असंच मला वाटतं राहिलं. कारण जे घडलं होतं ते अतिशय अनपेक्षित आणि नेमकं मला हवं तसंच!!

आज पंचवीस वर्षं उलटून गेल्यानंतरही त्या संध्याकाळचे ते क्षण मी विसरूच शकत नाहीय.माझ्या अनोख्या भविष्यकाळासाठी माझ्या संपूर्ण आयुष्यालाच सकारात्मक कलाटणी देणारी ती संध्याकाळ माझ्यासाठी उर्वरीत आयुष्यातली नवी पहाटच ठरली होती..!

वखरेसाहेबांनी सांगितलं त्यानुसार नागपूर रिजनल मॅनेजर श्रीवास्तव साहेब अकोला ब्रॅंचमधील बुडीत कर्जांमधे घोळ घालून ठेवलेल्या आधीच्या मॅनेजर इतकंच नंतर चार्ज घेतलेल्या मलाही जबाबदार ठरवू पहात होते आणि सर्व सुरळीत होईपर्यंत मला स्वेच्छानिवृत्तीसाठी आवश्यक असणारी ‘क्लीनचिट’ द्यायला टाळाटाळ करीत होते.३१ डिसेंबर ही सदर योजनेच्या अंमलबजावणीची अखेरची तारीख उजाडली तेव्हा माझा एकट्याचाच अर्ज अजूनही पेंडिंग असल्याचं लक्षात येताच एम्.डी.आॅफीसने तिथे सर्वांना धारेवर धरलं होतं.मी पुढे चालून आलेली एक सुवर्णसंधी हातून निसटूनच गेलीय हेच गृहित धरुन सगळं नाईलाजाने स्विकारलं होतं त्याचवेळी तिकडं सेंट्रल आॅफिस पातळीवर मात्र या प्रकरणाला अचानक हे वेगळंच वळण लागलं. तिथे हे प्रकरण थेट स्वत:च्या ताब्यात घेतलं ते नेमकं मला व्यक्तिशः ओळखणाऱ्या जी.एम्. मॅडमनीच. आणि दुसऱ्याच क्षणी वखरेसाहेबांच्या फोनचा रिंगटोन! अकोला ब्रॅंचमधील चिघळलेल्या प्रश्नाची सविस्तर पार्श्वभूमी मॅडमनी त्यांच्याकडून समजून घेतली आणि थेट श्रीवास्तव साहेबांना फोन करुन कडक शब्दांत याप्रकरणातील त्यांच्या कॅज्युअल अॅप्रोच आणि टाईम किलींग टॅक्टीजवर ताशेरे ओढत ‘ लिमयेनी तिथे अल्पकाळात प्रतिकूल परिस्थितीत जे कांही काम केलंय त्याचं पूर्ण रेकाॅर्ड झोनल व सेंट्रल आॅफिसमधे सुरक्षित आहे’ असं त्यांना स्पष्ट शब्दात बजावून ‘ घ्याल तो निर्णय पूर्ण जबाबदारीने घ्या आणि त्याच्या परिणामांना सज्ज रहा’ असं त्यांना बजावलं.

पुढच्या पंधरा-वीस मिनिटातच मला क्लीनचीट देणारा फॅक्स श्रीवास्तव साहेबांनी सेंट्रल आॅफीसला पाठवला होता आणि त्याची एक प्रत वखरेसाहेबांकडे.

वखरेसाहेब काय किंवा या जी.एम्.मॅडम काय, या सर्व घटनाक्रमात तिथं दुसरं कुणीही असतं तर? हे असंच या क्रमाने घडलं असतं? सगळं योगायोगानेच घडावं तसंच घडत गेलेलं असूनही त्या मागचा सूत्रधार मात्र ‘तो’च होता. त्या शिवाय हे सगळं असंच घडणं शक्य तरी होतं का? माझ्या आयुष्यातल्या अशा असंख्य बिकट वाटांवरच्या प्रत्येक अंधाऱ्या वळणावर मला लख्ख प्रकाशवाट दाखवणाराही ‘तो’च तर होता!

“सोs..टूमारो वील बी ए लास्ट डे आॅफ युवर सर्व्हिस लाईफ. विश यू आॅल द बेस्ट!” वखरेसाहेबांचे शब्द ऐकून मी दचकून भानावर आलो.स्वप्नवत वाटावेत असे त्यांचे ते शब्द मला भानावर आणतानाच आतून हळवं करून गेले.

“नका काळजी करु.सगळं व्यवस्थित होईल. मी आहे ना?” या त्यांच्याच शब्दांनी कांही दिवसांपूर्वीच मला आश्वस्त केलं होतं आणि आज त्यांचेच शब्द मला आनंदाने नव्या हव्याहव्याशा अशा अनोख्या वाटेवर निश्चिंतपणे मार्गस्थ व्हायचे संकेत देत होते!!

“थॅंक्यू व्हेरी मच सर..थॅंक्स फाॅर एव्हरीथिंग..”

माझा आवाज भरून आला होता. कसंबसं स्वतःला सावरत मी त्यांचे आभार मानले आणि जाण्यासाठी उठलो.

“बसा. हॅव अ कप आॅफ टी वुईथ मी..” ते मनापासून म्हणाले.

आज पंचवीस वर्षे उलटून गेल्यानंतरही त्या संध्याकाळपर्यंतचे हे असे सगळे क्षण आपसूकच माझ्या मनात अलगद जपले गेलेयत. कारण माझा अनोखा भविष्यकाळ खऱ्या अर्थाने कृतार्थ करण्यासाठी माझ्या संपूर्ण आयुष्यालाच अतिशय रेखीव अशी सकारात्मक कलाटणी देणारी ती संध्याकाळ माझ्या उर्वरित आयुष्यासाठी एक नवी पहाटच ठरली होती!!

