हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०६५ ⇒ रिश्ता और संपर्क ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “रिश्ता और संपर्क।)

?अभी अभी # १०६५ ⇒ आलेख – रिश्ता और संपर्क ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

 Relation & contact°

रिश्ता केवल खून का ही नहीं होता। हम यहां इंसानियत के रिश्ते की बात भी नहीं कर रहे। बिना जान पहचान के कोई रिश्ता नहीं पनपता। मेल जोल और मेल मिलाप किसी भी रिश्ते की बुनियाद है। रिश्ते हवा में नहीं बनाए जाते। वर वधू की तलाश में अखबारों में मेट्रिमोनियल और क्लासीफाइड विज्ञापन तो दिए जा सकते हैं, लेकिन बात तो पत्र व्यवहार और मिलने जुलने के बाद ही आगे बढ़ती है।

पहले चिट्ठी पत्री उन जान पहचान के लोगों में होती थी, जिनके बीच में किसी कारण भौगोलिक दूरियां होती थी। अनजान लोगों से कौन पत्र व्यवहार करता था। जब किसी अजनबी से पहली बार मुलाकात होती थी, तो सबसे पहले परिचय प्राप्त किया जाता था। आपका शुभ नाम ? अच्छा, आप हमारे पड़ोसी हैं। पहले परिचय, पश्चात् मेलजोल।।

जैसे जैसे इंसान के बीच भौगोलिक दूरियां बढ़ने लगी, संचार के साधन भी विकसित होते चले गए, जिन परिचित चेहरों की जानकारी डायरी में नोट की जाती थी, उनको मोबाइल में स्थान मिलने लगा और बाद में संचार क्रांति के बाद तो सारा संपर्क ही फोन के माध्यम से होने लगा। जहां डायरी में जान पहचान के २५-५० नाम होते थे, वहां फोन के कॉन्टैक्ट की संख्या सैकड़ा पर कर हजार की संख्या में पहुंचने लगी। आज अगर आपके व्हाट्सएप, फेसबुक और ट्विटर के संपर्क जोड़ लिए जाएं, तो

आप ही दांतों तले उंगली दबाने लगें।

क्या आज सोशल मीडिया पर हमारे जितने कॉन्टैक्ट हैं, उतने हमारे रिश्ते हैं ?आप नहीं समझते, आपका जवाब होगा। कब किससे क्या काम पड़ जाए आज के इस मशीनी युग में। वह जमाना गया जब बात बात पर साइकिल उठाकर बाजार जाना पड़ता था। आज फोन से कितनी सुविधा है, आप नहीं जानते। धीरे धीरे सभी काम ऑनलाइन होने लग गए हैं। अमेजिंग अमेजान है न।

न जान न पहचान, फिर भी अलादीन के चिराग की तरह मुंहमांगी चीज हाजिर और वह भी 24×7।।

क्या हमारे रिश्ते यंत्रवत और आभासी नहीं होते जा रहे। अपने काम से काम, और दूर की राम राम ! यह कैसी विडंबना है, जितनी जनसंख्या बढ़ती जा रही है, उतनी ही इंसान की आपस में दूरियां बढ़ती जा रही हैं। जो रिश्ते कभी जीवंत थे, वे आजकल औपचारिक होते जा रहे हैं। आज हर बच्चे के हाथ में मोबाइल है और उसके मोबाइल में मोबाइल गेम्स हैं। बस यही उसकी दुनिया है। समझ में नहीं आता, मोबाइल ने हमें जोड़ा है, या हम सिर्फ मोबाइल से ही जुड़े हैं।

कभी ये आंसू मेरे दिल की जुबान होते थे, आजकल फेसबुक ही मेरी जुबान है।

फेसबुक पर बैठकर मोबाइल के बारे में ऐसी बातें करना बिल्कुल ऐसा ही है, जैसे पानी में रहने वाली कोई मछली किसी को पानी से दूर रहने की हिदायत दे। मोबाइल की उपयोगिता हमने कोविड काल में देख ली। जब पूरे संसार हमारे लिए अछूता था, तब एक यह मोबाइल ही तो था, जिसने न सिर्फ गले से लगाया था, हर पल, हर क्षण हमारी मदद की थी। हमारे अकेलेपन का यह सहारा भी बना और एक उपयोगी संगी साथी भी। थैंक्स टू डिजिटल इंडिया।।

आप मानें या ना मानें, आज यह फोन हमारे शरीर का ही हिस्सा हो गया है। अब हमें शरीर के साथ इसकी भी देखभाल करनी है। जिस तरह अच्छे स्वास्थ्य के लिए हमें कई सावधानियां रखनी पड़ती हैं, फेसबुक और सोशल मीडिया की बुराइयों के प्रति हमें जागरूक, सावधान, और सतर्क रहना है। अगर आपने और विशेषकर आज की पीढ़ी ने मात्र इसे मनोरंजन का साधन समझ लिया तो मान लीजिए, आपने अपने लिए और युवा पीढ़ी के लिए नर्क का द्वार खोल लिया है।

पोर्न साइट्स और वैसी ही फिल्में आजकल आपके एंड्राइड फोन का हिस्सा हो गई हैं। बच्चों के वीडियो गेम्स दुस्साहसी ही नहीं, खतरनाक भी हैं। कई लोग तो महज सेल्फी के चक्कर में अपनी जान गंवा चुके हैं। अगर कोई बिल्डर अथवा प्रॉपर्टी ब्रोकर है तो उसका फोन टू व्हीलर हो अथवा फोर व्हीलर, कभी बंद नहीं हो सकता। जब कि ड्राइविंग के साथ मोबाइल का उपयोग अपराध ही नहीं, खतरनाक भी है।।

हम तो रसोई में चाकू का इस्तेमाल भी सावधानी से करते हैं, फिर मोबाइल के साथ लापरवाही क्यूं ? क्या हमारा सामाजिक जीवन मोबाइल द्वारा छीना नहीं जा रहा है। पहले रिश्तों में दरार आई और अब मोबाइल की बारी आई।

कितना अच्छा हो, जिस तरह कभी कभी जबान को लगाम देना सुखद लगता है, दोस्तों के बीच, परिवार के सदस्यों के बीच और इष्ट मित्रों के बीच, इस मोबाइल का मुंह भी बंद कर दिया जाए, ताकि हमारे रिश्ते जीवंत हों, खुली सांस ले सकें। फेसबुक पर स्वस्थ संवाद हो। साहित्य और अध्यात्म की चर्चा हो। आपसी समझ हो। रिश्तों की अहमियत हो, स्वार्थ और खुदगर्जी की नहीं। चाकू से सब्जी ही काटें, अपना हाथ नहीं।

खयाल रहे, बंदर के हाथ में कभी तलवार नहीं दी जाती।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #३३३ ☆ अहं या वहम… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख अहं या वहम…। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

(डॉ मुक्ता जी द्वारा रचित एक भजन – ये दुनिया है दो दिन का मेला / स्वर- रुखसार, सौजन्य – तरूनम चैनल)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # ३३३ ☆

☆ अहं या वहम… अत्यंत घातक… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

‘जल्दी जागना हमेशा फ़ायदेमंद होता है, फिर चाहे वह अपनी नींद से हो; अहं से हो; वहम से हो या  सोए हुए ज़मीर से… इनसे जितनी शीघ्रता से मुक्ति पा ली जाए; शरीर व मन के लिए उपयोगी है।’ जितनी शीघ्रता से मानव भोर होते, सूर्योदय से पूर्व नींद से जाग जाए… स्वास्थ्य-प्रदायक है। ‘जो सोवत है, सो खोवत है’ अर्थात् जो जागता है, वही पाता है। सो! समय से पूर्व जागने वाला व्यक्ति सदैव लाभ प्राप्त करता है और देर तक सोने वाले की हानि होना निश्चित है। यह सार्वभौमिक सत्य है कि कुछ पाने के लिए, कुछ खोना अवश्य पड़ता है। हम अगली सांस तब तक ग्रहण नहीं कर सकते, जब तक हम पहली श्वास का त्याग नहीं करते। प्रकृति की सब वस्तुएं हमें मुफ़्त में प्राप्त होती हैं, पर्याप्त हैं–परंतु संग्रहणीय नहीं हैं। यदि हम सीमा में रहते हुए उनका उपयोग करते हैं, तो उनका अभाव कभी नहीं खलता। परंतु जब हम आवश्यकता से अधिक उनका संग्रह करना प्रारंभ कर देते हैं, तो प्रकृति अपना विकराल रूप दिखा कर, मानव को सचेत करती है कि समय रहते चेत जाओ … अपनी बढ़ती लालसाओं पर अंकुश लगाओ … अपने संसाधनों का अतिरिक्त दोहन मत करो, अन्यथा तुम्हें इसका हर्ज़ाना अथवा दुष्परिणाम अवश्य भुगतना पड़ेगा। परंतु मदहोश मानव उसकी ग़ुहार की ओर ध्यान नहीं देता, बल्कि उपेक्षा भाव दर्शाता है–तो प्रकृति भीषण आपदाओं के रूप में अपना रोष प्रकट करती है।

हरी-भरी धरा को कंक्रीट के जंगल बनाने के कारण तापमान निरंतर बढ़ रहा है; ग्लेशियर पिघल रहे हैं; सुनामी दस्तक दे रहा है; ज्वालामुखी पर्वत फटने से भूकंप आ रहे हैं; सुनामी दस्तक दे रहे हैं; धरती फट रही है और मानव का सर्वस्व सैलाब में बह रहा है। ऐसा प्रतीत हो रहा है कि प्रकृति अपनी असीम वेदना व अथाह दु:ख प्रकट करते हुए आंसू बहा रही है। परंतु फिर भी मानव प्रकृति से खिलवाड़ कर रहा है; अपनी सीमाओं का उल्लंघन कर प्रतिबंधित क्षेत्र में हस्तक्षेप कर रहा है और उसके आक्रोश को समझने की ज़ेहमत नहीं पा रहा, क्योंकि वह चिरनिद्रा में सो रहा है।

