हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # २७६ – कुछ दिनों से – १☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है, आपके काव्य संग्रह ‘उजास ही उजास‘ की एक भावप्रवण कविता – कुछ दिनों से।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २७६ – कुछ दिनों से – १ ✍

(काव्य संग्रहउजास ही उजास से )

कुछ दिनों से

अजब घटनाएँ घट रही हैं।

परिचितों के पाँवों में

बिमाइयाँ फट रही हैं

लोग

बड़ी आतुरता से / बड़े गौर से

देखते हैं मेरा चेहरा / मेरा मुख

शायद कोशिश करते हैं

मन की इबारत को पढ़ने की

जिसे कहते हैं दुख।

मुख और में दुख

कोई तालमेल नहीं

किसी के मुख को पढ़ लेना

दुख को हर लेना

हँसी खेल नहीं।

ज्यादा हुआ/ तो

हँसा जा सकता है

किसी विपत्ति में फँसे पर,

तिनके की जगह

फेंका जा सकता है पत्थर

धार में धँसे पर

बड़ी अलग सी बातें हैं

दुख में रहना

दुख को सहना

और

चुप रहना!

क्रमशः…

© डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # २७५ – “विपदा का क्या – क्या आशय है…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत “विपदा का क्या – क्या आशय है...”।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २७५ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “विपदा का क्या – क्या आशय है...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी 

जितने बेटे उतने कमरे,

कहाँ रहेगी माँ , यह भय है ।

बेशक यह बूढ़ी अम्मा का,

सुविधा वंचित कठिन समय है ॥

 

माता जो निश्चेष्ट बैठकर

देख रही करतब ।

क्या ग्यारस, रविवार दिवस –

तिथि अखरा करते सब ।

 

जिन बहुओं के होने का

वह गर्व सदा करती ।

उनकी घनाक्षरी के आगे

चकित,अचंभित ज्यों छप्पय है।

 

सुबह नाश्ता, दोपहरी हो

या फिर संध्या की ब्यालू ।

क्रम से बटे तीन हिस्सों में

पर माँ के हिस्से आलू –

 

की चीजें उस मधुमेही को

मिलती रहती हैं प्रतिदिन ।

जान सकी, पति न रहने की

विपदा का क्या – क्या आशय है॥

 

तीनों बहुयें स्वांग किया

करती हैं लोगों के आगे ।

” अम्मा जैसी सासू माँ से

भाग हमारे हैं जागे ।”

 

कोई अगर ना देखे तो

मुह फेर चली जाया करती ।

मगर लोग भी जान गये

उनका यह केवल अभिनय है ॥  

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

15 – 03 – 20 26

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – हँसी ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – हँसी ? ?

(यह रचना लिखते समय लगभग बीस वर्ष पहले पढ़ी महान कथाकार प्रेमचंद जी की कहानी ‘घासवाली’ का धुँधला चरित्र मस्तिष्क में था।)

भीड़ को चीरती-सी एक हँसी

मेरे कानों पर आकर ठहर गई थी

कैसी विद्रूप, कैसी व्यावसायिक

कैसी जानी-बूझी लंपट-सी हँसी थी

मैं टूटा था, दरक-सा गया था

क्या यह वही थी, क्या वह उसकी हँसी थी…..?

 

पुष्पा गाँव की एक घसियारिन थी,

सलीके से उसके  हाथ

आधा माथा ढके जब घास काटते थे

तो उसके रूप की कल्पना मात्र से

कई कलेजे कट जाते थे…..

 

थी फूल अनछुई-सी

जंगली घास में जूही-सी

काली भरी-भरी सी देह

बोलती बड़ी-बड़ी-सी सलोनी आँखें

मुझे शायद आँखों से सुंदर

उसमें तैरते उसके भाव लगते थे

भाव जिनकी मल्लिका को

शब्दों की जरूरत ही नहीं

यों ही नि:शब्द रचना रच जाती थी…..

पुष्पा थी तो मधवा की घरवाली

पर कुँआरी लड़कियाँ भी

उसके रूप से जल जाती थीं,

गांव के मरदों के अंदर के जानवर को,

कल्पनाओं में भी

उसका ब्याहता रूप नहीं भाता था

लोक-लाज-रिवाज़ों के कपड़ों के भीतर भी

उनका प्राकृत रूप नज़र आ ही जाता था…..

 

पुष्पा न केवल एक घसियारिन थी

पुष्पा न केवल एक ब्याहता थी

पुष्पा एक चर्चा थी, पुष्पा एक  अपेक्षा थी…..

 

गाँव के छोटे ठाकुर …… बस ठाकुर थे

नतीजतन रसिया तो होने ही थे,

जिस किसी पर उनकी नज़र पड़ जाती

वो चुपचाप उनके हुक्म के आगे झुक जाती,

मुझे लगता था गाँव की औरतों में भी

कोर्ई अपेक्षा पुरुष बसा है,

अपनी तंग-फटेहाल ज़िन्दगी में

कुछ क्षण ठाकु र के,

उन्हें किसी रुमानी कल्पना से कम नहीं लगते थे

काँटों की शैया को सोने के पलंग

सपने सलोने से कम नहीं लगते थे…..

 

खेतों के बीच की पतली-सी पगडंडी

डूबते क्षितिज को चूमता सूरज

पक्षियों क ा कलरव,

घर लौटते चौपायों का समूह

दूर जंगल में शेर की गर्जना

अपने डग घर की ओर बढ़ाती

आतांकित बकरियों की छलांग,

इन सब के बीच,

सारी चहचहाट को चीरते

गूँज रही थी पुष्पा की हँसी …..

 

सर पर घास का बोझ, हाथ में हँसिया

घर लौटकर, पसीना सुखाकर

कुएँ का एक गिलास पानी पीने की तमन्ना

मधवा से होने वाली जोरा-जोरी की कल्पना…..

 

स्वप्नों में खोई परीकुमारी-सी

ढलती शाम को चढ़ते यौवन-सा

प्रदीप्त करती अक्षत कुमारी-सी

चली जा रही थी पुष्पा …..

