हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुंज # 53 ☆ संकल्प ☆ डॉ. भावना शुक्ल

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं  एक विचारणीय कविता  “संकल्प । ) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # 53 – साहित्य निकुंज ☆

☆ संकल्प  ☆

दोहा – 

कोरोना के काल में, बढ़ी पेट की आग।

कोई नहीं है सुन रहा, भूखों का यह राग।।

 

संकल्प –

 

करो दृढ़ संकल्प

नहीं दूसरा विकल्प

मिलजुलकर सब साथ रहो

एक दूसरे से कुछ न कहो।

कोरोना  का छाया आतंक

करना होगा मिलजुलकर अंत

जैसे

देश की रक्षा के लिए

वीरों ने उठाई तलवार

सहे अनेकों वार

राष्ट्र की अनेकता में एकता

रखी बरकरार।

देश पर आए अनेकों संकट

उखाड़ फेंके अनेकों कंटक

हमें अब नहीं है डरना

कोरोना को पड़ेगा हारना

मिलकर हम सबको उसे मारना।।

यह महामारी

नहीं होगी हम पर भारी।

इरादे रखो मजबूत

करते रहो

प्रभु का स्मरण

करो न उन्हें विस्मरण

हमें

घर से करना सामना

पैर घर में  ही थामना।।

करना है संकल्प

नहीं दूसरा कोई विकल्प।।

 

© डॉ.भावना शुक्ल

सहसंपादक…प्राची

प्रतीक लॉरेल , C 904, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब  9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष # 44 ☆ संतोष के दोहे ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष”

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. 1982 से आप डाक विभाग में कार्यरत हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं.    “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में प्रस्तुत है शब्द आधारित  “संतोष के दोहे”। आप श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार  आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # 44 ☆

☆ “संतोष के दोहे ☆

 

आँचल

माँ का आँचल जगत में,देता शीतल छाँव

माँ देवी अवतार हैं, जन्नत माँ के पाँव

 

अभिसार

ऋतु बसंत में गा रहे,भंवरे भी मल्हार

कलियों का रस पान कर,चाह रहे अभिसार

 

अनुप्रास

प्रेम जगत में भावना, हुई छंद अनुप्रास

ह्रदय हिलोरे ले रहा,लगा प्रेम की आस

 

अजेय

चीन अहम से समझता,खुद को बड़ा अजेय

आये ऊँट पहाड़ तल,भारत का यह ध्येय

 

अनिकेत

सुना राम का वन गमन,दशरथ हुए अचेत

व्याकुल नगरी चल पड़ी,बहुत हुए अनिकेत

 

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

सर्वाधिकार सुरक्षित

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.)

मो 9300101799

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हिन्दी/मराठी साहित्य – लघुकथा ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – जीवन रंग #4 ☆ मराठी लघुकथा ‘पुतळा’ – हिन्दी भावानुवाद ☆ श्रीमति उज्ज्वला केळकर

श्रीमति उज्ज्वला केळकर

(सुप्रसिद्ध वरिष्ठ मराठी साहित्यकार श्रीमति उज्ज्वला केळकर जी  मराठी साहित्य की विभिन्न विधाओं की सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपके कई साहित्य का हिन्दी अनुवाद भी हुआ है। इसके अतिरिक्त आपने कुछ हिंदी साहित्य का मराठी अनुवाद भी किया है। आप कई पुरस्कारों/अलंकारणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपकी अब तक 60 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं जिनमें बाल वाङ्गमय -30 से अधिक, कथा संग्रह – 4, कविता संग्रह-2, संकीर्ण -2 ( मराठी )।  इनके अतिरिक्त  हिंदी से अनुवादित कथा संग्रह – 16, उपन्यास – 6,  लघुकथा संग्रह – 6, तत्वज्ञान पर – 6 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।  

आज प्रस्तुत है  श्रीमति उज्ज्वला केळकर जी  की मूल मराठी  लघुकथा  ‘पुतळा’ एवं  तत्पश्चात आपके ही द्वारा इस  लघुकथा का हिंदी अनुवाद  ।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – जीवन रंग #4 ☆ 

☆ पुतळा

 ‘साहेब…’

‘बोल….’