अहम् और वहम एक सिक्के के दो पहलू हैं, जिनका चोली-दामन का साथ है। अहं मानव का सबसे बड़ा शत्रु है, जो इस वहम में जीता है कि उससे अधिक बुद्धिमान, समझदार व शक्तिशाली कोई दूसरा हो ही नहीं सकता है। सो! वह पूरी सृष्टि पर अधिपत्य स्थापित कर, अपने अहम् की पुष्टि करना चाहता है। वह अहंनिष्ठ प्राणी केवल अपने बारे में चिंतित रहता है; अपनी सुख-समृद्धि के निमित्त प्रयासरत रहता है तथा दूसरों पर विजय प्राप्त करने के बारे में सोच- विचार कर योजनाएं ही नहीं बनाता, बल्कि उसके कार्य-क्षेत्र में हस्तक्षेप करने की अनाधिकार चेष्टा भी करता है। सो! वह राह में आने वाले प्रत्येक वस्तु व व्यक्ति को मिटा डालना चाहता है; भले ही उसे कितने ही निम्नतम स्तर पर ही क्यों न उतरना पड़े? वह किसी अन्य को समान स्तर पर देख आत्म- नियंत्रण खो बैठता है; अपने आपे से बाहर हो जाता है… मानव-मूल्यों को तज, उचित-अनुचित को नकार सभी सीमाओं को लांघ जाता है। इस स्थिति में मर्यादा भी उसकी राह का रोड़ा नहीं बनती, क्योंकि वह स्वयं को सर्वश्रेष्ठ समझता है … भले ही वह उसका वहम क्यों न हो? लाख प्रयास करने पर भी वह दम्भी मनुष्य उस स्वनिर्मित चक्रव्यूह से बाहर निकलना ही नहीं चाहता। सो! ऐसे अहंनिष्ठ व्यक्ति का व्यवहार सामान्य कैसे रह सकता है और वह अपनी अंतरात्मा की आवाज़ कैसे सुन सकता है? उसके लिए अच्छा-बुरा, पाप-पुण्य कोई मायने नहीं रखता। वह बॉस की भांति केवल स्वयं को सदैव ठीक मानता है… अपनी सोच को उचित ठहराता है,  क्योंकि ग़लती तो वह कभी कर ही नहीं सकता। ऐसे व्यक्ति को यदि आप हिटलर की संज्ञा भी देंगे, तो भी अतिशयोक्ति नहीं होगी।

काश! मानव सोच पाता कि संसार में जो जन्मा है, उसकी मृत्यु अवश्यंभावी है। संसार रूपी रंगमंच पर सबको अपना क़िरदार अदा कर, ज़िदगी के सफ़र पर चल देना है। कोई भी व्यक्ति इस संसार में सदैव नहीं रहा तथा मृत्यु समय आने पर उसे लाख परदों के पीछे से भी ढूंढ लेती है। सो! मानव को अपना अहं त्याग कर, सबको समान दृष्टि से देखना चाहिए; उनसे अच्छा व्यवहार करना चाहिए, क्योंकि जैसा व्यवहार आप दूसरों के साथ करते हैं, वही प्रतिध्वनि के रूप में लौट कर आपके पास आता है।

‘जैसा बोओगे, वैसा काटोगे’ अथवा ‘बोया पेड़ बबूल का, आम कहां से खाए’ अर्थात् जैसे कर्म करोगे, वैसा ही फल आपको प्राप्त होगा। इसलिए जो व्यक्ति आप का अहित चाहता है; आपके पथ में कांटे बिछा कर अवरोध उत्पन्न करता है; उस स्थिति में आपके लिए वैसा ही प्रत्युत्तर न देना बेहतर है,

अर्थात् अपना रास्ता बदल लेना अधिक कारग़र है, क्योंकि मानव को अपने कृत-कर्मों के अनुसार फल अवश्य मिलता है। यदि कोई आपके साथ बुरा भी करता है, तो भी आपको उसके साथ अच्छा व्यवहार करना चाहिए…यही जीने का सबसे सर्वश्रेष्ठ व उत्तमोत्तम मार्ग है। परंतु कुछ परिस्थितियां अपवाद भी हो सकती हैं।

वहम सब रोगों की जड़ है। वहम केवल एक आदत नहीं… स्वयं को, अपनी सोच को ठीक व उचित समझने का मात्र जज़्बा नहीं है। यह भ्रम की वह स्थिति है, जिसमें अवगाहन कर मानव अपने सम्मुख सबको हेय समझता है तथा उनके अस्तित्व को नकार देता है। वह लाज-मर्यादा तज, जीवन-मूल्यों का तिरस्कार कर, सब पर दोषारोपण कर सुक़ून पाता है तथा सबको एक ही लाठी से हांकने में विश्वास रखता है। उसका सुप्त अहं व मृत्त ज़मीर उसके सोचने-समझने की शक्ति का हरण कर लेता है। इस स्थिति में सब उससे घृणा करने लग जाते हैं; कोई भी उससे बात तक करना पसंद नहीं करना चाहता। परंतु एक लंबे अंतराल के पश्चात् जब उसकी शारीरिक शक्तियां क्षीण हो जाती है; मनो- मस्तिष्क साथ नहीं देता… एकांत की त्रासदी झेलता वह अहंनिष्ठ शख़्स अपनों के बीच; अपनों के साथ जीवन का आखिरी समय व्यतीत करना चाहता है, परंतु उसके हाथ केवल निराशा ही लगती है। इन परिस्थितियों में वह अपना मानसिक संतुलन खो बैठता है…पागलों जैसा असामान्य व्यवहार करने लगता है और प्रायश्चित-स्वरूप उन्हें जीवन के समस्त सुख प्रदान कर, अपने दायित्व का निर्वहन करना चाहता है…अपने सुख-दु:ख साझे करना तथा अपनी विवशता व अप्रत्याशित परिस्थितियों से अवगत कराना; उसकी प्राथमिकता बन जाती है… परंतु सब निष्फल। उसके आत्मज उस स्थिति में उसे अतिव्यस्त, आत्मनिष्ठ, आत्ममुग्ध व आत्मलीन  भासते हैं… जिसका अंजाम उसे नियति के अनुसार अपने कर्मों के अनुरूप अवश्य भुगतना पड़ता है।

काश! मानव का ज़मीर ज़िंदा रहता… संवेदनाएं मृत्त नहीं होतीं… संबंधों की गरिमा बनी रहती… रिश्तों की अहमियत बरक़रार रहती..जीवन-मूल्य प्रासंगिक रहते, तो मानव संवेदनहीनता के दायरे में प्रवेश करके दुष्कर्म, फ़िरौती, कन्या भ्रूण-हत्या आदि के हादसों को अंजाम न देता; बालिकाओं की अस्मत सुरक्षित रहती; मां, बहन, बेटी को मात्र उपयोगिता की वस्तु न समझा-स्वीकारा जाता, लूट-खसोट, फ़िरौती, दुष्कर्म व हत्या की घटनाएं आम नहीं होतीं और उन पर अंकुश लग पाता। परंतु यह तभी संभव हो सकता था; यदि हमारा ज़मीर ज़िंदा होता।

आइए! लौट चलें ,अपनी संस्कृति की ओर… जहां ज्ञान-रूपी सूर्योदय सबसे पहले होता था। जहां सांस्कृतिक एकता के रूप में, विविधता में एकता विद्यमान थी। सभी धर्म-जातियों के लोग मिल-जुल कर रहते थे। पारस्परिक स्नेह-सौहार्द व मर-मिटने का भाव था, सब मर्यादा की सीमा-रेखा का स्वेच्छा से पालन करते थे और अधिकारों के स्थान पर कर्तव्यनिष्ठता व्याप्त थी। सब परमात्म-सत्ता के सम्मुख नत रहते थे…इसलिए असामान्य व अमानवीय हादसे घटित नहीं होते थे और समाज में समन्वय व सामंजस्यता व्याप्त रहती थी।

इए! हम लौट चलें! अपने स्वर्णिम अतीत की ओर.. जहां सुक़ून था, शांति थी, सुख का साम्राज्य था। मानव राग-द्वेष व स्व-पर से ऊपर था; वहां नकारात्मकता का लेशमात्र भी स्थान नहीं था तथा सर्वहिताय व सर्वमंगल की भावनाएं जन-मानस में निहित थीं। सो! हमें अहं का त्याग कर, वहम से मुक्ति प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए, क्योंकि प्राणी-मात्र में परमात्म-सत्ता उसी प्रकार व्याप्त है, जैसे सूर्य आकाश में दिखाई पड़ता है और वह विभिन्न घड़ो के जल में भी समान रूप में प्रति- भासित होता है। इसलिए हमें सम्पूर्ण जीव-जगत् में उस ब्रह्म की सत्ता को अनुभव करना चाहिए, ताकि ऐसे सुदृढ़ समाज की संरचना हो सके; जहां सत्यम्, शिवम्, सुंदरम् का साम्राज्य हो।

●●●●

© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – शिवोऽहम्… (४) ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

श्रावण मास निमित्त पुनर्पाठ में पढ़िए ‘निर्वाणषटकम्‘ पर  छह अंकों की यह शृंखला-

? संजय दृष्टि – शिवोऽहम्… (४) ? ?

।। चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्।।

आदिगुरु शंकराचार्य महाराज के आत्मषटकम् को निर्वाणषटकम् क्यों कहा गया, इसकी प्रतीति चौथे श्लोक में होती है। यह श्लोक कहता है,

न पुण्यं न पापं न सौख्यं न दु:खं

न मंत्रो न तीर्थं न वेदा न यज्ञः।

अहम् भोजनं नैव भोज्यम् न भोक्ता

चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ।।

मैं न पुण्य से बँधा हूँ और न ही पाप से। मैं सुख और दुख से भी विलग हूँ, इन सबसे मुक्त हूँ। अर्थ स्पष्ट है कि आत्मस्वरूप सद्कर्म या दुष्कर्म नहीं करता। इनसे उत्पन्न होनेवाले कर्मफल से भी कोई सम्बंध नहीं रखता।

मंत्रोच्चारण, तीर्थाटन, ज्ञानार्जन, यजन कर्म सभी को सामान्यतः आत्मस्वरूप का अधिष्ठान माना गया है। षटकम् की अगली पंक्ति  सीमाबद्ध को असीम करती है। यह असीम, सीमित शब्दों में कुछ यूँ अभिव्यक्त होता है, ‘मैं न मंत्र हूँ, न तीर्थ, न ही ज्ञान या यज्ञ।’ भावार्थ है कि आत्मस्वरूप का प्रवास कर्म और कर्मानुभूति से आगे हो चुका है।

मंत्र, तीर्थ, ज्ञान, यज्ञ, पाप, पुण्य, सुख, दुखादि कर्मों पर चिंतन करें तो पाएँगे कि वैदिक दर्शन हर कर्म के नाना प्रकारों का वर्णन करता है। तथापि तत्सम्बंधी विस्तार में जाना इस लघु आलेख में संभव नहीं।

आगे आदिगुरु का कथन विस्तार पाता है, ‘मैं न भोजन हूँ, न भोग का आनंद, न ही भोक्ता।’ अर्थात साधन, साध्य और सिद्धि से ऊँचे उठ जाना। विचार के पार, उर्ध्वाधार। कुछ न होना पर सब कुछ होना का साक्षात्कार है यह। एक अर्थ में देखें तो यही निर्वाण है, यही शून्य है।

वस्तुत: शून्य में गहन तृष्णा है, साथ ही गहरी तृप्ति है। शून्य परमानंद का आलाप है। इसे सुनने के लिए कानों को ट्यून करना होगा। अपने विराट शून्य को निहारने और उसकी विराटता में अंकुरित होती सृष्टि देख सकने की दृष्टि विकसित करनी होगी।  शून्य के परमानंद को अनुभव करने के लिए शून्य में जाना होगा।… अपने शून्य का रसपान करें। शून्य में शून्य उँड़ेलें, शून्य से शून्य उलीचें। तत्पश्चात आकलन करें कि शून्य पाया या शून्य खोया?

शून्य अवगाहित करती सृष्टि,

शून्य उकेरने की टिटिहरी कृति,

शून्य के सम्मुख हाँफती सीमाएँ

अगाध शून्य की  अशेष गाथाएँ,

साधो…!

अथाह की कुछ थाह मिली

या फिर शून्य ही हाथ लगा?

साधक एक बार शून्यावस्था में पहुँच जाए तो स्वत: कह उठता है, ‘मैं सदा शुद्ध आनंदमय चेतन हूँ, मैं शिव हूँ, मैं शिव हूँ, शिवोऽहम्..!’

?

© संजय भारद्वाज   

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  श्रावण साधना गुरुवार दि. 30 जुलाई से आरंभ होकर शनिवार 28 अगस्त (रक्षाबंधन) तक चलेगी 🕉️

  💥 

इस साधना में-

ॐ नमः शिवाय का मालाजप होगा।

गोस्वामी तुलसीदास रचित रुद्राष्टकम् का पाठ करेंगे।

इस बार हम आदि शंकराचार्य के निर्वाण षटकम् / वैराग्य षटकम् का भी प्रतिदिन कम से कम एक पाठ अवश्य करेंगे।

मालाजप, रुद्राष्टकम्, निर्वाण षटकम् के साथ आत्मपरिष्कार व ध्यानसाधना भी नियमित रूप से चलेंगे।

हमारा प्रयास है कि महत्वपूर्ण स्तोत्रों का अधिकाधिक प्रसार हो।

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०६४ ⇒ छाता और बरसात ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “छाता और बरसात।)

?अभी अभी # १०६४ ⇒ आलेख – छाता और बरसात ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

उधर आसमान को पता ही नहीं कि सावन आ गया है, लोग बेसब्री से बारिश का इंतजार कर रहे हैं और इधर एक हम हैं जो पंखे के नीचे बैठकर छाते की बात कर रहे हैं। याद आते हैं वे बरसात के दिन, जब उधर आसमान से रहमत बरसती थी और इधर हम बंदूक की जगह छाता तानकर उसका सामना करते थे। आज हमने सीख लिया, जब रहमत बरसे, तो कभी छाता मत तानो, बस रहमत की बारिशों में भीग जाओ।

जब हमारा सीना भी छप्पन सेंटीमीटर था, तब हम भी बरसती बारिश में सीना तानकर सड़क पर निकल जाते थे, क्योंकि तब घर में कोई नहीं था, जो हमारे लिए बिनती करता, नदी नारे ना जाओ श्याम पैंया पड़ूं। तबीयत से भीगकर आते थे, मां अथवा बहन टॉवेल लेकर हमारा इंतजार करती थी, कपड़े बदलो, और गर्मागर्म दूध पी लो।।

तब कहां आज की तरह सड़कों पर इतनी कारें और दुपहिया वाहन थे। इंसान बड़ी दूरी के लिए साइकिल और कम दूरी के लिए ग्यारह नंबर की बस से ही काम चला लेता था। शायद ही कोई ऐसा घर हो, जिसमें तब छाता ना हो। खूंटी पर टोपी, कुर्ते के साथ आम तौर पर एक छाता भी नजर आता था, काले रंग का। जी हां हमने तो पहले पहल काले रंग का ही छाता देखा था।

एक छाते में दो आसानी से समा जाते थे, और साथ में आगे छोटा बच्चा भी। उधर बच्चा बड़ा हुआ, उसके लिए भी एक बेबी अंब्रेला, यानी छोटा छाता।

अपने छाते से बारिश का सामना करना, तब हमारे लिए बच्चों का ही तो खेल था।

छाता भी क्या चीज है, खुलते ही छा जाता है, हमारे और बरसात के बीच, और छाते से छतरी बन जाता है। एक थे गिरधारी, जिन्होंने अपनी उंगली पर इंद्रदेव को नचा दिया था, छाते की जगह पर्वत ही उठा लिया था।

कलयुग में गलियन में गिरधारी ना सही, छाताधारी ही सही।।

समय के साथ, साइकिल की तरह छाते भी लेडीज और जेंट्स होने लग गए।

रंगबिरंगे फैशनेबल छाते, जापानी गुड़िया और मैं हूं पेरिस की हसीना ब्रांड छाते। हमें अच्छी तरह याद है, छातों में ताड़ी होती थी, जिससे बटन दबाते ही छाता तन जाता था और काले मोट कपड़े पर शायद धन्टास्क लिखा रहता था।

छाता कभी आम आदमी का उपयोग साधन था। कामकाजी संभ्रांत पुरुष डकबैक की बरसाती, हेट और गमबूट पहना करते थे, जेम्स बॉन्ड टाइप। कामकाजी महिलाओं के लिए भी लेडीज रेनकोट उपलब्ध होते थे। हर स्कूल जाने वाले बच्चे के पास बारिश के दिनों में बरसाती भी होती थी।।

समाज में एक तबका ऐसा भी है, जो पन्नी(पॉलिथीन) ओढ़कर ही बारिश का सामना कर लेता है। हमने कई बूढ़ी औरतों को गेहूं की खाली बोरी ओढ़कर जाते देखा है।

आज भी छाते की उपयोगिता कम नहीं हुई है। जो पैदल चलते हैं, उनकी यह जरूरत है। जो कार में चलते हैं, उन्हें भी बरसते पानी में, कार में बैठते वक्त और उतरते वक्त छाते का सहारा लेना ही पड़ता है।।

क्या विडंबना है, नीली छतरी वाले और हमारे बीच भी एक छतरी। रहमत बरसा, लेकिन छप्पर तो मत फाड़। कुंए, नदी, तालाब, पोखर, लबालब भरे रहें, लेकिन हमारे सब्र के बांध की परीक्षा तो मत ले। अब तो हमें तेरी तारीफ के लिए बांधे पुलों पर भी भरोसा नहीं रहा, बहुत झूठी तारीफ की हमने तेरी अपने स्वार्थ और खुदगर्जी की खातिर। हमें माफ कर।।

छाते का एक मनोविज्ञान है, एक छाते में दो प्रेमी बड़ी आसानी से समा जाते हैं।

प्रेम भाई बहन का भी हो सकता है और पति पत्नी का भी। साथ में भीगना भी, और भीगने से बचना भी, तब ही तो प्रेम छाता है। किसी अनजान व्यक्ति को भीगते देख उसे अपनी छतरी में जगह भी वही देगा, जिसके दिल में जगह होगी। हर इंसान तो नेमप्लेट लगाकर नहीं घूम सकता न ;

तेरा साथ रहा बारिशों में छाते की तरह,

भीग तो पूरा गए, पर हौंसला बना रहा।

(अनूप शुक्ल से साभार)

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – शिवोऽहम्… (३) ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

श्रावण मास निमित्त पुनर्पाठ में पढ़िए ‘निर्वाणषटकम्‘ पर  छह अंकों की यह शृंखला-

? संजय दृष्टि – शिवोऽहम्… (३) ? ?

