हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – “महिला लेखन” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ लघुकथा – “महिला लेखन” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

युवा लेखिका की पहली पहली किताब के विमोचन पर जाना हुआ। सबने न केवल लेखिका बल्कि उनके परिवार और खासतौर पर पति की जमकर तारीफ की। एक सफल कवयित्री के पीछे पति का जिक्र बार बार होता रहा। सभागार तालियों से गूंजता रहा।

समारोह के बाद घर पहुंचते ही पतिदेव ने कहा- देखो। बहुत हो गया यह साहित्य वाहित्य। बस। तुम्हारा शौक पूरा करवा दिया। अब बच्चों को देखो। पढ़ाओ लिखाओ इन्हें और एक औरत की तरह घर संभालो। समझी?

नयी नवेली किताब एक तरफ पड़ी मानो मुंह चिढ़ा रही थी।

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # ५८ – लघुकथा – गर्भस्थ शिशु ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ५८ ☆

☆ लघुकथा ☆ ~ गर्भस्थ शिशु ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

माँ के गर्भ में फंसा शिशु, गर्भ से बाहर निकलने का इंतजार कर रहा था लेकिन न जाने क्यों, वह बार-बार आगे पीछे की सोच रहा था। कभी तो उसके मन में आता कि बाहर चला आऊं और फिर कभी वह स्वयं को वापस गर्भ की ओर लेकर चला जाता।

यद्यपि वह यह सोचकर वह बाहर आना चाहता था कि उसे एक बहुत बड़ी दुनिया देखनी है, लेकिन जब उसे यह भी लगता कि बाहर आने पर जब लोग उसे वैश्या का बेटा कह कर ताना मारेंगे तो कहीं उसकी खुशहाली को तरसती जिंदगी नरक न बन जाए।

वह घोर चिंता में डूबा हुआ था। अचानक हिंदी के एक बड़े लेखक के लिखे एक लेख को जो एक पाठक द्वारा अपने मित्र श्रोता को पढकर सुनाई जा रही थी, उसकी आवाज उस गर्भस्थ शिशु के कान में पड़ गयी।

उस बड़े लेखक के व्यंग आलेख को पढ़ते हुए गंभीर श्रोता ने कहा – भाई ध्यान से सुनो! इस ख्याति प्राप्त लेखक ने क्या लिखा है। लेखक ने लिखा है कि –

“औरत ने बच्चे की गर्दन अब छोड़ी। उसने बच्चे का मुख चूम लिया और अस्पताल से चल निकलने के लिए तत्पर हो गई। उसने जाते – जाते बच्चे से कहा, “किसी तरह पल ही जाओगे। बड़ा होने पर मेरे कोठे में जरूर आना। पहचान जाऊँगी तो अपने पेट से निकला हुआ बेटा कहूँगी, न पहचानूँ तो अपने पेट के लिए तुम्हें अपना शरीर दूँगी।”

नहीं.. नहीं.. लेखक ने एक सच्चाई व्यंग्य में लिखा था, जो अक्सर होता है।

लेकिन मेरी इस कहानी का बच्चा और मां ऐसा बिल्कुल नही सोच रहे थे कि समाज क्या सोचेगा।

दरअसल मां और बेटे दोनों प्रसन्न थे। माँ यह सोचकर गदगद हो रही थी कि आगे चलकर मेरा बेटा! अपने कौशल और बुद्धि के बल पर स्वयं को ऐसी जगह स्थापित कर लेगा, जहां से मेरी पहचान बदल ही जाएगी, लोग मुझे वैश्या नहीं कहेंगे। लोग मुझे एक विद्वान बेटे की मां कहेंगे।

उधर बेटे के मन में दूसरी बात चल रही थी।

बेटा सोच रहा था, क्या हुआ मेरी मां वैश्या है तो क्या। सब कुछ बदला जा सकता है लेकिन माँ तो नहीं बदली जा सकती है। बशर्ते मैं वैश्या मां के गर्भ से पैदा हूँ, लेकिन माँ तो सिर्फ और सिर्फ यही है न। मेरी मां मुझे बहुत प्यार करेगी मुझे अपने आंचल में छुपा कर दूध पिलाएगी, मुझे खूब पढ़ायेगी और मैं पढ़ लिख कर एक बड़े मुकाम को हासिल करूँगा और अपनी माँ का नाम रोशन करुंगा।

©® राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # ११९ – कौन अपना?… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – कौन अपना?।)

☆ लघुकथा # ११९ – कौन अपना? श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

श्मशान की लपटें शांत हो चुकी थीं। माँ की सूनी आँखें अब भी बेटी की चिता की राख को निहार रही थीं। जिस बेटी को उसने नौ महीने कोख में रखा, उँगली पकड़कर चलना सिखाया, उसी को आज अपने हाथों विदा करना पड़ा।

सबसे अधिक पीड़ा बेटी की मृत्यु की नहीं, बल्कि उन रिश्तों की थी जो उसके साथ ही मर गए। जीते-जी जिसे घर की लक्ष्मी कहा गया, उसके अंतिम सफ़र में वही लोग साथ छोड़ गए।

पास खड़ी एक वृद्धा की भर्राई आवाज़ गूँजी—

“हे ईश्वर! यदि संतान ऐसी हो, जो अपने ही रिश्तों का धर्म भूल जाए, तो निःसंतान रहना ही कहीं अधिक अच्छा है।”

चिता की राख हवा में उड़ रही थी और उसके साथ समाज के खोखले रिश्तों का सच भी।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ चुभते तीर # १०७ – वाह री किस्मत! ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय कथा – वाह री किस्मत!)  

☆ चुभते तीर # १०७ – कथा  – वाह री किस्मत! ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

चाय की प्याली से उठते उस बेरहम धुएं में जिंदगी बिलकुल वैसे ही उलझी हुई दिखती थी, जैसे दराज के किसी कोने में पड़ी पुरानी इयरफोन की केबल, जिसे सुलझाने की कोशिश करो, तो गांठें और कस जाती हैं। मेज के उस पार वो बैठी थी, अपनी चमचमाती स्क्रीन के पीछे एक सुरक्षित दूरी बनाए हुए, और इस पार मैं था, अपने ढहते हुए वजूद के मलबे पर मुफ़्त की उस सलाह की तरह बिखरा हुआ जिसकी किसी को जरूरत नहीं होती। हम दोनों के बीच एक ऐसा भयानक सन्नाटा पसरा था, जो सिर्फ उस घर में होता है जहाँ वेंटिलेटर पर पड़े आखिरी बुज़ुर्ग की सांसें गिनते हुए लोग वसीयत के पन्नों पर दस्तखत होने का इंतजार कर रहे हों।