‘सरकारच्या प्रत्येक योजनेबद्दल, निर्णयाबद्दल टीका करणं, हीच आपली  पक्षीय नीति आहे. होय नं?’

‘बरं.. मग … ‘

‘मग त्या दिवशी आपण मुख्यमंत्रीजींच्या नव्या घोषणेचं स्वागत कसं केलत?

‘ मी? स्वागत केलं? कसली घोषणा ? कसलं स्वागत ?’

‘तीच घोषणा … नगराच्या मधोमध नेताजींचा पुतळा उभा करायची घोषणा … त्या दिवशी आपण म्हणाला होतात, सरकारच्या सगळ्या विधायक कार्यात आमचा पक्ष सहकार्य करेल. आपल्या दृष्टीने तर सरकारचं कुठलच कार्य विधायक नसतं. मग यावेळी सहकार्याची भाषा कशी काय?

‘अरे, मुर्खा, पुतळा उभा करायचा तर देणग्या गोळा करायला नकोत? ..’

‘हां… ते आहेच.’

‘त्या कामात आपण त्यांना मदत करू .’

‘पण का?’

‘तेव्हाच मग देणगीतील काही पैसा आपल्या तिजोरीत जमा होईल नं?

‘हूं … ‘

‘पुतळा उभा केल्यानंतर कधी-ना-कधी , कुणी-ना-कुणी त्या पुतळ्याची विटंबना करेल किंवा तिथे तोडफोड करेल…’

‘पण असं झालं नाही तर…’

‘ती व्यवस्थादेखील आपण करू. मग आंदोलन होईल. लूट –मार होईल. दंगे-धोपे होतील. तेव्हा मग आपली चांदीच चांदी॰…

 

©श्रीमति उज्ज्वला केळकर

❃❃❃❃❃❃

☆  प्रतिमा

(मराठी कथा – पुतळा   मूळ लेखिका – उज्ज्वला केळकर)

‘साहबजी…’

‘बोल…’

‘सरकार की हर योजना, निर्णय की आलोचना करना , यही हमारी पक्षीय नीति है. है नं?’

‘हं.. तो फिर… ‘

‘तो उस दिन आपने मुख्यमंत्रीजी की घोषणा का स्वागत कैसे किया?’

‘मै ने किया ?  कैसी घोषणा ? कैसा स्वागत ?’

‘वही … नगर के बीचों बीच उस नेताजी की प्रतिमा स्थापित करने की घोषणा … उस दिन आप ने कहा  था, सरकार के सभी विधायक कार्यों में हमारा पक्ष अपना सहयोग देगा. अपनी दृष्टि से तो सरकार का कोई भी कार्य विधायक हो ही नहीं सकता. तो फिर इस बार सहयोग की भाषा कैसी?

‘अरे, मूरख प्रतिमा बनानी है, तो चंदा इकठ्ठा करना ही पड़ेगा ..’

‘हां! सो तो है !’

‘इस काम में हम उन की मदद करेंगे.’

‘क्यों?’

‘तभी तो चंदे का कुछ हिस्सा अपनी तिजोरी में भी आ जाएगा नं?

‘हूं … ‘

‘प्रतिमा की स्थापना करने के बाद कभी – न – कभी , कोई –न – कोई उस की विडम्बना करेगा. उसे तोड भी सकता है.’

‘मगर ऐसा नहीं हुआ तो…’

‘तो उस की व्यवस्था भी हम करेंगे . तब आंदोलन होगा. लूट-मार होगी. दंगा-फसाद  होगा. तब तो समझो अपनी चांदी – ही – चांदी…’

 

© श्रीमति उज्ज्वला केळकर

176/2 ‘गायत्री ‘ प्लॉट नं12, वसंत साखर कामगार भवन जवळ , सांगली 416416 मो.-  9403310170

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मराठी साहित्य – कविता ☆ विजय साहित्य – विडंबन रचना – वाट वाकडी ☆ कविराज विजय यशवंत सातपुते

