हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # २९१ – “बहुत पुरानी थी मियार…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत बहुत पुरानी थी मियार...”।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २९१ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “बहुत पुरानी थी मियार...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी 

पहले बेचे बैल बाद में

दोनों खेत बिके

बेटेकी शिक्षापर दम्पति

के अरमान टिके

 

माँ कैसे भी खोंसे रहती

खुद को साड़ी में

जो फट कर चीथड़े हुई

है आँगन बाड़ी में

 

रहा कर्ज का बोझ पिता

की रीढ़ हुई दोहरी

माता की ममता पर अंधड़

जीवन की गति के

 

आस बड़ी पर एक जून

का भोजन है दूभर

खेत गये, तो रामधनी

अब जोत रहा ऊसर

 

किस किस का भुगतान

करे वह दीन हीन मानुस

और चुकाये पैसा बिन

पत्नी की सहमति के

 

बहुत पुरानी थी मियार

पिछवाड़े के घर की

बारिश तेज हुई तो

बिखरी भीटें बाहर की

 

भीगे नहीं अनाज,

सोचते जो परसों आया

कैसे भी दोनो की

काया में हैं प्राण छिके

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

14-7-2022

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – आर-पार ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – आर-पार ? ?

नदी का पाट चौड़ा है,

नदी में पानी गहरा है,

नदी में भंवर उठते हैं,

नदी में मगरमच्छ बसते हैं,

नदी में झंझावात है,

नदी में आघात है,

नदी सतत आशंका है,

नदी मृत्यु का घंटा है,

नदी से डरो..!

 

नदी में पानी है,

नदी की कहानी है,

नदी में सृष्टि है,

नदी एक दृष्टि है,

नदी में प्रवाह है,

नदी में उछाल है,

नदी अखंड संभावना है,

नदी का निमंत्रण स्वीकार करो,

नदी को पार करो…!

 

?

© संजय भारद्वाज   

( प्रातः 5:05 20 जून 2022)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ गुरु साधना 19 जुलाई से बुधवार 29 जुलाई तक चलेगी। 🕉️ 

इसका मंत्र होगा-

ॐ गुं गुरुभ्यो नम:

(उच्चारण- ओम गुम गुरुभ्यो नमह)

💥 आप अपने गुरु / मानस गुरु / मार्गदर्शक / माता /पिता / प्रेरक व्यक्तित्व आदि जिस किसी में भी आपकी श्रद्धा हो, को स्मरण कर इस मंत्र का पाठ कर सकते हैं। यदि ऐसा कोई व्यक्तित्व आपके जीवन में नहीं है तो भी अपनी सैद्धांतिक / वैचारिक प्रतिबद्धता को यह मंत्र समर्पित कर सकते हैं। सनातन ठहराव नहीं बहाव है। अतः प्रवाह की दिशा स्वयं तय करें। 💥

इसके साथ नीचे दिए श्लोक का भी अपनी सुविधा के अनुसार 11 /21 /31 /51 बार पाठ करें। 

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः। गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः॥

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २७३ ☆ # “संकेत…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता संकेत…”।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २७३ 

☆ # “संकेत…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

कैसे मोहब्बत करें हम

कैसे शिकायत करें हम

जो देखो वह लूटने बैठा है

कैसे हिफाजत करें हम

 

हमारी वफ़ा का कोई मोल नहीं

हमारी सादगी तो बेमोल रही

वह हर वक्त जफ़ा करते हैं

उसके खिलाफ कोई बोल नहीं

 

वह मगरूर होते जा रहे हैं

वह नए सितम रोज ढ़ा रहे हैं

बिक रहे हैं लोग मंडी में

अपने कदमों में सबको ला रहे हैं

 

एक फरिश्ते ने आवाज़ उठाई है

भीड़ भी धीरे-धीरे आई है

खामोशी टूटने लगी है अब

उसने संघर्ष की राह दिखाई है

 

सागर में लहरें उठने लगी है

मायूस आंखों में उम्मीद जगी है

कहीं यह तूफान का संकेत तो नहीं

हर सीने में एक आग दबी है/

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अभिव्यक्ति # -११६ – इंद्रधनुष… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता इंद्रधनुष।)

☆ अभिव्यक्ति # ११६ ☆

☆ इंद्रधनुष☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

आज सवेरे उठ कर मैने,

इंद्रधनुष जब देखा,

सात रंग चमकीले थे,पर,

रंग प्यार का ना था.

सोचा शायद देर हो गई,

मुझको सोते सोते,

रंग प्यार का सिमट गया है,

इंद्रधनुष के पीछे,

 *

जब प्रकृति दुल्हन बनकर,

स्नेह सुधा बरसाए,

हरियाली की चादर ओढ़े,

धरती भी शरमाए

 *

तब धरती पर रंगों से,

रंग,निखर कर आए,

प्रेम रंग हो सबसे निखरा,

प्रेम सदा बरसाए.

 *

बदली की ओट से चंदा,

अवनी को है झांके,

पृथ्वी पर व्याकुल चकोर,

चंदा को है ताके.