वह मुझसे बात कर रही थी, या शायद अपनी स्क्रीन पर रेंडर हो रहे किसी और अक्स को अपनी हंसी दान कर रही थी। उसकी उंगलियां की-बोर्ड पर इस बेरहमी और तेज़ी से नाच रही थीं जैसे कोई तजुर्बेकार कसाई बकरे की खाल उतार रहा हो या कोई बेहद सगा संबंधी आपकी सबसे दुखती रग को कुरेद रहा हो। अचानक मेरी आंखों में डिजिटल टॉर्च जैसी रोशनी मारते हुए उसने कहा, “तुम बदल गए हो।” मुझे एक तीखी हंसी आ गई। जब खुद आईने के सामने खड़े होकर अपनी ही शक्ल ढूंढने के लिए आधार कार्ड की तस्वीरों का सहारा लेना पड़े, तो सामने वाले का यह इल्जाम किसी मीठे जहर की तरह हसीन लगता है। हम सब चलते फिरते आईना हैं। वह मुझे देख रही थी, मैं उसमें अपना खोया हुआ ज़मीर ढूंढ रहा था और वह खुद को किसी तीसरे अनजान शख्स के लाइक्स और हार्ट वाले कमेंट्स के चश्मे से री-इमेजिन कर रही थी। क्या ख़बर कौन कहाँ किस की तरफ़ देखता है! पूरी कायनात ही जैसे किसी सस्ते सीसीटीवी कैमरे की फुटेज हो गई थी जिसमें कोई किसी का सगा नहीं था।

उसने नजरें उठाईं। उसकी आंखों में एक अजीब सा रहस्य था, ठंडा, गहरा और उतना ही खोखला, जैसे उस लावारिस सूटकेस का खालीपन जो रेलवे स्टेशन पर पड़ा रह जाता है। जैसे किसी बंद पड़े तहखाने का जंग लगा दरवाजा, जिसके भीतर अनाज सड़ चुका हो पर बाहर खुशखबरी का बोर्ड टंगा हो। उसने मुस्कुराने की ज़हमत उठाई, पर वो मुस्कान होठों के कॉर्नर पर आकर ऐसे दम तोड़ गई जैसे बिना पेट्रोल के भरे चौराहे पर किसी का सेकेंड हैंड स्कूटर खटखटाकर बंद हो जाता है।

“तुम बहुत ओवरथिंक करते हो,” उसने टका सा जवाब दिया और अपने फोन को बैग में ऐसे ठूंस लिया जैसे कोई चोर चुराया हुआ सामान छुपाता है। यही तो इस इक्कीसवीं सदी का सबसे मखमली व्यंग्य है। जब इंसान का दम घुट रहा हो, तो दुनिया कहती है कि मौसम की खराबी है। जब आत्मा अंदर से लहूलुहान होकर आईसीयू में भर्ती हो, तो लोग कंधे पर हाथ रखकर ज्ञान बघारते हैं कि ‘चिल ब्रो, तुम डीप थिंकिंग के शिकार हो।’

हम कैफ़े के उस ठंडे पाखंड से बाहर निकले। सड़क पर आसमान से बूंदें टपक रही थीं, पर दिल्ली की उस घुटन भरी शाम में वो बारिश राहत की फुहार नहीं, बल्कि जलती हुई चिता पर डाले जाने वाले घी की तरह रिस रही थी। वह दो कदम आगे-आगे चल रही थी, उसकी परछाई सड़क पर बिछे गंदे पानी में तैर रही थी। मैं उस परछाई को कुचलता हुआ, उसके पीछे-पीछे घिसट रहा था। एक अजीब सा रोमांच मेरे भीतर कुलबुला रहा था, एक ऐसा रहस्य जो दिल की धड़कनों को किसी मर्डर मिस्ट्री के क्लाइमेक्स जैसी रफ्तार दे रहा था। मुझे साफ़ अहसास हो रहा था कि आज कुछ बहुत बड़ा टूटने वाला है. कोई पुराना भ्रम, कोई मुगालता, या शायद खुद मेरी रीढ़ की हड्डी।

वह अचानक एक बड़े से शोरूम के विशालकाय शीशे के सामने ठिठक गई। वो शीशा इतना साफ़, इतना पारदर्शी था कि उसमें खड़े होकर आप अपने चेहरे के दाग-धब्बे और अपनी आत्मा की सारी कमियां बिलकुल साफ-साफ़ देख सकते थे। उसने उस चमचमाते कांच में खुद को निहारा, अपने बिखरे हुए बालों को इस तरह सेट किया जैसे कोई कफ़न ओढ़ने से पहले सजता है, और फिर अचानक मेरी तरफ मुड़ी। उसकी आंखों में पानी था, नहीं, आंसू थे, जो शायद इस नकली शहर की सबसे असली और सबसे महँगी चीज़ थे।

मैंने घबरा कर, अपनी बची-कुची संवेदनशीलता को समेटते हुए पूछा, “क्या हुआ? एनी प्रॉब्लम?”

उसने अपनी जींस की जेब से एक मुड़ा-तुड़ा, सिसकता हुआ कागज निकाला और मेरी हथेली पर ऐसे रख दिया जैसे कोई हारा हुआ जुआरी अपनी आखिरी सांस सौंपता है। उसके हाथ उस वक़्त बर्फ से भी ज्यादा ठंडे थे, मानो मौत ने अभी-अभी उनसे बहुत तसल्ली से हाथ मिलाया हो और कहा हो कि ‘बस दो मिनट रुको, तुम्हारा तमाशा पूरा देख लूं।’ वह बिना कोई शब्द बोले, बिना कोई पल बर्बाद किए मुड़ी और उस अंधी भीड़ में इस तरह ग़ायब हो गई जैसे श्मशान का धुआं हवा में उड़ जाता है। मैं उसे पुकारता रह गया, पर मेरी आवाज गाड़ियों के हॉर्न और तमाशबीन राहगीरों के शोर-शराबे में घुट कर वहीं ढेर हो गई।

मेरे हाथ ऐसे कांप रहे थे जैसे पहली बार किसी अपने की अर्थी को कंधा देते हुए कांपते हैं। दिल सीने के पिंजरे को तोड़कर बाहर छलांग लगाने को बेताब था। उस मुड़े हुए कागज की तह को खोलते हुए मेरी रूह के भीतर जैसे एक ठंडी सनसनी दौड़ गई। मुझे पूरा यकीन था कि इसमें कोई फिल्मी विदाई का खत होगा, कोई बेवफाई का शिकवा होगा, या किसी तीसरे रईसजादे का नाम और पता होगा जिसके पास मुझसे बड़ा सैलरी पैकेज था।

पर अफ़सोस, उस कागज पर कोई शायरी नहीं थी, कोई तोहमत नहीं थी। वह एक न्यूरोलॉजिस्ट की पर्ची थी। उस पर बड़े-बड़े अक्षरों में डॉक्टर की स्याही चीख रही थी ‘एडवांस्ड स्टेज अल्जाइमर (स्मृति लोप)। मरीज अब चेहरों और रिश्तों को पहचानने की क्षमता पूरी तरह खो चुका है। वह सिर्फ आईनों और चमकीली सतहों में अपनी खोई हुई पहचान ढूंढने की आत्मघाती कोशिश करता है और सामने खड़े जीते-जागते व्यक्ति को महज़ एक बेजान अक्स, एक रिफ्लेक्शन समझता है।’

पैरों के नीचे की जमीन ऐसे सरक गई जैसे किसी बड़े बिल्डर की बनाई हुई बहुमंजिला इमारत ताश के पत्तों की तरह ढह जाती है। मेरी आंखों से आंसुओं का वो सैलाब फूटा जिसकी उम्मीद खुद बादलों को भी नहीं रही होगी। हे भगवान! वह मुझे देख ही नहीं रही थी। वह तो उस आईने को, उस अक्स को ढूंढ रही थी जो मैं उसके धुंधलाते हुए दिमाग के लिए बनने का नाटक कर रहा था। वह हर रोज मुझसे कैफ़े में आकर इसलिए मिलती थी ताकि अपनी मरती हुई याददाश्त के मलबे में, अपने खुद के वजूद को दो पल के लिए ज़िंदा देख सके। मैं जिसे उसका मॉडर्न अकेलापन, उसका एटीट्यूड और उसकी स्क्रीन की दीवानगी समझकर उस पर ताने कस रहा था, वह दरअसल उसकी बुझती हुई दिमागी बत्तियों के बीच एक खामोश, चीखती हुई आख़िरी इल्तजा थी।

सड़क पर गाड़ियां बदस्तूर दौड़ रही थीं, वीकेंड का जश्न मनाते लोग ठहाके लगा रहे थे। मैं उस कीचड़ और बारिश के बीच खड़ा होकर पागलों की तरह हंस रहा था और रो रहा था। कैसा गजब का तमाशा है इस मुई जिंदगी का! हम पूरी उम्र दूसरों की आंखों में अपना चेहरा और अपना वजूद ढूंढते रहे, यह जाने बिना कि सामने वाले की आंखें तो खुद अपनी रोशनी और यादों का दीवाला निकाल कर बैठी हैं। सीने से एक ऐसी हूक उठी, एक ऐसी आह निकली, जो लफ्ज़ों के सारे व्याकरण को तोड़कर बिखर गई, वाह री किस्मत! तूने रुलाया भी तो इतने गहरे और ज़हरीले व्यंग्य के साथ कि रोने वाले अभागे को अपनी इस बदकिस्मती पर भी रश्क आ जाए और ज़माना तालियाँ पीटकर कहे, ‘क्या कमाल का क्लाइमेक्स है!’

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – शॉर्टकट… ☆ श्री कमलेश भारतीय

श्री कमलेश भारतीय

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता

☆ ☆ लघुकथा – शॉर्टकट… ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

(यह लघुकथा कुछ वर्ष तक पंजाब स्कूल शिक्षा बोर्ड की पाठ्य पुस्तक में शामिल रही)

– भाई साहब , ज़रा रेलवे स्टेशन तक जाने के लिए कोई शाॅर्टकट…

– शॉर्टकट तो है पर …

– पर क्या ? जल्दी बताइए न ।

– आप उस रास्ते से नाक पर रूमाल रख कर और दीवारों का सहारा लेकर पांव रखकर ही जा सकोगे । आपको लगेगा कि अब गिरे… अब कीचड़ में फंसे… कब जाने … क्या हो जाए …

– शॉर्टकट की ऐसी हालत क्यों ?

– क्योंकि आपकी तरह हर कोई शॉर्टकट ही इस्तेमाल करता है । बड़े रास्ते से होकर , चक्कर काट कर कोई जाना नहीं चाहता । पर ठहरिए…

– हां , कहिए ।

– बुरा तो नहीं मानेंगे ?

– अरे भाई जल्दी कहो न । मुझे गाड़ी पकड़नी है । छूट जाएगी ।

– …यही बात ज़िंदगी पर लागू नहीं होती ?

– सो कैसे ?

– अब देखो न । सफलता की गाड़ी हर कोई पकड़ना चाहता है और इसके लिए हर आदमी शॉर्टकट अपना रहा है । चाहे शॉर्टकट कितना ही…

– बस । बस । अपने उपदेश अपने पास रखो । जनाब मुझे भी सफलता चाहिए ।

– तो चलते चलते इतना तो सुनते जाइए कि मेहनत का कोई शॉर्टकट इस दुनिया में नहीं है ।

 

© श्री कमलेश भारतीय

1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # १०६ – कथा कहानी – पारो दादी ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय कथा – पारो दादी)  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # १०६ – कथा कहानी – पारो दादी ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

बरगद का वह बूढ़ा पेड़ गाँव के उस इकलौते सरकारी दफ्तर जैसा था, जिसकी जटाएँ ज़मीन छूने को बेताब थीं, पर फाइलें कभी आगे नहीं बढ़ती थीं। पारो दादी उसी पेड़ के चबूतरे पर जमी थीं। उनके माथे पर खिंची झुर्रियों का नक्शा भारत सरकार के किसी अधूरे हाइवे जैसा था, गड्ढे ही गड्ढे, पर टोल टैक्स हर सांस को चुकाना पड़ रहा था। उनके हाथ में थमी वह डायरी किसी परमाणु बम के रिमोट कंट्रोल की तरह रहस्यमयी लग रही थी, जिस पर गाँव भर की नजरें टिकी थीं।

गाँव के चौराहे पर बैठे ‘व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी’ के वीसी यानी रामखिलावन ने बीड़ी का कश खींचते हुए कहा, “अरे भाई, बूढ़ी इस उम्र में इतिहास लिख रही है या भूगोल? कहीं अपनी दो बीघा जमीन सरकार के ‘स्मार्ट सिटी’ प्रोजेक्ट के नाम तो नहीं कर रही?” हमारे देश में जब तक कोई मर न जाए, लोग उसके जीने की वजह ढूंढते रहते हैं। लोग तंज कस रहे थे, और दादी अपनी टूटी रीढ़ की हड्डी को सीधा करने की नाकाम कोशिश कर रही थीं।

उनका बेटा? अरे, वह तो देश की जीडीपी बढ़ा रहा था। बैंगलोर के किसी शीशे वाले कॉर्पोरेट पिंजरे में बैठकर ‘वर्क फ्रॉम होम’ करता था। विडंबना देखिए, जो बेटा अपनी कंपनी की वेबसाइट पर चौबीस घंटे ‘वी आर अवेलेबल फॉर यू’ का पॉप-अप लाइव रखता था, वह अपनी माँ की आखिरी सांसों के लिए हमेशा ‘नॉट रीचेबल’ रहता था। महीने की एक तारीख को उसके अकाउंट से दादी के खाते में जो ‘पेंशन रूपी खैरात’ गिरती थी, उसका मैसेज आते ही दादी का पुराना नोकिया फोन ऐसे थरथराता था मानो कह रहा हो, “लो, इस महीने भी बेटे ने अपनी जिम्मेदारी का कफ़न खरीद लिया।”

बगल में रखा मिट्टी का घड़ा किसी ईमानदार अफसर की कुर्सी की तरह खाली और सूखा था। चारों तरफ खिले वो रंग-बिरंगे फूल इस बात का तीखा उपहास उड़ा रहे थे कि बाहर चाहे कितनी भी बहार आ जाए, अगर अंदर का आंगन बंजर हो, तो हर रंग बेगाना लगता है। दीये की वह कांपती हुई लौ किसी मिडिल क्लास आदमी की बची हुई सेविंग्स जैसी थी, जो कभी भी बुझ सकती थी। दादी की कलम कागज़ पर ऐसे रेंग रही थी, मानो कोई अंधा आदमी अंधेरी रात में अपनी खोई हुई लाठी ढूंढ रहा हो। रहस्य का मीटर सौ की स्पीड पार कर चुका था। आखिर क्या था उस डायरी में? क्या वह कोई ऐसा सच उगलने वाली थीं जिससे बड़े-बड़े रसूखदारों के मुखौटे उतर जाएं?

