हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक की पुस्तक चर्चा # १९७ ☆ “व्यंग्य के रंग (साझा संकलन)” –संपादक द्वय : पवन कुमार जैन, परवेश जैन  ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  जी के आभारी हैं जो  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं।

आज प्रस्तुत है संपादक द्वय : पवन कुमार जैन, परवेश जैन जी द्वारा लिखित  “व्यंग्य के रंग (साझा संकलन” पर चर्चा।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा# १९७ ☆

☆ “व्यंग्य के रंग (साझा संकलन)” – संपादक द्वय : पवन कुमार जैन, परवेश जैन  ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

कृति: व्यंग्य के रंग (साझा संकलन)

संपादक द्वय : पवन कुमार जैन, परवेश जैन

प्रकाशक: अद्विक पब्लिकेशन, नई दिल्ली

मूल्य: ₹550/-

पृष्ठ संख्या: 212

ISBN: 978-93-49362-25-3

चर्चा: विवेक रंजन श्रीवास्तव

साहित्य जब समाज का जीवंत दस्तावेज बनता है, तो वह केवल शब्दों का संचयन नहीं रह जाता, बल्कि कालखंड की पदचाप बन जाता है। ‘व्यंग्य के रंग ‘ के पन्नों से गुजरते हुए ऐसा ही महसूस होता है। यह संकलन उन बिखरे हुए वैचारिक व्यंग्य के मोतियों की माला है, जो आज के संक्रमणकालीन भारत की तस्वीर को पूरी नग्नता और आत्मीयता के साथ उकेरते हैं।

संपादन की मेज पर परवेश जी ने जिस धैर्य और दृष्टि का परिचय दिया है, वह प्रशंसनीय है। उनके ‘संपादकीय कथन’ में स्पष्ट झलकता है कि यह संकलन केवल रचनाओं का जमावड़ा नहीं, बल्कि एक वैचारिक आंदोलन है। उन्होंने बड़ी बेबाकी से  इस संग्रह की प्रकाशन यात्रा साझा की है।

इस संग्रह की शक्ति इसकी विविधता है। राजनीति के गलियारों से लेकर सामाजिक सरोकारों की गलियों तक, यहाँ हर मोड़ पर एक नई दृष्टि मिलती है। राजनीति केंद्रित व्यंग्य लेखों  में ‘लोकतंत्र ‘ पर किए गए कटाक्ष पठनीय हैं। विभिन्न लेखकों की अपनी शैली में केंद्रीय चिंता एक विसंगति है। शुचिता की कामना विशेष रूप से उल्लेखनीय है। सत्ता के खेल में खोते जा रहे नैतिक मूल्यों पर कड़ा प्रहार करती रचनाएं हैं। लेखों के माध्यम से व्यवस्था के दोहरेपन को बेनकाब कर व्यंग्यकारों  ने उनके हिस्से के लेखकीय दायित्व निभाने का यत्न किया है।

इस संकलन में मेरी (विवेक रंजन श्रीवास्तव) की भी कुछ वैचारिक भागीदारी रही है। मेरा व्यंग्य लेख ‘ लाइक, शेयर, सब्सक्राइब प्लीज! शामिल किया गया है।

विकास की बलि चढ़ते सरोकार से खिन्न लेख, व्यंग्यकारों की छटपटाहट की अभिव्यक्ति है। आखिर हम कंक्रीट के जंगल उगाकर किस हरियाली की तलाश कर रहे हैं? तकनीकी विकास और मानवीय संवेदनाओं के बीच का जो असंतुलन है, उसे लेखकों ने अपनी  तार्किकता और साहित्य की तरलता के साथ पिरोने का प्रयास किया है।

संग्रह में शामिल कुल 88 रचनाओं में हरएक के अपने अनुभव, अलग अलग रचना समय, स्मृति, जड़ों की ओर वापसी  जैसे मूल सिद्धांत पाठक के मानस पटल पर गहरी छाप छोड़ती हैं।