*

कांच के टुकड़े,मुट्ठी में हों,

लहू गिरे रिस कर,

पर मुस्काए, दुख में भी,

यही प्रेम है, प्रिय वर.

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/ ≈

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हिंदी साहित्य – कविता ☆ शपथ-पत्र ! ☆ डॉ अमिताभ शंकर राय चौधरी ☆

डॉ अमिताभ शंकर राय चौधरी

(डॉ अमिताभ शंकर राय चौधरी जी एक संवेदनशील एवं सुप्रसिद्ध साहित्यकार के अतिरिक्त वरिष्ठ चिकित्सक  के रूप में समाज को अपनी सेवाओं दे रहे हैं। अब तक आपकी चार पुस्तकें (दो  हिंदी  तथा एक अंग्रेजी और एक बांग्ला भाषा में ) प्रकाशित हो चुकी हैं।  आपकी रचनाओं का अंग्रेजी, उड़िया, मराठी और गुजराती  भाषाओं में अनुवाद हो  चुकाहै। आप कथाबिंब ‘ द्वारा ‘कमलेश्वर स्मृति कथा पुरस्कार (2013, 2017 और 2019) से पुरस्कृत हैं एवं महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा द्वारा “हिंदी सेवी सम्मान “ से सम्मानित हैं।)

☆ कविता ☆ शपथ-पत्र ! ☆ डॉ अमिताभ शंकर राय चौधरी 

एक हिमालय उत्तर में है /

भारत माँ के आँचल में //

पूरब तक वो खेल रहा है /

नदी जंगल संग जल थल में //

 *

जंतर-मंतर में है भेजा /

उसने भाई को अपना //

हिम्मत सवार है यह सोनम /

दृढ़ है पाने को सपना //

 *

आत्मा अमर कहीं लिखा है /

किसे पता सच्चाई है? //

अनशन पर बैठा वांगचुक /

मचल उठी तरुणाई है.!! //

रो रहीं हैं सरस्वती आज /

वीणा उनकी टूटी हाय! //

इम्तहान की अस्मत लूटी /

भारत माँ को कौन बचाय ????

♦♦♦♦

© डॉ. अमिताभ शंकर राय चौधरी

16.7.26.

पताः फ्लैट नं. 301, चौथी मंजिल, टावर नं 1, मंगलम आनन्दा ग्रैंड रामपुरा रोड, सांगानेर, जयपुर, 302029

मो. 9455168359, 9140214489. ईमेल: asrc.vns@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सलिल प्रवाह # २८६ – गीत – किसका पूजन करूँ? ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है  – “गीत – किसका पूजन करूँ?”)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २८६ ☆

☆ गीत – किसका पूजन करूँ? ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

राम अनगिनत

किसका पूजन करूँ

न पूजूँ किसको कहिए?

.

भरमाते आराम-विराम

न सत्य सूझता,

मन कहता आराम हराम

न कर्म छूटता।

कर्म करो तो मिले कर्मफल

मुक्ति न पाई-

मकड़ा जाला बुनता, घुटता,

फँसकर मरता।।

श्याम अनगिनत

किसकी बंसी सुनूँ

सुनूँ नहिं किसकी कहिए?

राम अनगिनत

किसका पूजन करूँ

न पूजूँ किसको कहिए?

.

कभी सुहाते, कभी न भाते

रिश्ते-नाते,

कभी साथ दें, कभी दगा दे

दूर हटाते।

दुश्मन नहीं पुत्र अपना ही

आग लगाता-

पुत्र मिले अर्जी ले मंदिर- मस्जिद जाते।।

काम सकाम

अकाम अनवरत

क्या कब सहिए, तहिए, गहिए?

राम अनगिनत

किसका पूजन करूँ

न पूजूँ किसको कहिए?

.

गीत-अगीत-प्रगीत

न जानूँ, नहिं रच पाता,

व्यथा-कथा तन की कहता

जन बनकर ज्ञाता।

शब्दों की ले आड़, बुद्धि

खुद ही भरमाई-

तर्क वितर्क कुतर्क सत्य सब

दूर हटाता।।

नाम अनाम सुनाम

प्रणाम कलाम सुमिरिए।

राम अनगिनत

किसका पूजन करूँ

न पूजूँ किसको कहिए?

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

१९.११.२०२५

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – अधिकार ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – अधिकार ? ?

?

प्रारब्ध के आकाश पर

उनका डाका पड़ता रहा,

कर्म की भूमि का पट्टा, पर

सदा मेरे पास बना रहा…!

?

© संजय भारद्वाज   

प्रात: 9:22 बजे, 28 अक्टूबर 2021

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ नारायण साधना संपन्न हो चुकी। नई साधना की सूचना यथासमय देंगे। 🕉️

💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # ३९ – कविता – गिनती की साँसें… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर ☆

डॉ.राजेश ठाकुर

( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का  मंतव्य उनके ही शब्दों में –पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “गिनती की साँसें“.)  

? साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # ३९ ?

