हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # 58 – सीख की गाँठ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। । साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य  शृंखला में आज प्रस्तुत हैं  एक  सार्थक लघुकथा  “सीख की गाँठ”।  वास्तव में सीख की गाँठ तो सौ टके की है ही, यह लघुकथा भी उतनी ही सौ टके की है।  नवीन पीढ़ी को ऐसी ही कई गांठों की आवश्यकता है जो उचित समय पर बांधना ही सार्थक है। संभवतः सभी पीढ़ियां इस दौर से एक बार तो जरूर गुजरती हैं। इस  सार्थक लघुकथा के लिए श्रीमती सिद्धेश्वरी जी को हार्दिक बधाई।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी  का साहित्य # 58 ☆

☆ लघुकथा – सीख की गाँठ ☆

 

एक भव्य शादी समारोह लगभग सभी पढ़े लिखे शिक्षित परिवार से लग रहे थे।

बिटिया जिसकी शादी हो रही थी ” सुरीली” । बाहर पढ़ने गई हुई थी। लालन पालन भी आज की आधुनिकता भरे वातावरण में हुआ था।

घर पर सभी मेहमान आए हुए थे और बिटिया के बाहर रहने के कारण सभी सुरीली को कुछ ना कुछ समझा रहे थे।

शायद इसलिए कि वह इन रीति-रिवाजों को नहीं जान रही है और घर से दूर अकेली स्वतंत्र हॉस्टल की जिंदगी में पली बढ़ी है। हॉस्टल की जिंदगी अलग होती है।

समय निकलता जा रहा था सभी रस्में  एक के बाद एक होते जा रहे थे। सुरीली नाक चढ़ा मजबूरी है कहकर निपटाना समझ रही थी।

दादी जो कि सत्तर साल की थी। सब बातों को बड़े ध्यान से एक किनारे बैठ कर भापं रही थी क्योंकि कोई उन्हें पूछं भी नहीं रहा था और उनकी अपनी पांव की तकलीफ के कारण वह खड़ी भी नहीं हो पा रही थी।

कभी-कभी बीच-बीच में बेटा और पोता, बहू आ कर पूछ जाते कुछ चाहिए तो नहीं??? परंतु दादी लगातार नहीं कह… कर खुश हो जाती और कहती… तुम सब अपना काम करो। बस मुझे विदाई के समय सुरीली की ओढ़नी पर गांठ बांधनी है।

सभी को लगा कि विदाई में शायद दादी कुछ भारी-भरकम चीज देंगी। परंतु ऐसा कुछ भी नहीं था।

विवाह संपन्न हुआ और धीरे-धीरे विदाई का समय आया। पिताजी ने सुरीली से कहा… कि दादी का आशीर्वाद ले लो सुरीली ने थोड़ा मुंह बना लिया जिसे दादी देख रही थी। सुरीली निपटाना है कहकर… आगे बढ़ी और दादी के पास गई।

दादी ने बड़े प्यार से सुरीली और दामाद के सिर पर हाथ रखा और ओढ़नी के  पल्लू पर एक गांठ बांधते हुए बोली… मैं जान रही हूं तुम्हें संयुक्त परिवार की आदत नहीं है और जहां शादी होकर जा रही हो संयुक्त परिवार में जा रही हो।

यह गांठ मैं तुम्हें बांध रही हूं घर से निकलते समय बड़ों से पूछ कर जाना और उनके पूछने से पहले घर के अंदर आ जाना  बस इतना सा ही कहना है। सुरीली की आंखें नम हो गई। दादी को कसकर गले लगा लिया और हां में सिर हिला दिया।

दादी की ‘सीख गांठ’ के लिए सभी ने तालियों से स्वागत किया। और अपनी पुरानी काया के साथ अनुभव को अपनी नातिन को बांटते हुए दादी फूली नहीं समा रही थी। सभी की आंखें चमक उठी। सभी ने कहा दादी ने सौ टके की बात कही। दादी  की गांठ का सभी ने लोहा माना।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ लेखनी सुमित्र की – सावन ☆ डॉ राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