सामूहिक संकलनों की सबसे बड़ी विशेषता उनकी ‘डेमोक्रेसी’ होती है, जहाँ भिन्न विषय पर अलग-अलग लेखकों के भिन्न दृष्टिकोण पाठक को सोचने के लिए एक व्यापक धरातल प्रदान करते हैं। वरिष्ठ कलमकारों का अनुभव और नए लेखकों का उत्साह, इस पुस्तक को पठनीय और संग्रहणीय बनाता है।

पुस्तक की साज-सज्जा और इसके आवरण (Cover) पर चर्चा किए बिना यह समीक्षा अधूरी होगी। आवरण का डिजाइन प्रतीकात्मकता से भरा है।

गांधी जी की मेज पर उपस्थित तीन बंदरों का प्रतीकात्मक संदेश न्यू आर्ट फॉर्म में, ब्लैक एंड व्हाइट चित्र से प्रदर्शित किया गया है। जो द्वंद्व कवर पर चित्रित किया गया है, वह पुस्तक के शीर्षक  के साथ पूरा न्याय करता है।

पुस्तक क्या ग्रंथ कहा जाना चाहिए में, अकारादी क्रम में लेखक शामिल हैं। राजू श्रीवास्तव, डॉ. अजय अनुरागी, डॉ. अजय जोशी, अखतर अली, अलंकार रस्तोगी, अलका अग्रवाल सिगतया, आलोक पुरानीक, अनीता यादव, अनूप शुक्ल, डॉ. कुमारी अर्पणा, अर्चना चतुवदी, अरुण अर्नव खरे, अरिवंद तिवारी, आशीष दशोतर, आत्माराम भाटी, डॉ. अतुल चतुर्वदी, बी.एल. आचछा, बिंदु जैन, ब्रजेश कानूनगो, बुलाकी शमा, धर्मपाल महेंद्र जैन, दिलीप कुमार, दिलीप तेतरवे, डॉ. दिनेश चमोला ‘शैलेश’, फ़ारूक़ आफ़रीदी, गिरीश पंकज, ज्ञान चतुर्वेदी, हनुमान मुण्ड, हरशंकर राढ़ी, डॉ. हरीश कुमार सिंह, डा हरीश नवल, इंद्रजीत कौर

, इंद्रजीत कौशिक, इन्दु सिन्हा ‘इन्दु’, जय प्रकाश पाण्डेय, जीतेंद्र जितांशु, डॉ. के.के. अस्थाना, कैलाश मण्डलेकर, डॉ. किशोर अग्रवाल, डॉ. कुलवंत सिंह शेहरी, डॉ. लालित्य ललित, मलय जैन, मीरा जैन, मुकेश राठौर, मुमताज़ अज़ीज़ नाज़ा

नीरज दइया, पंकज सून, डॉ. पंकज साहा, परवेश जैन, पवन कुमार जैन, डॉ. पिलक अरोरा, शारदेन्दु शुक्ला ‘शरद’, शिशिर सिंह, श्रीकांत आप्टे, डॉ. स्नेहलता पाठक, सुभाष चंदर, सुभाष काबरा, सुधीर कवलिया, सुनील जैन ‘राही’, सुनील सक्सेना, डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतुप्त’, सूर्यबाला, विजय आनंद दुबे, विजय शंकर मिश्र, विशाल चर्चित, विवेक रंजन श्रीवास्तव, यशवंत कोठारी, पूरन सरमा, प्रभाशंकर उपाध्याय, प्रभात गोस्वामी एवं पृथ्वीराज चौहान, डॉ प्रेम जनमेजय, डॉ. राजेश कुमार, राज नागर ‘निरंतर’, राजेश वर्मा, आचार्य राजेश कुमार, राकेश सोहम, राम भोले शर्मा, रामस्वरूप दीक्षित, रामविलास जांगिड़, डॉ. रामवृक्ष सिंह, रमाकांत ताम्रकार, रमेश सैनी, रणविजय राव, रश्मि चौधरी, डॉ. संगीता शर्मा अधिकारी, सीमा राय ‘मधुरिमा’ एवं सेवाराम त्रिपाठी जैसे सभी स्वनाम धन्य सुप्रसिद्ध व्यंग्य कारों को एक जिल्द में पढ़ सकते हैं।