कविराज विजय यशवंत सातपुते

(समाज , संस्कृति, साहित्य में  ही नहीं अपितु सोशल मीडिया में गहरी पैठ रखने वाले  कविराज विजय यशवंत सातपुते जी  की  सोशल मीडिया  की  टेगलाइन माणूस वाचतो मी……!!!!” ही काफी है उनके बारे में जानने के लिए। जो साहित्यकार मनुष्य को पढ़ सकता है वह कुछ भी और किसी को भी पढ़ सकने की क्षमता रखता है।आप कई साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। कुछ रचनाये सदैव समसामयिक होती हैं। आज प्रस्तुत है  आपकी  कामगारों के जीवन पर आधारित एक विडंबन रचना “वाट वाकडी )

☆ विजय साहित्य – विडंबन रचना – वाट वाकडी ☆

☆मुळ  गीत☆

 

गर्द सभोती रान साजणी,  तू तर चाफेकळी

काय हरवले सांग, शोधिशी त्या यमुनेच्या जळी

 

ती वनमाला ,म्हणे नृपाळा,हे तर माझे घर

पाहत बसते मी तर येथे, जललहरी सुंदर

 

रात्रीचे वनदेव पाहुनी,भुलतील रमणी तुला

तु वनराणी दिसे भुवन, या तुझिया रूपा तुला

 

अर्ध स्मित तव मंद मोहने, पसरे गालावरी

भुलले तुजला ह्रदय साजणी, ये चल माझ्या घरी

 

गीतकार  बालकवी

संगीत  जितेंद्र  अभिषेकी

नाटक संगीत मत्स्य गंधा

गायक आशालता वाफगावकर

 

☆ वाट वाकडी ☆

 

मर्द देखणे,तुझ्या सभोती, तू तर नवदेखणी

काय गवसले ,सांग षोडशे ,आवडला का कुणी ?

 

ती दचकोनी म्हणे तयाला ,अपुला रस्ता धर

करू नको तू वाट वाकडी,  वळणावर सुंदर.

 

खात्रीचे ना दिसे कुणी ग,फसवतील हे तुला

तू फुलराणी ,गंध भारली, प्राशून घेतो तुला .

 

कडाडली ती दुर्गा होऊन , प्रसाद गालावरी

पादत्राणे घेत गरजली,  जा पळ अपुल्या घरी.

 

© विजय यशवंत सातपुते

यशश्री, 100 ब दीपलक्ष्मी सोसायटी,  सहकार नगर नंबर दोन, पुणे 411 009.

मोबाईल  9371319798.

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हिन्दी साहित्य – ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद # 36 ☆ लघुकथा – देवी नहीं, इंसान है वह ☆ डॉ. ऋचा शर्मा

डॉ. ऋचा शर्मा

(डॉ. ऋचा शर्मा जी को लघुकथा रचना की विधा विरासत में  अवश्य मिली है  किन्तु ,उन्होंने इस विधा को पल्लवित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी । उनकी लघुकथाएं और उनके पात्र हमारे आस पास से ही लिए गए होते हैं , जिन्हें वे वास्तविकता के धरातल पर उतार देने की क्षमता रखती हैं।  आप ई-अभिव्यक्ति में  प्रत्येक गुरुवार को उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है उनकी एक सामाजिक त्रासदी पर विमर्श करती लघुकथा  “देवी नहीं, इंसान है वह। डॉ ऋचा शर्मा जी की लेखनी को जीवन के कटु सत्य को दर्शाती  लघुकथा रचने के लिए सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद  # 36 ☆

☆  लघुकथा – देवी नहीं, इंसान है वह

 

उसे देवी मत बनाओ, इंसान समझो- आजकल ये पंक्तियां  स्त्री के लिए कही जा रही हैं. हाँ खासतौर से भारतीय नारी के लिए जिसे आदर्श नारी के फ्रेम में जडकर  दीवार पर टाँग दिया जाता है, उसकी जिंदा मौत किसी को नजर नहीं आती, खुद उसे भी नहीं, क्योंकि ये तो घर – घर की बात है.