डॉ राजकुमार तिवारी ‘सुमित्र’

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी  हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। आज प्रस्तुत हैं आपके सावन पर अप्रतिम दोहे। )

  ✍  लेखनी सुमित्र की – सावन  ✍

 

सावन की ऋतु आ गई ,आंखों में परदेश।

मन का वैसा हाल है, जैसे बिखरे केश।।

 

सावन आया गांव में, भूला घर की गैल।

इच्छा विधवा हो गई ,आंखें हुई रखैल।।

 

महक महक मेहंदी कहे ,मत पालो संत्रास ।

अहम समर्पित तो करो, प्रिय पद करो निवास।।

 

सावन में सन्यास लें, औचक उठा विचार ।

पर मेहंदी महक गई ,संयम के सब द्वार।।

 

सावन के संदेश का, ग्रहण करें यह अर्थ ।

गंध हीन जीवन अगर, वह जीवन  है व्यर्थ ।।

 

जलन भरे से दिवस हैं ,उमस भरी है रात ।

अंजुरी भर सावन लिए ,आ जाए बरसात ।।

 

मेहंदी, राखी ,आलता, संजो रहा त्यौहार।

सावन की संदूक में, महमह करता प्यार।।

 

डॉ राजकुमार सुमित्र

© डॉ राजकुमार “सुमित्र”

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

मो 9300121702

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # 10 – चेहरे के समाज से  ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा ,पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित । 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है।  आज पस्तुत है आपका अभिनव गीत  “चेहरे के समाज से”

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # 10 – ।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ चेहरे के समाज से  ☆

 

चित्र :: आमुख

 

बिखर गईं मुस्काने

होंठों की दराज से

माँगा जिनको सबने

चेहरे के समाज से

 

चित्र :: एक

 

मौसम डरा -डरा सा

बाहर को झाँका है,

मौका परदे के विचार

से भी बाँका है

 

चुपके पूछ रहा-

कपड़े क्या सस्ते हैं कुछ?

“तो खरीद लूँगा मैं”

कस्बे के बजाज से

 

चित्र :: दो

 

पेड़ों के पत्तों में

हलचल बढ़ने  वाली

शाख -शाख पर फैली

केसर उड़ने वाली

 

फैल रही खुशबू अब

चारों ओर सुहानी

हवा लुटाती है अपनापन

इस लिहाज से

 

चित्र :: तीन

 

वहीं ज्योति सी प्रखर

धूप की बेटी के मुख

अंग -अंग पर, छाया

रंग से बदल गया रुख

 

दोनों हाथों से घर में

वह सगुन स्वरूपा

डाल रही सगनौती है

छत पर अनाज से

 

© राघवेन्द्र तिवारी

27-06-2020

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश पाण्डेय का सार्थक साहित्य # 58 ☆ परसाई जी के जीवन का अन्तिम इन्टरव्यू – अन्न की मौत ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय

श्री जय प्रकाश पाण्डेय

(श्री जयप्रकाश पाण्डेय जी   की पहचान भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी के अतिरिक्त एक वरिष्ठ साहित्यकार की है। वे साहित्य की विभिन्न विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। उनके  व्यंग्य रचनाओं पर स्व. हरीशंकर परसाईं जी के साहित्य का असर देखने को मिलता है। परसाईं जी का सानिध्य उनके जीवन के अविस्मरणीय अनमोल क्षणों में से हैं, जिन्हें उन्होने अपने हृदय  एवं  साहित्य में  सँजो रखा है । प्रस्तुत है साप्ताहिक स्तम्भ की  अगली कड़ी में  उनके द्वारा स्व हरिशंकर परसाईं जी के जीवन के अंतिम इंटरव्यू का अंश।  श्री जय प्रकाश पाण्डेय जी ने  27 वर्ष पूर्व स्व  परसाईं जी का एक लम्बा साक्षात्कार लिया था। यह साक्षात्कार उनके जीवन का अंतिम साक्षात्कार मन जाता है। आप प्रत्येक सोमवार ई-अभिव्यिक्ति में श्री जय प्रकाश पाण्डेय जी के सौजन्य से उस लम्बे साक्षात्कार के अंशों को आत्मसात कर सकेंगे।) 

