हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # ११३ – नौतपा… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – नौतपा…।)

☆ लघुकथा # ११३ – नौतपा… श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

“बहुत अधिक गर्मी है मोना और तरुण तुम लोग कहाँ जा रहें हो?” सुनीता जी ने कहा।

मोना ने कहा – “मम्मी जी हम जब भी कही घूमने जाते हैं तो आप अवश्य रोक टोक करती हो?”

तरुण ने कहा – “माँ बच्चों की स्कूल की छुट्टी है इसलिए पास की  पार्क में जा रही है। वहां  पर वाटर पार्क और चिड़ियाघर घूम कर आएगे।”

मोना ने गुस्से से कहा – “आप की माँ तो हमें कहीं घूमने नहीं जाने देती हैं?”

तरुण की माँ सुनीता ने कहा-

“बेटा तुम लोग घूमने जाओ मुझे कोई एतराज नहीं है पर नौतपा लगा है इसलिए मना कर रही हूँ।”

मोना ने कहा -“क्या नया नाटक है नौतपा क्या है?”

सुनीता जी ने कहा- “मोना बच्चों को भी बुला लो मैं बताती हूँ कि यह नौतपा क्या है यह जानकारी सभी को रहनी चाहिये।”

तरुण ने बच्चों को बुला लिया और बोला “माँ बोलो हम सभी सुनेंगे।”

सुनीता जी ने कहा-ज्येष्ठ मास में जब सूर्य, रोहिणी नक्षत्र के प्रथम चरण में होता है, तो पहले 9 दिनों तक सूर्य की किरणें सीधे पृथ्वी पर पड़ती हैं। बहुत अधिक गर्मी पड़ती है उसी को नौतपा कहते हैं 9 दिन अधिक तकनीक से वर्षा अच्छी होती है यदि इस बीच पानी गिर गया तो वर्षा कम होती है।”

मोना ने कहा – “हमारे घूमने जाने पर आप क्यों रोक लगा रही हैं?”

“बेटा उन दिनों बहुत अधिक धूप सीधी पड़ती है गर्मी अधिक रहती है लू चलती है लू लग जाने के कारण तुम और बच्चे बीमार हो जाओगे तुम्हारी चिंता है इसलिए कह रही हूँ, यदि तुम्हें मेरी बात पर यकीन ना हो तो गूगल में देख लो क्योंकि आजकल सारी बातें तो तुम गूगल की ही मानती हो न”

सुनीता जी ने धीमी स्वर  में कहा वह गंभीर हो गई।

मोना तुरंत गूगल में देखने लग गई और उसने कहा कि- “माँ आप सही कह रही हैं, गूगल बता रहा है कि इन दोनों मांगलिक कार्य भी नहीं होते इसीलिए मेरी बड़ी बहन अपनी बेटी की शादी बाद में कर रही है।”

इस समय सूर्य और पृथ्वी के बीच की दूरी कम हो जाती है, जिससे वातावरण में भीषण तपिश बढ़ जाती है।

तरुण ने कहा- “माँ की बात में मानता हूँ तो तुम्हें गुस्सा आता है माँ सही कहती है चलो मौसम अच्छा होगा बारिश में तो हम सब मिलकर घूमने चलेंगे।”

बच्चों ने कहा “हमने देखा दादी की बात कितनी सही है तुम्हारे चक्कर में हम घूमने जाते और बीमार पड़ जाते घर में आराम से हम सब खाएंगे और नौतपा के विषय में भी हमने कितनी अच्छी जानकारी ली लिख लिख कर स्कूल में सबको बताऍंगे।”

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २६५ – मापनी ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “मापनी”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २६५ ☆

🌻लघु कथा🌻 मापनी 🌻

वैशाली एक साहित्य साधना में लीन महिला है। गृहणी के साथ ही साथ सभी की सेवा श्रद्धा भावना से करती है।

सृजन करते समय सभी तुकांत पदांत मापनी और विधा का ध्यान रखती है।

सदैव की भांति आज वह फिर अपनी ही खास सखी से छली गई क्योंकि उसे चाटुकारिता, चापलूसी की मापनी, विधा नही आती।

कब दीर्घ लघु बन जाता है और कब दो लघु दीर्घ बन जाते हैं। ये मापनी उसने दोस्ती, संबंधों में शायद नही सीख पाई थी।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य क्षणिका# १०५ – क्रांति वीर – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– क्रांति वीर …” ।

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य क्षणिका # १०५ — क्रांति वीर — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

सन् 1857 के अपने एक कल्पित दस्तावेज के हवाले से मैं यह कहानी रच रहा हूँ। इस तारीख से बात करने की मेरी एक भावनात्मक सोच है। बात यह है उन्हीं दिनों बलिया वासी मेरा परदादा मॉरिशस आया था। पर यह मेरे परदादा की कहानी नहीं है। यह एक भारतीय परम वीर की कहानी है। अंग्रेजों के अधीन अपनी जन्मभूमि में क्रांति के जुनून के कारण गिरफ्तार हुआ था। वह किसी तरह जेल से भागा था। भारतीय मजदूर मॉरिशस लाने वाले जहाज की एक खेप में वह यहाँ आ गया था। अगले जहाज में अंग्रेज सरकार के सिपाही उसे यहाँ ढूँढने आ गए थे, लेकिन वे उसे पा न सके थे। उसे एक गुफा में छिपा कर रखा गया था। दिनों बाद यहीं उसकी मृत्यु हुई थी। सम्मान के साथ उसका दाह संस्कार किया गया था।

 © श्री रामदेव धुरंधर

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – लघुकथा ☆ चिंता मुक्त ☆ मोहम्मद जिलानी ☆

मोहम्मद जिलानी

(ई-अभिव्यक्ति में वरिष्ठ शिक्षाविद एवं साहित्यकार मोहम्मद जिलानी जी का हार्दिक स्वागत.शिक्षण – बी.ए., बी एड, एम ए (अंग्रेजी, हिंदी, समाजशास्त्र), एम एड विशेष – यू के में एक सप्ताह का शैक्षणिक दौरा. सेवाएं – व्याख्याता (अंग्रेजी और हिंदी) के पद पर सेवाएं प्रदत्त, इसके पश्चात् प्रधानाध्यापक और प्राचार्य पद पर सेवाएं प्रदत्त, तत्पश्चात उप शिक्षा अधिकारी, जिला परिषद् चंद्रपुर के पद से सेवानिवृत्त. अभिरुचि – हिंदी, अंग्रेजी, मराठी, उर्दू, और तेलुगु भाषा में पठन, लेखन. गीत, संगीत और सिनेमा में भी विशेष अभिरुचि. संप्रतिनिदेशक जिलानी ग्रुप ऑफ़ स्कूल्स। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – चिंता मुक्त.)

🌱 लघुकथा – चिंता मुक्त🌷

“चल! भाग यहां से, बदमाश कहीं का” डांटते हुए ट्राफिक सिग्नल पर खड़े पुलिस वाले ने कहा। यह सुनकर भीख मांगने वाला दूर हटते हुए कहने लगा, “साहाब, दो दिन से भर पेट खाने तक के लिए पैसे नहीं मिल रहे है। तो, सोचा सिग्नल पर पैसे वालों की गाड़ियां रूकती है। कुछ ज्यादा पैसे मिल जायेंगे। यह सोच कर..।” यह सुनकर पुलिस वाला चिढ़कर कहने लगा,”अरे! बेवकूफ यही अमीरजादे हमारे अधिकारियों से शिकायत करते हैं कि पुलिस वालों की लापरवाही से ही सिग्नल पर भिखारियों की तादाद बढ़ रही है। अब दुबारा दिखेंगा, तो तीन महिने के लिए अंदर करा दूंगा।”

यह सुनकर भीख मांगने वाला दूर के फ्लाई ओव्हर ब्रिज के नीचे जाकर बैठ़ गया। बैठ़े बैठ़े सोचने लगा,”मैं पढ़ा लिखा होने के बावजूद अपने गांव में मुझे कोई काम नहीं मिल पाया, तो मुंबई आ गया। यहां भी अजनबियों को काम देने से लोग डरते है।”

पिछले तीन महिनों से उसका अपना ठिकाना कभी इस पुल के नीचे, तो कभी उस फुटपाथ पर, और धंदा भीख मांगना रह गया है। कहने को तो उसका नाम सुखवीर था। पर यहां उसे भिखारी के नाम से लोग पुकारने लगे।

दुपहर की गमी॔ से भूख और प्यास बढ़ने लगी, तो सोचा मंत्रालय के सिग्नल पर जाना चाहिए। यह सोचकर सुखवीर सिग्नल के पास जाकर खड़ा हो गया। एक दो गाड़ियों के पास गया भी था। लेकिन ज़ोरदार झिड़कियां ही मिली। कुछ देर और ठहरता, इतने में पुलिस की पेट्रोलिंग जीप आ गयी। उसे दरोगा की कड़क आवाज सुनाई दी. “अरे! कोई इस भिखारी को पकड़कर जीप में डालो। पास में ही मंत्रालय है।  इसकी वजह से हमारी नौकरी चली जायेंगी।”

इतने में एक पुलिस वाला जीप से उतरा और उसका कालर पकड़कर जीप में बिठ़ा दिया। थाने पहुंचकर दरोग़ा ने सुखवीर को मंत्री की गाड़ियों के सामने भीख मांगने के जुम॔ में तीन महिने की सज़ा सुना दी।

यह सुनकर सुखवीर को बड़ी ख़ुशी हुई। वह अपने आप से कहने लगा, ” चलो, अच्छा ही हुआ। अब तो तीन महिने के लिए खाने और रहने की चिंता से मुक्ति जो मिल गयी है।”

© मोहम्मद जिलानी

संपर्क – चंद्रपुर (महाराष्ट्र) मो 9850352608 (व्हाट्सएप्प), 8208302422

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – “मोमबत्तियां” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ लघुकथा – “मोमबत्तियां” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

– मां ये मोमबत्तियां जलाकर क्यों चल रहे हैं अंकल लोग?

