हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ चुभते तीर # १११ – मौन रुदन – ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय कथा – मौन रुदन।)  

☆  चुभते तीर # १११ – कथा – मौन रुदन ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

बचपन की यादों के किसी कोने में आज भी वह एक दृश्य ठहरा हुआ है- गाँव के सिवान पर लगे मेले की धूल, भपभपाती गर्मी और उस सबके बीच से गुजरती एक पुरानी, चरमराती साइकिल। उस साइकिल के पीछे कैरियर पर बंधी एक बांस की खपच्ची, जिसमें खोंसे हुए रंग-बिरंगे भोंपू, प्लास्टिक की गुड़िया, टिक-टिक करती तीतर-बटेर वाली गाड़ियां और हवा में लहराती लाल-पीली पन्नियों की फिरफिरियां। वो कोई महज खिलौने बेचने वाला नहीं था, वह सीधे अपनी पीठ पर खुशियों का पूरा का पूरा संसार लादे चला आता था। उसकी साइकिल की घंटी बजती थी, तो लगता था जैसे पूरे मोहल्ले के बच्चों के फेफड़ों में नई हवा भर गई हो। लेकिन आज जब पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो लगता है कि हम सब बड़े क्या हुए, उस साइकिल वाले की पूरी दुनिया ही कहीं खो गई। अब न वह घंटी सुनाई देती है, न मेले की उस धूल में वह जानी-पहचानी सूरत दिखाई देती है। ऐसा लगता है कि वक्त की तेज रफ्तार ने उस गरीब के पैरों के पैडल ही छीन लिए हैं।

ऑनलाइन शॉपिंग वाले इस नए ज़माने में, जहाँ बस एक टच करते ही खुशियाँ पैक होकर घर के दरवाज़े पर सज जाती हैं, वहाँ उस गरीब फेरीवाले की मैली सी पोटली अब कबाड़ का ढेर लगने लगी है। वह हर सुबह उठकर अपनी साइकिल की उतरी हुई चेन चढ़ाता है, जी-तोड़ पैडल मारता है, पर कमबख्त वक्त का पहिया उससे बहुत आगे निकल चुका है। बाज़ार के इस चमचमाते मलबे के नीचे उसकी उम्मीदें और छोटा सा हुनर घुट-घुटकर दम तोड़ चुके हैं। लोग सच ही कहते हैं कि भूखे भजन न होय गोपाला, पर यहाँ तो पूरी ज़िंदगी ही भूख का अंतहीन भजन बन गई है। कलेजा तब फट जाता है जब सोचता हूँ कि जो शख्स दूसरों के बच्चों के होठों पर चंद रुपयों में मुस्कान बिखेरने की ज़िद में अपनी एड़ियाँ घिस देता है, उसके अपने मासूम बच्चे रात को अक्सर भूखे पेट, रोते हुए सो जाते हैं। उसकी उस फटी कमीज़ के मैल और पसीने की गंध में ईमानदारी की आख़िरी गवाही बची है, जिसे यह बेरहम दुनिया देखना ही नहीं चाहती।

मेले का मतलब कभी होता था रिश्तों का मिलना, खुशियों का सांझा होना, लेकिन अब मेले भी कॉर्पोरेट हो गए हैं। बड़े-बड़े पंडाल, टिकट वाले झूले और वीआईपी पास के बीच उस साइकिल वाले को गेट के बाहर ही खदेड़ दिया जाता है। ‘भाग यहाँ से, रास्ता मत रोक’ ये दुरदुराने वाले शब्द जब कोई रसूखदार सुरक्षाकर्मी या पुलिसवाला उसे डपटकर बोलता है, तो सिर्फ उसकी साइकिल पीछे नहीं हटती, बल्कि उसका आत्मसम्मान भीतर तक लहूलुहान हो जाता है। वह अपनी ढीली पड़ चुकी चप्पल को घसीटता हुआ, सिर झुकाए किसी पेड़ की छाँव में जा खड़ा होता है। उसकी वह लाचारी, उसका वह मौन विलाप देखकर आसमान का कलेजा भी कांप उठता होगा। उसने कभी किसी से भीख नहीं मांगी, उसने कभी हराम की कमाई नहीं चाही, उसने तो बस अपने पसीने की बूंदों से खिलौने सींचे थे, पर इस बेरहम दुनिया ने उसे उसकी ईमानदारी का यही सिला दिया।

अब तो ऐसा लगता है कि वह सिर्फ एक खिलौने बेचने वाला नहीं, बल्कि हमारी गुज़र चुकी मासूमियत का आखिरी कफ़न है जो धीरे-धीरे मैला हो रहा है। हम जितने आधुनिक हो रहे हैं, उतने ही कसाई होते जा रहे हैं। हमें तरस आता है भूखे जानवरों पर, हम सोशल मीडिया पर संवेदनाओं के समंदर बहा देते हैं, पर सामने खड़े उस जीते-जागते मरते हुए इंसान की सिसकी हमारे कानों तक नहीं पहुँचती। उसकी साइकिल का वह जर्जर ढांचा, जिसका हैंडल अब मुड़ चुका है और जिसकी गद्दी फटकर रुई उगल रही है, ठीक उसकी ज़िंदगी का आईना है। वह हर रोज़ सुबह एक नई जंग के लिए निकलता है, यह जानते हुए भी कि इस बाज़ार में उसकी हार पहले से ही तय है।

अब तो गलियों में उसकी आवाज़ भी जैसे घुटकर रह गई है। पहले उसकी एक हाक पर पूरा मोहल्ला जीवंत हो उठता था, ‘ले लो बाबू, उड़ने वाली चिड़िया, टिक-टिक घोड़ा!’ अब उसकी वह आवाज़ कलाई घड़ियों के अलार्म और मोबाइल की रील्स के शोर में कहीं दफ़न हो गई है। लोग अपने घरों के ऊंचे दरवाज़े और खिड़कियाँ बंद कर लेते हैं ताकि बाहर की धूल और वह दरिद्रता भीतर न आ सके। वह बंद दरवाजों को देखता है, अपनी सूखी जीभ से होठों को चाटता है और बिना कुछ कहे आगे बढ़ जाता है। उसकी पीठ झुक गई है, बाल समय से पहले सफेद हो गए हैं और हाथों की नसें इस तरह उभर आई हैं जैसे कोई सूखा हुआ दरख्त हो। वह एक जीता-जागता भूत बन चुका है, जो इस इंसानों की बस्ती में अपनी खोई हुई ज़िंदगी ढूंढ रहा है।

