सूचनाएँ/Information ☆ बाल साहित्यकार ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ को वर्ष 2023 का महाराणा सूरजमल बाल विज्ञान साहित्य सम्मान – अभिनंदन ☆ साभार – श्री अरविंद कुमार संभव, संयोजक ☆

 ☆ सूचनाएँ/Information ☆

(साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समाचार)

🌹 बाल साहित्यकार ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ को वर्ष 2023 का महाराणा सूरजमल बाल विज्ञान साहित्य सम्मान – अभिनंदन 🌹

🌹 जयपुर साहित्य संगीति 🌹

(कलम, तूलिका, वाद्य, नाट्य, कला, मेधा का बौद्धिक संगम)

इस के अंर्तगत इस वर्ष 2023 का महाराणा सूरजमल बाल विज्ञान साहित्य सम्मान बाल साहित्यकार ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ और लखनऊ के डॉक्टर जाकिर अली रजनीश को प्रदान कर सम्मानित किया जाएगा।

🌹 जयपुर बाल साहित्य सम्मान वर्ष 2023 – परिणाम🌹

बाल साहित्य पर विभिन्न विधाओं में सम्मान वर्ष 2023 हेतु

1.बप्पा रावल बालगीत सम्मान

राजकुमार निजात, सिरसा हरियाणा

कुसुम अग्रवाल राजसमन्द राजस्थान

2. राणा हम्मीर बाल कहानी सम्मान

1.नीलम राकेश, लखनऊ

2.डा. शील कौशिक, सिरसा हरियाणा

3. महाराजा सूरजमल बाल विज्ञान साहित्य सम्मान

1.ओम प्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’, रतनगढ़ नीमच मध्यप्रदेश

2.डा. जाकिर अली रजनीश, लखनऊ

4. मेजर शैतान सिंह बाल कार्टून कथा सम्मान

कोई नहीं

5. राणा सांगा धार्मिक बोधकथा सम्मान

कोई नहीं

6. महाराणा प्रताप बाल शौर्य कथा सम्मान

कोई नहीं

🌹  जयपुर बाल साहित्य सम्मान 2023 विशेष अलंकरण पत्र 🌹

(बाल साहित्य में बेहतरीन समग्र एवं सतत् कार्य करने हेतु)

1. डा. चेतना उपाध्याय, अजमेर
2. दीनदयाल शर्मा, हनुमानगढ़
3. ताराचंद मकसाने, नवीं मुम्बई
4. रोचिका अरुण शर्मा, चैन्नई
5. डा. देशबंधु शाहजहांपुर, शाहजहांपुर यूपी
6. सुशीला शर्मा, जयपुर
7. अलका अग्रवाल, जयपुर
8. डा. सुधीर आजाद, भोपाल
9. तरुण कुमार दाधीच, उदयपुर
10. प्रो. राजेश कुमार, नौएडा
11. विमला नागला, केकड़ी, अजमेर
12 संगीता सेठी, बीकानेर
13. परी जोशी, भोपाल

संयोजक की टिप्पणी

लगभग दो माह पूर्व बच्चों में बाल साहित्य को पढ़ने की उत्सुकता जगाने तथा राजस्थान के वीर रणबांकुरे योद्धाओं के बारे में जानने के उद्देश्य से राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिवर्ष चयनित बाल साहित्यकारों को विभिन्न विधाओं में सम्मानित करने के ध्येय से यह बाल साहित्य सम्मान योजना प्रारम्भ की गयी थी। इसमें कुल 24 बाल साहित्यकारों के नाम के प्रस्ताव आये जिनमें से ज्यादातर बप्पा रावल और राणा हम्मीर बाल साहित्य सम्मान के लिये थे। ‌ महाराजा सूरजमल, मेजर शैतान सिंह, राणा सांगा और महाराणा प्रताप बाल साहित्य सम्मान के लिये रखी गयी विधाओं में या तो प्रविष्टि आयी ही नहीं या फिर बहुत कम।

बाल कथा और बाल कविता में सर्वश्रेष्ठ साहित्यकार का चयन करना इसलिए भी बहुत कठिन हो गया क्योंकि लगभग सभी ने इन विधाओं में बहुत काम किया है। हालांकि हमारी मूल विज्ञप्ति के उस क्लाज़ को ज्यादातर ने शायद पढ़ा नहीं जिसमें लिखा था कि यह सम्मान योजना उन्हीं लेखकों के लिये है जो मूल एवं समग्र रूप से केवल बाल साहित्य में ही लिखते हैं। कभी कभार बाल कविता या कहानी लिखने वालों के लिये यह योजना नहीं थी।

फिर भी हमने कोशिश की है कि गुणवत्ता की उपेक्षा नहीं की जाये। इसीलिए प्रथम तीन श्रेणियों में प्रत्येक में दो दो लेखकों का चयन किया गया है।

चयन करते समय न तो हमने इस बात पर गौर किया है कि व्यक्ति विशेष को कितने और कहाँ कहाँ से अब तक पुरस्कार मिले हैं और ना ही हमने उनसे उनके द्वारा प्रकाशित पुस्तकों का बंडल मंगवाया। हमने केवल बाल साहित्य में सतत् रूप से किये गये उनके कार्य पर ही दृष्टि रखी। अन्य सब हमारे लिए गौण था।

इसी श्रेष्ठता को दृष्टि में रखते हुए कुछ लेखकों को अतिरिक्त रूप से भी विशिष्ट अलंकरण पत्र से सम्मानित करने का निर्णय लिया गया जिनकी सूची भी संग में ही जारी कर दी गयी है। ये सभी बाल साहित्य में समान रूप से विद्वान हैं और पुरस्कार/ सम्मान की किसी भी श्रेणी में आने की योग्यता रखते हैं।

विशिष्ट अलंकरण पत्र से सम्मानित सभी साहित्यकारों को अलंकरण पत्र डाक से प्रेषित कर दिया जायेगा। यदि वे स्वयं उपस्थित होकर इसे लेना चाहें तो पूर्व सूचना देकर दिनांक 25 जून 2023 को जयपुर साहित्य संगीति के तत्वाधान में आयोजित जयपुर साहित्य सम्मान 2023 अलंकरण समारोह एवं साहित्योत्सव में पधार कर इसे ग्रहण कर सकते हैं। यात्रा एवं आवास की व्यवस्था आपकी स्वयं की ही रहेगी।

कार्यक्रम स्थल

एस एफ एस सामुदायिक केंद्र सभागार, अग्रवाल फार्म, मानसरोवर, जयपुर 302020.