लगभग 350 पृष्ठ की किताब का गेटअप, रंगों का चयन और शीर्षक का संयोजन पहली नजर में ही पाठक को अपनी ओर आकर्षित करता है और विषय-वस्तु की गंभीरता का संकेत दे देता है। अद्विक पब्लिकेशन ने मुद्रण और कागज की गुणवत्ता में भी उच्च मानक स्थापित किए हैं।

अंततः, यह संकलन केवल पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि सहेजने के लिए है। यह हमें याद दिलाता है कि हम चाहे कितने भी आधुनिक हो जाएं, हमारी आत्मा की धड़कनें आज भी शाश्वत सत्य के मूल्यों के बीच कहीं अटकी हुई हैं।

किताब खरीदिए, पढ़िए और अपनी सम्मति से व्यंग्य जगत के इस ” जोर लगा कर हैय्या” वाले समवेत स्वर को बधाई दीजिए।

चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # २१० – कर्तव्य भाव का बोध ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “कर्तव्य भाव का बोध ”। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २१० – कर्तव्य भाव का बोध  ☆

☆

सेना करे कमाल देखिए।

दुश्मन की हर चाल देखिए।।

 *

सीमा पर चौकस रहते हैं।

राष्ट्र भक्ति की ढाल देखिए।।

 *

जो भी कदम मिला कर बढ़ते।

उनका ऊँचा भाल  देखिए।।

 *

अनुशासन में पगे हुए सब।

दुश्मन है बेहाल  देखिए।।

 *

करें सुरक्षा हम सबकी वे।

रखें हमारा ख्याल देखिए।।

* 

कर्तव्य भाव का बोध सदा।

इस पर नहीं सवाल देखिए।।

☆

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २५५ – भोले का अभिषेक ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “भोले का अभिषेक”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २५५ ☆

🌻 लघु कथा 🌻 भोले का अभिषेक 🌻

महाशिवरात्रि की धूम, भक्तों की टोली यत्र- तत्र, शिवालय, देवालय घर मंदिर, सजा सुंदर, चमकता जहाँ तक दृष्टि जाए हर- हर महादेव की गूंज।

दूध दही, गंगाजल निर्मल जल की धार, अभिषेक करने की होड़ सी मची है। शिव शंकर भक्तों की परीक्षा ले रहे हैं। सब उनका मायाजाल।

अरे जल्दी चलो नहीं जाना है क्या? मालती।

जल्दी चलो– शिव अभिषेक करने का समय हो चला है। पास के मंदिर में बहुत भीड़ होने लगी है।

सखी ने जोर से आवाज लगाई।

नहीं अभी नहीं जा रही हूँ। घर मंदिर में अभिषेक कर लूँ तत्पश्चाप जाऊंगी।

तू तो पगली है घर में बाद में करते रहना। पहले चल वहाँ हो आते हैं। बहुत अच्छा पुण्य मिलता है। नहीं तो  मंदिर में बहुत भीड़ हो जाएगी।

नहीं मेरे मंदिर में सभी देवगण बैठे इंतजार करते हैं। सभी को मेरे अभिषेक की आवश्यकता है।

सखी आँखें तरेर कर बोली– ऐसे कह रही है– जैसे भगवान इसके घर पर हैं।

मालती ने कहा सही कहा तुमने। चाय, दूध, नाश्ता, टिफिन, कपड़े की तैयारी, स्कूल की तैयारी, भोजन व्यवस्था, झाड़ू बुहार, साफ सफाई समय पर नहीं हुआ तो मेरे अभिषेक का क्या महत्व।

मेरे पतिदेव ने सारा कुछ मुझे सौप दिया है। अपनी जिम्मेदारी उठा परिवार को खुश रखने के लिए दिन-रात परिश्रम करते हैं।

कहते-कहते वह भाव विभोर होने लगी। आज पतिदेव उठकर भोर एक लोटा जल सूर्य देव अर्पण करते कह रहे थे – – – प्रभु मेरी मालती को सदैव कुशल रखना। हे अर्धनारीश्वर बस यही मेरा अभिषेक है।