उसे भी मायके से विदा होते समय यही समझाया गया था कि पति परमेश्वर होता है, मायके की बातें ससुराल में नहीं कहना और ससुराल में तो जैसे रखा जाए, वैसे रहना.  वह भूलती नहीं थी अपने पिता की बात – डोली में जा रही हो ससुराल से अर्थी ही उठनी चाहिए. सुनने में ये बातें साठ के दशक की किसी पुरानी फिल्म के संवाद लगते हैं, पर नहीं, ये उसका  जीवन था जिसे उसने जिया. इतनी गहराई से जिया कि अपनी बीमारी में वह सब भूल गई लेकिन यह ना भूली कि पति परमेश्वर होता है. उसे ना अपने खाने – पीने की सुध थी, ना अपनी, बौराई- सी इधर – उधर घूमती  बोलती रहती – आपने खाना खाया कि नहीं ? बताओ किसी ने अभी तक इन्हें खाने के लिए नहीं पूछा, हम अभी बना देते हैं. वह सिर पीट रही थी –  हे भगवान बहुत पाप लगेगा हमें कि पति से पहले हमने खा लिया.  थोडी देर बाद वही बात दोहराती, फिर वही, वही —.

सिलसिला थमता कैसे ? वह अल्जाइमर की रोगी है.  इस रोग ने भी उसे ससुराल जाते समय दी गई सीख को भूलने नहीं दिया. शायद वह सीख नहीं, मंत्र होता था जिसे अनजाने ही स्त्रियां जीवन भर जपती रहतीं थीं.  धीरे – धीरे उसमें अपना अस्तित्व ही खत्म कर लेती थीं, अपना  खाना- पीना, सुख – दुख सब  होम . उससे मिलता क्या था उन्हें ? आईए यह भी देख लेते हैं –

वह अब घर की चहारदीवारी में कैद है, कहने को मुक्त, पर उसे कुछ पता नहीं . बूढे पति देव छुटकारा पाने के लिए निकल लेते हैं दोस्तों – यारों से मिलने.  उनके आने पर वह कोई शिकायत ना कर कभी उन्हें पुचकारती है, कभी सिर पर हाथ फेरती है, कहती है बहुत थक गए होंगे आओ पैर दबा दूँ, क्या खाओगे ? वे झिडक देते हैं – हटो, जाओ यहाँ से अपना काम करो —

अपना काम??? वह दोहराती है, इधर- उधर जाकर फिर लौटती है उसी प्यार और अपनेपन के साथ, पूछती है – थक गए होगे, पैर दबा दूँ, क्या खाओगे ——  फिर झिडकी —————-.

© डॉ. ऋचा शर्मा

अध्यक्ष – हिंदी विभाग, अहमदनगर कॉलेज, अहमदनगर.

122/1 अ, सुखकर्ता कॉलोनी, (रेलवे ब्रिज के पास) कायनेटिक चौक, अहमदनगर (महा.) – 414005

e-mail – richasharma1168@gmail.com  मोबाईल – 09370288414.

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # 60 ☆ व्यंग्य – बकवास काम की ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ”  में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, अतिरिक्त मुख्यअभियंता सिविल  (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) में कार्यरत हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है।  उनका कार्यालय, जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। आज प्रस्तुत है श्री विवेक जी का एक अतिसुन्दर व्यंग्य “बकवास काम की । श्री विवेक जी का यह व्यंग्य सोशल मीडिया  के सामाजिक विसंगतियों पर पड़ रहे  प्रभावों पर एक सार्थक विमर्श है। इस सार्थक व्यंग्य के लिए श्री विवेक जी  का हार्दिक आभार। )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्या # 60 ☆

☆ व्यंग्य  – बकवास काम की  ☆

गूगल ने हम सबको ज्ञानी बना दिया है. हर कोई इतना तो जानने समझने ही लगा है कि गूगल की सर्च बार पर उसके बोलते ही संबंधित जानकारी मोबाईल स्क्रीन पर सुलभ है. हर किसी के पास मोबाईल है ही, मतलब सारी जानकारी सबकी जेब में है . इसके चलते भले ही लोगों के भेजे में कुछ न हो, भेजा खुद घुटने में हो, पर हर अदना आदमी भी महा ज्ञानी बन बैठा है. दूसरे की सलाह हर किसी को बकवास ही लगती है. इतनी बकवास कि यदि फोन रखते ही तुरंत कहे गये सद्वाक्य, सामने वाला वह व्यक्ति जिससे फोन पर महा ज्ञान की चर्चायें चल रही थीं,  सुन ले तो हमेशा के लिये रिश्ते ही समाप्त हो जावें.