समय प्रातः 9 बजे से

साभार – श्री अरविंद कुमार संभव, संयोजक
9950070977

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – सार्वकालीन ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। )

? संजय दृष्टि – सार्वकालीन ??

मेरा समय

क्षुब्ध है मुझसे,

निरर्थक बिता देने से

क्रुद्ध है मुझ पर,

पर यह केवल

मेरा सत्य नहीं है,

स्वयं को कर्ता समझ कर

जब कभी इस कविता को बाँचोगे,

इसमें प्रयुक्त ‘मेरा’ को

स्वयं पर भी लागू पाओगे,

इसलिए कहता हूँ,

अपने समय का

और हर समय का

सार्वभौम यथार्थ कहती है,

कविता समकालीन होती है,

कविता सार्वकालीन रहती है!

© संजय भारद्वाज 

रात्रि 12:10 बजे,28.4.22

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆   ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ श्री हनुमान साधना 🕉️

अवधि – 6 अप्रैल 2023 से 19 मई 2023 तक।

💥 इस साधना में हनुमान चालीसा एवं संकटमोचन हनुमनाष्टक का कम से एक पाठ अवश्य करें। आत्म-परिष्कार एवं ध्यानसाधना तो साथ चलेंगे ही 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों  को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # 137 – जोड़ लिया है कैसा नाता… ☆ डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

डॉ राजकुमार तिवारी ‘सुमित्र’

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी  हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। आज प्रस्तुत हैं आपकी एक भावप्रवण रचना – जोड़ लिया है कैसा नाता…।)

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # 137 – जोड़ लिया है कैसा नाता…  ✍

जोड़ लिया है कैसा जाता

इधर उधर जब हो जाती तो

जाने कैसा मन घबराता।

जनम जनम के प्यासे मन को

पनघट का आधार मिला

जिसे सदा दुत्कार मिली हो

उसको गहरा प्यार मिला

क्या जानूँ तुम किन जन्मों की

पत्नी, प्रेयसी या माता।

सुबह शाम या सोते जगते

नयनों में छवि उतराती

तुम जीवन की चटक चाँदनी

हो मेरी पुण्य प्रभाती।

शक्ति भक्ति आसक्ति तुम्हीं हो

नींद तुम्हीं तुम जगराता।

© डॉ राजकुमार “सुमित्र”

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

Please share your Post !

Shares

मराठी साहित्य – जीवनरंग ☆ ‘एक नंबर शिवणार’… भाग १ – लेखक – श्री राजेंद्र परांजपे ☆ प्रस्तुती – श्री मेघःशाम सोनवणे ☆

श्री मेघःशाम सोनवणे

?जीवनरंग ?

☆ ‘एक नंबर शिवणार’… भाग १ – लेखक – श्री राजेंद्र परांजपे ☆ प्रस्तुती – श्री मेघःशाम सोनवणे ☆

रविवारची सकाळ. आम्ही सगळे झोपेत होतो. इतक्यात दारावरची बेल वाजली. आधी मी दुर्लक्ष केलं. वाटलं भास असेल. पण दोन मिनिटांनी पुन्हा वाजली. तिसऱ्या वेळेस जेव्हा वाजली तेव्हा नाईलाजाने उठावं लागलं. उठून घड्याळात बघितलं तर जेमतेम साडेसात वाजत होते. म्हणजे रविवारच्या मानाने पहाटच म्हणायची.

मी आळस देतदेतच दार उघडलं. दारात साधारण चाळीस एक वर्षांचा एक काळासावळा माणूस उभा होता. अंगात पांढरा लेंगा झब्बा, आणि डोक्यावर मळकी गांधीटोपी. दाढीचे खुंट वाढलेले. त्याच्या हातात एक कापडी पिशवीपण होती. मी त्याला ओळखलं नाही.

माझ्या चेहऱ्यावरचे भाव बघून तोच म्हणाला, “साहेब, नमस्कार. मी राजाराम.”

“सॉरी, मी तुम्हाला ओळखलं नाही.” मी म्हणालो.

“अहो कसं ओळखणार? आपण पहिल्यांदाच भेटतो आहोत. मला बाबासाहेब देशमुखांनी तुमचा पत्ता दिला आणि भेटायला सांगितलं.” त्याने स्पष्टीकरण दिलं.

बाबासाहेब देशमुख म्हणजे प्रसिद्ध इतिहास संशोधक. माझे चांगले आणि गेल्या अनेक वर्षांपासूनचे मित्र. त्यांनी पाठवलंय म्हणजे हा माणूस नक्कीच कामाचा असणार. हे लक्षात आल्यावर, मी राजारामला म्हणालो,

“या ना, आत या. बसा. मी तुमच्यासाठी पाणी घेऊन येतो.”

“साहेब, तुम्ही मला अहो जाहो नका करु. नुसतं राजाराम म्हणा. मी लहान माणूस आहे.” राजाराम म्हणाला.

“बरं, बस राजाराम. मी आलोच” असं म्हणून मी आत जाऊन त्याच्यासाठी पाणी घेऊन आलो, आणि काय काम आहे ते विचारलं.

“साहेब, मी जुनी फाटकी पुस्तकं शिवतो.  देशमुखसाहेब म्हणाले की तुम्हीपण त्यांच्यासारखेच इतिहास संशोधक आहात. त्यामुळे तुमच्याकडेपण शिवण्यासारखी अशी दुर्मिळ आणि फाटकी पुस्तकं असतील तर ती द्या. एक नंबर शिवतो बघा मी ती. अगदी नव्यासारखी करुन देतो.” राजारामने त्याच्या येण्याचं प्रयोजन सांगितलं.

त्याचं म्हणणं खरं होतं, मीदेखील गेली तीसेक वर्ष इतिहासाचा अभ्यासक असल्यामुळे, कुठून कुठून जुनी आणि दुर्मिळ पुस्तकं, ग्रंथ, बखरी आणि इतर बरेच ऐतिहासिक दस्तावेज जमा केले होते. त्यातल्या काहींची अवस्था खूप नाजूक होती. ती व्यवस्थित शिवणं गरजेचं होतं. नाहीतर त्यातली पानं सुटून गहाळ होण्याची शक्यता होती. त्यामुळे मी अशाच एखाद्या माणसाच्या शोधत होतो. बरं झालं बाबासाहेबांनी त्याला धाडला ते.

