हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३०५ ☆ व्यंग्य – उत्कोच-स्वीकारक महासंघ की विशेष सभा ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम एवं विचारणीय व्यंग्य – ‘उत्कोच-स्वीकारक महासंघ की विशेष सभा’। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३०५ ☆

☆ व्यंग्य ☆ उत्कोच-स्वीकारक महासंघ की विशेष सभा

‘अखिल भारतीय उत्कोच-स्वीकारक महासंघ’ की एक आपात्कालीन बैठक हुई। कारण यह था कि रिश्वतखोरी का एक मामला सनसनीखेज़ हो गया था। यों तो रिश्वतखोरी अब सनसनीखेज़ रही नहीं। रिश्वतखोरी में पकड़े जाने की कोई खबर छपे तो लगता है अखबारों को खबरों का टोटा पड़ गया।

लेकिन इस बार मामला सनसनीखेज़ इसलिए हो गया कि एक आदमी सामान्य कुर्ता, धोती, जूते पहने एक दफ्तर में घुसा। जब बाहर आया तो कपड़े जूते गायब थे। सिर्फ चड्डी बाकी थी। यह भी सामान्य बात थी, ऐसा तो होता ही है। लेकिन बाहर खड़े चपरासी ने झपटकर उसकी चड्डी भी उतार ली। आदमी मादरज़ात नंगा हो गया। कोई शर्मदार आदमी था। लगता है रिश्वत के अदब- कायदे का अभ्यास नहीं था। वह पच्चीस कदम दूर  नीम के पेड़ तक गया और वहीं ढेर हो गया। उसका हार्टफेल हो गया। इस युग में शर्मदारों का यही हश्र होता है।

बात ने तूल पकड़ा। अखबारों ने मामले को उछाला। लिखा कि अब हद हो गयी, पानी सर के ऊपर से गुज़र गया, रिश्वतखोरी कोढ़ है, कैंसर है, समाज के लिए अभिशाप है, वगैर:वगैर:। वही बातें जो सदियों से दुहराई जा रही हैं।

मजबूरन ‘अखिल भारतीय उत्कोच- स्वीकारक महासंघ’ की कार्यकारिणी की आपात्कालीन बैठक बुलायी गयी।

महासंघ के अध्यक्ष पवित्र नारायण बोले, ‘भाइयो, यह बैठक बुलाने का कारण यह है कि हमारे समाज-सेवा के काम में एक बाधा उत्पन्न हो गयी है। एक आदमी हमारे महासंघ के सदस्यों से सेवा प्राप्त करके कार्यालय से बाहर निकला और वहीं स्वर्गवासी हो गया। वैसे मृत्यु से बढ़कर मामूली और अनिवार्य घटना मनुष्य के जीवन में दूसरी नहीं है। फिर, जहां सौ काम सफलता से होते हैं वहां एकाध गड़बड़ी भी होती है। लेकिन अखबार वाले खामखां मामले को उछाल रहे हैं। हमें बदनाम कर रहे हैं। इसीलिए यह बैठक बुलायी है कि हम विचार करें कि अपने काम करने के तरीके में कौन सा परिवर्तन करें कि इन ऐरे-गैरे लोगों को मुंह खोलने का मौका न मिले।’

कार्यकारिणी के एक सदस्य दयाराम बोले, ‘इस बात का क्या प्रमाण है कि वह आदमी रिश्वत देने के कारण मरा? हो सकता है उसे रक्तचाप या दिल की कोई बीमारी रही हो।’

पवित्र नारायण बोले, ‘पोस्टमार्टम से यह बात पता चली है कि वह किसी रोग का रोगी नहीं था। वह अकस्मात मानसिक धक्के से मरा।’

दूसरे सदस्य दीनानाथ बोले, ‘यह कहां साबित होता है कि वह मानसिक धक्का रिश्वत का ही था? हो सकता है उसे किसी पारिवारिक समस्या या दुश्चिंता का धक्का लगा हो।’

महासंघ के महासचिव करुणानिधान बोले, ‘अरे भई, बेपर की मत हांको।  सब ने उसे दफ्तर से नंगे निकलते और मरते देखा।’

दयाराम और दीनानाथ चुप हो गये। अध्यक्ष पवित्र नारायण का जीवन उत्कोच की कृपा से सभी सिद्धियों और फलों से भर चुका था। एक तरह से वे अघा चुके थे। बोले, ‘मेरे खयाल से हमारे कुछ सदस्य आजकल अति करने लगे हैं। कई लोग रातों-रात करोड़पति बन जाना चाहते हैं। इसीलिए हमारे महासंघ की बदनामी होती है। मैं सोचता हूं अब हमें कुछ समय के लिए कुछ ऐसा करना चाहिए कि लोगों को यह भ्रम हो कि हमें राष्ट्र की चिन्ता है। हमारे ऊपर जो कीचड़ उछाला जा रहा है उसे साफ करना भी ज़रूरी है। इस संबंध में मैं आपसे सुझाव आमंत्रित करता हूं।’

कार्यकारिणी के एक सदस्य धर्मदास काफी रिश्वत खा चुकने के बाद अब धीरे-धीरे अध्यात्म की ओर मुड़ रहे थे। वे उठकर बोले, ‘मेरा सुझाव है कि हमें गरीबी की रेखा से नीचे रहने वालों से रिश्वत लेना बन्द कर देना चाहिए।’

एक दूसरे सदस्य नेकराम चिढ़ कर बोले, ‘तुम रहे मूसर के मूसर। गरीबी की रेखा से नीचे रहने वालों की लिस्ट कहां से लाओगे? फिर हमारे देश में यह खराब प्रवृत्ति है कि एक वर्ग को जो सुविधा दी जाए वह दूसरे वर्ग भी मांगने लगते हैं। उससे हम भारी संकट में पड़ जाएंगे। हम हमेशा समानता और गुटनिरपेक्षता के सिद्धान्तों पर चले हैं और उन्हीं पर अटल रहेंगे।’

‘मूसर’ संबोधन से नाराज़ होकर धर्मदास नेकराम से उलझ गये। थोड़ी देर तूतू- मैंमैं हुई। अध्यक्ष महोदय ने उन्हें शान्त किया।

नेकराम खड़े होकर बोले, ‘मेरे खयाल से तो हमें अपनी कार्य प्रणाली में परिवर्तन करने की कोई ज़रूरत नहीं है। हर मिनट हजारों लोग मरते हैं, इसके लिए विचलित होने की ज़रूरत नहीं है। हमारा तौर तरीका ठीक है इसीलिए हमारी सदस्य-संख्या में दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ोत्तरी हुई है। जो रिश्वत नहीं लेता उस पर लोग हंसते हैं। इसलिए मेरी समझ में तो इस बैठक की ही कोई ज़रूरत नहीं थी। वी आर सिंप्ली वेस्टिंग अवर प्रेशस टाइम। इतनी देर में तो हम जनता के सहयोग से दस बीस हजार  रुपये खड़े कर लेते।’

पवित्र नारायण सिर हिला कर बोले, ‘नहीं नहीं, कुछ न कुछ तो करना होगा। मेरे खयाल से हम सरकार को प्रस्ताव भेजें कि हम रिश्वतखोरी छोड़ने को तैयार हैं, बशर्ते कि सरकार हमें वैसा ही ‘नॉन प्रैक्टिसिंग अलाउंस’ दे जैसा वह प्राइवेट प्रैक्टिस न करने वाले डॉक्टरों को देती है।’

दयाराम बोले, ‘नॉन प्रैक्टिसिंग अलाउंस किस आधार पर तय होगा?’

अध्यक्ष ने जवाब दिया, ‘पद के हिसाब से तय हो जाएगा।’

नेकराम अपना हाथ उठाकर बोले, ‘मुझे इसमें एतराज़ है। मैं अफसर न होते हुए भी किसी अफसर से ज्यादा रिश्वत पैदा करता हूं। इसलिए पद के हिसाब से अलाउंस लेने के प्रस्ताव को मैं तुरंत रिजेक्ट करता हूं।’

अध्यक्ष महोदय सोच में पड़ गये। बोले, ‘अच्छा तो फिलहाल ऐसा करते हैं कि महासंघ की ओर से ‘उत्कोच त्याग पखवाड़ा’ घोषित करते हैं। इस पखवाड़े में कोई सदस्य रिश्वत नहीं लेगा। इस पखवाड़े का जोरदार प्रचार किया जाए।’

दीनानाथ बोले, ‘कोई अपनी मर्जी से दे तब भी न लें?’

अध्यक्ष बोले, ‘बिलकुल नहीं।’

दीनानाथ का मुंह बिगड़ गया।

एक और घाघ सदस्य दस्युदास चुपचाप बैठे मुंह में पान की जुगाली कर रहे थे। रिश्वत लेने के मामले में वे घोर सिद्धांतवादी थे। बाप का काम भी बिना रिश्वत लिये नहीं करते थे। उन्हें अब तक की सारी बातें निरर्थक और हास्यास्पद लग रही थीं।

एकाएक वे चोंच ऊपर उठाकर बोले, ‘हम फालतू बातों में अपना कीमती वक्त बर्बाद कर रहे हैं। आज की बैठक में हमें सिर्फ उस महान आदमी की मौत का शोक करना चाहिए जो हमारा कल्याण करते हुए काम आया। बेचारा कमज़ोर दिल का था। ऐसे कमज़ोर दिल वालों को आज की दुनिया में जन्म नहीं लेना चाहिए। सब लोग उठें और एक मिनट का मौन धारण करके दिवंगत आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करें।’

अध्यक्ष महोदय प्रस्ताव से निरुत्तर हो गये। सब उठकर आंख मूंद कर खड़े हो गये। एक मिनट तक ईश्वर से प्रार्थना करते रहे कि वह सब प्राणियों को रिश्वत का धक्का सहने की शक्ति प्रदान करे।

मौन के बाद दस्युदास बोले, ‘हम एक शोक-प्रस्ताव दुखी परिवार को भेजें। सुना है मरने वाला पांच हजार रिश्वत देकर मरा था। भला आदमी था। महासंघ उसके प्रति कृतज्ञ है। मेरा प्रस्ताव है कि उस पांच हजार में से दो हजार रुपया  सहानुभूति-राशि के रूप में दुखी परिवार को दिया जाए और इस बात का बाकायदा प्रचार हो ताकि हमारे महासंघ के बारे में लोगों के भ्रम दूर हों।’