व्यंग्य पढ़ना सबको पसंद है, ऐसा इसलिये लिख रहा हूं क्योकि हर अखबार व्यंग्य छाप रहा है. संपादकीय पन्नों पर प्रमुखता से छप रहा है. व्यंग्य पढ़ कर उसके कटाक्ष पर सब मुस्कराते भी हैं, पर वह विसंगति जिस पर व्यंग्य लिखा जा रहा है, कोई सुधारना नही चाहता. उसे हम सब हास्य में उड़ा देना चाहते हैं. सब शुतुरमुर्ग की तरह समाज के उस कमजोर पक्ष को महज व्यंग्य में मजे लेने का विषय बने रहने देना चाहते हैं. रिश्वत हो, भ्रष्टाचार हो, भाई भतीजावाद हो, हार्स ट्रेडिंग हो, व्यवहार का बनावटीपन हो, ऐसी सारी विसंगतियो के प्रति समाज निरपेक्ष भाव से चुप लगाकर बैठने में ही भला समझ रहा है. ऐसे माहौल में देशप्रेम, चरित्र, धर्म, नैसर्गिक मूल्य, सम्मान जैसे सारे आदर्श उपेक्षित हैं. ट्वीट की असंपादित त्वरित संक्षेपिकायें सारे बंधन तोड़ रही हैं. एक क्लिक पर वर्जनायें स्वतः निर्वसन हो रही हैं. इसे फैशन कहा जा रहा है. ऐसे दुष्कर समय में हमारे जैसे व्यंग्यकार बकवास किये जा रहे हैं.

हर वह रोक टोक, वह हिदायत जो कभी उम्र के बहाव में या कथित प्रगतिशीलता के प्रभाव में बकवास लगती रही हैं, परिपक्वता की उम्र में किसी न किसी पड़ाव पर समझ आती हैं, और तब वह बड़ों की सारी बकवास काम की समझ आने लगने लगती है.नई पीढ़ी को पुनः वही बकवास इस या उस तरीके से दोहराकर बतलाई जाती है. कोरोना काल में तो दादी नानी की साफ सफाई की सारी पुरातन बकवास, बड़े काम की सिद्ध हो रही दिखती हैं.

हर कबीर को कभी उसके समय में लोगों ने सही नही समझा. बाद में जब किसी ने उसकी काम की बकवास को पढ़ा, समझा, गुना तो ढ़ाई आखर पर पी एच डी की उपाधियां बंटी. कबीरों के नाम पर प्रशस्तियां बांटी गईं. आज कोई पढ़े न पढ़े, समझे न समझे, समाज के पहरुये व्यंग्य साधक, हर पीढ़ी के कबीर यह काम की बकवास लिख ही रहे हैं. समय कभी मूल्यांकन अवश्य करेगा. इस  प्रत्याशा में कि यह बकवास काम की है.

 

© विवेक रंजन श्रीवास्तव, जबलपुर

ए १, शिला कुंज, नयागांव,जबलपुर ४८२००८

मो ७०००३७५७९८

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ व्यंग्य से सीखें और सिखाएँ # 25 ☆ बैन बनाम चैन ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

( ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों / अलंकरणों से पुरस्कृत / अलंकृत हैं।  आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “बैन बनाम चैन।  वास्तव में श्रीमती छाया सक्सेना जी की प्रत्येक रचना कोई न कोई सीख अवश्य देती है। सोशल मीडिया में विदेशी एप्प्स को बैन करने के सकारात्मक परिणामों के कटु सत्य पर विमर्श करती यह सार्थक रचना हमें राष्ट्रहित में उठाये कदमों हेतु प्रेरित करती है, बस समय के साथ जीवन शैली परिवर्तित करने  की आवश्यकता है।  इस सार्थक रचना के लिए  श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन ।

आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे। )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएँ # 25 ☆

☆ बैन बनाम चैन

चैन बना कर व्यापार को बढ़ाने की खूबी तो आजकल जोर -शोर से सिखायी जा रही है । इतनी लंबी चैन की सामने वाले का चैन ही छीन ले । बस प्रचार – प्रसार हेतु छोटे- छोटे वीडियो बना कर पोस्ट करना तो मानो परम्परा का रूप ही धारण करने लगा है। हर बात को मीडिया से जोड़कर रखने में ही लोग फैशन समझते हैं । शेयर, हैश टैग, कमेंट, मैसेज ये सब रुतबे के साथ डिजिटल प्लेटफॉर्म में घूमते नजर आते हैं ।

