(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब) शिक्षा- एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता
आदरणीय श्री कमलेश भारतीय जी से किसी भी रूप में जुड़ना एक रिश्ता बन जाने जैसा है। एक अनजान रिश्ता। मुझे यह सौभाग्य मिला डॉ मधुसूदन पाटिल सर के माध्यम से। उनके संस्मरण हमें स्मृतियों के उस संसार में ले जाते हैं जहाँ जाना अब संभव नहीं है। हम उस संस्मरण के एक तटस्थ पात्र बन जाते हैं। बिलकुल आर के लक्ष्मण के पात्र ‘कॉमन मैन’ की तरह। इस रिश्ते से कोई भी पाठक या मैँ स्वयं उनके रचना संसार में तटस्थ पात्र ‘कॉमन मैन’ ही हूँ। प्रस्तुत है आदरणीय कमलेश भारतीय जी संस्मरण – हिमाचल से मेरा प्रेम और कुछ यादें )
☆ संस्मरण ☆ हिमाचल से मेरा प्रेम और कुछ यादें… ☆
(इस लेख को दिव्य हिमाचल के संपादक व मेरे मित्र अनिल सोनी ने और बाद में उर्मि कृष्ण ने शुभतारिका के हिमाचल विशेषांक में प्रकाशित किया था। इसे फिर संशोधित किया है – – कमलेश भारतीय)
हिमाचल से मेरा प्रेम है और जब-जब समय मिलता है मैं इसकी ओर उमड़ पड़ता हूं । बचपन में मेरी दादी किसी धार्मिक संग के साथ बाबा बालकनाथ की यात्रा पैदल करती थी और दो वर्ष मैं भी उनके साथ इस यात्रा में शामिल रहा । इतना याद है कि नवांशहर से गढशंकर तक रेल से जाते । रात वहां किसी सराय में रुकते और दूसरी सुबह पदयात्रा शुरू होती जय जयकार करते । रास्ते में संतोखगढ़ आता और पानी के स्त्रोत भी । ठंडा शीतल जल । रास्ते में गरूने के फल तोड़कर खाते ।
बाबा बालकनाथ की कहानी भी बहुत मजेदार । बारह साल गाय चराई और फिर एकमुश्त ही पेड़ पर चिमटा मार कर माई रत्नो को सारी रोटियां वापस कर दीं । ऐसा कुछ वाक्या मेरे साथ खटकड़ कलां में हुआ । मैं लगभग बारह वर्ष ही वहां प्राध्यापक और प्रिंसिपल रहा । पड़ोस की छात्रा तरसेम कौर की मां मेरे लिए मक्खन रोटी रखती । जब बारह साल बाद शिक्षण को विदा दी तब आंसुओं के बीच मैंने कहा कि वे बाबा बालकनाथ ही ऐसा कर सकते थे कि सब कुछ लौटा दें । मैं एक साधारण मनुष्य हूं । मैं आपका प्यार लौटा नहीं सकता ।
फिर मेरा रिश्ता हिमाचल से जुड़ा जब मैं बीएड की क्लास फैलो कांता की शादी में बिलासपुर गया । वहां की झील के बारे में रोचक बात पता चली कि पुराने शहर को लील लिया और पानी कम होने पर लोग वहां अपने घर तलाशने और देखने जाते हैं । अभी कुछ मंदिर दिखते हैं । विवाह सुंदरनगर में चितरोखड़ी में था । इसलिए राजा का महल भी देखा । यह सन् 1973 की बात है ।
सुंदरनगर में ही तब गीतकार सुरेश ओबराय नमन् नौकरी करते थे । उनके पास रुका । उन्होंने दूरवर्ती पाठ्यक्रम से एम ए हिंदी करने की सलाह दी और देर होने के कारण दूसरी सुबह रोटी की पोटली बांध कर मुझे शिमला की बस पर चढा दिया और साथ में आकाशवाणी के बी आर मेहता के नाम चिट्ठी दे दी । वैसे यादवेंद्र शर्मा से भी मिला । वे अब शायद वकालत करते हैं । यदा कदा उनकी कविताएं पढने को मिल जाती हैं । सशक्त कवि हैं ।
इस तरह शिमला आकाशवाणी पहुंच कर मैंने ‘गूंजती घाटियां’ के संपादक बी आर मेहता से भेंट कर नमन् की चिट्ठी सौंप दी । वे शाम को फागली स्थित अपने घर ले गये । उस दिन उनके पड़ोस में शादी थी सो पहली बार पहाड़ी भात खाने का मजा भी लिया । दूसरे दिन मेहता जी ने फोटोग्राफर ढूंढा और बीच सड़क खड़ा कर मेरा तुरत फुरत फोटो करवाया और समरहिल ले जाकर प्रोविजनली मेरा एम ए का फाॅर्म भरवा दिया ।
इस तरह दो वर्ष तक शिमला मेरा आना जाना बना रहा और मेरा लगाव बढ़ता गया । मुझे तो बस शिमला जाने का बहाना चाहिए होता था । चीड़ और देवदार के घने पेड़ मानो मुझे आमंत्रित करते । खूब चहल पहल । शिमला में बहुत सी साहित्यिक पुस्तकें भी खरीदता रहा जिन पर आज भी शिमला और तिथि लिखी देखकर सब याद आ जाता है । हंसराज भारती बेशक अमृतसर नौकरी करते थे पर हिमाचल के थे । संपर्क बना रहा । अब वे जंजैहली से बराबर जुड़े हुए हैं ।