यह प्रस्ताव सर्वसम्मति से स्वीकृत हो गया। दस्युदास आगे बोले, ‘शोक प्रस्ताव के बाद कोई कार्यवाही नहीं होती, इसलिए आज की बैठक समाप्त की जाए। पखवाड़ा अखवाड़ा मनाने के प्रस्ताव पर विचार करने के लिए दो-चार माह बाद फिर बैठक रखी जाए।’

फिर एक आंख दबाकर बोले, ‘तब तक मामला ठंडा भी हो जाएगा।’

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ६४ – और रिश्तों की असली दूरी ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार, बाल साहित्य लेखक, और कवि हैं। उन्होंने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज, और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने, और समन्वय करने में महत्वपूर्ण कार्य किया है। उनके ऑनलाइन संपादन में आचार्य रामचंद्र शुक्ला के कामों के ऑनलाइन संस्करणों का संपादन शामिल है। व्यंग्यकार डॉ. सुरेश कुमार मिश्र ने शिक्षक की मौत पर साहित्य आजतक चैनल पर आठ लाख से अधिक पढ़े, देखे और सुने गई प्रसिद्ध व्यंग्यकार के रूप में अपनी पहचान स्थापित की है। तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (तेलंगाना, भारत, के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से), व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान (आदरणीय सूर्यबाला जी, प्रेम जनमेजय जी, प्रताप सहगल जी, कमल किशोर गोयनका जी के करकमलों से), साहित्य सृजन सम्मान, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करकमलों से और अन्य कई महत्वपूर्ण प्रतिष्ठात्मक सम्मान प्राप्त हुए हैं।

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय व्यंग्य रचना और रिश्तों की असली दूरी)  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ६४ – और रिश्तों की असली दूरी ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

कभी-कभी लगता है कि हमने जन्मपत्री गलत जगह से बनवा ली। थोड़ी-सी गड़बड़ी होती तो हम उस जमाने में पैदा होते जब चिट्ठी लिखने में स्याही सुखाने का सब्र चाहिए था, और जवाब आने में इतनी देर कि आदमी अपनी दाढ़ी को कर्जदार समझकर काटना भूल जाए। तब लोग समझाते थे—“धैर्य रखो।” आज वही बगुला-भगत व्हाट्सऐप पर ‘सीन’ दिखते ही ऐसे तमतमाते हैं जैसे संसद में घूस खाते पकड़े गए हों। तब जवाब में महीनों का सांप-सीढ़ी खेल होता था, अब घंटों का। फर्क बस इतना कि तब इंसान ‘मुलाक़ात’ करता था और अब ‘निगाहबानी की नीली टिक’ करता है। पुराना जमाना एक लंबी प्रतीक्षा-यात्रा था, और आज का जमाना ‘तुरंत खाओ और डकार लो’। धैर्य अब शब्दकोश में बंद पड़ा है, उतना ही अनुपयोगी जितना सरकारी दफ्तर में रखी इन्वेस्टमेंट गाइडलाइन।

बचपन की अलमारी याद आती है—जिसकी चाबी माँ के पास और जिज्ञासा हमारे पास। उस ताले की खटाखट से हमें लगता था मानो किसी ऐतिहासिक किला-कुंडली का रहस्य खुल गया हो। ऊपर सरकारी आदेशों जैसी सुनहरी लकीरों से भरी नोटबुकें, और नीचे दबा-छिपा शक्करपारे का लोकतांत्रिक खज़ाना। वह अलमारी किसी ‘म्यूज़ियम’ नहीं, बल्कि घर का लघु संसद थी—जहाँ मिठाई और ज्ञान दोनों पर ‘माँ की एकल पार्टी’ का कब्ज़ा था। आज की आधुनिक अलमारियाँ क्या हैं? अमेज़न के ‘कार्ट’ जैसी—हमेशा भरी हुई लेकिन रहस्य शून्य। अब अलमारी खोलकर रस नहीं मिलता, बस डिलीवरी बॉक्स खोलकर प्लास्टिक का झुनझुना मिलता है। सच कहें तो पुरानी अलमारी के भीतर इतना रोमांच था कि इंडियाना जोन्स भी शर्म से इस्तीफा दे देता। अब तो पूरी ‘रहस्यमयी दुनिया’ उस जगह दफ़न है, जहाँ लोग पासवर्ड भूल जाते हैं और कंपनी ईमेल पर चिल्लाती है—“पासवर्ड रीसेट करिए।”

पुराने ज़माने की छुट्टियाँ रिश्तेदारों की भीड़ से शुरू होती थीं। घर किसी संसद की तरह गरम हो जाता था और पंखे के पंखों को घुमाने का अधिकार किसी ‘कैबिनेट मिनिस्टर’ जितना महत्वपूर्ण काम होता। बढ़िया लोकतंत्र था—झोंके के लिए झगड़ा और संतुलन बैठाने को दिलासा। आज हर कमरे में एसी है, हर हाथ में रिमोट है, पर माहौल फिर भी गरमाया हुआ रहता है, क्योंकि रिश्ते अब स्क्रीन पर इमोजी निकालते हैं। तब गले लगने में पसीना आता था और मोहल्ले में खबर फैलती थी कि ‘रिश्ता आया है’। अब सिर्फ़ एक कमेन्ट आता है—“बहुत अच्छे लग रहे हो।” बिना आलिंगन वाली प्रशंसा उतनी ही बेकार है जितनी बिना घी की जलेबी। तब की चख-चख वाली गर्माहट भी मीठी थी, आज की खामोशी वाली ठंडक भी कड़वी है। परिवार का ‘संस्थागत ढाँचा’ अब लाइक-बटन की सरकारी मुहर से चलता है।

“बड़ों का पैर छूने से ज्ञान मिलता है”—ये वाक्य हमें बचपन से ठोंक-पीटकर पढ़ाया गया। हमने न जाने कितने पैर छुए, और बदले में सिर्फ़ यही ज्ञान मिला कि “पैरों से बदबू आती है।” अब नई पीढ़ी ने इस परंपरा को चाय की प्याली की तरह हल्के से रख दिया है। वे पैर क्या छुएँगे, उन्होंने फ़ॉन्ट साइज इतना बड़ा कर दिया है कि बड़ों की धुँधली आँखें भी इन्फ्लेशन का चार्ट पढ़ सकें। आशीर्वाद? वो अब व्हाट्सऐप पर ‘जय श्री रैम’ का फॉरवर्ड बन चुका है। पहले कहते थे—“बड़ों का स्पर्श आत्मा को पवित्र करता है।” आज आत्मा नहीं, फेसबुक प्रोफ़ाइल पिक्चर पवित्र करनी की ज़रूरत है। तब पैर छूने में रीढ़ की हड्डी झुकती थी, अब मोबाइल झुकाकर ‘लाइक’ दे दिया जाता है। फर्क बस इतना है कि तब आशीर्वाद महँगा था और अब मुफ्त ‘गुड मॉर्निंग’ मैसेज सारे सवेरे में फैलता है।

पुराना रेडियो याद है? जब ‘समाचार’ सुनाने वाला खुद बोलने से पहले तौलता था, जैसे कोई वकील अदालत में बयान देता है। अखबार में ‘संपादकीय’ ऐसे छपता था जैसे ईश्वर के उपदेश हों। तब हमें सच आधा मिलता था, मगर उसमें शांति थी, क्योंकि आवाज़ें कम थीं। आज? अब तूफानी चैनल आधा सच भी पूरे दहाड़कर परोसते हैं, और बाद में कहते हैं—“घटना हुई ही नहीं।” यही प्रगति है—झूठ भी उसी जोश से बोला जाता है जैसे पहले सच। पहले संपादक धूल झाड़ता था, अब एंकर लार झाड़ता है। फर्क इतना है कि तब समाचार शांत बाण था, और अब पाँच पंडित मिलकर वही अधूरा सच “ब्रेकिंग” करके परोसते हैं। ब्रेकिंग आमतौर पर खबर कम और चायपत्ती ज़्यादा होती है। आज समाचार वो है जिसमें शोर इतना हो कि मक्खी की भनभन भी चुनाव का मुद्दा बन जाए।

स्कूल की बात करें तो मास्टरजी की तख्ती पर चाक की लकीरें और उनकी धूल ने बच्चों के छल-छिपे ज्ञान को गढ़ा था। वे चाक इतने ईमानदार होते थे कि हर सवाल पर धूल झाड़ते-झाड़ते अपनी सफेदी इतनी बढ़ा देते थे कि सफाई कर्मचारी संघ ने हड़ताल की सोच ली थी। पर वह सफेदी ही असली थी—तख्ती पर लिखावट ज्यों की त्यों छोड़ती अक्स वाली। आज के स्मार्ट क्लास में प्रोजेक्टर और टचपेन भले हों, पर बच्चों की बुद्धि से तेज़ तो पिक्सेल ही रहती हैं। इस विकास का सच ये है कि बचपन की मासूमियत ने “एप के नये वर्ज़न” का स्वागत किया है लेकिन अभी भी समझ नहीं पाया कि इस नवाचार से न तो ज्ञान बढ़ा, न ही शिक्षक के माथे की शिकन कम हुई। पढ़ाई का खेल अब लुकाछिपी नहीं, बस नोटिफिकेशन के बीच का युद्ध है, जिसमें बच्चे ‘डिस्टर्ब’ पाए बिना फोन छीनने की कला में पारंगत हो रहे हैं।

*

गली-मोहल्ले की याद आ रही है? शाम को गोलगप्पे वालों की ठेलियाँ चलती थीं, बच्चे दौड़ते थे जैसे नोबेल इनाम के लिए आवेदन कर रहे हों। चटकारे होते थे स्वाद के और झगड़े थे ठेला को लेकर—“मेरे में ज्यादा आलू, तेरे में कम पानी।” दुकानदार बापू बहुत धीरज के साथ कहते—“बेटा, सबका बराबर मिलेगा।” यह तब का बड़ा lesson था—सबको बराबर हो सकता है। अब तो ग्राहक एक सितारा दे देता है ‘कस्टमर टू साल्टी’, और दुकानदार भी ऐप की रेटिंग देखता है। वहां से रोज़ चरस टपकती रहती है और मोहल्ला सोशल मीडिया की तरह आगंतुकों की निंदा करता रहता है। आज का गोलगप्पा वाला ऐप चला रहा है, क्रिकेट के स्कोर के साथ लेन-देन, और बच्चे घर बैठे टेक्स्ट पर लड़ाई कर रहे हैं। यहीं है असली विकास—गोलगप्पा पर झगड़ा ऐप पर, और ठेले पर एक-दूसरे को म्यूट।

सिनेमा हॉल का जमाना भी बड़ा मज़ेदार था। बीच-बीच में फिल्म रुकती थी, ऑपरेटर धुआँ छुपाने का बहाना करता, और दर्शक सीट से उठकर कुर्सी भगाते। लेकिन जैसे ही फिल्म वापस चलती, सब अपने पुराने मोह में डूब जाते। वहीं खत्म होता मनोरंजन का असली नशा। आज का युग नेटफ्लिक्स और यूट्यूब का है, जहां अगर पचास सेकंड का एड भी आ जाए तो लोग अंतर्निहित संविधान तक संशोधन के लिए तैयार हो जाते हैं। रिलैक्सेशनशून्य, सब्र सून्य। पिछली पीढ़ी की वो लंबी प्रतीक्षा और धीरज अब इंस्टाग्राम स्टोरी में ‘गोल्डन एरा’ बन गई है, जहाँ उनकी निराशाएँ भी फिल्टर होकर गुलाबी सी नजर आती हैं। और वही नॉस्टैल्जिया एक बिज़नेस मॉडल बन चुका है—जो कष्ट हमने झेले, वही अब #ओल्डइज़गोल्ड के नाम से सस्ते में बिकता है।

होली-दीवाली की पुरानी रौनक भी अब डिजिटल हो चुकी है। तब दीवाली लड्डू और पटाख़ों के संग आती थी, अब सेल का ऑफर लेकर आती है—“लड्डू बाद में, अभी ऑफ़र्स ग्रैब करो।” पटाखों का धुआँ अब रेटिंग और रिव्यू के रूप में उड़ता है। होली पर पिचकारी में पानी भरने की मेहनत अब कागज़ी संदेश में बदल गई—“गुलाल की जगह मुस्कान भेज रहा हूँ, अपनापन बनाए रखना।” रंग खिलाड़ियों से हटकर इमोजी खिलाड़ियों में बदल गए हैं। ऐसा लगता है जैसे जमीनी रंगों ने डिजिटल फिल्टर ठोक दिया हो। लेकिन यह बदलाव भी व्यंग्य से खाली नहीं है, क्योंकि रंग अब ऑनलाइन होते हैं और जश्न केवल टेक्स्ट में। खूब खूब हूँई है तो, पर त्योहारों की रौनक कहीं ‘पेंडिंग’ की तरह छुट्टी पर है।

सबसे बड़ा व्यंग्य यह है कि पहले मोहल्ले का सम्मान ‘तीन कुर्सियों वाला आदमी’ होता था, जिसकी मेहमाननवाज़ी से पूरा मोहल्ला खिलखिलाता था। अब सम्मान बन गया है डिलीवरी बॉय का। रोज़ ‘पैंट आ गई, शर्ट अलग आएगी।’ रिश्तों की डिलीवरी भी अब सिस्टम में ‘पेंडिंग’ है। कोई पूछता नहीं कि हे डिलिवरी बॉय, तुम्हारी सेल्फी कब आएगी? रिश्ते इतने डिजिटल हो गए हैं कि अब उनका ‘मोड’ और ‘सेटिंग’ ही चलन है। कहीं भी संपर्क हो, लेकिन संपर्क जैसा नहीं। इंसानी रिश्ता अब ‘डेटा’ में सिमट गया है, जहां झूठ की फाइलें पहले भी होती थीं पर आकड़ों की तेजी ने इन्हें ‘डाटा सेव्ड सक्सेसफुली’ कर दिया है।

अख़बार का स्वरूप पहले भजन की तरह होता था, जिसे लोग भक्तिभाव से पढ़ते थे। शब्दों की ताकत ऐसी होती थी कि वह आत्मा को गुदगुदा देती थी। आज के समय में वही ताकत मेम और मीम के रूप में फैल रही है, जो दिमाग को चकरा देती है। पहले संपादकीय इतने गंभीर होते थे कि लेखक की हाजिरी तक लगती थी, अब तो सोशल मीडिया पर एक मज़ेदार मीम ही संपादकीय बन जाता है। शब्दों के लिए दिल की जगह अब ‘लाइक्स’ और ‘शेयर’ की तंगी है। पहले लोग सोचते थे, अब लोग बस रिएक्ट करते हैं। खबरों की धार इतनी तेज हो गई है कि असली तथ्य कहीं खो गए हैं, और अफवाहें चमचमाती हेडलाइन बनकर इंटरनेट की गलियों में नाचती हैं। यही डिजिटल युग का व्यंग्य है जहाँ शब्द अपनी आत्मा खो बैठे हैं पर फिर भी इंटरनेट पर वायरल हो रहे हैं।

क्या सचमुच पुराना समय स्वर्णिम था? या हमारी स्मृतियाँ उस जमाने की कमी को गुलाबी फिल्टर की तरह छुपा देती हैं? पुराना जमाना भी संकटों से भरा था, पर तब रोशनी कम थी इसलिए अंधेरा कम दिखता था। नॉस्टैल्जिया हमें एक ऐसा आईना दिखाता है जिसमें हर बीता वक्त बेहतर नजर आता है और आने वाला वक्त हमेशा खराब। आज जो हम वर्तमान कहते हैं, वही कल का नॉस्टैल्जिया बनेगा। जैसे अगली पीढ़ी कहेगी—“क्या जमाना था, जब लोग रील्स देखते-देखते अकाउंट डिलीट कर देते थे। कितना प्योअर टाइम था।” यह घमंड और विडंबना का मेल है कि हम हमेशा बीते वक्त को परफेक्ट मानते हैं और वर्तमान को दोष देते हैं। यही नॉस्टैल्जिया की सबसे बड़ी फंदाकशी है—वह हमारी आंखों को वह गुलाबी चश्मा देता है जिससे हम भूल जाते हैं कि असली ज़िंदगी हमेशा त्रासदी और कॉमेडी का मिश्रण होती है।

सच यह है कि नॉस्टैल्जिया हमारी आत्मा की सांत्वना है और व्यंग्य उसका सर्वांग दुखी पक्ष। हमें ग़म के साथ हँसी भी दी जाती है, लेकिन फर्क इतना है कि पहले यह थाली पीतल की थी—उसकी चमक जरा कम भी होती तो उसमें गरिमा थी। अब वही थाली प्लास्टिक की है, चमकदार लेकिन टूटने वाली। इस इशारे में समाई है हमारी आधुनिक ज़िंदगी की सच्चाई—जहां हंसी कम और कटुता ज्यादा है, और जहां यादें भी ज्यों-ज्यों पुरानी होती हैं, व्यंग्य भी मित्र की तरह करीब आता जाता है। इसलिए हम लिखते जाते हैं, सोचते हैं, और हंसते हैं, कभी-कभी खुद पर, तो कभी यादों पर। आखिरकार, यही वह ज़िंदगी है जो हमें मिली है—पीतल की चमक से घिरी हुई, मगर प्लास्टिक की मजबूती में दम तोड़ रही। इसी में छुपा है सबसे तीखा व्यंग्य।

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ३७१ ☆ व्यंग्य – “बीत गया हैप्पी हिंदी डे” ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ३७१ ☆

? व्यंग्य – बीत गया हैप्पी हिंदी डे ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

आज हिंदी दिवस है और हम सभी अपनी मातृभाषा हिंदी दिवस का जन्मदिन मना रहे हैं।

यूं हिंदी और अंग्रेजी तिथियों में हम सबका जन्म दिन दो बार मनाया ही जाता है, उसी तरह हिंदी दिवस भी प्रतिवर्ष राष्ट्रीय स्तर पर 14 सितंबर को एवं 10 जनवरी को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मनाया जाता है।

तो “हैप्पी बर्थडे” हिंदी ।

क्योंकि  हिंदी को अंग्रेजी का सहारा लेने में कोई शर्म नहीं करनी चाहिए , यही आधुनिकता है ।

प्यारी हिंदी आज कितनी खुश होगी! आखिरकार साल दर साल इसी बहाने हम हिंदी को याद तो करते हैं। सरकारी खजाने से बड़ा बजट एलाट होता है, सेमिनार होते हैं की हिंदी का उपयोग कैसे बढ़ाएं। पोस्टर,बैनर बनते हैं हिंदी फॉर्म बुकलेट, छपते बंटते हैं।

आज का दिन , हिंदी का होता है । सबके व्हाट्सएप स्टेटस हिंदी में होंगे, फेसबुक पोस्ट हिंदी में होंगे भले ही रोमन हिंदी में लिखें । कल से फिर भले ही वापस अंग्रेजी में काम जारी हो जाए, लेकिन आज तो हिंदी की जय-जयकार है!

हमने हिंदी को स्मार्ट बना लिया है। एफ एम रेडियो पर अंग्रेजी मिक्सड हिंदी का नया प्रयोग सुनने मिलता है।  हम कहते हैं “मैं अपने ऑफिस से घर जा रहा हूं।” वाह! कितना अच्छा लगता है। “कार्यालय से घर” कहने में जिव्हा ट्विस्ट होती है!

अब हम मॉडर्न हैं, अप-टू-डेट हैं। हमारी हिंदी में भी इंग्लिश का तड़का लगा रहता है।

देश में हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा मिला हुआ है, लेकिन व्यावहारिक रूप से अंग्रेजी ही सबकी प्रिय है। स्कूलों में हिंदी पढ़ाई जाती है, लेकिन अच्छे स्कूल वे माने जाते हैं जहां सब कुछ अंग्रेजी में होता है। हिंदी मीडियम के बच्चे तो जैसे दूसरे दर्जे के नागरिक हैं। हमारी शिक्षा व्यवस्था में हिंदी एक विषय है, बाकी सब विषय का मध्यम अंग्रेजी ही है।

नेता जी भी कितने समझदार हैं! हिंदी दिवस पर दो-चार वाक्य हिंदी में बोल देते हैं, बाकी सारे साल इंटरनेशनल इमेज बनाने के लिए अंग्रेजी में भाषण देते हैं, भले ही गलत स्पेलिंग में या हिंदी में लिखे अंग्रेजी शब्द पढ़ कर बोलते हों।

बॉलीवुड की तो बात ही न्यारी है। पहले फिल्में होती थीं “मुगल-ए-आजम”, “शोले”, “दीवार”। अब आती हैं “हाउसफुल”, “रेडी”, “वांटेड”। गाने भी कमाल के हैं – “यू आर माई सोनिया”, “नागिन डांस”। हमारे फिल्मकार कहते हैं कि अंग्रेजी नाम रखने से फिल्म इंटरनेशनल लगती है। जी हां, “प्रेम कहानी” कहने से तो बहुत लोकल लगता है!

व्यापारियों का भी अपना फलसफा है। दुकान पर लिखा रहता है “सेल”, “ऑफर”, “डिस्काउंट”। “बिक्री”, “छूट” जैसे शब्द पुराने जमाने की बात हो गई। ग्राहक भी खुश होते हैं , लगता है कि विदेशी माल मिल रहा है। “स्वदेशी” शब्द सुनकर तो लोग डर जाते हैं कि कहीं कुछ घटिया न हो।

मीडिया भी दो कदम बढ़कर है। न्यूज चैनल पर “ब्रेकिंग न्यूज”, “एक्सक्लूसिव रिपोर्ट”, “लाइव अपडेट” चलता रहता है। हिंदी में कहना हो तो “ताजा समाचार”, “विशेष रिपोर्ट”, “सीधा प्रसारण” कहते हैं, लेकिन यह सब पुराने जमाने की बात है। आजकल की पत्रकारिता में अंग्रेजी का तड़का जरूरी है, वरना टी आर पी रेटिंग कैसे आएगी? मजेदार बात यह है कि हम अपनी डिग्रियों पर भी अंग्रेजी में नाम लिखवाते हैं। “राम कुमार शर्मा” की जगह “Ram Kumar Sharma” लिखवाना जरूरी है। जॉब इंटरव्यू में हिंदी नाम बताने में शर्म आती है, लगता है कि इंटरव्यूअर सोचेगा कि यह तो निरा गंवार है।

रेस्टोरेंट में मेनू कार्ड अंग्रेजी में होता है। “दाल, चावल” की जगह “फ्राइड दाल” ” राइस”, “रोटी” की जगह “इंडियन ब्रेड ”  लिखा रहता है। वेटर से हिंदी में बात करने में हिचकिचाहट होती है, लगता है कि हम कुछ छोटे लोग हैं।

मजेदार यह है कि हमारे घरों में दादी-नानी से हिंदी में बात करते हैं, बच्चों से अंग्रेजी में। बुजुर्गों के लिए हिंदी, बच्चों के लिए अंग्रेजी यह हमारी भाषाई नीति बन गई है। बच्चे हिंदी बोलें तो मां बाप परेशान हो जाते हैं कि कहीं ये बच्चा जमाने से  पिछड़ न जाए।

सोशल मीडिया पर भी कमाल का दृश्य है। फेसबुक पर स्टेटस लिखते हैं “गुड मॉर्निंग फ्रेंड्स, हैव अ नाइस डे”। व्हाट्सएप पर “गुड नाइट स्वीट ड्रीम्स”। दो भाषाओं का ऐसा घालमेल कि समझ में ही नहीं आता कि हम कौन सी भाषा बोल रहे हैं।

अस्पतालों में भी यही हाल है। डॉक्टर साहब अंग्रेजी में बीमारी बताते हैं, हिंदी में समझाना पड़ता है। दवाइयों के नाम भी अंग्रेजी में ही लिखे रहते हैं। मरीज को समझ में नहीं आता, लेकिन अंग्रेजी में लिखा है तो दवाई बेहतर लगती है।

अजीब बात यह है कि हम अपने बच्चों के नाम भी अंग्रेजी वर्शन में रखते हैं। “आर्यन”, “रिया”, “ट्विंकल” जैसे नाम फैशन में हैं। “रामकुमार”, “श्यामसुंदर” जैसे नाम आउट ऑफ डेट हो गए हैं।

लेकिन फिर भी आज का दिन हिंदी का है! आज हमें गर्व से कहना चाहिए कि हम भारतीय हैं और हिंदी हमारी भाषा है। भले ही कल से फिर अंग्रेजी  शुरू हो जाए, आज तो हिंदी की जय-जयकार है। तो आइए मिलकर कहते हैं “हैप्पी बर्थडे हिंदी!” अरे क्षमा करें, “हिंदी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं!”

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार

संपर्क – ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी भोपाल 462023

मोब 7000375798, ईमेल apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ शेष कुशल # ५५ ☆ व्यंग्य – “गरीब का जीना भी कोई जीना है लल्लू!!…” ☆ श्री शांतिलाल जैन ☆

श्री शांतिलाल जैन

(आदरणीय अग्रज एवं वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री शांतिलाल जैन जी विगत दो  दशक से भी अधिक समय से व्यंग्य विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी पुस्तक  ‘न जाना इस देश’ को साहित्य अकादमी के राजेंद्र अनुरागी पुरस्कार से नवाजा गया है। इसके अतिरिक्त आप कई ख्यातिनाम पुरस्कारों से अलंकृत किए गए हैं। इनमें हरिकृष्ण तेलंग स्मृति सम्मान एवं डॉ ज्ञान चतुर्वेदी पुरस्कार प्रमुख हैं। श्री शांतिलाल जैन जी  के  स्थायी स्तम्भ – शेष कुशल  में आज प्रस्तुत है उनका एक अप्रतिम और विचारणीय व्यंग्य  “बकरे की अम्मा कब तक खैर मनाएगी…” ।)

☆ शेष कुशल # ५५ ☆

☆ व्यंग्य – “गरीब का जीना भी कोई जीना है लल्लू!!… – शांतिलाल जैन 

इन दिनों यमराज और उनका पूरा डिपार्टमेंट हैरान परेशान है. चित्रगुप्त का और चुनाव आयोग के डाटा का आपस में मिलान नहीं हो पा रहा. यमदूत जिसकी आत्मा लेने इहलोक में आते हैं मतदाता सूची में वे ऑलरेडी मरे हुए निकलते हैं. बीस बाईस लाख आत्माएँ तो अकेले बिहार में हैं जो मरने के बाद भी सशरीर आर्यावर्त में ही घूम रहीं हैं. चुनाव आयोग उनको जिन्दा नहीं मान रहा और यमदूत उनको ले जा नहीं पा रहे. ‘सलीम तुम्हें मरने नहीं देगा और अनारकली हम तुम्हें जीने नहीं देंगे’ टाईप का मामला है. वैसे हमारा चुनाव आयोग निष्पक्ष और निडर है. उसने चित्रगुप्त को एफेडेविट देकर साफ़ साफ़ बोल दिया है कि जो मरे नहीं उनके नाम एक सितम्बर तक बता दें हम वेरीफाई करा लेंगे, शेष आत्माएँ आप ले जाईए परलोक में. बैकुंठ में रखिए, स्वर्ग में रखिए, नर्क में रखिए, बफर ज़ोन में रखिए – कहीं भी रखिए, ये आपका सरदर्द है. आर्यावर्त में नहीं रहेंगे. आप ले जा पाए तो ठीक, नहीं तो सशरीर पृथ्वीलोक में ही उनको कहीं डिपोर्ट कर दिया जावेगा.

चित्रगुप्त की परेशानी यहीं तक सीमित नहीं है. हजारों मामलों में यमदूत रोजाना बिना आत्मा लिए खाली हाथ वापस आ जा रहे हैं. अब आप इन पंक्तियों के लेखक का ही मामला लीजिए. पिछले दिनों यमदूत उनको लेने आया था और कंफ्यूज होकर वापस चला गया, खाली हाथ. जाकर चित्रगुप्त को रिपोर्ट किया – “प्रभु, सेम पर्सन, सेम वोटर आईडी. फोटो में भी सेम-टू-सेम सांतिभिया उज्जैन में भी मिले, लखनऊ में भी, बेंगलुरु में भी, फिर महाराष्ट्र में भी. मैं कौनसे वाले सांतिभिया को लाता, टेल-मी.”

“पिताजी के नाम से मिलान करके ले आना था.”

“प्रभु, फादर का नाम ऐसा उजबक् कि कांट प्रोनाउंस. क्या तो लिखा था एएसडीऍफ़जी….समथिंग लाईक देट.”

“यमदूत होकर इत्ती अंग्रेजी बोलते हो!!”

“सॉरी सर, पिछले दिनों ही आर्यावर्त में ट्रान्सफर होकर आया हूँ. पहले लंदन से आत्माएँ लाता था.” 

उधर सांतिभिया भी खुश. न कभी डाटा टेली होगा न कभी वे मरेंगे, और चार जगह वोट डालने को मिलेगा सो बोनस में. डेमोक्रेसी मज़बूत करने के लिए एक से ज्यादा निर्वाचन क्षेत्रों में वोट डालकर वे अपना अप्रतिम योगदान देते रहेंगे. आर्यावर्त के लोकतंत्र में जिन्दा रहना भी एक कला है. काश, सावित्री को यह कला आती. उसने चुनाव आयोग से संपर्क किया होता तो सत्यवान को वापस लाने के लिए यमराज की चिरौरी नहीं करनी पड़ती.

बहरहाल, ऐसा सभी मामलों में नहीं हुआ है. बहुत से लोग सच में जिन्दा मिले हैं मगर उनकी कद-काठी चित्रगुप्त के रिकार्ड से मैच नहीं कर रही. उनको आदमकद होना था मगर वे कद में इतने छोटे-छोटे थे कि एक कमरे के मकान में एक सौ अस्सी की संख्या में समाए हुए थे. बरसों से बंद एक कमरे में सैकड़ों की संख्या में घूमते तिलचट्टों नुमा. यमदूत फिर कन्फ्यूज्ड. खचाखच भरे एक कमरे के मकान में पाँव रख पाना मुश्किल तो आत्मा निकालकर बाहर लाएँ कैसे ?  

वैसे आप और हम इस बात पर और अधिक गर्व कर सकते हैं भारत ने दुनिया को शून्य की अवधारणा दी और आयोग ने उसका उपयोग हजारों मकानों को पहचान देने में किया है. महान भारतीय खगोलशास्त्री आर्यभट्ट के बाद ये चुनाव आयोग ही है जिसने शून्य का इतना शानदार उपयोग किया है. ये बात और है कि इससे यमदूत चकरघिन्नी हो गए हैं कौनसे वाले ज़ीरो नंबर के मकान से आत्मा ले जाना है, समझ नहीं आता.

यमदूतों का जॉब इतना कठिन कभी नहीं रहा श्रीमान् जितना इन दिनों हो गया है. एक मकान में वे एक सौ चौबीस वर्षीय महिला को लेने के लिए पहुँचे. महिला की आत्मा ने साथ में चलने से मना कर दिया, कहा – ‘फर्स्ट-टाईम वोटर हूँ मैं, मैंने अभी-अभी तो फॉर्म सिक्स भरकर वोटरलिस्ट में नाम जुड़वाया है. अभी से मैं आपके साथ कैसे चल सकती हूँ. दो-चार बार वोट डालने तो दीजिए. दो हज़ार सैंतालीस का विकसित भारत देख लूं, फिर चलूंगी,’ बेचारा यमदूत, मुँह लटकाकर वापस चला गया.

आंकड़ों के मिलान, चेकिंग, बेलेंसिंग, रिकन्सिलीएशन ने इन दिनों आर्यावर्त में जन्म-मृत्यु का सिस्टम बिगाड़ दिया है. चुनाव आयोग एक स्वायत्त, संवैधानिक संस्था है, उसकी विश्वसनीयता संदेह से परे है. रिकार्ड तो चित्रगुप्त को ही अपना ठीक करना पड़ेगा. गरीब, अनपढ़, प्रवासी, अल्पसंख्यकों को मृत दिखाकर बीएलओ ने अपनी ड्यूटी निभा दी है अब उन आत्माओं को आर्यावर्त से ले जाना यमराज के डिपार्टमेंट की जिम्मेदारी है. वैसे आर्यावर्त में गरीब का जीना भी कोई जीना है लल्लू!!

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© शांतिलाल जैन 

बी-8/12, महानंदा नगर, उज्जैन (म.प्र.) – 456010

9425019837 (M)

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ६३ – ईमानदारी – देश का सबसे बड़ा अपराध ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार, बाल साहित्य लेखक, और कवि हैं। उन्होंने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज, और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने, और समन्वय करने में महत्वपूर्ण कार्य किया है। उनके ऑनलाइन संपादन में आचार्य रामचंद्र शुक्ला के कामों के ऑनलाइन संस्करणों का संपादन शामिल है। व्यंग्यकार डॉ. सुरेश कुमार मिश्र ने शिक्षक की मौत पर साहित्य आजतक चैनल पर आठ लाख से अधिक पढ़े, देखे और सुने गई प्रसिद्ध व्यंग्यकार के रूप में अपनी पहचान स्थापित की है। तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (तेलंगाना, भारत, के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से), व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान (आदरणीय सूर्यबाला जी, प्रेम जनमेजय जी, प्रताप सहगल जी, कमल किशोर गोयनका जी के करकमलों से), साहित्य सृजन सम्मान, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करकमलों से और अन्य कई महत्वपूर्ण प्रतिष्ठात्मक सम्मान प्राप्त हुए हैं।

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय व्यंग्य रचना ईमानदारी – देश का सबसे बड़ा अपराध)  

साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ६३ – ईमानदारी – देश का सबसे बड़ा अपराध ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

मैं ईमानदार आदमी हूँ। यह कहना इस देश में उतना ही शर्मनाक काम है जितना कि किसी को बताना कि आप बेरोजगार हो। लोग हँसते हैं, आँखें घुमाते हैं और पूछते हैं – “भाई, अब तक जिंदा कैसे हो?” सच तो यह है कि इस देश में ईमानदारी एक बीमारी है जिसका कोई इलाज नहीं। लोग जुकाम वाले से हाथ मिलाते हैं, डेंगू वाले से गले मिलते हैं, लेकिन ईमानदार से मिलने से डरते हैं। शायद उन्हें लगता है कि कहीं यह बीमारी उन्हें भी न लग जाए। स्थिति यह है कि मैं मुहल्ले में पहुँचूँ तो लोग ऐसे साइड हो जाते हैं जैसे मैं कोई जंजीर से छूटा हुआ कुत्ता हूँ। शादी-ब्याह में बुलावा आता है, लेकिन सिर्फ इसलिए कि समाज का नियम है, न कि मेरी इज़्ज़त के लिए। मेज़बान मुझे देखते ही दुखी हो जाते हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि दारू और चिकन की प्लेट मैं छूने से भी डरूँगा। मैं कोने में बैठा सूखी रोटी पर सब्ज़ी खाता रहता हूँ और बाकी लोग दिल्ली-लखनऊ की राजनीति पर पैग छलकाते हैं। मेरी स्थिति वही है जैसे कोई ‘साइलेंट ज़ोन’ में लाउडस्पीकर। सबको लगता है मैं हूँ तो मेले का मज़ा कम हो जाएगा।

मेरी पत्नी रोज़ भुनभुनाती है। उसका नारा साफ़ है – “घर में आदर्श से नहीं, नोट से चूल्हा जलता है।” वह मेरे माथे पर पसीना देखती है और चिल्लाती है, “तू आदमी है या महापुरुष? घर के लिए तो कभी पाप कमाकर भी ला।” उसका दुख जायज़ है, लेकिन मैं क्या करूँ? पड़ोस वाली शर्मा अंकल की बीवी हर तीज पर सोने का हार पहनकर निकलती है, हमारे घर में आज भी तांबे के गिलास में पानी पिया जाता है और बच्चे उस गिलास को देखकर मुँह बिचकाते हैं कि इसमें सेल्फ़ी नहीं दिखती। पत्नी कहती है: “तेरी ईमानदारी ने हमें कहीं का न छोड़ा। पड़ोसी की लड़की विदेश पढ़ रही है और हमारे बच्चे इंग्लिश मीडियम की फीस के लिए तरस रहे हैं।” मैं तर्क देता हूँ कि चरित्र सबसे बड़ा पूँजी है, तो वह पलट कर कहती है, “बाज़ार में चरित्र बेचकर चावल ला देंगे क्या?” झगड़े में हमेशा वही जीतती है क्योंकि मेरे पास तर्क तो है पर राशन का बिल नहीं। बच्चे भी माँ के पक्ष में खड़े हो जाते हैं, उन्हें स्पष्ट दिखता है कि पिताजी ईमानदार हैं और यही परिवार का सबसे बड़ा अपराध है। घर में ईमानदारी अब ‘बुरा रोग’ मानी जाती है।

ऑफिस मेरा सबसे बड़ा चिड़ियाघर है जहाँ मैं अकेला गीदड़ की तरह कराहता हूँ। बाकी सब शेर, भेड़िये और लोमड़ियाँ हैं। उनकी टेबल पर रिश्वत की मिठाइयाँ, ठेके की कमीशन, और मलाईदार फाइलें रहती हैं। मेरी टेबल पर सिर्फ़ “नैतिकता की फाइल” पड़ी रहती है जो सालों से वैसे ही पतली है जैसे मेरी जेब। लोग मुझे देखकर कहते हैं, “ये रहा राष्ट्र का भविष्य, इसे देखो और अपनी गलतियों पर शर्म करो।” लेकिन वहीं अगले ही पल सब मेरे सामने पैसे बाँटते हैं जैसे सारे नोट रक्षाबंधन के धागे हों। प्रमोशन में भी मैं हमेशा फेल रहता हूँ। फाइल पर घोटाले के दस्तख़त करने वालों को पाँच सीढ़ी ऊपर भेज दिया जाता है और मुझे सीढ़ियों पर बैठकर अपना टिफ़िन खाने की आज़ादी दे दी जाती है। सहकर्मी अब मेरे वरिष्ठ बन चुके हैं। वो मुझे आदेश देते हैं और फिर पान की पीक थूककर कहते हैं, “गांधी की औलाद, कम से कम कलम लाल कर लो।” मेरा ईमानदारी का चश्मा सबको खटकता है क्योंकि उनके अपराध उसमें दो गुना मोटे दिखते हैं। दफ्तर तो उनके लिए कमाई का मेला है लेकिन मेरे लिए आजीवन कारावास।

मेरे बच्चे अब साफ़ कह चुके हैं – “पापा, हमें आपके संस्कार नहीं चाहिए, हमें स्कूटी, मोबाइल और फॉरेन टूर चाहिए।” मैंने बहुत समझाया कि ईमानदारी से जीवन लंबा और शांत होता है। वे हँसकर बोले, “लंबा तो जेल की सज़ा भी होती है। हमें उस लंबाई से क्या करना है?” समाज भी मुझे आइडल केवल दूर से मानता है। जैसे कोई पत्थर की मूर्ति को अगरबत्ती लगाता है पर घर में उसे कभी नहीं रखता। हर गली-मुहल्ले में मेरी तारीफ़ होती है लेकिन कोई बेटी का रिश्ता मेरे बेटे से जोड़ने को तैयार नहीं। क्योंकि सबको चिंता है कि ईमानदार की संतान भूखी रह जाएगी। शादी-ब्याह में मैं खड़ा होता हूँ तो लोग मेरे पास आकर फुसफुसाकर कहते हैं, “आप बहुत नेक हैं, आपके जैसे लोग ही देश को सँभाले हुए हैं।” लेकिन वहीं वोट किसी गुंडे, किसी नोट बाँटने वाले नेता को डालते हैं। मुझे एक वोट भी नहीं मिलता। समाज मुझे आदर्श चाहता है पर नेता और ठेकेदार की गली में रहना पसंद करता है। मैं आदर्श नाम का बोर्ड हूँ जिसे देखकर सब सिर झुकाते हैं लेकिन आगे जाकर चौराहा बदल लेते हैं।

ईमानदार आदमी की मौत भी उसकी ज़िंदगी जैसी ही अकेली और अपमानजनक होती है। मेरे मोहल्ले में जब कोई बेईमान नेता मरता है तो षड्यंत्रों की कैंची लेकर पूरी भीड़ निकल पड़ती है। पाँच हज़ार लोग उसे कंधा देते हैं, फूलों की बाढ़ आती है, एक दर्जन समाचार चैनल चीख़ते हैं—‘जनता का सच्चा सेवक चला गया।’ और मैं जानता हूँ कि उसने कितने अरब सेवा में खा लिए। लेकिन जब ईमानदार आदमी मरता है, तो गली के बच्चे भी उसे देखने नहीं आते। मेरी शवयात्रा में बस पत्नी, दो बच्चे और मोहल्ले का एक कुत्ता होगा जो शायद आदत से निकल आए, दया से नहीं। लोग कहेंगे—“बेचारा, आदमी अच्छा था पर मूर्ख था।” मरने के बाद शायद अखबार में कोने की खबर छपे: “ईमानदार बाबू का निधन।” और उसी हेडलाइन के नीचे बड़े अक्षरों में यह भी छपे—“पूर्व मंत्री के भ्रष्टाचार पर सीबीआई जाँच।” दोनों साथ-साथ छपेंगे और लोग बाद वाले पर चर्चा करेंगे। मेरा जीवन और मौत दोनों अखबार की फुटनोट हैं।

मैं सोचता हूँ कि अगर इस देश में सच्चाई और ईमानदारी सचमुच महान हैं, तो हमें उनके लिए मंत्रालय होना चाहिए। लेकिन यहाँ सच का मंत्रालय नहीं, झूठ का महल है। बच्चों की किताबों में हमें पढ़ाया जाता है—‘सत्य की हमेशा जीत होती है।’ स्कूल से निकलकर बच्चा देखता है कि राजनीति में सत्य हमेशा पिछली पंक्ति में बैठा होता है। कक्षा की कविता कहती है कि ईमानदार राष्ट्र का गहना होता है, और सच्चाई यह है कि गहनों की दुकान पर कभी ईमानदारी नहीं बेची गई। अब मुझे लगता है कि संविधान में संशोधन होना चाहिए: हर नागरिक को भ्रष्ट होने का मूल अधिकार दिया जाए, ताकि जो ईमानदार बचा हो वह खुद को अपराधी न माने। और यदि कहीं कोई ईमानदार फिर भी जीवित बच जाए, तो उसे चिड़ियाघर में पिंजरे में रखा जाए ताकि बच्चे देख सकें, जैसे बाघ या शेर को देखते हैं। बाहर एक बोर्ड टाँगा जाए—“यहाँ ईमानदार आदमी प्रदर्शित है। कृपया उस पर पत्थर न मारें। वह पहले से ही लहूलुहान है।” यही इस देश का अंतिम व्यंग्य है कि ईमानदार आदमी अब सिर्फ़ प्रदर्शन की वस्तु रह गया है, जीवन की उपयोगिता से बाहर।

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३०४ – व्यंग्य – धूल भरा हीरा ☆ ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम व्यंग्य – ‘धूल भरा हीरा‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३०४ ☆

☆ व्यंग्य ☆ धूल भरा हीरा

रज्जू भाई बहुत दिन तक ठलुआगीरी करते रहे। पढ़ाई-लिखाई में रुचि रही नहीं, किसी तरह रो-झींक कर थर्ड डिवीज़न में बी.ए. पास कर लिया, फिर घर में बैठ गये। सवेरे दस  ग्यारह बजे तक मुंह ढंक कर सोते, फिर उठकर चौराहे की तरफ निकल जाते। पान की दूकान पर परिचितों से बतयाते एक-दो घंटे निकल जाते। लौट कर दोपहर के भोजन के बाद फिर दो घंटे की निद्रा। फिर शाम को बाज़ार का एक चक्कर। घर में कोई उनसे मिलने आता तो पिताजी हाथ उठाकर कह देते, ‘वो पड़े हैं मरे। ‘ घर में रज्जू की कोई पूछ-कदर नहीं थी। बेहयाई की रोटी तोड़ रहे थे।

उनकी किस्मत उनके दोस्त धीरू की सलाह पर पलटी। उसने बताया कि नगर के विधायक चमन भाई अपने चुनाव प्रचार के लिए लड़कों को खरीद रहे हैं। करीब एक महीने का काम, मेहनताना दस हज़ार रुपये। नाश्ता भोजन अलग। बताया कि सौदा फायदे का है। उस समेत आठ दस लड़के बिक चुके हैं। रज्जू बिकने के लिए राज़ी हो गये। चमन भाई के सामने पेश हो गये। काम समझा दिया गया। तुरत काम पर लगने की हिदायत दी गयी।

रज्जू और दूसरे लड़कों की मेहनत के फलस्वरुप चमन भाई जीत गये और रज्जू उनकी नज़र में चढ़ गये। अब रज्जू रोज़ सवेरे जल्दी उठकर चमन भाई के दरवाज़े पर हाज़िरी देने लगे। दिन भर वहीं दौड़-भाग में लगे रहते। उनके परिवार की सेवा भी करते रहते। वे चमन भाई के विश्वासपात्र बन गये थे। चमन भाई किसी कार्यक्रम में जाते तो रज्जू को ड्राइवर के बगल में बैठा कर ले जाते। रज्जू भी घूम घूम कर लोगों को जताते कि वे चमन भाई के दाहिने हाथ होने का दर्जा प्राप्त कर चुके हैं। चमन भाई के मित्र-परिचित और पार्टी के लोग भी रज्जू को जानने लगे। रज्जू ने अपने स्कूटर पर सामने ‘विधायक प्रतिनिधि’ लिखवा लिया। अब जो लोग चमन भाई के बंगले पर किसी काम से आते, वे रज्जू भाई की जेब में सौ, दो सौ रुपये खोंस जाते।

कुछ दिन बाद रज्जू चमन भाई के बंगले के बाहर दफ्तर में, एक तरह से उनके सचिव बनकर, बैठने लगे। सब आने वाले पहले उन्हीं के पास आकर सलाम बजाते, फिर रज्जू चमन भाई से उनकी मुलाकात का जुगाड़ बैठाते।

रज्जू बाबू की हैसियत और कमाई में बराबर इज़ाफा होता गया। अब वे पार्टी में कुछ ऊंचा हासिल करने का ख्वाब देखने लगे थे। नगर में उनके फोन पर अधिकारी ध्यान देने लगे थे। दफ्तरों में घुसते ही उन्हें कुर्सी और सैल्यूट मिलने लगी थी। छोटे-मोटे अफसरों को रज्जू बाबू डांट पिला देते थे और अफसर चुपचाप सुन भी लेते थे।

अब घर में भी रज्जू बाबू का रोब- दाब बढ़ गया था। अब वे टाइम से सोते और अलार्म लगा कर टाइम से उठते। घर का कोई काम अटकता तो रज्जू के लिए पुकार लगती और रज्जू तुरत फोन उठाते। अब वे ‘काम’ के आदमी हो गये थे। अब घर में कोई उनसे मिलने आता तो पिताजी बहुत प्रेम और मुलायमियत से कहते, ‘उधर बैठे हैं। जाइए, मिल लीजिए।’

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ६२ – प्रेम का लाइसेंस: एक राष्ट्रीय तमाशा ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार, बाल साहित्य लेखक, और कवि हैं। उन्होंने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज, और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने, और समन्वय करने में महत्वपूर्ण कार्य किया है। उनके ऑनलाइन संपादन में आचार्य रामचंद्र शुक्ला के कामों के ऑनलाइन संस्करणों का संपादन शामिल है। व्यंग्यकार डॉ. सुरेश कुमार मिश्र ने शिक्षक की मौत पर साहित्य आजतक चैनल पर आठ लाख से अधिक पढ़े, देखे और सुने गई प्रसिद्ध व्यंग्यकार के रूप में अपनी पहचान स्थापित की है। तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (तेलंगाना, भारत, के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से), व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान (आदरणीय सूर्यबाला जी, प्रेम जनमेजय जी, प्रताप सहगल जी, कमल किशोर गोयनका जी के करकमलों से), साहित्य सृजन सम्मान, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करकमलों से और अन्य कई महत्वपूर्ण प्रतिष्ठात्मक सम्मान प्राप्त हुए हैं।

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय व्यंग्य रचना प्रेम का लाइसेंस: एक राष्ट्रीय तमाशा)  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ६२ – प्रेम का लाइसेंस: एक राष्ट्रीय तमाशा ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

हमारे देश में मुसीबतों की कमी नहीं। बेरोज़गारी ने जवान को बेकार बनाया, महंगाई ने जेब खाली की, भ्रष्टाचार ने नैतिकता को चाट लिया। मगर अब एक नया राष्ट्रीय संकट सर पर मंडरा रहा है, जिसे आधुनिक बुद्धिजीवी ‘डेटिंग’ कहते हैं। यह कोई प्लेग नहीं, कोई परमाणु हमला नहीं, लेकिन इसका असर इतना ज़बरदस्त है कि देश का युवा, खासकर 16 से 23 साल के सपने देखने वाले, अपने सुनहरे साल स्मार्टफोन की चमक में गँवा रहे हैं। दिन-रात चैटिंग, इमोजी की बौछार, और ‘सीन’ के इंतज़ार में जिंदगी का कीमती वक्त धूल में मिल रहा है। यह प्रेम नहीं, भाइयो, यह डिजिटल भूतनाथ है, जो जवान दिलों को स्क्रीन पर बाँधकर नचाता है। एक मैसेज भेजो, जवाब में ‘टाइपिंग…’ दिखे, और फिर सन्नाटा। मैं, एक सामान्य देशवासी, इस तमाशे को देखकर सोचता हूँ—जब युवा इमोजी के पीछे पागल हो रहा है, तो देश का भविष्य कौन सँभालेगा? शायद कोई नया ऐप?

इस त्रासदी की जड़ में एक नया जीव है, जिसे समाज ने ‘जेन-ज़ी लड़की’ का तमगा दिया है। यह कोई साधारण प्राणी नहीं, यह तो चलता-फिरता इमोजी-कोश है। यह लड़की प्रेम को कविता नहीं, बल्कि एक रील्स वाला गेम मानती है।  भेजकर वह युवक के दिमाग में दस सवालों का बवंडर खड़ा कर देती है। ‘हम्म’ लिखकर वह उसकी नींद हराम कर देती है। और जब जवाब न आए, तो समझ लो, भाई, तुम ‘सीन’ हो गए। पुराने ज़माने का प्रेमी, जो लव-लेटर और गुलाब की उम्मीद में जीता था, इस नए युग में बिलकुल बेकार है। वह हर इमोजी को डिकोड करने में दिन-रात एक कर देता है— का मतलब ‘आगे बढ़ो’ है या ‘बस करो’?  का मतलब ‘कोशिश करो’ है या ‘टाटा-बाय-बाय’? यह प्रेम का जंगल नहीं, यह तो इमोजी का अखाड़ा है, जहाँ जेन-ज़ी लड़की रेफरी है और युवक कुश्ती हारता है। और वह? वह तो अगली स्टोरी अपलोड करके हँस रही है। भाइयो, यह कोई शिकायत नहीं, यह तो समाज का रियलिटी शो है!

इसलिए मैंने, एक चिंतित देशभक्त के नाते, कुछ समाजशास्त्रियों, दार्शनिकों और गणितज्ञों (जिनमें से आधे मेरे पड़ोसी थे) से सलाह ली। कई चाय के प्याले और बिस्कुटों की तबाही के बाद, मैंने एक क्रांतिकारी योजना बनाई—प्रेम को सरकारी विभाग में बदल दो! जैसे ड्राइविंग लाइसेंस होता है, वैसे ही ‘कोर्टशिप लाइसेंस’ हो। हर 18 साल के लड़के को यह लाइसेंस मिले, जिसमें उसकी प्रेम-हिस्सेदारी का पूरा रजिस्टर हो। हर लड़की को ‘सोशल क्रेडिट अकाउंट’ दो, जिसमें उसके इमोजी-उपयोग और जवाब देने की गति का हिसाब हो। प्रेम अब मुफ्त में नहीं चलेगा, भाइयो! पहला मैसेज भेजने का शुल्क—50 रुपये। लड़की को तीन घंटे में जवाब देना होगा, ‘हाँ’ या ‘ना’, वरना जुर्माना। बात आगे बढ़े, तो 200 रुपये में कॉफी डेट। अगर लड़की बीच में ‘वॉशरूम’ कहकर भाग जाए, तो 100 रुपये रिफंड। इस तरह, प्रेम एक अनुबंध होगा—न दिल का, न दिमाग का, बल्कि बटुए का। ‘टॉकिंग स्टेज’ जैसी बकवास को जड़ से उखाड़ फेंकेंगे। प्रेम अब एक सरकारी फॉर्म होगा—भरो, जमा करो, और रसीद लो!

इस योजना के फायदे गिनवाऊँ, तो अखबार की जगह किताब छप जाए। पहला, लड़कों को अपने टाइम और इमोशन की कीमत समझ आएगी। 50 रुपये खर्च करके अगर जवाब नहीं मिला, तो वे अगली बार सोचेंगे कि मैसेज भेजना है या चाय पीनी है। दूसरा, लड़कियाँ जवाबदेह होंगी। बार-बार ‘सीन’ किया, तो सोशल क्रेडिट स्कोर डाउन। स्कोर गिरा, तो प्रीमियम लाइसेंस गया। तीसरा, और सबसे मज़ेदार—देश को नया बिजनेस मिलेगा। प्रेम उद्योग! कॉफी डेट से लेकर रिफंड तक, हर चीज़ से पैसा बहेगा। सरकार को टैक्स मिलेगा, जिससे सड़कें बनेंगी, बिजली आएगी, और शायद कुछ मंत्रियों की जेबें भी भरेंगी। सबसे तेज़-तर्रार लड़कियाँ ‘प्रीमियम लाइसेंस’ लेंगी, जिससे वे प्रति मैसेज 100 रुपये वसूल सकेंगी। और जो लड़के बार-बार ‘सीन’ हो रहे हैं, उन्हें ‘इमोशनल रिहैब’ कैंप में भेजेंगे, जहाँ वे ‘सेल्फ-रिस्पेक्ट 101’ और ‘टाइम मैनेजमेंट’ का कोर्स करेंगे। यह योजना प्रेम को नहीं, पूरे देश को अमीर बनाएगी!

अब कुछ शायराना लोग चिल्लाएँगे—‘प्रेम को बाज़ार बना दिया!’ ‘दिल को दुकान में बेच दिया!’ अरे भाई, जब प्रेम में पहले ही टाइम, पैसा, और आँसू खर्च हो रहे हैं, तो रसीद क्यों नहीं? आज का प्रेम एक लॉटरी है—स्मार्टफोन वाले जीतते हैं, और सच्चे दिल वाले ‘सीन’ होकर रोते हैं। मेरी योजना इस लॉटरी को एक सरकारी टेंडर में बदलती है, जिसमें सबको नियम पता हैं। इसे प्रेम का बाज़ारीकरण कहना आसान है, मगर यह तो प्रेम का मॉडर्न मैनेजमेंट है। जेन-ज़ी लड़की को बदलना वैसा ही है, जैसे हवा को पकड़ना। वह इमोजी में हँसती है, रील्स में जीती है, और ‘घोस्ट’ करने में मज़ा लेती है। लेकिन हम उसकी इस कला को एक ढाँचे में बाँध सकते हैं, जो देश की GDP बढ़ाए। यह योजना प्रेम को एक सर्विस बनाती है—जैसे आधार कार्ड या पैन कार्ड। हर चीज़ का रेट फिक्स, हर जवाब का टाइम फिक्स। इससे न दिल टूटेगा, न जेब ढीली होगी। और अगर जेब ढीली होगी, तो कम से कम रसीद तो मिलेगी

मैं यह योजना अपने लिए नहीं लाया। मेरी उम्र में प्रेम अब पुरानी फिल्म का गाना है—याद आता है, मगर गाने की हिम्मत नहीं। मगर देश के युवाओं को देखकर दिल पसीजता है। वे स्क्रीन पर प्यार ढूँढते हैं, और जवाब में ‘सीन’ पाते हैं। मेरी योजना उन्हें एक रास्ता देगी, एक रसीद देगी, और देश को नया बिजनेस देगी। यह प्रेम का बाज़ार नहीं, प्रेम का स्टार्टअप है। आइए, इस योजना को अपनाएँ। हर लड़के को उसका लाइसेंस दो, हर लड़की को उसका क्रेडिट स्कोर। प्रेम को एक नियम दो, एक रेट-लिस्ट दो, और देश को एक नया स्टार्टअप दो। आखिर, अगर प्रेम में पैसा खर्च हो ही रहा है, तो उसका GST क्यों न लगे? और अगर GST लगेगा, तो देश क्यों न तरक्की करे? चलो, प्रेम को लाइसेंस दो, और भारत को ‘प्रेम स्टार्टअप नेशन’ बनाओ!

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिंदी साहित्य – व्यंग्य ☆ कुत्ता नहीं —श्वान या डाॅग बाबू ! ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

सुश्री इन्दिरा किसलय

☆ व्यंग्य ☆ कुत्ता नहीं —श्वान या डाॅग बाबू ! ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

सत्यं ब्रूयात्, प्रियं ब्रूयात्, न ब्रूयात् सत्यं अप्रियम्——– शास्त्र भी खूब हैं। सत्य, प्रिय कैसे हो सकता है। अप्रिय सत्य तो साहित्यकार भी बोलने में डरते हैं। आ बैल मुझे मार, कौन कहे।

बेशक कुत्ते को कुत्ता ही कहना  पड़ता है, यही सत्य है पर यह भाषायी संस्कृति के अनुरूप नहीं है। कुत्ता शब्द गाली सा लगता है। कभी कुबेरों के विदेशी नस्ल के कुत्ते को कुत्ता बोलकर देखिए— आपको हिकारत की नज़र से न देखा जाए तो कहिएगा।

दूर क्यों जाएं S I R के लिए किसी ने “आवास प्रमाण पत्र” में कुत्ते को कुत्ता नहीं ” डाॅग बाबू” लिखा। इसे कहते हैं भाषायी संस्कार। आखिर कुत्ता प्रजाति की भी कोई इज्जत होती है कि नहीं। भाषा हाइब्रिड है तो क्या !

बात दूर तक पहुँच गई। हवा और बातें किसी से पूछकर फैलती हैं क्या?

कुत्ता कुत्ता और कुत्ता–सड़क से लेकर महाअदालत तक। कुत्ते को कुत्ता कहना बेशक अपराध न हो पर अप्रिय सत्य अवश्य हो सकता है। पर्यायवाची होते किस दिन के लिए हैं। श्वान भी तो कहा जा सकता है। मनुष्य को कुत्तों की भाषा समझती है या नहीं यह शोध का विषय है पर अपनी भाषा की भी पूरी जानकारी न होना खेद का विषय है। कुत्ते, आदमी की भाषा सीख जाते तो जाने क्या होता। वे अपने अपमान और अत्याचार को लेकर महाअदालत जाते या नहीं, कौन कह सकता है। या वे भी मनुष्य की तरह विषपायी हो चुके हैं। विष का जिनपर कोई असर होता नहीं। वैसे भी कई भाषाएं सीख लेने से समझदारी आ जाती है ऐसा कहाँ लिखा है।

भौंकना कुत्तों की नैसर्गिक भाषा है। भौंकते हैं इसलिए कुत्ता कहना न्यायसंगत नहीं। वे भौं भौं न करें तो क्या मनुष्य करेगा। हर जीव को अपनी भाषा में बात करने का पूरा अधिकार है।

अब बात कटखनेपन की। हर कुत्ता कटखना कहां होता है ! कुछ वफादार भी होते हैं। केवल अपने मालिक के लिये ही भौंकते हैं। लगातार। आठों याम। कभी थकते नहीं।

बात निकली तो आँखों के सामने अखबारों की कतरनें नाचने लगीं। सामने नमूदार हुए कुत्ताजी के “हैप्पी बर्थ डे “वाले बड़े बड़े होर्डिंग्ज। जिसपर उनके मालिक, दोस्त और अन्य शुभेच्छुओं के नाम अंकित थे। अचरज हुआ और नहीं भी। अपनी छींक और खांसी का विज्ञापन करने वाले कसमसाने लगे पर यह कसमसाहट बिजली की तरह कौंधी और विलुप्त हो गई। फिर वही ढाक के तीन पात। गली गली, हर नगर नगर, हर डगर डगर मानव प्रजाति की उपलब्धियों के दाँत चियारते हुए होर्डिंग्ज।

दिल्ली का कुत्ता काण्ड जाने किस किस बात की याद दिला रहा है। मन में विचार उठा युधिष्ठिर के साथ  उनका कुत्ता भी स्वर्ग पहुँचा था। कलियुग है। अब युधिष्ठिर ही नहीं, किसी का  भी कुत्ता स्वर्ग तक साथ निभा सकता है। कोई बताता भी नहीं कि उनका कुत्ता स्वर्ग में भी स्वामीभक्ति का परिचय दे रहा है।

स्वामिभक्ति से जापान के उस कुत्ते की याद आना स्वाभाविक है जो हर दिन नियत समय पर, रेलवे स्टेशन जाकर अपने मालिक की राह देखा करता था। अन्ततः उसका प्राणान्त हुआ, वह प्यार और वफ़ा की नज़ीर बन गया।

जापान ही नहीं कितने ही भारतीय कुत्तों में भी ये गुण पाए जाते हैं। सभी को एक ही लाठी से हाँकना ठीक है क्या ?

बड़ी देर से “अमीर खुसरो” भी ज़ेहन में उथलपुथल मचा रहे हैं। पनघट पर पनिहारिनों से पीने के लिए पानी माँग बैठे तो उन्होंने खीर चर्खा कुत्ता और ढोल पर कविता सुनाने की माँग कर दी। बस फिर क्या था खुसरो ने आव देखा न ताव चारों को दो लाइनों में समेट दिया–

“खीर पकाई जतन से, चर्खा दिया चला।

आया कुत्ता खा गया, तू बैठी ढोल बजा। । “

रही बात ताजा दौर की, पनघट तो रहे नहीं। ललनाएं खीर भी कहाँ पकाती हैं। सच ये है कि उन्हें पकाना आता ही नहीं। जब पकी ही नहीं तो कुत्ता खीर खायेगा कहाँ से? चर्खा क्या होता है? पता ही नहीं तो चलाएगा कौन ?  जब कुछ भी नहीं है तो ढोल बजाने के अलावा चारा ही क्या बचता है।

इति कुत्ता पुराण!