निर्वाण षटकम् का हर शब्द मनुष्य के अस्तित्व पर हुए सारे अनुसंधानों से आगे की यात्रा कराता है। इसका सार मनुष्य को स्थूल और सूक्ष्म की अवधारणा के परे ले जाकर ऐसे स्थान पर खड़ा कर देता है जहाँ ओर से छोर तक केवल शुद्ध चैतन्य है। वस्तुत: लौकिक अनुभूति की सीमाएँ जहाँ समाप्त होती हैं, वहाँ से निर्वाण षटकम् जन्म लेता है।

तृतीय श्लोक के रूप में जगद्गुरु आदि शंकराचार्य का परिचय और विस्तृत होता है-

न मे द्वेषरागौ न मे लोभमोहौ
मदो नैव मे नैव मात्सर्यभाव:
न धर्मो न चार्थो न कामो न मोक्ष:
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्।।3।।

अर्थात न मुझे द्वेष है, न ही अनुराग। न मुझे लोभ है, न ही मोह। न मुझे अहंकार है, न ही मत्सर या ईर्ष्या की भावना। मैं धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष से परे हूँ। मैं सदा शुद्ध आनंदमय चेतन हूँ, मैं शिव हूँ , मैं शिव हूँ।

राग मनुष्य को बाँधता है जबकि द्वेष दूरियाँ उत्पन्न करता है। राग-द्वेष चुंबक के दो विपरीत ध्रुव हैं। चुंबक का अपना चुंबकीय क्षेत्र है। अनेक लोग, समान और विपरीत ध्रुवों के निकट आने से उपजने वाले क्रमश: विकर्षण और आकर्षण तक ही अपना जीवन सीमित कर लेते हैं। यह मनुष्य की क्षमताओं की शोकांतिका है।

इसी तरह मोह ऐसा खूँटा होता है जिससे मनुष्य पहले स्वयं को बाँधता है और फिर मोह मनुष्य को बाँध लेता है। लोभ मनुष्य को सीढ़ी दर सीढ़ी मनुष्यता से नीचे उतारता जाता है। इनसे मुक्त हो पाना लौकिक से अलौकिक होने, तमो गुण से वाया रजो गुण, वाया सतो गुण, गुणातीत होने की यात्रा है।

एक दृष्टांत स्मरण हो आ रहा है। संन्यासी गुरुजी का एक नया-नया शिष्य बना। गुरुजी दैनिक भ्रमण पर निकलते तो उसे भी साथ रखते। कोई न कोई शिक्षा भी देते। आज भी मार्ग में गुरुजी शिष्य को अपरिग्रह की शिक्षा देते चल रहे थे। संन्यास और संचय का विरोधाभास समझा रहे थे। तभी शिष्य ने देखा कि गुरुजी एक छोटे-से गड्ढे के पास रुक गये, मानो गड्ढे में कुछ देख लिया हो। अब गुरुजी ने हाथ से मिट्टी उठा-उठाकर उस गड्ढे को भरना शुरू कर दिया। शिष्य ने झाँककर देखा तो पाया कि गड्ढे में कुछ स्वर्णमुद्राएँ पड़ी हैं और गुरुजी उन्हें मिट्टी से दबा रहे हैं। शिष्य के मन में विचार उठा कि अपरिग्रह की शिक्षा देनेवाले गुरुजी के मन में स्वर्णमुद्राओं को सुरक्षित रखने का विचार क्यों उठा? शिष्य का प्रश्न गुरुजी पढ़ चुके थे। हँसकर बोले, “पीछे आनेवाले किसी पथिक का मन न डोल जाए, इसलिए मैं मिट्टी पर मिट्टी डाल रहा हूँ।”

मिट्टी पर मिट्टी डालने की लौकिक गतिविधि में निहितार्थ गुणातीत होने की अलौकिकता है।

गतिविधि के संदर्भ में देखें तो धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष जीवन के चार पुरुषार्थ हैं। इनमें से हर पुरुषार्थ की विवेचना अनेक खंडों के कम से कम एक ग्रंथ की मांग करती है। यदि इनके प्रचलित सामान्य अर्थ तक ही सीमित रहकर भी विचार करें तो धर्म, अर्थ, काम या मोक्ष की लालसा न करना याने इन सब से ऊपर उठकर भीतर विशुद्ध भाव जगना। ‘विशुद्ध’, शब्द लिखना क्षण भर का काम है, विशुद्ध होना जन्म-जन्मांतर की तपस्या का परिणाम है।

परिणाम कहता है कि तुम अनादि हो पर आदि होकर रह जाते हो। तुम अनंत हो पर अपने अंत का साधन स्वयं जुटाते हो। तुम असीम हो पर तन और मन की सीमाओं में बँधे रहना चाहते हो। तुम असंतोष और क्षोभ ओढ़ते हो जबकि तुम परम आनंद हो।

राग, द्वेष, लोभ, मोह, मद, मत्सर, धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष इन सब से हटकर अपने अस्तित्व पर ध्यान केंद्रित करो। तुम अनुभव करोगे अपना अनादि रूप, अनुभूति होगी अंतर्निहित ईश्वरीय अंश की, अपने भीतर के चेतन तत्व की। तब शव होने की आशंका समाप्त होने लगेगी, बचेगी केवल संभावना, जो प्रति पल कहेगी ‘शिवोऽहम्।’

?

© संजय भारद्वाज   

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  श्रावण साधना गुरुवार दि. 30 जुलाई से आरंभ होकर शनिवार 28 अगस्त (रक्षाबंधन) तक चलेगी 🕉️

  💥 

इस साधना में-

ॐ नमः शिवाय का मालाजप होगा।

गोस्वामी तुलसीदास रचित रुद्राष्टकम् का पाठ करेंगे।

इस बार हम आदि शंकराचार्य के निर्वाण षटकम् / वैराग्य षटकम् का भी प्रतिदिन कम से कम एक पाठ अवश्य करेंगे।

मालाजप, रुद्राष्टकम्, निर्वाण षटकम् के साथ आत्मपरिष्कार व ध्यानसाधना भी नियमित रूप से चलेंगे।

हमारा प्रयास है कि महत्वपूर्ण स्तोत्रों का अधिकाधिक प्रसार हो।

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – आलेख ☆ काशी की रामलीला ☆ डॉ अमिताभ शंकर राय चौधरी ☆

डॉ अमिताभ शंकर राय चौधरी

(डॉ अमिताभ शंकर राय चौधरी जी एक संवेदनशील एवं सुप्रसिद्ध साहित्यकार के अतिरिक्त वरिष्ठ चिकित्सक  के रूप में समाज को अपनी सेवाओं दे रहे हैं। अब तक आपकी चार पुस्तकें (दो  हिंदी  तथा एक अंग्रेजी और एक बांग्ला भाषा में ) प्रकाशित हो चुकी हैं।  आपकी रचनाओं का अंग्रेजी, उड़िया, मराठी और गुजराती  भाषाओं में अनुवाद हो  चुकाहै। आप कथाबिंब ‘ द्वारा ‘कमलेश्वर स्मृति कथा पुरस्कार (2013, 2017 और 2019) से पुरस्कृत हैं एवं महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा द्वारा “हिंदी सेवी सम्मान “ से सम्मानित हैं।)

☆ आलेख ☆ काशी की रामलीला ☆ डॉ अमिताभ शंकर राय चौधरी 

(‘सबसे बुरा होता है हमारे सपनों का मर जाना !’- कथाकार संजीव (गिरेबान में झाँकने की जरूरत:ः बहुवचन: अक्टूबर-दिसंबर. 2016) 

ईश्वरगंगी – हाँ, यही नाम है इस पोखरे का। वामन शिवराम आप्टे ने ‘ईश’ के अर्थ में लिखा है – राज्य करना, स्वामी होना, शासन करना आदि, और ‘ईश्वर’ का अर्थ है – 1.शक्तिसम्पन्न 2.दौलतमंद 3.पति ४. परमेश्वर  5.कामदेव और 6.शिव (संस्कृत हिन्दी कोश)। राणाप्रसाद शर्मा ने पौराणिक कोश में ईश्वर के ये अर्थ दिये हैं -महेश्वर या शिव। वैसे काशी तो शिव की नगरी है ही। और शिव ने ही स्वर्ग से धरा पर तेज रफ्तार से उतरती गंगा को अपनी जटा में सँभाल लिया था। यह कथा तो सभी को मालूम है। यहाँ बनारस में गंगा उत्तरवाहिनी हंै, यानी दक्षिण की ओर न जाकर उत्तर की ओर बहती हैं। तो लोकमन में यही आस्था रही होगी कि ईश्वरगंगी के पोखरे में स्नान करने से गंगा नहाने का पुण्य मिलता है, मगर अब तो…….। खैर….

आज शाम यहीं होगा राम केवट संवाद। सरोवर के चारों ओर पुराने मुहल्लों के मकान एक दूसरे के कंधे से कंधे भिड़ाकर खड़े हैं। उत्तर और  पश्चिम तट डाँगरों के कब्जे में। पोखरे के घाट कहीं पक्के हैं, तो कहीं सिर्फ मिट्टी से बने हैं। देखते देखते तालाब के इर्द गिर्द सँकरे रास्तों पर लोक लहरें आकर मचलने लगती हैं। कहीं गोलगप्पे के ठेले लगेे हैं, तो कहीं रास्ते के किनारे कपड़ों पर चिउड़ा और रेवड़ी की दुकाने सजी हैं। गुब्बारेवाले हाथ में फिरकी घुमाते हुए घूम रहे हैं। किसी बालक की आँखें उड़ते गुब्बारों के संग हवाबाजी करने लगती हैं, तो कोई आधुनिक बच्चा अपनी माता का हाथ खींचते हुए अपना माडर्न डिमांड पेश कर रहा है,‘ए मम्मी, हम्मे उ मोबाइल दिला दे !’ एकाध जगह शिव, काली, बंदर, हनुमान और राक्षसों के मुखौटे बिक रहे हैं। एक जमाने में तो कागज की लुगदी से बने मुखौटे ही बिकते थे। आज तो सत्यानाशी प्लास्टिक सर्वव्यापी है। किस तरह यहाँ की एक लोक कला और एक घरेलू उद्योग अपनी आखिरी साँस ले रहे हैं आप इसका भी एहसास कर सकते हैं।

घाट पर एक नाव आकर लगती है। नौका में रंग रोेगन हुआ है, उसे खूब सजाया गया है। हाथों में धनुष वाण लिये वनवासी के भेस में घाट पर खड़े हैं दो छोटे बालक – राम और लक्ष्मण। उनके सिर पर है जटा, माथे पर तिलक और गले में माला। उनकी बगल में उसी तरह खड़ी है नन्ही जानकी। कबहुँ नहिं यहि भाँति देख्यो, आज को सो रंग (-सूर)! अब तीनों को गंगापार जाना है। राम निशादराज गुह यानी केवट को बुलाते हैं।

ज्यों तीनों नाव पर बैठने जाते हैं, केवट ने हाथ जोड़ लिये,‘प्रभु, एक विनती है।’

राम पूछते हैं कि भाई क्या बात है ?