आखिर में जब वह इतिहास के पन्नों से पूरी तरह गायब हो जाएगा, तब शायद हम उसकी तस्वीरें देखकर कहेंगे कि ‘हाँ, एक दौर ऐसा भी था’। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होगी। हमने अपनी तरक्की की वेदी पर एक बेहद मासूम और ईमानदार वजूद की बलि चढ़ा दी होगी। जब भी कभी किसी पुरानी अलमारी से वह धूल खाती हुई प्लास्टिक की फिरफिरी मिले, तो ठहरकर सोचना जरूर कि इसे बेचने वाले के घर में उस दिन दीया जला था या नहीं। वह साइकिल वाला कोई कहानी का पात्र नहीं है, वह हमारी आँखों के सामने तड़प-तड़प कर दम तोड़ती हुई एक संस्कृति है, जिसकी मौत पर न कोई मातम मनेगा, न कोई आंसू बहाएगा। बस, हवा में उसकी साइकिल की वह आखिरी घंटी कहीं गूंजकर हमेशा-हमेशा के लिए खामोश हो जाएगी और हम अपनी सजी-धजी दुनिया में मगन रहेंगे, यह भूलकर कि किसी का पूरा वजूद हमारी बेरुखी की भेंट चढ़ गया।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – शोषण ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – शोषण ? ?

मीलों यात्रा करती हैं,

फूल-फूल भटकती हैं,

बूँद-बूँद संचित करती हैं,

परिश्रम की पराकाष्ठा से

छत्ते का निर्माण करती हैं,

मधुमक्खियाँ…,

 

मनुष्य, तोड़कर

निकाल लाता है छत्ता,

चट कर जाता है शहद,

देखती रह जाती हैं

हताश, निराश मधुमक्खियाँ..,

 

आदिकाल से शोषित हैं

मधुमक्खियाँ,

पर अफ़सोस,

शोषण के इतिहास में

मधुमक्खी का उल्लेख नहीं मिलता..!

?

© संजय भारद्वाज   

प्रात: 7:51 बजे,  10 जुलाई 2024

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ नारायण साधना संपन्न हो चुकी। नई साधना की सूचना यथासमय देंगे। 🕉️

💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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English Literature – योग-साधना/Yoga ☆ YOGA FOR GIRLS ☆ Radhika Bisht ☆

(An experienced yoga teacher in the tradition of Swami Satyananda Saraswati, founder of Bihar School of Yoga. Successfully completed 200 Hours Yoga Teacher Training Course from the Parmath School of Yoga, Rishikesh, accredited by the International Yoga Alliance and Indian Yoga Association. Trained at and certified by the Himalayan Iyengar Yoga Centre, Dharamkot, Dharamshala.)

🌌 YOGA FOR GIRLS 🌌 Radhika Bisht 🌌

Why do girls need to practise yoga? What benefits does it bring?

Yoga is highly beneficial for girls. It improves the strength, flexibility and resilience of the body. This enhances stamina, balance and coordination, which can be especially helpful for practitioners of classical dance. It also helps students focus and concentrate more deeply in their studies.

Yoga supports healthy hormonal development by stimulating and balancing the endocrine glands. This has a positive impact on mental and emotional well-being.

It improves blood circulation and promotes a smooth flow of energy throughout the body. The mind becomes calmer, purer and more peaceful. Girls who practise yoga regularly are less likely to experience stress, anxiety and depression.

Yoga encourages holistic growth and all-round personality development. The harmony of mind, body and spirit enhances self-confidence and self-esteem, empowering girls to face life’s challenges with courage and composure.

Yoga also cultivates self-discipline and restraint. It deepens awareness and mindfulness, opening the door to a meaningful, balanced and fulfilling life.

♥ ♥ ♥ ♥

© Radhika Bisht

radhikajagat@gmail.com

LAUGHTER YOGA MASTER TRAINER: An internationally recognised Laughter Yoga Master Trainer trained by Dr Madan Kataria, founder of Laughter Yoga. Conducted sessions for Nestle, Airports Authority of India, Abercrombie & Kent, State Bank of India, Cancer Survivors, Specially Abled Children, etc.

CO-FOUNDER LIFESKILLS: Co-founder, LifeSkills – a pathway to authentic happiness, well-being and a fulfilling life!

≈ Founder Editor – Shri Hemant Bawankar/Editor (English) – Captain Pravin Raghuvanshi, NM

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # ५९ – आत्मकथ्य – श्रेयस कृत काव्य कथा वीथिका की कविताएं : कविता में लघुकथा ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ५९ ☆

☆ आत्मकथ्य ☆ ~ श्रेयस कृत काव्य कथा वीथिका की कविताएं : कविता में लघुकथा ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

कोविड अपने चरम पर था, उन दिनों मैं फेसबुक पर लगभग प्रतिदिन एक कविता लिखा करता था। इस पोस्ट का नाम मैंने काव्य कथा वीथिका ही रखा था। धीरे धीरे मेरी ऐसी कई रचनाएं बनकर तैयार हो गयीं। फिर मैंने इन रचनाओं को संकलित कर संकलित कर पुस्तक का स्वरूप दिया। यह पुस्तक काव्य कथा वीथिका थी। इस पुस्तक की कविताएं, सामान्य, सरल एवं आम जन के लिए आसानी से समझ में आने वाली थी। इन कविताओं की विशेषता यह थी कि मेरे जीवन में (पूर्व में और वर्तमान में) जो कुछ भी घटनाएं घटती या जो कुछ भी मैंने अपने आंखों से घटते हुए देखता, उनका आश्रय लेते हुए कुछ काल्पनिक पुट से उसे साहित्यिक ढंग में सजाते हुए कविता के रूप दे देता। इसके अतिरिक्त भी सामाजिक समताओ एवं विषमताओं पर आधारित मनोभावों को कविता का स्वरूप दे देता था। यह सब उपक्रम करते एवं कविता लिखते वक्त मुझे यह पता ही नहीं चला कि कब इन कविताओं में छोटी सी लघुकथाएँ समा गयीं। मैं तो इन्हें बस एक सरल, तुकबंदी वाली, अगेय कविता ही समझ रहा था।

खैर पुस्तक के प्रकाशन की अवधि नजदीक आयी तो मैंने इसकी पांडुलिपि को मॉरीशस में जन्मे, भारतीय मूल के हिंदी गद्य साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी के पास पुस्तक भूमिका लिखने हेतु भेज दी।

अब प्रश्न उठता है कि काव्य की भूमिका एक गद्य लेखक कैसे लिख सकता है। इस विषय में क्या सोच सकता है, तो इस पर मेरा मानना यह है कि एक गद्य लेखक अवश्य ही गद्य लिखता है लेकिन वह एक पाठक भी होता है। उसके भीतर भी हृदय होता है तथा शब्दों के भाव और रस को समझने की क्षमता होती है। कविताएं जो मन को प्रमुदित करती है, उनको सुनने का चाव सबके अंदर होता है. 