– बेटा, ये कुछ अक्ल के अंधों को रोशनी दिखाने निकले हैं !

– मम्मी, मोमबत्तियां पिघलने लगेंगीं तो गर्म मोम उंगलियों‌ पर गिरेगा, ये तो किसी का क्या बिगड़ा? अपना ही हाथ जलेगा !

– बात तो ठीक है तेरी। फिर तेरी नज़र में क्या करना चाहिए?

– मैं तो कहती हूँ कि ये मोमबत्तियां लेकर उस पापी को जलाओ, जिसने यह गंदा काम किया है !

मां अपनी नन्ही सी बेटी का मुंह देखती रह गयी !!

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # ११२ – रिश्ते जिंदा है क्या?… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – रिश्ते जिंदा है क्या?।)

☆ लघुकथा # ११२ – रिश्ते जिंदा है क्या? श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

अरे! देवर जी तुम कब आ गए आश्चर्य पूर्वक कमल जी ने कहा।

“अपनी भाभी भाई के घर में आने के लिए क्या मुझे कोई इजाजत लेनी पड़ेगी या कार्ड छपवाना पड़ेगा” नवीन बोला।

कमल जी ने कहा – “नहीं नहीं भैया मैं ऐसा नहीं बोल रही इतने दिनों तक आपने दर्शन नहीं दिया आज अचानक आप आए इसलिए मैंने ऐसा कहा।“

“भाभी भैया कहाँ है?” नवीन बोला।

“तुम्हारे भैया 13वीं का इंतजाम करने के लिए बाजार गए हैं” कमल जी ने कहा।

नवीन बोला- “तुम लोगों ने घर और खेत ले लिया है मेरे पास सिर्फ मेरा हिस्सा और दुकान है सब चीजों का बंटवारा तो हो जाना चाहिए।”

कमल जी ने कहा- “ठीक है देवर जी मैं भी यही चाहती हूँ लेकिन दुकान और घर का एक बहुत बड़ा हिस्सा तो आपके ही कब्जे में है जहाँ आप हमें जाने भी नहीं देते अभी पिताजी को गुजरे दो ही दिन हुए हैं। हम पर पहाड़ टूट पड़ा है और आप हमें आकर इस तरह बोल रहे हैं कम से कम 13 दिन तो रुक जाना था।”

नवीन बोला “भाभी रोने धोने का नाटक तो तुम बहुत अच्छा कर लेती हो गरीब बनाकर सबसे हमदर्दी लेकर पूरे समाज में हमारी बदनामी कर रही हो कि हमने सबसे ज्यादा हिस्सा ले लिया।”

रोते हुए कमला ने कहा – “अब हमारा तुम्हारा कैसा नाता चले जाओ अभी मैं तुमसे बात करने के मूड में नहीं हूँ, कुछ दिन बाद हम आराम शांति से बैठेंगे दीदी लोग को  बुला लेंगे।  दो बहने भी है तुम्हारी और फिर तय करेंगे कि किसी क्या मिलना चाहिए सारी पिताजी की विरासत में तुम्हारा ही हक  है।”

नवीन ने कहा- “ठीक है देखता हूँ, कैसे तुम सब हिस्सा लेते हो? नवीन गुस्से से बड़बड़ाता हुआ गया।”

कमल जी कहती है कि “हे भगवान इस दुनिया में क्या रिश्ते नाते जिंदा है? जाना सबको है छोड़कर लेकिन फिर भी लोग कैसे लड़ते हैं।”

 

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य क्षणिका# १०४ – कसौटी… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– कसौटी…” ।

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य क्षणिका # १०४ — कसौटी — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

ईश्वरीय कसौटी की एक अद्भुत कहानी है। सम्राट अनादिकाल से जन्म लेता आया है और उसी अनुपात से उसकी मृत्यु होती रही है। उसके जन्म और मृत्यु के इस परिवेश में देखा तो यही जाता है आधा संसार ही उसकी जीत में आता है और आधा उसकी जीत से मुक्त रह जाता है। शेष आधे की जीत उसके वश में हो भी नहीं सकती। यह ईश्वरीय है। ईश्वर उसे आधा ही ताज पहनाता है और आधा पहनाये बिना उसे बुला लेता है।

 © श्री रामदेव धुरंधर

27 – 04 — 2026

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – लघुकथा – ☆ अपना काम करती रहो… ☆ सुश्री नरेंद्र कौर छाबड़ा ☆