क्रमश:…  (प्रत्येक गुरूवारी)

©️ अरविंद लिमये

सांगली (९८२३७३८२८८)

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ.मंजुषा मुळे/सौ.गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – जीवनरंग ☆ अद्वैत… भाग – २ ☆ डाॅ. निशिकांत श्रोत्री ☆

डाॅ. निशिकांत श्रोत्री 

? जीवनरंग ?

☆ अद्वैत… भाग – २ ☆ डाॅ. निशिकांत श्रोत्री ☆

(नकळतच तिने आपले दोन्ही ओठ अंमळ विलग केले. मुलीने त्यात ओतलेले गंगाजलाचे थेंब तिच्या तोंडात गेले. तरीही ते थेंब घशातून गिळायचे त्राण काही तिच्यात शिल्लक नव्हते. आता आपल्या या देहाच्याने झाली तर केवळ एखादीच हालचाल होऊ शकेल याची कल्पना तिला आली.) 

इथून पुढे – – 

जीवाच्या करारावर मोठ्या कष्टाने तिने आपले डोळे उघडायचा प्रयत्न केला तिने. डोळे संपूर्ण तर उघडवेच ना तिला. मोठ्या मुश्किलीने तिने आपले डोळे किलकिले केले. अंधुकपणे का होईना पण तिला समोर लेक, सून, नातू आणि मुलगा दिसले – पण तेही क्षणभरच; दुसऱ्याच क्षणी तुला आपल्या नाभीत काही विचित्र संवेदना जाणवली आणि एकदम हलके हलके जाणवायला लागले. तिने आपले लक्ष्य क्षणभरासाठी जडददेहावर केंद्रित केले.

आता ना तिचे श्वसन होत होते ना इतर काही हालचाल; तिचा रजतरज्जू देखील तिच्या जडदेहापासून पूर्ण विलग झाला होता.

त्याच्या सूक्ष्मदेहाजवळ तिचा सूक्ष्म देह पोहोचला.

‘आ ऽऽऽऽऽ ई ऽऽऽऽऽ, ’ संपूर्ण खोली सगळ्यांच्या वियोग विलापाने आक्रोशून उठली.

‘इथे नको आता, देवघरात जाऊ, ’ त्याच्या सूक्ष्मदेहाची स्पंदने तिला जाणवली. आता तिच्या बरोबरच त्याचा सूक्ष्मदेहातही जांभळट छटा पसरू लागली होती. ‘नाही म्हटले तरी आपल्या अपत्यांचा दुःखाचा आक्रोश विचलित करणारच ना! 

विचारहीन अवस्थेन दोघेही देवघरात संक्रमित झाले. लेकरांच्या टाहो मुळे दोघांच्याही विचारात अंमळ नैराश्य आले आणि त्यांच्या सूक्ष्मदेहावर निळसर छटा झाकोळू लागली.

‘संपलं, ’ क्षणभरात सावरल्याने तिचा सूक्ष्मदेह पुन्हा नारिंगी झाला.

‘काय संपलं?’ त्याचाही सूक्ष्मदेह पुनरपि पूर्ववत झाला.

‘या इहलोकीचे लागेबांधे संपले; आप्तेष्टांचे तर संपलेच, आता आपली ओळख सांगणाऱ्या त्या नश्वर देहाचे देखील संपले. आता जो काय कालखंड या सूक्ष्मपातळीवर काढायचा तेवढाच, ’ तिच्या विचारातील स्पष्टपणा त्याला जाणवू लागला.

‘मुलांवरची माया… ’ तो जरासा चकितच झाला.

‘तेव्हा तू मला – आम्हाला सगळ्यांना सोडून गेलास आणि मला जीवनाचे फार मोठे तत्वज्ञान शिकवून गेलास, तिचा सूक्ष्मदेह आता विलक्षण तोजोम्य झाल्याचे त्याला जाणवले. ‘नश्वर देहात आहोत तोपर्यंत सगळे आपले किंवा परके ; आणि आपण सगळ्यांचे, नातेसंबंध तेवढ्यापुरताच! त्यानंतर कोण कुठे जाणार कोणालाच ठाऊक नसते. मग कशाला या भावनांमध्ये गुंतवून ठेवायचे!? देह सोडतांना आपल्या भावनाही त्या देहबरोबरच सोडून यावे हेच उचित! क्षणभर मलाही आपल्या मुलाबाळांचा वियोग असह्य झाला होता; पण तो केवळ क्षणभरच! तू गेल्यापासून मी माझ्या मनाला याबाबत वरचेवर पढवत आले आहे. खरं सांगायचं तर तुझी अशी आणि ही भेट अपेक्षितच नव्हती मला. ’

‘नाही रुचली आपली ही भेट तुला?’

‘आता गैरसमज करून घ्यायची वेळ नाही; आणि आपल्यापाशी कदाचित तेवढा वेळाही नसेल, ’ तिच्या विचारांतील स्पष्टता कल्पनतीत होती. ‘आपण एकत्वाचे जिणे जगलो; आणि मी देहात होते तोंवर तरी माझ्या मनात तीच भावना होती. ’

‘मग आता… ?’ त्याचे विचार कंपायमान झाले.

‘आता आपल्या हातात काय आहे याची काहीच कल्पना नाही. ’

‘पण एवढ्यासाठी तर मी इतकी वर्षे या सूक्ष्मपातळीवर अजून तग धरून आहे ना!’ आता मात्र त्याने पुढाकार घ्यायचे ठरविले.

‘ते देखील एक आश्चर्यच म्हणावे लागेल! तरीही मला वाटते की ज्या अर्थी तू या अवस्थेत इतकी वर्षे काढलीस त्या अर्थी तुझ्या सगळ्याच भावनांपासून एव्हाना तू मुक्त झाला असावास. अन्यथा तू पुन्हा कुठे तरी जन्म घेतलाच असतास, ’ तिने आपला कयास त्याच्यासमोर उघड केला.