हर पीढ़ी के दिलोदिमाग पर इनकी गहरी छाप पड़ चुकी है । चार- चार लॉक डाउन बिना ऊफ किये यदि मजे से बीत गए हैं ; तो केवल डिजिटलाइजेशन की वजह से । इसकी खूबी है; कि जब मोबाइल हाथ में तो कैसे वक्त बीतता जाता है , कुछ पता ही नहीं चलता ।  जिस प्रश्न का उत्तर गूगल बाबा से पूछो तो उसके साथ – साथ बहुत से उत्तर अनोखे अंदाज में देने लगता है । यदि आप कच्चे मन के  स्वामी हुए तो बस वहीं अटक कर रह जायेंगे, यदि  छूटने हेतु थोड़ा और जोर लगाया तो यू ट्यूब के फंदे में अवश्य फसेंगे । बस यहाँ से आपको भगवान भी नहीं बचा सकते क्योंकि यहाँ आध्यात्म से  जुड़े हुए एक से एक रोचक प्रसंग भी उपलब्ध रहते हैं ।

अब कैसे बचें ? आखिर इस सब से पेट तो भरेगा नहीं । फिर भी मनोरंजन तो जरूरी है;  सो प्रयोग करते रहें । अब जबकि कुछ एप्स पर बैन लग चुका है तो इनके यूजर बेचारे रुआसे से हो रहे हैं । मजे की बात देखिए कि इस मुद्दे पर भी दो खेमे तैयार  हैं, एक पक्ष में दूसरा विपक्ष में । क्या राष्ट्रीय हितों पर ही गुटबाजी अच्छी बात है ।  इन एप्स का इतना नशा कि आप राष्ट्र की अस्मिता को भी दाँव पर लगा कर इनके प्रयोग के समर्थन में जी- जान की बाजी लगा देंगे ।

अच्छा हुआ जो बैन लगा, पता तो चला कि इस विदेशी एप तकनीकी ने किस तरह से माइंड को  बड़ी सफाई के साथ  सेट कर मास्टरमाइंड बना दिया है। सही है ; जब मानसिक युद्ध मोबाइल के मार्फ़त हो रहा है, तो बचाव भी मोबाइल के माध्यम से ही होना चाहिए । समय रहते सचेत होने से स्वदेशी एप को बढ़ावा मिलेगा व भारतीय और तकनीकी रूप से उन्नत होने का प्रयास करेंगे जिससे सुखद परिणाम अवश्य आयेंगे अतः बेचैन होने से अच्छा है ; चैन के साथ बैन का स्वागत करें ।

 

© श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # 34 ☆ नवगीत – भीगिए, गाइए आज गाना ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’

डॉ राकेश ‘ चक्र

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक शताधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।  जिनमें 70 के आसपास बाल साहित्य की पुस्तकें हैं। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  इनमें प्रमुख हैं ‘बाल साहित्य श्री सम्मान 2018′ (भारत सरकार के दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी बोर्ड, संस्कृति मंत्रालय द्वारा  डेढ़ लाख के पुरस्कार सहित ) एवं उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा ‘अमृतलाल नागर बालकथा सम्मान 2019’। अब आप डॉ राकेश ‘चक्र’ जी का साहित्य प्रत्येक गुरुवार को  उनके  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  आत्मसात कर सकेंगे । इस कड़ी में आज प्रस्तुत हैं  एक सकारात्मक एवं भावप्रवण नवगीत  “भीगिए, गाइए आज गाना.)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # 34 ☆

☆ नवगीत  – भीगिए, गाइए आज गाना ☆ 

 

फिर हुआ

आज मौसम सुहाना

आ गया बारिशों का जमाना

भीगिए

गाइए आज गाना

 

गा रही हैं फुहारें

छतों पर

दर्द लिख दीजिए

सब खतों पर

 

बचपने में चले जाइएगा

बूँदों से है

रिश्ता पुराना

 

युग-यगों से

प्रतीक्षा रही है

मीत!अब आस

पूरी हुई है

 

प्रेयसी आ गई

आज मिलने

बात मन की

उसे अब बताना

 

जागिए

अब निकलिए घरों से

उड़ चलें आज

मन के परों से

 