फिर दैनिक ट्रिब्यून में आ गया । तब एक बार कथा कहानी समारोह का आयोजन करने गेयटी थियेटर में संपादक विजय सहगल के साथ आया और हमें स्टेट गेस्ट बनाया गया । शांता कुमार मुख्यमंत्री थे और शिक्षामंत्री राधारमण हमें अपनी सरकारी गाडी में अगवानी कर गेयटी थियेटर तक लेकर गये । वह याद आज भी खुशी देती है । आयोजन बहुत सफल रहा । वर्तिका नंदा और प्रतिभा कुमार को पुरस्कृत करना याद है । आज वे लेखन व सामाजिक काम में अपना मुकाम बना चुकी हैं ।
इसके बाद राजेंद्र राजन ने ज्ञानरंजन के आगमन पर विजय सहगल को आग्रह कर कवरेज के लिए मेरी ड्यूटी लगवाई थी । जहां तक मुझे याद पड़ता है मेरा रहने का प्रबंध कथाकार बद्रीनाथ भाटिया के आवास पर किया था । नंदिता तब बहुत छोटी थी ।
दूसरे दिन ज्ञानरंजन का प्रारंभिक संबोधन दिल को छू गया था । बहुत लम्बे समय बाद ऐसा व्याख्यान सुना था । जो बात कही वह बहुत दूरदर्शी लेखक ही कह सकता था और बात यह थी कि कलम की जगह जल्द ही माउस लेने वाला हैं । तब कम्प्यूटर इतने प्रचलन में भी नहीं थे पर आज देखिए ज्ञानरंजन की बात कितनी सच हो चुकी है । ज्ञानरंजन को चंडीगढ़ में भी सुनने का मौका मिला । ज्ञानरंजन ऐसे ही ज्ञानरंजन नहीं हैं। मैने उनकी पैंतीस कहानियों वाली पुस्तक भी पढ़ी हैं ।
हां । एक प्यारी सी याद धर्मशाला से भी जुड़ी है । मैं परिवार के साथ लेखक गृह में रुका था । वहां चौकीदार ने प्रसिद्ध लेखक उपेंद्रनाथ अश्क के प्रवास की कहानी भी सुनाई थी कि कैसे कभी-कभी गुस्सा हो जाते थे । प्रत्यूष गुलेरी अपनी गाड़ी में हमें रात का खाना खिलाने दाढ़ी अपने घर ले गये । रात ग्यारह बजे तक उनकी बेटी अदिति और मेरी बेटी रश्मि ने धमाल मचाया । वह शाम कभी नहीं भूल सकता । प्रत्यूष जब एम ए कर रहे थे तो जालंधर से पाठ्यक्रम की पुस्तकें लेने आते तो मेरे पास नवांशहर भी जरूर आते । वह प्रेम आज तक चला आ रहा है ।
खैर । अब फिर से मेरा रिश्ता शिमला से एस आर हरनोट व विनोद प्रकाश गुप्ता ने जोड़ दिया है नवल प्रयास के कार्यक्रमों में आमंत्रित कर । बहुत अच्छा लगा हिमाचल के दूरदराज से आए नवलेखकों व कुछ चर्चित लेखकों से मिलने का और उन्हें सुनने का अवसर पाकर । प्रियंवदा शर्मा, कंचन शर्मा, सुमित राज वाशिष्ठ, आत्मारंजन, प्रोमिला ठाकुर, शिल्पा भाटिया, मृदुला श्रीवास्तव, पूनम तिवारी, साक्षी मेहता , गंगाराम राजी, कुल राजीव पंत और न जाने कितने लेखक मिले। मृदुला का पहला कहानी संग्रह काश पंचोली न होती और हरनोट की प्रतिनिधि कहानियां विमोचन पर मिले और पढे । खूब सार्थक ।
हिमाचली टोपी जो सम्मान में मिली मैं उसे सर्दियों में हिसार में बडे चाव से पहनता हूं और लोग मुझे हिमाचली समझते हैं। बडा मज़ा आता हैंं । कंचन शर्मा ने अपने आवास पर हिमाचली नाश्ता भी करवाया जिसकी सुगंध याद आती रहती है और प्रमोद जी से मिलवाया । वे तब चुनाव की तैयारी कर रहे थे । वीरभद्र सिंह के बेटे विक्रमादित्य को चुनौती दी । बेशक हार गये । आर डी शर्मा ने भी मुझसे पंजाब, हरियाणा और हिमाचल की कहानी पर लेख लिखवाया और परिवर्तन पत्रिका में प्रकाशित भी किया । दो बार उन्होंने भी आमंत्रित किया । हि प्र विश्वशिद्यालय गेस्ट हाउस मेरे दूसरे घर जैसा है । दिनेश कुक ऐसे स्वागत् सत्कार में लग जाता है मानो हम उसके ही अतिथि और परिवार के सदस्य हों । देर तक खाना खिलाने का इंतजार करता है । अपने दैनिक ट्रिब्यून के सहयोगी और शिमला से रिपोर्टर रहे शशिकांत शर्मा जो आजकल हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के मीडिया विभाग में प्राध्यापक हैं, उन्हें भी स्मरण कर रहा हूं। अपनी गाड़ी में जाखू मंदिर घुमाने ले गये और जिन दिनों राज्यपाल देवव्रत के मीडिया सलाहकार रहे तब हमें राज्यपाल भवन का अतिथि बना कर सम्मान दिया । वाह रविकांत बहुत प्यारे हो । मेरे एक फोन पर तुरंत सारी व्यवस्था बना देते हो । क्या कहूँ?