‘खरे आहे, ’ त्याला पुन्हा हुरूप आला. ‘एक भावना सोडून मी यशस्वीपणे सगळ्या भावनांचा, वासनांचा त्याग करू शकलो. ’

‘कोणती भावना?’ या प्रश्नाची आवश्यकता नाही हे समाजात असून देखील तिच्यातून तो उद्भवलाच.

‘तुझ्यावरचं अमाप प्रेम, ’ त्याचे विचार खूप मुलायम झाले. ‘केवळ त्याच्यावरच मी जीवन जगलो आणि मरणही स्वीकारले. त्यापोटीच माझ्या इतर सगळ्या भावना एक एक करत गळून पडत होत्या. केवळ तुझीच प्रतीक्षा होती. ’

‘प्रतीक्षापूर्ती तर झाली; आता काय विचार आहे?’ 

‘आता आपण वेळ घालवायला नको, ’ आपल्या विचारांच्या मार्गावर ती आपोआपच आल्यामुळे तो जरासा सुखावला. ‘लगेचच पुढची कृती करूयात. ’

‘ती कोणती?’

‘सध्या पलीकडच्याच रस्त्यावर दोन जोडपी आहेत, ’ तो आपली योजना समजावून देऊ लागला. ‘शेजारीच आहेत ते एकमेकांचे. त्यांच्या बायका आता गरोदर आहेत; दोघीनाही पाचवा महिना चालू आहे. आपण त्यांच्या गर्भात शिरुयात. मग पुढच्या जन्मातही आपण पुन्हा एकत्र येऊ शकतो. ’

‘किती गोष्टी गृहीत धरल्या आहेस तू!’ जडदेहात असती तर ती अगदी खळखळून हसली असती. ‘दोघींच्या गर्भधारणा व्यवस्थित पार पडल्या तर आपण जवळजवळ जन्माला येऊ इतकेच! त्यानंतर आपले लग्न होणे किती तरी कौटुंबिक आणि सामाजिक घटकांवर अवलंबून असणार; त्या आपल्या हातात थोड्याच असणार?!’

‘पुढच्या जन्मात तुला माझ्याबरोबरच नाही रहायाचे?’ तिचा हा इतका व्यवहारी प्रतिसाद त्याला अगदीच अनपेक्षित होता.

‘पुन्हा गैरसमज! आपण एकत्वाचे जिणे जगलो ना रे? तुला सोडायचा विचार माझ्यात उद्भवेलच कसा?!’

‘मग असे का म्हणतेस?’

‘इतकी वर्षे तू या सूक्ष्मपातळीवर यशस्वीपणे तग धरून राहिलास, पुढच्या जन्माची आंस न बाळगता, ’ तिच्या सूक्ष्मदेहाला आता एक वेगळेच तेज प्राप्त झाल्याचे त्याला जाणवले. ‘म्हणजे आता तुझी कोणतीही अतृप्त वासना किंवा इच्छा उरलेली नाही. ’

‘केवळ एकच, ’ त्याने प्रांजळपणे कबुली दिली. ‘तुझ्याखेरीज मला दुसरे काहीच नको आहे. ’

‘आता माझा देह तर मागेच राहिला; अन् थोड्या वेळातच तो भस्मसात देखील होईल. ’ तिने पुन्हा त्याला परिस्थितीची जाणीव करून दिली.

‘आपले प्रेम काय केवळ देहापुरतेच मर्यादित होते – किंबहुना आहे? मी देहात असतांना देखील आपण आत्म्याने एकरूपच झालो होतो ना!’

‘हो ना? मग आता पुनर्जन्माची आंस का?’ तिचे विचार पुन्हा मूळपदावर आले. ‘तू म्हणतोस तसा जन्म घेतल्याने पुन्हा जननमरणाच्या फेऱ्यात अडकायचे, जीवनातील सगळे टप्पेटोणपे खायचे, कधी यश पदरी पडेल तर कधी अपयशाला तोंड द्यावे लागेल. पुन्हा नवे संबंध, नवी नाती! कोण केव्हा सोडून जातील सांगता येत नाही. बाकीच्यांचे तर सोडा, आपले काय? पुन्हा आपल्यातील एकजण आधी जाणार. मागे राहिल्याची काय अवस्था होते ते मी गेली काही वर्षे अनुभवते आहे – मरण जगणे म्हणजे काय ते समजले आहे मला. पुन्हा तसले अनुभव नकोत आता – ना मला, ना तुला. ’

तिच्या मुद्द्यांनी तो स्तंभितच झाला.

‘तुझ्या आता दुसऱ्या काही अतृप्त वासना शिल्लक राहिलेल्या नाहीत, माझ्याही नाहीत. त्यामुळे आता काही कर्मपूर्तीसाठी देह धारण करायचा प्रश्नच उद्भवत नाही. केवळ आपण पुन्हा एकत्र यायच्या हव्यासापोटी पुन्हा जन्म घ्यायचे म्हणजे सगळे जीवन पुन्हा जर-तरच्या भोवर्‍यात गटांगळ्या खायच्या!’

‘म्हणजे आता काही वेळानंतर आपण विलग व्हायचे एकमेकांपासून?’ त्याचे तेजोवलय पुन्हा काळवंडू लागले. ‘इतकी वर्षे तुझ्या प्रतीक्षेत सूक्ष्मपातळीवर ताटकळत राहिलो ते सगळे फोल जाणार?’

‘नाही रे राजा, ’ तिने त्याला उभारी द्यायचा प्रयत्न केला. ‘तथापि आपल्या एकत्र येण्यासाठी आता मला कोणत्याही प्रकारची अनिश्चितता नको आहे; किंवा त्यानंतर पुन्हा असे वियोगाचे जिणे नको आहे. जे काही निर्णय घ्यायचे ते पूर्ण विचारांतीच!’

‘म्हणजे काय करायचे?’ त्याचा तिच्यावर पूर्ण विश्वास होता.

‘आपली आत्मीयता केवळ देहांवर नव्हतीच – नाहीच; बरोबर? देह हे केवळ एकत्र येण्यासाठी एक साधन. आत्ता आपल्या दोघांचेही देह नसून देखील आपल्या आपलेपणात कुठे तरी कमतरता जाणवते आहे का आपल्यातील कोणालाही; नाही ना?’ तिला काहीही प्रतीविचार न देता केवळ विचारग्रहण करायचे ठरविले त्याने. ‘मग पुन्हा अवतरण करायच्या ऐवजी उद्धरण का करू नये!?’

‘म्हणजे नक्की काय करायचे आपण?’ तो पूर्णतः भांबावून गेला.

‘सूक्ष्मदेह, जडदेह, आणि आनंददेह या देहाच्या तीन अवस्था आहेत ना!’ आता ती अधिक मोकळी होऊ लागली. तिचे तेजोवलय विलक्षण तेजाने झळकू लागले. ‘सूक्ष्मदेहातून पुनरपि जडदेहात जायचे, पुनश्च जननमरणाच्या फेऱ्यात अडकायचे हे अवतरणच नव्हे तर काय! त्यापेक्षा काही वासना नसतांनाच सूक्ष्मदेहातून आनंददेहाकडे गेलो तर जीवनाच्या अनिश्चिततेपासून सुटका नाही का होणार?’

‘म्हणजे आता आपला शाश्वत वियोग होणार?’ भावनांच्या हिंदोळ्यांवर स्वतःला कसे सावरायचे हेच त्याला उमगेना. त्याच्या तेजोवलयाचे स्वरूप क्षणाक्षणाला बदलत होते.

‘नाही रे; समजून तर घे मला, ’ आता तिला त्याच्या प्रतीविचाराची आवश्यकता वाटेना. ‘या सूक्ष्मदेहातच आपण एकत्र होऊ. हे आपले शाश्वत अद्वैत असेल. अशा अद्वैतातच आपण आनंददेहात प्रवेश करू; तात्पुरताच! त्यानंतर आपण थेट ब्रह्मतत्वाकडे झेपावूयात ना! मग आपल्याला कोणीच विलग करू शकणार नाही. हेच शाश्वत अद्वैत आहे आपले!’

आणि विलक्षण समाधानाने, तृप्तीने त्याचा सूक्ष्मदेह पुन्हा झळाळू लागला.

‘ये’

‘त्याचे विचार जाणवतच, दुसऱ्याच क्षणी तिचा सूक्ष्मदेह त्याच्या सूक्ष्मदेहाच्या दिशेने सरकला. त्या दोन सूक्ष्मदेहाचे मीलन झाले; दोघांनाही वासनाविरहित एकत्वाची अनुभूती आली. आता कोणतीच इच्छा शेष नाही या भावनेने तत्क्षणी त्यांच्या अद्वैती सूक्ष्मदेहाचे आनंददेहात परिवर्तन झाले

अन् दुसऱ्याच क्षणी अद्वैत पावलेला तो आनंददेह निर्विकारपणे ब्रह्मतत्वाकडे झेपावला – अद्वैताच्या शाश्वत आनंदप्राप्तीसाठी – मुक्तीसाठी – मोक्षासाठी !

समाप्त –

कवी : © डॉ. निशिकान्त श्रोत्री

एम. डी. , डी. जी. ओ.

एरंडवणे, पुणे ४११००४, मो- ९८९०११७७५४

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ हनुमानाची प्रार्थना – तारी उदारा… ☆ श्री दिवाकर बुरसे ☆

श्री दिवाकर बुरसे

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हनुमानाची प्रार्थना – तारी उदारा… ✦ श्री दिवाकर बुरसे ☆

(चैत्र पौर्णिमा, गुरुवार २ एप्रिल २०२६ – – या दिवशी संपन्न होणाऱ्या हनुमान जन्मोत्सवानिमित्त हनुमानाची प्रार्थना)

☆ तारी उदारा ☆


रघुवीर दासा, रुद्रावतारा

तारी उदारा, तारी उदारा!।।१।।

*

मंदारमाला, सिंदूर ल्याला 

मज बालकाला, तारी उदारा।।२।।

*

तुझिया प्रतापे त्र्यैलोक सारा 

कापे थरारा, तारी उदारा।।३।।

*

बजरंग धीरा, बळवंत वीरा

भवदुःख हारा, तारी उदारा।।४।।

*

वायू-सुपुत्रा, बुद्धीसमुद्रा

षट्शत्रु वारा, तारी उदारा।।५।।

*

कपिसंघमुख्या, दे शांति सौख्या

शरणागता या, तारी उदारा।।६।।

© श्री दिवाकर बुरसे

पुणे

संपर्कः ९२८४३००१२५, ९५५२६२९२४५

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ ‘हे देवाघरचे देणे’… ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

श्री विश्वास देशपांडे

? इंद्रधनुष्य ?