छेड़ दी रागिनी

पंछियों ने

देखिए

पंख का फड़फड़ाना

 

डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001

उ.प्र .  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी की लघुकथाएं # 55 – तनाव ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

 

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी की लघुकथाएं ”  के अंतर्गत उनकी मानवीय दृष्टिकोण से परिपूर्ण लघुकथाएं आप प्रत्येक गुरुवार को पढ़ सकते हैं।  आज प्रस्तुत है उनकी एक विचारणीय लघुकथा  “तनाव। )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी की लघुकथाएं  # 55 ☆

☆ लघुकथा – तनाव ☆

 

“ रंजना ! ये मोबाइल छोड़ दे. चार रोटी बना. मुझे विद्यालयों में निरीक्षण पर जाना है. देर हो रही है.”

रंजना पहले तो ‘हुहाँ’ करती रही. फिर माँ पर चिल्ला पड़ी, “ मैं नहीं बनाऊँगी. मुझे आज प्रोजेक्ट बनाना है. उसी के लिए दोस्तों से चैट कर रही हूँ. ताकि मेरा काम हो जाए और मैं जल्दी कालेज जा सकू.”

तभी पापा बीच में आ गए, “ तुम बाद में लड़ना. पहले मुझे खाना दे दो.”

“ क्यों ? आप का कहाँ जाना है ? कम से कम आप ही दो रोटी बना दो ?” माँ ने किचन में प्रवेश किया.

“ हूँउ  ! तुझे क्या पता. आज मेरे ऑफिस में आडिटर आ रहा है. इसलिए जल्दी जाना है.”

यह सुनते ही वह चिल्लाते हुए पलटी , “ पहले कहना था. सब ठेका मेरा ही है.”

पापा पीछे थे. उन के हाथ के गिलास से पानी छलका. गर्म तवे पर गिर कर उछलने लगा. कटोरे में पड़ी रोटी पेट में जाने का इंतजार करती रह गई और माँ के कान में भी अपने कहे यही शब्द गूंजते रहे, “ पहले कहना था.”

 

© ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

०७/०८/२०१५

पोस्ट ऑफिस के पास, रतनगढ़-४५८२२६ (नीमच) मप्र

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com

मोबाइल – 9424079675

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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सुजित साहित्य # 52 – आसरा…! ☆ सुजित शिवाजी कदम

सुजित शिवाजी कदम

(सुजित शिवाजी कदम जी  की कवितायेँ /आलेख/कथाएँ/लघुकथाएं  अत्यंत मार्मिक एवं भावुक होती हैं. इन सबके कारण हम उन्हें युवा संवेदनशील साहित्यकारों में स्थान देते हैं। उनकी रचनाएँ हमें हमारे सामाजिक परिवेश पर विचार करने हेतु बाध्य करती हैं. मैं श्री सुजितजी की अतिसंवेदनशील  एवं हृदयस्पर्शी रचनाओं का कायल हो गया हूँ. पता नहीं क्यों, उनकी प्रत्येक कवितायें कालजयी होती जा रही हैं, शायद यह श्री सुजित जी की कलम का जादू ही तो है! आज प्रस्तुत है उनकी एक भावप्रवण कविता  “आसरा…!”। आप प्रत्येक गुरुवार को श्री सुजित कदम जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं। ) 

☆ साप्ताहिक स्तंभ – सुजित साहित्य #52 ☆ 

☆ आसरा…! ☆ 

इवलासा जिव

फिरे गवोगाव

आस-याचा ठाव

घेत असे..

 

पावसाच्या आधी

बांधायला हवे

घरकुल नवे

पिल्लांसाठी..

 

पावसात हवे

घर टिकायला

नको वहायला

घरदार..

 

विचाराने मनी

दाटले काहूर

आसवांचा पूर

आटलेला..

 

पडक्या घराचा

शोधला आडोसा

घेतला कानोसा

पावसाचा..

 

बांधले घरटे

निर्जन घरात

सुखाची सोबत

होत असे..

 

घरट्यात आता

रोज किलबिल

सारे आलबेल

चाललेले..

 

© सुजित शिवाजी कदम

पुणे, महाराष्ट्र

मो.७२७६२८२६२६

दिनांक  27/3/2019

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