☆ जय प्रकाश पाण्डेय का सार्थक साहित्य # 58 ☆

☆ परसाई जी के जीवन का अन्तिम इन्टरव्यू – अन्न की मौत ☆ 

जय प्रकाश पाण्डेय –

आपके गद्य लेखन को व्यंगमूलक मानने के बावजूद इधर कुछ महत्वपूर्ण आलोचकों ने उसमें भाव के प्रामाश्य को रेखांकित किया है। व्यंग्य मूलतः एक आक्रामक या संहारक रचना शैली है, इसमें करुणा जैसे विरोधी भाव का अंतरयोग सिद्धांतत: बहुत कठिन है। व्यंग्य की रचना शैली के विशिष्ट अनुशासन के भीतर आप करुणा भाव को कैसे चरितार्थ कर पाते हैं ?

हरिशंकर परसाई –

ऐसी स्थितियां होतीं है जो करुण स्थितियां होती हैं, मेरी रचनाओं में आयी हैं। जैसे कि “अन्न की मौत” मेरा एक निबंध है, उसमें जब बहुत कठिनाई है आटा मिलने में, तो कहीं से मुझे आधा बोरा आटा मिल जाता है,जब उसे खोलते हैं तो उसमें मरा हुआ चूहा निकलता है,तो हम भाई-बहन चारों उस बोरे के आसपास बैठ जाते हैं और हमें याद आता है कि जब हमारे चाचा मरे थे तब भी हम इसी तरह बैठे थे, तो ये “अन्न” मरा है।तब भी हम इसी तरह बैठे हैं।अब ये स्थिति तो बहुत करुण है…न…। ये बहुत करुण स्थिति है, लेकिन मैंने पूरे के पूरे निबंध को जिस स्थिति में लिखा उसमें व्यंग्य ही व्यंग्य आता है।उस बोरे के आसपास उदास बैठना, इसमें कुछ विनोद ही ज्यादा है, फिर मैंने लिखा है कि “यहां तो अमेरिका से आयेगा गेहूं, तब मिलेगा” ।

……………………………..क्रमशः….

© जय प्रकाश पाण्डेय

416 – एच, जय नगर, आई बी एम आफिस के पास जबलपुर – 482002  मोबाइल 9977318765

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रंजना जी का साहित्य # 51 – ये मेरी धरती माँ ☆ ☆ श्रीमती रंजना मधुकरराव लसणे

श्रीमती रंजना मधुकरराव लसणे 

 

(श्रीमती रंजना मधुकरराव लसणे जी हमारी पीढ़ी की वरिष्ठ मराठी साहित्यकार हैं।  सुश्री रंजना  एक अत्यंत संवेदनशील शिक्षिका एवं साहित्यकार हैं।  सुश्री रंजना जी का साहित्य जमीन से  जुड़ा है  एवं समाज में एक सकारात्मक संदेश देता है।  निश्चित ही उनके साहित्य  की अपनी  एक अलग पहचान है। आज  प्रस्तुत है आपकी प्रथम हिंदी रचना   ” ये मेरी धरती माँ ”। आपका इस अभिनव प्रयास के लिए अभिनन्दन ।  आप उनकी अतिसुन्दर ज्ञानवर्धक रचनाएँ प्रत्येक सोमवार को पढ़ सकेंगे। )

☆ रंजना जी का साहित्य # 51 ☆

☆ ये मेरी धरती माँ ☆

 

ये मेरी धरती माँ सबसे पावन है।

सितारा दुनियाँ का सबको मनभावन है।।धृ।।

 

