हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # ६४ – आलेख – बलिया बलिदान दिवस – १९ अगस्त ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ६४ ☆

☆ आलेख ☆ ~ बलिया बलिदान दिवस – १९ अगस्त ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

(क्रांतिकारियों की कहानी – श्रेयस की जुबानी)

१९ अगस्त बलिया बलिदान दिवस है। यानी १९ अगस्त १९४२ को जब पूरे भारत में ब्रिटिश साम्राज्य का शासन था, यूँ कहे अपना बृहद भारत अंग्रेजी दासता के अधीन गुलाम था।

मैं कहानी कह रहा हूँ उस वक्त की, कि जब पूरे देश में क्रांति की ज्वाला जल उठी थी।

बलिया का अपना एक अलग इतिहास रहा है। पौराणिक काल से लेकर आज तक इस जनपद ने समय-समय पर कुछ नया कर दिखाया है। तभी तो हमारे जिले में आज भी युवाओं के मुंह से एक आवाज निकल जाती है।

“सब जिला जिला ह, हमार जिला बलिया ह”..

और इसके बाद एक नारा लगता है..”बोल बोल भृगु बाबा की जय”

आखिर सब जिला, जिला ह, त बलिया हमार जिला खास काहे ह..

इसका उत्तर मुझे जो समझ में आया वह यह कि-

जैसा कि पुराणो में विदित है कि बलिया भक्त प्रहलाद के पौत्र असुरराज बली की राजधानी हुआ करती थी। वही राजा बलि जिनके १०८ यज्ञॉ के प्रभाव ने देवराज इंद्र के भी सिंहासन को हिला कर रख दिया था, जिसके कारण भगवान विष्णु को वामन स्वरूप में दानवीर बलि के यहाँ याचक के रूप में आना पड़ा था। चूँकि राजा बलि ने १०८ यज्ञ किए थे, जिसके चलते बलिया का नाम बलियाग फिर कालांतर में बलिया पड़ा। महर्षि भृगु और भगवान विष्णु की कहानी को तो हम सभी जानते हैं,। उसके बाद १९५७ में पंडित मंगल पाण्डेय का बाकी तेवर ने मेरठ छावनी में बगावत करते हुए अंग्रेज ऑफिसर को गोली मार दिया। बाद में उन्हें फांसी हुई और आजादी का यह ऐतिहासिक बलिदान बलिया के खाते में जुड़ गया, फिर आता है वर्ष १९४२,.. वर्ष १९४२ में बलिया आज ही के दिन 19 अगस्त को बलिया चार दिनों के लिए आजाद हो गया था। फिर आया इमरजेंसी कॉल जब बलिया के लोकनायक जयप्रकाश नारायण का बिगुल बजा था और तरुणाई जग गई। इसके बाद समय-समय पर कोई न कोई ऐसे महापुरुष हुए, और उन्होंने कुछ ऐसा किया कि उनका नाम इतिहास में जुड़ गया जैसे हमारे पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय श्री चंद्रशेखर जी जैसे महापुरुषों को इस धरती ने जन्मा, जिन्होंने बलिया को अपनी अलग पहचान दी। यह पहचान का सिलसिला अभी भी खत्म नहीं हुआ है।

आज १९ अगस्त है, अब भी अगस्त का महीना अपनी पहचान पर कायम। बलिया नित नवीन इतिहास और नवभारत का इतिहास लिख रहा। हम ऐसे महापुरुषों को हम नमन करते हैं।

बलिया में क्रांति का बिगुल कैसे बजा? इसके सार संक्षेप में कहते हुए यदि हम आगे बढ़ते हैं तो कहानी कुछ यूँ बनती है-

९ अगस्त को रेडियो की खबरों के द्वारा पता चला कि महात्मा गांधी,जवाहरलाल नेहरू और सरदार पटेल जैसे नेताओं की गिरफ्तारी हो चुकी है, और पूरे देश में जरूर क्रांति की शुरुआत हो गयी थी। इसमे बलिया पीछे नही था लेकिन बलिया की क्रांति कुछ हटकर हुई, क्योंकि… बात तो वही है कि –सब जिला जिला ह..

इस कहानी को बताने पहले मैं एक ऐसे एक दो जीवित क्रांतिकारी के मुंह से सुनी हुई कहानी से इसका प्रारंभ करना चाहता हूँ जिनके साथ मुझे कुछ वक्त बिताने का अवसर मिला और उनके मुंह से कही हुई बात, उनके पौत्र श्री रजनीश सिंह जी की जुबानी है इसे आपके बीच में रख रहा हूँ, यह हम सभी की जानकारी हेतु जरूर विशेष होगी।

मैं बात कर रहा हूं जनपद बलिया के तहसील बांसडीह के अंतर्गत आने वाले गांव कैथवली के बाबू रामदयाल सिंह की जुबानी। मैं उनके नजदीक इसलिए भी हूं कि उनकी नतिनी (बेटी की बेटी) की शादी मुझसे हुई थी। और जब कभी हम लोग एक पास बैठते थे वे अक्सर वे अपनी पुरानी यादों को साझा किया करते थे.

उस वक्त चंद परिवारों को छोड़कर अन्य सामान्य परिवार आर्थिक तंगी में रहता ही था। कुछ खेती बारी होने के बावजूद भी लोगों को अपनी आर्थिक जरूर पूरा करने के लिए बाहर जाना होता था। विशेष रूप से बलिया की यह विशेषता ही रही। गंगा,सरयू (घाघरा) और तमसा (टोंस) जैसी नदियों से घिरे हुए इस जनपद, के लोग बाढ़ की विभीषिका झेलते हुए बार-बार बेघर हो जाया करते थे। हर बार जब घर लौट कर आते तो एक छप्पर डालते, एक छोटा सा नव सृजित फूस के घरों से बने का गाँव को बनाते तो कोई दुबे छपरा, दल छपरा, गोहिया छपरा बन जाता है। मैं प्रवास की बात इसलिए कर रहा हूँ कि यह प्रवास जहां एक तरफ यहाँ के लोगों के लिए अभिशाप होता था तो वहीं, यहां के लिए लोगों के लिए शैक्षिक,आर्थिक,सामाजिक उन्नति का कारण बनता रहा है। यह प्रवास सिर्फ भारत तक नहीं रहा बल्कि भारत के बाहर सुदूर मॉरीशस सहित अन्य करेबियन देशों तक पहुंचता है और वहाँ स्वयं को स्थापित करता था। मॉरीशस की कहानी मैंने अपने साहित्यिक गुरु श्री रामदेव धुरंधर से बार-बार सुनी है। उनके पूर्वज भी वर्ष 1838 में बलिया से ही मॉरीशस गए थे।