“आहेत अशी पुस्तकं वगैरे. अरे पण ती बेडरुममधे कपाटात आहेत. बेडरूम मध्ये माझी बायको आणि मुलगा झोपले आहेत. कपाटातून पुस्तकं बाहेर काढताना कदाचित त्यांची झोपमोड होईल. तू असं कर, तू दुपारनंतर ये. तोपर्यंत मी ती काढून ठेवतो.” मी म्हणालो.

 “दुपारनंतर?” तो चाचरत पुढे म्हणाला, “साहेब, मी अंबरनाथला राहतो. आता घरी जाऊन परत यायचं म्हणजे खूप उशीर होईल. त्यापेक्षा मी तुमच्या बिल्डिंगच्या खालीच थांबतो, आणि तासाभराने वर येतो. चालेल?

अंबरनाथला राहतो? अरे बापरे ! तिथून निघून हा माणूस रविवारी इतक्या लवकर अंधेरीला माझ्या घरी पोहोचला? पहिल्यांदाच आल्यामुळे माझं घर शोधण्यातदेखील त्याचा थोडा वेळ गेला असेलच. कमाल आहे या माणसाची. म्हणजे घरुन निघाला तरी किती वाजता असेल हा? मनातल्या मनात विचार करुन मी त्याला म्हणालो, “बरं, चालेल. मी लवकरात लवकर पुस्तकं बाहेर आणतो. पण तू घरुन काही खाऊन निघालास का?”

“हो साहेब” तो म्हणाला खरा, पण त्याच्या चेहऱ्यावरून स्पष्ट जाणवत होतं की तो खोटं बोलतोय. घरुन निघताना किंवा वाटेत त्याने काहीच खाल्लेलं नसावं. मी खणातून माझं पाकीट काढलं, आणि त्यातली शंभरची नोट काढून त्याच्या पुढ्यात धरुन म्हटलं “हे घे आणि कोपऱ्यावर जाऊन आधी चहा, नाश्ता करुन ये.”

राजारामने थोडे आढेवेढे घेतले, पण मी ती नोट त्याच्या खिशातच कोंबल्यावर त्याचा नाईलाज झाला. तो नाश्ता करायला गेला.

तो चहा, नाश्ता करुन येईपर्यंत, मी पुस्तकं काढून ठेवली होती. ही पुस्तकं शिवायचं काम तो कुठे बसून करणार, असा माझ्या मनात प्रश्न आला. पण जणू काही तो वाचून, राजारामच म्हणाला, “साहेब, तुम्ही तुमची गॅरेजमधली गाडी थोडावेळ बाहेर लावलीत तर मी तिथे बसून काम करतो. चालेल का?”

राजाराम हुशारीने आधीच सगळा विचार करुन आला होता तर. मला त्याचं कौतुक वाटलं. आणि त्याचा प्रस्तावही चांगला होता. मग आम्ही दोघांनी मिळून पुस्तकं आणि एक मोठी चटई खाली नेली. मी माझी गाडी बाहेर लावली, आणि गॅरेजची जागा त्याला मोकळी करुन दिली. त्याने ताबडतोब चटई अंथरुन त्याच्या जवळच्या पिशवीतून दाभण, दोरा, गोंद, चिकटपट्टी वगैरे सामान काढलं आणि तो कामाला लागला.

“एक नंबर शिवणार बघा साहेब. काही काळजीच नको तुम्हाला आता या पुस्तकांची. या तुम्ही तुमचं आवरुन.”  तो म्हणाला.

वॉचमनला त्याच्यावर लक्ष ठेवायला सांगून मी घरी गेलो आणि आंघोळ, चहा नाश्ता करुन पुन्हा तासा दीड तासाने खाली गेलो. तोपर्यंत त्याने अर्धअधिक काम संपवलं होतं. कामातली त्याची सफाई बघून मी खुश झालो. त्याच्याशी गप्पा मारता मारता मला समजलं की त्याच्या घरी त्याची बायको आणि आई आहे. त्या दोघी लोकांकडे धुणी, भांडी करतात आणि फावल्या वेळेत गोधड्या, पिशव्या वगैरे शिवण्याचंही काम करतात. आणि हा चपलांपासून पुस्तकांपर्यंत सगळं शिवतो. तसे खाऊन पिऊन सुखी होते तिघे, पण त्याच्या लग्नाला पंधरा वर्ष झाली तरी अजून पाळणा हलला नव्हता. हा सल त्याच्या मनात होता, तो त्याने दोन तीन वेळा बोलूनही दाखवला. असतं एकेकाचं नशीब.

 आणखी तासाभरात त्याचं काम संपलं. आम्ही पुस्तकं घेऊन वर घरी आलो. अगदी मला हवं होतं तसं काम केलं होतं त्याने. त्याला काही खायला देऊन, मी पैसे विचारले. माझ्या अंदाजापेक्षा त्याने कमीच सांगितले. मी ते दिले. त्याबरोबर त्याने त्यातले शंभर रुपये मला परत दिले. “साहेब, हे सकाळी तुम्ही मला नाश्त्यासाठी दिले होते.” तो म्हणाला.

मी अवाक् झालो. आजच्या लबाडीच्या जगात इतका प्रामाणिकपणा? नाहीतर लोक ठरलेले पैसे दिल्यावरसुद्धा वर लोचटपणे आणखी बक्षिसी मागतात. मी राहू दे म्हंटलं. पण त्याने ऐकलं नाही. ती नोट त्याने टेबलावर ठेवली आणि नमस्कार करुन तो निघून गेला. जाण्याआधी, ‘परत काही काम असेल तर सांगा साहेब, एक नंबर शिवणार’ हे सांगायला, आणि आपला फोन नंबर एका कागदावर लिहून द्यायला तो विसरला नाही. पण दुर्दैवाने राजारामने लिहून दिलेला त्याचा नंबर माझ्याकडून हरवला. त्यामुळे नंतर त्याच्याशी कुठलाच संपर्क झाला नाही. बाबासाहेबांकडून त्याचा नंबर घेईन म्हंटलं, पण तेही राहूनच गेलं.

क्रमश:  भाग 1

मूळ लेखक – राजेंद्र परांजपे  

संग्राहक – मेघःशाम सोनवणे

मो 9325927222

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

Please share your Post !