एक याद नाहन और राजेंद्र राजन से खासतौर पर याद आ रही है । तब राजेंन्द्र राजन वहां जनसंपर्क अधिकारी के तौर पर तैनात थे और किसान भवन में कार्यक्रम आयोजित किया था । नाहन के बारे में सुना था
नाहन शहर नगीना
आए एक दिन रुके महीना ।
मैं पंजाब विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के उस समय अध्यक्ष व प्रसिद्ध कथाकार डाॅ वीरेंद्र मेहंदीरत्ता के साथ नाहन तक उनकी कार में गया था । उनकी उम्र कुछ हावी हो रही थी कि वे पूछ रहे थे कि कमलेश, तुम्हें कार ड्राइव करनी आती है ? मैंने कहा कि नहीं । कहने लगे आती तो कम से कम मुझे कुछ आराम मिल जाता पर वे हिम्मत कर कार ड्राइव कर नाहन ले ही गये । पिंजौर के यादवेंद्रा गार्डन में बांसुरी बजाने वाले प्रेमी फकीर को भी बुलाया गया था । उसका बांसुरी वादन आज भो कानों में कभी कभी गूंज जाता है और राजेंद्र राजन भी याद आते रहते हैं ।
इसके बावजूद जब चंडीगढ़ से हिमाचल की यात्रा शुरू होती है तो सड़क को चौड़ा करने की कवायद यह अहसास ही नहीं होने देती कि हम शिमला की ओर जा रहे हैं । देवदार के पेड़ कटते जा रहे हैं और कंक्रीट सड़कें बनती जा रही हैं । प्राकृतिक सौंदर्य कम होता जा रहा है । दिल दुखी होता है । पहाड़ों की कांट छांट की जा रही है । हरियाली घटती जा रही है । पहाड़ सूखते व वीरान से होते जा रहे हैं । प्लाॅस्टिक की थैलियां सैलानी फेंकते जाते हैं ।
एक बार बिलासपुर में हिमाचल के प्रथम लघुकथा सम्मेलन में रत्नचंद निर्झर ने मुख्य अतिथि के रूप में बुलाया । तब मैं हरियाणा ग्रंथ अकादमी का उपाध्यक्ष था । चंडीगढ से मैं जीतेंद्र अवस्थी और रत्नचंद रत्नेश के साथ पहुंचा और वहां सुदर्शन वाशिष्ठ और कृष्ण महादेविया, प्रदीप गुप्ता, अरूण डोगरा रीतू सहित अनेक रचनाकारों से भेंट हुई । तब दूसरी बार एक पंगत में बैठ कर भात व क कढी खाई । जिसका स्वाद आज तक याद है । मुझे खुशी हुई कि लघुकथा में दूरदराज याद किया गया । हिमाचल की श्रेष्ठ लघुकथाएं पुस्तक की भूमिका भी रत्नेश ने मुझसे लिखवाई । यह बता कर कि ये सारी लघुकथाएं मैंने ही दैनिक ट्रिब्यून के कथा कहानी में छाप कर हिमाचल को प्रमुखता दी । इसी प्रकार मंडी में मुझे नरेश पंडित ने एक कार्यक्रम में आमंत्रित किया था जिससे दीनू कश्यप और नाटक निर्देशक इंदु से मेरा परिचय बना हुआ है । यह कार्यक्रम भी किसान भवन में हुआ था ।
शिमला जाते समय व्यंग्यकार अशोक गौतम को मिलना नहीं भूलता । सोलन में भी कुछ समय बिता ही लेता हूं । अशोक की गर्मजोशी बहुत भाती है । वह स्वागत् के लिए तैयार मिलता है । एक बार प्रसिद्ध लेखक केशव नारायण के घर भी अतिथि बनने का सौभाग्य मिला तो एक बार पालमपुर में सुशील फुल्ल से भी उनके आवास पर मिला । तब अंगूरा खरगोश रखे थे । मेरी बेटियां बहुत खेलीं । तब अर्चना भी थी । फिर वह चंडीगढ इंडियन एक्सप्रेस में आई तब ज्यादा मिलना हुआ । इतने वर्षों बाद नवल प्रयास के सम्मान समारोह में शिमला में केशव व सुशील कुमार फुल्ल से मिलना हुआ । अब शिमला जाता हूं तो जरूर समय निकाल कर सम्मान से मिलने आती है बेटी की तरह अर्चना फुल्ल । इसी तरह राजेंद्र राजन की बेटी नंदिता दिल्ली में नवल प्रयास की काव्य गोष्ठी में मिली । खुद ही फेसबुक फोटो से पहचाना । अच्छा लगा । उससे भी निरंतर संपर्क में हूं । कविताएं अच्छी लिखती है । इसी प्रकार कुमार कृष्ण के शोघी स्थित निवास पर भी आतिथ्य का सौभाग्य मिला । वे भी निरंतर संपर्क में हैं । सुंदर लोहिया से समरहिल में यूनिवर्सिटी में छोटी सी मुलाकात हुई थी । तब हम दोनों की कहानियां श्रीपत राय की कहानी पत्रिका में आती थीं । सुना है आजकल वे अस्वस्थ हैं ।
अब शिमला और हिमाचल में मेरे अनेक मित्र हैं । सबको यादों की धरोहरपहुंचाने की कोशिश की ।
पुनीत सहगल को भी याद कर रहा हूं । वह नवांशहर में ही रहा और शिमला दूरदर्शन का डायरेक्टर भी रहा । उसने एख बार शिमला दूरदर्शन पर मेरा लाइव इंटरव्यू प्रसारित किया । सेन्नी अशैष के जिक्र के बिना भी क्या हिमाचल? सैन्नी अशेष से पहली मुलाकात सपरिवार तो अम्बाला छावनी में कहानी लेखन महाविद्यालय के प्रांगण में हुई लेकिन सन् 2019 सितम्बर में मनाली में कहानी लेखन महाविद्यालय के लेखक शिविर में हुई । तीन दिन । खूबु मुलाकात और अपने घर भी ले गये । ओशो की झलक भी दिखाई । एक घंटे के कार्यक्रम में। जाने कितने लेख /चर्चायें ओशो पर और स्नोबा बार्नो का रहस्यमयी चरित्र। डाॅ गौतम शर्माव्यथित । डाॅ चंद्रशेखर के पास जब पीएचडी कर रहे थे और जालंधर उनसे निर्देश लेने आते गाइड के तौर पर तब मुलाकात होती रही जो सम्पर्क आज तक बना है ।