 

एकाएक,

शेर की गर्जना ऊँची हुई

मेमनों में हलचल मची

एक विद्रूप चौपाया

मासूम बकरी को घेरे खड़ा था

ठाकुर का एक हाथ मूँछोें पर था

दूसरा पुष्पा की कलाई पकड़े खड़ा था …..

 

हँसी यकायक चुप हो गई

झटके से पल्लूू वक्ष पर आ गया

सर पर रखा घास का झौआ

बगैर सहारे के तन गया था

हाथ की हँसुली

अब हथियार बन गया था…..

 

रणचंडी का वह रूप

ठाकुर देखता ही रह गया

शर्म से ऑँखें झुक गई

आत्मग्लानि ने खींचकर थप्पड़ मारा,

निःशब्द शब्दों की जननी

सारे भाव ताड़ गई

ठाकुर, पुष्पा को क्या ऐसी-वैसी समझा है

तू तो गाँव का मुखिया है

हर बहू-बेटी को होना तुझे रक्षक है

फिर क्यों तू ऐसा है,

क्यों तेरी प्रवृत्ति ऐसी भक्षक है …..?

 

ऐ भाई!

आज जो तूने मेरा हाथ थामा

तो ये हाथ रक्षा के लिये थामा,

ये मैंनेे माना है,

एक दूब से पुष्पा ने रक्षाबंधन कर डाला था,

ठाकुर के पाप की गठरी को

उसके नैनों से बही गंगा ने धो डाला था,

ठाकुर का जीवन बदल चुका था

छोटे ठाकुर, अब सचमुच के ठाकुर थे…..

 

पुष्पा की हँसी का मैं कायल हो गया था

निष्पाप, निर्दोष छवि का मैं भक्त हो चला था,

फिर शहर में घास बेचती

ग्राहकों को लुभाकर बातें करती

ये विद्रूप हँसी, ये लंपट स्वरूप,

पुष्पा तेरा कौन-सा है सही रूप ?

 

उसे मुझे देख लिया था

पर उसकी तल्लीनता में

कोई अंतर नहीं आया था,

उलटे कनखियों से

उसे देखने की फ़िराक़ में

मैं ही उसकी आँखों से जा टकराया था

वह फिर भी हँसती रही……

गाँव के खेतों के बीच से जाती

उस संकरी पगडंडी पर

उस शाम पुष्पा फिर मिली थी

वह फिर हँसी थी…..

 

बोली, बाबूजी! जानती हूँ,

शहर की मेरी हँसी

तुमने गलत नहीं मानी है,

पुष्पा वैसी ही है

जैसी तुमने शुरू से जानी है

हँसती चली गई, हँसती चली गई

हँसती-हँसती चली गई दूर तक…..

 

अपने चिथड़ा-चिथड़ा हुए

अस्तित्व को लिए

निस्तब्ध, लज्जित-सा मैं

क्षितिज को देखता रहा

जाती पुष्पा के पदचिह्नों को घूरता रहा,

खुद ने खुद से प्रश्न किया

ठाकुर और तेरे जैसों की

सफेदपोशी क्या सही थी,

उत्तर में गूँजी फिर वही हँसी थी !

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ गुरुवार 12 मार्च से हमारी आपदां अपहर्तारं साधना आरंभ होगी। यह श्रीराम नवमी तदनुसार गुरुवार दि. 26 मार्च तक चलेगी। 🕉️ 

💥 इस साधना में श्रीरामरक्षा स्तोत्र एवं श्रीराम स्तुति का पाठ होगा‌। मौन साधना एवं आत्मपरिष्कार भी साथ-साथ चलेंगे।💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ शेष कुशल # ६०☆ व्यंग्य – “किस्सा-ए-अंकल सैम और मरहूम मासूम बच्चियाँ…” ☆ श्री शांतिलाल जैन ☆

श्री शांतिलाल जैन

(आदरणीय अग्रज एवं वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री शांतिलाल जैन जी विगत दो दशक से भी अधिक समय से व्यंग्य विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी पुस्तक  ‘न जाना इस देश’ को साहित्य अकादमी के राजेंद्र अनुरागी पुरस्कार से नवाजा गया है। इसके अतिरिक्त आप कई ख्यातिनाम पुरस्कारों से अलंकृत किए गए हैं। इनमें हरिकृष्ण तेलंग स्मृति सम्मान एवं डॉ ज्ञान चतुर्वेदी पुरस्कार प्रमुख हैं। श्री शांतिलाल जैन जी के  स्थायी स्तम्भ – शेष कुशल  में आज प्रस्तुत है उनका एक अप्रतिम और विचारणीय व्यंग्य  किस्सा-ए-अंकल सैम और मरहूम मासूम बच्चियाँ…” ।)

☆ शेष कुशल # ६० ☆

☆ व्यंग्य – “किस्सा-ए-अंकल सैम और मरहूम मासूम बच्चियाँ – शांतिलाल जैन 

आदाब, नमस्कार. खुशामदीद ख़वातीन-ओ-हज़रात. सुनो सुनो. सात समंदर पार का दर्दनाक किस्सा सुनो. चश्म-ए-नम कर देने वाला किस्सा सुनो. दिल चीर देने वाला किस्सा सुनो. सीना चाक न कर दे तो नाम बदल देना किस्सागो का.

यूँ तो सुने आपने अब तक किस्से बादशाहों के, शहंशाहों के, राजाओं के, महाराजाओं के, निज़ाम के, सियासी रहनुमाओं के. आज सुनिए आप किस्सा-ए-अंकल सैम और मरहूम मासूम बच्चियाँ. एक रहे आए अंकल सैम, पढ़े लिखे अंकल सैम! सभ्य अंकल सैम! समृद्ध अंकल सैम! दुनिया के चौधरी अंकल सैम! पर्शिया में निज़ाम बदलवाने निकले अंकल सैम! असली मकसद तो तेल बेचना. तेल बेचने निकले अंकल सैम! तेल कब्ज़ाने निकले अंकल सैम! तेली नंबर-वन का मिशन लिए निकले अंकल सैम! क्रूर अंकल सैम! लालच में अंधे अंकल सैम! पर्शियन ख़वातीनों को आज़ाद कराने निकले, एक सौ पैसठ बच्चियों को फ़ानी दुनिया से आज़ाद करा बैठे.