तभी धूल के गुबार को चीरती हुई एक चमचमाती सफारी गाड़ी आकर रुकी। उसमें से एक युवा लड़का उतरा, जिसके गले में लाखों का कैमरा लटका था। वह ‘रूरल इंडिया’ की कंगाली बेचकर यूट्यूब पर व्यूज बटोरने वाला आधुनिक ‘डिजिटल भिखारी’ था। उसने रील्स बनाने के लिए दादी के करीब जाकर कैमरा ऑन किया और एकदम इमोशनल टोन में पूछा, “अरे दादी माँ! इस डिजिटल युग में यह कागज़-कलम? क्या आप समाज की इस बेरुखी पर कोई तीखा व्यंग्य लिख रही हैं? क्या आपका बेटा आपको प्रताड़ित करता है? बताइए दादी, आज आपका यह वीडियो ट्रेंडिंग में नंबर वन जाएगा!”

दादी ने अपनी पथराई आँखों से उस लड़के को देखा। उनकी आँखों में कोई आंसू नहीं था, बल्कि एक ऐसा सन्नाटा था जो कैमरे के लेंस को भी पिघला दे। उन्होंने अपनी डायरी बंद की, उसे लड़के की तरफ बढ़ाया, और उनके सिर से पल्लू ऐसे सरक गया जैसे किसी मंदिर का पर्दा अचानक हट गया हो। उसी पल दादी की गर्दन एक तरफ झुक गई। उनकी आत्मा उस कॉर्पोरेट दुनिया को लात मारकर इस शरीर से ‘अर्ली एग्जिट’ ले चुकी थी।

लड़के ने कांपते हाथों से कैमरे को ऑन रखते हुए डायरी का पहला पन्ना पलटा। उसे लगा कि अंदर ‘मदर्स डे’ पर कोई तगड़ी स्क्रिप्ट मिलेगी जिससे लाखों लाइक्स मिलेंगे। लेकिन पन्ने पर जो लिखा था, उसने उसके कैमरे का सारा ऑटो-फोकस बिगाड़ दिया।

पूरी डायरी के हर पन्ने पर, हर लाइन में, केवल एक ही वाक्य बार-बार लिखा हुआ था, “मेरे बेटे की कंपनी वाले उसे छुट्टी नहीं देते, वह बहुत बड़ा आदमी बन गया है। उसकी कोई गलती नहीं है। हे भगवान, इस डायरी को सरकारी रिकॉर्ड में मत डालना, वरना मेरे बेटे की नौकरी चली जाएगी।” और आज की तारीख वाले आखिरी पन्ने पर स्याही से कम, पानी से ज्यादा लिखा था—”आज मैंने अपनी आखिरी सांस भी उसके नाम ट्रांसफर कर दी है, अब वह चैन से मीटिंग कर सकेगा।”

लड़के का कैमरा उसके हाथ से छूटकर उसी धूल में गिर गया जहाँ दादी के नंगे पैर टिके थे। जो लड़का दुनिया को रोता हुआ दिखाकर अपनी दुकान चलाता था, आज उसकी अपनी आह भी हलक में फंस गई थी। पूरी प्रकृति इस आधुनिक विकास पर थू-थू कर रही थी। एक माँ ने मरते-मरते भी उस ‘सिस्टम’ और ‘बेटे’ का बीमा कर दिया था, जिसने उसे जीते जी एक लावारिस लाश बना दिया था। वाह रे आधुनिक समाज, और धन्य है वह माँ जो अपने हत्यारे को ही कफ़न का कपड़ा तोहफे में दे गई!

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # ५७ – लघुकथा – फरिश्ता ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ५७ ☆

☆ लघुकथा ☆ ~ फरिश्ता ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

बेशर्म गर्मी को इतनी भी शर्म नहीं कि किसी की रोजी-रोटी और पेट पर लात मार न दे। रोड के किनारे पड़ी मौरंग की बोरियों को तीसरे माले तक ले जा रहे अचल का पसीना सिर से एड़ी की तरफ उतर रहा था। इतनी गर्मी में बेचारे अचल को लगातार चलना ही पड़ रहा था। और चले भी क्यों नहीं। घर के लिए तेल- नमक का जुगाड़ करने के साथ साथ, छोटे बेटे सोमेश के दवाई के लिए पैसे का इंतजाम करना उसकी मजबूरी थी।

आज अचल जब घर से चला, तो सोमेश ने धीरे से कहा था बाबूजी ! आज जल्दी घर आना। मुझे आज किसी डॉक्टर के पास जरूर ले चलो। सोमेश की ये बातें अचल के मजबूर कानों में बार-बार गूंज रही थी।

डॉ. प्रवीण अपने निर्माणाधीन कोठी को देखने के लिए आए हुए थे। सारे मिस्त्री मजदूर उनके पास जमा हो गए थे। शायद आज डॉ. प्रवीण में मजदूरों के लिए कोका कोला वाला कोल्ड ड्रिंक का इंतजाम करके लाए थे। इस प्रकार चिलचिलाती गर्मी में इस कोठी के मालिक ने अपने मजदूरों के लिए कुछ राहत का इंतजाम किया था।

सारे मजदूर ठंडी कोल्ड ड्रिंक का मजा ले रहे थे। ठीक उसी वक्त अचल धूप में किनारे खड़ा चंदन के फोन से अपने बेटे सोमेश से बातें कर रहा था। बात करते-करते वह रो पड़ा।

बेटा मैं अभी आता हूँ, मेरे लाल ! अब मत रोवो, मैं आ ही रहा हूँ।

ऐसा कहते हुए उसने छोटे वाले की पैड फोन को अचल को चंदन को पकड़ाते हुए कहा। भाई चंदन! मैं घर जा रहा हूँ। मेरे बेटे की तबीयत बहुत खराब है। अब मुझसे बर्दाश्त नहीं हो रहा है। तुम्हारे जेब में क्या दो – तीन सौ रूपये पड़े हैं। यदि पड़े हो तो भईया मुझे दे दो। मैं मेहनत मजदूरी करके मय ब्याज तुमको चुकता कर दूंगा। मुझे अपने भैया को डॉक्टर से दिखाना जरूरी है।

चंदन ने जब अपना जेब टटोला तो मुश्किल से उसकी जेब में डेढ -पौने दो सौ रुपए पड़े थे। उसने उन रूपयो को अचल को पकड़ाते हुए, कहां भाई यह पकड़ो, आज भईया को हर हाल में डॉक्टर के पास ले जाओ। अचल के चेहरे की रंगत बदल गयी, थोड़ी सी खुशी तो चेहरे पर झलक पड़ी थी।

उसने सुपरवाइजर राकेश से घर जाने के लिए छुट्टी मांगी। एकाएक एक कड़कती आवाज में सबका ध्यान उसकी तरफ खींच लिया।

कहाँ बे कहाँ जाएगा ?

तुम्हें कहीं नहीं जाना है, शाम को जाना है ?