Shares

सूचनाएँ/Information ☆ साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समाचार – जयपुर से ☆ प्रस्तुति – डॉ निशा अग्रवाल ☆

 ☆ सूचनाएँ/Information ☆

(साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समाचार)

🌹 साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समाचार – जयपुर  से  – डॉ निशा अग्रवाल🌹

🌹अभ्युदय अन्तरराष्ट्रीय का वार्षिक कार्यक्रम आयोजित🌹

अभ्युदय अन्तरराष्ट्रीय द्वारा देश की राजधानी दिल्ली के हिन्दी भवन में दिनांक 8अप्रैल 2023 को भव्य आयोजन आस्ट्रेलिया से पधारी विश्व प्रसिद्ध विदूषी डॉ मृदुल कीर्ति व जयपूर से पधारी वरिष्ठ साहित्यकार मृदुला बिहारी जी के विशेष स्वागत व सम्मान में।

वर्ष 2021 – 2022का घोषित अभ्युदय अंतरराष्ट्रीय का विशिष्ट सम्मान व पुरस्कार डॉ. मृदुल कीर्ति, मृदुला बिहारी, डॉ शशी मंगल को दिया जाएगा, इसके साथ ही दिल्ली की कुछ खास विभूतियों को भी सम्मानित किया जाएगा। इसके साथ ही पुस्तक लोकार्पण व परिचर्चा में वरिष्ठ साहित्यकार अपने विचार रखेंगे।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करेंगे वरिष्ठ साहित्यकार विजयकिशोर मानव, मुख्य अतिथि की भूमिका में वरिष्ठ साहित्य सेवी व शिक्षाविद प्रो( डॉ) नवीनचन्द्र लोहनी और सान्निध्य प्राप्त होगा वरिष्ठ कवि व साहित्यकार लक्ष्मीशंकर बाजपेयी,  पूर्व दिल्ली दूरदर्शन कार्यक्रम निदेशक संस्था सहअध्यक्ष डॉ अमरनाथ अमर, पूर्व दिल्ली आकाशवाणी के पूर्व सहायक निदेशक संस्था उपाध्यक्ष भीमप्रकाश शर्मा, कलकता से पधारी संस्था की सुप्रसिद्ध कवयित्री व छन्दों की ज्ञाता महासचिव चन्दा प्रहलाद, बनारस से पधारी संस्था की सहसचिव व उत्तर प्रदेश शाखा की अध्यक्ष सुप्रसिद्ध कवयित्री डॉ.मंजरी पाण्डेय,  मध्य जोन अध्यक्ष डॉ.रचना शर्मा का।

इस आयोजन में सहभागिता निभाने के लिए राजस्थान से पश्चिम जोन की अध्यक्ष डॉ निशा अग्रवाल, विशेष सचिव राजपुताना इतिहास के अध्येता शिवराज पाल, महाराष्ट्र शाखा की अध्यक्ष लता नौवाल, हरियाणा शाखा सचिव मंजु तंवर, विशेष सचिव अमिता श्रीवास्तव के साथ दिल्ली व हरियाणा के संस्था पदाधिकारियों व सदस्यों के साथ दिल्ली शहर के प्रतिष्ठित वरिष्ठ व प्रसिद्ध प्रतिभा के धनी साहित्य व कला के विद्वतजन भी उपस्थित होकर संस्था को गौरवान्वित करेंगें।

साभार –  डॉ निशा अग्रवाल

जयपुर ,राजस्थान  

 ☆ (ब्यूरो चीफ ऑफ जयपुर ‘सच की दस्तक’ मासिक पत्रिका)  ☆ एजुकेशनिस्ट, स्क्रिप्ट राइटर, लेखिका, गायिका, कवियत्री  ☆ 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

Please share your Post !

Shares

मराठी साहित्य – विविधा ☆ विचार–पुष्प – भाग 62 – स्वामी विवेकानंदांचं राष्ट्र-ध्यान – लेखांक तीन ☆ डाॅ.नयना कासखेडीकर ☆

डाॅ.नयना कासखेडीकर

?  विविधा ?

☆ विचार–पुष्प – भाग 62 –   स्वामी विवेकानंदांचं राष्ट्र-ध्यान –  लेखांक तीन ☆ डाॅ.नयना कासखेडीकर 

स्वामी विवेकानंद यांच्या जीवनातील घटना-घडामोडींचा आणि प्रसंगांचा आढावा घेणारी मालिका विचार–पुष्प.

आपल्या समाजातील अज्ञान आणि दारिद्र्य दूर कसे होईल आणि भारताचे पुनरुत्थान कसे होईल?त्याच्या आत्म्याला जाग कशी येणार? याच प्रश्नावर जास्त वेळ चिंतन करत होते.

प्राचीन ऋषीमुनींनी दिलेले उदात्त आध्यात्मिक विचार आणि जीवनाची श्रेष्ठ मूल्ये खालच्या थरातील माणसांपर्यंत पोहोचवण्याची गरज आहे असे त्यांना तीव्रतेने वाटत होते. सामान्य माणसाच्या सेवेसाठी आणी उन्नतीसाठी आपण प्रयत्न करायचा असा स्वामीजींचा निर्णय झाला. हे करण्यासाठी पाच दहा माणसं आणि पैसा हवाच. पण या दरिद्री देशात पैसे कुठून मिळणार? त्यांना आलेल्या अनुभवा नुसार धनवान मंडळी उदार नव्हती.

आता अमेरिकेत सर्वधर्म परिषद भरते आहे. तिथे जाऊन त्यांना भारताच्या आध्यात्मिक संस्कृतीचा परिचय करून द्यावा आणि तिकडून पैसा गोळा करून आणून इथे आपल्या कामाची ऊभारणी करावी. आता उरलेले आयुष्य भारतातल्या दीन दलितांच्या सेवेसाठी घालवायचे असा संकल्प स्वामीजींनी केला आणि शिलाखंडावरून ते परतले. समाजाला जाग आणण्याचा आणि आपल्या देशातील बांधवांचे पुनरुत्थान घडवून आणण्याचा संकल्प त्यांनी केला. त्याच बरोबर स्वतविषयी अहंकार असणार्‍या पाश्चिमात्यांना आपल्या पौर्वात्त्यांच्या अनुभवापुढे नम्र होण्यास स्वामीजी प्रवृत्त करणार होते. आणि त्यासाठी भारताचा अध्यात्मिक संदेश जगभर पोहोचविणार होते. कारण सर्व मानव जातीने स्वीकारावीत अशी शाश्वत मूल्ये आपल्याला आपल्या पूर्वजांनी दिली आहेत. हे त्यांनी अनुभावातून आणि वाचनातून जाणून घेतलं होतं. 