और वह सखी की ओर देखने लगी। सखी बोल पड़ी – – हो गया भोले का अभिषेक। 🙏😊

☆

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १६६ – देश-परदेश – दूध ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १६५ ☆ देश-परदेश – दूध ☆ श्री राकेश कुमार ☆

दूध गर्म हो या ठंडा, है तो अमृत ही खूब पीना चाहिए। विगत दिनों कुछ दिन राजस्थान के शहर जोधपुर में था। उपरोक्त फोटो वहीं की है। प्रतिदिन नियम से कुल्लड़ में गर्मा गर्म दुग्धपान का आनंद लिया। दुकान भी करीब 75 वर्ष पुरानी है।

बड़ी सी कढ़ाई में दूध की बाल्टियां उड़ेल कर, नीचे भट्ठी कीे आंच पर धीमे धीमे दूध के गर्म होते समय की खुशबू राहगीरों को आकर्षित करने का दम रखती हैं। हम भी पहले दिन उसी खुशबू के जाल में फंस गए, जब तक रहे उसके दीवाने बन गए।

रात्रि का भोजन छोड़ कर गर्म दूध के साथ फिड़िया का सेवन सर्वोत्तम माना जाता हैं। दूध के कुल्लड के ऊपर मोटी मलाई की परत तो सोने पर सुहागा का काम करती हैं।

लौटती ठंड की सर्द हवाएं, गर्म दूध की तलब बढ़ाने में उत्प्रेरक का कार्य बाखूबी करती हैं। आज मौका भी है, और दस्तूर भी, तो इस वेलेंटाइन डे का मज़ा लीजिए ” गर्मा गर्म” दूध अपने अपने  वेलेंटाइन के साथ हो जाय।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ श्री अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती #३१८ ☆ तपस्या… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

 

? अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # ३१८ ?

☆ तपस्या… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

☆

तुडवला मार्ग मी खडतर?

मिळवण्या देह हा नश्वर

*

पुढ्यातच ती उभी रंभा

मनाला थांबवू कुठवर

*

जगाचे बोट धरुनी मी

कळेना जायचे कुठवर

*

शिवाचे घर तिथे आहे

नगाच्या उंच शिखरावर

*

अशी केली तपस्या मी

सुखाला मारुनी ठोकर

*

सुरक्षा कवच मेंढीचे

कशी ती पांघरू लोकर

*

कबीरासारखा दोहा

विणावा होउनी विणकर

☆

 © अशोक श्रीपाद भांबुरे

धनकवडी, पुणे ४११ ०४३.

ashokbhambure123@gmail.com

मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ माझी जडणघडण… भाग – – ७७ / १ – ग्रँड कॅन्यन ☆ सौ राधिका भांडारकर ☆

सौ राधिका भांडारकर

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☆ माझी जडणघडण… – भाग – ७७ / १ – ग्रँड कॅन्यन ☆ सौ राधिका भांडारकर ☆

(सौजन्य : न्यूज स्टोरी टुडे, संपर्क : ९८६९४८४८००)

ग्रँड कॅन्यन.

असं म्हणतात की तुम्ही अगदी जाज्वल्यपणे एखादं स्वप्न बाळगलं असेल तर कधीतरी ते प्रत्यक्षात साकार होतंच.

अॅरीझोना स्टेट अमेरिका येथील ग्रँड कॅन्यन कधीतरी पहायला मिळावंं हे माझं अगदी शाळेत असतानापासूनचे स्वप्न होते. आणि ते अगदी अलीकडेच म्हणजे २०२२ साली माझी अमेरिकास्थित लेक ज्योतिका हिच्यामुळे प्रत्यक्षात अवतरले.

आतापर्यंतच्या भ्रमंतीतली ही वेगळाच अनुभव देणारी, निसर्गाचा निराळाच अविष्कार दाखवणारी अविस्मरणीय सफर होती. माझी नात सायरा, ज्योतिका, मी आणि विलास अटलांटाहून अमेरिकन एक्सप्रेसच्या विमानाने अॅरिझोना स्टेट मध्ये फ्लॅगस्टाफ या गावात आलो. आमच्या प्रवासात डॅलसला चार तासाचा हाॅल्ट होता.

 

ग्रँड कॅन्यनला जाण्यासाठीचे हे पर्यटन स्थळ आहे.