☆ ‘हे देवाघरचे देणे’…  ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

तो सुप्रसिद्ध गायक स्व. मुकेश यांचा जन्मदिवस होता. आणि मला जुनी गाणी ऐकण्याची आवड असल्याने त्यांचे ‘ मेरा प्यार भी तू है, ये बहार भी तू है.. ’ हे सदाबहार गीत योगायोगाने ऐकत होतो. हे गीत पडद्यावर राजेंद्रकुमार आणि वैजयंतीमाला यांच्यावर चित्रित झाले असून सुमन कल्याणपूर आणि मुकेश यांचे हे अजरामर आणि अवीट गोडीचे द्वंद्वगीत आहे. आपला असा समज होण्याची शक्यता आहे की मी आज स्व. मुकेश यांच्याविषयी किंवा या गीताविषयी बोलणार आहे पण खरे तर मला सांगायचे आहे ते वेगळेच. जेव्हा राजेंद्रकुमार वैजयंती मालाला म्हणतो की ‘ मेरा प्यार भी तू है…’ तेव्हा त्याला तिच्या ठायी निसर्गातील सगळ्या गोष्टी असलेल्या प्रतिबिंबित होतात. निसर्गातील फुलात, सगळ्या निसर्ग सौंदर्यात जणू तिचाच भास त्याला व्हायला लागतो. किंवा दुसऱ्या एखाद्या गीतात एखादा प्रियकर आपल्या सुंदर प्रेयसीकडे पाहून म्हणतो, ‘ तेरे चेहरेसे नजर नही हटती, नजारे हम क्या देखे…’ असे चित्रपटातील नायक आणि नायिकेचे प्रेम आपण नेहमी पडद्यावर पाहतो. किती छान वाटते हे सगळे बघायला आणि ऐकायला सुद्धा.. ! सगळे कसे romantic…! ‘ क्या यही प्यार है…? ‘

आपल्याला चित्रपटातील, टी व्ही वरील मालिकातून नायक नायिकेचे प्रेम बघायची इतकी सवय झालेली आहे की हे सगळे आपण पाहतो ते म्हणजेच प्रेम असा आपला समज होत असतो. इतकं ते आपल्या रक्तात भिनलेले असते जणू. मंगेश पाडगावकर यांची ‘ प्रेम म्हणजे प्रेम असतं, तुमचं आणि आमचं सेम असतं.. ’ या ओळी आम्हाला पाठ असतात किंवा ऐकून माहिती असतात. पण खरं प्रेम कसं असतं ? ‘ प्रेमा तुझा रंग कसा ?’ प्रेम हे सर्वव्यापी आहे. प्रेमाला स्वतःचा मुळचा रंग नाही. प्रेम हे पाण्यासारखे असते. ‘ पानी तेरा रंग कैसा, जिसमे मिला दो लगे उस जैसा… ’ एक सुंदर मराठी गीत आहे, ‘ प्रेमाला उपमा नाही, हे ते देवाघरचे देणे.. ’ खरंच किती सुंदर शब्द आहेत ! प्रेम हे देवाघरचे देणे आहे.

प्रेम हे जीवनाच्या वेलीवर उमललेले सर्वात सुंदर फुल आहे ! फुलासारखेच नाजूक आणि सुंदर. जणू काही ‘ जपून हाताळा ‘ दुष्ट आणि क्रूर मानवी भावनांनी ते करपून जाते. त्याला सतत मायेचे पाणी घालावे लागते नाही तर ते कोमेजण्याचा धोका असतो. प्रेमाचे एक वैशिष्ट्य आहे. प्रेम दिल्याने वाढते. जेवढे देऊ त्याच्या अनेक पटींनी परत मिळते. जसे शेतात काही मुठ दाणे पेरावे आणि अनेक पटींनी पीक घ्यावे. What we give, we get back in abundance. प्रेम दिले तर प्रेम मिळेल आणि द्वेष पेरला तर द्वेशाचेच पिक येईल. म्हणूनच तर आपण ‘ पेरावे तसे उगवते ‘ असे म्हणतो. एकदा गौतम बुद्धांकडे एक गरीब माणूस आला. तो म्हणाला, ‘ महाराज मी गरीब का आहे ते सांगावे. ’ बुद्ध त्याला म्हणाले, ‘ तू तुझ्याजवळ असलेले लोकांना देत नाहीस म्हणून तू गरीब आहेस. ’ त्याने विचारले की माझ्याजवळ काय आहे देण्यासारखे ? बुद्ध म्हणाले, ‘ अरे लोकांना प्रेम तर देऊ शकतोस की नाही, लोकांशी प्रेमाने तर बोलता येईल की नाही ?’ मग बघ तू गरीब राहणार नाहीस. किती सुंदर उपदेश बुद्धांचा… !

खरे प्रेम कसली अपेक्षा करीत नाही. आई आपल्या मुलांवर निरपेक्ष प्रेम करते. तिला कोणती अपेक्षा असते ? आपल्या वृद्धापकाळी आपल्याला हे मूल सांभाळील या भावनेनेच ती त्याचे सगळे करते का ? पित्याचेही मुलांवर असेच निरपेक्ष प्रेम असते. त्यांनी आपल्या आईवडिलांना वृद्धापकाळी सांभाळायचे की नाही हा प्रश्न या प्रेमापुढे गौण ठरतो. असेच प्रेम भावंडांचे एकमेकांवर असते. पण जिथे नात्यात स्वार्थ आला तिथे प्रेम संपते. स्वार्थ, कपटीपणा या सारख्या भावनांनी प्रेमाचे फुल करपते. पती पत्नींचे एकमेकांवरील प्रेम असेच निरपेक्ष असते, असले पाहिजे. लग्नानंतरचे मंतरलेले जादुई दिवस काही वर्षातच भुरकन उडून जातात. मग वास्तवाला सामोरे जावे लागते. एकमेकांच्या स्वभावातील दोष, उणीवा जाणवू लागतात. पण खरे प्रेम या सर्व गुणदोषांसह समोरच्याचा स्वीकार करते. तसे नसेल तर ते खरे प्रेम नाहीच असे समजायला हरकत नाही.