सुश्री नरेंद्र कौर छाबड़ा

(सुप्रसिद्ध हिंदी साहित्यकार सुश्री नरेन्द्र कौर छाबड़ा जी पिछले 40 वर्षों से अधिक समय से लेखन में सक्रिय। 5 कहानी संग्रह, 1 लेख संग्रह, 2 लघुकथा संग्रह, 1 पंजाबी कथा संग्रह 1 तमिल में अनुवादित कथा संग्रह,मराठी में अनुवादित लघुकथा संग्रह, मराठी में अनुवादित  कहानी संग्रह, कुल 12 पुस्तकें प्रकाशित।  पहली पुस्तक मेरी प्रतिनिधि कहानियाँ को केंद्रीय निदेशालय का हिंदीतर भाषी पुरस्कार। एक और गांधारी तथा प्रतिबिंब कहानी संग्रह को महाराष्ट्र हिन्दी साहित्य अकादमी का मुंशी प्रेमचंद पुरस्कार 2008 तथा २०१७। प्रासंगिक प्रसंग पुस्तक को महाराष्ट्र अकादमी का काका कालेलकर पुरस्कार 2013 । लेखन में अनेकानेक पुरस्कार। आकाशवाणी से पिछले 45 वर्षों से रचनाओं का प्रसारण। लेखन के साथ चित्रकारी, समाजसेवा में भी सक्रिय । महाराष्ट्र बोर्ड की 10वीं कक्षा की हिन्दी लोकभारती पुस्तक में 2 लघुकथाएं शामिल 2018)

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा अपना काम करती रहो

? लघुकथा – अपना काम करती रहो ? सुश्री नरेंद्र कौर छाबड़ा ?

आज उसे आईसीयू से निकाल कर प्राइवेट रूम में शिफ्ट कर दिया गया था. पति के साथ ही दोनों बच्चे भी वहां उसका इंतजार कर रहे थे . कमरे में अपने परिवार को देख उसके मन में गहरे संतोष के भाव उभर आए . कुछ देर बाद बच्चे घर चले गए तो वह पति से धीरे से बोली – “ कल मैंने एक कविता लिखी…..”

 पति हैरानी से बोले- “ आईसीयू में तुमने कविता कैसे लिख ली…?”

“ आपने ही तो मुझसे कहा था बीमारी को अपना काम करने दो तुम अपना काम करती रहो . बहुत चिंतन मनन चल रहा था. मैंने नर्स से कहा तो उसने अपने मोबाइल में मेरी कविता रिकॉर्ड कर ली. फिर मेरे मोबाइल में भेज दी . देखिए मेरे मोबाइल में होगी ….”

पति ने बड़ी उत्सुकता से जेब में से पत्नी का मोबाइल निकाला. कविता का ऑडियो साफ नजर आ रहा था .

“ चलो ,सुनते हैं…..” कह कर उसने ऑडियो ऑन किया. बहुत संवेदनशील कविता थी. अंत में पति के प्रति कृतज्ञता भी जाहिर की गई थी . पति ने उसके हाथ पकड़ कर चूम लिये .

“मुझे तुम पर गर्व है ….तुम्हारी हिम्मत पर…. तुम्हारी योग्यता पर… कला पर….”

“ और मुझे आपके सहयोग , प्रेरणा पर..” पत्नी भी हौले से मुस्कुरा दी. बेशक चेहरे पर दर्द भी साफ नजर आ रहा था.

“ चलो अब तुम बिल्कुल ठीक हो गई हो. केवल चार  कीमो लेनी होंगी …” पति के कहते ही वह फौरन कह उठी – “ अब मुझे किसी बीमारी का डर नहीं. जिसे आना है आए…. मैं तो अपना काम करती रहूंगी . आपने कहा था ना ….” फिर दोनों ही मुस्कुरा दिए . पत्नी की आंखों में गजब का आत्मविश्वास, दृढ़ता नजर आने लगी थी.

© नरेन्द्र कौर छाबड़ा

संपर्क –  सी-१२०३, वाटर्स एज, विशालनगर, पिंपले निलख, पुणे- ४११०२७ (महाराष्ट्र) मो.  9325261079 

Email-  narender.chhabda@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – मन की गाँठ… ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी, बी एड, प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । ‘यादों की धरोहर’ हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह – ‘एक संवाददाता की डायरी’ को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह- महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ कथा कहानी ☆ लघुकथा – मन की गाँठ… ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

-बाबू! बुरा तो नहीं मानोगे?

-नहीं! कहो, क्या बात है?

-अब आपकी चप्पल की लाइफ पूरी हो चुकी ! इस बार तो गांठ देता हूँ। ‌आगे मुश्किल है ! फिर नयी ले लेना! मैं  गांठ नहीं पाऊंगा!

-अरे! चप्पल को क्या हुआ? थोड़ी सी तो ठीक करनी है!

-वही तो कहा, बाबू जी! थोड़ी थोड़ी करते भी टांके लगाऊं तो आंखें जैसे इसी में टंक जाती हैं। आपको क्या है, नयी ले लेना, बाबू जी! अब तो बहुत ऑपरेशन कर लिये इसके ! अब इसकी लाइफ नहीं बची!