जब इस सुप्रसिद्ध कथाकार ने मेरी कविताओं के अंदर एक लघुकथा को समाते हुए देखा तो उन्होंने अपनी भूमिका में निम्न पंक्ति डाल दीं –

काव्य कथा वीथिका – यह आपका निजी शीर्षक था, जिसे आपने धारा प्रवाह बनाकर अब तक अनेक रचनाओं का पाठकों को रसास्वादन करवा दिया है। विशेष कर आपबीती को आप आधार बना कर लिखते हैं जो किसी भी कोण से साहित्य होता है। मैंने शुरू में लिखा था आप अपनी ओर से एक विधा की नींव रख रहे हैं आज भी मैं अपनी इस बात पर कायम हूँ. “

प्रसिद्ध गीतकार स्व.श्री नीरज अवस्थी (लखीमपुर) के देख रेख में प्रकाशित इस पुस्तक की एक रचना आपके समक्ष रखता हूँ, जो कि निम्नवत है

☆ दादी की होली ☆

*

होली का त्योहार आज था, दादी घर पर न थी।

 अम्मा चाचा को दादी की, चिंता आज लगी थी। ।

 बुधिया काकी के घर में, चूल्हा नहीं जला क्यों।

 चिंता न हो दादी को, इसकी आज भला क्यों। ।

 ऐसे कैसे हो सकता था, हम सब पूआ खाएं।

 बुधिया काकी के घर के, बच्चे भूखे भूखे सोए। ।

 घर से आँटा घी लेकर के, दादी वही गई थी।

 मेरी दादी की होली, ऐसे आज मनी थी।।

मुझे बेशक अपनी कविताओं में लघुकथा नहीं समझ में आयी लेकिन श्री रामदेव तुरंत ने इन कविताओं में एक लघुकथा देखा था।

युवा उत्कर्ष साहित्यिक मंच उत्तर प्रदेश इकाई के तत्वावधान में दिनांक 28 -10 2023 को, कविता में लघुकथा विषय पर एक संगोष्ठी का आयोजन गूगल मीट के आभासी पटल पर किया गया l कार्यक्रम में श्री राम किशोर उपाध्याय जी, राष्ट्रीय अध्यक्ष युवा उत्कर्ष साहित्यिक मंच, श्री रामदेव धुरंधर मॉरीशस, डॉ0 नूतन पाण्डेय जी, सहायक निदेशक केंद्रीय हिंदी निदेशालय नई दिल्ली रहीं l डॉ 0 अभय नाथ सिंह, प्राचार्य किसान स्नात्तकोत्तर महाविद्यालय रकसा, रतसर बलिया, श्री चंद्रेश्वर प्रताप सिंह छ. ग., प्रवासी साहित्यकर डा. अनिता कपूर जी (अमेरिका) एवं डा. दीपक पाण्डेय जी सहायक निदेशक, केंद्रीय हिंदी निदेशालय, नई दिल्ली श्रीमती प्रमिला कानपुर डॉ मोहम्मद जावेद, श्री रामसनेही विश्वकर्मा ‘सजल’, डॉ श्री प्रकाश मिश्रा, श्री मृदुल कुमार सिंह ‘मृदुल’, श्री नरेंद्र सिंह सिसोदिया, श्री अमित कुमार गुप्ता नेश्री शकील अहमद (बिलासपुर छ. ग.), श्री रामराज भारती, श्री बृजेश यादव, श्री अतुल राय, श्री नंदकिशोर वर्मा जी आदि ने अपने वक्तव्य एवं विचार रखें।

इस विषय में एक प्रस्ताव युवा उत्कर्ष साहित्यिक मंच केंद्रीय इकाई के समक्ष भी रखा गया कि क्या इसे एक विधा का रूप में देख सकते हैं या नहीं।

“श्रेयस की काव्य कथा विथिका का कविताओं के माध्यम से छोटी-छोटी लघुकथाओं और घटनाओं का अवलोकन कराती है।

इनकी कविताओं में किसी लघु कथा के विभिन्न तत्व – पात्र, परिवेश, संघर्ष, समस्या घटनाक्रम और संदेश सभी समाहित है।

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

संस्थापकसंपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – पग-पग नर्मदा यात्रा – भाग – ४० ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – पग-पग नर्मदा यात्रा – भाग- ४० ☆ श्री सुरेश पटवा ?

7.पग-पग नर्मदा यात्रा

नर्मदा परिक्रमा:दूसरा चरण

बेलखेड़ी से गंगई 07 नवम्बर.2019

सुबह एक-एक गिलास दूध पीकर आठ बजे बेलखेड़ी गाँव से नर्मदा की गोदी में उतर कर चल पड़े। रास्ता बड़ा कठिन था, किसानों ने खेतों को गोड़ दिया है या फ़सल बोकर स्प्रिंकलर चलने के कारण रास्ते पर कीचड़ हो जाने से जूतों में दो-दो किलो मिट्टी चिपकने से चलना दूभर था। बड़ी मुश्किल से रुक-रुक कर चलते रहे। नर्मदा के अति सुंदर नज़ारे आँखों और मोबाईल में क़ैद होने लगे। क़रीबन तीन बजे धुरन्धर बाबा के आश्रम में पहुँचे। धुरन्धर बाबा बिहार से आकर नर्मदा के किनारे एक पहाड़ी पर आश्रम बनाकर रहने लगे हैं। गाँजे की पत्ती और चाय उनका भोजन है। एक बार सरकारी आबकारी विभाग ने धुरन्धर बाबा को गाँजे के पौधे साक्ष्य स्वरुप लेकर नरसिंहपुर कलेक्टर के सामने पेश किया। धुरन्धर बाबा ने दलील दी कि गाँजे की पत्तियाँ मेरा भोजन है, नहीं खाऊँगा तो मर जाऊँगा और हत्या का आरोप आपके माथे पर आएगा। कलेक्टर साहब ने आबकारी अधिकारी को धुरन्धर बाबा की पेशकारी पर डाँट पिलाई। उस दिन के बाद धुरन्धर बाबा निर्विघ्न गाँजे की खेती करके पत्तियों के भोजन और चाय सेवन से ज़िंदा हैं। उनके बाल दस फ़ुट लम्बे हैं, बाबा का कहना है कि जिन लड़कियों या औरतों को केश की लम्बाई बढ़ानी है वे गाँजे की पत्तियों का नियमित सेवन करें। बाबा मज़बूत पाए के काऊच पर आसन जमाए गाँजा रगड़ते और बाँटते हैं उनके पास आठ-दस कुत्ते पले हैं जिनको भी गाँजे के धुएँ और पत्तियों के सेवन की आदत पड़ गई है। पहले हमारा साबका उनके एक धूर्त सेवक से हुआ, जो खींसे निपोरकर किसी भी बात का मुंडी हिलाकर जबाव देता था। पहले बोला आश्रम में दाल-चावल भर हैं। रात में केवल दाल-चावल खाने से रात में बार-बार पेशाब  से नींद टूटती है और अच्छी नींद  नहीं होने से शरीर टूटने लगता है जबकि हमें रोज़ दस किलोमीटर चलना होता है। हम अरुण भाई के साथ गाँव से आलू, भटे और टमाटर ख़रीद लाए तो वह बोला आपही बना लो, जब धुरन्धर बाबा को पता चला तो उन्होंने स्वयं सब्ज़ी और आठ चपाती के बराबर एक 10-12 मिलीमीटर मोटाई का एक-एक टिक्क बनाकर परसा जिसे मुश्किल से खपा पाए।  