इतने में लीला का ‘व्यास’जी यानी कथावाचक रामचरितमानस के अयोध्याकाण्ड से लीला सम्बन्धित चैपाइयों को पढ़ने लगते हैं,‘ चरन कमल रज कहुँ सबु कहई। मानुश करनि मूरि कछु अहई।।’ प्रभु, सभी कहते हैं कि तुम्हारे चरणकमलों की धूल में कोई ऐसी जड़ी है जिससे कोई बेजान वस्तु भी इन्सान बन जाती है। क्योंकि …….

‘छुअत सिला भइ नारि सुहाई। पाहन तें न काठ कठिनाई।। तरनिउ मुनि घरिनी होइ जाई। बाट परइ मोरि नाव उड़ाई।।

’आपके चरणस्पर्श से तो एक पत्थर भी सुंदरी बन गया था। मेरी नाव तो बस काठ की है, वह तो पत्थर जितनी सख्त भी नहीं है। कहीं वो भी किसी मुनि की घरवाली बन कर फुर्र हो जाये तो मैं तो लुट जाऊँगा!’

यानी केवट पहले राम लक्ष्मण और सीता के चरण धोना चाहते हैं फिर उन्हें अपनी नाव पर बैठायेंगे।

इसी तरह से काशी के भिन्न भिन्न मुहल्लों में मानस के एक एक अंश की लीला ‘अभिनीत’ होती रहती है। किसी दिन दिन अगर ईश्वरगंगी में राम केवट संवाद की लीला चल रही होती है, तो उसी दिन हो सकता है रामनगर में सूर्पनखा की नाक काटने वाली घटना को दर्शाया जा रहा है और भोजूबीर में चित्रकूट में भरद्वाज मुनि के साथ उन तीनों की भेंट की लीला सम्पन्न हो रही हो।

काशी की लोक-कलाओं एवं लोक-संस्कृति में रामलीला का अपना अनूठा स्थान रहा है। पर इसे अभिनय मात्र न समझे। इस संदर्भ में काशी के विशिश्ट संस्कृति कर्मी डा0 भानुशंकर  मेहता का वक्तव्य भी काबिले गौर है,‘….‘लीला’ में नाटक मत ढूँढ़ो। यह तो ‘वृत्तांत दर्शन’ है, लोक वृत्तानुकरण है, धार्मिक अनुष्ठान है, जीवन का अनुदर्शक है और सर्वोपरि, ‘भावानुकीर्तन’ है। ….लीला में पात्र अभिनय नहीं करते – भूमिकाएं जीते हैं।’ ( आजकल:ःफरवरी 2006)

ध्यान देनेवाली बात यह भी है कि आज के इस राम केवट संवाद में स्वयम् ईश्वरगंगी पोखरे को भी एक रोल मिला हुआ है। वह गंगा के चरित्र में यहाँ उपस्थित है। गंग सकल मुद मंगल मूला। सब सुख करनि हरनि सब सूला।। समस्त आनन्द और मंगलों के मूल गंगा है। वे सबको सुखी करती हैं और हर पीड़ा हर लेती हैं।

रामलीला आरम्भ होने के बाद आज यह पंद्रहवी संध्या है। प्रतिवर्ष अनन्त चतुर्दशी से यह लीला शुरू हो जाती है। और हाँ, परंपरा के अनुसार बालकांड के 175 दोहे चैपाई जिनका लीलारूप में मंचन नहीं किया जाता, उन्हें अनन्त चतुर्दशी के पहले गायन कर रस्म पूरी की जाती है। इसके लिए रामायणियों के उत्साह में कभी कोई कमी नहीं रहती। भादो कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी पर गणेश पूजन के बाद से वे रामनगर के चैक स्थित रामलीला पक्की पर बैठे उन दोहे चैपाइयों का गायन करते हैं।

काशी में गंगा के उस पार स्थित है रामनगर का दुर्ग। वहाँ रहते हैं काशी नरेश। वे हर साल रामलीला के समय गोधूली वेला में हाथी पर बैठ कर जनता के सामने आते हैं। इसके बाद षुरू होती है रामलीला – गंगा के इस पार एवं उस पार। 2013 में वहीं एक विशेष घटना घटी थी। राजा जिस हाथी पर सवार होकर आनेवाले थे, उसका कोई लाइसेन्स नहीं था। चूँकि इसतरह किसी बेजबान प्राणी को तकलीफ देना अनुचित है, इस आधार पर आदि विश्वेश्वर मंदिर का महन्त शिवशंकर  मिश्र ने वन विभाग में शिकायत की थी। नतीजा यह हुआ कि हाथी पर राजा की सवारी दो दिन के लिए टल गयी थी (प्रमोद यादव – दैनिक जागरण 20.9.13)।

कहते हैं काशी में रामलीला का शुभारंभ करनेवाले थे एक वैष्णव, नारायण दास ‘मेघाभगत’। वाल्मीकि रामायण पर आधारित यह लीला संभवतः सन् 1543 में शुरू हुई होगी। मानस की रचना तो उसके बाद यानी 1574 में हुई थी। रामनगर की रामलीला का शुभारंभ 1830 में हुआ था, और काशी की रामलीला 472 साल पुरानी है। चित्रकूट, असीघाट और रामनगर की लीलाओं को ही काशी में प्रमुख माना जाता है। 

पर एक प्रचलित कथा यह भी है कि गोस्वामीजी ने ही नारायण का नामकरण किया था – मेघा भगत। कवि के महाप्रयाण के समय वे इतना व्याकुल हो उठे थे कि आत्महत्या की बात सोचने लगे थे। तुलसीदास ने उनको समझाया और सान्त्वना दी। उनसे कहा कि अपनी जीवन नैया को भक्ति एवं निष्ठां के डाँड़ से खेने का प्रयास करो! संत के महाप्रयाण के बाद अन्न जल त्याग कर विलाप करते हुए वे जा पहुँचे अयोध्या। वहाँ स्वप्न में दो बालकों के रूप मंे उनको देव दर्शन हुआ, और वहाँ से लौटकर उन्होंने चित्रकूट की रामलीला का शुभारम्भ किया। (प्रो. राममोहन पाठक:ः आजकल. फरवरी 2006)

इन मेलों में कभी लाखों की भीड़ इकठ्ठी होती थी। इसीलिए इनको ‘लक्खी मेले’ नाम से अभिहित किया गया है। लोक जीवन में स्वाभाविक रूप से इन मेलों का अलग महत्व होता था। बड़े बूढ़ों से लेकर महिलायें एवं बच्चे – इनमें सभी की हिस्सेदारी होती थी। वे दर्शक तो थे ही, भक्त भी थे और कभी राम बारात का अंश या कभी जनक सभा में सभासद भी होते थे। इन्हीं मेलों में छोटे छोटे दुकानदार अपनी जिन्स लेकर पहुँचते थे। उनका भी कारोबार चलता था। लोग आपस में मिलते जुलते थे। वैसे अब बहुत कुछ बदल चुका है। फिर भी चेतगंज के नक्कटैया के मेले में घर आये मेहमानों की खातिरदारी के लिए घरवालों को पहले से बंदोबस्त करना पड़ता है। चूँकि मेला भले शाम तक षुरू हो जाए, पर लक्ष्मण के द्वारा सूर्पणखा की नाक कटते कटते आधी रात बीत ही जाती है, तो मेहमान उतनी रात अपने घर कैसे वापस जायेंगे? सो उनके खाने एवं ठहरने का प्रबन्ध तो अनिवार्य ही हो जाता है।

नक्कटैया के मेले के जलूस में तरह तरह से सजावट भी होती है। जैसे चित्रकूट की कुटिया के सामने राम, लक्ष्मण और सीता बैठे हैं – ऐसे दृष्यों का स्वांग या झाँकी बनाकर दूर दूर से लोेग आते हैं। फिर लाग और विमान। इनमंे पवनपुत्र द्वारा उड़कर मेघनाद के शक्तिवाण लगने से मूर्छित लक्ष्मण के लिए विषल्या या विषल्यकरणी यानी संजीवन बूटी लेने जाने का दृश्य या ऐसा ही कुछ रहता है। इसमें जो लड़का पवनपुत्र बना होता है, उसे तार के सहारे एक लोहे के स्टैंड से लटका कर रखा जाता है। उसी हालत में उसे घंटों लटके रहना पड़ता है। उधर कहीं अगर राम की वानर सेना की झाँकी प्रस्तुत की गयी है, तो अंगदादि के मुखौटे लगाकर पूरे मेकअप के साथ कई पात्र राम लक्ष्मण के पास खड़े रहते हैं।

अब जरा इस पर भी गौर फरमाइये। लोक संस्कृति की एक अनुपम ताकत होती है इसकी सम्प्रेषणीयता। कथ्य, भाश्य एवं वाचन की दृश्टि से यह जनता जनार्दन के बिलकुल नजदीक होती है। यद्यपि घटनाओं को दर्शाते समय इनमंे कोई अनपेक्षित क्राइसिस, कैथार्सिस या कथानक की सीढ़ी चढ़ने के उपरान्त कोई अनजाना क्लाइमैक्स नहीं होता, फिर भी दर्शक मंडली उसकी जानी पहचानी कहानी में ही भाव विभोर हो उठती है। उदाहरण के लिए जरा सोचिए – वन गमन के समय दर्शक यह जानता है कि आगे क्या होने वाला है, दशरथ का कौन सा हष्र होने जा रहा है, फिर भी वह हर साल जानकी की पीड़ा से, बेटे से बिछुड़ने के कारण राजा दशरथ के हाहाकार से द्रवित हो जाता है। आखिर क्यों ? यहीं पर जनता की बोली, उसकी भाशा, परंपरा, भावनायें, धार्मिक विश्वास, उसका समाज, उसकी परवरिश आदि हर एक का प्रभाव उस पर परिलक्षित होने लगता है।  