-ठीक है, मैं तो तुम्हारे बारे में सोच रहा था! अब काम ही कितना बचा है तुम्हारे पास!

-हां बाबू जी! काम तो पहले रेडिमेड जूतों, चप्पलों ने ले लिया ! अब रिपेयर भी कम ही आती है! लोग बाग घर पर ही जूते पालिश कर लेते हैं, पर आता हूँ  तो बाज़ार में आप जैसे लोगों से दिल बहल जाता है! और तो क्या! काम ही कहां बचा है?

-फिर गुजारा कैसे?

-बेटा पढ़ लिख गया, नौकरी लग गयी! बस, उसका सहारा ! आप बाबू जी! कैसे दिन बिताते हैं?

-बस, तुम्हारी तरह ! कुछ इधर बैठ लिया, कुछ उधर! निकल जाता है, दिन!

-कैसे?

-दिनों की मरम्मत करके, गांठें लगाते, कभी दुख की, कभी सुख की !

-लो, बाबू, आपकी चप्पल तैयार!

-ठीक है। पैसे कितने?

-अंतिम संस्कार के कैसे पैसे?

बाबू की आंखें भीग गयीं अपनी चप्पल को आखिरी बार देखकर !

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिंदी साहित्य – कथा कहानी ☆ प्यास… – मराठी लेखिका – उज्ज्वला केळकर ☆ हिन्दी भावानुवाद – जस्मिन शेख ☆

जस्मिन शेख

☆ कथा कहानी ☆ प्यास… – मराठी लेखिका – उज्ज्वला केळकर ☆ हिन्दी भावानुवाद – जस्मिन शेख ☆

उज्ज्वला केळकर

जस्मीन करुना निकेतन क्रेश की सीढ़ियाँ उतरी और उसके पीछे-पीछे क्रेश के सब लोग… गेट तक चले आए।। सुनीता काफी देर से टैक्सी के साथ गेट के बाहर इंतज़ार कर रही थी। हालाँकि, जस्मीन के पैर वहाँ से हटने का नाम नहीं ले रहे थे। उसके कदम मानो थमसे गए थे। क्रेश के लिए यह क्षण ऐतिहासिक महत्व का था। पच्चीस साल पहले क्रेश ने अपनेमें समाए हुए उस छोटीसी बच्ची ने देखते ही देखते एम.बी.बी.एस. की पढ़ाई पूरी की थी। और अब आगे की पढ़ाई के लिए जर्मनी जा रही थी। क्रेश में आज सभी ने उसे अलविदा कह दिया। विदाई और उसकी यात्रा के लिए…… उसकी शिक्षा के लिए….. उसके भावी जीवन के लिए…… जनहित में समर्पित उसके जीवन उद्देश के लिए …. हार्दिक शुभकामनाएँ। इन सभी लोगों की आत्मयता उसके मन पर भारी पड़ रही थी। जैस्मिन को लगने लगा था कि उस भारीपण के नीचे उसका दम घुट रहा है। एक ओर, वह जल्द से जल्द इन सब से बाहर निकलना चाहती थी, लेकिन दूसरी ओर, उसके पैर और मन उन्ही में समा गए थे। उसे यह भी लग रहा था कि जितना ज़्यादा समय वह उनके साथ बिता सके, उतना अच्छा है। वह अपने मन की दुविधा से उलझन में थी। आज सुबह से ही, क्रेश का हर व्यक्ति उससे कुछ कहने के लिए झटपटा रहा था। समय कम था। और बात खत्म ही नही हो रही थी।

‘आज सिस्टर नैंन्सी यहाँ चाहिए थी।’ सिस्टर मारिया मन ही मन सोच रही थी। जैस्मीन को पढ़ाने और उच्च शिक्षा के लिए जर्मनी भेजने का सिस्टर नैंन्सी का सपना था। उन्होने यह बात कई लोगों को कई बार बताया था। वह खुशी से फुली न समाती। उसे और फादर फिलिप को…….

जस्मीन क्रेशने गोद ली हुई पहली बेटी! तब वह साढ़े तीन साल की थी। आज क्रेश परिवार काफ़ी बड़ा हो गया है। अलग-अलग उम्र की तीन साडे तीन सौ लड़कियाँ हैं। कुछ अनाथ बच्चे हैं, कुछ को उनके माता-पिता ने छोड़ दिया है, कुछ को यहाँ इसलिए लाया गया है क्योंकि वे हालात को संभाल नहीं पाईं। कुछ को आपराधिक सुधार गृह से भेजा गया है, कुछ घर से भाग गई हैं। क्रेश ने उन सभी पर अपने ममता की छाँव धरी है। उसने उन्हें जीवन दिया है, उनकी रक्षा की है, उन्हें शिक्षा प्रदान की है, हर एक के शक्ति के अनुसार!