चरण रज माँ तेरी जलधि नित धोता है।

उन्नत माथे पे हिमालय रहता है।

नदियों  की धाराओं से हर गली उपवन है।।१।।

 

घनेरे जंगल ये घटाये लाते हैं।

सुनहरे झरने तो तराने गाते हैं।

खेत खलिहानो में मचलता सावन है।।२।।

 

मर्यादा पुरुषोत्तम कही रघुनंदन है।

नटखट राधा के देवकीनंदन है।

रुप इन दोनों के सभी घर आंगण है।।३।।

 

वेद उपनिषदों  की अमृत गाथा है

कुरान और धम्मदीप सबको मन भाता है।

सहिष्णु भूमि  के चरणों में वंदन है।।४।।

 

©  रंजना मधुकर लसणे

आखाडा बाळापूर, जिल्हा हिंगोली

9960128105

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी #5 ☆  सावन का मौसम ☆ श्री श्याम खापर्डे

श्री श्याम खापर्डे 

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं । सेवारत साहित्यकारों के साथ अक्सर यही होता है, मन लिखने का होता है और कार्य का दबाव सर चढ़ कर बोलता है।  सेवानिवृत्ति के बाद ऐसा लगता हैऔर यह होना भी चाहिए । सेवा में रह कर जिन क्षणों का उपयोग  स्वयं एवं अपने परिवार के लिए नहीं कर पाए उन्हें जी भर कर सेवानिवृत्ति के बाद करना चाहिए। आखिर मैं भी तो वही कर रहा हूँ। आज से हम प्रत्येक सोमवार आपका साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी प्रारम्भ कर रहे हैं। आज प्रस्तुत है एक समसामयिक रचना  “ सावन का मौसम”।  कुछ अधूरी कहानियां  कल्पनालोक में ही अच्छी लगती हैं। संभवतः इसे ही फेंटसी  कहते हैं। ) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी #5 ☆ 

☆  सावन का मौसम ☆ 

ये सावन का मौसम

ये ठंडी-ठंडी हवायें

चलो आज हम तुम

कहीं दूर घूम आयें

ये गुपचुप का ठेला

ये लोगों का मेला

ये गरमागरम चाट

खायें, एक दूसरे को खिलायें

गार्डन में देखो बच्चों की टोली

ऊधम मचाती बिंदास बोली

कूद कूदकर खेलें हैं होली

छींटो  से खुदको कोई कैसे बचायें

ये दिलकश नज़ारा

ये जल की बहती धारा

ये बिखरी हुई बूंदें

ये धुंध  में लिपटा किनारा

ये दृश्य तो आंखों से

दिल में उतर जायें

हरी भरी वसुंधरा

प्रणय गीत गायें

अंबर के मेघों को

मिलने बुलायें

प्रकृति का ये खेल देखो

दौड़कर घिर आई

काली घटाएं

चलो रिमझिम फुहारों में

हम तुम भी भींगें

हृदय पटल पर

प्रेम गीत लिखें

भीगा – भीगा  तन-मन हों

भीगी  हों सांसें

ऐसे सावन को भला

कोई कैसे भूल पाएं ?

 

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़)

मो  9425592588

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मराठी साहित्य – कविता ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – हे शब्द अंतरीचे # 9 ☆ किमया… ☆ कवी राज शास्त्री

कवी राज शास्त्री

(कवी राज शास्त्री जी (महंत कवी मुकुंदराज शास्त्री जी) का ई- अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत है। आप मराठी साहित्य की आलेख/निबंध एवं कविता विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। मराठी साहित्य, संस्कृत शास्त्री एवं वास्तुशास्त्र में विधिवत शिक्षण प्राप्त करने के उपरांत आप महानुभाव पंथ से विधिवत सन्यास ग्रहण कर आध्यात्मिक एवं समाज सेवा में समर्पित हैं। विगत दिनों आपका मराठी काव्य संग्रह “हे शब्द अंतरीचे” प्रकाशित हुआ है। ई-अभिव्यक्ति इसी शीर्षक से आपकी रचनाओं का साप्ताहिक स्तम्भ आज से प्रारम्भ कर रहा है। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता “ किमया…”)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – हे शब्द अंतरीचे # 9 ☆ 

☆ किमया… ☆

कोरड्या नदीला

अपेक्षा पावसाची

ओरडणाऱ्या पावश्याला

आशा एक पर्जन्य थेंबाची..