मुझे इससे लेना देना नहीं कि तुम्हारा बेटा बीमार है या मर..%%

अचल को जैसे लकवा मार गया हो, वह भरभरा कर जमीन पर गिर पड़ा। सारे मजदूर उसकी तरफ दौड़े।

डॉ. प्रवीण दूर से इस पूरे घटनाक्रम को देख रहे थे। उन्होंने अचल और चंदन की बात को भी सुन लिया था। उन्हें इस बात का पता भी लग गया था कि सुपरवाइजर तेज आवाज में सिर्फ इसलिए बोल रहा है की मालिक डॉक्टर प्रवीण यह जान जाए कि वह अपने दायित्वों के प्रति कितना जागरुक है।

डॉ. प्रवीण अचल की ओर बढ़े। बड़े ही प्रेम से बिना इस बात की फिक्र किया कि उनके कपड़े गंदे हो जाएंगे, उन्होंने अचल को अपनी बाहों में उठा लिया और बोले चाचा! आप बिल्कुल परेशान न हो। आप मेरे साथ चलिए। मैं आपको आपके घर ले चलता हूँ। मैं आपके बच्चे को ले आऊंगा और आपके बच्चे का इलाज कोई दूसरा नहीं करेगा, मैं स्वयं करूंगा। रूपए पैसे की चिंता बिल्कुल छोड़िए और आपने ये जो थोड़े से पैसे उस लड़के से उधार लिए है उसे वापस कर दीजिए।

ऐसा कहते हुए डॉ.प्रवीण ने अचल को अपनी कार में बैठाया, और अचल के घर की तरफ चल दिए।

कुछ ही घंटे बाद अचल का बेटा सोमेश डॉ प्रवीण की क्लीनिक पहुंच चुका था। उसने दवा खा ली थी। उसका बुखार उतर गया था। ए सी की ठंडी ठंडी हवाएं, उसके बदन को राहत पहुंचा रही थी। अचल स्तब्ध होकर डॉ प्रवीण को निहार रहा था। वह उन्हें ऐसे देख रहा था कि मानो कोई फरिश्ता उसके सामने बैठा हो।

डॉ. प्रवीण भी सामने बैठे अचल को एकटक निहार रहे थे। वे अतीत के उन दिनों की यादों खो गए थे, जब बचपन में वे एक बार बहुत बीमार थे। उनका भी शरीर तेज ज्वर से जल रहा था। उस समय उनके पिताजी जो नोएडा के एक छोटे से कारखाने में बतौर मजदूर काम करते थे, वे भी अपने सुपरवाइजर के डांट की परवाह किए बगैर अपने प्रवीण के लिए दोपहर में काम छोड़कर वापस घर आ गए थे।

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक : 26-06-2026

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # १०५ – कथा कहानी – जहाँ खुदा नहीं रहता ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय कथा कहानी – जहाँ खुदा नहीं रहता)  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # १०५ – कथा कहानी – जहाँ खुदा नहीं रहता ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

कलीम साहब के चेहरे पर झुर्रियों की एक ऐसी उलझी हुई लिखावट थी, जिसे वक्त की स्याही से नहीं, बल्कि शहर के सारे कायदे-कानूनों ने मिलकर लिखा था। वह साठ पार के एक ऐसे ढहते हुए मलबे की तरह थे, जिसमें कभी एक आलीशान इमारत रही होगी। उनके हाथ में प्लास्टिक की एक पारदर्शी थैली थी, जिसमें क्वार्टर की दो बोतलें और पानी का एक पाउच ऐसे टकरा रहे थे, जैसे किसी उजाड़ खंडहर में हवा के झोंकों से लोहे की कोई पुरानी जंजीर दीवार से टकरा रही हो।

रात के ग्यारह बज चुके थे। शहर के सारे ठेके पुलिस की सायरन वाली गाड़ियों के डर से अपनी शटर गिरा चुके थे। कानून की मुस्तैदी का आलम यह था कि जैसे पूरी दुनिया का सारा अपराध बस उसी सवा सौ मिलीलीटर के कांच के टुकड़े में कैद हो। कलीम साहब के घुटने अब उनका साथ छोड़ रहे थे, और प्यास? प्यास गले में ऐसे कांटे की तरह चुभ रही थी, जैसे किसी सूखे कुएं के तल में कोई मछली आखिरी बार तड़प रही हो।

तभी उनके ठीक सामने उस गली का नुक्कड़ आया, जहां इस अंधेरे और तल्ख शहर की इकलौती रोशन मीनार खड़ी थी। संगमरमर की वह मस्जिद, जिसके कंगूरे रात की चांदनी में ऐसे चमक रहे थे मानो खुदा ने खुद आसमान से चांदी का वर्क उतारकर वहां चिपका दिया हो। कलीम साहब के कदम थमे। उनके पैर उस चौखट की तरफ बढ़ने लगे, जहां कभी अमीर और गरीब, पापी और पुण्य आत्मा, सब एक ही कतार में खड़े होकर सजदा करते थे।

वहां चबूतरे पर शहर के सबसे नामी मौलवी साहब बैठे थे। उनकी लंबी सफेद दाढ़ी इतनी सलीके से संवारी हुई थी कि उसमें कोई एक तिनका भी ढूंढना चाहे तो नाकाम रहे। उनका कुर्ता इतना कड़क कलफदार था कि अगर उसे खड़ा कर दिया जाए, तो वह खुद एक इंसान की तरह गवाही देने लगे।

कलीम साहब ने अपनी कांपती हुई थैली को छाती से सटाया और सीढ़ियों पर कदम रख दिया।

मौलवी साहब की नजरें कलीम साहब की उस थैली पर पड़ीं, और उनकी भौहें ऐसे तिनक गईं जैसे किसी पवित्र किताब पर किसी ने काली स्याही छिड़क दी हो। वह अपनी जगह से ऐसे उछले, मानो तख्ते के नीचे कोई बिच्छू आ गया हो।

“अरे-अरे! ओ कलीम! दिमाग खराब हो गया है क्या तुम्हारा? ये क्या नापाक चीज हाथ में थामे खुदा के घर की तरफ बढ़े चले आ रहे हो? लानत है इस उम्र में इस बेहयाई पर! यह मस्जिद है, खुदा का पाक आशियाना। यह फरिश्तों का ठिकाना है, तुम्हारी इस चुल्लू भर लानत का नहीं।” मौलवी साहब की आवाज में पूरे मजहब का ठेका गूंज रहा था।

कलीम साहब की आंखों में एक अजीब, सर्द सन्नाटा था। उन्होंने थैली को और कसकर भींचा। उनकी आवाज में रोने की खनक नहीं, बल्कि एक टूटे हुए कांच की किरच थी। उन्होंने मौलवी साहब की आंखों में आंखें डालीं और बेहद धीमे, थरथराते होठों से कहा, “साहब, थका हुआ हूँ। जिंदगी ने ऐसा निचोड़ा है कि अब भीतर सिवाय बारूद के कुछ बचा नहीं है। बस दो घूंट हलक से उतारने दे इस मस्जिद के किसी कोने में बैठकर। खुदा तो बड़ा रहमदिल है ना? वह तो घट-घट की जानता है, वह मेरी इस बेबसी को भी समझ लेगा।”

“तौबा-तौबा! बदतमीज, गुस्ताख!” मौलवी साहब ने हवा में हाथ लहराया, जैसे किसी आवारा कुत्ते को दुत्कार रहे हों। “खुदा रहमदिल है, लेकिन गुनाहगारों का मददगार नहीं। इस पाक जगह पर कदम रखने की भी हैसियत नहीं है तेरी इस नापाक हालत में। भाग यहाँ से! यहाँ हर जर्रे में खुदा मौजूद है, तेरी इस गंदगी के लिए यहाँ कोई कोना नहीं है।”

कलीम साहब की पीठ झुक गई। उनकी हालत उस फटे हुए लिफाफे जैसी हो गयी थी, जिसके भीतर का खत कब का खो चुका था। उन्होंने एक गहरी सांस ली। उन्होंने थैली उठााई, मौलवी साहब को देखा और वह मशहूर शेर बुदबुदाया,

“ज़ाहिद शराब पीने दे मस्जिद में बैठ कर…

या वो जगह बता दे जहाँ पर ख़ुदा न हो।”

मौलवी साहब के चेहरे पर कुत्सित मुस्कान तैर गई। उन्होंने अपनी उंगली शहर के सबसे अंधेरे, सबसे गंदे कोने की तरफ उठाई, “जा! उस पार जा। जहाँ बदबू है, जहाँ गटर बहता है, जहाँ जिस्म बिकते हैं, वहाँ जा। वहाँ खुदा नहीं रहता। वहाँ जो मर्जी सो कर।”

कलीम साहब बिना कुछ कहे पलट गए। वह हांफ रहे थे, गिर रहे थे, संभल रहे थे। वह उस गटर की तरफ नहीं गए, बल्कि वह शहर के उस सबसे पॉश इलाके की तरफ मुड़ गए, जहां बड़ी-बड़ी कोठियां थीं। एक ऐसी कोठी, जिसके बाहर संगमरमर की नेमप्लेट पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था, ‘कलीम विला’।

यह कलीम साहब का अपना खुद का घर था। वही घर, जिसे उन्होंने अपनी जवानी के खून-पसीने से सींचा था।

अंदर का नजारा हैरान करने वाला था। कलीम साहब का इकलौता बेटा, जो आजकल की लाइफ स्टाइल और प्रोफेशनल इमेज के लिए जाना जाता था, आज घर में एक बड़ी पार्टी दे रहा था। हॉल में शहर के बड़े रईस और सरकारी अफसर मौजूद थे। धुआं, संगीत और महंगी विदेशी स्कॉच के दौर चल रहे थे।

कलीम साहब जब पिछले दरवाजे से अपने ही घर के बगीचे में दाखिल हुए, तो उन्होंने खिड़की से देखा कि उनका बेटा मौलवी साहब (जो अभी-अभी मस्जिद से वहां पहुंचे थे) को एक बड़ा लिफाफा सौंप रहा था। बेटा कह रहा था, “साहब, यह नया प्रोजेक्ट बिना ‘ऊपर वाले की रहमत’ के मुमकिन नहीं था। यह छोटा सा नजराना आपके चैरिटी ट्रस्ट के लिए। बस दुआ कीजिएगा कि अगली टेंडर भी हमें ही मिले।”

मौलवी साहब, जो अभी दस मिनट पहले मस्जिद की सीढ़ियों पर पाक-नापाक का पाठ पढ़ा रहे थे, अब उसी हाथ से स्कॉच का गिलास पकड़े हुए थे और मुस्कुराकर कह रहे थे, “मियां, खुदा तो बस तुम जैसे कामयाब लोगों के साथ है।”

कलीम साहब अपने ही घर के लॉन में, उसी अंधेरे कोने में बैठ गए जहाँ उन्होंने कभी उम्मीदों का एक पौधा लगाया था। उन्होंने कांपते हाथों से अपनी सस्ती बोतल का ढक्कन खोला। पहली घूंट जब हलक से उतरी, तो उनकी आँखों से निकले आंसू सीधे शराब में जा गिरे।

अंदर आलीशान झूमर के नीचे ‘मजहब’ और ‘मुनाफा’ एक ही मेज पर बैठकर जश्न मना रहे थे और बाहर अंधेरे में वह बूढ़ा बाप बैठा था जिसने अपनी पूरी जायदाद और वसीयत कुछ दिन पहले ही अपने बेटे के नाम कर दी थी, यह सोचकर कि अब आखिरी दिन सुकून से बीतेंगे। लेकिन उसे क्या पता था कि जिस घर की ईंटों में उसने अपनी रूह गाड़ दी, वहां अब उसके लिए एक कुर्सी तक नहीं बची थी।

कलीम साहब ने अपनी पूरी ताकत समेटकर एक आखिरी घूंट भरी। उनके होठों पर एक ऐसी मुस्कान उभरी, जिसमें रिश्तों और धर्म का जनाजा उठ रहा था। उन्होंने आसमान की तरफ देखा, जहाँ चाँद बादलों के पीछे छिप रहा था।

उन्होंने बुदबुदाया, “मौलवी साहब… तुमने सच कहा था। मस्जिद में खुदा था, इसलिए वहाँ जगह नहीं मिली। और इस घर में… इस घर में तो अब सिर्फ ‘सौदा’ बचा है, इंसान ही नहीं रहा, तो खुदा कहाँ से होगा? मुझे मेरी वो जगह मिल गई, जहाँ खुदा नहीं है।”

अगले ही पल, कलीम साहब की गर्दन एक तरफ लुढ़क गई। खाली बोतल उनके हाथ से छूटकर संगमरमर के फर्श पर गिरी और बिखर गई। अंदर कमरे में ठहाकों और नोटों की गिनती की आवाज गूंज रही थी, और बाहर लॉन में, एक बाप की रूह इस ढोंगी दुनिया के मुंह पर अपनी आखिरी खामोश हंसी छोड़कर हमेशा के लिए आजाद हो चुकी थी।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख / कथा कहानी में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # ११८ – धरती माँ की पुकार… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – धरती माँ की पुकार।)

☆ लघुकथा # ११८ – धरती माँ की पुकार श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

पर्यावरण दिवस पर शहर के एक बड़े विद्यालय में भव्य कार्यक्रम आयोजित था। मंच पर बड़े-बड़े भाषण गूँज रहे थे—

“पेड़ बचाओ… पानी बचाओ… धरती बचाओ…”

सभागार तालियों से गूँज उठा। कार्यक्रम के बाद लोगों ने जलपान किया और जाते-जाते आधी भरी प्लेटें, प्लास्टिक की बोतलें और बचा हुआ पानी यूँ ही इधर-उधर फेंक दिया।

भीड़ छँटने लगी तो एक शिक्षक की नजर विद्यालय के बाहर सूखे पेड़ के नीचे बैठी एक नन्ही बच्ची पर पड़ी। वह जमीन पर गिरी अधूरी पानी की बोतलों से बचा पानी अपनी छोटी-सी बोतल में भर रही थी।

शिक्षक उसके पास गए और स्नेह से बोले,

“बेटी, ये क्या कर रही हो?”

बच्ची ने मासूम आँखों से उनकी ओर देखा—

“अंकल, माँ कहती हैं… पानी और अन्न कभी व्यर्थ नहीं फेंकना चाहिए। ये धरती माँ का आशीर्वाद होते हैं।”

शिक्षक कुछ क्षण निरुत्तर खड़े रहे।

तभी बच्ची ने पास खड़े सूखे पेड़ को सहलाते हुए कहा—

“जब पेड़ रोते होंगे ना अंकल… तब ही बारिश कम हो जाती होगी। फिर खेत सूख जाते होंगे… और गरीबों को दो जून की रोटी भी नहीं मिलती होगी…।”

उसकी बात सुन शिक्षक का मन भीतर तक भीग गया। मंच पर दिए गए सारे भाषण उस मासूम बच्ची की एक बात के आगे फीके पड़ गए थे।

उन्होंने देखा—

धरती को बचाने की बातें करने वाले लोग ही धरती का सबसे ज्यादा नुकसान कर रहे थे।

“प्रकृति बदला नहीं लेती,

बस समय आने पर हर कटे हुए वृक्ष का हिसाब

सूखे खेतों और प्यासे होंठों से वसूल करती है।”

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ कथा कहानी ☆ दस रुपए के नोट की आत्मव्यथा ☆ श्री ओमप्रकाश पाण्डेय ☆

श्री ओमप्रकाश पाण्डेय

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री ओमप्रकाश पाण्डेय जी भारतीय स्टेट बैंक से 2015 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्त.  सन 2018 से कविताओं और लघु कथाओं का नियमित रूप से लेखन. दो काव्य संग्रह “ऑंचल” और “किलकारियाँ (बालगीत संग्रह)” तथा दो कथा संग्रह “चूड़ियाँ” और “अनपढ़” प्रकाशित. लगभग तीन सौ से अधिक कहानियाँ व लघु कथाएं रचित जिनमें “मार्निंग वाक” (दस कहानियाँ), “आधुनिक विक्रम और वेताल की कथा” (दस कहानियाँ), दीदी, प्रश्न या आमंत्रण, सोंकविता , विश्वास आदि चर्चित रहीं हैं. आपके द्वारा सात सौ से अधिक कविताएँ रचित जो कई साहित्यक मंचों पर प्रस्तुत की गईं हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय कथा “दस रुपए के नोट की आत्मव्यथा“.)

 ☆ कथा कहानी ☆ दस रुपए के नोट की आत्मव्यथा ☆ श्री ओमप्रकाश पाण्डेय ☆

आप लोग महान व्यक्तियों की आत्मकथा पढ़ते होंगे , और उनकी आत्मकथा से प्रेरणा भी लेते होंगे. मेरे जीवन में ऐसा कुछ है नहीं. मैं तो मात्र लेन -देन का एक माध्यम हूॅं. मैं जिसकी जेब में रहता हूॅं, वह बहुत खुश रहता है. फिर लोग समझते होंगे कि मैं भी सदा खुश रहता हूॅं, पर यह पूरा सत्य नहीं है, बल्कि अधूरा सत्य है . आइये मैं आपको अपनी आत्मव्यथा बताऊॅं .

भारत सरकार के नोट छापने के प्रेस में मेरा जन्म हुआ. जन्म भी संगीनों के साये में हुआ और ऐसी जगह हुआ जहाॅं  परिंदे भी पर नहीं मार सकते थे. जो भी कर्मचारी अथवा अधिकारी अन्दर आता  था, उसकी पूरी तलाशी ली जाती थी, यहाॅं तक कि उनके  जूते और मोज़े भी उतरवा कर चेक किया जाता था. मैं एकदम कड़क और खूबसूरत था. मुझे मेरे अन्य निन्नानबे भाईयों के साथ मिलाकर एक सौ की गड्डी बनायी गई. मेरी तरह बहुत सारे नोटों की गड्डियों को मिला कर बंडल बनाया गया. हम सारे नोटों को देश के विभिन्न बैंकों में,  एक  लकड़ी के  बक्से में बंद कर के, कड़ी सुरक्षा में पहुंचा दिया गया.  अब यहाॅं से मेरी वास्तविक जीवन यात्रा शुरू होती है.

एक दिन मुझे बैंक के कैशियर को दे दिया गया, और वहाॅं पर बैंक से मुझे एक व्यक्ति,  जिसने बहुत सारे रुपए निकाले थे, उसे अन्य नोटों के साथ ( जिसमें  पांच सौ, सौ, पचास,बीस , दस आदि के नोट भी थे ) मुझे भी दे दिया गया. अब मैं बैंक से, उस व्यक्ति के पर्स में पहुंच चुका था. मैं मुड़ा हुआ,  चुपचाप उसके पर्स में पड़ा हुआ था. बैंक से बाहर आने के बाद उस व्यक्ति ने रामआसरे के पान की दूकान पर पान खाया और उसे मुझे दे दिया. रामआसरे ने भी पान के पांच रुपए काट कर, बाकी पांच रुपए उसे वापस कर दिया और उसने मुझे अपने पैरों के पास में रखे हुए  एक डिब्बे में रख दिया. मैं अन्य नोटों के साथ उसी डिब्बे में पड़ा हुआ था.

शाम को रामआसरे ने डिब्बे से कुछ नोट निकाले, जिसमें मैं भी एक था, और अपने जेब में रख कर, अच्छे कपड़े पहन कर, अपने दोस्त कल्लू के बेटे की शादी में चल दिया. थोड़ी देर बाद, रात हो चुका था और मेरे कानों में  बैंड बाजा की आवाज और लोगों के नाचने की आवाज सुनाई पड़ी और ” आज मेरे यार की शादी है” गाना सुनाई पड़ने लगा. रामआसरे यह गाना सुन कर इतना खुश हुआ कि वह खुद भी नाचने लगा. अचानक नाचते – नाचते उसने जेब में रखे हुए नोटों को अपने हाथ में लेकर लहराने लगा, लहराते हुए नोटों में मैं भी एक था. लहराते- लहराते उसने हाथ के सारे नोटों को  हवा में उछाल दिया. सारे बैंड वाले, बजाना बन्द कर के हमें बटोरने लगे. इस आपाधापी में कितनों के जूतों के नीचे मैं कुचला गया, मुझे याद नहीं. जीवन में पहली बार मुझे बुरी तरह से जूते से कुचला गया. खैर, थोड़ी ही देर में, एक बैंड वाले के हाथ मैं लग गई और उसने मुझे अपनी जेब में जल्दी से रख लिया. दर्द से मैं कराह रही थी, लेकिन वहाॅं मेरी चीखें कौन सुनता! खैर कुछ देर उसकी जेब में पड़े रहने के बाद,मेरा दर्द कुछ कम हुआ .

उस बैंड वाले व्यक्ति ने बारात के बाद घर आकर सारे नोट अपनी पत्नी अर्चना  को दे दिया, और उसने सहेज कर अपने पर्स में हम सबको रख लिया. अब तक आधी रात बीत चुकी  थी . घर के सब लोग सो चुके थे, हम सारे नोट भी पर्स में आराम से पड़े हुए थे. सुबह होते ही अर्चना के बेटे गजेन्द्र ने कहा मम्मी मुझे दस रुपए दे दो, आज मंगलवार है, हनुमानजी को मैं प्रसाद चढ़ाऊंगा. अर्चना ने पर्स से मुझे निकाल कर गजेन्द्र को दे दिया. गजेन्द्र ने हनुमानजी के मंदिर के पास के चौधरी के दूकान से बतासा खरीद कर, हनुमानजी को चढ़ा दिया. चौधरी ने अभी मुझे अपने गल्ले में रखा ही था कि एक भीखमंगा आ गया और उससे भगवान के नाम पर कुछ मांगने लगा. चौधरी ने मुझे उठा कर उसे दे दिया और बोला कि एक रुपया रख लो और नौ रुपया वापस करो. अब मैं भिखमंगा बटौहा के झोले में पहुंच गया. दिन भर भीख मांगने के बाद शाम को बटौहा ने एक दूकान से कुछ चावल – दाल खरीदा और सब्जी मंडी से कुछ सब्जी. अब मैं सब्जी बेचने वाली लक्षमिनिया के पैरों के नीचे, जिस बोरे  पर वह बैठी थी, उसके भीतर मैं पहुंच गया. भीषण बदबू हो रही थी, ऊपर से लक्षमिनिया मेरे ऊपर बैठी थी, और मैं अन्य नोटों के साथ दबा हुआ था. लक्षमिनिया ने रात में पता नहीं क्या खाया था, वह थोड़ी- थोड़ी देर के बाद बदबूदार हवा  छोड़ती रहती और हम सब नोटों की हालत नारकीय हो रही थी.

इस प्रकार से हमारी यात्रा चलती रही, कहने को तो मेरा एक बहुत ही लम्बा जीवन है, लेकिन मैं अपने जीवन के अन्तिम समय के पहले की कुछ मर्मांतक घटनाओं को कह कर, मैं अपनी कहानी समाप्त कर दूंगा.

एक दिन मुझे एक आदमी ने किशोर आटो चालक को दे दिया. दिन भर किशोर आटो चलाने के बाद रात में मयूरी डांस बार पहुंचा. उसकी वहां पर पसंद की डांस गर्ल थी बिंदिया. बिंदिया बिल्कुल बिंदास थी. उसके लिए दोस्ती अपनी जगह, धंधा अपनी जगह. धंधे में बिंदिया कोई लफड़ा नहीं मांगती थी. खैर उस रात किशोर के साथ उसने काफी समय बिताया, चलते समय किशोर ने उसके हाथ में कुछ नोट रख दिए. बिंदिया ने नोटों को गिना. कुल नोट थे, चार सौ दस! अब बिंदिया क्रोध से चिल्लाने लगी, किशोर को संसार की जितनी भी भद्दी गालियां हो सकती थी, उसने दिया. किशोर ने कहा बिंदिया रानी, आज कमाई कम हुई है, रख लें, रोज़ तो तुम्हारे लायक देता ही हूॅं. बिंदिया भड़क गई, बोली देख, लूंगी तो पूरा लूंगी, नहीं तो यह अपना रुपया रख, मैं ऐसे रुपए पर थूकती हूं. इतना कहकर बिंदिया ने मुझ पर थूक दिया. जिंदगी में पहली बार मुझे यह भी दिन देखना पड़ा. किशोर एकदम भड़क गया, पहले तो उसने हम नोटों को उठाकर अपने रुमाल से पोंछा और अपने जेब में रखा, उसके बाद उसने जो बिंदिया को गाली देना शुरू किया कि पूछो मत. फिर उसने बिंदिया को कहा कि आज तूने दौलत के नशे में लक्ष्मी पर थूका है ( हम नोटों को कुछ लोग लक्ष्मी भी कहते हैं, और प्रणाम करते हैं), जा मैं तुम्हें श्राप देता हूं कि तुमको कोढ़ हो जायेगा.

किशोर फिर बार से बाहर आया और सीधे एक देशी दारु की दुकान पर गया. दुकान के सामने एक औरत जिसका  नाम सुरजिया था और उसने चिकने की दूकान जमीन पर लगा रखी थी, जहां वह भूजी हुई मछली, उबले हुए अंडे आदि बेचती थी और लोग दारु पीने के पहले उसकी दूकान से चिकना खाते थे. किशोर ने भी भूजी हुई मछली खरीदी और अन्य नोटों के साथ मुझे  सुरजिया को दे दिया. सुरजिया  ने हमें अपने पैरों के नीचे रखें बोरे में घुसा  दिया. अब मैं उसके पैरों के नीचे, जहाॅं  कच्ची दारु की बदबू आ रही थी, दबा था. लेकिन मेरे पास कोई चारा नहीं था सिवाय वहीं पड़े रहने के. ग्राहक आते, चिकना लेते और फिर भट्टे पर दारू पीने चले जाते. आधी रात के बाद सुरजिया ने अपनी दूकान समेटी और दारु की दूकान पर जा कर एक पौआ दारु पिया और कुछ नोटों के साथ मुझे भी भट्टे वाले को दे दिया. भट्टे वाले ने बिना गिने मुझे अपने गल्ले में रख दिया. चारों ओर कच्ची दारु की बदबू फैली थी और उसी में मैं पड़ा हुआ था.

सुबह हुआ और एक आदमी ने हम सारे नोटों को एक बोरे में रखा और बाजार में जा कर एक बैंक में , वहां के एक कैशियर को दे दिया. कैशियर ने कहा क्या तुम गंदे नोट ले आते हो, मुझे साहब से डांट खाना पड़ता है. उस आदमी ने हंसते हुए कहा साहब हमारे पास तो ऐसे नोट और ऐसे ही लोग आते हैं, मैं साफ नोट कहां से लाऊॅं ! फिर उस आदमी ने अपने दूसरे झोले से एक शैम्पेन की बोतल निकाली और कैशियर को देते हुए बोला साहब यह आप के लिए है. कैशियर ने कहा इसकी क्या जरूरत थी!  उस आदमी ने कहा नहीं साहब जरुरत क्यों नहीं है, आप लोग भी बड़ी मेहनत करते हैं. और इस प्रकार से मैं बैंक में पुनः पहुंच गया. शाम को हेड कैशियर ने कहा कि साफ नोट और गन्दे नोट अलग-अलग कर दो और जो गन्दे नोट हैं,  उन्हें non – issuable नोटों की आलमारी में रख दो, जिससे कि उन्हें  दुबारा ग्राहकों को नहीं दिया जाय.

दूसरे दिन मेरी तरह न जाने कितने गन्दे नोट एक अलग आलमारी में बंद कर दिए गए. कितने समय उस आलमारी में मैं पड़ा रहा, मुझे पता नहीं, लेकिन एक दिन हम सारे गन्दे नोटों को बक्से में बंद कर, भारतीय रिजर्व बैंक भेज दिया गया. वहां भी हम , सालों बक्से में बंद पड़े रहे  और एक दिन हम सबको बाहर निकाल कर, मशीन से छोटे – छोटे टुकड़े कर के, एक बड़े से बिजली के ओवन में, भारतीय रिजर्व बैंक के बड़े साहबों के उपस्थित में , हमें सामूहिक जला दिया गया और इस प्रकार से मेरी जीवन यात्रा समाप्त हो गई.

© श्री ओमप्रकाश पाण्डेय 

14.06.2026

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