मी वाचलेली एक गोष्ट या ठिकाणी सांगण्याचा मोह आवरत नाही. एका डॉक्टरांचे हे निवेदन आहे. ते त्यांच्याच शब्दात. “ सकाळची ८. ३० ची वेळ. माझ्या दवाखान्यात कोणीही रुग्ण नव्हता. एवढ्यात एक ८० वर्षांचे वृद्ध गृहस्थ दवाखान्यात आले. त्यांच्या अंगठ्याला जखम झालेली होती. तिला टाके घातलेले होते. हे टाके काढण्यासाठी ते माझ्याकडे आले होते. ते मला म्हणाले डॉक्टर, लवकर माझी जखम बघा आणि टाके काढा. मला दुसरीकडे जायचे आहे. माझी नऊ वाजताची दुसरीकडे appointment आहे. दवाखान्यात गर्दी नसल्याने मी त्यांचा रक्तदाब इ. तपासला. आणि त्यांच्या जखमेचे परीक्षण करू लागलो. जखम बऱ्यापैकी भरली होती. मी सहाय्यक डॉक्टरांना टाके काढण्याचे साहित्य घ्यायला सांगितले.

जखमेचे टाके काढले आणि जखमेची मलमपट्टी करताना त्यांच्याशी बोलू लागलो. मी विचारले, तुम्हाला दुसऱ्या डॉक्टरांकडे जायचे आहे का ? त्यावर ते म्हणाले, मला माझ्या पत्नीला भेटायला जायचे आहे. ती शुश्रुषा गृहात आहे. मी दररोज सकाळी तिच्यासोबत नाश्ता करतो. मग मी विचारले की कशी आहे त्यांची तब्येत ? त्यावर ते म्हणाले ती वृद्धापकाळी होणाऱ्या विस्मृतीच्या आजाराने (Alzheimer Disease) ग्रस्त असून गेली पाच वर्षे अंथरुणावर आहे. मी विचारले की तुम्हाला उशीर झाला तर त्या काळजी करतील का ? यावर ते म्हणाले की गेली पाच वर्षे ती मला ओळखत नाही. त्यामुळे माझी काळजी करण्याचा प्रश्नच येत नाही.

मी आश्चर्यचकित होऊन विचारले की त्या तुम्हाला ओळखतही नाहीत आणि तरीही तुम्ही गेली पाच वर्षे त्यांना नियमाने भेटायला जात आहात ? यावर त्यांनी दिलेले उत्तर मला थक्क करणारे होते. ते म्हणाले, मग काय झाले ? ती जरी मला ओळखत नसली तरी मी तिला ओळखतो ना.. ! अशा वेळी साथ सोडायची का ? आणि त्यांनी माझा हात हलकेच थोपटला. माझ्या अंगावर रोमांच उभे राहिले. डोळ्यातील नकळत येणारे अश्रू मी रोखले. “

असे असते खरे प्रेम. खरे प्रेम केवळ शारीरिक नसते किंवा romantic ही नसते. खरे प्रेम म्हणजे जे काही आहे, असणार आहे या सगळ्यांचा स्वीकार करणे. जगातील सर्वात सुखी दिसणाऱ्या माणसांना सर्वच गोष्टी उत्तम मिळालेल्या असतात असे नाही पण जे काही मिळाले आहे त्यातून सर्वोच्च आनंद मिळवण्याची त्यांची क्षमता आणि मानसिक तयारी असते. म्हणूनच ते सुखी आणि समाधानी असतात.

© श्री विश्वास देशपांडे

चाळीसगाव

प्रतिक्रियेसाठी ९४०३७४९९३२

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ “ही दंतकथा नाही हो…” – लेखक : श्री सुधीर गाडगीळ ☆ प्रस्तुती – श्री मोहन निमोणकर ☆

श्री मोहन निमोणकर 

? इंद्रधनुष्य ?

☆ “ही दंतकथा नाही हो…” – लेखक : श्री सुधीर गाडगीळ ☆ प्रस्तुती – श्री मोहन निमोणकर

महादेव काशिनाथ गोखले 

पुण्याच्या पेठांमध्ये असले अचाट भिडू राहून गेले आहेत की आज त्यांचे किस्से सांगितले तर लोकांना ते दंतकथा वाटतात. असेच एक आजोबा पेरूगेट पोलीस चौकीजवळ साठ वर्ष पेपर विकायचे. टिपिकल पांढरा शर्ट, चड्डी, तोंडावर कधी एकदा तुमचा अपमान करू असे भाव, काटक शरीर.

आता त्यांचं वैशिष्ठ्य काय अस तुम्ही विचाराल तर त्याची लाईन खूप मोठी आहे, ऐकून तुम्हाला दम भरेल.

नाव महादेव काशिनाथ गोखले, जन्म १९०७ साली झाला असावा. राहायला सदाशिव पेठ पुणे. शिक्षण- चौथी व्यवसाय- बुक बाइंडीग आणि वर्तमानपत्र विकणे, छंद- अचाट गोष्टी करणे.

आता परवा पर्यंत म्हणजे २०१० पर्यंत ते भरतनाट्यमंदिर जवळच्या एका छोट्याशा दुकानात ते दिसायचे. म्हणजे काय तर टिळकांच्या काळापासून ते मनमोहनसिंग यांचा काळ त्यांनी जवळून पाहिला.

महादेव गोखलेंना बाबुराव म्हणून ओळखत. तर हे बाबुराव रोज पहाटे 3. ३० वाजता उठायचे. पेरूगेटजवळच्या आपल्या घरापासून धावायला सुरु करायचे ते थेट कात्रजमार्गे खेड-शिवापूर, तिथून डायरेक्ट सिंहगड मग परत खडकवासला मार्गे पुण्यात पेरूगेटच्या दुकानात ९च्या ठोक्याला हजर. हा दिनक्रम वयाच्या २१ व्या वर्षी सुरु झाला ते ९० वर्षापर्यंत सुरूच होता.

सहज म्हणून घरातून फिरायला निघायचे आणि लोणावळाला जाऊन यायचे तेही पायी.

शीर्षासन करून फक्त दोन्ही हातावर पर्वती चढायचे तर कधी पाठमोरं चढायचे. आपल्या बायकोला पाठंगुळीवर घेऊन पर्वती चढायचा विक्रम तर ४३ वेळा वेळा केला होता.