इथल्या स्थानिक वेळेनुसार आम्ही रात्री साडे नऊला पोहचलो. ज्योतिकाने कार रेन्ट केली. सुंदर, मोठी ऐसपैस कार.

डलासला आम्ही डिनर घेतलेच होते. एग रोल्स, फ्राईड राईस, चिकन नुडल्स वगैरे.

फ्लॅगस्टाफला हाॅलीडे इन मध्ये बुकींग होतेच.

छान आरामदायी हाॉटेल.

लगेच झोपेच्या अधीनच झालो. प्रवासाने थकवा आलाच होता. अटलांटा आणि अॅरीझोनाच्या वेळेत तीन तासाचा फरक आहे.

दुसर्‍या दिवशी सकाळी लवकरच जाग आली. ज्योतिकाने दिवसभराची भटकंती योग्य पद्धतीने आखलेली होतीच.

ब्रेकफास्ट घेउन आम्ही लगेच निघालो. ज्युस, दही सीरीअल्स, आॅम्लेट वगैरे अमेरिकन ब्रेकफास्ट होता.

आजचे ध्येय होते *हाॉर्स शू बेन्ड हिल्स.. *

ड्राईव्ह अतिशय सुंदर होता. अॅरीझोना म्हणजे जगातील सर्वांत मोठे वाळवंट. रस्त्याच्या दोन्ही बाजूला पसरलेला विस्तीर्ण ओसाड प्रदेश. मध्ये मध्ये दिसणारी खुरटी पण हिरवट झुडुपे. गडद पिवळ्या रंगाची रानफुले. लालसर रंगाचे गवत. लांबच लांब पसरलेले पर्वत. अगदी निरभ्र निळे अथांग आकाश. निसर्गाचं एक अत्यंत निराळं पण देखणं रुप पाहून विस्मयीत झालो. भारतातले कच्छचे रणही आठवले. वाटेत अनेक नैसर्गिक सँड ड्युन्स दिसले. अगदी रचून ठेवलेल्या वाळूच्या ढिगार्‍यासारखे दिसत होते. आता आम्ही संपूर्ण डोंगरांच्या विळख्यातच होतो जणू जिथे पहाल तिथे हे लाल रंगांचे दगडी कॅन्यन. या डोंगरांमध्ये निसर्गानेच अनंत आकाराची शिल्पेच बनवली आहेत जणू! इतकी रेखीव आणि आकृतीबंध! बघणार्‍याच्या नजरेने त्या शिल्पांना कुठलीही नावे द्यावीत. महाल, मंदीरे, कळस, मखर, गाभारे नृत्यांगना, राजे, प्राणी, काहीही. अतिशय रेखीव आणि कोरीव. आणि हे सारंं नैसर्गिक. मानवनिर्मीत शिल्पकला आतापर्यंत ठिकठिकाणी पाहिल्या. पण इथे एकमेव शिल्पकार, केवळ निसर्ग. आम्ही रस्त्यात थांबत, फोटो काढत या निसर्गाच्या अप्रूपतेच्या आठवणी साठवत होतो.

हाॅर्सशूबेन्ड हाही एक नैसर्गिक चमत्कारच आहे. एका उंच डोंगराभोवती घोड्याच्या नालेसारखी कोलॅरॅडो नदी वळसा घेत वाहते. आम्ही व्ह्यु पाॉईंट वरुन हे मनोहर दृष्य डोळ्यात साचवले. हिरवीगार संथ नदी. जणू इतस्तत:विखुरलेल्या डोंगरांची सखीच.

 

व्ह्युपाॅइंटपर्यंत बरेच चालावे लागले होते. रणरणतं उनही होतं. मात्र हवेत सुखद गारवा होता. वार्‍याच्या झुळकी आनंददायी होत्या. प्रदूषणरहित वातावरण. आणि डोक्यावरचे नितांत निळे आकाश. त्यामुळे उन्हातले चालणे सुद्धा अजिबात कष्टदायी नव्हते.

 

मी सहज म्हटलं, भारतात अशा ठिकाणी खाद्य पेयांच्या टपर्‍या असतात. इथे तसे काहीच नाही.