स्वामीजींनी ध्यान केलं होतं जगन्मातेचं आणि चिंतन केलं होतं भारतमातेचं. तीन दिवस तीन रात्रीच्या चिंतनातून प्रश्नाचं उत्तर स्वामीजींना मिळालं होतं. २५ ,२६, २७ डिसेंबर १८९२ ला स्वामीजींच्या वैचारिक आंदोलनाने सिद्ध झालेल्या याच शिलाखंडावर भव्य असे विवेकानंद शिलास्मारक उभे आहे.

कन्याकुमारीचे विवेकानंद शिला स्मारक हा धर्म कार्याच्या विकासाचा पहिला टप्पा होता. त्यानंतर विवेकानंद केंद्र राष्ट्रीय पातळीवर सुरू झाले हा दूसरा टप्पा तर विवेकानंद केंद्र इंटरनॅशनल  ही पुढची संकल्पना . या पातळीवर स्वामीजींच्या स्वप्नातले विश्वव्यापी काम सुरू आहे.

स्वामीजींचे जीवन पाहता त्यांचे चरित्र आणि त्यांनी दिलेला संदेश खूप सुसंगत आहेत. ते हिंदुत्वाचे सर्वोत्कृष्ट प्रतींनिधी तर होतेच पण, ते सर्वाधिक थोर आणि जाज्वल्य असे आंतरराष्ट्रीयवादी ,आधुनिक भारतीय सत्पुरुष होते .  

स्वामीजी कन्याकुमारीला पोहोचले तेंव्हा ते एक संन्यासी होते. पण या तीन दिवसांनंतर परिवर्तन होऊन तो, राष्ट्र उभे करणारा श्रेष्ठ नेता,जगाला त्याग आणि सेवेचा नवा संदेश देणारा श्रेष्ठ गुरु, एक खरा देशभक्त म्हणून जगन्मान्य झाला. स्वामीजींच्या स्वप्नातल्या कार्ययोजनेला प्रत्यक्ष स्वरूप देणारं हे  वैचारिक आंदोलन केंद्रच आहे. आज ही श्रीपाद शिला विवेकानंद शिला म्हणून सर्वदूर परिचित आहे. या स्मारकाचे प्रेरणास्थान एकनाथजी रानडे आहेत. १९६३ मध्ये स्वामी विवेकानंद यांच्या जन्मशताब्दी निमित्त त्यांची आठवण म्हणून हे शिला स्मारक करण्याचा निर्णय घेतला. अनेक अडचणी आल्या.पण हे स्मारक आज या इतिहासाची साक्ष तर देतच आहे आणि कामासाठी प्रेरणा व विचार पण देतंय.

क्रमशः…

© डॉ.नयना कासखेडीकर 

 vichar-vishva.blogspot.com

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

Please share your Post !

Shares

मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ क्रांतीसूर्य सावरकर ☆ श्री सुहास रघुनाथ पंडित ☆

श्री सुहास रघुनाथ पंडित

? कवितेचा उत्सव ?

☆ क्रांतीसूर्य सावरकर ☆ श्री सुहास रघुनाथ पंडित 

जयोस्तुते श्री परम् विक्रमी क्रांतीच्या सूर्या

तेजोमय ही जीवनारती आपण गाऊया ।

राष्ट्राचा अभिमान सार्थ तू स्फूर्ती शहिदांची

पूजा बांधिली प्राणपणाने स्वातंत्र्यदेवीची ।

खड्गासंगे कलमाच्या तू इतिहास रचियेला

पतिता  संगे  पतित  पावन पावन तू  केला ।

पर्वत   बनुनी  धैर्याचा  तू   झुंज  कधी  देशी

सार्थ नाम हे ‘विनायक’, तू शब्दप्रभू होशी ।

शक्ती, बुद्धी ही तुझीच रूपे तू शूर सेनानी

अनादी आणि अनंत तू ,गातो तूज कवनी ।

© सुहास रघुनाथ पंडित 

सांगली (महाराष्ट्र)

मो – 9421225491

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ श्री हनुमान चालीसा – विस्तृत वर्णन – भाग – 9 ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆

ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय

(ई-अभिव्यक्ति ने समय-समय पर श्रीमदभगवतगीता, रामचरितमानस एवं अन्य आध्यात्मिक पुस्तकों के भावानुवाद, काव्य रूपांतरण एवं  टीका सहित विस्तृत वर्णन प्रकाशित किया है। आज से आध्यात्म की श्रृंखला में ज्योतिषाचार्य पं अनिल पाण्डेय जी ने ई-अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों के लिए श्री हनुमान चालीसा के अर्थ एवं भावार्थ के साथ ही विस्तृत वर्णन का प्रयास किया है। आज से प्रत्येक शनिवार एवं मंगलवार आप श्री हनुमान चालीसा के दो दोहे / चौपाइयों पर विस्तृत चर्चा पढ़ सकेंगे। 

हमें पूर्ण विश्वास है कि प्रबुद्ध एवं विद्वान पाठकों से स्नेह एवं प्रतिसाद प्राप्त होगा। आपके महत्वपूर्ण सुझाव हमें निश्चित ही इस आलेख की श्रृंखला को और अधिक पठनीय बनाने में सहयोग सहायक सिद्ध होंगे।)   

☆ आलेख ☆ श्री हनुमान चालीसा – विस्तृत वर्णन – भाग – 9 ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆

जम कुबेर दिगपाल जहां ते।

कबि कोबिद कहि सके कहां ते।।

अर्थ:- यमराज, कुबेर आदि सब दिशाओं के रक्षक, कवि विद्वान, पंडित या कोई भी आपके यश का पूर्णतः वर्णन नहीं कर सकते।

भावार्थ:- यह चौपाई श्री रामचंद्र जी द्वारा हनुमान जी की प्रशंसा में कही गई है। उन्होंने कहा है कि यम अर्थात यमराज, जो हर व्यक्ति का लेखा जोखा रखते हैं, कुबेर अर्थात विश्व के सभी ऐश्वर्य के स्वामी दसों दिगपाल अर्थात दसों दिशाओं के रक्षक  देवता गण विश्व के सभी कवि सभी विद्वान सभी पंडित मिलकर के भी आपके यश का पूर्णत वर्णन नहीं कर सकते हैं।

संदेश-

अगर आप अच्छी इच्छा शक्ति और अच्छे इरादे  के साथ कर्म करें तो आपकी प्रशंसा करने के लिए सभी बाध्य हो जाते हैं।

इस चौपाई का बार बार पाठ करने से होने वाला लाभ:-

जम कुबेर दिगपाल जहां ते, कबि कोबिद कहि सके कहां ते।।

हनुमान चालीसा की इस चौपाई के बार बार पाठ करने से यश कीर्ति की वृद्धि होती है, मान सम्मान बढ़ता है।