वो कैसे किस्सागो ?

ख़वातीन-ओ-हज़रात, खुलुक खुदा का, मुलुक अंकल सैम का, हुकुम ट्रंप साहेब का. हुकुम हुआ मिसाईल चलाने का. टॉमहॉक चली तो गिरी जाकर मिनाब शहर के इलेमेंट्री स्कूल पर. अल्लाह को प्यारी हो गईं डेढ़ सैंकड़ा बच्चियाँ. न डॉलर जानती थीं न पेट्रो डॉलर. न टैरिफ न बेलेंस ऑफ़ पेमेंट. मरहूम बच्चियाँ. मासूम बच्चियाँ. अम्मी-अब्बू की उम्मीदों की बच्चियाँ. उनकी अँखियों की नूर बच्चियाँ. टूटे ख्वाबों की बच्चियाँ. उनके ख्वाबों में तालीम थी. ख्वाब टीचर बनने के. ख्वाब डॉक्टर बनने के. ख्वाब साइंटिस्ट बनने के. अम्मी जैसा घर बसाने के ख्वाब. अपने हिस्से की आधी दुनिया को खूबसूरत बनाने के ख्वाब. अंकल सैम की नफ़रत, हिंसा और क्रूरता से चूर चूर ख्वाब.

ख़वातीन-ओ-हज़रात,  बच्चियों से पुरानी दुश्मनी रही आई अंकल सैम की. एक्जोटिक आईलेंड पर छोटी छोटी बच्चियों के साथ मुँह काला करके आए थे, छोटी छोटी बच्चियों के स्कूल पर मिसाईल दाग बैठे. चमड़ी का रंग सफ़ेद मगर हरकतों में मुँह काला, हाथ काले, काला ही ठहरा मन. चले थे शांति का नोबेल लेने, अबोध बालिकाओं का वध कर बैठे. मस्ती के मंज़र एपस्टीन की फाईल में, तबाही का मंज़र स्कूल के दालान में. अधजले दुपट्टे, अधखाए लंच बॉक्स, बिखरे स्कूल बेग, बिखरी पॉकेट मनी, खून से लथपथ होमवर्क की कॉपियाँ, कॉपियों में यहाँ वहाँ चितरी बे-तरतीब ड्राईंग, गुस्सैल टीचर के मुँह चिढ़ाते रेखाचित्र, जुगराफियों के तितर-बितर नक़्शे, नक्शों पर खीचीं सरहदें बदलने की ज़िद में चली टॉमहॉक मिसाईल. काँप उठी कायनात, बच्चियों की चीख से नहीं, खामोश जन्नत नशींनी से. 

हाँ तो ख़वातीन-ओ-हज़रात,  इसके बाद किस्से में रह ही क्या जाता है. अलबत्ता, जंग जारी है. जंग के किस्से ख़त्म नहीं होते… रुंध जाए गला किस्सागो का तो किस्से को विराम लेना ही होता है. अलविदा.

अरे!! रुको रुको किस्सागो, चश्म-ए-नम तो हमारी भी हैं मगर इतना तो बताते जाओ उसी समय जंबूद्वीप में क्या हुआ?

कुछ नहीं हुआ ख़वातीन-ओ-हज़रात. एक होर्डिंग खड़ा था वहाँ, अपने सीने पर बड़े बड़े हर्फ़ों में एक जागतिक नारा चस्पाँ किए – ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’.  होर्डिंग ख़ामोश खड़ा रहा.

होर्डिंग अब भी ख़ामोश है.

-x-x-x-

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© शांतिलाल जैन 

बी-8/12, महानंदा नगर, उज्जैन (म.प्र.) – 456010

9425019837 (M)

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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English Literature – Weekly Column ☆ Witful Warmth # 66 – Love Merger: An Advanced Love Story… ☆ Dr. Suresh Kumar Mishra ‘Uratript’ ☆

Dr. Suresh Kumar Mishra ‘Uratript’

Dr. Suresh Kumar Mishra, known for his wit and wisdom, is a prolific writer, renowned satirist, children’s literature author, and poet. He has undertaken the monumental task of writing, editing, and coordinating a total of 55 books for the Telangana government at the primary school, college, and university levels. His editorial endeavors also include online editions of works by Acharya Ramchandra Shukla.

As a celebrated satirist, Dr. Suresh Kumar Mishra has carved a niche for himself, with over eight million viewers, readers, and listeners tuning in to his literary musings on the demise of a teacher on the Sahitya AajTak channel. His contributions have earned him prestigious accolades such as the Telangana Hindi Academy’s Shreshtha Navyuva Rachnakaar Samman in 2021, presented by the honorable Chief Minister of Telangana, Mr. Chandrashekhar Rao. He has also been honored with the Vyangya Yatra Ravindranath Tyagi Stairway Award and the Sahitya Srijan Samman, alongside recognition from Prime Minister Narendra Modi and various other esteemed institutions.

Dr. Suresh Kumar Mishra’s journey is not merely one of literary accomplishments but also a testament to his unwavering dedication, creativity, and profound impact on society. His story inspires us to strive for excellence, to use our talents for the betterment of others, and to leave an indelible mark on the world.

Some precious moments of life

  1. Honoured with ‘Shrestha Navayuvva Rachnakar Samman’ by former Chief Minister of Telangana Government, Shri K. Chandrasekhar Rao.
  2. Honoured with Oscar, Grammy, Jnanpith, Sahitya Akademi, Dadasaheb Phalke, Padma Bhushan and many other awards by the most revered Gulzar sahab (Sampurn Singh Kalra), the lighthouse of the world of literature and cinema, during the Sahitya Suman Samman held in Mumbai.
  3. Meeting the famous litterateur Shri Vinod Kumar Shukla Ji, honoured with Jnanpith Award.
  4. Got the privilege of meeting Mr. Perfectionist of Bollywood, actor Aamir Khan.
  5. Meeting the powerful actor Vicky Kaushal on the occasion of being honoured by Vishva Katha Rangmanch.