माझी नात लगेच म्हणाली”, here they dont want to ruin the nature–”

किती खरे आहे हे!!

इथे फक्त निसर्गाच्या सहवासात रहा. आनंद जपा, आनंद वेचा.

 

*ग्रँड कॅन्यन रेलरोडटुर* तर्फे केलेला आमच्या प्रवासाचा पुढचा टप्पाही एक वेगळाच अनुभव देणारा होता. सकाळी आठ वाजता आमच्या हाॅटेलवर ट्रॅव्हल्सची व्हॅन घ्यायला आली.

व्हॅन एकदम आरामदायी होती. आम्ही दहा प्रवासी होतो.

निरनिराळ्या देशातील लोक होते ते. आमचा ड्रायव्हर एकदम हसतमुख आणि भरपूर बोलका होता. संपूर्ण प्रवासात तो अनेक किस्से, भौगोलिक माहिती आम्हाला पुरवत होता.

गेट टू ग्रँड कॅन्यन या रेल्वेस्टेशनवर आम्ही एका ट्रेनमध्ये बसलो. हा ट्रेनचा प्रवास अतिशय सुंदर होता. गाडीत सर्व सुखसोयी आणि स्वच्छता होती. मधून मधून प्रवाश्यांची खबरबात घेणारा मदतनीसही होता. तो अॅरीझोना स्टेटचा इतिहासही सांगायचा. फोटोग्राफर होती. गिटारवादक होता. त्याने सुरेल संगीताने प्रवाशांचे मनोरंजन केले. पाईन ट्रीच्या जंगलातला हा आगगाडीचा संथ प्रवास अगदी अविस्मरणीय होता.

आम्ही ग्रँड कॅन्यन स्टेशनला पोहचलो. दोन तासाचा हा आगगाडीचा प्रवास कसा संपला ते कळलेच नाही.

इथे आमची व्हॅन व ड्रायव्हर हजरच होते.

प्रथम लंच घेतले. आणि नंतर प्रत्यक्ष ग्रॅड कॅन्यन ची सफर सुरु झाली. अतिशय सुंदर, रेखीव आखीव गाव. इथे रहाण्यासाठी बैठे बंगले असतात. पण त्यासाठी तीन वर्षे आधी बुकींग करावे लागते.

पहिल्या व्ह्यु पाॅईंटला आम्ही उतरलो आणि निसर्गाच्या त्या विस्तीर्ण, भव्यतेच्या दर्शनाने नि:शब्द झालो. अमेरिकेतल्या सात आश्चर्यांपैकी ग्रँड कॅन्यन हे एक नैसर्गिक भूगर्भीय आश्चर्य!

कॅन्यन म्हणजे दरी. खिंड. आणि या दरीतली पर्वतासमान भासणारी अनेक आकारांची नैसर्गिक शिल्पे.

कोलोरॅडो नदीचा प्रवाह इथे पहायला मिळतो. जमीनीतून वर झेपावणारे असंख्य खडक या नदीच्या पाण्याच्या दाबाने कातरत गेले. शिवाय वाराही या खडकांना सतत कापत असतो आणि त्यातून ही असंख्य शिल्पे तयार झाली आहेत. आणि मैलौन् मैल ती पसरलेली आहेत. बघणार्‍याच्या नजरेला जो दिसेल तो आकार. इथे राजवाडे, मंदीर दालने, गड किल्ले, गाभारे, माणसे प्राणी पक्षी अगदी गणपती, नंदीबैल, गरूड पक्ष्यांसारखे आकार इथे पहायला मिळतात. एक अॉस्ट्रेलिअन माझ्या जवळ आला, आणि म्हणाला, ”see over there, an indian temple of God Mahadeo” क्षणभर मलाही ते तसेच वाटले. आणि जगभरात भारतीयांचं इशप्रेम किती प्रसिद्ध आहे हे जाणवले.

 निसर्ग हाच किमयागार.

आम्ही इथे डक अॉन द राॅक या पाॅइंटवर उतरलो.

अक्षरश: एक धारधार चोचीचं बदक पंख आत गोळा करुन एका प्रचंड दगडावर बसलंय् आसाच भास होतो.