इसी बात को जरा और आगे बढ़ायें तो आप पाइयेगा कि भिन्न भिन्न समय में हमारी आजादी की लड़ाई में भी लोक संस्कृति या इन मेलों ने एक महत्वपूर्ण रोल अदा किया था। बंगाल के चारण कवि मुकुंद दास ऐसे मेलों में जाकर ही गाया करते थे,‘ हे बंगबालायें, अपनी कलाइयों से इन रेशमी चूड़ियों को फेंक दो! हे जननी, हे भगिनी, अब जागो!’ उसी तरह आदिवासी लड़ाकू नेता बिरसा मुंडा ने घोषणा की थी कि अब रावण का लंकाराज (यानी अंग्रेजी राज) खतम करने का वक्त आ गया है। मंदोदरी (इंग्लैंड की रानी) की मूर्ति को अब जला देना है! (बिरसा मुंडा:ः के.एस.सिंह. पृ.45)

और 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के बाद इन झाँकियों में ‘खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसीवाली रानी थी’ या फाँसी के तख्ते पर चढ़ते तात्या टोपे या अन्य विद्रोहियों की झाँकी भी शामिल की गयी। केवल सीधी व्यंजना नहीं, वरन व्यंग या वक्रोक्ति के जरिए भी अपनी बात कह दी जाती थी। जेम्स् प्रिन्सेप ने ‘बनारस इलस्ट्रेटेड’ में लिखा है सन् 1825 में जो रावण सेना बनायी गयी थी, उनमें बदन पर जैकेट पहने एवं सफेद मुखौटा लगाये ढेर सारे ‘राक्षस’ थे। तो इशारा किस तरफ था? हाँ, प्रिन्सेप्स साहब ने इस बारे में ‘कौनो काॅमेंट’ नहीं किया है। अक्लमंद के लिए इशारा काफी होता है। (फेस्टिवल आॅफ रामलीला)

फिर 1920 के लवण सत्याग्रह या विदेशी कपड़ों की होली को लेकर भी इन मेलों में झाँकी या स्वाॅग की रचना की गयी। आगे चलकर भगत सिंह, सुखदेव एवं राजगुरू भी इनमें किरदार के रूप में उपस्थित हो गये। फिर दूसरी सामाजिक समस्यायों पर भी इसी तरह टिप्पणी की गयी। मंदिरों में हरिजनों का प्रवेश हो, दहेज के लिए बहुओं की प्रताड़णा, उन पर जुल्म बंद हो – इन विषयों पर भी लाग या झाँकी की रचना हुई। यानी धार्मिक तत्व के अलावा अपने सामाजिक उत्तरदायित्व का भी इन मेलांे ने भरसक निर्वाह किया।  

‘‘लीला का अनूठा पक्ष है उसका उद्देष्य, उसका प्रयोजन!’ डा0 भानुशंकर  अपनी बात को इस तरह आगे बढ़ाते हैं, ‘श्रीमद्भागवत के अनुसार:- जीवस्य यः संसरतो विमोक्षणं/ न जानतोऽनर्थ वहच्छरीरतः/ लीलावतारैः स्वयश प्रदीपकं/ प्राज्वालयत्वा तमहं प्रपद्ये।

लीला का उद्देश्य है समाज-कल्याण, मानव मात्र का कल्याण, सबके लिए सुख-समृद्धि, सुख-शांति के लिए आयोजित अनुष्ठान। आधुनिक नाटक में अवसाद है, त्रासदी है, कैथार्सिस है, नहीं है तो सर्वमंगल, सर्वेभवन्तु सुखिनः की कामना।’ (आजकल – वही)

हाँ, तो साहबजान मेहरबान, रामलीला की झाँकी महिमा प्रस्तुत करते हुए मेरी कलम-लीला भी अब समापन की ओर अग्रसर है। मगर रात का ध्रुव तारा भी जब निष्प्रभ होने लगे तो लोक-संस्कृति एवं लोक-विरासत के बारे में कोशी मिथिला अंचल के रमेश कुमार का बयान भी जरा सुन लीजिए, ‘किसी भी लोक-कला, लोक-शिल्प, लोक-तकनीक के पतन की पहली शर्त है कि वह अपने लोगों के बीच में ही अपना कलात्मक महत्व को खो दे।’ (ककसाड़ – दिसंबर. 2016)

और हाँ, पर्दा गिरने से पहले यह भी तो सोचें कि आखिर एक ‘मेला’ मर क्यों जाता है? आप अगर बट-बाबा को ही काट डालिएगा, तो मेला होगा किस मैदान में ? आप अगर खनिज सम्पदा के खनन के नाम पर या तथा कथित विकास के लिए मेले वाली जमीन ही हथिया लीजिएगा, तो मेेला होगा कौने ठाँई? भले ही आप उन अभागे अशिक्षितों को उनकी जमीन की ‘कीमत’(?) अदा कर दें, मगर उनकी आगे की पीढ़ी कहाँ जायेगी? कहाँ बसेगी? क्या खायेगी? अपने बीवी बच्चों को क्या खिलायेगी? क्या आपको मालूम भी है कि इतनी बड़ी एवं निर्मम ‘नर्मदा-रामायण’ के बाद किसको कितना मुआवजा मिला? नर्मदा बचाओ आंदोलन के बारे मेें तो आपने सुना ही है। वहीं धोलेरा स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट से प्रभावित 22 गांवों के लोगों ने अहमदाबाद के लिए प्रस्तावित नहरों के लिए सरदार सरोवर प्रोजेक्ट के डिनोटिफिकेशन का विरोध किया था। आखिर नर्मदा का वह पानी गुजरात के किसानों के खेतों की प्यास नहीं बुझा रहा है, वो तो किसी नयी नगरी के निर्माण में ‘कामगार’ बन गया है (प्रीती सम्पत: दि हिन्दू 1.2.2017.)। तो ? जन ही रह नहीं जायेगा तो जन-संस्कृति के दीये जलायेगा कौन ?

रवीन्द्रनाथ ने अपने आलेखों में कई जगह (कालान्तर मंे ‘छोटो ओ बड़ो’, ‘वातायनिकेर पत्र’, फिर राजा प्रजाः समूह में ‘विरोधमूलक आदर्श’ आदि) एक ऋशि वाक्य को दोहराया है:-

अधर्मेनैधते तावत् ततो भद्राणि पश्यति,/ ततः सपत्नान् जयति समूलस्तु विनश्यति।

इसको अगर यूँ कहें:- अधर्म के जरिए कुछ लोग तो ‘बड़े आदमी’ बन जाते हैं, अधर्म में ही वे अपना कल्याण देखने लगते हैं, अधर्म से वे अपने शत्रुओं पर भी विजय प्राप्त कर लेते हैं, परंतु आखिर जड़ से ही उनका विनाश होता है।

लोक-चेतना, लोक-दृश्टि और लोक-संस्कृति के रक्षकों को भी यह नहीं भूलना चाहिए कि ‘अपनी सीता’ को पाने के लिए स्वयम् राम को जंग-ए-लंका लड़नी पड़ी थी। ‘सिंहासन’ ने पांडवांे को बिना युद्ध के सूच्यग्र मेदिनी देने से भी इनकार कर दिया था। अपने ‘हक’ के लिए उनको लड़ना पड़ा कुरुक्षेत्र का समर।

♦♦♦♦

© डॉ. अमिताभ शंकर राय चौधरी

पताः फ्लैट नं. 301, चौथी मंजिल, टावर नं 1, मंगलम आनन्दा ग्रैंड रामपुरा रोड, सांगानेर, जयपुर, 302029

मो. 9455168359, 9140214489. ईमेल: asrc.vns@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – शिवोऽहम्… (२) ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

श्रावण मास निमित्त पुनर्पाठ में पढ़िए ‘निर्वाणषटकम्‘ पर  छह अंकों की यह शृंखला-

? संजय दृष्टि – शिवोऽहम्… (२) ? ?

शिवोऽहम् के संदर्भ में आज  निर्वाण षटकम् के दूसरे श्लोक पर विचार करेंगे।

न च प्राणसंज्ञो न वै पंचवायुः

न वा सप्तधातुः न वा पंचकोशः।

न वाक्पाणिपादं न चोपस्थपायु

चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्।।

न मैं मुख्य प्राण हूँ और न ही मैं पंचप्राणों में से कोई हूँ। न मैं सप्त धातुओं में से कोई हूँ, न ही पंचकोशों में से कोई । न मैं वाणी, हाथ, अथवा पैर हूँ, न मैं जननेंद्रिय या मलद्वार हूँ।  मैं सदा शुद्ध आनंदमय चेतन हूँ, मैं शिव हूँ , मैं शिव हूँ। 

जगद्गुरु आदि शंकराचार्य के इस अद्भुत आत्मपरिचय को यथासंभव समझने का प्रयास जारी रखेंगे।

वैदिक दर्शन में प्राण को ही प्रज्ञा भी कहा गया। शाखायन आरण्यक का उद्घोष है,

यो व प्राणः सा प्रज्ञा, या वा प्रज्ञा स प्राणः

अर्थात जो प्राण है, वही प्रज्ञा है। जो प्रज्ञा है वही प्राण है।

प्राण, वायु के माध्यम से शरीर में संचरित होता है। संचरण करने वाली वायु पाँच स्थानों पर मुख्यत: स्थित होती है। इन्हें पंचवायु कहा गया है। पंचवायु में प्राण, अपान, समान, व्यान, और उदान समाविष्ट हैं।