विवेचना:-

यह चौपाई “जम कुबेर दिगपाल जहां ते, कबि कोबिद कहि सके कहां ते” इसके पहले की चौपाई “सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा नारद सारद सहित अहीसा “ के साथ पढ़ी जानी चाहिए। इस चौपाई में भी श्री रामचंद्र जी ने हनुमान जी की प्रशंसा की है। यम से यहां पर आशय यमराज से है जो कि मृत्यु के देवता है। इनके पिताजी भगवान सूर्य कहे जाते हैं और यमुना जी इनकी बहन है। इनके अन्य भाई बहनों के नाम शनिदेव, अश्वनीकुमार, भद्रा, वैवस्वत मनु, रेवंत, सुग्रीव, श्राद्धदेव मनु और कर्ण है। इनके एक पुत्र का नाम युधिष्ठिर है जो पांच पांडवों में से एक हैं। यमराज जी जीवों के शुभाशुभ कर्मों के निर्णायक हैं। वे परम भागवत, बारह भागवताचार्यों में हैं। यमराज दक्षिण दिशा के दिक्पाल कहे जाते हैं। ये समस्त जीवो के अच्छे और बुरे कर्मों को बताते हैं। परंतु ये भी हनुमान जी द्वारा किए गए अच्छे कार्यों को  पूर्णरूपेण बताने में असफल हैं।

कुबेर जी धन के देवता माने जाते हैं पूरे ब्रह्मांड का धन इनके पास है। यक्षों के राजा कुबेर उत्तर दिशा के दिक्पाल हैं। संसार के रक्षक लोकपाल भी हैं। इनके पिता महर्षि विश्रवा थे और माता देववर्णिणी थीं। वह रावण, कुंभकर्ण और विभीषण के सौतेले भाई हैं। धन के देवता कुबेर को भगवान शिव का द्वारपाल भी बताया जाता है। श्री कुबेर जी के पास ब्रह्मांड का पूरा धन होने के उपरांत भी वे हनुमान जी की कीर्ति की व्याख्या पूर्ण करने में असमर्थ हैं।

सनातन धर्म के ग्रंथों में दिक्पालों का बड़ा महत्व है। सनातन धर्म के अनुसार 10 दिशाएं होती हैं और हर दिशा की रक्षा करने के लिए एक दिग्पाल हैं। यथा – पूर्व के इन्द्र, अग्निकोण के वह्रि, दक्षिण के यम, नैऋत्यकोण के नैऋत, पश्चिम के वरूण, वायु कोण के मरूत्, उत्तर के कुबेर, ईशान कोण के ईश, ऊर्ध्व दिशा के ब्रह्मा और अधो दिशा के अनंत। दसों दिशाओं में होने वाली हर कार्यवाही की पर इनकी नजर होती है। परंतु श्री रामचंद्र जी के अनुसार ये भी हनुमान जी की पूर्ण प्रशंसा करने में असमर्थ हैं।

कहा जाता है कि जहां न पहुंचे रवि वहां पहुंचे कवि। परंतु ये कवि गण भी हनुमान जी की पूर्ण प्रशंसा करने में असमर्थ हैं।

अगर हम हनुमान जी के हर एक गुण का अलग-अलग वर्णन करें तो भी हम  हनुमान जी के समस्त गुणों को लिपिबद्ध नहीं कर सकते। जैसे कि उनके दूतकर्म के लिए वाल्मीकि रामायण में श्री रामचंद्र जी के मुंह से कहा गया है:-

एवम् गुण गणैर् युक्ता यस्य स्युः कार्य साधकाः।

स्य सिद्ध्यन्ति सर्वेSर्था दूत वाक्य प्रचोदिताः।।

(वाल्मीकि रामायण, किष्किंधाकांड)

अर्थात हे लक्ष्मण एक राजा के पास हनुमान जैसा दूत होना चाहिए जो अपने गुणों से सारे कार्य कर सके। ऐसे दूत के शब्दों से किसी भी राजा के सारे कार्य सफलता पूर्वक पूरे हो सकते हैं।

सीता जी का पता लगाने के लिए जामवंत जी की कसौटी पर केवल हनुमान जी ही खरे उतरते हैं। देखिए जामवंत जी ने क्या कहा :-

हनुमन् हरि राजस्य सुग्रीवस्य समो हि असि |

राम लक्ष्मणयोः च अपि तेजसा च बलेन च ||

(वाल्मीकि रामायण/सुंदरकांड-६६-३)

अर्थात हे हनुमान आप वीरता में वानरों के राजा सुग्रीव के समान हैं। आपकी वीरता स्वयं श्री राम और लक्ष्मण के बराबर है।

रामचरितमानस में तुलसीदास जी ने अवतरण का उद्देश्य भी स्पष्ट किया है –

राम काज लगि तब अवतारा।

सुनतहिं भयउ परबतकारा।।

अर्थात – महावीर हनुमान जी का जन्म ही राम काज करने के लिए हुआ था। यह सुनते ही हनुमान जी पर्वत के आकार के बराबर हो गए।

जब हनुमान जी मां जानकी का पता लगाने के अलावा लंका को जला कर वापस लौटे।  उसके उपरांत सभी बंदर, भालू श्री रामचंद्र जी के पास आए तब जामवंत जी ने हनुमान जी की प्रशंसा में श्री राम चंद्र जी से कहा:-

नाथ पवसुत कीन्हीं जो करनी।

सहसहुं मुख न जाई सो बरनी।।

पवनतनय के चरित सुहाए।

सुनत कृपानिधि मन अति भाए।।

श्रीरामचंद्र जी ने जब यह सुना कि हनुमान जी लंका जलाकर आए हैं तब उन्होंने परम वीर हनुमान जी से घटना का पूरा विवरण जानना चाहा :-

कहु कपि रावन पालित लंका।

केहि बिधि दहेउ दुर्ग अति बंका।।

महावीर स्वामी महावीर हनुमान जी ने इसका बड़ा छोटा सा जवाब दिया प्रभु यह सब आपकी कृपा की वजह से हुआ है। यह विनयशीलता की पराकाष्ठा है:-

 प्रभु प्रसन्न जाना हनुमाना।

 बोला बचन बिगत हनुमाना।।

साखा मृग के बड़ी मनुसाई।

साखा ते साखा पर जाई।।

नाघि सिंधु हाटकपुर जारा।

निसिचर गन बधि बिपिन उजारा।।

सो सब तव प्रताप रघुराई।

नाथ न मोरी कछु प्रभुताई।

ता कहूं प्रभु कछु अगम नहीं जा पर तुम्ह अनुकूल।

तव प्रभावं बड़वानलहि जारि सकल खलु तूल।।

(रामचरितमानस/सुंदरकांड)