स्व.राम दयाल सिंह जी भी मिडिल पास करने के बाद आर्थिक तंगी और पारिवारिक परेशानियों को लेकर कोलकाता नौकरी पर चले गए, अपने मातृभूमि से कई सो किलोमीटर दूर वे कलकत्ता अवश्य गए लेकिन उनके दिल से, उनके मन में मातृभूमि की यादें बनी रहतीं। ६ या ७ वर्ष नौकरी करने के बाद वे बनारस लौट आए, और वहां कहीं किसी सेठ साहूकार के रहकर मुंशी गिरी का काम करने लगे। वाराणसी में गांधी जी की सभा हुई और उन्होंने क्रांतिकारियों के भाषण को सुना उनके मन में क्रांति की आग जल गई और फिर क्या था, बनारस में उन्होंने सेठ की नौकरी को लात मारा और बलिया चले आए। बलिया आकर क्रांतिकारियों के आंदोलन में जमकर जुड़ गए।

श्री राम दयाल सिंह जी (नाना जी)बताते हैं कि उस जमाने में संचार के कोई साधन नहीं हुआ करते थे। पूरे देश में क्या हो रहा है इसकी जानकारी उन्हें मात्र रेडियो,वह भी किसी खास बीबीसी न्यूज़ से पता चलती थी। अब युवाओं में जोश कैसे जगे। हर रोज की जानकारी कैसे मिले युवा रामदायल सिंह उस समय एक रेडियो लेकर आते थे और अपने गाँव कैथोलिक में एक जगह बड़की दलान हुआ करती थी, वही बैठकर रेडियो खोलने और स सारे लोग समाचार सुनते थे और उन्हें पता चलता था कि पूरे देश में क्रांति और आजादी की लड़ाई किस ढंग से लड़ी जा रही है और क्या-क्या घटनाएं घट रही है.

इन लोगों के लिए यह सिर्फ एक समाचार नहीं था, यह तो एक जलती हुई चिंगारी थी जो हर वक्त उनके भीतर जल रही थी आखिरकार यह चिंगारी शोले के शक्ल में बदल गई –

अब आगे बढ़ते हुए मैं बलिया के अंदर 1942 कि उसे क्रांति की तिथि वार घटना का वर्णन संछिप्त कर रहा हूं। इसका संदर्भ मैंने बलिया के इतिहास विद श्री शिव कुमार कौशिकेय जी की पुस्तक बलिया विरासत से लिया है –

9 अगस्त को बलिया में महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल आज की गिरफ्तारी की खबर मिलने के बाद स्थानीय स्तर पर तत्कालीन नगर मंत्री श्री उमाशंकर सोनार अपने साथी सरजू प्रसाद के साथ मिलकर 10 अगस्त को बलिया में जुलूस निकाले और सभी छात्रों और व्यापारियों ने उसमें भाग लिया।

11 अगस्त को इस जुलूस के बाद एक भाषण शहीद पार्क पर हुआ। इस भाषण के दौरान पंडित राम अनंत पांडे जी को गिरफ्तार कर लिया गया। आंदोलन की चिंगारी शहर से गांवों की तरफ बढ़ गई। 12 अगस्त को बलिया और बैरिया में विशाल जुलूस निकाला गया। पुलिस और छात्रों के बीच का मार पीट और झड़प हुई। 30 छात्रों को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया 13 अगस्त को बनारस से बलिया पहुंची ट्रेन को छात्रों ने चित्त बड़ा गांव रेलवे स्टेशन पर फूंक दिया और रेल की पटरी को उखाड़ कर प्रदर्शन किया . खेजूरी बेल्थरा रोड में जनसभाएं हुई 14 अगस्त को चितबड़ागांव ताजपुर में रेल की पटरिया उखाड़ दी गई। बेल्थरा रोड में भी आंदोलन तीव्र हो गया वहां पर भी यही सारी चीजे हुई। सिकंदरपुर में मिडिल स्कूल में जुलूस निकाला गया वहां क्या स्थानीय थानेदार ने क्रूरता दिखाते हुए बच्चों पर घोडों को दौड़ा दिया। सैकड़ो छात्र घायल हुए 15 अगस्त को बलिया जनपद के जहाज घाट, माल गोदाम डाकघर आदि पर स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने लूट पाट करना शुरु किया। चितबड़ागांव में तमसा नदी पर लकड़ी के बने पिपरा घाट पुल को तोड़कर सेनानियों ने सारे रास्ते बंद कर दिए। जहां-जहां क्रांतिकारी आंदोलन करते धीरे-धीरे वहां वह एक सरकारी कार्यालय पर कब्जा करते और अपना शासन चलाने लगे। पंचायत की राज शासन व्यवस्था काम करने लगी बैरिया,नगरा ताखा आदि कई जगहों पर भी क्रांतिकारियों ने ऐसे ही कार्रवाई की। 16 अगस्त को जिला मुख्यालय पर अपनी हनक जमाने के लिए जिला प्रशासन ने धारा 144 का कड़ाई से पालन करने का आदेश दिया लेकिन सेनानियों पर इसका कोई असर नहीं हुआ। इसका प्रतिरोध खोरी पाकर गांव के युवा दुखी कोइरी ने किया। पुलिस फायरिंग में दुखी कोईरी समेत 7 लोग शहीद हो गए। चिलकहर रेलवे स्टेशन फूंक दिया गया, नौरंगा घाट पर खड़े माल भाग जहाज को बहा दिया गया। 17 अगस्त 1942 को हुए ऐतिहासिक स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ा है। महात्मा गांधी के ‘करो या मरो’ के आह्वान पर क्रांतिकारियों ने रसड़ा तहसील को अंग्रेजी हुकूमत से मुक्त कराया था। इस संघर्ष में चार वीर सपूत अमर हो गए थे। तहसील और थाने पर सेनानियों ने बहुत आसानी से अधिकार जमा लिया। इसी दिन बांसडीह तहसील पर बगैर किसी प्रतिरोध के स्वराज सरकार का अधिकार हो गया। 18 अगस्त 1942 को स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और ब्रितानी पुलिस के बीच चूहा बिल्ली का खेल चल रहा था। वह खूनी संघर्ष में बदल गया बैरिया थाने पर तिरंगा फहराने और स्वराज सरकार के अधिकार को लेकर हुई जंग में 18 सेनानी शहीद हो गए।

अब आया 19 अगस्त 1942 का वह दिन जब बलिया के क्रांतिकारियों ने इतिहास रच दिया। ब्रिटानी दास्ताँ का दंश झेल रहे लोगों के लिए एक नजीर बनी लाखों की साथ-साथ भीड़ में जिला मुख्यालय को घेर लिया। मजबूर होकर ब्रिटिश सरकार के तत्कालीन कलेक्टर जगदीश चंद्र निगम एवं पुलिस कप्तान जियाउद्दीन अहमद ने आत्मसमर्पण कर दिया। जेल में बंद कांग्रेस के तात्कालिक जिला अध्यक्ष पंडित चित्तू पांडे, महानंदा मिश्रा, विश्वनाथ चौबे आदि सभी राजनीतिक कैदियों को जेल से जेल का फाटक खोलकर रिहा कर दिया गया और बलिया आजाद हो गया।

मैं बात श्री राम दयाल सिंह जी की कर रहा था, बॉसडीह कचहरी पर कब्जे के दौरान आंदोलन का कर रहे रामदयाल सिंह और अन्य लोगों को आखिरकार गिरफ्तारी से बचने के लिए फरारी का रास्ता चुना पड़ा लेकिन यह बहुत ज्यादा दिन नहीं रही। श्री रामदयालु सिंह गिरफ्तार करके बनारस जेल भेज दिए गए .