 

स्वाती नक्षत्र पाऊस

थेंब अगणित पडती

तरी एकाच थेंबाचे

शुभ्र वेधक मोती बनती..

 

गाईच्या कासेला

गोचीड बिलगती

सोडून पय अमृत

रक्त प्राशन करिती..

 

पडला साधा पाऊस

ओढ्यास पूर येई

उन्हाळ्यात महानदी

रखरखीत वाळवंट होई..

 

कुणास मिळे पुरणपोळी

कुणास चटणी भाकर

कुणी उपाशी तसाच

असाध्य दुःखाचा डोंगर..

 

गरीब गरीब राहिले

श्रीमंत, पैश्यात लोळले

नाहीच काही जवळ धन

कुणी मरण समीप केले..

 

खूप विचित्र गड्या

निसर्गाची माया

आलोत जन्मास भूवरी

साधू काही छान किमया..

 

© कवी म.मुकुंदराज शास्त्री उपाख्य कवी राज शास्त्री.

श्री पंचकृष्ण आश्रम चिंचभुवन,

वर्धा रोड नागपूर,(440005)

मोबाईल ~9405403117, ~8390345500

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # 59 ☆ व्यंग्य – कन्या-दर्शन का कार्यक्रम ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार

डॉ कुन्दन सिंह परिहार

(आपसे यह  साझा करते हुए हमें अत्यंत प्रसन्नता है कि  वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे  आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं। आज  प्रस्तुत है  एक अतिसुन्दर व्यंग्य  ‘कन्या-दर्शन का कार्यक्रम ’।  हम कितने भी पढ़ लिख लें , कन्याओं को कितना भी पढ़ा लिखा दें किन्तु, कन्या-दर्शन के कार्यक्रम के लिए लड़की के परिवार को मानसिक रूप से तैयार होना ही पड़ता है । डॉ परिहार जी ने इस व्यंग्य के माध्यम से सारे समाज को आइना दिखा दिया है।  युवा पीढ़ी द्वारा अंतरजातीय विवाह एवं प्रेम विवाह संभवतः ऐसी परम्पराओं को नकारने  का एक कारण हो सकता है जिसे अंततः दोनों परिवार स्वीकार कर लेते हैं। इस  सार्थक व्यंग्य  के लिए डॉ परिहार जी की  लेखनी को  सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # 59 ☆

☆ व्यंग्य – कन्या-दर्शन का कार्यक्रम  ☆

हमारे देश में नारी-स्वातंत्र्य और दहेज-विरोध को लेकर बड़ा शोरगुल होता है।  लेख लिखे जाते हैं,  फोटोदार परिचर्चा होती है।  थालियाँ और डिब्बे बजा बजाकर जुलूस निकाले जाते हैं,  गला फाड़कर नारे लगाये जाते हैं।  लेकिन जब झाग बैठता है तो पता चलता है कि हम जहाँ खड़े थे वहीं रुके हैं।  बल्कि दो चार कदम और पीछे हट गये।

