हिंदी साहित्य – लघुकथा ☆ सुबह की मुस्कान😊 ☆ श्री जगत सिंह बिष्ट ☆

श्री जगत सिंह बिष्ट

(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker.)

🌱 सुबह की मुस्कान😊

आज सुबह हमारे अपार्टमेंट की लिफ़्ट के कपाट जैसे ही ग्राउंड फ्लोर पर खुले, एक मधुर स्वर कानों में घुला — “गुड मॉर्निंग!”

मैंने मुड़कर देखा। एक प्रफुल्लित दंपत्ति मुस्कुराते हुए लिफ़्ट से बाहर निकल रहे थे। मैंने भी मुस्कान के साथ उनके अभिवादन का उत्तर दिया।

न जाने क्यों, लिफ़्ट से बाहर आते ही दोनों विपरीत दिशाओं में चल पड़े—पति बाईं ओर, पत्नी दाहिनी ओर।

पति ने हँसते हुए पुकारा, “अरे, उधर नहीं… इधर!”

पत्नी ने भी मुस्कुराकर अपनी दिशा बदल ली।

मैंने हल्के से चुटकी ली, “लगता है, आजकल रास्ते भी थोड़े-थोड़े भटकने लगे हैं!”

क्षण भर में तीनों की निश्छल हँसी एक साथ फूट पड़ी। लगा, सुबह की हवा में किसी ने थोड़ी-सी खुशबू, थोड़ी-सी आत्मीयता और थोड़ी-सी हँसी घोल दी हो।🥰

© श्री जगत सिंह बिष्ट

साधक

LifeSkills

A Pathway to Authentic Happiness, Well-Being & A Fulfilling Life! We teach skills to lead a healthy, happy and meaningful life.

The Science of Happiness (Positive Psychology), Meditation, Yoga, Spirituality and Laughter Yoga. We conduct talks, seminars, workshops, retreats and training.

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # १२२ – सुविधा शुल्क… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – सुविधा शुल्क।)

☆ लघुकथा # १२२ – सुविधा शुल्क ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

सुबह से सीमा घर के कामों में लगी थी। किसी को चाय चाहिए, किसी के लिए नाश्ता, बच्चों का टिफिन, सास की दवा—हर आवाज़ पर वह दौड़ रही थी।

“सीमा! मेरी कमीज़ प्रेस हुई कि नहीं?”

“मम्मी, मेरी बोतल भर दो।”

“बहू, ज़रा चश्मा तो ढूँढ़ दो।”

एक साथ उठती आवाज़ों के बीच वह रसोई से बाहर निकली ही थी कि उसका पैर फिसल गया। वह ज़ोर से गिरी और दर्द से चीख उठी।

पति दौड़े, पर पहला वाक्य था, “इतनी भी क्या जल्दी थी? अब सारा काम रुक जाएगा!”

सास बड़बड़ाईं, “ज़रा-सा भी ध्यान नहीं रहता।”

बच्चे बोले, “अब हमारा टिफिन कौन बनाएगा?”

तभी कामवाली बाई आई। उसने सबकी बातें सुनीं, बिना कुछ कहे सीमा को सहारा दिया, ऑटो बुलाया और अस्पताल ले गई।

पीछे घर में बहस छिड़ गई—”खाना कौन बनाएगा?” “बर्तन कौन धोएगा?” “बच्चों को कौन देखेगा?”

अस्पताल से लौटते समय सीमा खामोश थी। बाई मुस्कुराकर बोली, “बीबीजी, आज समझ आया… इस घर में आपकी नहीं, आपके काम की कीमत है।”

सीमा ने खिड़की से बाहर देखा। उसे पहली बार महसूस हुआ कि इस घर में वह सदस्य कम, सुविधा अधिक है।

घर पहुँची तो सबने एक साथ पूछा, “अब कैसी हो?”

सीमा हल्की-सी मुस्कुराई और बोली— “सुविधा चाहिए… तो अब उसका शुल्क भी लगेगा।”

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २७१ – सिलाई मशीन ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है स्त्री विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “सिलाई मशीन”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २७१ ☆

🌻लघु कथा🌻 सिलाई मशीन 🌻

पैरदान सिलाई मशीन पर बैठी सिलाई करते – करते अचानक अंजू रुक गई। तारिख— ओहहहहहहहहहहह आज तो उसका जन्मदिवस है। पूरे साठ बरस की हो गई। कितने सैकड़ों डिजाईनर कपड़े बनाकर देती रही। परन्तु आज भी उसने भाभी- बहु के उतरे साड़ी ब्लाउज पहन रखे हैं। क्योंकि उसने अपने वैवाहिक जीवन को चरक प्रेस करके मजबूत तो बनाया परन्तु समय के अनुसार चलन पर लटकन- झटकन, डोरी फुदरा सलमा सितारें नही टाँक सकी।