ग्रीन टेम्पल चर्च शहर के एक बेहद ग्रामीण और पिछड़े इलाके में स्थित है। यह चर्च जर्मन मिशन द्वारा समर्थित है। फादर जर्मनसे इस चर्चा के मुख्य बिशप बनकर आए हैं। इस विश्वास के साथ कि गरीबों और ज़रूरतमंदों की सेवा करना प्रभु येशू का कार्य है, इसी विश्वास से उन्होंने अपने आस-पास के लोगों की मदद की। उन्होंने गरीबी से असमय नष्ट हो रही कलियों को जीवनदान दिया। प्रभु यीशु के संदेश को कर्म द्वारा फैलाने के उद्देश्य से उन्होंने चर्च की एक सहयोगी संस्था के रूप में निकेतन की शुरुआत की। फिर सिस्टर मारिया, सिस्टर ज्युथिका जर्मनी से आए। कुछ अन्य स्थानीय ईसाई कलीसियाओं ने भी मदद की।

फादर फिलिप ने क्रेश शुरू करने का फैसला करने के बाद, एक भिखारी दंपति से तीन या चार साल की बच्ची को गोद लिया, जिसे कुष्ठ रोग था। हम उसकी अच्छी देखभाल करेंगे, उसे खूब पढ़ाएंगे, उसका पालन-पोषण करेंगे, उसे जर्मनी भेजेंगे, लेकिन आप उससे बिल्कुल नहीं मिलेंगे, उसको अपना परिचय नहीं देंगे। भिखारी दंपति सहमत हो गए। उन्होंने सोचा होगा कि कम से कम लड़की का जीवन बेहतर होगा। फादरने डॉ. थॉमस से पूरी जांच करने को कहा। लड़की प्रभावित नहीं हुई थी। प्रभु की लीला। उसने अपने हाथों को अपनी छाती पर हाथ से क्रॉस कर लिया। बाद में उसका नमकरण हो गया। सिस्टर नैंन्सीने एक नाम सुझाया। जस्मीन, एक ऐसा फूल जो अपनी उपस्थिति से पूरे वातावरण को सुगंधित कर देता है….. जस्मीन।

जस्मीन…क्रेशने गोद ली हुई पहली लड़की । जस्मीन जो पहले सड़कों पर पली-बढ़ी थी, उस सीमित वातावरण में इतनी घबरा जाती थी कि कोई उसे छूता या कोई अगर वह पास आती भी, तो वह डर से सिकुड जाती, मेमनेकी तरह!।

जस्मीन को अपने जीवन के उन टुकड़ों को इकट्ठा करके अपनी जीवन कहानी गढ़ने का जुनून सवार हो गया था, जो उसने समय-समय पर क्रेशमें दूसरों की बातचीत से इकट्ठा किए थे। दरअसल, उसमें कभी किसी से कुछ पूछने की हिम्मत नहीं हुई। वह बहुत शर्मीली और संकोची थी, लेकिन वह हमेशा सोचती थी कि उसके माता-पिता कौन हैं। फादरने उसे पहली बार कब और कहाँ देखा था? उन्होंने उसे गोद लेने के बारे में कैसे सोचा? अगर उन्होंने यह नहीं सोचा होता, अगर उसके माता पिताने हमें उन्हें देने से इनकार कर दिया होता, तो आज हम कहाँ होते? हमारी ज़िंदगी कैसी होती?

शायद ऊन भिखारी की तरह हमारा शरीरभी सड जाता । शायद नही, यकीनन! हम भी सडा हुआ शरीर लेकर घसीटते हुए जिंगकी काटते रहते। उस स्थिति में हम क्या सोचते? हम सोचते की यही जीवन है, और कुछ नहीं।

हम किसी और की दुहाई देकर जीते या किसी के घृणा के कार बनते।

कई सवाल…… सवालों का एक चक्रव्यूह। हर सवाल उलझाने वाला है। वह अपने मन में जवाब ढूँढ़ने की कोशिश करती रहेगी। वह अपने मन में उस स्थिति में अपना ही रूप देखेगी। उसे हर बार अलग उत्तर मिलेगा।

स्कूल जाते समय, वह सड़क पर भिखारियों को देखती, कोढ़ियों को जो चपटी नाक, टूटी उंगलियाँ, सूजे हुए हाथ-पैर और गंदे कपड़ों के साथ ग्रीन टेम्पल के क्रेश के आसपास घूमते थे। कभी कोई ठेले पर गाड़ी खींचता या बैठकर घूमता हुआ महारोगी। वह उनके प्रत्येक चेहरे को ध्यान से देखती और उनमें अपनी समानता खोजने की कोशिश करती। वह किसकी आँखों को अपनी जैसी समझती? यह किसका रंग है? अपने माता-पिता के बारे में सोचकर उसका पूरा शरीर काँप उठता। उसके शरीर रोमांचित हो जाता था।