श्री राम दयाल सिंह जी बताते हैं कि जेल में उन लोगों को जी बैरक में रखा गया था। पांच सोटा की सजा सुनाई गई। यानी प्रतिदिन इन क्रांतिकारियों को डंडे से पीटा जाता था, जिसे वे लोग हंसते-हंसते बर्दाश्त करते थे। स्वर्गीय श्री राम दयाल सिंह जी एक और बात बताते थे उसे समय उसे जेल में केवल एक अखबार आता था। वह सब लोग पढ़े लिखे नहीं थे क्योंकि वह पढ़े लिखे थे तो और जेल के साथी कैदी उनसे कहते थे कि ए रामदयाल के खबर पढ कर के सुनाओ। बाबू राम दयाल सिंह उसे पढ़ कर अपने कैदी साथियों को सुनाते थे इस तरह से उनके मुंह से कही हुई बातों को भी मैं यहां रखा।

देश आजाद हो गया,ये क्रांतिकारी रिहा हुए इनको तात्कालिक मुख्यमंत्री श्री गोविंद बल्लभ पंत जी ने तराई में जंगलों के बीच कुछ जमीन इनके लिए जमीने आवंटित की और यह वर्तमान में इनका परिवार उधम सिंह जनपद के आनंदपुर नमक के गांव में रहता है

दूसरे बड़े क्रांतिकारी जो बलिया की आजादी की लड़ाई में बड़ा नेतृत्व कर रहे थे उनकी चर्चा भी करना चाहूंगा क्योंकि उनके साथ तो मैं अपने बचपन के बहुत समय बिताए हैं। मेरे गाँव को संवरा नहीं, बोलते हैं संवरा को,संवरा -गोपालपुर बोलते हैं। गोपालपुर और संवरा दोनों जुड़वा नाम के रूप में एक साथ लिया जाता था। इसी गोपालपुर में जन्मे हुए क्रांतिकारी पंडित विश्वनाथ चतुर्वेदी जी, श्री चित्तू पाण्डेय के साथ उस आंदोलन के हिस्सा थे। जिसका वर्णन मैंने पहले भी किया था। आजादी की लड़ाई से जुड़ी हुई बहुत सारी घटनाओं की जानकारी बहुत सारी बातें वे हमसे बताते थे। अत्यंत सरल और सहज प्रकृति के लेकिन अनैतिकता के घोर विरोधी विश्वनाथ चतुर्वेदी जी हमारे सबसे नजदीक के क्रांतिकारियों में से एक थे। पूर्व प्रधानमंत्री श्री चंद्रशेखर जी उनको बहुत आदर करते थे। जिसे मैंने स्वयं अपनी आंखों से देखा है। चंद्रशेखर जी जब हमारे गांव संवरा चट्टी पर आते थे तो वह चट्टी नहीं कहते थे,चौराहा कहते थे। यहां पहुंचते हुए बोलते थे कि चौबे जी (श्री विश्वनाथ चतुर्वेदी) को बुलाओ।

यह बात मेरे बचपन की है। मै एक और क्रांतिकारी की बात करके मैं अपनी बात को समाप्त करूंगा। वह एक ऐसे क्रांतिकारी थे जो गुमनाम क्रांतिकारी थे। उनकी कहानी को मैं अपने पुस्तक काव्य कथा विथिका के द्वितीय खंड में स्थान दिया है। हमारे गांव के सिंहा मिसिर जो कि कभी जेल नहीं गए नहीं वह क्रांतिकारी घोषित किए गए उनके न पत्नी थी नाही उनके बच्चे थे। वे पूरे जीवन ऐसे ही रह गए वह हमसे कहा करते थे।

बाबू.. हमनी के रेल लाइन के काटी जा और आंदोलन करी जा, लेकिन पुलिस के डर से हम भाग जाईजा।

क्योंकि उनकी गिरफ्तारी नही हुई, उनका नाम डर से भाग जाने वाले क्रांतिकारियों के लिस्ट में था। सबको पेंशन मिलता रहा लेकिन स्व. सिघा मिसिर जी आज वह हमारे बीच में नहीं है लेकिन जब हम 19 अगस्त बलिया बलिदान दिवस में क्रांतिकारियों को याद कर रहे हैं तो मैं उन्हें भी याद करता हूँ ऐसे गुमनाम अनेकों क्रांतिवीरों को भी याद करते हुए अपनी बात समाप्त करता हूँ।

जय हिंद, जय बलिया।

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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English Literature – Satire ☆ Witful Warmth # 105 – The Appraisal Secret… ☆ Dr. Suresh Kumar Mishra ‘Uratript’ ☆

Dr. Suresh Kumar Mishra ‘Uratript’

Dr. Suresh Kumar Mishra, widely known in the world of satire by his pen name ‘Uratipt’, expresses his emotions and thoughts with profound honesty and depth. His multifaceted talent is evident in his contributions across various literary genres. He is not only a renowned satirist but also a poet and a children’s author.

His satirical writings have earned him a special place in the literary world. His satire, ‘Shikshak Ki Mout’, went massively viral on the Sahitya Aajtak channel, garnering over a million views and reads—a monumental achievement in the history of Hindi satire. His collection of satires, ‘Ek Tinka Ikyavan Aankhen’ (A Straw and Fifty-One Eyes), is also highly acclaimed and includes his timeless work, ‘Kitabon Ki Antim Yatra’ (The Last Journey of Books). Other celebrated collections include ‘Mayaan Ek, Talwar Anek’ (One Sheath, Many Swords), ‘Gapodi Adda’ (The Gossiper’s Den), and ‘Sab Rang Mein Mere Rang’ (My Colors in Every Hue). His satirical novel, ‘Idhar-Udhar Ke Beech Mein’ (In Between Here and There), is a unique and groundbreaking work focused on the third world.

His significant contributions to literature have been widely recognized. He was honored with the Best Young Creator Award, 2021 by the Telangana Hindi Academy and the Government of Telangana, an award presented by Chief Minister K. Chandrasekhar Rao. The Rajasthan Children’s Literature Academy also honored him for his children’s book, ‘Nanhon Ka Srijan Aasmaan’ (The Creative Sky of Little Ones). Additionally, he has received the Vyanga Yatra Ravindranath Tyagi Sopaan Samman and the Sahitya Srijan Samman from Prime Minister Narendra Modi.

Dr. Uratript has also played a pivotal role in writing, editing, and coordinating a total of 55 books for the Government of Telangana for primary school, college, and university levels. His work is included in university textbooks in Bihar, Chhattisgarh, and Telangana, where his satirical creations are part of the curriculum. This recognition underscores that young readers can identify and appreciate quality and impactful writing.

Key Accolades and Works

  • Viral Satire: ‘Teacher’s Death’ (over 1 million views)
  • Satire Collections: ‘Ek Tinka Ikyavan Aankhen’, ‘Mayaan Ek, Talwar Anek’, ‘Gapodi Adda’
  • Unique Satirical Novel: ‘Idhar-Udar Ke Beech Mein’
  • Awards: Shreshtha Navyuva Samman (Telangana), Sahitya Srijan Samman (PM Modi), and more.
  • Educational Contribution: Authored and edited 55 books for the Telangana government.

Some precious moments of life

  1. Honoured with ‘Shrestha Navayuvva Rachnakar Samman’ by former Chief Minister of Telangana Government, Shri K. Chandrasekhar Rao.
  2. Honoured with Oscar, Grammy, Jnanpith, Sahitya Akademi, Dadasaheb Phalke, Padma Bhushan and many other awards by the most revered Gulzar sahab (Sampurn Singh Kalra), the lighthouse of the world of literature and cinema, during the Sahitya Suman Samman held in Mumbai.
  3. Meeting the famous litterateur Shri Vinod Kumar Shukla Ji, honoured with Jnanpith Award.
  4. Got the privilege of meeting Mr. Perfectionist of Bollywood, actor Aamir Khan.
  5. Meeting the powerful actor Vicky Kaushal on the occasion of being honoured by Vishva Katha Rangmanch.

Today we present his satire The Appraisal Secret 

☆ Witful Warmth# 105 ☆

☆ Satire ☆ The Appraisal Secret… ☆ Dr. Suresh Kumar Mishra ‘Uratript’ ☆

In the quiet universe of MindTree Consultancy, the annual performance appraisal was less of a corporate review and more of a high-stakes psychological drama. Employees walked into Room 404 looking like confident gladiators and emerged twenty minutes later looking like damp umbrellas left out in a monsoon downpour.

Rohan had played his cards with mathematical precision all year. He was the first to enter the office, the last to leave, and the only one who voluntarily brought homemade samosas for the manager, Mr. Deshmukh, every single Wednesday. His colleague, Nitin, on the other hand, was the king of subtle procrastination. Nitin spent half his day staring thoughtfully at empty Excel sheets and the other half giving eloquent speeches about work-life balance near the coffee machine.

When final appraisal day arrived, Rohan was supremely confident. He had calculated his key performance indicators down to the third decimal point. As he sat across from Mr. Deshmukh, the manager adjusted his glasses and looked at Rohan with profound, almost theatrical melancholy.

“Rohan,” Mr. Deshmukh sighed, tapping his pen against a thick paper folder. “Your technical output is unmatched. You work like a machine. But in today’s corporate world, being a machine isn’t enough. You lack… spiritual visibility.”

Rohan’s jaw dropped. “Spiritual visibility, sir? I worked sixty hours a week!”

“Yes,” Mr. Deshmukh nodded slowly. “Look at Nitin. Whenever upper management walks down the floor, Nitin is always standing near the whiteboard, marker in hand, looking deeply stressed and intensely reflective. That projects leadership! You, on the other hand, are always silently typing away at your desk. People think you’re just playing Solitaire.”

Rohan felt a knot tighten in his stomach. The top-tier rating and the elusive thirty percent hike felt like a dream vanishing into thin air. Mr. Deshmukh opened the folder, signed the bottom page with a flourish, and handed the letter to Rohan. “I have made my final decision. Read it outside.”

Rohan walked out with heavy steps, his heart sinking into his shoes. Nitin smirked from the coffee machine, waving his coffee cup like a victorious trophy. With trembling hands, Rohan opened the envelope in the elevator, preparing himself for disappointment.

To his utter astonishment, the letter confirmed the highest performance rating possible, accompanied by a staggering forty percent raise and a promotion to Team Lead. Attached was a small yellow sticky note in Mr. Deshmukh’s handwriting:

“Rohan, management buys performance, not whiteboard drama. I gave Nitin a five percent raise so he has plenty of free time to keep looking deeply reflective near the coffee machine. Congratulations, Team Lead.”

Rohan let out a loud laugh as the elevator doors clicked open, and the entire floor erupted into spontaneous applause for their new boss.

****

© Dr. Suresh Kumar Mishra ‘Uratript’

Contact : Mo. +91 73 8657 8657, Email : drskm786@gmail.com

≈ Blog Editor – Shri Hemant Bawankar/Editor (English) – Captain Pravin Raghuvanshi, NM ≈

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हिंदी साहित्य – आलेख ☆ ऑनलाइन योग या प्रत्यक्ष योग कक्षा? ☆ श्री जगत सिंह बिष्ट ☆

श्री जगत सिंह बिष्ट

(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker.)

🌱 ऑनलाइन योग या प्रत्यक्ष योग कक्षा?🪷 

दो तरीके, दो तरह के अनुभव 🍀

योग आज डिजिटल युग में भी हमारे जीवन का हिस्सा बन चुका है। ऑनलाइन योग कक्षाएँ सुविधा, समय की स्वतंत्रता और घर की निजता देती हैं, जबकि प्रत्यक्ष योग कक्षाएँ व्यक्तिगत मार्गदर्शन, मानवीय जुड़ाव और निकट से सीखने का अवसर देती हैं।

इनमें से कोई एक अपने-आप में सही या गलत नहीं है। चुनाव इस बात पर निर्भर करता है कि साधक योग से क्या प्राप्त करना चाहता है।

🏠 ऑनलाइन योग — सुविधा और लचीलापन

✔️ सुविधाजनक: अपनी सुविधा के अनुसार समय चुनकर घर के शांत और निजी वातावरण में अभ्यास किया जा सकता है।

✔️ आसानी से उपलब्ध: योग स्टूडियो तक आने-जाने की आवश्यकता नहीं होती। व्यस्त दिनचर्या या सीमित गतिशीलता वाले लोगों के लिए यह विशेष रूप से उपयोगी हो सकता है।

व्यक्तिगत ध्यान सीमित: बड़ी ऑनलाइन कक्षा में योग प्रशिक्षक के लिए प्रत्येक साधक की गतिविधियों पर बारीकी से नजर रखना और गलत आसनों या गतिविधियों को ठीक करना कठिन होता है।

सबके लिए एक जैसा अभ्यास: प्रायः पूरी कक्षा के लिए एक ही क्रम और निर्देश होते हैं। अलग-अलग आयु, शारीरिक क्षमता और व्यक्तिगत आवश्यकताओं वाले सभी लोगों के लिए एक ही अभ्यास समान रूप से उपयुक्त हो, यह आवश्यक नहीं।