©  सुश्री इंदिरा किसलय 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३०३ ☆ बकरों-मुर्गों की फ़रियाद ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय व्यंग्य – ‘बकरों-मुर्गों की फ़रियाद’। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३०३ ☆

☆ व्यंग्य ☆  बकरों-मुर्गों की फ़रियाद

दिल्ली के जंतर मंतर मैदान पर एक सवेरे अचानक बकरे और मुर्गे इकट्ठे होने लगे। देखते-देखते सारा मैदान बकरों  और मुर्गों से भर गया। सब तरफ बकरों के मिमियाने और मुर्गों की बांग का शोर गूंज रहा था। उनके आगे काले कोट में दो वकील थे जो बकरों-मुर्गों के प्रवक्ता थे। बड़ी मुश्किल से दो शुद्ध शाकाहारी वकीलों को ढूंढ़ कर यह काम सौंपा गया था।

बकरों-मुर्गों के वकीलों का कहना था कि कुत्तों की रक्षा के मामले की तो सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हो गयी, लेकिन बकरों-मुर्गों के दुख को सुनने के लिए आज तक कोई पंचायत तक नहीं बैठी। यह सरासर बेइंसाफी है। उन्होंने बताया कि इस सभा के लिए भैंसें और मछलियां भी आना चाहती थीं, लेकिन भैंसों को उनके तबेले वालों ने छोड़ा नहीं और मछलियां इतनी दूर तक घिसट कर नहीं आ सकतीं।

वकीलों ने कहा कि कुत्तों को तो सिर्फ अलग बाड़े में रखने की बात पर इतना हो-हल्ला हुआ, लेकिन बकरों, मुर्गों और मछलियों को बेदर्दी से मार कर खा लिया जाता है, उनकी सुनने वाला कोई नहीं। यह काम धर्म के नाम पर भी हो रहा है, जो समझ पाना मुश्किल है। आदमी को यह  खुशफ़हमी है कि बकरों की जान लेने से उसे पुण्य या सवाब प्राप्त होता है। क्या बकरों मुर्गों को बनाने वाला कोई दूसरा है? बकरों-मुर्गों का कहना है कि भगवान का एक मुख्य अवतार मत्स्यावतार है, फिर भी मछलियों को बख्शा नहीं जाता। देहातों में अब भी बकरियों का दूध आदमी के पोषण के काम में आता है। गांधी बाबा बकरी का दूध ही पीते थे। मुर्गी के अंडे पूरी दुनिया में स्वास्थ्यवर्धक माने जाते हैं। फिर भी आदमी अपने स्वाद के लिए इन्हें मारने में एक पल भी नहीं सोचता। भैंसों का दूध बेचकर दुनिया के व्यापारी मोटा मुनाफा कमाते हैं, लेकिन उन्हीं भैंसों को ‘बीफ़’ के रूप में बेचने के पहले कोई विचार नहीं होता।

गाय हमारी माता है, लेकिन गोमूत्र और गोबर बेचकर मुनाफा कमाया जाता है। गाय के दूध और घी से भी मोटा मुनाफा मिलता है, लेकिन मुनाफे का कितना हिस्सा गाय की देखभाल पर खर्च होता है यह जांच का विषय है।

बकरों-मुर्गों का तर्क है कि  जब आदमी गुफाओं में रहता था तब उसके पास खाने को कुछ नहीं था। तब वह जंगली जानवरों को मार कर पेट भरता था। लेकिन अब तो उसके पास छप्पन व्यंजन हैं, फिर पशुओं-चिड़ियों पर ज़ुल्म क्यों? बकरे-मुर्गे ने कुत्तों की तरह भौंकते हैं, न किसी को काटते हैं, फिर भी ज़ुल्म का शिकार होते हैं। बकरों की हालत पर समाज में मुहावरे चल पड़े हैं— ‘बलि का बकरा’ और ‘बकरे की मां कब तक खैर मनाएगी?’

बकरों का कहना है कि जंगल के जानवरों और पक्षियों की रक्षा के लिए देश में कानून बन गया है। जो पशु इंसानों को नुकसान पहुंचाते हैं वे भी संरक्षित हो गये हैं। शिकार पर रोक लग गयी है। बंदरों, भालुओं, सांपों, घोड़ों पर अत्याचार दंडनीय हो गया। यहां तक कि कई पौधों के संरक्षण के लिए कानून बन गया है। बकरे-मुर्गे किसी को नुकसान नहीं पहुंचाते, लेकिन उनका पुरसाने-हाल कोई नहीं है।

उनका यह भी कहना है कि आदमी अपने को अहिंसक और शांतिप्रिय कहता है, लेकिन वह जिस तरह निरीह पशु-पक्षियों को मारता और खाता है उसे देखकर इस बात को हज़म कैसे किया जा सकता है?

बकरों ने अफसोस ज़ाहिर किया कि कुत्तों की बाड़ाबंदी पर कई श्वान-प्रेमी आंसू बहाते दिखे, लेकिन बकरों-मुर्गों की किस्मत पर आंसू बहाने वाला कभी कोई नज़र नहीं आया। 

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३०२ ☆ व्यंग्य – भाई हिम्मतलाल का संकट ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम विचारणीय कथा – ‘भाई हिम्मतलाल का संकट‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३०२ ☆

☆ व्यंग्य ☆ भाई हिम्मतलाल का संकट

भाई हिम्मतलाल ने लंबी उम्र भोगने के बाद एक दिन दुनिया को अलविदा कह दिया। उनकी आत्मा शरीर को छोड़कर सीधे दूसरे लोक को उड़ गयी।

आत्मा या रूह या ‘सोल’ के संबंध में खास बात यह है कि वह जीव के जन्म के समय से ही उच्चतम टेक्नॉलॉजी से युक्त रही है। आज के वैज्ञानिक अपनी उपलब्धियों की जो भी डींग मारें, आत्मा शरीर से अलग होते ही बिना किसी गाइडिंग मेकैनिज़्म और बिना किसी प्रोपेलर के उड़कर पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण को पार कर लेती है और मृतक के धर्म के अनुसार स्वर्ग,जन्नत या हैविन में पहुंच जाती है। आज के वैज्ञानिक अभी तक इस तरह का करिश्मा नहीं कर पाये हैं। आत्मा की इस विलक्षण क्षमता पर कोई शोध क्यों नहीं हुआ, यह ताज्जुब की बात है। ताज्जुब यह भी है कि वैज्ञानिकों ने  सारे ग्रह खोज लिये, लेकिन वे आज तक यह पता नहीं लगा सके कि स्वर्ग,जन्नत या हैविन कहां स्थित है। ग़नीमत है कि इन में आदमी का भरोसा अब भी कायम है। बहुत से तो स्वर्ग या जन्नत की उम्मीद में ही जिल्लत भरी ज़िन्दगी काट लेते हैं।

तो भाई हिम्मतलाल की आत्मा ने जो उड़ान भरी तो  सीधे एक विशाल गेट के सामने ब्रेक लगाया। हिम्मतलाल ने  देखा, गेट के ऊपर अजनबी भाषा में कुछ लिखा था। सामने तीन-चार बन्दे खड़े थे। उनमें से एक ने झुक कर हिम्मत भाई को सलाम किया। बोला, ‘ख़ुशामदीद। तशरीफ़ लाइए।’

भाई हिम्मतलाल चक्कर में पड़ गये ।पूछा, ‘यह कौन सी जगह है भाई?’

बन्दा बोला, ‘यह जन्नत और दोज़ख का दरवाज़ा है। तशरीफ़ लाइए।’

हिम्मतलाल को झटका लगा,बोले,’ अरे भैया, हम दूसरे धरम के हैं। हम स्वर्ग या नरक में जाएंगे। लगता है हमारी आत्मा का सिस्टम गड़बड़ हो गया।’

बन्दा बोला, ‘नहीं हुज़ूर, ऐसा होना मुमकिन नहीं है। आप पांच मिनट यहीं तशरीफ़ रखिए। मैं दरयाफ़्त करके आता हूं।’

भाई हिम्मतलाल धड़कते दिल से वहीं बैठे रहे। थोड़ी देर में बन्दा वापस आ गया, बोला, ‘जनाब, मैंने आपका रिकॉर्ड चेक कर लिया है। आप  सही जगह आये हैं। यहीं आपके कामों का हिसाब-किताब होगा।’

भाई हिम्मतलाल बोले, ‘अरे भाई, मेरा धरम दूसरा है। दूसरे धरम में ही पूरी जिन्दगी बसर की है। दूसरे धरम के हिसाब से ही शरीर का क्रिया-कर्म हुआ है। आप कैसी बातें करते हैं?’

बन्दा हंसकर बोला, ‘जनाब, आप भूल जाते हैं कि आपने पहली बीवी के रहते हमारा मज़हब अख़्तियार करके दूसरी शादी की थी, और उसके बाद आपने अपने पुराने मज़हब में लौटने की कोई कोशिश नहीं की।’

सुनकर हिम्मत भाई जैसे आसमान से गिरे। रिरियाकर बोले, ‘अरे भैया, पुराने धरम में कैसे लौटते? वहां  पहली बीवी के रहते दूसरी शादी की इजाज़त नहीं है। वह दरवाज़ा तो अपने लिए बन्द हो गया था।’

बन्दा बोला, ‘अब तो आप समझ गये होंगे कि आपको यहां क्यों लाया गया है। आप हैसियतदार आदमी थे, इसलिए वहां घालमेल चल गया होगा। यहां दूध का दूध और पानी का पानी होगा। आप दोनों हाथों में लड्डू रखना चाहते थे।’

हिम्मत भाई दुखी होकर बोले, ‘तो अब मेरा क्या होगा?’

बन्दा बोला, ‘मेरे ख़याल से तो आपको दोज़ख में जाना पड़ेगा क्योंकि आपके रिकॉर्ड में लिखा है कि आपने अपनी पहली नेकबख़्त बीवी पर ख़ूब ज़ुल्म किये। उनके जज़्बात से खिलवाड़ किया।  इसकी सज़ा तो आपको मिलेगी।’

हिम्मत भाई निरुत्तर होकर माथा पकड़ कर बैठ गये।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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