स्कूल जाते समय, वह उन्हें देखती हुई धिरे धिरे आगे बढती। जब वह देखती कि वे उस पर ध्यान दे रहे हैं, तो सभी भिखारी शोर मचाते।” बहन, गरीब को दो पैसे दे दो। भगवान तुम्हें अमीर बना देगा। वह तुम्हें खुश कर देगा।” वह हँस पडती। उन्हें पैसे दो और इसीलिए भगवान उन्हें अमीर बना देगा। तो फिर भगवान उन्हें सीधे पैसे क्यों नहीं देते? लेकिन फिर उसके अंतरमन पर हुये प्रभु यीशु के संस्कार उसे याद आते। गरीबों के दुख दूर करो। प्रभु यीशु जीवन भर गरीबों की मदद करते रहे। सिर्फ़ अपने लिए मत जियो। दूसरों के लिए जियो।

उसे फादर फिलिप का मधुर भाषा में दिया गया उपदेश याद आया। फिर उसने मन ही मन सोचा, “इनके फैले हुए हाथों में कुछ पैसे रख दूँ। काश ये मेरे माता-पिता होते, तो चाय की चुस्की लेते। पैसे होते, तो सब्ज़ियाँ लाकर खाते। एक पल के लिए उनके उदास और मेहनती चेहरों पर खुशी की एक चमक आ जाती।

लेकिन उसके पास पैसे नहीं थे। वह क्रेशसे अपनी ज़रूरत की किताबें और कॉपियाँ ले आती। स्कूल में उसे जो पढ़ाई का सामान चाहिए था, वो सभी मिलता, पर पैसे कभी नहीं मिलते। क्रिसमस,इस्टर जैसे मौकों पर क्रेश की तरफ़ से वहाँ जमा भिखारियों को मिठाइयाँ बाँटी जातीं। जैस्मिन उन्हें बाँटने में पहल करती। उसे लगता कि क्रेश में भिखारियोंको भरपेट खाना खिलाना चाहिए। पर वह कुछ नहीं कर सकती थी। रोज़ खाना खाते हुए जस्मिन प्रार्थना करती, “हे प्रभु, जैसे मुझे बढिया खाना मिलता है, वैसे ही मेरे माता-पिता और दूसरे लोग भी मिला दो…..और सभी लोगोंको भी. आमेन…..।”

उसे अपने माता-पिता का ज़िक्र क्यों करना पड़ता है?

कहते हैं कि प्यार और स्नेह संगति से पैदा होता है। बचपन से उसे उनकी संगति नही मिली, फिर भी उसका मन लगातार उनके बारे में क्यों सोचता रहता है? उसकी सोच उनके इर्द-गिर्द क्यों घूमती रहती है? क्या वह नहीं जानती कि इसके पीछे भी कोई ईश्वरी संकेत है? क्रेशमें सभी उसे प्यार करते हैं, लेकिन हम यहाँ अजनबी हैं।…… हम भिखारी हैं।…… उसकी यह जीवनकहानी सुनकर उसके दिल में जो भावना पैदा हुई थी, उसे वह कभी नहीं मिटा पाई।

आज शाम चार बजे क्रेश के मनोरंजन कक्ष में जस्मीनको विदाई देने के लिए एक छोटा सा कार्यक्रम आयोजित किया गया। उसकी पढ़ाई की आदतों, विनम्र और मधुर व्यवहार की खूब प्रशंसा की गई। सिस्टर मारिआने उसकी बहुत प्रशंसा की और कहा कि स्कूल की सभी लड़कियों को उस पर गर्व होना चाहिए। स्कूल की लड़कियों को उसका अनुसरण करना चाहिए। जैस्मिन भी अभिभूत हो गई।

हम कौन हैं? उन्होंने हमारे और हम जैसे कई लोगों के लिए कितना कुछ किया है? उन्होंने हमें अपने पाले में खींचने के लिए इतना कुछ क्यों किया? लोग आलोचना करते हैं। वे कहते हैं कि लोगों को धर्मसे भ्रमित करने के लिएयेसारी साजिश है। लेकिन आलोचक, जो इन्ही को दोष देते हैं, उन्होंने क्या किया है,हम जैसी लड़कियों को आश्रय और सुरक्षा देने के लिए ? उनका आंतरिक उद्देश्य केवल धर्म का प्रसार करना नहीं था। उनके हृदय में शुद्ध मानवता का एक झरना बह रहा था और उन्हें यीशु के दूत के संदेश और शिक्षाओं में अटूट विश्वास था। वह संदेश दूसरों तक पहुँचने अर्थ उन्हें अपने पाले में खिंचना नहीं हो सकता। वे अपनी मातृभूमि से दूर आए और यहीं रहे। उन्होंने यहाँ के लोगों की यथासंभव सेवा की। उन्होंने कहाँ सभी को अपने पाले में खींचा, हम उनके जन्म के ऋणी हैं।