स्थूल रूप से समझें तो प्राणवायु का स्थान नासिका का अग्रभाग माना गया है। यह सामने की ओर गति करने वाली है। प्राणवायु देह तथा प्राण की अधिष्ठात्री है। अपान का अर्थ है नीचे जाने वाली। अपान वायु गुदा भाग में होती है। मूत्र, मल, शुक्र आदि को शरीर के निचले भाग की ओर ले जाना इसका कार्य होता है। समान वायु संतुलन बनाये रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसका स्थान आमाशय बताया गया है। भोजन का समुचित पाचन इसका दायित्व है। व्यान वायु शरीर में सर्वत्र विचरण करती है। इसका स्थान हृदय माना गया है। रक्त के संचार में इसकी विशेष भूमिका होती है। उदान का अर्थ ऊपर ले जाने वाली वायु है। अपने उर्ध्वगामी स्वभाव के कारण यह कंठ, उर, और नाभि में स्थित होती है। वाकशक्ति मूलरूप से इस पर निर्भर है। 

इसी तरह त्वचा, मांस, मेद, रक्त, पेशी, अस्थि एवं मज्जा, शरीर की सप्तधातुएँ हैं। इनमें से किसी एक के अभाव में मानवशरीर की रचना  दुष्कर है। शरीर में इनका संतुलन बिगड़ने पर अनेक प्रकार के विकार जन्म लेते हैं।

अन्नमय, मनोमय, प्राणमय, विज्ञानमय, आनंदमय, शरीर के पंचकोश हैं। हर कोश का नामकरण ही उसे परिभाषित करने में सक्षम है। विभिन्न कोशों द्वारा चेतन, अवचेतन एवं अचेतन की अनुभूति होती है।

जगद्गुरु उपरोक्त श्लोक के माध्यम से अस्तित्व का विस्तार प्राण, पंचवायु, सप्तधातु, पंचकोश से आगे ले जाते हैं। तीसरी पंक्ति में वर्णित वाणी, हाथ, पैर, जननेंद्रिय अथवा गुदा तक, स्थूल या सूक्ष्म तक आत्मस्वरूप को सीमित रखना भी हाथी के जितने भाग को स्पर्श किया, उतना भर मानना है।

विवेचन करें तो मनुष्य को ज्ञात सारे आयामों से आगे हैं शिव। शिव का एक अर्थ कल्याण होता है। चिदानंदरूप शिव होना मनुष्यता की पराकाष्ठा है। इस पराकाष्ठा को प्राप्त करना, हर जीवात्मा का लक्ष्य होना चाहिए।

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© संजय भारद्वाज   

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

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इस साधना में-

ॐ नमः शिवाय का मालाजप होगा।

गोस्वामी तुलसीदास रचित रुद्राष्टकम् का पाठ करेंगे।

इस बार हम आदि शंकराचार्य के निर्वाण षटकम् / वैराग्य षटकम् का भी प्रतिदिन कम से कम एक पाठ अवश्य करेंगे।

मालाजप, रुद्राष्टकम्, निर्वाण षटकम् के साथ आत्मपरिष्कार व ध्यानसाधना भी नियमित रूप से चलेंगे।

हमारा प्रयास है कि महत्वपूर्ण स्तोत्रों का अधिकाधिक प्रसार हो।

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०६४ ⇒ पर्स ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “पर्स।)

?अभी अभी # १०६४ ⇒ आलेख – पर्स ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

पर्स का जन्म प्रिवीपर्स से हुआ है ! इसे आप प्रीवियस पर्स भी कह सकते हैं। यह तो हुई राजा महाराजाओं वाली बात। आम आदमी की कमीज़ में एक खीसा होता था, जिसमें पइसा रखा जाता था। मुद्रा के प्रचलन के इतिहास में शासकों के सिक्के ही चलते थे, जिन्हें थैलियों में रखा जाता था। मोहर, दीनार का ज़माना था वह।

चीन से हम मोबाइल ही नहीं, paytm भी लाए ! यह तो हुई आज की बात। पेपर करेंसी का जन्मदाता भी सुना है, चीन ही है। प्रोनोट और नोट, दोनों अंग्रेजों की देन है। हम लोग हुंडी वाले हैं। याद कीजिये, नरसिंह भगत की हुंडी और नानी बाई को मायरो। ।

पर्स नाम से ही लेडीज़ लगता है ! इसलिए पुराने समय में मर्द लोग बटुआ रखते थे। आज भी दुकानदार पर्स को लेडीज पर्स ही बोलता है। पुरुष वॉलेट जो रखने लग गए हैं। जब किसी का पर्स खोता है, तो वह कॉमन जेंडर हो जाता है। लेडीज पर्स छीना जाता है, जेंट्स पर्स या तो कोई हिप पॉकेट से निकाल लेता है, या कहीं गिर जाता है।

पर्स लेडीज हो या जेंट्स, एक ऐसी बहुउद्देशीय युक्ति है, जिसमें पैसे के अलावा बहुत कुछ रखा जाता है। कुछ पुरुषों का वॉलेट तो इतना भारी और मोटा हो जाता है, मानो वह उनके शरीर का ही एक अंग हो। बहुत सारे विज़िटिंग कार्ड, आधार, क्रेडिट, डेबिट कार्ड, घर के सामान की सूची के बाद अगर कुछ जगह बचे तो कुछ नकद रुपए।

महिलाओं के पर्स की तो पूछिये ही मत। पूरी गृहस्थी साथ लेकर चलनी पड़ती है। एक समय था, जब हर कामकाजी महिला के पर्स में एक ऊन का गट्टा और सलाइयाँ अवश्य होती थी। जहाँ भी समय मिला, ज़ुबाँ से तेज उंगलियाँ चलती थी। अनाधिकारिक तौर से इसे भी ऑफिस वर्क का ही हिस्सा माना जाता था। आखिर होता तो यह भी एक ज़रूरी काम ही था न। स्कूल और सरकारी दफ्तरों के कार्यालयीन समय में स्वेटर और गर्म कपडों का आँकड़ा अगर न भी उपलब्ध हो, तो भी यह राष्ट्रीय उत्पाद का एक बहुत बड़ा हिस्सा है, वह भी बिना हींग और फिटकरी के। ।

जब से मुआ मोबाइल और कंप्यूटर आया है, न तो पर्स में ऊन के लिए इतनी जगह बची है, और न ही दफ़्तर में इतना टाइम ! हर समय कंप्यूटर पर आँखें, और की बोर्ड पर उंगलियाँ चलानी पड़ती हैं।

जब से इंडिया डिजिटल हुआ है, और कैशलेस इकॉनमी हुई है, पर्स और बटुए का औचित्य खत्म ही हो गया है। लेकिन पर्स हल्के होने के बजाय अब और भारी होने लग गए हैं।

पर्स की ज़िम्मेदारी बढ़ने के साथ ही इनकी कीमतों में भी इज़ाफ़ा हुआ है। पर्स में जितनी जेब हों, उतना अच्छा। जितने घर की अलमारी में खाने होते हैं, उतनी जगह तो पर्स में होनी ही चाहिए। अलमारी में अगर ताला है, तो पर्स में चेन। इधर चेन खराब, तो उधर जीया बैचेन। आखिर एक चलती फिरती अलमारी ही तो है पर्स। ।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – शिवोऽहम्… (१) ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

श्रावण मास निमित्त पुनर्पाठ में आज से  पढ़िए ‘निर्वाणषटकम्’ पर  छह अंकों की यह शृंखला-

? संजय दृष्टि – शिवोऽहम्… (१) ? ?

।। चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्।।

गुरु द्वारा परिचय पूछे जाने पर बाल्यावस्था में जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा दिया गया उत्तर निर्वाण षटकम् कहलाया। वेद और वेदांतों का मानो सार है निर्वाण षटकम्। इसका पहला श्लोक कहता है,

मनोबुद्ध्यहङ्कार चित्तानि नाहं

न च श्रोत्रजिह्वे न च घ्राणनेत्रे ।

न च व्योम भूमिर्न तेजो न वायुः

चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥

मैं न मन हूँ, न बुद्धि, न ही अहंकार। मैं न श्रवणेंद्रिय (कान) हूँ, न स्वादेंद्रिय (जीभ), न घ्राणेंद्रिय (नाक) न ही दृश्येंद्रिय (आँखें)। मैं न आकाश हूँ, न पृथ्वी, न अग्नि, न ही वायु। मैं सदा शुद्ध आनंदमय चेतन हूँ, मैं शिव हूँ , मैं शिव हूँ।

मनुष्य का अपेक्षित अस्तित्व शुद्ध आनंदमय चेतन ही है। आनंद से परमानंद की ओर जाने के लिए, चिदानंद से सच्चिदानंद की ओर जाने के लिए साधन है मनुष्य जीवन।

सर्वसामान्य मान्यता है कि यह यात्रा कठिन है। असामान्य यथार्थ यह  कि यही यात्रा सरल  है।

इस यात्रा को समझने के लिए वेदांतसार का सहारा लेते हैं जो कहता है कि अंत:करण और बहि:करण, इंद्रिय निग्रह के दो प्रकार हैं।  मन, बुद्धि और अहंकार अंत:करण में समाहित हैं। स्वाभाविक है कि अंत:करण की इंद्रियाँ देखी नहीं जा सकतीं, केवल अनुभव की जा सकती हैं। संकल्प- विकल्प की वृत्ति अर्थात मन, निश्चय-निर्णय की वृत्ति अर्थात बुद्धि एवं स्वार्थ-संकुचित भाव की वृत्ति अर्थात अंहकार। इच्छित का हठ करनेवाले मन, संशय निवारण में महत्वपूर्ण भूमिका निभानेवाली बुद्धि और अपने तक सीमित रहनेवाले अहंकार की परिधि में मनुष्य के अस्तित्व को समेटने का प्रयास हास्यास्पद है।

बहि:करण की दस इंद्रियाँ हैं। इनमें से चार इंद्रियों आँख, नाक, कान, जीभ तक मनुष्य जीवन को बांध देना और अधिक हास्यास्पद है।