? कविता – गिनती की साँसें… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर  ? ?

?

=1=

मैंने माना, कि गिनती की साँस बची है

तुम भी मानो, नियति ने पटकथा रची है

=2=

साम-दाम ये दण्ड-भेद उफ़्फ़! इस स्तर पर!!

गिरा डालने एक -दूजे को, होड़ मची है

 =3=

ये हसीन जीवन न पाओगे दोबारा

सौ फीसद ये बात कहें, सच हमें जँची है

 =4=

यहाँ इन्द्र बेदाग़, अहिल्या अब भी निन्दित

आज सवालों के घेरे में, फँसी शची है

 =5=

खरी-खरी ‘राजेश’, आप फ़रमाना छोड़ो

ज़हर सरीखी कड़वी बातें, किसे पची है??

© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर

शासकीय कॉलेज़ केवलारी

संपर्क — ग्राम -धतूरा, पोस्ट – जामगाँव, तहसील -नैनपुर, जिला -मण्डला (म.प्र.) मोबा. 9424316071

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सविता साहित्य # ११ – !!सावन अब जल बरसाओ!! ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆

सुश्री सविता खण्डेलवाल ‘भानु’

(लेखन-प्रकाशन – गत 2022 से छंद लेखन, एकल प्रकाशन– कलम के नवांकुर, अनुग्रह नवप्रस्तारित छंद पर लेखन (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), साझा संकलन – तकरीबन 10, द्वादश ज्योतिर्लिंग (लंदन बुक आफ रिकार्ड), अनेकता में एकता (एशिया बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड), छंदावली – (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), महाकाल साहित्य सम्मान से सम्मानित। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता !! सावन अब जल बरसाओ !!)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सविता साहित्य # ११ ☆

☆ !! सावन अब जल बरसाओ !! ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆

तरस रही है रोज निगाहें, काले मेघा आ जाओ ।

आया पावन मास सुहाना, 

सावन अब जल बरसाओ ।।

*

रीते है सब ताल-तलैया, धरती भी तुम्हें पुकारे ।

 कल-कल करते झरनों के अब, मधुरिम से गीत सुना रे ।।

रिमझिम-रिमझिम जमकर बरसो, गीत खुशी के मिल गाओ ।

आया पावन मास सुहाना,

सावन अब जल बरसाओ ।।

*

तेरे आने की आहट से, मन पुलकित हो जाते ।

धरती करती श्रृंगार नया, अरु मोर पपीहा गाते ।।

छुपा रखी है जो अंतस में, वो प्रेम सुधा झलकाओ ।

आया पावन मास सुहाना,

सावन अब जल बरसाओ ।।

*

बाग-बाग में झूले डलते, झूले  है राधा कृष्णा ।

तृप्त हृदय सबके हो जाते, मिट जाती सारी तृष्णा ।।

करो जलाभिषेक भोले का, गंग धार को ले आओ ।

आया पावन मास सुहाना,

सावन अब जल बरसाओ ।।

© सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु”

झालरापाटन राजस्थान

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ “श्री हंस” साहित्य # २१२ ☆ मुक्तक – ।। आओ मिल दुनिया की कहानी नई लिखते हैं ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

श्री एस के कपूर “श्री हंस”

☆ “श्री हंस” साहित्य # २१२ ☆

☆ मुक्तक ।। आओ मिल दुनिया की कहानी नई लिखते हैं ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

=1=

आओ मिल कर कहानी, नई लिखते हैं।

जीवन रंग-ढंग रवानी, नई लिखते हैं।।

सबके लिए सरोकार, की बात हैं करते।

जीने का सलीका जिंदगानी, नई लिखते हैं।।

=2=

बात मेहरबानी की हर, किसी के लिए हो।

परेशानी नहीं हर, किसी के लिए हो।।

अधिकार और कर्तव्य, का मेल हो खूब।

दुनिया दीवानी -सी हर, किसी के लिए हो।।

=3=

कड़ी से कड़ी जोड़ कर, एक जंजीर बनाते हैं।

मेहनत से मिल कर, चलो तक़दीर बनाते हैं।।

कण- कण में जहाँ पर, प्रेम हो बिखरा हुआ।

दुनिया की ऐसी कोई, नई तस्वीर बनाते हैं।।

=4=

हमदर्द हमसाया कोई, समाज नया रचते हैं।

हमराह सा अब रिवाज़, कोई नया रचते हैं।।

प्यार की हर रीत, प्रेम की प्रथा हो जहाँ पर।

हमदम मेरे दोस्त का, कोई साज़ नया रचते हैं।।

=5=

स्नेह-प्रेम प्यार के हम सब, बनते चित्रकार हैं।

दोस्ती और दुआ के बनते, हमसब दस्तकार हैं।।

महाभारत के पांसे न, लाते रमायण के आदर्श।

स्वर्ग सरीखी दुनिया के, बनते अब शिल्पकार हैं।।

© एस के कपूर “श्री हंस”

बरेली ईमेल – Skkapoor5067@ gmail.com, मोब  – 9897071046, 8218685464

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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