मेरे कुछ परिचित परिवारों में विवाह-योग्य कन्याएं हैं।  खासी पढ़ी-लिखी,  योग्य।  देखने के लिए  लड़के वाले आते हैं।  पहले माँ बाप लड़के के साथ आते हैं।  तीन चार दिन बाद लड़के का बड़ा भाई अपनी बीवी के साथ आता है।  फिर दो चार दिन बाद लड़के की बहन आती है।  फिर खबर आती है कि अगले इतवार को लड़के के बहनोई साहब इटारसी से आ रहे हैं।  वे भी कन्या-दर्शन का लाभ प्राप्त करेंगे।  बहनोई साहब के आगमन के चार दिन बाद पता चलता है कि लड़के के ताऊजी बुरहानपुर से चल चुके हैं।  वे भी कन्या को देखने का इरादा रखते हैं।  अन्तिम निर्णय उन्हीं का होगा।  वैसे लड़के के अस्सी वर्षीय,  मोतियाबिन्द-पीड़ित दादाजी भी आ रहे हैं।

इस बीच लड़की वालों को लड़के वालों के निर्णय का कुछ पता नहीं चलता।  वे अनिश्चय और आशंका की स्थिति में झूलते रहते हैं।  लड़की को दिखाने से मना नहीं कर सकते,  चाहे लड़के वाले अपना पूरा मुहल्ला लेकर आ जाएं।  आधी रात को जगाकर कन्या दिखाने का हुक्म दें तो तामील करना पड़ेगा।  वैसे अगर ‘दीगर’ बातें पहले से तय हो जाएं तो यह देखने-वेखने और टेवा (जन्मपत्री) मिलाने का कार्यक्रम संक्षिप्त भी हो सकता है।

लड़के पर यह बात लागू नहीं होती।  लड़की वाले जाएं तो कुँवर साहब के दर्शन बड़े सौभाग्य से और बड़े नखरों के बाद होते हैं।  कभी खबर आ जाती है कि कुँवर साहब आराम कर रहे हैं,  दर्शन कल होंगे।  वैसे हमारे देश में लड़के वालों के दरवाज़े पर लड़की वालों की स्थिति याचक की सी होती है।  इसलिए कुँवर साहब और उनके जनक-जननी जैसा नाच नचायें, लड़की वालों को नाचना पड़ता है।

सवाल यह है कि लड़की के दर्शन लड़के के बहनोई से लेकर ताऊ और बाबा तक क्यों करते हैं? ताऊजी लड़की को अपने पचास साल वाले चश्मे से देखेंगे या लड़के के चश्मे से? माँ-बाप का देखना तो समझ में आता है, लेकिन परिवार के सभी आदरणीय को इस रस्म में शामिल करना क्यों ज़रूरी है? मान लो लड़की को सब ने पसन्द कर लिया लेकिन सयाने ताऊजी ने सब के मत को ‘वीटो’ कर दिया तो क्या होगा? शादी लड़के की होनी है,  लेकिन पसन्द ताऊजी की चलेगी।

इस तरह की रस्में हमारे समाज में स्त्री की स्थिति का कच्चा-चिट्ठा खोलती हैं।  स्त्री घर से बाहर आयी,  पर्दे से मुक्त हुई,  शिक्षित भी हुई,  लेकिन समाज पर पंजा पुरुष का ही है।  लड़कियों को पढ़ाने में लापरवाही इसलिए की जाती है क्योंकि उन्हें पराये घर जाना है।  लेकिन यह लापरवाही लड़की के बाप को लड़के वालों के सामने और ज़्यादा दुम हिलाने के लिए मजबूर कर देती है।

स्थिति बदतर हो रही है।  दहेज के खिलाफ बड़े सख्त कानून बने,  लेकिन किसी कमज़ोर धनुर्धारी के तीर की तरह लक्ष्य तक पहुँचे बिना ही कहीं खो गये।  वैसे भी हमारे आदर्शों और व्यवहार में हमेशा विरोध रहा है, इसलिए कोई ग़म की बात नहीं है।  कम से कम हम महान कानून तो बना रहे हैं ताकि आगे आने वाली पीढ़ियाँ उन्हें पढ़कर समझें कि हमारा समाज दहेज और स्त्री-शोषण के कितने ज़बरदस्त खिलाफ था।  ये कानून की किताबें काल-पात्र में रखी जानी चाहिए।