परिक्रमा के दौरान एक बात पता चली कि संगीन अपराधी बाबा का चोला रखकर परिक्रमा करते रहते हैं। कोई भी परिक्रमा वासी सात दिन एक आश्रम में खाने, पीने और रहने की सहूलियत पा सकता है। वह हर सात दिन में जगह बदलकर पुलिस को चकमा देते रह सकता है, वैसे भी एक थाना क्षेत्र की पुलिस दूसरे क्षेत्र में दख़लंदाज़ी नहीं करती है। एक अनुमान के अनुसार तीन-चार हज़ार से अधिक आश्रम नर्मदा किनारे हैं, जहाँ अपराधी शरण पाते रह सकते हैं। साधु सन्यास लेते समय नाम बदल लेते हैं, तो वे लोग भी नाम बदल लेते हैं। उनसे नाम पता पूछो तो घुमा फिराकर इधर उधर की बात से भरमा देते हैं जैसे :-

नाम न पूछो साधु का पूछ लीजिए ज्ञान

मोल करो तलवार का पड़ी रहन दो म्यान।

सुबह-शाम धुरन्धर बाबा के शिष्य नियम से गाँजे की चिलम खींचने आते हैं। दरबार में काऊच पर बाबा के आसन के सामने लम्बी चौड़ी दरी पर शिष्यों का चिलम का दौर रामचरितमानस के किष्किन्धा कांड और सुंदर काण्ड के प्रवचन की सी डी  पर चलता रहता है।

जबलपुर-इटारसी रेल खंड स्टेशनों की दूरी नर्मदा किनारों से दस से बीस किलोमीटर है। मुख्य सड़क भी कमोवेश उतनी ही दूरी पर है इसलिए वायु, जल प्रदूषण नहीं है, पेड़ों और गन्ने के खेतों की सघन हरियाली से सूर्य की किरणें ज़मीन में जज़्ब होने से वातावरण गर्म नहीं होता है। जबकि शहरों के कांकरीट जंगल भट्टी की तरह झुलसते हैं। अनाज सागभाजी और भरपूर दूध दही मक्खन सेवन से लोग मेहनतकश और स्वस्थ रहते हैं जबकि शहरों में विलासिता पूर्ण जीवन के आदी लोग दवाइयों के भरोसे ज़िंदा रहने के अभ्यासी हो गए हैं। गांधी जी का ग्रामीण परिवेश को स्वावलम्बी बनाने का उद्देश्य था कि स्थानीय कुशल कारीगर ज़रूरत की चीज़ें स्थानीय स्तर पर पैदा करें लेकिन निज़ाम ने उन्हे शहरी कारख़ानों का उपभोक्ता बना छोड़ा है। गांधी जी के सिद्धांत पर भूटान आर्थिक नीतियों को अमल में लाकर ख़ुशहाली इण्डेक्स में पहली पाँच श्रेणी में स्थान पाता है। भारत में शहर प्रदूषण के अड्डे बन गए हैं। गाँव के मेहनतकश लोग सुबह और शाम दो बार भोजन करते हैं जबकि उन्हें दिन भर ऊर्जा हेतु ग्लूकोज़ की दरकार होती है। नरसिंहपुर जिले में सर्वाधिक फ़सल गन्ने की होती है इसलिए चाय-दूध में बहुत अधिक शक्कर डालने का रिवाज बन गया है ताकि उनकी ग्लूकोज़ की भरपाई होती रहे। खेती में मशीनीकरण के कारण समृद्ध किसान डायबिटीज़ और हृदय रोग के शिकार होना शुरू हो गए हैं। धुरन्धर बाबा के आश्रम में तार पर सूखने डाले, चड्डी और बानियान छूट गए और बेलखेड़ी में चार्जर जल गया, जबलपुर से अविनाश दवे आगे साँकल घाट पर यात्रा में जुड़ने वाले थे अतः दोनों चीजें लाने हेतु उन्हें फ़ोन कर दिया।

गंगई से ब्रह्म कुण्ड  08 नवम्बर 2019

हमारी परिक्रमा किसी मन्नत या जन्नत की लालसा से नहीं की जा रही है अपितु हिंदू जिज्ञासुओं की एक सांस्कृतिक परिक्रमा है जिसका उद्देश्य परिक्रमा की भावना, क्षेत्र, विस्तार और लक्ष्य की सीधी जानकारी लेना है ताकि उन्हें भावी पीढ़ी के लिए संजो कर रखा जा सके।

शाहपुरा-भिटौनी के मनकेडी गाँव से दो व्यक्तियों ने आज ब्रह्मकुण्ड घाट से विधिवत अखंड परिक्रमा ऊठाई है। उनका कहना था कि बेटी का हाथ बंदर ने चबा लिया था उसे डाक्टर ठीक न कर सके नर्मदा मैया ने दर्शन देकर उसे आशीर्वाद दिया और बेटी का हाथ ठीक हो गया। दूसरे ने घरेलू वाद-विवाद से मुक्ति हेतु परिक्रमा व्रत लिया है। वे भिक्षा में सीधा लेकर भोजन बनाते हैं और अतिरिक्त सामग्री दान कर देते हैं। प्रतिदिन पाँच घर भिक्षा माँगते हैं। समान्यत: लोग पाप मुक्ति, मान्यता या स्वर्ग कामना से परिक्रमा करते है। उन्हें आस्था का संबल खींचता है। हमारे जैसे बिना किसी कामना के अमृत लाल बेगड़ जैसे बहुत कम लोग इस अत्यंत दुरुह यात्रा पर निकलते है।

कुछ साम्यवादी हिंदू पौराणिक शास्त्रों को बकवास और धर्म को जनता की अफ़ीम बताते हैं लेकिन उनके रूसी आका येरूसलम, कन्नांन, हारान को पवित्र भूमि और पुराना नियम को इतिहास बताकर ख़ुश होते हैं। यहूदियों ने अपनी किताबों और सिद्धांतों व विचारधारा से 2500 सालों बाद इज़राइल पाकर उसे सशक्त आधुनिक राष्ट्र बनाया। हिंदुओं के पुराणों में नर्मदा के जिन घाटों, ऋषि-मुनियों और आध्यात्मिक सिद्धांतों का उल्लेख है, जिनको करोड़ों लोग मानते हैं उन जगहों की जानकारी लिपिबद्ध करना हमारा पुनीत कर्तव्य है। ज़रा सोचिए, लोगों से तथाकथित अफ़ीम छुड़ा ली जाए तो उनके पास जीवन की विद्रुपता से निपटने हेतु सिवाय शराब और सेक्स के क्या बचेगा। 

सभी धर्मों के प्राचीन ग्रंथ बड़े बेतरतीबी से लिखे या संग्रहित किए गए हैं। जिस समय वे लिखे जा रहे थे उस समय पुस्तकें लिखने की कला विकसित नहीं हुई थी। सौ या दो सौ सालों तक उनका संकलन होता रहता था फिर एक, दो, तीन या चार संगिति में सम्बंधित धर्म के विद्वान उसे अंतिम स्वरुप देते थे। बाइबिल, क़ुरान, बुध्यचर्या और गुरुग्रंथ सहित समस्त पुराण इसी तरह संकलित हुए हैं। समय-समय पर उन्हें अद्यतन किया जाता रहा है, जैसे विकीपीडिया में जो जब चाहे कुछ भी जोड़ सकता है, अतः उनमें बुद्धिगम्य तार्किकता पूर्ण संदेश ढूंढ़ना मृग मरिचिका के सिवाय कुछ नहीं है लेकिन एक बात ज़रूर सही है कि सम्बंधित धर्मों के मूलभूत सिद्धांत उन बेतरतीब शास्त्रों में आस्था पूर्वक पिरोए गए हैं इसीलिए वे ग्रंथ उनके अनुयायियों के लिए पूजनीय हैं। उनमें से काम की चीज़ लेकर बाक़ी छोड़ दीजिए।

जड़ चेतन गुण दोष मय विश्व कीन्ह करतार

संत हंस गुण पय लहहीं छोड़ वारी विकार।

हिंदुओं के 4 वेद, 18 पुराण और 108 उपनिषद 1194 में मुहम्मद गौरी से लेकर 1774 में वारेंन हेस्टिंग के आने तक 600 साल इस्लामिक अत्याचार से बचते-बचाते उपेक्षित रहे हालाँकि वे शास्त्र  आदि शंकराचार्य द्वारा आठवीं सदी में देश के चार धामों, बारह ज्योतिर्लिंगों, बावन स्थापित शक्तिपीठों और नर्मदा किनारे भेड़ाघाट से भंडोंच तक अनेकों ऋषि आश्रमों में सुरक्षित रखे रहे। सोमनाथ, उज्जैन, मथुरा और काशी में मंदिर-मूर्तियाँ तोड़कर ग्रंथ जलाए गए लेकिन सतपुड़ा-विंध्याचल के बीच वनाच्छादित घने बियाबांन जंगलों में 1300 से अधिक किलोमीटर लम्बी नर्मदा के घाटों में सुरक्षित रहे। ऋषि-मुनि उन्हें ढोकर परिक्रमा करते श्रुति और स्मृति में ज़िंदा रखे रहे। 1774 में वारेंन हेस्टिंग के आने के बाद कलकत्ता हाईकोर्ट में एक व्यक्ति विलियम जोंस न्यायाधीश बनकर आए, उन्होंने देखा कि हिंदुओं का न्याय भी मुस्लिम शरीयत से होता है, जिसके कारण उनके साथ अन्याय बरता जाता है। उन्होंने संस्कृत पढ़कर हिंदू धार्मिक ग्रंथों के अध्ययन से हिंदू न्याय सिद्धांतों को जानना चाहा तो कोई उन्हें संस्कृत पढ़ाने वाला न मिला। अंत में काशी का एक ब्राह्मण माँस-मदिरा त्याग कर हिंदू पद्धति से रहने की शर्त पर उन्हें हिंदू दर्शन व धार्मिक शास्त्रों के अध्ययन कराने को तैयार हुआ। उन्होंने शास्त्रों का गम्भीर अध्ययन करके अंग्रेज़ी में अनुवाद किया। तब पश्चिमी दुनिया उन्हें पढ़कर चौंक गई। विवेकानंद ने प्रेसीडेंसी कालेज में वेदान्त का अंग्रेज़ी भाष्य उनके अनुवाद से पढ़कर शिकागो का प्रसिद्ध वक्तव्य दिया था। तथाकथित खंडित बुद्धिजीवी इन्हें बकवास मानते हैं लेकिन घरों में उन्ही पौराणिक पात्रों को घंटी बजाकर पूजते हैं।  

सनातन पौराणिक मान्यताओं के अनुसार अमरकण्टक से नेमावर के बहाव को देवी नर्मदा की देह का ऊपर का हिस्सा माना जाता है, तदानुसार नेमावर नाभिकुंड है। नेमावर को विष्णु के छठे अवतार परशुराम का जन्मस्थान माना जाता है। इसका मतलब हुआ कि ऋषि जमदग्नि और रेणुका का आश्रम नेमावर में रहा होगा। भृगु, मार्कंडे, वशिष्ठ, कौंडिल्य, पिप्पल, कर्दम, सनत्कुमार अत्रि नचिकेता, कश्यप, कपिल जैसे अनेकों सनातन ऋषियों के आश्रम भेड़ाघाट से नेमावर के बीच रहे हैं जहाँ वेदों का पठन-पाठन, उपनिषद, अरण्यकों, ब्राह्मण ग्रंथों और पुराणों के साथ स्मृतियों का लेखन कार्य उन ऋषि आश्रमों में हुआ है।

आर्य-अनार्य सिद्धांत को ठीक माने तो आर्यों के आगमन के बाद से अनार्य याने असुर विन्ध्याचल और सतपुडा पर्वतों के बीच सघन जंगलों में प्रवाहित सदानीरा नर्मदा के दोनों किनारों बस गए थे। उत्तर भारत का इलाक़ा उन्होंने आर्यों के लिए छोड़ दिया था। नरसिंहपुर के नृसिंह मंदिर में भगवान नरसिंह की  मूर्ति प्रह्लाद ने स्थापित की होगी। इसी क्षेत्र में हिरण्यकश्यप का राज्य था, शोणितपुर अर्थात वर्तमान सोहागपुर में प्रह्लाद के पोते  बाणासुर की राजधानी थी। प्रह्लाद की एक बहन के पुत्र असुरों के गुरु शुक्राचार्य का आश्रम विन्ध्याचल और सतपुडा पर्वतों के घने वन क्षेत्र में था यहाँ की जड़ीबूटियों के रसायन से उन्होंने अमृत संजीवनी तैयार की थी जिसे अर्जित करने हेतु देवताओं के राजा इंद्र ने गुरु पुत्र कछ को भेजा था। इसी क्षेत्र में उसका प्रेम प्रसंग शुक्राचार्य पुत्री देवयानी से हुआ था। देवासुर संग्राम के पूर्व देवताओं ने ब्रह्मकुण्ड में शिव आराधना की थी। गराडू घाट पर गरूँड़ ने युद्ध काल में तपस्या की थी। नर्मदा की परिक्रमा में इन सभी देवी-देवताओं की परिक्रमा हो जाती है। जयचंद विद्यालंकार के कालबद्ध पौराणिक इतिहास लेखन के बाद से पौराणिक साहित्य को हिंदुओं का ऐतिहासिक साहित्य माना जाने लगा है। नर्मदा घाटी का भेड़ाघाट से नेमावर का क्षेत्र देव-असुर संग्राम का साक्षी रहा है। स्कन्द पुराण के रचयिता वेद व्यास ने कार्तिकेय अर्थात शिवपुत्र स्कन्द के नाम पर यह यह ग्रंथ संकलित किया था।  स्कन्द  द्वारा तारकासुर असुर का वध का साक्षी भी यही स्थल रहा है। भगवान शिव संहार के देवता हैं। उनका पुत्र कार्तिकेय संहारक शस्त्र अथवा शक्ति के रूप में जाना जाता है। तारकासुर का वध करने के लिए ही स्कन्द का जन्म हुआ था। कार्तिक माह की ग्यारस   के चमकते चाँद की गवाही में इस पौराणिक स्थान का आनंद लिया। स्कंद का एक नाम कार्तिकेय है, कार्तिक मास की पूर्णिमा को नर्मदा के दोनों तटों के हज़ारों घाटों पर भरने वाले मेलों में करोड़ों लोग डुबकी लगाकर पुण्य सहेजते हैं। 

हमारी पग-पग यात्रा नर्मदा की कल-कल संगीतमयी सरगम की धुनों पर परवान चढ़ रही थी, धुरन्धर बाबा के आश्रम से उसमें एक नया राग “फूफा-राग” जुड़ गया। यह जनमासा ठाट का दिन के चौथे-पाँचवें पहर में बजाया जाने वाला राग है, इसका आरोह-अवरोह अरुण भाई ने उस समय ईजाद किया था जब जगमोहन भाई ने धुरन्धर बाबा के एक अकड़ूँ चेले की ऐसी तेसी कर दी थी जैसा कि बारातों में दुल्हा के फूफा करते हैं। यह गंगई घराने का राग है जो शाम की उदासी या रात के पहले प्रहर के सन्नाटे और लस्तपस्त शरीरों में जान फूँकने के लिए अरुण भाई द्वारा छेड़ा जाता था, हम तबले पर तीन ताल मे संगत करते थे। फूफा पहले हल्के से गुर्रा कर ता.. थई… ताता… थई पर कत्थक के घुँघरू दार क़दम ताल चलते हुए हल्का चक्कर लेते-लेते तांडव पर उतर आते तब फूफा के रौद्र रूप से समूह को साँप सूंघ जाता। इस प्रकार नीरसता में रस तलाशती यात्रा हमारी यादों की तिजौरी में जमा होती मूल्यवान सम्पत्ति है। 

गंगई से ब्रह्मकुंड तक की यात्रा अबतक की सबसे दुरुह पदयात्रा थी। रास्ता बहुत ख़राब कही कीचड़, कहीं नुकीले पत्थर, कहीं रेतीले और कहीं कटे किनारे जानलेवा हो सकते थे। सुबह आठ बजे आश्रम के स्वामी धुरंधर बाबा से विदा लेकर नर्मदा किनारे-किनारे चल पड़े। क़रीबन तीन किलोमीटर चलकर मुआर घाट पहुँचे, मान्यता है कि दुर्गा देवी ने भैंसासुर का वध इसी घाट पर किया था। इसकी प्रबल सम्भावना है कि आर्य-अनार्य संघर्ष सतपुड़ा-विंध्याचल के बीच प्रवाहमान नर्मदा के दस से बीस किलोमीटर मैदान में हुआ हो वही घटना पुराणों में देवासुर संग्राम के रूप में वर्णित है क्योंकि आर्यों से अलग माने जाने वाली गौंड, भील, कोरकू प्रजातियां अभी भी वहाँ निवास करती हैं। उस दिन कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की ग्यारस थी। घाट पर स्नान चल रहा था, हम सभी ने भी स्नान किए और कुछ चना-चबैना ग्रहण किया। घाट पर चार व्यक्ति अखंड परिक्रमा उठा रहे थे उनके परिजन उन्हें विदाई देने आए थे। आज कई लोग दोनों किनारे के घाटों से परिक्रमा उठा रहे थे। कुछ पंचकोशी परिक्रमा उठा रहे थे। शाम के चार बजे तक सफ़ेद कपड़ों में क़तारबद्ध होकर परिक्रमा वासी चल पड़े, नर्मदा के सौंदर्य में चार चाँद लग गए।

ब्रह्म कुण्ड में सीधी चढ़ाई चढ़कर धर्मशाला पहुँचे वहाँ एक 93 वर्षीय बुज़ुर्ग अपनी लक्वाग्रस्त पत्नी सहित मिले, वे बड़ी आत्मीयता से पत्नी सेवा में रत हैं। पहले हमने जहाँ ठिकाना बनाया वहाँ रोशनी की व्यवस्था नहीं होने से उनके दालान में ठिकाना जमाया, वे भोजन सामग्री देने को तत्पर थे बनाना हमें था परंतु थकान से शरीर टूट रहे थे। एक पंडित जी के घर से तीस रोटी और आलू की सब्ज़ी का ठेका तीन सौ रुपयों में तय हुआ और सुबह से पड़े ख़ाली पेट भर गए। एक असहाय बूढ़ी माँ विक्षिप्त अवस्था में आकाश के नीचे खुले में सो रही थी, आश्रम सेवक से पूछा तो पता चला वह बिस्तर में शरीर की सारी गंदगी फैलाकर बदबू फैलाती है इसलिए आग जलाकर बाहर सोती है। सुबह मुंशीलाल जी ने अपना शाल, इनर, चादर, दरी और मोज़े उस असहाय को दान कर दिए। मुंशीलाल एक-एक करके कपड़े देते जा रहे थे वह ख़ुश होकर आशीर्वाद बरसा रही थी, बड़ा मार्मिक दृश्य था।

 क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

संस्थापक सम्पादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०४२ ⇒ व्यंग्य – सफ़ेद बाल ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका व्यंग्य- “सफ़ेद बाल।)

?अभी अभी # १०४२⇒ व्यंग्य – सफ़ेद बाल ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

बाल उगाना तो बच्चों का खेल है, लेकिन उन्हें हमेशा काले बनाए रखना बड़े-बूढ़ों का खेल है। सभी बच्चे अमूमन बाल लेकर पैदा होते हैं, कुछ ज़्यादा तो कुछ कम। बिना बाल के बच्चे कम ही पैदा होते हैं। इसीलिए उन्हें बाल बच्चे कहते हैं।

बच्चों के साथ बाल भी बढ़ते हैं। लड़कों के बाल कटते रहते हैं, लड़कियों के बाल बढ़ते रहते हैं। बाल और नाखून साथ साथ बढ़ते हैं, दोनों में खून नहीं होता। लेकिन जब कोई उखाड़ता है तो दर्द होता है। नाखून घर में काटे जाते हैं, केश, आपले केश कर्तनालय में।।

बहुत से घरों में छुट्टी के दिन बाल दिवस मनाया जाता है। एक समय था जब शिकाकाई और मुल्तानी मिट्टी से महिलाएँ बाल-सेवा में व्यस्त रहा करती थी। रेडियो सीलोन पर लोमा हेयर आयल का विज्ञापन आता था। तब तक शैम्पू का तो जन्म भी नहीं हुआ था। केवल दादियों के बाल सफ़ेद हुआ करते थे। बालों में जुओं और घरों में खटमलों का राज हुआ करता था।

बालों की सुरक्षा शरीर की सुरक्षा का एक प्रमुख अंग है। किसी के सर में एक भी सफेद बाल बुढापे की निशानी समझा जाता था। इसी कारण हाथों में लगने वाली मेंहदी सर पर चढ़ गई। बाज़ार में बालों की सुरक्षा के लिए शैम्पू, कंडीशनर और मॉइस्चराइजर आ गए। इंदौर में एक मॉडर्न लांड्री थी, जो अपनी दुकान के नाम के नीचे डायर्स और ड्राइकलीनर्स भी लिखती थी।।

जब से वॉशिंग मशीन घरों में आ गई कपड़े घरों में ही ड्राई-क्लीन होने लगे और गोदरेज डाई से बाल भी काले होने लगे। बाल डाई करने के बाद किसी भद्र महिला-पुरुष की उम्र का पता ही नहीं चलता। महिलाओं के चेहरे और बालों की सुंदरता के लिए ब्यूटी पार्लर की सेवाएँ ली जाने लगी तो पुरुषों ने भी जेंट्स पार्लर की ओर रुख कर लिया।

जॉनीवाकर का एक मशहूर गीत है -तेल मालिश चम्पी ! सर की मालिश और शरीर की मालिश अब फेशियल और बॉडी मसाज हो गई है। ए के हंगल भी जब मेन्स पार्लर से बाहर आता है तो अपने आप को देवानंद समझता है। बाल काले करने से दुनिया उजली नज़र आने लगती है।।

कुछ ही भाग्यशाली पुरुष ऐसे होते हैं जिन्हें बालों की चिंता नहीं होती। लोग उन्हें मुफ्त ही बदनाम करते हैं कि चिंता से बाल उड़ जाते हैं। महिलाओं के बाल कम उड़ते हैं, जब कि उन पर जिम्मेदारियों का बोझ अधिक होता है।

एक ऐसी मान्यता है कि धूप में बाल सफेद होते हैं। जिनके बाल सफेद होने लगते हैं, वे सफाई देते हैं कि हमने बाल धूप में सफेद नहीं किये। कहाँ किये, कभी नहीं बताते। उन्हें इतना नहीं समझता कि सफेद बाल काले करना तो आसान है लेकिन काले बाल सफेद करना इतना आसान नहीं।।

जिन्हें हम सफ़ेद बाल कहते हैं, उन्हें अंग्रेज़ी में grey hair कहते हैं। सफेद बाल सम्मान का प्रतीक है। लोग सम्मान की आशा तो रखते हैं, लेकिन बूढ़ा नहीं दिखना चाहते। बुढापा विचारों से तो आता ही है, बार बार आईना देखने, और सफ़ेद बाल गिनने से भी आता है।

बाल काले हों, सफेद हों, कोई फ़र्क नहीं पड़ता ! बस दिल काला न हो। सुंदर दिखना और लगना आपका जन्मसिद्ध अधिकार है। अच्छे दिखें, अच्छे लगें, साथ साथ अच्छे बनें भी। जो देखे, बस यही कहे, अहा ! आप मुझे अच्छे लगने लगे। कितना पुराना गीत है, लेकिन हमेशा जवां ;

अभी तो मैं जवान हूँ,

अभी तो मैं जवान हूँ,

अभी तो मैं जवान हूँ…

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सविता साहित्य # १० – !! मानवता !! ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆

सुश्री सविता खण्डेलवाल ‘भानु’