व्यक्तिगत जुड़ाव कम: स्क्रीन निर्देश तो पहुँचा सकती है, लेकिन आमने-सामने मिलने से पैदा होने वाली आत्मीयता, संवाद, प्रोत्साहन और मानवीय संबंधों को पूरी तरह महसूस कराना उसके लिए कठिन है।

परम्परा का एक आयाम छूट जाता है: आभासी माध्यम में प्राचीन गुरु–शिष्य परम्परा का वह जीवंत अनुभव स्वाभाविक रूप से कम हो जाता है, जिसमें शिक्षक को देखकर, उसके मार्गदर्शन में और उसके साथ रहकर सीखना शामिल है।

🧘 प्रत्यक्ष योग — व्यक्तिगत मार्गदर्शन और आत्मीयता

✔️ व्यक्तिगत ध्यान: छोटी कक्षा में योग शिक्षक या गुरु प्रत्येक साधक को अधिक ध्यान से देख सकते हैं, उसकी मुद्रा सुधार सकते हैं और आवश्यकता के अनुसार मार्गदर्शन कर सकते हैं।

✔️ व्यक्ति के अनुरूप अभ्यास: शिक्षक जब साधक को व्यक्तिगत रूप से जानते हैं, तो उसकी आयु, शारीरिक स्थिति, सीमाओं और आवश्यकताओं के अनुसार अभ्यास में बदलाव कर सकते हैं।

✔️ अधिक सुरक्षित अभ्यास: सभी से एक जैसे आसन करवाने के बजाय शिक्षक किसी साधक को ऐसे आसन से बचने या उसे संशोधित करने की सलाह दे सकते हैं, जो उसके लिए उपयुक्त न हो।

✔️ मानवीय जुड़ाव: आमने-सामने मिलने से शिक्षक और साधकों के बीच आत्मीयता, प्रोत्साहन, मित्रता और सामूहिकता की भावना विकसित होती है।

✔️ जीवंत परम्परा: अनेक साधकों के लिए शिक्षक की प्रत्यक्ष उपस्थिति में सीखना प्राचीन गुरु–शिष्य परम्परा के उस महत्वपूर्ण पक्ष को जीवंत करता है, जिसमें केवल निर्देश सुनना ही नहीं, बल्कि देखकर सीखना, अभ्यास करना, गलती सुधरवाना और अनुभव के माध्यम से आगे बढ़ना भी शामिल है।

🌿 इसे एक सरल उदाहरण से समझें

ऑनलाइन कक्षा कभी-कभी ऐसी हो सकती है जैसे एक डॉक्टर हजारों मरीजों को एक ही दवा लिख दे—यह सुविधाजनक हो सकती है और बहुतों के लिए उपयोगी भी, लेकिन हर व्यक्ति की अलग आवश्यकता का ध्यान रखना सम्भव नहीं होता।

इसके विपरीत, एक अच्छा प्रत्यक्ष योग शिक्षक प्रत्येक साधक को देखकर, उसकी सीमाओं और आवश्यकताओं को समझकर उसके लिए अधिक उपयुक्त अभ्यास बता सकता है।

निष्कर्ष

  • ऑनलाइन योग सुविधा देता है।
  • प्रत्यक्ष योग आत्मीयता देता है।
  • ऑनलाइन योग पहुँच आसान बनाता है।
  • प्रत्यक्ष योग व्यक्तिगत मार्गदर्शन देता है।

जो व्यक्ति योग की मूल बातें अच्छी तरह समझता है, सुरक्षित अभ्यास करना जानता है और समय की सुविधा चाहता है, उसके लिए ऑनलाइन योग एक अच्छा विकल्प हो सकता है।

लेकिन जो साधक निकट से मार्गदर्शन, व्यक्तिगत ध्यान, आसनों में सुधार, आत्मीय संगति और शिक्षक–शिष्य के गहरे अनुभव की तलाश में है, उसके लिए छोटी प्रत्यक्ष योग कक्षा वह अनुभव दे सकती है, जिसे एक स्क्रीन पूरी तरह नहीं दे सकती।

अंततः, सबसे अच्छी योग कक्षा वही है जो आपको नियमित, सुरक्षित, सजग और सार्थक अभ्यास के लिए प्रेरित करे। 🧘‍♀️🌿

© श्री जगत सिंह बिष्ट

साधक

LifeSkills

A Pathway to Authentic Happiness, Well-Being & A Fulfilling Life! We teach skills to lead a healthy, happy and meaningful life.

The Science of Happiness (Positive Psychology), Meditation, Yoga, Spirituality and Laughter Yoga. We conduct talks, seminars, workshops, retreats and training.

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – पग-पग नर्मदा यात्रा – भाग – ४५ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – पग-पग नर्मदा यात्रा – भाग- ४५ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

7.पग-पग नर्मदा यात्रा

नर्मदा परिक्रमा:दूसरा चरण

समनापुर से पिपरहा 13 नवम्बर 2019

समनापुर पहुँचते-पहुँचते अरुण भाई की पीठ में दाहिनी तरफ़ दर्द होने लगा, समनापूर में जगमोहन भाई ने उनकी पीठ दबाई, अविनाश भाई ने दर्द-नाशक क्रीम लगाकर कंबिफ़्लेम गोली खिलाई। उन्हें आराम लगा, लेकिन दर्द हुआ क्यों?

पहली बात है कि हम केवल पैरों से नहीं चलते बल्कि पूरे शरीर से चलते हैं, दाहिना पैर आगे बढ़ाकर रखते समय पीठ के बाँए तरफ़ की मांसपेशियाँ सक्रिय होतीं हैं, बाँए पैर बढ़ाते समय दाहिना हिस्सा ज़ोर लगाता है। इस प्रकार पीठ भी चलने में थकती है।

दूसरी बात सुबह ख़ाली पेट दस किलोमीटर चलने से शरीर में मांसपेशियाँ में ऊर्जा ख़त्म होती है तो हड्डियों को ज़ोर लगाना पड़ता है, वे दर्द करने लगती हैं।

तीसरा ख़ाली पेट रहने से गैस बनने से भी दर्द होता है।

चौथा नींद पूरी न होने से माँसपेशियों को आराम न मिलने से शरीर में जान नहीं रहती, चलने में थकावट से दर्द हो सकता है।

आपस में चर्चा करके निश्चय किया कि आगे इन बातों का ध्यान रखना होगा। कुछ साथियों ने छोटा धुँआधार नहीं देखा था, वे सुबह छः बजे वहाँ चले गए इसलिए सात बजे निकलने के बजाय आठ बजे पिपरहा के लिए यात्रा शुरू की। खेत में बखर चल जाने से रास्ता बहुत ऊबड़-खाबड़ था उस पर मुसीबत यह कि तीन चौड़े नाले किनारदार पगडंडियों से पार करने पड़े। पहले बम्होरी गाँव पड़ा वहाँ किसान के खेत से गन्ना काट कर खाया। उसके बाद हथिया, झामर, घूरपुर और घाट-पिपरिया होते हुए पिपरहा पहुँचना था।