१९५० साली आयसेन हॉवरने या ठिकाणी भेट दिली होती.

त्यावेळी ते एक सामान्य नागरिक होते. त्यानंतर ते अमेरिकेचे प्रेसीडेंट बनले.

अर्थात हे सर्व आकार वारा वादळ पाण्यांनी बदलू शकतात.

शंभर वर्षानंतर इथे कदाचित हे आकार नसतील. ते बदललेले असतील.

ब्रह्मानंदी टाळी लागणे म्हणजे काय याचा अनुभवच इथे जणू घेता आला.

एक घारीसारखा पक्षी आकाशात विहरत होता. क्षणभर मला वाटले यांच्या पंखावर बसावे आणि या भव्य दरीतली

ही निसर्गाची किमया न्याहळावी.

स्वर्ग म्हणजे आणखी वेगळे काय असेल.??

थोडे पुढे गेल्यावर वॉच टाॅवर पाॉईंटला कोलोरॅडो नदीचा प्रवाह पहायला मिळाला. याठिकाणी मात्र तिचा प्रवाह 

मलीन वाटला.

 

नोव्होवा नावाची एक इंडीअन जमात इथे आहे. त्यांनी त्यांचं हेरीटेज जपलेलं आहे. बदलत्या जगाचा भाग त्यांना 

व्हायचे नाही. अॅरीझोनाचा काही भाग हा त्यांचं स्वतंत्र राष्ट्र म्हणून मानला जातो. तिथे अमेरिकन फेडरल रुल नसून

नोहोव्हा जमातीचे रुल्स आहेत. त्यांचा अध्यक्षही निराळा आहे. आम्ही ग्रँड कॅन्यनहून परतताना नोवोव्हा रीझोल्युशनला भेट दिली. तिथे मास्क घालणे सक्तीचे होते.

त्यांचे आर्ट आणि क्राफ्ट चे दुकान सुंदर होते. तिथे त्यांची

जीवनपद्धती दाखविणार्‍या कलाकृती पहायला मिळाल्या.

त्यांच्या जीवनाचे एकच ध्येय या पृथ्वीचे रक्षण. निसर्गाला 

मूळ स्वरुपातच सांभाळणे.

मनात आले, खरोखरच आज काळाची ही गरज आहे…

 

याच सफरीतले आणखी एक वैशिष्ट्यपूर्ण ठिकाण म्हणजे. *lower Antelope canyon. *

आम्ही अँन्टीलोप कॅन्यन व्हीजीटींग सेंटरपर्यंत फ्लॅगस्टाफहून कारने आलो. जवळ जवळ अडीच तासाचा ड्राईव्ह होता. ही जागा नोवाहा कम्युनिटीच्या राज्यात येते.

इथूनच प्रत्यक्ष टूरला सुरवात होते. ज्योतिकाने आधीच टुर बुक केली होती. सेंटरवर तिने तिचे बुकींग दाखवले.

आमचे तिघांचे बुकींग होते. मात्र जी सेंटरवरची मदतनीस होती ती म्हणाली, । इथे दोघांचच बुकींग दिसतय्”. सायराचे नावच नव्हते. ज्योतिकाला इंटरनेट मिळत नव्हते. त्यामुळे 

तिला कंपनीशी संपर्क साधता येत नव्हता. शेवटी तिने सायराचे तिथल्या काउंटरवरच परत तिकीट काढले. आॅनलाईनपेक्षा इथले तिकीट थोडे कमीही होते. टेक्नोलाॉजीचे जसे फायदे तसे तोटेही…असो!

साधारण एक तासाची ही भूगर्भीय सफर होती. आम्हाला दुपारी सव्वा बाराची वेळ मिळाली. इथेही वेळेत एक तासाचा फरक आहे. एक तासाने हा परिसर मागे आहे.

आम्ही तिथल्या गिफ्ट शॉपमध्ये काही खरेदी करण्यात वेळ घालवला.