जस्मीन के हृदय में फादर फिलिप और सिस्टर नैंन्सीके लिए कृतज्ञता का एक असीम भाव उमड़ पड़ा। जस्मीन बोलने के लिए उठी, लेकिन आज उसे बोलने के लिए शब्द नहीं मिल रहे थे। उसने बस इतना ही कहा।

इसी क्रेश ने ही मुझे उभारा है, उसके प्रति मेरा भी कुछ कर्तव्य है, लेकिन अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद, मैं यहाँ आऊँगी। इस क्रश में रहकर मैं जनसेवा करुँगी। उसने कुष्ठ रोग पर और अधिक शोध करने की मंशा भी व्यक्त की। उसके मन में फिर से विचारों की लहरें उठीं। वह सपने देखने लगी।

जब हम लौटेंगे, तो हम एक छोटा सा निकेतन, कुष्ठरोगीयोंके लिए एक साफ-सुथरी कॉलोनी और उनके लिए एक आधुनिक अस्पताल बनाएंगे। क्रेश के आसपास कोई ‘लेपर’ नहीं होना चाहिए। कोई भीख न मांगे। सभी को अपनी कॉलोनी में काम करना चाहिए और खाना चाहिए।

प्रभु यीशु, ईश्वर ने हमें अपने दृढ़ संकल्प में दृढ़ रहने की शक्ति दी है।

पर हमें आने में चार या पाँच साल लगेंगे। तब तक यहाँ कौन जीवित रहेगा ? क्या हमारे माता-पिता उनमें से होंगे? क्या हम अपने हाथों से उनकी थोड़ी सी भी सेवा कर पाएंगे?

कोई जस्मीन के बारे में बोल रहा था…,कोई उसकी सहेलियों बारे में..उसके स्कूल के दोस्तों के बारे में बात कर रहा था,…….लेकिन वह कुछ सुन नहीं पा रही थी। सामने हॉल में, एक बड़ा पोस्टर था जिसमें प्रभु यीशु एक महिला को पानी पिला रहे थे। नीचे लिखा था: ‘उन्होने दिये हुए पानी से जो तृप्त होता है, उसे फिर प्यास नहीं लगती।’

उसे फादर फिलिप्स के सर्मन की याद आई। किसी शरमोणी महिला की कहानी। प्रभु ने उस पापी महिला को दर्शन दिया। क्या उसके माता-पिता पापी थे ? तो उन्हें पानी कौन देता? यीशु उस पापी महिला को करीब लाए और उसे जीवन का जल, आध्यात्मिक जल दिया। उसकी प्यास हमेशा के लिए बुझ गई। हम तो प्रभु यीशु द्वारा दिए गए पानी में डूबे रहते हैं।सर से पाँव तक। फादरने हमें इस पानी के करीब लाए, लेकिन फिर भी हम प्यासे थे। हम बहुत प्यासे थे। हम अपने अनदेखे माता-पिता को देखने के लिए प्यासे थे। हमारी आंखें बहुत प्यासी थीं। हमारा गला सूख गया था। हम बहुत प्यासे थे। हमारा जी घबरा गया….इतनी प्यास….

क्रेश सेबाहर आते समय जस्मीन का मन इन सभी विचारों से भर गया।सुनीता उसे बार-बार जल्दी आने के लिए कह रही थी। वह जस्मीन के साथ मुंबई तक जाने वाली थी। जस्मीन टैक्सी के पास पहुँची और जैसे ही बाकी सब गेट के पास खडे रहे। टैक्सीका दरवाज़ा खोलकर अंदर बैठते वक्त उसने सामने फुटपाथ पर जाने-पहचाने भिखारियों को देखा। भिखारी माथे पर अधुरे हाथ रखे राहगीरों से रहम की भीख माँग रहे थे। जस्मीन फिर बाहर आई, टैक्सी का दरवाज़ा बंद किया, भिखारियों के पास गई, पर्ससे कुछ नोट और सिक्के उनकी थाली,कटोरोंमें डाले, और मन ही मन कहा, “मेरे अनजान माता-पिता, मेरे काम में मेरी सफलता के लिए प्रार्थना करो, मुझे आशीर्वाद दो।”

वह टैक्सी में बैठ गई। टैक्सी चल पड़ी। उसने गेट पर खड़े क्रेशके सभी लोगों और सामने फुटपाथ पर बैठे भिखारियों की ओर हाथ हिलाया। बुझ-बुझीसी चार आँखे बेबस होकर जाती हुई टैक्सी की ओर देखती रही।

♥♥♥♥

मूल लेखिका – सौ. उज्ज्वला केळकर

संपर्क – निलगिरी, सी-५ , बिल्डिंग नं २९, ०-३  सेक्टर – ५, सी. बी. डी. –  नवी मुंबई , पिन – ४००६१४ महाराष्ट्र

मो.  836 925 2454, email-id – kelkar1234@gmail.com 

भावानुवाद  – जस्मिन शेख

मिरज. मो 9881584475

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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