अर्थात महावीर हनुमान जी अपने श्री राम को प्रसन्न देख कर अपने अभिमान और अहंकार का त्याग कर अपने कार्यों का वर्णन करते हुए कहते हैं कि एक बंदर की क्या विशेषता हो सकती है। वो तो एक पेड़ की शाखा से दूसरी शाखा पर कूदता रहता है। इसी तरह से मैंने समुद्र पार किया और सोने की लंका जलाई। राक्षसों का वध किया और अशोक वाटिका उजाड़  दी।

हे प्रभु  ये सब आपकी प्रभुता का कमाल है। मेरी इसमें कोई शक्ति नहीं है। आप जिस पर भी अनुकूल हो जाते हैं उसके लिए कोई भी कार्य असंभव नहीं होता। आपके प्रभाव से तुरंत जल जाने वाली रुई भी एक बड़े जंगल को जला सकती है।

सूरदास जी ने सूरसागर के नवम स्कंद के 147 वें पद में लिखा है :-

कहाँ गयौ मारुत-पुत्र कुमार।

ह्वै अनाथ रघुनाथ पुकारे, संकट-मित्र हमार।।

इतनी बिपति भरत सुनि पावैं आवैं साजि बरूथ।

कर गहि धनुष जगत कौं जीतैं, कितिक निसाचर जूथ।

नाहिं न और बियौ कोउ समरथ, जाहि पठावौं दूत।

को अब है पौरुष दिखरावै, बिना पौन के पूत?

इतनौ वचन स्त्र वन सुनि हरष्यौ, फूल्यौ अंग न मात।

लै-लै चरन-रेनु निज प्रभु की, रिपु कैं स्त्रोनित न्हात।

अहो पुनीत मीत केसरि-सुत,तुम हित बंधु हमारे।

जिह्वा रोम-रोम-प्रति नाहीं, पौरुष गनौं तुम्हारे!

जहाँ-जहाँ जिहिं काल सँभारे,तहँ-तहँ त्रास निवारे।

सूर सहाइ कियौ बन बसि कै, बन-बिपदा दुख टारै॥147॥

यह पद लक्ष्मण जी को शक्ति लगने के उपरांत की प्रकृति का वर्णन करता है। उस समय श्री हनुमान जी संजीवनी बूटी ढूंढ़ने के बजाय पूरा पर्वत ही उठा कर ले आते हैं और श्री लक्ष्मण जी के प्राण बचाते हैं। हनुमान जी की सेवा के अधीन होकर प्रभु श्रीराम ने उन्हें अपने पास बुला कर कहा—

कपि-सेवा बस भये कनौड़े, कह्यौ पवनसुत आउ।

देबेको न कछू रिनियाँ हौं, धनिक तूँ पत्र लिखाउ।।

(विनय-पत्रिका पद १००।७)

‘भैया हनुमान! तुम्हें मेरे पास देने को तो कुछ है नहीं; मैं तेरा ऋणी हूँ तथा तू मेरा धनी (साहूकार) है। बस इसी बात की तू मुझसे सनद लिखा ले।’

इसी प्रकार समय-समय पर हनुमान जी की प्रशंसा मां जानकी, भरत जी, लक्ष्मण जी, रावण एवं अन्य देवताओं ने की है।

इस प्रकार हम देखते हैं कि हनुमान जी की प्रशंसा में हर किसी ने कुछ न कुछ कहा है परंतु तब भी उनकी प्रशंसा पूर्ण नहीं हो पाई है। ऐसे हनुमान जी से प्रार्थना है कि वे हमारी रक्षा करें।

चित्र साभार – www.bhaktiphotos.com

© ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय

(प्रश्न कुंडली विशेषज्ञ और वास्तु शास्त्री)

सेवानिवृत्त मुख्य अभियंता, मध्यप्रदेश विद्युत् मंडल 

संपर्क – साकेत धाम कॉलोनी, मकरोनिया, सागर- 470004 मध्यप्रदेश 

मो – 8959594400

ईमेल – 

यूट्यूब चैनल >> आसरा ज्योतिष 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। )

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

💥 महादेव साधना सम्पन्न हुई। अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र दी जाएगी। 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों  को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

? संजय दृष्टि –   ??

 

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆   ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

Please share your Post !

Shares

मराठी साहित्य – मी प्रवासिनी ☆ मी प्रवासिनी क्रमांक 37 – भाग 2 – काळं पाणी आणि हिरवं पाणी ☆ सौ. पुष्पा चिंतामण जोशी ☆

सौ. पुष्पा चिंतामण जोशी

☆ मी प्रवासिनी क्रमांक 37 – भाग 2 ☆ सौ. पुष्पा चिंतामण जोशी ☆ 

✈️ काळं पाणी आणि हिरवं पाणी  ✈️

अंदमान आता प्रवासी स्थान झालं आहे. जैवविविधतेने नटलेला निसर्ग, अनेक दुर्मिळ झाडं, प्राणी, पक्षी, जलचर असा दुर्मिळ खजिना इथे आहे. वर्ल्ड हेरिटेज म्हणून आणि इको टुरिझम म्हणून अंदमानला मान्यता मिळाली आहे. इथे सेंटेनल, जारवा,  ओंगे, ग्रेट निकोबारी अशा आदिम जमाती आहेत. त्यांना एकांतवास व त्यांची जीवनपद्धतीच प्रिय आहे. आपण प्रवाशांनी त्यांच्या जीवनात हस्तक्षेप न करता, तिथल्या श्रीमंत निसर्गाला धक्का न लावता, तिथल्या टुरिझम बोर्डाच्या नियमांप्रमाणेच वागणं आवश्यक आहे. इथले आदिवासी हे मानववंशशास्त्राच्या दृष्टीने फार महत्त्वाचा दुवा आहेत. त्यांना इथलं प्राणी व पक्षी जीवन, सागरी जीवन, विविध वृक्ष, त्यांचे औषधी उपयोग यांचं पारंपरिक ज्ञान आहे. या दुर्मिळ खजिन्याच्या रक्षणासाठी त्यांच्या ज्ञानाचा त्यांच्या कलाने उपयोग करून घेणं महत्त्वाचं आहे.

