हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कादम्बरी # १५१ – बुन्देली कविता – ”अंगरेजन से जौन लड़ी है” ☆ आचार्य भगवत दुबे ☆

आचार्य भगवत दुबे

(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे। 

आज प्रस्तुत हैं बुन्देली कविता – अंगरेजन से जौन लड़ी है।)

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १५१ ☆

☆  बुन्देली कविता – अंगरेजन से जौन लड़ी है ☆ आचार्य भगवत दुबे ✍

अंगरेजन सें जौन लड़ी है

हमने ऊ की किसा पढ़ी है

समर भूम में झाँसी बारी

सीना ताने रई अड़ी है

 *

प्रान निछावर करे देश पै

दुश्मन खें दै दई तड़ी है

 *

खूब लड़ी मर्दानी बारी

कविता कई-कई बार पढ़ी है

 *

झाँसी में लक्ष्मी बाई की

ऊँची मूरत उतइ खड़ी है

 *

अमर भई झाँसी की रानी

हर दिल में तस्वीर जड़ी है

 *

भगवतनाँव लेत रानी कौ

जयकारों की लगत झड़ी है

© आचार्य भगवत दुबे

82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # २२३ – मानवता की ज्योति जलाएँ  ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “मानवता की ज्योति जलाएँ । आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २२३ ☆

☆ मानवता की ज्योति जलाएँ  श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

मनुज परिस्थिति से लड़ता है।

जीवन को जीना पड़ता है।।

*

मानवता की ज्योति जलाएँ ।

किसी धर्म में कुछ जड़ता है।।

*

मधुरिम-मधुर सँवारो जीवन।

बुरी सोच से मन सड़ता है।।

*

गलत कर्म से दूरी रखिए।

लज्जित हो भू में गड़ता है।।

*

चिंताओं से चिता सँवरती।

वय का पौधा तब झड़ता है।।

*

सद्पुरुषों की धरा रही यह।

कट्टरता पर कब अड़ता है??

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # २८७ – महा-प्रस्थान के क्षण १☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – महा-प्रस्थान के क्षण…१।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २८७ – महा-प्रस्थान के क्षण…१ ✍

 काल दशित दस दिशाएँ

दग्ध दिनकर मौन हैं।

चन्दन चिता पर सो गया

लेकर विदा

यह कौन है?

आह इसका मुख

कि जिससे हो रहा

आलोक प्लावन,

सम्पुटित ज्यों पुण्यगीता

वेद के श्लोक पावन!

सिद्धि के सोपान वर से

वे अधर

कि जैसे शांति के स्वर है

हारी कितनी उम्र के

मुखर होकर, बोलना ही चाहते हैं।

पाँव हैं या प्रगति के पर्याय!

संभावना के ये सफल समुदाय के

मानो डोलना ही चाहते हैं

कि

स्यात् यह निद्रा 

अरुक छंदी यात्रा की श्रांति है.

किन्तु यह निष्कंप है

कैसी भयाकुल शांति है!

वातावरण में भ्रान्ति है!

जलती चिता की गोद मे

जो शीश रखकर सो रहा

कितना तरुण है!

झेल वज्राघात

क्रमशः…

स्व डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – टिटहरी ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – टिटहरी ? ?

भीषण सूखे में भी

पल्लवित होने के प्रयास में,

जस- तस अंकुर दर्शाती,

अपने होने का भास कराती,

आशाओं को, अंगुली थाम

नदी किनारे छोड़ आता हूँ।

 

आशाओं को

अब मिल पाएगा

पर्याप्त जल और

उपजाऊ ज़मीन।

 

ईमानदारी से मानता हूँ,

नहीं है मेरा सामर्थ्य,

नदी को खींचकर

अपनी सूखी ज़मीन तक लाने का,

न कोई अलौकिक बल,

बंजर सूखे को

नदी किनारे बसाने का।

 

वर्तमान का असहाय सैनिक सही,

भविष्य का परास्त योद्धा नहीं हूँ,

ये पिद्दी-सी आशाएँ,

ये ठेंगु-से सपने,

पलेंगे, बढ़ेंगे,

भविष्य में बनेंगे

सशक्त, समर्थ यथार्थ,

एक दिन रंग लाएगा

मेरा टिटहरी प्रयास।

 

जड़ों के माध्यम से

आशाओं के वृक्ष

सोखेंगे जल, खनिज

और उर्वरापन,

अंकुरों की नई फसल उगेगी,

पेड़ दर पेड़ बढ़ते जाएँगे,

लक्ष्य की दिशा में

यात्रा करते जाएँगे।

 

मैं तो नहीं रहूँगा

पर देखना तुम,

नदी बहा ले जाएगी

सारा नपुंसक सूखा,

नदी कुलाँचें भरेगी

मेरी ज़मीन पर,

सुदूर बंजर में

जन्मते अंकुर

शरण लेंगे

मेरी ज़मीन पर,

और हाँ..,

पनपेंगे घने जंगल

मेरी ज़मीन पर..!

 

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ १७ मई से ज्येष्ठ अधिकमास आरंभ हुआ है। इसी दिन से नारायण साधना आरंभ होगी।  इसका मंत्र है – ॐ नारायणाय नम:। 🕉️

💥 इसके साथ मौन साधना एवं आत्म परिष्कार भी चलेंगे। अपनी हर निर्बलता पर विजय पाने का साधन है आत्म परिष्कार। इसका नियमित अभ्यास रखे💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २६७ ☆ # “मेरी अर्ज…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “मेरी अर्ज…”।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २६७ ☆

☆ # “मेरी अर्ज…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

तुम क्या जानो

घर से बेघर होने का दर्द

एक झोपड़ी बनाने पर भी

सर पर चढ़ जाता है कर्ज

 

जो फतवे दे रहे हैं

बस्तियां उजाड़ दो

वह मद में चूर है

उनका है ना इलाज मर्ज

 

एक तरफ मौसम का कहर

एक तरफ नफरत का जहर

एक तरफ आंखें आंसुओं से है तरबतर

इंसा कितना हो गया है खुदगर्ज

 

किससे करें शिकायत

किससे करें फरियाद

हाकिम इस शहर का

बड़ा ही है बेदर्द

 

अहं के होड़ में

हथियारों की दौड़ में

युद्ध रुकने पर बचेगी

बस गर्द ही गर्द

 

जो निशक्तों के आंसू पोंछे

सदा उनके हित सोंचे

हक के लिए लड़े दुनिया से

वही है सच्चा मर्द

 

प्रीत का मंदिर बनाओ

रिश्तो से सजा घर बसाओ

मुस्कुराते हर पल बिताओ

यही है सबसे मेरी अर्ज/

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अभी अभी # १०१३ ⇒ जीवन सुख ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – “जीवन सुख।)

?अभी अभी # १०१३  ⇒ कविता – जीवन सुख  ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

००० अभी अभी ०००

एक स्मार्ट सी धरती

स्मार्ट सा आसमान

जिसके नीचे रहता

एक स्मार्ट सा इंसान !

गम खाता,आँसू पीता

बंद शौचालय में

उन्मुक्त,बैक्टीरिया-फ्री

फाइव डे वीक

बाहर से मज़बूत

अंदर वे वीक

लाफ्टर योगा, पावर योगा

जीवन सुख भोगा ।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सलिल प्रवाह # २८२ – पर्यावरण दिवस विशेष – अशआ’र ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है पर्यावरण दिवस पर विशेष रचना  अशआ)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २८२ ☆

☆ पर्यावरण दिवस विशेष – अशआ’र ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

पर्यावरण है दोस्त लेकिन आदमी दुश्मन बना।

आज खतरा आदमी को आदमी से हो गया।।

पर्यावरण का दोस्त हो तो, आदमी महफूज हो।

यह हकीकत आदमी को, कब समझ में आएगी?

*

पाँव पर अपने कुल्हाड़ी, मारता खुद आदमी?

काटता है वृक्ष घटती आक्सीजन जान ले।।

*

पर्वतों को खोदकर, तालाब-नदियाँ पाटता।

काटता जंगल हरे, क्यों कब्र अपनी खोदता?

*

मारता-मरता जमीं के नाम पर जब आदमी।

ग़मजदा पर्यावरण हो, अश्रुधार बहा रहा।।

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

५.६.२०२६

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

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हिंदी साहित्य – कविता ☆ – कभी गाँव था – ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

☆ कविता – कभी गाँव  था

कभी गाँव था अब नगर हो गया

नदी बह रही थी ज़हर हो गया

*

यहाँ बांग देने न मुर्गे रहे

घडी बोल बैठी गजर हो गया

*

नहीं भोर होती नशा रात भर

नशे का यहाँ तो कहर हो गया

*

नहीं मानता वो खुदा की दुवा

बुरा मैकदे का असर हो गया

*

नई नस्ल काफी परेशान हैं

खुशी में हमारा सफ़र हो गया

*

नशे में युवा तो यहाँ मर रहे

वहाँ नौजवाँ तो अमर हो गया

*

पढाया लिखाया पिताने मगर

जवाँ दिल किसी की नज़र हो गया

© अशोक श्रीपाद भांबुरे

धनकवडी, पुणे ४११ ०४३.

मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सविता साहित्य # ५ – पर्यावरण ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆

सुश्री सविता खण्डेलवाल ‘भानु’

(लेखन-प्रकाशन – गत 2022 से छंद लेखन, एकल प्रकाशन– कलम के नवांकुर, अनुग्रह नवप्रस्तारित छंद पर लेखन (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), साझा संकलन – तकरीबन 10, द्वादश ज्योतिर्लिंग (लंदन बुक आफ रिकार्ड), अनेकता में एकता (एशिया बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड), छंदावली – (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), महाकाल साहित्य सम्मान से सम्मानित। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता पर्यावरण!)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सविता साहित्य # ५ ☆

☆ पर्यावरण ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆

वृक्ष काटते निशदिन मानव, होगा क्या परिणाम रे।

शीतलता कह कहाँ मिलेगी, जब आएगी घाम रे।।

खो जाएंँगे मौसम सारे, नहीं मिलेगी बूंँद रे।

जागो अब कब तक बैठोगे, ऐसे आंँखें मूंँद रे।।

निशिदिन जंँगल खाली होते, धरती करती शोक रे।

धानी चुनर फटती जाती, मानव इसको रोक रे।।

रौद्र रूप जब धारे माता, होगा क्या परिणाम रे।

शीतलता कह कहाँ मिलेगी, जब आएगी घाम रे।।

पर्यावरण दिवस जब आए, आती सबको याद रे।

वृक्ष नीर हम लोग बचाएंँ, भूले इसके बाद रे।।

दिव्य संपदा का अति दोहन, होगा ये अभिशाप रे।

भारत माँ आवाज लगाती, बंद करो ये पाप रे।।

हरित क्रांति से वसुंधरा का, दृश्य बनें अभिराम रे।।

शीतलता कह कहाँ मिलेगी, जब आएगी घाम रे।।

© सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु”

झालरापाटन राजस्थान

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # ३३ – कविता – कॉकरोच… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर ☆

डॉ.राजेश ठाकुर

( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का  मंतव्य उनके ही शब्दों में –पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “कॉकरोच“.)  

? साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # ३३?

? कविता – कॉकरोच… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर  ? ?

?

=1=

फैले हैं कितने-कहाँ कॉकरोच पता कर

इनकी कहाँ तलक है एपरोच पता कर

= 2 =

मरे हुए पे रोते हैं, ज़िन्दा को रुलाते

कब मरा ज़मीर निःसंकोच पता कर

= 3 =

पेट्रोल गैस डीजल की किल्लतों से उफ़्फ़

सत्ता को कुछ आई क्या खरोंच पता कर

= 4 =

लीकेज़ किसने किया युवा पूछ रहा है

नीट से लड़ाई किसने चोंच पता कर

= 5 =

कौन कर रहा है अच्छे दिन के नाम पर

ये लूटमार-छीन-झपट-नोंच पता कर

= 6 =

क़िरदार जा टकराया एपस्टीन शिला से

तब भी तनिक न आई क्यों मोच पता कर

= 7 =

कंकाल ले बहन का पहुँचा बैंक में बंदा

क्यों ऐसा दाँव-पेंच किसकी सोच पता कर

= 8 =

ख़्वाहिश तो बादशाह की भी रहती अधूरी

सियासती लोचे में क्यूँ ये लोच पता कर

= 9 =

‘राजेश’ हर मशीनरी निढाल पड़ी है

कानून को किसने लिया दबोच पता कर

© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर

शासकीय कॉलेज़ केवलारी

संपर्क — ग्राम -धतूरा, पोस्ट – जामगाँव, तहसील -नैनपुर, जिला -मण्डला (म.प्र.) मोबा. 9424316071

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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