आता एवढा व्यायाम असेल तर खुराक पण तसाच हवा नां राव. नव्वद वर्ष पूर्ण केल्यावरही एकावेळी ९० जिलेब्या पैजेवर सहज फस्त करायचे. त्यांचे एक मित्र होते साताऱ्याचे तुळशीराम मोदी. ते त्यांना सकाळच्या नाश्त्याला खास एक किलो कंदी पेढे पाठवून द्यायचे. पुण्याच्या सुप्रसिद्ध काका हलवाई दुकानातून रोज एक किलो पेढे त्यांच्या घरी पोहचवले जायचे.

या अचाट भिडूच्या स्कीलचा वापर कोणी केला नसता तर नवल.

स्वातंत्र्यापूर्वीचा काळ होता. तेव्हा त्यांनी क्रॉसकंट्री मॅरेथोन स्पर्धेत २५७ मेडल मिळवले होते. त्यांची किर्ती ऐकून ४ ब्रिटीश अधिकारी त्यांच्याकडून ऑलिम्पिकसाठी ट्रेनिंग घ्यायचे. फावल्या वेळात त्यांना मराठी, हिंदी शिकवायचे.

पुढे त्यांना साठेबिस्कीट कंपनीमध्ये नोकरी लागली. साठे बिस्कीटचे मुख्यालय होते कराचीला. तर बाबुरावांना पावसाळ्याचे ४ महिने सोडले तर कराचीला आठ महिने नोकरीसाठी राहावं लागायचं. पण तिथेही त्यांची अंगातली रग शांत बसायची नाही. कराची-पुणे हा प्रवास ते सायकलवरून करायचे. तिथूनच त्यांनी मानसरोवरला सायकलप्रवास देखील केला होता.

पुण्यात असताना त्यांना बालगंधर्वांच्या गाण्याची आवड निर्माण झाली होती. ते स्वतः उत्कृष्ट तबला वाजवायचे. (आता बास की किती काय करणार)

मग बालगंधर्वांची गाणी ऐकण्यासाठी त्यांच्या कार्यक्रमाचा डोअरकीपर म्हणूनही नोकरी केली होती. तिथे त्यांची सगळी गाणी पाठ झाली. पुढे कराचीला आल्यावर सुप्रसिद्ध अभिनेत्री नर्गिसची आई म्हणजेच जद्दनबाई, बेगम आरा या त्याकाळच्या सर्वोत्तम गायिका गोखल्यांकडून गंधर्व स्टाईलचं गाण शिकण्यासाठी येत.

त्यांची किर्ती बडोद्याच्या सयाजीराव गायकवाड यांच्यापर्यंत पोहचली. बाबुराव गोखलेंना त्यांनी बडोद्याला प्रिंटींग शिकवण्याच्या नोकरीवर ठेऊन घेतलं. पण खरा उद्देश त्यांच्या धावण्याला वाव देणे हा होता.

१९३६ साली जेव्हा बर्लिनमध्ये ऑलिम्पिक होणार होते तेव्हा बडोद्याच्या महाराजांना हिटलरचे खास निमंत्रण होते. सयाजीराव जर्मनीला आपल्या सोबत बाबुराव गोखल्यांना घेऊन गेले.

स्पर्धेदरम्यान गोखल्यांची हिटलरशी ओळख करून दिली. अनवाणी रोज ६०-७० किलोमीटर धावणाऱ्या या अवलिया धावपटूवर हिटलर फुल इम्प्रेस झाला. त्याने गोखल्यांना जर्मनीत काही दिवस ठेवून घेतले. त्यांचा पाहुणचार केला होता. हिटलरशी त्याकाळात त्यांची चांगली मैत्री झाली होती.

पुढे ते जेव्हा लंडनला गेले तेव्हा त्यांच्या स्वागतासाठी त्यांचे जुने शिष्य व तेव्हाचे गव्हर्नर स्वतः आले. हे बघून बडोद्याचे महाराजसुद्धा आश्चर्यचकित झाले होते.

असा हा अवलिया माणूस. तारुण्यात गंमत म्हणून घरात चित्ता, अजगर असे प्राणी पाळायचा.

टिळकांचे नातू म्हणजेच माजी विधानसभा अध्यक्ष जयंतराव टिळक हे त्यांचे खास मित्र. त्यांच्यासोबत अनेकदा शिकारीसाठी रानोमाळ भटकन्ती केली होती. स्वातंत्र्यानंतर मात्र स्वतःचं पेपरविक्री आणि बुक बाईंडिंगच छोटसं दुकान उघडलं आणि आयुष्यभर ते संभाळल.

जवळपास १०३ वर्ष जगले. रोज जेवणाला १५ भाकऱ्या खाल्ल्या. आणि हे त्यांच्या शरीरयष्टीकडे बघून जाणवायचं देखील नाही.

आयुष्यात एकदाही दवाखान्याचे तोंडही बघितलं नाही. त्यांच्या मृत्यू नंतर मेडिकल सर्टिफिकेट कुठून आणायचं हा प्रश्न त्यांच्या लेकीला आणि जावयाला पडला होता.

 – – – ही कथा वाचली तरी आपल्याला वाटेल भिडू आपल्याला थापा मारतोय. मात्र आजही पेठेत गेले तर अनेक जण त्यांनी केलेल्या वेगवेगळ्या पराक्रमाचे साक्षीदार सापडतील. २००१ साली त्यांना प्रसिद्ध योगगुरु बिसी अय्यंगार, जेष्ठ गायिका धोंडूताई कुलकर्णी, संस्कृत पंडीत लक्ष्मणशास्त्री शेंडे यांच्यासोबत पुण्याचा मानाचा शारदा ज्ञानपीठ सन्मान देण्यात आला.

लेखक : सुधीर गाडगीळ

प्रस्तुती : श्री मोहन निमोणकर

संपर्क – सिंहगडरोड, पुणे-५१ मो.  ८४४६३९५७१३.