सनातन दर्शन में जिसे अपरा चेतना कहा गया है, उसमें निर्वाण षटकम् के पहले श्लोक में निर्दिष्ट आकाश, भूमि, अग्नि, वायु, मन, बुद्धि, अहंकार जैसे स्थूल और सूक्ष्म दोनों तत्व सम्मिलित हैं। अपरा प्रकृति केवल जड़ पदार्थ या शव ही जन सकती है। परा चेतना या परम तत्व या चेतन तत्व या आत्मा का साथ ही उसे चैतन्य कर सकता है, चित्त में आनंद उपजा सकता है, चिदानंद कर सकता है।

आनंद प्राप्ति में दृष्टिकोण महत्वपूर्ण है। दृष्टिकोण में थोड़ा-सा परिवर्तन, जीवन में बहुत बड़ा परिवर्तन लाता है। मनुष्य का अहंकार जब उसे भास कराने लगता है कि उसमें सब हैं, तो यह भास, उसे घमंड से चूर कर देता है। दृष्टिकोण में परिवर्तन हो जाए तो वह धन, पद, कीर्ति पाता तो है पर उसके अहंकार से बचा रहता है। वह सबमें खुद को देखने लगता है। सबका दुख, उसका दुख होता है। सबका सुख, उसका सुख होता है। वह ‘मैं’ से ऊपर उठ जाता है।

यूँ विचार करें करें कि जब कोई कहता है ‘मैं’ तो किसे सम्बोधित कर रहा होता है? स्वाभाविक है कि यह यह ‘मैं’ स्थूल रूप से दिखती देह है। तथापि यदि आत्मा न हो, चेतन स्वरूप न हो तो देह तो शव है। शव तो स्वयं को सम्बोधित नहीं कर सकता। चिदानंद चैतन्य, शव को शिव करता है  और जगद्गुरु आदि शंकराचार्य के शब्द सृष्टि में चेतनस्वरूप की उपस्थिति का सत्य, सनातन प्रमाण बन जाते हैं।

इसीलिए कहा गया है, ‘शिवोहम्’,..मैं शिव हूँ..’मैं’ से शव का नहीं शिव का बोध होना चाहिए। यह बोध मानसपटल पर उतर आए तो यात्रा बहुत सरल हो जाती है।

यात्रा सरल हो या जटिल, इसमें अभ्यास की बड़ी भूमिका है। अभ्यास के पहले चरण में निरंतर बोलते, सुनते, गुनते रहिए, ‘शिवोऽहम्।’

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© संजय भारद्वाज   

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ पावस ऋतु के विषैले जीव: पहचान, संरक्षण और सुरक्षा ☆ डाॅ राकेश सक्सेना ☆

डाॅ राकेश सक्सेना

(डाॅ राकेश सक्सेना जी पूर्व सदस्य हिंदी सलाहकार समिति, खान मंत्रालय, भारत सरकार, जेएलएन पी०जी० काॅलेज, एटा से हिंदी विभागाध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त हैं। कनाडा, भूटान, नेपाल, श्रीलंका, ताशकंद आदि देशों की विदेश यात्राएँ। 07 मौलिक कृतियां, 20 सम्पादित, अनगिनत पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित.  आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख  – पावस ऋतु के विषैले जीव: पहचान, संरक्षण और सुरक्षा।)

☆ आलेख – पावस ऋतु के विषैले जीव: पहचान, संरक्षण और सुरक्षा ☆ डाॅ राकेश सक्सेना ✍

भारतीय ऋतुचक्र में पावस केवल हरियाली, कृषि समृद्धि तथा वर्षा का ही नहीं, यह जैव विविधता की दृष्टि से भी अत्यन्त सक्रिय और रचनात्मक काल होता है। महीनों से सूखी मिट्टी में सोए हुए बीज अंकुरित हो जाते हैं, हिरण-लोमड़ी इसी मौसम में पैदा होते हैं, मेंढ़क-टोड प्रजनन शुरू कर देते हैं, तितलियाँ, मधुमक्खी, दीमक, जुगनू की संख्या कई गुना बढ़ जाती है, नदियाँ- तालाब पानी से भर जाते हैं और इसी समय अनेक विषैले जीव — साँप, बिच्छू, मकड़ियाँ और कनखजूरे अपने आवासों से निकलकर  बस्तियों में दिखाई देने लगते हैं। परिणामस्वरूप सर्प एवं बिच्छूदंश जैसी अनेक घटनाएँ घटित होने लगती हैं। इस ऋतु में तापमान, आर्द्रता और नमी बढ़ जाती है। वर्षा के कारण बिलों में पानी भर जाता है, प्रजनन काल आरम्भ होने व भोजन की उपलब्धता बढ़ने से ये विषैले जीव मानव-आवासों की ओर बढ़ जाते हैं।

भारत में तीन सौ से अधिक साँपों की प्रजातियाँ पाईं जाती हैं, जिनमें लगभग साठ प्रजातियाँ अधिक विषैली होती हैं। भारतीय कोबरा, सामान्य करैत, रसेल वाइपर, साॅस्केल्ड वाइपर सर्वाधिक घातक सर्प होते हैं। अधिकांश सर्पदंश की घटनाएँ इन्हीं से सम्बन्धित होती हैं। बिच्छू की भी यहाँ सौ से अधिक प्रजातियाँ पाईं जाती हैं। लाल और काले बिच्छुओं का डंक अत्यधिक घातक व पीड़ादायक होता है। यहाँ की अधिकांश मकड़ियाँ विषैली किन्तु हानिरहित होती हैं। कुछ प्रजातियों का विष त्वचा व स्नायुतंत्र को प्रभावित करता है। कनखजूरा का विष भी प्राणघातक तो नहीं होता किन्तु पीड़ा, सूजन तथा एलर्जी उत्पन्न करता है। ततैया, बर्र, मधुमक्खियाँ तथा इल्ली भी विषैला प्रभाव उत्पन्न करती हैं। सभी विषैले साँपों का विष एक जैसा नहीं होता। कुछ का विष मस्तिष्क और स्नायुतंत्र को प्रभावित करता है जिसमें पलकें झुक जाती हैं, बोलने में कठिनाई, साँस लेने में परेशानी व माँसपेशियाँ शिथिल हो जाती हैं। नाग और करैत का विष इसी प्रकार होता है। कुछ का रक्त पर प्रभाव पड़ता है, रक्त के थक्के बनने की क्षमता को प्रभावित करता है। मसूड़ों से रक्तस्राव, मूत्र में रक्त, गुर्दों पर दुष्प्रभाव आदि इनके लक्षण होते हैं। रसेल वाइपर इसका प्रसिद्ध उदाहरण है। कुछ सर्पों का विष ऊतकों को क्षति पहुँचाता है। यह विष काटे गए स्थान की कोशिकाओं को नष्ट करता है। तीव्र सूजन, फफोले, संक्रमण,ऊतकों का नष्ट होना इसके प्रमुख लक्षण होते हैं।

ये विषैले जीव जहाँ एक ओर हानिकारक हैं वहाँ दूसरी ओर पारिस्थितिकी में उपयोगी घटक भी हैं। साँप एक वर्ष में सैकड़ों चूहों को खा जाते हैं। यदि ये नहीं होंगे तो कृषि को नुकसान होगा, अनाज भंडारण कठिन होगा, चूहों से फैलने वाले रोगों में वृद्धि होगी। सर्प स्वयं खाद्य श्रृंखला का हिस्सा है। ये स्वयं गरुड, मोर, नेवला, उल्लू जैसे जीवों के भोजन बनते हैं। इनके विष से अनेक औषधियों के विकास पर अनुसंधान हो रहा है। भारत में अधिकांश साँप वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 के अंतर्गत संरक्षित हैं। इनका शिकार, अवैध व्यापार, अनावश्यक हत्या दण्डनीय अपराध माना गया है। यदि किसी घर या परिसर में ये दिखाई दें तो मारने के बजाय प्रशिक्षित वन विभाग अथवा अधिकृत सर्परक्षक को सूचना देना उचित बताया गया है।

पावस ऋतु में इन विषैले जीवों से स्वयं को बचाना अति आवश्यक है। दुर्घटनाओं से बचाव हेतु रात को टाॅर्च का उपयोग करें, ऊँचे जूते पहनकर खेतों में जाएँ, हाथ डालने से पूर्व लकड़ी,घास या पत्थरों को डण्डे से हटाएँ, झाड़ियाँ- कचरा आसपास न रखें, दरवाजों और खिड़कियों की दरारें बंद रखें। सर्पदंश से होने वाली अनेक मौतें समय पर उपचार न मिलने के कारण होती हैं। गाँवों में आज भी कई लोग झाड़- फूँक, ताबीज, मंत्र व घरेलू नुस्खों पर भरोसा करते हैं, जिससे बहुमूल्य समय नष्ट हो जाता है। घाव को चाकू से काटना, विष चूसने का प्रयास करना, बर्फ लगाना, बहुत कसकर पट्टी बाँधना, झाड़- फूँक, रोगी को शराब पिलाना इन उपायों से लाभ नहीं होता, स्थिति गंभीर हो जाती है। समय पर अस्पताल पहुँचने से रोगियों का सफल उपचार सम्भव है। अत: सर्पदंश केवल वन्यजीवों से जुड़ी समस्या ही नहीं, जनस्वास्थ्य, ग्रामीण चिकित्सा व्यवस्था, समय पर उपचार और जनजागरूकता से भी जुड़ा विषय है। जब समाज ज्ञान और जागरूकता को अपनाएगा तभी पावस ऋतु की हरियाली के साथ मानव और वन्यजीवों का संतुलित सहअस्तित्व सुरक्षित रह सकेगा।

©  डाॅ राकेश सक्सेना

पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष, 68, शान्तीनगर, एटा ( उ०प्र० ) 207001

मोबाइल: 94122 82235

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