Today we present his SatireLove Merger: An Advanced Love Story.  

☆ Witful Warmth# 66 ☆

☆ Satire ☆ Love Merger: An Advanced Love Story… ☆ Dr. Suresh Kumar Mishra ‘Uratript’ ☆ 

It was a golden, high-tech morning in the year 2050. The atmosphere in the neighborhood’s “Oxygen Park” was unique. Two elderly men sat there with oxygen cylinders on their shoulders, opening the “files” of their vintage memories. They were reminiscing about the old days when lovers would stand outside houses and perform “manual tasks” like throwing pebbles at windows. Today, however, was the era of remote romance and cloud-based attachments.

Nearby, a young man named Alex-Paul was checking data on his smart glasses and sighing deeply. Seeing this, his friend Cyber-Sylvester asked, “What’s wrong, bro? Did your girlfriend log out with someone else, or did your emotional cloud crash?”

Alex gave a philosophical smile, looking like a man who had just suffered a massive spiritual loss. He said, “No man, the tragedy is that she’s back! I sent my partner, Zara-Quantum, on a three-month ‘free trial’ to a neighbor so she could upgrade her exploration skills. But now she says she wants to renew my subscription! This is total backwardness! She should have been progressive and multi-tasking. She should have been making HD reels of strangers, but instead, she’s back here talking about making tea and being ‘loyal.’ I’m thinking of suing her in the Emotional Consumer Court!”

Cyber-Sylvester comforted him, “Don’t worry, society is in a transition phase. Slowly, she’ll learn to be ‘open-source’ with others.”

Actually, Alex’s pain was twofold. He was hurt because Zara was “dumping” him at home instead of launching him into the international market. He wanted Zara to “offer” him at a high-profile Metaverse kitty party so he could realize his global marketing value. He was annoyed that while the whole world followed the “sharing economy,” Zara treated him like a private asset or household furniture. He dreamed of a modern type of bravery—where Zara would send him on a date with another woman, lock the door from the outside, and live-stream the data to win a “Gold Medal for Progressive Partners.”

Meanwhile, pseudo-intellectuals were holding a seminar at a five-star center. They claimed old-fashioned lovers were “unprofessional” because they got jealous and violent. A “Relationship Algorithm Specialist” shouted from the stage, “Friends! Real manhood isn’t about holding her in your arms; it’s about live-streaming and gathering social media likes! A lover who doesn’t shortlist a second lover for his girlfriend is not a lover—he’s a ‘Love-Terrorist’!”

Finally, Alex gave Zara-Quantum an ultimatum: “Zara, if you don’t go on date with a stranger by next week and send me the ‘Behind the Scenes’ photos and sensory data, I will block you from my life’s friend-list forever!”

Poor Alex just wanted his girlfriend to join the mainstream and be “evolved.” By 2050, this new relationship model was seen as a sustainable solution to old crimes. Possessiveness was now declared a serious mental illness, and “sharing” was the highest virtual virtue. New-age lovers like Alex believed that murder was a “waste of resources and data loss,” while sharing a girlfriend was a long-term social investment.

Alex’s mind had become so “global” that he started looking for new paths for himself. He created a profile on the “Dating App (Ultra-Pro-Max Version).” He layered so many AI masks and digital filters on his face that if his own DNA report saw him, it would mistake him for a tourist from another planet and ask for dollars! Under all that digital makeup, he had forgotten his real identity.

That night, he saw a profile: Neo-Night-Rider. The avatar was so magical and shiny that Alex’s heart started racing at gigabyte speed. He thought this was the perfect stranger to “acquire” for Zara to boost his social standing. He hit Super-Like, Mega-Like, and even God-Like! He had no idea who was behind that digital screen.

Eventually, Zara succeeded in her mission to find a new boyfriend. Alex was so happy he started dancing in his Virtual Reality suit and distributed “Digital Sugar-Free Laddu” coupons to the whole neighborhood. “My Vision 2050 is a success!” he cheered.

Just then, Zara video-called him. “Alex darling, your recommendation worked! I found my secondary partner—and guess what? You recommended him yourself by Super-Liking him last Sunday! Meet your new relative and my new project!”

Zara turned the camera. Alex’s eyes nearly popped out. Sitting on the sofa was his own younger brother, Sonu-Cyber, wearing Alex’s favorite T-shirt and grinning.

“Sonu? You?” Alex stammered. “But I liked Neo-Night-Rider who had six-pack abs and a robotic supermodel face!”

Sonu-Cyber laughed. “Big brother, in 2050, faces are just ‘display ads.’ I bought that filter on the Dark Web. You taught me that hiding your identity is ‘progress.’ So I thought, why let the family wealth go outside? When I saw your Super-Like, I took it as a divine sign for a family collaboration!”

Alex was an “evolved” man of 2050. After a moment of confusion, he started laughing loudly. “Wow! This is maximum output! At least now I don’t have to pay for petrol, Wi-Fi data, or restaurant bills for her dates. I can monitor this ‘in-house project’ myself. And Sonu, you’ll make the smart-coffee tomorrow because you’re the ‘Intern Lover’ now!”

But Zara had one more bomb to drop. “Alex, Sonu has a return gift for you. He matched your profile with ‘Madam-Moon’ from our neighborhood—the one who has had three divorces and five renewals. She’s inviting you for a candle-light dinner to show you her ‘vintage emotional data’ collection. Sonu says everyone must do their ‘sharing duty’ to be a holistic family.”

Alex’s eyes filled with joy. “Amazing! A hybrid model of old traditions and new progress!”

Suddenly, a Robotic Police officer arrived at the door. “Alex sir, your brother Sonu and girlfriend Zara have ‘logged you out’ of this house. They deleted your profile from the ‘agreement’ and rented your room on the Metaverse to a foreign partner. You are now a ‘Freelance Lover.’ Please find a new software and a new roof.”

Alex looked at his phone, sighed, and smiled. “No problem! At least now I am ‘unlimited’ and ‘unbound!’ Rejection is just a system update.”