– क्रमशः भाग ७७ / १ 

© सौ. राधिका भांडारकर

पुणे

मो.९४२१५२३६६९

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # २७२ – आकाशवाणी ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है, आपके काव्य संग्रह ‘शब्द नहीं रहे शब्द‘ की एक भावप्रवण कविता – आकाशवाणी…।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २७२ – आकाशवाणी ✍

(काव्य संग्रह – शब्द नहीं रहे शब्द से )

 

ये आकाशवाणी है

अब आप समाचार सुनिये ।

कल बिजली का बिल आयेगा

मकान मालिक चीखेगा

परसों बुआ आयेंगी

चिट्ठी न मिलने पर

दादा जी नाराज हैं

बहू के अस्पताल पहुँचने की

संभावना है

बउ के घुटनों में दर्द है

एम.आर.दो माह बाद मिलेगा

अगले चौबीस घंटे

मौसम खराब रहेगा

गरज के साथ छींटे पड़ेंगे।

 

© डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # २७१ – “बह रही सरिता पुलक…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत “बह रही सरिता पुलक...”)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २७१ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “बह रही सरिता पुलक...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

☆

पेड़ हैं पर्यावरण है,

और तुम हो ।

बस यही शालीन

सा कुछ ,आचरण है,

और तुम हो ॥

 

धडकनों में धुँध

कोहरा हृदय में है।

जो हमारे इस गुजरते

समय में है ।

 

क्या पता कल की

विरासत क्या रहे,

आज यह हम में

प्रकृति का उद्धरण है,

और तुम हों ॥

 

वायु के वक्तव्य को

विस्तार  देती ।

बह रही सरिता पुलक

अधिकार देती ।

 

नींद से बोझिल थ कीं

आँखें भले,

ठीक आगे सही

अपना जागरण है,

और तुम हो ।

☆

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

 संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २५२ ☆ # “प्रेम…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “प्रेम…”।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २५२ ☆

☆ # “प्रेम…” # ☆

☆

जो झंकृत कर दे सांसों को

वही मधुर संगीत है

जो उन्माद भर दे रोम रोम में

वही  प्रेम गीत है

 

जिन नैनों में आस बसी हो

जिन होठों में प्यास सजी हो

व्याकुल तन हो, व्याकुल मन हो

जिस काया में रास रची हो

जिसमें पल-पल अगन लगाती

जन्म जन्म की प्रीत है

 

रूप से काया का रिश्ता

मोह से माया का रिश्ता

धूप से छाया का रिश्ता

तन से साया का रिश्ता

प्रेम में निभाना

युगों युगों की रित है

 

लैला मजनू शीरी फरियाद

प्रेमी करते उनको याद

हीर रांझा रोमियो जूलियट

कई प्रेमी हुए इसके बाद

प्रेमियों के विरहा में डुबे

कई लोकगीत है

 

प्रेम है सपनों को जीना

अपने प्रेमी को अपनाना

तोड़कर रूढ़ियों के बंधन

जग में चले तानकर सीना

प्रेम तो बस प्रेम है

ना कोई हार न जीत है

 

जो झंकृत कर दे सांसो को

वही मधुर संगीत है

जो उम्मत भर दे रोम रोम में

वही प्रेम गीत है/

☆

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अभिव्यक्ति # ९५ – हम शीश झुकाते हैं… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता ‘हम शीश झुकाते हैं…‘।)

☆ अभिव्यक्ति # ९५ ☆ हम शीश झुकाते हैं… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

 

मैया तेरे चरणों में,

हम शीश झुकाते हैं,

 

खुद को समर्पित कर,

हम सुख पाते हैं,

ऊंचे पहाड़ों पे तेरा बसेरा,

कठिन डगर है,घना अंधेरा,

तेरे ही कदमों में,

हम झुक जाते हैं,

मैया तेरे चरणों में….

 

तेरे ही भगत हैं,

तेरे ही दीवाने,

अपनी व्यथा को,

आए हैं सुनाने,

तेरी ही कृपा पर तो,

हम सब इतराते हैं,

मैया तेरे चरणों में,,,,

 

हम तेरे भरोसे पर,

बड़ी दूर चले आए,

एक तेरा ही सहारा है,

हम यही मनाते हैं,

मैया तेरे चरणों में,

हम शीश झुकाते हैं.

☆

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/ ≈

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