पोर्ट ब्लेअरच्या दक्षिणेला वांडूर बीच जवळ लहान मोठी पंधरा बेटे मिळून ‘महात्मा गांधी मरीन नॅशनल पार्क उभारण्यात आलं आहे. इथली सागरी संपत्ती पाहिली की निसर्गाच्या अद्भुत किमयेला दाद द्यावीशी वाटते. कोरल्सचे असंख्य प्रकार इथे बघायला मिळतात. आपल्या मेंदूसारखे लाटालाटांचे कोरल, बशीसारखे, झाडासारखे असे विविध आकारांचे कोरल्स आहेत. विंचवासारखा, वाघासारखा, सार्जंट, गिटार, वटवाघुळ, फुलपाखरू यांच्या आकारातील मासे आहेत. पोपटाच्या चोचीसारखे तोंड पुढे आलेले हिरवट पॅरट मासे आहेत. हे सारे जलचर एकमेकांशी सहकार्याने राहतात. सी-ॲनम हा जलचर खडकाला चिकटून राहतो तर जोकराच्या आकाराचा मासा त्याला खायला आणून देतो व सी-ॲनम जोकर माशाला खडकाचं घर देतो.काळ्या चंद्रकलेवर मोती जडवावे तसे काळ्या छोट्या माशांवर स्वच्छ पांढरे ठिपके होते. एका प्रचंड व्हेल माशाचा सांगाडा ठेवला आहे.

सेल्युलर जेलजवळ आता अंदमान वॉटर स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स उभारलं आहे. त्यात मोटार बोटी,पॅडल बोटी, वॉटर स्कूटर्स,स्किईंग  वगैरे प्रकार आहेत. पोर्ट ब्लेअर जवळील चातम आयलंडला एका पुलावरून गेलो. इथे आशियातील सर्वात जुनी व सर्वात मोठी सॉ मील आहे. रेडवूड, सागवान, सॅटिन वूड, ब्लॅक चुगलम, थिंगम, कोको, महुआ, जंगली बदाम, डिडु अशा नाना प्रकारच्या वृक्षांचे भले मोठे घेर असलेले ओंडके ठेवले होते. दुसऱ्या महायुद्धात या मिलच्या  काही भागाचं नुकसान झालं. हे मोठमोठे लाकडी ओंडके कापणाऱ्या, धारदार, विजेवर चालणाऱ्या करवती होत्या. यातील काही लाकूड इमारत कामासाठी तर काही फर्निचर व कोरीव कामासाठी,बोटी बनविण्यासाठी वापरण्यात येतं. पूर्वी रेल्वे रूळांचे स्लीपर्स बनविले जात.  तिथल्या म्युझियममध्ये रेडवूडपासून बनविलेले कोरीव गणपती, देव्हारे, पुतळे, घड्याळे अशा सुंदर वस्तू आहेत. तिथून मानव विज्ञान संग्रहालय पाहायला गेलो. अंदमान- निकोबारच्या आदिवासींच्या वापरण्यातल्या वस्तू म्हणजे बांबूच्या चटया, पंखा, झाडू, टोपली मशाल, बाण, तिरकमठा, हुक्का, मधपात्र, बरछी, मासे पकडायची जाळी, सामुदायिक झोपडी, लाकडाची डोंगी म्हणजे होडी, झाडाच्या सालींच्या पट्ट्या रंगवून त्या डोक्याला व कमरेला गुंडाळायचे वस्त्र, शंख- शिपल्यांच्या माळा, कवड्यांच्या माळा, सुंभाचे बाजूबंद, समुद्र कोरलचे पैंजण, लाल मातीने चेहऱ्यावर केलेले पेंटिंग,नृत्याचे रिंगण अशा वस्तू, पुतळे पाहिले की आदिम काळापासून स्त्रियांची नटण्याची हौस आणि उपलब्ध सामग्रीतून जीवनोपयोगी वस्तू बनविण्याची मानवाची बुद्धी लक्षात येते.

रॉस आयलँड ही ब्रिटिशांची जुनी ऍडमिनिस्ट्रेटिव्ह राजधानी होती. तिथे ब्रिटिशांनी घरे, स्विमिंग पूल, चर्च, जिमखाना, क्लब, ओपन एअर थिएटर सारं काही उभारलेलं होतं. नारळाची व इतर अनेक प्रकारची झाडं आहेत. हरणं व बदकं फिरत असतात. विहिरी व जपानी सैन्याने खोदलेले बंकरही बघायला मिळाले. आता हे बेट आपल्या नौदलाच्या ताब्यात आहे. वायपर आयलंड इथे कैद्यांना फाशी देण्याची ब्रिटिशकालीन जागा आहे. तसंच स्त्री कैद्यांसाठी तिथे तुरुंग बांधण्यात आला होता. आमच्या गाईडने अगदी तन्मयतेने त्या काळातील राजकीय कैद्यांचा त्याग, त्यांनी भोगलेल्या शिक्षा आमच्यापुढे शब्दातून उभ्या केल्या. त्या अज्ञात शूरवीरांना आम्ही ‘वंदे मातरम्, भारत माता की जय’ असं म्हणत आदरांजली वाहिली.

नॉर्थ बे आयलंड इथे स्नॉर्केलिंगची  मजा अनुभवता आली. आपल्याला डोळ्यांना विशिष्ट प्रकारचा चष्मा लावायला देतात. त्यामुळे नाकपुड्या बंद होतात. आपण दातांमध्ये धरलेल्या नळीचं तोंड समुद्राच्या वरच्या पातळीवर राहतं. आपल्याला तोंडाने श्वास घ्यायला लागतो. तेथील प्रशिक्षकाच्या सहाय्याने पाण्यावर तरंगत हा निसर्गाचा खजिना बघायला मिळाला. या भागात किनाऱ्याजवळच खूप प्रवाळ बेटे आहेत. पाणी संथ व स्वच्छ असल्यामुळे नाना तऱ्हेचे व रंगाचे छोटे-मोठे मासे सुळकन इकडे तिकडे फिरताना दिसत होते. बटरफ्लाय, टायगर, गोल्डन टेट्रा असे मासे झुंडीने फिरत होते. स्पंजसारखे जिवंत कोरल्स होते. त्यांना स्पर्श केल्यावर ते तोंड उघडत. त्यांचा फिका जांभळा रंग व तोंडात छोटे छोटे गोंड्यासारखे जांभळ्या रंगाचे पुंजके दिसले.

अंदमान – भाग २ समाप्त

© सौ. पुष्पा चिंतामण जोशी

जोगेश्वरी पूर्व, मुंबई

9987151890

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

Please share your Post !

Shares