Outside, Madam-Moon was honking her electric scooter. Alex ran to sit on the back seat. In the morning of 2050, Alex proved that as long as the “sharing data packet” is active, resources and emotions never end—whether it’s a room or a heart.

The elderly neighbor watched this, ripped off his oxygen mask, and thought, “Death is better than this ‘progressive’ air.” But Alex just waved goodbye and disappeared with Madam-Moon.

It’s true—no one lost here; everyone just got “shared.” Whether Alex was looted or became “globally free” is a decision only the algorithms of 2050 can make.

****

Note: It is not necessary that the editorial board agrees with the opinions/views expressed in the satire/article.

© Dr. Suresh Kumar Mishra ‘Uratript’

Contact : Mo. +91 73 8657 8657, Email : drskm786@gmail.com

≈ Blog Editor – Shri Hemant Bawankar/Editor (English) – Captain Pravin Raghuvanshi, NM ≈

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हिंदी साहित्य – आलेख ☆ जब शिक्षा जीवन का दीपक बन जाती है ☆ श्री जगत सिंह बिष्ट ☆

श्री जगत सिंह बिष्ट

(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker.)

👷🏻‍♂️जब शिक्षा जीवन का दीपक बन जाती है👷🏻‍♂️

👷🏻‍♂️नवपीढ़ी के लिए आशीर्वचन,

परिवार के लिए गौरव का क्षण👷🏻‍♂️

“शिक्षा का कोई अन्त नहीं होता। ऐसा नहीं है कि आपने कोई पुस्तक पढ़ ली, परीक्षा पास कर ली और शिक्षा समाप्त हो गई। जन्म से लेकर मृत्यु तक सम्पूर्ण जीवन ही सीखने की प्रक्रिया है।”

जे. कृष्णमूर्ति

जीवन में कभी-कभी ऐसे क्षण आते हैं जब मन अपने आप कृतज्ञता से भर उठता है। यह केवल इसलिए नहीं कि किसी ने सफलता प्राप्त की है, बल्कि इसलिए कि वह सफलता विनम्रता, परिपक्वता और सौम्यता के साथ आई है। ऐसे क्षण हमें आश्वस्त करते हैं कि जिन मूल्यों को हम अपने जीवन में संजोकर रखते आए हैं, वे आज भी अगली पीढ़ी तक पहुँच रहे हैं।

हर माता-पिता की यही कामना होती है कि उनके बच्चे सुखी हों, आगे बढ़ें और जीवन में सफल हों। वे चाहते हैं कि उनके बच्चे केवल परीक्षाओं में ही नहीं, बल्कि जीवन की कसौटियों पर भी खरे उतरें। परन्तु आज के समय में अपने बच्चों के लिए सही शिक्षा और सही दिशा चुनना कभी-कभी एक चुनौती भी बन जाता है।

वास्तव में, सच्ची शिक्षा केवल पुस्तकों और अंकों तक सीमित नहीं होती। एक श्रेष्ठ शिक्षण संस्था का उद्देश्य केवल अपने विद्यार्थियों को परीक्षा में सफल बनाना नहीं होता, बल्कि उन्हें संवेदनशील, जिम्मेदार और समाज के उपयोगी नागरिक के रूप में विकसित करना भी होता है।

👷🏻‍♂️जब शिक्षा मन और हृदय

दोनों को सँवारती है👷🏻‍♂️

आजकल शिक्षा के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण विचार सामने आया है, जिसे “पॉज़िटिव एजुकेशन” (Positive Education) कहा जाता है। इसका अर्थ है—पारम्परिक शिक्षा को सुख, संतोष और जीवन-कल्याण के अध्ययन के साथ जोड़ना।

पॉज़िटिव एजुकेशन विद्यार्थियों को केवल ज्ञान ही नहीं देती, बल्कि उन्हें जीवन जीने की कला भी सिखाती है—

सुदृढ़ सम्बन्ध बनाना, सकारात्मक भावनाएँ विकसित करना, कठिन परिस्थितियों में धैर्य बनाए रखना, सजगता (माइंडफुलनेस) का अभ्यास करना और स्वस्थ जीवन शैली अपनाना।

प्रख्यात मनोवैज्ञानिक मार्टिन सेलिगमैन का कहना है—

“युवा पीढ़ी को कार्यक्षेत्र के कौशल तो सीखने ही चाहिए, जिन पर पिछले दो सौ वर्षों से शिक्षा प्रणाली केन्द्रित रही है। परन्तु अब हम उन्हें जीवन-कल्याण के कौशल भी सिखा सकते हैं—जैसे अधिक सकारात्मक भावनाएँ, जीवन में अर्थ, बेहतर सम्बन्ध और सार्थक उपलब्धियाँ।”

इसी प्रकार प्रसिद्ध शोधकर्ता एंजेला डकवर्थ शिक्षा के मूल लक्ष्य को बहुत सरल शब्दों में परिभाषित करती हैं—

“बुद्धिमत्ता के साथ चरित्र — यही सच्ची शिक्षा का लक्ष्य है।”

उनके अनुसार चरित्र का निर्माण तीन प्रकार की शक्तियों से होता है—

हृदय की शक्तियाँ — दूसरों को देना और उनसे प्रेम प्राप्त करना;

मस्तिष्क की शक्तियाँ — सोचना, कल्पना करना और सृजन करना;

इच्छाशक्ति की शक्तियाँ — आत्मसंयम, दृढ़ता और संकल्प।

जब ये तीनों गुण एक साथ विकसित होते हैं, तभी शिक्षा वास्तव में जीवन को आलोकित करने वाली शक्ति बनती है।

👷🏻‍♂️एक ऐसा क्षण जिसने मन को गहरे संतोष से भर दिया👷🏻‍♂️

हम जैसे बुज़ुर्ग लोग कभी-कभी यह सोचकर चिन्तित हो उठते हैं कि आज की तेज़ रफ्तार दुनिया में हमारी युवा पीढ़ी किस दिशा में जा रही है। परन्तु समय-समय पर जीवन ऐसे सुखद संकेत भी देता है जो मन को आश्वस्त कर देते हैं।

ऐसा ही एक सुखद अनुभव मुझे उस समय हुआ जब मैंने अपने भतीजे लविश सिंह का यह पोस्ट पढ़ा। लविश ने वर्ष 2025 में IIITDM कर्नूल से कम्प्यूटर साइंस एंड इंजीनियरिंग में स्नातक करते हुए न केवल अपनी शाखा में बल्कि सभी बी.टेक. कार्यक्रमों में प्रथम स्थान प्राप्त किया और स्वर्ण पदक से सम्मानित हुए। वर्तमान में वे भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc), बेंगलुरु में कम्प्यूटेशनल और डेटा साइंस में एम.टेक. कर रहे हैं।

मुझे सबसे अधिक गर्व इस बात पर हुआ कि इस उपलब्धि के साथ उनके शब्दों में जो विनम्रता, कृतज्ञता और जीवन-दृष्टि झलकती है, वह किसी भी बड़े सम्मान से कम नहीं है।

मैं उनका पोस्ट ज्यों का त्यों आपके साथ साझा कर रहा हूँ—

👷🏻‍♂️Post of Lavish Singh:

“With profound humility and heartfelt gratitude, I share that I have been honoured with the Gold Medal as both the Branch Topper in Computer Science & Engineering and the Overall Topper of the graduating batch at IIITDM Kurnool 2021-2025.

“This achievement is not mine alone. It has been made possible by the incessant showers of blessings and grace from the great lineage of gurus whose wisdom continues to guide me, the unconditional love, sacrifice, and faith of my parents bestowed upon me as a privilege, the steadfast support of my family, who have been my anchor through every phase, the friendship, camaraderie, and shared aspirations of my friends, who made every moment meaningful and the contributions of every individual and well wishers who encouraged and supported me in countless ways.

“I have officially graduated with a B.Tech degree in Computer Science & Engineering, carrying not just academic laurels, but a deeper understanding of discipline, resilience, and community. This milestone is both a culmination and a beginning, a responsibility to contribute with purpose, to learn with humility, and to grow with compassion.

“As I move forward, I hold close the values instilled in me by all those who walked with me on this journey. I am immensely grateful.

ॐ सह नाववतु।

सह नौ भुनक्तु।

सह वीर्यं करवावहै।

तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै।

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥

(Om saha nāvavatu, saha nau bhunaktu, saha vīryaṃ karavāvahai | tejasvi nāvadhītamastu mā vidviṣāvahai, Om śāntiḥ śāntiḥ śāntiḥ||)

“May the spirit of learning, mutual respect, and peace always guide us.”

👷🏻‍♂️नवपीढ़ी के प्रति विश्वास👷🏻‍♂️

इन शब्दों को पढ़ते हुए मन में एक गहरा विश्वास जागता है कि आने वाला समय सचमुच उज्ज्वल हाथों में है। शैक्षणिक उपलब्धियाँ निस्संदेह महत्वपूर्ण हैं, परन्तु जब उनके साथ विनम्रता, कृतज्ञता और समाज के प्रति उत्तरदायित्व की भावना भी जुड़ जाती है, तब वे और भी अर्थपूर्ण हो जाती हैं।

लविश और उनके जैसे असंख्य युवा आज केवल ज्ञान अर्जित नहीं कर रहे, बल्कि चरित्र का निर्माण भी कर रहे हैं। वे हमें यह विश्वास दिलाते हैं कि शिक्षा आज भी एक पवित्र यात्रा हो सकती है—ज्ञान की, सेवा की और आत्म-विकास की।

लविश के लिए एक बड़े का स्नेहिल आशीर्वाद—

तुम्हारी प्रतिभा निरन्तर उज्ज्वल होती रहे, जिज्ञासा सदैव जीवित रहे और विनम्रता तुम्हारे व्यक्तित्व की आधारशिला बनी रहे। भारतीय विज्ञान संस्थान में तुम्हारी यह नई यात्रा ज्ञान और सेवा के और भी विस्तृत क्षितिज खोले। और तुम अपने माता-पिता, गुरुओं, परिवार और सभी शुभचिन्तकों का नाम सदैव रोशन करते रहो।

साथ ही यह संदेश समूची युवा पीढ़ी के लिए है—

हमें तुम पर विश्वास है, तुम्हारी क्षमता पर भरोसा है, और हम उस उज्ज्वल भविष्य की प्रतीक्षा कर रहे हैं जिसे तुम अपनी प्रतिभा और संवेदनशीलता से गढ़ोगे।

क्योंकि जैसा कि कृष्णमूर्ति ने कहा है—

सीखने की यात्रा कभी समाप्त नहीं होती।

वह जीवन की धारा की तरह निरन्तर बहती रहती है—गहराती हुई, फैलती हुई और अपने स्पर्श से जीवन को समृद्ध करती हुई।👷🏻‍♂️

 

#गौरव_का_क्षण

#नई_पीढ़ी_पर_विश्वास

#जीवनभर_सीखना

#चरित्र_और_शिक्षा

#युवा_भारत

#आशीर्वाद

#ज्ञान_की_यात्रा

© श्री जगत सिंह बिष्ट

साधक

LifeSkills

A Pathway to Authentic Happiness, Well-Being & A Fulfilling Life! We teach skills to lead a healthy, happy and meaningful life.

The Science of Happiness (Positive Psychology), Meditation, Yoga, Spirituality and Laughter Yoga. We conduct talks, seminars, workshops, retreats and training.

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संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # २२ – हास्य-व्यंग्य – “पीर, बावर्ची, भिश्ती, खर याने मास्टर” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।

प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन

आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय व्यंग्य  “पीर, बावर्ची, भिश्ती, खर याने मास्टर

साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # २२

☆ व्यंग्य ☆ “पीर, बावर्ची, भिश्ती, खर याने मास्टर” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव

शिक्षक “पीर, बावर्ची, भिश्ती, खर” है। लोग मानते हैं कि शिक्षक से कुछ भी कराया जा सकता है। इसे यदि आप सम्मानजनक शब्दों में कहना चाहे तो शिक्षकों को सर्वगुण सम्पन्न भी कह सकते हैं। हमारे देश का सौभाग्य है कि चाहे यहां के पुराने राजा – महाराजा रहे हों अथवा आज के सरकारी प्रमुख सभी गुणों के पारखी होने के साथ साथ गुण ग्राहक भी हैं। इसका एक ताजा उदाहरण सामने आया है। अब मध्यप्रदेश सरकार ने कॉलेजों के परिसरों में आवारा पशुओं के प्रवेश को रोकने का जिम्मा प्राचार्यों को सौंप दिया है। 11 मार्च 26 को भास्कर समाचार पत्र में प्रकाशित समाचार के अनुसार “प्रदेश के सभी सरकारी और निजी कॉलेजों तथा विश्वविद्यालय परिसरों में आवारा पशु और कुत्तों की एंट्री रोकने के लिए उच्च शिक्षा विभाग ने निर्देश जारी किया हैं। कॉलेजों में प्राचार्य या प्रभारी प्राचार्य को नोडल अधिकारी बनाया गया है, जो परिसर की सुरक्षा करने और वहां आवारा पशुओं को रोकने की व्यवस्था सुनिश्चित करेंगे। विभाग ने निर्देश दिए हैं कि नोडल अधिकारी का नाम और मोबाइल नम्बर परिसर में प्रदर्शित किया जाए। जरूरत पड़ने पर स्थानीय निकायों से सहयोग लिया जाए। समाचार बड़ा है अंत में क्षेत्रीय अतिरिक्त संचालकों को सभी कॉलेजों में इन निर्देशों के पालन की जांच कर रिपोर्ट भेजने के लिए कहा गया है। बताया गया कि यह आदेश सुप्रीम कोर्ट के एक प्रकरण में दिए गए निर्देशों के पालन में जारी किया गया है। लोग कहते हैं कि शिक्षक ठान ले तो क्या नहीं कर सकता ? जो सभ्यता – संस्कृति, देश और सरकार तक को बना और बिगाड़ सकता है क्या वह कालेज और विश्वविद्यालय के परिसरों से आवारा पशुओं, कुत्तों को नहीं भगा सकता क्या ? यहां विचारणीय यह है कि आवारा पशुओं को परिसरों से किस विधि से भगाया जाए, परिसर में “पशुओं का प्रवेश वर्जित” लिखे पोस्टर लगाने या उन्हें सम्मान पूर्वक भगाने से तो वे नहीं भागेंगे। उन्हें हट – हट कहते हुए भगाया जाए, छड़ी या डंडा दिखाकर अथवा मारकर  भगाया जाए आखिर परिसर में अवैध घुसपैठ करने वाले पशुओं को कैसे भगाया जाए, इसका उल्लेख सरकारी निर्देश में नहीं किया गया है। कुछ कालेज प्राचार्य भयभीत हैं कि यदि वे अपने सोचे किसी तरीके से आवारा पशुओं को भगाते हैं और यदि वह तरीका उन आवारा पशुओं के पालकों, पशु प्रेमियों अथवा सरकार को पसंद नहीं आता तब क्या होगा ?

अतः कुछ कॉलेजों के प्राचार्य स्टाफ मीटिंग करके, कुछ प्राचार्य क्षेत्रीय समाजसेवियों – नेताओं से विचार विमर्श करके आवारा पशुओं को परिसरों से भगाने का सर्वमान्य तरीका खोजना चाह रहे हैं। सरकारी आदेशों – निर्देशों को अपने चातुर्य से लंबे समय तक लटकाए रखने में  माहिर एक प्राचार्य ने नाम गोपनीय रखने की शर्त पर बताया कि वे इस सरकारी आदेश पर सरकार से यह मार्गदर्शन मांगने पत्र भेज रहे हैं कि आवारा पशुओं को भगाने के लिए कौन – कौन से उपाय किए जा सकते हैं। किसी प्रकार का विवाद होने की स्थिति में नोडल अधिकारी के पास क्या विशेषाधिकार होंगे आदि – आदि।

मैं यह लिख ही रहा था कि आवारा कुत्तों पर नियंत्रण संबंधी नगर पालिका निगम, जबलपुर के सहायक आयुक्त सह स्वास्थ्य अधिकारी का एक पत्र भी वाट्स एप पर देखने मिला। इसे पढ़कर लगा कि शायद सुप्रीम कोर्ट के डर से आवारा पशुओं, कुत्तों आदि पर नियंत्रण को लेकर शासन – प्रशासन की नींद खुल गई है। नगर निगम ने समस्त शासकीय – अशासकीय शिक्षण संस्थाओं, अस्पतालों, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों, मेडिकल कॉलेज, खेल स्टेडियमों, बस स्टेंडों, रेलवे स्टेशनों आदि को आवारा पशुओं, कुत्तों से मुक्त रखने नोडल अधिकारी नियुक्त करने दिशा निर्देश जारी किए हैं। परिसरों की बाउंड्रीवाल बनवाने – सुधारने, गेट लगाने/सुधारने, साफ सफाई रखने के निर्देश भी दिए गए हैं। तीन माह में नगर निगम कमेटी सभी जगह निरीक्षण करके सुनिश्चित करेगी कि सब ठीक चल रहा है। कुछ हो न हो बाउंड्रीवाल और गेट आदि बनवाने/ सुधरवाने के टेंडर तो हो ही जाएंगे। इसमें कमीशन बाजी का अंदेशा तो है ही। अब आगे तीन माह बाद तब लिखूंगा जब नगर निगम का एक निरीक्षण हो जाएगा।

यहां एक बात और विचारणीय है कि जब इन परिसरों में आराम फरमा रहे आवारा पशुओं को सड़कों पर खदेड़ा जाएगा तब राहगीरों की सुरक्षा का क्या होगा। पुलिस आवारा पशुओं का चालान कटेगी क्या ?

 

© श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर – पिन – 482002 मो. 9425153629

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २५६ ☆ # “परीक्षा…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता परीक्षा…”।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २५६ ☆

☆ # “परीक्षा…” # ☆

जीवन के हर मोड़ पर

हर पल हर क्षण

विधाता परीक्षा लेता है

एक सबक सबको देता है

छोटा हो या बड़ा

गरीब हो या अमीर

सबको एक मौका देता है

बचपन में पाठशाला होती है

मिडिल स्कूल होती है

उसके बाद हायर सेकेंडरी

उसके बाद कॉलेज में

आगे की पढ़ाई होती है

कॉलेज से निकलकर

जीवन के  अथाह सागर में

आपके ज्ञान की

तजुर्बा और

स्किल की आजमाइश होती है

स्पर्धा के इस युग में

गला काट प्रतियोगिता होती है

कुछ पास होते हैं

कुछ फेल होते हैं

दृढ़ निश्चय  वाले

निराशा में संयम नहीं खोते हैं

कई बार प्रयास करते हैं

कभी जीत तो कभी हार होती है

संघर्ष के इस दौर में

मेहनत और संकल्प से

हर कठिनाई पार होती है

ज्ञान के सागर की कोई सीमा नहीं है

ज्ञान प्राप्त करने का कोई फार्मूला

कोई तेज या कोई धीमा नहीं है

बस लगन, कड़ी मेहनत और समर्पण ही जरूरी है

इसके बिना लक्ष्य प्राप्त करने की जिद अधूरी है

यह आपके जीवन के हर ध्येय की समीक्षा है

जीवन भर हर व्यक्ति को कदम कदम पर देनी पड़ती परीक्षा है /

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अभिव्यक्ति # -९९ – शब्द अनमोल… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता शब्द अनमोल।)

☆ अभिव्यक्ति # ९९ ☆ शब्द अनमोल☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

शब्दों से ही रूठे तुम,

शब्दों से ही मना लिया,

शब्द कितने घातक हैं,

शब्दों से ही बता दिया,

*

शब्द मरहम बनते हैं,

शब्द ही घाव देते हैं,

बोल से पहले सोचिए,

शब्द ही लगाव देते हैं,

*

जब इंसान लड़ते हैं,

शब्द मुस्कराते हैं,

शब्दों के तीर चलते हैं,

शब्द ही लहराते हैं,

*

तोल मोल कर बोलिए,

जब भी बोलें बोल,

शब्द तब ही बोलिए,

जब मौन से हों अनमोल.

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९४४ ⇒ इशारों इशारों में ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “इशारों इशारों में।)

?अभी अभी # ९४४ ⇒ आलेख – इशारों इशारों में ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

अजनबी तो बन के करो ना इशारा! कल एक होटल में जन्मदिन की पार्टी में जाने का अवसर प्राप्त हुआ। शायद वह दुनिया की पहली महिला होगी, जो घोषित रूप से अपना 60वां जन्मदिन मना रही थी। गुब्बारों की ज़बर्दस्त सजावट से, बच्चों के जन्मदिन जैसा माहौल था।

जश्न आधुनिक था, डीजे की कमी आधुनिक (अ)लोकप्रिय गाने पूरी कर रहे थे, जिनकी तेज़ आवाज़, मनोजकुमार की फ़िल्म शोर का विज्ञापन करती नज़र आ रही थी। आप परिचितों से हाथ तो मिला सकते थे, लेकिन कुछ भी कहने के लिए, कान के पास मुँह ले जाना पड़ता था। यह आपातकालीन व्यवस्था भी पुरुषों तक ही सीमित रह पाती थी। किसी संभ्रांत महिला के कानों में कुछ कहने की कोशिश के पहले ही लोगों में कानाफूसी शुरू हो जाने का डर भी लगातार बना रहता था।।

सभी जानते हैं कि खुदा ने हमारे कान मोबाइल सुनने के लिए बनाए हैं। कुछ लोग तो इश्कजादे टीवी सीरियल के दाढ़ी वाले नायक की तरह एक कान से मोबाइल ऐसे चिपकाए रहते हैं, कि कभी कभी शक होता है, पोस्टबॉक्स के लाल डब्बे की तरह, उनका मोबाइल कान से चिपका हुआ है। लेकिन जन्मदिन के शोर से अधिक, फूहड़ फिल्मी गानों की आवाज़, इंसान को बहरा करने के लिए काफी होती है।

वहीं एक मूक-बधिर केंद्र के संचालक ने मुझे कुछ इशारों से समझाना चाहा। मैं समझ गया, वे मूक-बधिर भाषा का मुझ पर प्रयोग कर रहे थे। होगा समझदार को इशारा काफी, मैं मूक-बधिरों की उंगलियों के इशारों की भाषा नहीं समझता। अक्सर कानपुर वाले मुँह की भाषा ही समझते हैं, इशारों की नहीं।।

उनके इशारों की भाषा में फिर भी वे मुझे यह समझाने में सफल हो गए कि इस तरह के भीड़ भरे शोरगुल के माहौल में अगर मूक बधिरों की उँगलियों की मुद्राओं वाली भाषा, एक आम इंसान भी सीख ले तो क्या बुरा है। व्यर्थ शब्दों के प्रयोग अथवा दुरुपयोग से भी छुटकारा और आवाज़ के प्रदूषण के बिना सामने वाले के दिल तक आपकी बात भी पहुँच जाए और इंसान को तो क्या, दीवारों तक को कानोंकान खबर न हो।

और अनायास ही मुझे बिहारी याद आ गए ;

कहत नटत, रीझत खिछत,

मिलत खिलत लजियात।

भरे भौंन में करत हैं

नयनन हि सों बात।।

आजकल जब भी टीवी न्यूज़ पर धुरंधरों की धारावाहिक बहस चल रही होती है, मैं टीवी के म्यूट बटन का उपयोग कर लेता हूँ। उनके इशारों और हाव-भाव से महाभारत का आंखों देखा हाल मुझ तक आसानी से पहुँच जाता है।

कोई भी भाषा बुरी नहीं, चाहे फिर वह मूक बधिरों की भाषा ही क्यों न हो। इशारों इशारों में दिल लेने वाले, बता ये हुनर तूने सीखा कहाँ से, गीत की प्रेरणा भी शायद गीतकार को इसी भाषा से आई हो।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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