नतीजा आज वह मायके में भैया – भाभी के साथ पूरी जिंदगी बीता रही है। अचानक सुई ऊँगली पर चूभ गई, परन्तु आज यह चूभन  उसे रुला नही रही थी बल्कि पुरानी बातों को याद दिला रही थी।

सिलाई मशीन बनना और सिलाई करने का मतलब वह आज समझ चुकी थीं पर समय बीत चुका था।

☆

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – “बचपन” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ लघुकथा – “बचपन” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

मेरे छोटे भाई के बेटे का जन्मदिन था । इसलिए ऑफिस से जल्दी छुट्टी लेकर आया । घर के अंदर खूब रौनक और, खुशी के माहौल । बाहर क्या देखता हूं हमारी कामवाली का छोटा सा बेटा बर्तन मांज रहा है और रोते रोते मां से कह रहा है – मुझे भी केक दिलवाओ। मुझे भी जन्मदिन मनाने है ।

मां बेबस । झांक रही अपने अंदर । मैं सोच रहा हूं कि जन्मदिन किसका मनाऊं ?

☆

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # ६० – लघुकथा – अंधकार ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ६० ☆

☆ लघुकथा ☆ ~ अंधकार ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

☆

बच्चे ने सूरज की किरणों को मुट्ठी में बाँध लिया। सूरज का असमंजस यह था कि उसे धरती पर नया सवेरा लाना था, जो कि उसकी किरणों के बिना संभव नहीं था। धरती लोक के लोगों की चाहत यह थी कि उन्हें हर एक ईश्वर प्रदत्त चीज को अपने बस में करना था, सो उन्होंने बच्चे को इस काम के लिए भेजा। इधर बच्चे की माँ दहाड़े मार कर इसलिए रो रही थी, क्योंकि घने अंधकार मे उसे अपना बच्चा ढूंढे नहीं मिल रहा था।

 ♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # १२१ – कौन अपना? ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – कौन अपना?।)

☆ लघुकथा # १२१ – कौन अपना? ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्मशान की लपटें शांत हो चुकी थीं। माँ की सूनी आँखें अब भी बेटी की चिता की राख को निहार रही थीं। जिस बेटी को उसने नौ महीने कोख में रखा, उँगली पकड़कर चलना सिखाया, उसी को आज अपने हाथों विदा करना पड़ा।

सबसे अधिक पीड़ा बेटी की मृत्यु की नहीं, बल्कि उन रिश्तों की थी जो उसके साथ ही मर गए। जीते-जी जिसे घर की लक्ष्मी कहा गया, उसके अंतिम सफ़र में वही लोग साथ छोड़ गए।

पास खड़ी एक वृद्धा की भर्राई आवाज़ गूँजी—

“हे ईश्वर! यदि संतान ऐसी हो, जो अपने ही रिश्तों का धर्म भूल जाए, तो निःसंतान रहना ही कहीं अधिक अच्छा है।”

चिता की राख हवा में उड़ रही थी और उसके साथ समाज के खोखले रिश्तों का सच भी।

 

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३४० ☆ कथा-कहानी – माया-मोह की फांस ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम एवं विचारणीय कथा – ‘माया-मोह की फांस‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३४० ☆

☆ लघुकथा ☆ माया-मोह की फांस ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

नायक जी के दुआरे पर बड़ा समूह इकट्ठा है। पुरुष और स्त्रियां दोनों हैं। दरअसल नायक जी नर्मदा यात्रा पर निकल रहे हैं। करीब पंद्रह दिन नर्मदा के किनारे किनारे चलेंगे। फिर अगली बार यात्रा वहीं से उठाएंगे जहां से उसे छोड़ा था। ऐसे ही किश्तों में यात्रा होती है।

नायक जी के साथ आठ दस लोग जा रहे हैं। उनकी पत्नियां उन्हें विदा करने आयी हैं। समूह में दो बोझा ढोने वाले हैं जो बहंगी में सामान लेकर चलेंगे। बोझा मतलब राशन-पानी, खाना खाने और बनाने के बर्तन। कुछ तैयार नाश्ते का सामान भी।

भीड़ में गोपाल भी है। सामान की उठा-धराई में मदद कर रहा है।

दल का एक सदस्य गोपाल से पूछता है, ‘तुम भी चल रहे हो?’