सबसे अच्छी बात शिमला के रिज की । पिछले वर्ष की आखिरी शाम यानी 31 दिसम्बर को हम शिमला में ही थे । रिज पर । खूब भीड़ । खूब नये साल का जश्न । ऐसे में मुख्यमंत्री जय ठाकुर कुछ अंगरक्षकों के साथ अभिवादन करते चले जा रहे थे । वाह । न कोई धक्का मुक्की । न कोई रास्ता ब्लाक । न कोई घेराबंदी । जिसे मिलना हो । आगे आए और हाथ मिला ले । सच कोई वीआईपी कल्चर नहीं । भीड़ को यह भी मालूम नहीं कि मुख्यमंत्री हमारे बीच जा रहा है जबकि मैदानी क्षेत्रों में मुख्यमंत्री के आने पर रास्ते तक बदल दिए जाते हैं और जनता परेशान होती हैं । काश । यह बात दूसरे राज्यों के नेता भी समझें ।
(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)
संजय दृष्टि – सृजन…
जल शांत था। उसके बहाव में आनंदित ठहराव था। स्वच्छ, निरभ्र जल और दृश्यमान तल। यह निरभ्रता उसकी पूँजी थी, यह पारदर्शिता उसकी उपलब्धि थी।
एकाएक कुछ कंकड़ पानी में आ गिरे। अपेक्षाकृत बड़े आकार के कुछ पत्थरों ने भी उनका साथ दिया। हलचल मची। असीम पीड़ा हुई। लहरें उठीं। लहरों से मंथन हुआ। मंथन से सृजन हुआ।
कहते हैं, उसकी रचनाओं में लहरों पर खेलता प्रवाह है। पाठक उसकी रचनाओं के प्रशंसक हैं और वह कंकड़-पत्थर फेंकनेवाले हाथों के प्रति नतमस्तक है।
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
गोविंद साधना संपन्न हुई। अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र ही दी जावेगी।
हमारा प्रयास है कि महत्वपूर्ण स्तोत्रों का अधिकाधिक प्रसार हो।
≈≈
≈ संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(ई-अभिव्यक्ति परिवार की ओर से स्मृति शेष – साहित्य में पूर्णिका के जनक श्रद्धेय डा. सलपनाथ यादव प्रेम को सदर नमन एवं विनम्र श्रद्धांजलि। अमेज़न किंडल पर डॉ. सलपनाथ यादव ”प्रेम“ द्वारा स्थापित ‘पूर्णिका’ नाम से डिजिटल पुस्तक (eBook) भी उपलब्ध है, जिसमें इस विधा की बारीकियों और कविताओं का संकलन किया गया है।
ई-अभिव्यक्ति द्वारा समय समय पर पूर्णिका से सम्बंधित विशेष रचनाएँ प्रकाशित की गई हैं जिन्हें आप निम्न लिंक्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं👉
☆ स्मृति शेष – साहित्य में पूर्णिका के जनक श्रद्धेय डा. सलपनाथ यादव प्रेम☆ समीक्षा – श्री यशोवर्धन पाठक ☆
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आज पूर्णिका हुई प्रतिष्ठित
हिन्दी के रंग मंच पर
हिन्दी से यह प्रेम तुम्हारा
वंदन का अधिकारी है
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हिन्दी साहित्य में पूर्णिका के प्रणेता श्रद्धेय डा.सलपनाथ जी यादव प्रेम के वियोग को उनके शोकाकुल मित्रों ने बड़े दिल दिमाग से महसूस किया। वास्तव में साहित्यिक क्षेत्र समेत हम सभी के लिए यह एक अपूर्णीय क्षति है। अंतरराष्ट्रीय पूर्णिका मंच और आभा साहित्य संघ के संस्थापक के रूप में उन्होंने हिन्दी साहित्य के मंच पर पूर्णिका को प्रतिष्ठित कराने में जिस संघर्षशील भूमिका का निर्वाह किया उसने उनको पूर्णिकाकारों के मध्य हमेशा के लिए अभिनंदनीय वंदनीय सिद्ध कर दिया।
पूर्णिका के जनक आदरणीय डा . सलपनाथ यादव प्रेम जी पर आधारित और अंतरराष्ट्रीय पूर्णिका मंच के लिए समर्पित पं. अंशुल विशंभर मिश्र कदम जबलपुरी द्वारा संपादित और देश के विभिन्न अंचलों से ९३ पूर्णिकाकारों द्वारा डा. सलपनाथ यादव प्रेम जी के जन्म दिवस पर उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर सृजित पूर्णिकाओ के इस अद्भुत संकलन की जब प्रस्तुति की गई तो पाठकों के बीच इसकी काफी चर्चा की गई। किसी साहित्य साधक की रचना धर्मिता को लेकर इतने रचनाकारों के द्वारा श्रद्धापूर्वक पूर्णिका की रचना करना अपने आप में साहित्यिक क्षेत्र में एक सराहनीय कीर्तिमान है। यहां महत्वपूर्ण है कि पूर्णिका के इस संग्रह को देश की चार साहित्य अकादमी और दो विश्वविद्यालयों ने भी अपनी प्रभावी प्रतिक्रियाओं और सहमति से लोकप्रिय निरूपित किया।
पूर्णिका के सृजन की शुरुआत में इसके जनक डा. सलपनाथ यादव प्रेम जी को काफी कोशिशें करना पड़ी। बाधायें भी आईं लेकिन प्रेम जी की सक्रियता और संकल्पबद्धता ने आखिरकार पूर्णिका को कविता के क्षेत्र में एक विधा के रूप में प्रतिष्ठित और स्थापित करने में सफलता अर्जित कर ली। आज प्रेम जी के संरक्षण और मार्गदर्शन में देश भर से अधिक से अधिक पूर्णिकाकार सफलता पूर्वक पूर्णिका लिख रहे हैं और देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में छप रहे हैं। पूर्णिका के पक्ष में यह आज गौरव की बात है कि आज विभिन्न अंचलों से रचनाकारों के अधिकांश पूर्णिका संग्रह प्रकाश में आ रहे हैं और उनकी सर्वत्र असरकारक ढंग से चर्चा भी हो रही है। अंतरराष्ट्रीय पूर्णिका मंच ने गत वर्ष भी अपने गरिमामय आयोजन में देश के साहित्यकारों की पूर्णिका कृतियों का काफी संख्या में विमोचन किया था जिसकी साहित्यिक क्षेत्र में सर्वत्र काफी चर्चा हुई थी। अंतरराष्ट्रीय पूर्णिका मंच और आभा साहित्य संघ के संस्थापक डा सलपनाथ यादव प्रेम जी की कोशिशों से आज पूर्णिका राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित और विकसित हो चुकी है।
सामाजिक और साहित्यिक क्षेत्र में डा. सलपनाथ जी यादव सभी के सुख दुख के साथी थे। प्रेम उपनाम से उन्होंने लेखन के क्षेत्र में अपनी सक्रिय पहचान बनाई और प्रतिष्ठा अर्जित की और केवल उन्होंने साहित्यिक क्षेत्र में प्रतिष्ठा प्राप्त नहीं की बल्कि वे एक बहुआयामी व्यक्तित्व थे। एक सफल अधिवक्ता, यादव समाज में एक प्रसिद्ध समाजसेवी और मार्गदर्शक, आयुर्वेद रत्न के रूप में एक जानकार चिकित्सक ये सब उनके प्रभावी व्यक्तित्व की पहचान थी। उन्होंने मिलनसारित और जुझारूपन के कारण विभिन्न क्षेत्रों में अपनी अनोखी छाप छोड़ी और लोगों को प्रेरित और प्रोत्साहित किया।
आज डा.सलपनाथ जी यादव हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनका संघर्ष और उनका प्रेम सदा हमारे साथ रहेगा और हम उनके सपनों को पूरा करेंगे जो कि उन्होंने पूर्णिका के विकास के संबंध में देखा था। आज कविवर श्री नरेन्द्र की ये पंक्तियां याद आ रही हैं जो कि उनके सक्रिय और संघर्षशील व्यक्तित्व पर खरी उतरती हैं –
(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)
जीवन के कुछ अनमोल क्षण
तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित।
मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी से भेंट करते हुए।
बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए।
आप डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – बॉस की पुरानी डायरी।)
☆ चुभते तीर # १३५ – व्यंग्य – बॉस की पुरानी डायरी☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’☆
(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार
गुप्ता जी के रिटायर्ड होते ही दफ़्तर की अलमारी की सफ़ाई का काम नए नवेले जूनियर क्लर्क रमन को सौंपा गया। अलमारी का निचला ड्रॉर पिछले बीस सालों से बंद पड़ा था। उसके ताले पर जंग की ऐसी मोटी परत चढ़ी थी जैसे किसी पुराने रिश्ते पर वक्त की धूल। जब रमन ने हथौड़ी से ताला तोड़ा, तो अंदर से कागज़ों के कबाड़ के बीच चमड़े के ज़िल्द वाली एक पुरानी काली डायरी निकली।
उस डायरी के पहले पन्ने पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था—’दफ़्तर के गुप्त रहस्य और तरक्की का अचूक मंत्र’।
रमन की आंखों में चमक आ गई। कॉर्पोरेट दुनिया में सीधे रास्ते से चलने वाले अक्सर दफ़्तर के दरवाज़े पर ही खड़े रह जाते हैं, जबकि शॉर्टकट वाले लिफ़्ट से सीधे पाँचवें माले पर पहुँचते हैं। रमन ने डायरी को अपनी जैकेट में छुपाया और चाय के टपरे पर जाकर पन्ने पलटने लगा।
डायरी में कोई सरकारी हिसाब नहीं था, बल्कि दफ़्तर के हर साहब की कमज़ोरियों का पूरा आलेख था। लिखा था कि बड़े साहब को जब गुस्सा आए तो अदरक वाली चाय में आधा चम्मच शहद डालकर दो, उनका गुस्सा मक्खन की तरह पिघल जाएगा। दूसरे साहब को अगर मीटिंग में हराना हो, तो बातों-बातों में उनकी पुरानी गाड़ी की तारीफ़ कर दो, वे खुश होकर हर फाइल पर दस्तखत कर देंगे।
रमन ने डायरी के हर पन्ने को किसी धार्मिक ग्रंथ की तरह रट लिया। अगले दो महीनों में दफ़्तर में चमत्कार होने लगा। जो बड़े साहब बात-बात पर क्लर्कों पर गरजते थे, वे रमन को देखते ही मुस्कुराने लगते। जिसकी फाइलें तीन-तीन महीने लटकी रहती थीं, रमन का नाम लेते ही वो फाइलें हवा की रफ्तार से आगे बढ़ने लगतीं। पूरे दफ़्तर में फुसफुसाहट शुरू हो गई कि रमन पर ज़रूर किसी सिद्ध संत का हाथ है।
वार्षिक समीक्षा का दिन आया। इस बार ‘बेस्ट एम्पलाई’ के पुरस्कार के लिए रमन का नाम सबसे ऊपर था। पुराने सीनियर साहब, जो रमन की इस अचानक तरक्की से जलते थे, उन्होंने भरे हॉल में माइक संभाल लिया।
उन्होंने रमन पर निशाना साधते हुए कहा, “रमन ने काम क्या किया, यह तो कोई नहीं जानता, लेकिन इसके पास ज़रूर कोई ऐसी जादुई छड़ी है जिससे यह हर साहब को अपनी उंगलियों पर नचाता है। मैं मांग करता हूँ कि इसकी इस जादुई डायरी को सबके सामने पेश किया जाए!”
पूरे हॉल में सन्नाटा छा गया। रमन का दिल दहल गया। अगर डायरी का सच बाहर आया, तो उसकी नौकरी का जनाज़ा निकल जाएगा। रमन ने कांपते हाथों से अपनी जेब से वह काली डायरी निकाली और मंच पर जाकर बड़े साहब के हाथ में थमा दी।
बड़े साहब ने चश्मा लगाया और डायरी का अंतिम पन्ना खोला, जो अब तक रमन ने भी नहीं पढ़ा था।
अंतिम पन्ने पर गुप्ता जी की लिखावट में लिखा था: “यदि आप यह डायरी पढ़ रहे हैं, तो समझ लीजिए कि यह कोई जादू नहीं है। दफ़्तर में काम कागज़ों से नहीं, इंसान के स्वभाव को समझने से होता है। जो इंसान अपनों का मूड समझ ले, वही असली अफ़सर है।”
बड़े साहब की आंखें भर आईं। उन्होंने डायरी बंद की और रमन को गले लगा लिया। पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। रमन ने राहत की सांस ली और मन ही मन माना कि सबसे बड़ा कूटनीतिज्ञ वही है जो बिना लड़े मैदान जीत ले।
(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)
☆ लघुकथा ☆ ~ सपनों का राजकुमार ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆
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सपनों में आया राजकुमार बहुत ही सुन्दर लग रहा थाl उसके आंगन में प्रवेश करते ही ऐसा लगा,मानों हजारों बल्बों की रोशनी जल गई होl बूढ़े बाप को अपनी सुकुमारी सी बेटी के लिए, इससे सुंदर वर क्या हो सकता था, लेकिन आंगन की चमचमाती रोशनी अचानक अंधेर कूप में इसलिए बदल गई क्यों कि बरामदे में खड़ी, मोटरसाइकिल को वह राजकुमार इस बार ही अपने साथ ले जाना चाहता था, जबकि बुजुर्ग ने बेटे को स्कूल जाने के लिये इस मोटरसाइकिल को महंगे ब्याज पर कर्ज लेकर खरीदा था l
(श्री सुरेश पटवा जी भारतीय स्टेट बैंक से सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों स्त्री-पुरुष “, गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर।)
यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – गढ़चिरौली यात्रा – भाग- ४७ ☆ श्री सुरेश पटवा
8.गढ़चिरौली यात्रा
नक्सलियों के मायके में
कैलाश मेश्राम की स्टेट बैंक के भोपाल स्थित स्थानीय कार्यालय में पदस्थी के दौरान मेरी उनसे हुई मुलाक़ात मित्रता में बदल गई। कुछ समय बाद कैलाश की पदोन्नति सहायक महाप्रबंधक की श्रेणी में होने के साथ उनका तबादला अंकेक्षण (Audit) विभाग में हो गया। दोनों घूमने-फिरने के शौक़ीन थे इसलिए कैलाश जहाँ भी आडिट करने जाते वहाँ मुझे घूमने-फिरने बुलाते। अनेकों बार कार्यक्रम बनता परंतु किन्ही कारणों से बिगड़ जाता। नवम्बर 2020 के पहले हफ़्ते में कैलाश को आडिट हेतु पंद्रह दिन गढ़चिरौली में रहना था। उन्होंने मुझे गढ़चिरौली भ्रमण हेतु आमंत्रित किया।
मैंने गढ़चिरौली के वनीय वैभव, गोंडी-तेलुगु-मराठी लोगों की मिलीजुली जीवंत संस्कृति, बाबा आमटे के पुत्र प्रकाश आमटे एवं उनकी पत्नी मंदाकिनी आमटे द्वारा पलकोटा, वेडिया और इंद्रावती नदियों के त्रिवेणी संगम पर स्थापित लोक बिरादरी सेवा आश्रम, अल्लापल्ली के प्रसिद्ध सागौन वन क्षेत्र और मार्क्सवादी नक्सल आतंकवाद के मायके के नाम से मशहूर कमलापुर वनक्षेत्र के बारे में सुन रखा था। गढ़चिरौली भ्रमण की बड़ी पुरानी इच्छा कुलबुला उठी। नौ नवम्बर 2020 को कार के टैंक में सिरे तक पेट्रोल भराकर सुबह छः बजे भोपाल से गढ़चिरौली के लिए निकल लिए।
ठंडी हवा के झोंकों से बतियाते जैसे ही अब्दुल्लागंज पार किया विंध्याचल पर्वत के सुहाने दृश्य और ताज़ी हवा के झोंकों ने मन प्रसन्न कर दिया परंतु वह प्रसन्नता अधिक देर नहीं टिकी रही क्योंकि आगे आठ-दस किलोमीटर लम्बा धूल भरा ट्रैफ़िक जाम उसका स्वागत करने को तैयार था। फ़र्स्ट ग़ैर में घिसटते-घिसटते एक घंटे का रास्ता तीन घंटों में पूरा कर इटारसी पार करके केसला और पथरौटा से गुज़र कर शाहपुर पहुँचने ही वाले थे कि सतपुड़ा की लुभावनी हरीतिमा को छूकर आए हवा के झोंकों ने उसकी तबियत खुश कर दी। पता चला कि बैतूल ज़िला लग चुका है। हरे भरे पहाड़ों से घिरे एक ढ़ाबे पर मुँह-हाथ धोकर घर से लाया टिफ़िन ख़ाली करके पेट में भरा और वहाँ पड़ी खटिया पर पटिया को सिरहाना बनाकर लेट गए। लेटते ही दिमाग़ में बैतूल ज़िले की भौगोलिक संरचना और बसावट के विचार तरंगित होने लगे।