सुबह आठ बजे पंद्रह किलो वज़न लाद कर चल पड़े दो किलोमीटर चलकर नर्मदा का बहुत सुंदर घाट हथिया घाट आया वहाँ नर्मदा संगमरमर की शिलाओं का निर्माण करते हुए भारी खरखराहट से बह रहीं हैं नहाने योग्य किनारा नहीं है। थोड़ा नाश्ता खाया फिर आगे बढ़े तो चिंकी घाट आश्रम में सेवक ने चाय पिलाई। इसे च्यवन ऋषि का आश्रम स्थान बताया, वे औषधि विज्ञान के प्रणेता माने जाते हैं। च्यवन ऋषि का आश्रम इन भूमध्य सागरीय पर्वतीय वनस्पतियों के बीच होना सही प्रतीत होता है, क्योंकि औषधीय पौधे कर्क और मकर रेखा के बीच ऐसी ही जलवायु में पनपते हैं। उसके बाद झामर गाँव से होते हुए घूरपुर आश्रम पहुँचे। वहाँ एक महाराष्ट्रियन युवक चार महीने से चौमासा बिता रहा रहे हैं। वे निरंतर चिल्ला कर बोलते रहते, शायद अंदरूनी ख़ालीपन को भरने की कोशिश में पूरे ख़ाली होकर समाधि के चरम बिंदु की तलाश में भटक रहे हों। उनसे मिलने लातूर से गाड़ी भरकर एक परिवार आया हुआ था। उनका भोजन तैयार हो रहा था यहां महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले से एक साधु चौमासा कर रहे थे। उनके भक्तों ने भंडारा आयोजित किया था सो पूरन पोली, हलुआ, लड्डू, पूरी, सब्जी, दाल, चावल सब कुछ भरपेट खाया। एक घंटे आराम करके निकल पड़े। रास्ता अत्यंत दूभर था दो साथी तो आसानी से पार कर गए लेकिन तीन साथी भय से थरथराते नाला पार न कर सके। वे ऊपर चढ़कर दो किलोमीटर घूम कर पिपरहा के किनारे पहुँचे। दो साथी छोटा धुँआधार पहुँचे उन्होंने एक घंटे धुँआधार निहारा फिर एक किलोमीटर ऊपर चढ़ कर बिछड़े साथियों से जा मिले। एक निजी धर्मशाला में विश्राम करने रुक गए। थोड़ी देर बाद शरण पाने पाँच परिक्रमा यात्री वहाँ पहुँचे लेकिन जगह की कमी महसूस कर वे गाँव के स्कूल में जाकर रुके। करण सिंह ढीमर ने हमारे भोजन की व्यवस्था कर दी।

कुछ आश्रमों में अहमन्य, अहंकारी और धनलिप्सा में डूबे मठाधीशों के क्रोधी, वैमनस्य और लोभी चरित्र पर एक महाराज जी से चर्चा हुई तो हमने उनसे जानना चाहा कि :- “महाराज! काम, क्रोध, लोभ, मद, मोह और मत्सर इन छः दोषों को हिंदू धर्मशास्त्रों में षठरिपु कहा गया है इनमें से एक भी दोष का लेशमात्र साधु के समस्त ज्ञान वैराग्य को नष्ट करने हेतु पर्याप्त है।”

महाराज बोले “ये सब शास्त्रों में लिखी बातें हैं, ये लोग यम, नियम, संयम और समाधि द्वारा सन्यास की स्थिति तक पहुँचने की विभिन्न दशाओं में भटक रहे हैं, जब उन्हें ज्ञान प्राप्त हो जाएगा तब उनके षठरिपु शांत हो जाएँगे।”

हमने कहा “महाराज गीता तो प्रपंचियों को भी ईश्वर को समर्पण द्वारा मुक्ति का मार्ग बताती है, सांख्ययोग, कर्मयोग, ज्ञानयोग, सन्यासयोग और पतंजलि योग भगवान तक पहुँचने के मार्ग हैं। अंत में भगवान कहते हैं कि मनुष्य कितना भी बड़ा पापी हो लेकिन अंत में सच्ची समर्पित भक्तियोग द्वारा मुझे प्राप्त कर सकता है, अतः मेरी शरण में आओ, मम शरणम ब्रज! क्या ये बाबा बनावटी भक्ति के अज्ञान योग से सम्पत्ति लोभ में डूबे हुए नहीं हैं।”

महाराज ने यह कहकर वार्ता समाप्त की, “शायद आप ठीक कह रहे हैं। संसार में सब प्रकार के लोग होते हैं।”

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

संस्थापक सम्पादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # ४२ – कविता – सावन का अंधा… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर ☆

डॉ.राजेश ठाकुर

( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का  मंतव्य उनके ही शब्दों में –पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “सावन का अंधा“.)  

? साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # ४२ ?

? कविता – सावन का अंधा… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर  ? ?

?

मुझको हरा ही हरा दिख रहा है

मैं सावन का अंधा हुआ जा रहा हूँ ll

प्रभारों के बोझों से इतना लदा हूँ, हम्मालों का कंधा हुआ जा रहा हूँ ll

मैं सावन का…

=1=

रंगा न लहू से, वो अख़बार कैसा

हिंसा क़त्ल चोरी कपट काला पैसा

कालाबाज़ारी दलालों की मण्डी, मैं उफ़ गोरखधंधा हुआ जा रहा हूँ ll

=2=

डायनिंग सैट सोफा किचन सैट सब हैं, अपसैट माइण्ड चुप्पी साधे लब हैं

फँसते चुनिन्दा ही जालों के फन्दे, मैं बेबस परिन्दा हुआ जा रहा हूँ ll

मैं सावन का…

=3=

चंदा जुटाने में मशगूल बंदा, ज़माना बख़ाने भले इसको गंदा

मुनाफ़े की अब न गुंज़ाइश तनिक़ भी, मैं बिजनिस इक मन्दा हुआ जा रहा हूँ ll

मैं सावन का….