(लेखन-प्रकाशन – गत 2022 से छंद लेखन, एकल प्रकाशन– कलम के नवांकुर, अनुग्रह नवप्रस्तारित छंद पर लेखन (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), साझा संकलन – तकरीबन 10, द्वादश ज्योतिर्लिंग (लंदन बुक आफ रिकार्ड), अनेकता में एकता (एशिया बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड), छंदावली – (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), महाकाल साहित्य सम्मान से सम्मानित। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता !! मानवता !!)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सविता साहित्य # १० ☆

☆ !! मानवता !! ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆

मेरे मन की एक तमन्ना, हे ठाकुर पूरी हो जाए ।

घृणित सोच हो खत्म सभी की, मानव में मानव मिल पाए ।।

*

भरे हुए मन अँधियारों से, कर्म भाव की कलुषित समता।

बचा नहीं अब नर में पौरुष, नहीं रही नारी में ममता।।

व्यथित रुग्ण मन नर नारी के, इक दूजे पर घात लगाए।

घृणित सोच हो खत्म सभी की, मानव में मानव मिल पाए ।।

*

सियाराम सी अमर प्रीत को, भूल गए क्यों सब नर- नारी।

प्राण हनन करने को आतुर, ढोंग रचाते अत्याचारी।

धर्म-कर्म की परिभाषा नव, कोई तो आकर सिखलाए।

घृणित सोच हो खत्म सभी की, मानव में मानव मिल पाए ।।

*

नारी तन सामान बना क्यों, बेच रहे जन बन व्यापारी ।

अस्मत नित्य विलाप करे है, कैसी नारी की लाचारी ।।

दंड मिले दोषी को ऐसा, अग्रिम पाप सभी रुक जाए ।

घृणित सोच हो खत्म सभी की, मानव में मानव मिल पाए ।।

*

मेरे मन की एक तमन्ना, हे ठाकुर पूरी हो जाए ।

घृणित सोच हो खत्म सभी की, मानव में मानव मिल पाए ।।

© सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु”

झालरापाटन राजस्थान

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # ३८ – कविता – साजिश… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर ☆

डॉ.राजेश ठाकुर

( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का  मंतव्य उनके ही शब्दों में –पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय रचना “साजिश“.)  

? साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # ३८ ?

? कविता – साजिश… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर  ? ?

?

=1=

फन कुचल दो वरना वो तुम्हें ही डसेगा

चूके अगर ज़रा कहीं,वो तुमपे हँसेगा

=2=

दोगे आस्तीन में पनाह ग़र उसे

हौले-हौले अपना वो शिकंजा कसेगा

=3=

जाल जो बिछायेगा दूजों के वास्ते

अपनी रची साजिशों में ख़ुद ही फंसेगा

=4=

सोचा न था इक दिन मेरे कलेजे का टुकड़ा

रोजी के वास्ते कहीं जा दूर बसेगा

=5=

‘राजेश’ जिसकी फ़ितरतें हैं टाँग अड़ाना

देखना महफ़िल में वो ज़बरन आ ठसेगा

© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर

शासकीय कॉलेज़ केवलारी

संपर्क — ग्राम -धतूरा, पोस्ट – जामगाँव, तहसील -नैनपुर, जिला -मण्डला (म.प्र.) मोबा. 9424316071

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ “श्री हंस” साहित्य # २११ ☆ गीत – ।। मैं से हम की यात्रा सब कुछ बदल देती है ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

श्री एस के कपूर “श्री हंस”

☆ “श्री हंस” साहित्य # २११ ☆

☆ गीत ।। मैं से हम की यात्रा सब कुछ बदल देती है ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

मैं से हम   की यात्रा   सब कुछ बदल देती है।

सामूहिक शक्ति ही  अतुलनीय बल असल देती है।।

**

मिलकर सहयोग की ताकत कहीं अधिक होती है।

कार्य सम्पूर्ण होताऔर बात अहम में नहीं खोती है।।

मैं की नीति अधिकतर कार्य को राह रसातल देती है।

मैं से हम  की यात्रा सब   कुछ बदल देती है।।

**

ऊँचीआवाज नहीं शब्दों में वजन की बात होनी चाहिए।

तार्किक दृष्टि की इसमें भरपूर सौगात होनी चाहिए।।

सहयोग सरोकार की बात हर समस्या का हल देती है।

मैं से हम  की यात्रा   सब कुछ बदल  देती है।।

**

मानवताआज तरस रही एक दूजे का प्यार पाने के लिए।

हर एक कोशिश होनी चाहिएअहम दूर भगाने के लिए।।

मिलकर काम करने की भावना ही सुनहरा कल देती है।

मैं से हम की  यात्रा सब   कुछ  बदल देती है।।

© एस के कपूर “श्री हंस”

बरेली ईमेल – Skkapoor5067@ gmail.com, मोब  – 9897071046, 8218685464

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ काव्य धारा #२७४ ☆ कविता – महाराज छत्रपति शिवाजी… ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

(आज प्रस्तुत है गुरुवर स्व  प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  द्वारा रचित – “कविता  – महाराज छत्रपति शिवाजी…। हमारे प्रबुद्ध पाठकगण स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी  काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।) 

☆ काव्य धारा # २७४

☆ महाराज छत्रपति शिवाजी…  स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

अति पराक्रमी चपल गति नीति निपुण गुणवान

छोटे कद के सुगठित, देशभक्त बलवान

धर्म परायण,  दयालु पर प्रचण्ड रणधीर

महाराष्ट्र के शिवाजी थे एक वीर महान ।।।।।

रणकौशल में अप्रतिम, सजग, सहित अनुमान

उड़ती चिड़िया के परों की जिनको पहचान

घोड़े की ही पीठ पर बीता जीवन काल

गुरू पूजक यों शिवाजी थे पवित्र इन्सान ।।2।।

थे प्रयास हो संगठित बिखरा हुआ समाज

हो देश में स्थापित पावन हिन्दू राज प्रबल

विदेशी शत्रु का हो मूलोच्छेद भारत में

हो उदित नव सुखकर स्वर्ण विहान ।।3।।

यों थे शिवाजी छत्रपति के शुभ उच्च विचार

पूरी होती चाह तो होता कुछ संसार।

आज कार्य के नाम पर होते जो उत्पात

कहीं न होते होता तब जन-जीवन आसान  ।।4।।

सामाजिक व्यवहार में जो थे सहज उदार

राजनीति में नीति का जिसने किया विचार।

जिसके हर व्यवहार की छवि अब भी है आदर्श

ऐसे व्यक्ति महान का करते हम यशगान ।।5।।

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

साभार – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

ए २३३ , ओल्ड मीनाल रेजीडेंसी  भोपाल ४६२०२३

मो. 9425484452

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≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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