बैतूल
बैतूल समुद्र तल से 2,000 फीट की ऊँचाई पर स्थित वनों और जैव विविधता से समृद्ध क्षेत्र है, जो पूरे वर्ष यहाँ जलवायु को सुखद व मनमोहक बनाता है। यह सतपुड़ा रेंज के मैदानी इलाकों में स्थित होने से धूल भरे शहर के जीवन से एक सुखद, शांतिपूर्ण भ्रमण हेतु उपयुक्त है। बैतूल ज़िला मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से 180 किलोमीटर दूर छिंदवाड़ा, नागपुर, खंडवा, होशंगाबाद, हरदा जिलों की गोद में सतपुड़ा पर्वत के दक्षिणी पठार से नागपुर की तरफ़ फैले मैदान तक फैला हुआ है।
इतिहास की किताबों में यह क्षेत्र वाकाटक वंश, राष्ट्रकूट, सतवाहन, मुगल, गोंड, भोंसले, ब्रिटिश के अधीन रहा बताया जाता है। उन्नीसवीं शताब्दी की शुरुआत में, बैतूल क्षेत्र बदनूर का इलाक़ा के नाम से जाना जाता था। इस स्थान और ज़िले का वर्तमान नाम इसके दक्षिण में लगभग 5 किमी की दूरी पर बसे एक छोटे से शहर बैतूल-बाजार के कारण पड़ा है। लेकिन बैतूल शब्द कहाँ से आया? बैतूल का शाब्दिक अर्थ “बिना बाढ़” का है। इस क्षेत्र के चारों तरफ़ कपास की खेती बहुतायत से होती थी। किसानों ने यहाँ भी कपास लगाना शुरू किया लेकिन यहाँ की ज़मीन पथरीली और जलवायु नम से होने से यहाँ कपास का पौधा बढ़ता (तूल) नहीं था। जैसे “बातों को तूल न देना” याने न बढ़ाना एक मुहावरा है। वैसे ही कपास के पौधों का न बढ़ना बैतूल हो गया।
वहाँ आदिवासियों की छोटी हाट लगती थी जिसे बैतूल बाज़ार पुकारा जाने लगा। उन्नीसवी सदी में उड़ीसा और छत्तीसगढ़ फ़तह करके लौटते वक्त चौथ-सरदेशमुखी वसूली हेतु बिरार का इलाक़ा शिवाजी के वंशज राघोजी भोसले को सौंपा गया था। मराठा साम्राज्य विखंडन होने पर अंग्रेजों ने बैतूल को राजस्व तालुक़ा बना दिया। 1822 में जिला मुख्यालय को वर्तमान स्थान पर स्थानांतरित कर दिया गया, तभी से स्थानीय बोली में बदनूर इलाक़ा बैतूल के नाम से जाना जाने लगा।
बहुत कम लोग जानते हैं कि उन्नीसवीं शताब्दी में मराठों ने मंदिरों और पूजा स्थलों के रूप में अपने अमिट निशान छोड़ हैं। कई हिंदू और जैन मंदिर इस क्षेत्र के आसपास उसी समय के बने हैं। एक पहाड़ी की चोटी पर बना, मुक्तागिरी जैन मंदिर जैनियों के लिए यह एक पवित्र स्थान है। सबसे प्रसिद्ध मंदिर शहर के केंद्र से लगभग आठ किलोमीटर की दूरी पर स्थित बालाजीपुरम मंदिर है। 15 एकड़ में फैला, मंदिर 2001 में बनाया गया एक लंबा ढांचा और वास्तुकला में आधुनिक है। बसंत पंचमी के त्योहार पर हर साल मेला भरता है। कुकरुखमाला, सोना घाटी, मुलताई और शापना जलाशय आसपास के अन्य पर्यटन स्थल हैं।
अमरावती जिले में हाटीघाट और चिकलदा पहाड़ियों के किनारे ताप्ती की सहायक नदियाँ मोरंड और गंजल दक्षिणी-पश्चिमी सीमा निर्धारित करती हैं। मोरंड नदी और ढोढरा मोहर रेलवे स्टेशन के आगे से तवा नदी ज़िले की उत्तरी सीमा बनाती हैं। पूर्वी सीमा छोटी नदियों और पहाड़ियों से गुलज़ार हैं। जिनमें से खुरपुरा और रोटिया नाला बरसात के दिनों में बादलों से ढँके अनेकों प्रपातों का निर्माण करते हैं। गोंड, कोरकु, भरिया, कुर्मी, कुनबी, मेहरा और चमार इस ज़िले के मुख्य निवासी हैं। क़रीब आधा घंटा आराम के बाद पुनः यात्रा शुरू करके शाम को पाँच बजे के आसपास नागपुर शहर के मकान दिखने लगे।
( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का मंतव्य उनके ही शब्दों में – “पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “ख़्वाहिश…“.)