=4=

‘राजेश’ मन-ही-मन, बेशुमार प्यार भी, पर हो न पाया कभी दिल से इज़हार भी

चुपके तकिये में छुपाके पढ़ें कई, मैं यूँ गुलशन नंदा हुआ जा रहा हूँ ll

मैं सावन का…

© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर

शासकीय कॉलेज़ केवलारी

संपर्क — ग्राम -धतूरा, पोस्ट – जामगाँव, तहसील -नैनपुर, जिला -मण्डला (म.प्र.) मोबा. 9424316071

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सविता साहित्य # १५ – हिन्दुस्तानी शान!! 🇮🇳 ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆

सुश्री सविता खण्डेलवाल ‘भानु’

(लेखन-प्रकाशन – गत 2022 से छंद लेखन, एकल प्रकाशन– कलम के नवांकुर, अनुग्रह नवप्रस्तारित छंद पर लेखन (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), साझा संकलन – तकरीबन 10, द्वादश ज्योतिर्लिंग (लंदन बुक आफ रिकार्ड), अनेकता में एकता (एशिया बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड), छंदावली – (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), महाकाल साहित्य सम्मान से सम्मानित। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता हिन्दुस्तानी शान !!)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सविता साहित्य # १५ ☆

☆ हिन्दुस्तानी शान !!🇮🇳 ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆

तीन रंग से बना तिरंगा, हिंदुस्तानी शान है।

गर्व करें हम भारतवासी, यह अपनी पहचान है।।

शीर्ष रंग है केसरिया जो, कहे कहानी त्याग की।

धवल रंग धुन छेड़ा करता, देश प्रेम अनुराग की।।

रंग हरा हरियाली देता, रखना प्यारे ध्यान है।

गर्व करें हम भारतवासी, यह अपनी पहचान है।।

 

तिलियां मिल चौबीस बनाती, सुंदर चक्र अशोक है।

सीख अनोखी हर तीली दे, ज्ञान भरा यह लोक है।

अमन शांति का घर स्वदेश हो, मन में बस अरमान है।

गर्व करें हम भारतवासी, यह अपनी पहचान है।।

ताज हिमालय का पहनें हैं, अपनी माता भारती।

चरण पखारें पावन नदियांँ, शंखनाद से आरती।

भारत मांँ का आंँचल पानें, जन्म लिए भगवान है।

गर्व करें हम भारतवासी, यह अपनी पहचान है।।

© सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु”

झालरापाटन राजस्थान

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०७३ ⇒ मलाई-नामा ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “मलाई-नामा।)

?अभी अभी # १०७३ ⇒ आलेख – मलाई-नामा ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

कुछ व्यक्तित्व मलाई जैसे होते हैं, मसलन दलाई लामा ! मैं छुटपन से देखता आ रहा हूँ। मैंने मलाई के स्वाद में और दलाई लामा के स्वरूप व स्वभाव में कभी कोई अंतर नहीं पाया।

मलाई दूध का वाष्पीकृत, परिष्कृत स्वरूप है। दलाई लामा भी व्यक्ति, संस्कार, साधना, संयम और सहनशक्ति की पराकाष्ठा है। हमारे शंकराचार्य की तरह दलाई लामा अपने नाम के आगे पीठ और नाम नहीं लगाते। वे अपने व्यक्तित्व को भी एक ही पदवी में, अवस्था में विलीन कर लेते हैं।।

आम इंसान एक साधारण दूध है, जिसे तपाने पर कुछ गाढ़ापन आने लगता है। संघर्ष और तपिश को बर्दाश्त करने की एक सीमा होती है। अगर तपन की आँच को कम न किया जाए तो व्यक्तित्व में क्रोध का उफान आने की संभावना रहती है, दूध या तो उफन जाता है, या जल जाता है। धैर्य और सहनशक्ति व्यक्ति में परिपक्वता और ठंडक लाता है।

यही दूध में मलाई है, इंसानों में विवेकवान, ज्ञानवान, लामाओं में दलाई लामा, और संतों में श्रेष्ठ महात्मा, शंकराचार्य अथवा सद्गुरु हैं।

हम कुछ सज्जनों को क्रीम ऑफ सोसयटी कहते हैं। जिस तरह खाद्य पदार्थों को क्रीम से गार्निश, अर्थात सजाया जाता है, यह आभिजात्य वर्ग देश के वैभव और सम्पदा को बढ़ाता है। देश की कीर्ति में चार चाँद लगाता है। ललित कला, साहित्य, संगीत और सामाजिक क्षेत्रों में विराजमान प्रतिभाओं को राष्ट्रीय सम्मानों से नवाज़ा जाता है।।

सामाजिक असमानता का आलम यह है कि किसी वंचित के नसीब में दूध की एक बूँद नहीं, और कहीं देखो तो मलाई-पाक से नीचे बात नहीं। जो सम्पन्न लोग मलाई का संग्रह कर लेते हैं, उन्हें कालांतर में मलाई से नवनीत और घृत की प्राप्ति होती है, जो शरीर को स्वस्थ व दीर्घायु रखता है। आम आदमी बची हुई छाछ से ही कढ़ी बना संतुष्ट हो जाता है और अपने प्रभु का गुणगान करता रहता है।

दलाई लामा बनना इतना आसान नहीं ! जप, तप, त्याग और संयम ही जीवन की मलाई है, निचोड़ है। सियासती नारे और चुनावी वादे भी एक तरह मलाई का ही प्रलोभन है। मेहनत की, पसीने की कमाई से आप सिर्फ़ दूध की ही आस रख सकते हैं, और कभी दूध से भी जल जाएँ, तो छाछ भी फूँक-फूँककर पी सकते हैं।।

आजकल तो मलाई का भी आरक्षण होने लग गया है। बिल्ली की तरह इंसानों में भी एक प्रजाति होती है, जिसे वीआईपी कहते हैं। जिस प्रकार सात तालों में रखी मलाई पर बिल्ली हाथ साफ़ कर सकती हैमलाई का उत्तम-भोग भी सबसे पहले वीआईपी द्वारा ही लगाया जाता है। हम तो खुरचन से ही संतुष्ट होने वाले लोग हैं …!!!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ “श्री हंस” साहित्य # २१६ ☆ मुक्तक – ।। जय कन्हैया लाल की ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

श्री एस के कपूर “श्री हंस”

☆ “श्री हंस” साहित्य # २१६ ☆

☆ मुक्तक ।। जय कन्हैया लाल की ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

।। वर्ण 8 8 8 7।।

=1=

जय कन्हैया   लाल की

हाथी घोड़ा ओ  पालकी

कारागार   में    देवकी

पाला   यशोदा   माई।।

=2=

बाल ग्वाल   रात्रि भोर

खेले  घूमें   करें  शोर

कहते  माखन    चोर

यशोदा   को   बधाई।।

=3=

बन   गए    नंद  लाल

पूतना    करा    संहार

कंस   मरा  घर   द्वार

असुरों     से   लड़ाई।।

=4=

गोपियों  मटकी  फोड़ें

दही  माखन न   छोड़ें

गायों  संग  बस  डोलें

द्रौपदी   ली   बचाई।।

© एस के कपूर “श्री हंस”

बरेली ईमेल – Skkapoor5067@ gmail.com, मोब  – 9897071046, 8218685464

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ हे श्रावणा… ☆ श्री सुहास रघुनाथ पंडित ☆

श्री सुहास रघुनाथ पंडित

? कवितेचा उत्सव ?