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – वाचताना वेचलेले ☆ रफू… – लेखक : अज्ञात ☆ प्रस्तुती – सौ. गौरी गाडेकर ☆

सौ. गौरी गाडेकर

📖 वाचताना वेचलेले 📖

☆ रफू… – लेखक : अज्ञात ☆ प्रस्तुती – सौ. गौरी गाडेकर

गावातल्या जुन्या बाजारपेठेत एक छोटंसं दुकान होतं — ‘रफूवाला’.

दुकान इतकं छोटं की आत उभं राहिलं की बाहेरचं जग विसरून जावं.

भिंतीवर टांगलेले जुने कोट, फाटलेल्या शाली, झिजलेले स्वेटर्स… आणि टेबलावर एक छोटं भिंग.

 

दादाभाईचं काम एकच — रफू.

.. .. रफू म्हणजे फक्त सुई-दोऱ्याचं काम नाही.

रफू म्हणजे फाटलेलं इतकं जपून जोडणं की फट कुठे होती हेही दिसू नये.

.. .. पण हे काम सगळ्यांना जमत नाही.

कारण फक्त सुई-दोरा असला म्हणून रफू होत नाही.

त्यासाठी लागतात — वर्षांचा अनुभव, संयम, आणि कपड्याची भाषा समजणारे डोळे.

 

त्या दिवशी दादाभाईच्या दुकानात एक तरुण आला. हातात त्याने एक जुना स्वेटर धरला होता.

“भाई… हे रफू होईल का?”

भाईने भिंग लावून स्वेटर पाहिला. फट मोठी होती.

 

ते शांतपणे म्हणाले, “रफू होईल… पण वेळ लागेल.”

 तरुण थोडा चिडून म्हणाला, “इतका वेळ कशाला? दोन टाके मारले की झालं ना?”

 

भाई हलकंसं हसले.

“बाबा… दोन टाके मारणं म्हणजे शिवण.

पण रफू म्हणजे जखम लपवणं.”

 

 दुकानात एक वृद्ध माणूस बसलेला होता.

तो सगळं ऐकत होता. त्याने हळूच विचारलं ,

“भाई… कपड्याला रफू असतो…

पण नात्यांना असतो का?”

.. .. दुकानात क्षणभर शांतता पसरली.

 

त्या वृद्धाचं नाव होतं दत्ताभाऊ.

त्यांचा एक जिवलग मित्र होता — गणेश.

शाळेत एकत्र, कॉलेजात एकत्र, लग्नात एकमेकांच्या बाजूला.

लोक म्हणायचे,

“हे दोघे मित्र नाहीत…एका आत्म्याचे दोन भाग आहेत.”

 

पण आयुष्यात एक दिवस आला.

व्यवसायात पैसे आले.

पद, प्रतिष्ठा, सत्ता आली.

आणि त्याच्यासोबत आली —

.. .. अहंकाराची बारीक फट.

 

सुरुवातीला ती फट दिसलीच नाही. मग गैरसमज वाढले. एकमेकांवर शब्द झडले.

आणि एक दिवस…

.. .. नातं फाटलं.

 

दत्ताभाऊ हळू आवाजात म्हणाले,

“सुरुवातीला वाटलं… दोन फोन केले की सगळं ठीक होईल. पण अहंकाराचा दोरा खूप घट्ट असतो.”

 

वर्षं गेली.

.. दोघेही आपापल्या आयुष्यात मोठे झाले.

पण आत कुठेतरी एक जागा रिकामी राहिली.

 

भाई शांतपणे रफू करत होते.

ते म्हणाले,

“दत्ताभाऊ… कपडं फाटलं की लोक लगेच आणतात.

पण नातं फाटलं की लोक थांबतात.

अहंकार सुकू देतात… जखम खोल जाऊ देतात… .. आणि मग रफू करायला येतात तेव्हा…”

 

ते स्वेटर उचलून दाखवत म्हणाले,

“दोरा जुळत नाही… रंग जुळत नाही… आणि फट जास्त मोठी झालेली असते.”

 

दत्ताभाऊंच्या डोळ्यात पाणी आलं.

 

ते म्हणाले, “भाई… मग उपाय काय?”

 

भाईने सुई हळूच ठेवली.

.. “उपाय एकच… रफू लवकर करायचा.”

“फट दिसली की लगेच बसायचं.

दोरा संयमाचा, सुई समजुतीची, आणि गाठ माफीची.”

.. .. स्वेटर तयार झाला. फट कुठे होती हे ओळखूही येत नव्हतं.

 

तरुण आश्चर्याने म्हणाला,

“भाई… खरंच दिसत नाही!”

 

दादाभाई म्हणाले,

“कारण मी फक्त टाके मारले नाहीत.

कपड्याच्या धाग्यांतूनच धागा काढून रफू केला.”

 

दत्ताभाऊ उठले. त्यांनी फोन काढला. खूप वर्षांनी एक नंबर डायल केला.

 

फोनच्या दुसऱ्या बाजूने आवाज आला…

“हॅलो…?”

दत्ताभाऊंचा आवाज थरथरला.

“ गण्या, आपल्या मैत्रीला थोडा रफू करायचा आहे. वेळ आहे का?”

 

त्या दिवशी दादाभाई दुकान बंद करताना हळूच पुटपुटले , “कपड्याचा रफू मी करू शकतो. पण नात्यांचा रफू माणसांनी स्वतः करायचा असतो…

कारण –

– – फाटायला एक क्षण लागतो, पण रफू करायला कधी कधी संपूर्ण आयुष्य लागतं.”

लेखक : अज्ञात

प्रस्तुती : गौरी गाडेकr

संपर्क – 1/602, कैरव, जी. ई. लिंक्स, राम मंदिर रोड, गोरेगाव (पश्चिम), मुंबई 400104.

फोन नं. 9820206306

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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