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “खो जाने का सुख…“।)
अभी अभी # १०९० ⇒ आलेख – खो जाने का सुख श्री प्रदीप शर्मा
कुछ खो जाने, और सब कुछ खो जाने में बड़ा अंतर होता है। सब कुछ लुटा के होश में आए, तो क्या किया! खो जाने पर कौन खुश होता है। तुझे खो दिया हमने, पाने के बाद, तेरी याद आए। जिंदगी में हमने क्या खोया, क्या पाया, आखरी वक्त, कौन हिसाब रख पाया।
अब चैन को ही लें! जहाँ चैन नहीं, वहाँ बैचेनी है। सब चाहते हैं, चैन की सांस लें। जहां सुख है, वहाँ चैन है। सोने में सुख है, सोने की चेन में भी सुख है। जब चेन गुम हो जाती है, कोई सुख चैन भी चुरा ले जाता है और नैन से नींद भी। खोने में दुख ही दुख है। कौन कहता है, सोने में सुख है। सोने में दुख ही दुख है। चैन से सोने में ही असली सुख है।
बच्चे अक्सर मेले में, भीड़ में, खो जाते हैं। एक गाय का बछड़ा, जब अपनी मां से बिछड़ जाता है, तो उसकी दशा और दिशा देखने लायक होती है। उसकी पुकार बड़ी मार्मिक होती है। जब कभी दुख में, तकलीफ में, विषाद में, हम ईश्वर को पुकारते हैं, वही दर्द उस जीव में अपनी वत्सला मां के लिए होता है। एक बछड़े की तरह, जब जीव को अहसास होता है, कि वह भी परमात्मा से बिछुड़ा हुआ है, उसकी पुकार में भी वही दर्द महसूस किया जा सकता है। लेकिन हम अब बच्चे नहीं, दूध पीते, गाय से बिछड़े, बछड़े नहीं, एक बड़े, समझदार इंसान हैं। अब हमारे पास खोने और पाने के लिए बहुत कुछ है। परमात्मा का क्या है। मंदिर में, आते जाते, वार त्योहार पर, हाय हैलो, दुआ सलाम होती रहती है। सुख संपत्ति घर आए, कष्ट मिटे तन का। जीने को और क्या चाहिए।
पाने में सुख ही सुख है। क्या खोने में भी सुख है! आपने बहुत खोया होगा, लेकिन क्या कभी आप खुद भी खोए हैं ? वाह, हम क्यों खोएं, खोएँ हमारे दुश्मन। आओ खो जाएँ कहीं, छोड़ दें, दुनिया ये ज़मीं! अरे, वह तो प्यार की, फिल्मों की बातें हैं। कभी कभी किसी के प्यार में खोना अच्छा भी लगता है। अच्छा, तो आप उस खोने की बात कर रहे हैं।।
कई बार खोएं हैं, अपने काम में, बीवी बच्चों और परिवार के प्यार में। यार दोस्तों के बीच, गीत संगीत की महफिलों के बीच! वही खोना ही तो जिंदगी को पाना है। जब एक बार तैरना आ जाए, तब ही डूबने का मज़ा आता है। पानी सर से ऊपर बहे, तब भी डर नहीं लगता।
कई बार ऐसा होता है, अकेले बैठे बैठे, हम कहीं खो जाते हैं। एकाएक, भीड़ में भी अकेले हो जाते हैं। हमें आसपास कुछ सुनाई नहीं देता, बस हम हां में हां किए जाते हैं। सामने वाला समझ जाता है। भाई साहब, कहाँ खो गए हैं। हम एकदम जागते हुए कहते हैं, नहीं तो। हां तो आप क्या कह रहे थे।।
अकेले में, एकांत में, शांत वातावरण में, कुछ सोचते सोचते, चिंतन मनन करते, अनायास कुछ पल ऐसे आ जाते हैं, जब हम अपने आप में खो जाते हैं। कोई विचार आता जाता नहीं है, कोई आवाज़ कानों तक नहीं पहुंचती, आँखें खुली होती हैं, लेकिन देखते हुए भी खोई खोई सी रहती है। नींद नहीं, खुमारी नहीं, पूरी जाग्रत अवस्था, फिर भी कहीं खोए खोए। ध्यान कह लें, भाव समाधि कह लें। कुछ पाने की चाह न होना ही वास्तविक खोना है।
बहुत खो लिया जिंदगी में, बहुत पा लिया। कभी खुद को खोकर देखें, हम कब अंदर से खाली हुए हैं। बाहर से इतना अंदर आता है, आखिर यह जाता कहां है। हमारी साँस पूरा हिसाब रखती है इस आवागमन का। सांस कभी नहीं रुकती, कभी नहीं थमती। कितनी खोई रहती है सांस हममें। चलती रहती है और हमें पता ही नहीं चलता। आइए, खो जाएं कहीं, इन साँसों से परे, एक ऐसे संसार में, जिसमें और किसी का प्रवेश नहीं। वहाँ न मैं है, न तू। बस तू ही तू! अलख निरंजन।।