☆ हे श्रावणा... ☆ श्री सुहास रघुनाथ पंडित 

हे श्रावणा, मनभावना, शब्द माझे ऐक ना

मोहविते रुप तुझे, तूच का रे कृष्ण कान्हा

डुलशी पाचूतुनी तू, स्त्रवशी धारेतुनी तू

पानातुनी, रानातुनी, दिसशी मला तूच तू

 *

किरण होशी कोवळे पांघरिशी मेघमाला

बासरीचा सूर येतो वाहताना रानवारा

 *

या फुलांचा गंध आणि लाभले रुप तुजला

पक्षीगण हे धावले गीत तुझे गावयाला

 *

जातसे रंगुनी मी हे रंग सारे पाहताना

घालीशी अन् मोहिनी तू लोभविसी या मना

हे श्रावणा… मन भावना

 

© श्री सुहास रघुनाथ पंडित 

सांगली (महाराष्ट्र)

मो – 9421225491

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ विहंगावलोकन… ☆ दीपा नारायण पुजारी ☆

दीपा नारायण पुजारी

?विविधा ?

☆ विहंगावलोकन…  ☆ दीपा नारायण पुजारी ☆

विहंगावलोकन, विहंग + अवलोकन अशी फोड असणारा हा तसा समजायला सोपा शब्द. विहंग करणारे ते पक्षी. पक्षी विहंग करतात, म्हणजे आकाशात उंच उंच जातात. उंच विहार करु शकतात. तेथून ते खाली जमिनीवर लक्ष ठेऊ शकतात. थोडक्यात, विहंगावलोकन म्हणजे उंचीवरून केलेलं अवलोकन, निरीक्षण. घार, गरुड, गिधाडे असे काही पक्षी, इतर पक्ष्यांच्या तुलनेत जास्त उंचावरुन उडतात. यातील घार आपल्याला जास्त परिचीत आहे. दोनशे ते पाचशे फूट उंचीवरून उडणारी घार, जमिनीवरील भक्ष्य शोधते, तसेच आपल्या पिल्लांवरही नजर ठेवून असते. तिची नजर खूपच तीक्ष्ण असते. घारीची नजर हा वाक्प्रचारही आपण वापरतो.

विहंगावलोकन म्हणजे कोणत्याही बाबीकडे, प्रकरणाकडे, घटनेकडे, सूक्ष्म, अतिसूक्ष्म नजरेने पाहणे. या क्रियेत अतिशय बारीक सारीक मुद्दे विचारात घेतले जातात. हे काम नक्कीच सोपं नसतं. क्लिष्ट असतं. ज्या गोष्टीचा असा अभ्यास करायचा आहे, त्या गोष्टीची सखोल माहिती असणं आवश्यक असतं. त्या क्षेत्रातील कामाचा अनुभव असणं गरजेचं असतं. मुळात त्या गोष्टीकडं एकाच अंगानं न बघता अनेक कोनातून बघावं लागतं. त्या गोष्टीचा सर्वांगानं अभ्यास करावा लागतो. असा सर्वंकष विचार आपण कधीतरीच करतो. बऱ्याच वेळा तो करतच नाही. पण आपल्या आवडीच्या गोष्टीकडं मात्र आपण सर्वांकष नजरेने बघू शकतो.

एखादं ऑफिसचं काम, अभ्यास, एखाद्या कार्यक्रमाचं नियोजन असा सर्वंकष विचार करून केला जातो तेव्हा ते किती उत्कृष्ट होतं ना! आपण कधी असा विचार केला आहे का; आपल्या कृतीचं, विचारांचं किंवा आपण केलेल्या एखाद्या कामाचं असं विहंगावलोकन करणं गरजेचं आहे? बहुतेक वेळा आपण तसा विचार करत नाही. कधी कधी आपण उगाचच आपलं मत मांडून रिकामे होतो. घडलेल्या गोष्टीविषयी मत मांडणं फारच सोपं असतं. परंतु साधक-बाधक दृष्टीने विचार करून बोलणं फार कठीण! एखाद्या वेळेस अशी आपणच आपली उलट तपासणी केली तर! आपणच आपल्या कृतीचं कामाचं मनात आलेल्या विचारांचं किंवा बोलून दाखवलेल्या वाक्याचं असं विहंगावलोकन केलं तर? यामुळे आपली शिकण्याची क्षमता वाढेल. स्वजागरूकता निर्माण होईल. भोवतालच्या परिस्थितीचा योग्य अंदाज येईल.

काम झाल्यानंतर स्वतःला प्रश्न विचारावेत. हे बरोबर झाले आहे का? योग्य आहे का? याचा काय परिणाम होईल? आणखी कोणत्या पद्धतीनं आपल्याला ते करता येईल? थोडक्यात, स्वतःच आत्मपरीक्षण करण्याची सवय लावून घ्यायला हवी. त्यामुळे आपण कुठं आहोत? काय करायचं आहे? कसं करायचं आहे? याचा आढावा घेता येणं शक्य होईल. कोणत्याही विषयावर प्रभुत्व मिळवायला हा विचार, हे प्रश्न नक्कीच मदत करतील. त्यामुळे अघटीत गोष्टी टाळता येतील, हो ना? अनिश्चितता टाळायलाही, भीती कमी करायलाही असं परीक्षण उपयोगी पडेल. आत्मबल वाढेल. प्रश्न सोडवण्याची क्षमता वाढेल. आपल्या भावनिक कक्षा रुंदावतील आणि मानसिक आरोग्य ही सुधारेल. ही गोष्ट खूप कठीण नक्कीच नाही. का, कशासाठी, कधी, कसे, केव्हा किंवा आणखी कोणते पर्याय? असे प्रश्न आपणच आपल्याला विचारायचे. आपलंच निरीक्षण करायचं. उत्तर शोधायचं. हं, दुसऱ्याकडे बोट दाखवणं सोपं असतं. त्यापेक्षा आपण आपल्याकडेच बोट दाखवू. आपल्या मनातून आपल्यातल्या ‘मी’ ला थोडं बाहेर काढू आणि ‘मी’ ला बाहेरून तपासून बघू. आपणच आपली उन्नती करून घेऊ. हेच तर आहे विहंगावलोकन.

सोप्पं वाटलं तरी हे तसं अवघड आहे. कारण हे एक प्रकारचं आत्मपरीक्षण आहे. स्वतःला तपासणं आहे. स्वतःतील उणीव शोधणे आहे आणि अशी उणीव शोधायला फारसं आपल्याला आवडत नाही. जरी उणीव लक्षात आली, तरी स्वीकारून बदल करायला त्याहूनही कठीण. पण हे साधायला पाहिजे. स्वतःची प्रगती करण्यासाठी, स्वतःला उन्नत करण्यासाठी ही गोष्ट आपण शिकली पाहिजे. हे घडेल तेव्हा आपण जास्त समाजाभिमुख होऊ. तसेच आपणच आपल्याला शिकवून शहाणं करू.

 

© दीपा नारायण पुजारी

इचलकरंजी

9665669148

deepapujari57@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – उज्ज्वला केळकर/ सुहास रघुनाथ पंडित / मंजुषा मुळे/ गौरी गाडेकर≈

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