मंहगाई बढ़ने के साथ लड़कों के रेट बढ़ रहे हैं।  व्यापारिक भाषा में कहें तो ‘सुधर’ रहे हैं।  इसलिए लड़की के बाप पर दुहरी मार पड़ रही है।  सब कुछ सुधर रहा है,  इसलिए कन्या के पिता की हालत बिगड़ रही है।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच – #56 ☆ शून्य ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।

श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली  कड़ी । ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)
☆ संजय उवाच – शून्य ☆

शून्य उत्सव है। वस्तुतः महोत्सव है। शून्य में आशंका देखते हो, सो आतंकित होते हो। शून्य में संभावना देखोगे तो  प्रफुल्लित होगे। शून्य एक पड़ाव है आत्मनिरीक्षण के लिए। शून्य अंतिम नहीं है। वैसे प्रकृति में कुछ भी अंतिम नहीं होता। जीवन, पृथ्वी सब चक्राकार हैं। प्रकृति भी वृत्ताकार है। हर बिंदु परिधि की इकाई है और हर बिंदु में नई परिधि के प्रसव की क्षमता है। प्रसव की यह क्षमता हर बिंदु के केंद्र बन सकने की संभावना है।

यों गणित में भी शून्य अंतिम नहीं होता। वह संख्याशास्त्र का संतुलन है। शून्य से पहले माइनस है। माइनस में भी उतना ही अनंत विद्यमान है, जितना प्लस में। शून्य पर जल हिम हो जाता है। हिम होने का अर्थ है, अपनी सारी ऊर्जा को संचित कर काल,पात्र,परिस्थिति अनुरूप दिशा की आवश्यकतानुसार प्रवहमान होना। शून्य से दाईं ओर चलने पर हिम का विगलन होकर जल हो जाता है। पारा बढ़ता जाता है। सौ डिग्री पारा होते- होते पानी खौलने लगता है। बाईं ओर की यात्रा में पारा जमने लगता है। एक हद तक के बाद हिमखंड या ग्लेशियर बनने लगते हैं। हमें दोनों चाहिएँ-खौलता पानी और ग्लेशियर भी। इसके लिए शून्य होना अनिवार्य है।

शून्य में गहन तृष्णा है, साथ ही गहरी तृप्ति है। शून्य में विलाप सुननेवाले नादान हैं। शून्य परमानंद का आलाप है। इसे सुनने के लिए कानों को ट्यून करना होगा। अपने विराट शून्य को निहारने और उसकी विराटता में अंकुरित होती सृष्टि देख सकने की दृष्टि विकसित करनी होगी।  शून्य के परमानंद को अनुभव करने के लिए शून्य में जाएँ।

…मैं अपने अपने शून्य का रसपान कर रहा हूँ। शून्य में शून्य उँड़ेल रहा हूँ , शून्य से शून्य उलीच रहा हूँ। शून्य आदि है, शून्य अंत है।

 

© संजय भारद्वाज

# परमसत्य की यात्रा मंगलमय हो।

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆

मोबाइल– 9890122603

writersanjay@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # 16 ☆ समय न उगता खेत में  ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी रचना समय न उगता खेत में  )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # 16 ☆ 

☆ समय न उगता खेत में  ☆ 

 

समय न उगता खेत में

समय न बिके बजार

कद्र न जिनको समय की

वही हुए लाचार

 

नाथ समय के नमन लें

दें मुझको वरदान

असमय करूँ न काम मैं

बनूँ नहीं अनजान

खाली हाथ न फिरे जो

याचक आए द्वार

 

सीमित घड़ियाँ करी हैं

हर प्राणी के नाम

उसने जो सकता बना

सबके बिगड़े काम

सौ सुनार पर रहा है

भारी एक लुहार

 

श्वास खेत में बोइए

कर्म फसल बिन देर

ईश्वर के दरबार में

हो न कभी अंधेर

सौदा करिए नगद पर

रखिए नहीं उधार

 

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

११-३-२०२०

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

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