जवाब मिलता है, ‘नहीं, अभी नहीं। अभी नर्मदा मैया की कृपा नहीं है।’

सदस्य कहता है, ‘क्यों! चलो। ऐसा मौका फिर कहां मिलेगा? पुन्य कमाने का मौका बार-बार नहीं मिलता।’

गोपाल जवाब देता है, ‘क्या करें! बड़ी मजबूरी है। पिताजी की तबियत ठीक नहीं है। डेढ़ साल से उठने बैठने से लाचार हैं। हमीं को पूरी देखभाल करनी पड़ती है। चौबीस घंटे की ड्यूटी है। कहीं जाने की कहूं तो हाथ पकड़ कर रोने लगते हैं।

सदस्य कहता है, ‘घर में और लोग भी तो होंगे। लड़के बच्चे तो होंगे।’

गोपाल बोला, ‘सब हैं, लेकिन पिताजी हमें ही ढूंढ़ते हैं। और किसी को अपने को छूने नहीं देते।’

सदस्य बोला, ‘फालतू माया-मोह में फंसे हो। एक बार निकल पड़ो। लौट कर पाओगे कि तुम्हारे बिना भी सब ठीक-ठाक चलता है। हम तो अपना झोला उठाकर निकल पड़ते हैं। लौट कर आते हैं तो सब ठीक मिलता है। लेकिन हम सोचते हैं कि दुनिया हमारे बिना नहीं चल सकती।’

गोपाल हाथ जोड़कर बोला, ‘आप ठीक कहते हो, लेकिन हमारा मन नहीं मानता। उन्हें छोड़कर कैसे चले जाएं?’

जत्था ‘नर्मदे हर’ का घोष करके रवाना हो गया और गोपाल अपने घर की तरफ चल पड़ा जहां उसके पिता नींद से जाग कर उसके लिए गुहार लगा रहे थे।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares
1

हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – बस एक और… ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆

डॉ. रीटा अरोड़ा

(डॉ. रीटा अरोड़ा जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर। समाचार पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। आपका लेख-संग्रह ‘बांस का विवेक’ हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में केडीपी (KDP) पर ‘अकीरा अराता’ (AKIRA ARATA) उपनाम से प्रकाशित है। आप जनवादी लेखक संघ, हरियाणा की सक्रिय सदस्य हैं।)

☆ लघुकथा ☆ बस एक और… ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆

☆

“माँ, इस बार प्रमोशन मिल जाए, फिर मैं चैन से जीऊँगा,” रवि ने कहा।

एक साल बाद प्रमोशन मिल गया।

“अब क्या बात है?” माँ ने पूछा।

“बस अपना घर हो जाए, फिर कोई चिंता नहीं रहेगी।”

कुछ वर्षों बाद घर भी बन गया।

माँ ने फिर पूछा, “अब तो खुश हो?”

रवि बोला, “सोच रहा हूँ, थोड़ा बड़ा घर ले लूँ।”

माँ अलमारी से उसकी बचपन की तस्वीर निकाल लाई।

“याद है, तब तुम कहते थे—बस एक साइकिल मिल जाए, फिर कुछ नहीं चाहिए।”

रवि तस्वीर को देर तक देखता रहा।

माँ ने मुस्कुराकर कहा, “बेटा, चीज़ें बदलती रहीं, लेकिन तुम्हारा ‘बस एक और’ कभी नहीं बदला।”

रवि के पास कोई उत्तर नहीं था।

☆

© डॉ रीटा अरोड़ा

सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर करनाल

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – “कुर्सी” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ लघुकथा – “यह घर किसका है ?” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

प्रेस क्लब ने मुख्यमंत्री को आमंत्रित किया। पुलिस तैनात हो गयी और आम जनता का रास्ता बंद कर‌ दिया गया। हर अधिकारी मुआयना करने आया। क्या सिविल, क्या पुलिस के अधिकारी ! सब आते रहे, मुआयना करते रहे।

आखिर सीआईडी विभाग के उच्चाधिकारी ने कहा कि जिस कुर्सी पर मुख्यमंत्री को बैठना है, वह कुर्सी ठीक नहीं। इसे तुरंत बदलो। यह हमारे उच्चाधिकारियों का आदेश है।

हम वहां सारी तैयारियां कर चुके थे। अब कुर्सी में क्या खोट निकल आया?

हमने मज़ाक मज़ाक में पूछा -फिर यह भी बता दीजिये कि कौन सी कुर्सी लायें? तीन महीने वाली या पांच साल चलने वाली?

अधिकारी हमारा मुह देखते रह गये!!

☆

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिंदी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – प्रतिबिंब… ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

सुश्री इन्दिरा किसलय

☆ लघुकथा ☆ प्रतिबिंब… ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

☆

कामवाली बाई पोंछा लगा रही थी। तभी आम के वृक्ष से अलग हुई एक पीली सूखी पत्ती खिड़की की राह कमरे में चली आई।

बाई ने उसे सोफे पर रख दिया।

मैं हैरान! कि क्या सोचकर उसने उस पीतवर्णा पत्ती को सोफे पर रखा होगा !

चाहती तो खिड़की के बाहर फेंक सकती थी, पर नहीं फेंका।

बड़ी देर तक मैं खुद से ही उलझती रही। पत्ती को हाथ में लिया। उसे उलट पलट कर देखती रही।

शायद मैं उसमें जीवन की नश्वरता तथा अपनी सोच का प्रतिबिंब देख रही थी। उसमें सारे मौसमों के अनुराग और आघात की धुन सुन रही थी।

☆

©  सुश्री इंदिरा किसलय 

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares