हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # २९३ – “फिर भी रही तिरस्कृत…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत “फिर भी रही तिरस्कृत ...”।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २९३ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “फिर भी रही तिरस्कृत...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी 

रही अनिश्चिता

जो उसको तोड़ रही थी।

वही अभागिन बस

अपना घर छोड़ रही थी ॥

 

पीछे उस की बुनियादी

जरूरतों वाली ।

थी शापित परम्परा

या गम की दीवाली ।

 

पुत्र नहीं दे सकी महज

उसकी गलती थी –

यह रूढी समाज की

उसे निचोड़ रही थी ॥

 

जब कि उसी के हाथों में

इस  घर का कौशल ।

उसके हृदय नहीं था

चिन्तित करता छल बल ।

 

और पुराने लोगों की

बस कहन -समझ में –

सज्जनता -सच्चाई का

गठजोड़ रही थी ॥

 

सारे गुण थे उसमें

फिर भी रही तिरस्कृत ।

नये उलहने और झिडकियाँ

सहती नितनित ।

 

सहनशक्ति ,कर्तव्यपालना

के रहते वह –

अच्छाई की ओर बुराई

मोड रही थी।

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

01-08-2026

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # ३५ – हास्य-व्यंग्य – “परीक्षा, प्रश्न पत्र और लीकेज ?” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।

प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन

आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय व्यंग्य  परीक्षा, प्रश्न पत्र और लीकेज ?

साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # ३५

☆ हास्य – व्यंग्य ☆ “परीक्षा, प्रश्न पत्र और लीकेज ?” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव

मैं सुबह का अखबार पढ़ते हुए चाय का इंतजार कर रहा था, तभी डोर वेल बजी। दरवाजा खोला तो सामने मेरे पड़ोसी वर्मा जी खड़े थे। नमस्कार करते हुए वे अंदर आये और सोफे पर बैठते ही प्रश्न दाग दिया। भाई साहब यह पेपर लीक का क्या लफड़ा है, इस पर इतना हंगामा क्यों हो रहा है ? पेपर लीक क्यों होते हैं ? इसे रोका क्यों नहीं जाता ?

मैंने कहा भाई जी पेपर लीक पर सड़कों से संसद तक बातें, हंगामें चल रहे हैं वह क्या कम हैं ? मुझे इसमें शामिल नहीं होना। तभी मेरी श्रीमती जी ने चाय लेकर कमरे में प्रवेश किया, वर्मा जी को चाय देते हुए उन्होंने कटाक्ष किया – वर्मा जी, घर के छत पर रखी पानी की टंकी का लीक तो श्रीमान जी अभी तक बंद नहीं करवा पाए और आप इनके सामने देश के प्रश्न पत्रों के लीक होने का मुद्दा उठा रहे हैं ! मैंने कहा प्रिये दो बार टंकी का लीकेज बंद करवा चुका हूं, हर 5/6 माह में किसी न किसी नल में लीकेज हो जाता है और मैं उसे सुधरवाता हूं। लीकेज का कोई स्थाई समाधान नहीं है। वह तो समय के साथ रास्ता और जगह बदल कर होता रहेगा। मेरी बात सुनकर मेरी श्रीमती जी ने वर्मा जी की ओर रुख किया और कहा वर्माजी आपको आपके प्रश्न का उत्तर मिल गया। कितना भी सुधार कर लो एक समय के बाद किसी न किसी नए रास्ते से लीकेज होने ही लगता है। लीकेज रोकना कभी भी स्थाई नहीं होता यह निरंतर होने और रोकते रहने वाली प्रक्रिया है। मेरी श्रीमती जी की बात सुनकर वर्मा जी ने खड़े हो कर उनके समाधान पर उन्हें धन्यवाद दिया। मैंने गर्व से पत्नी की ओर देखा, उन्होंने वर्मा जी के प्रश्न से मेरी जान छुड़ाई थी।.. लेकिन यह क्या वे रुकी नहीं., बोलीं, “वर्मा जी कभी गैस पाइप लीक होने लगता है, बरसात में छत से पानी लीक होने लगता है, नगर निगम की पानी की पाइप लाइनें भी जब – तब लीक हो जाती हैं, बिजली के तारों से करंट लीक होने लगता है। सरकार की/ विपक्ष की गुप्त योजनाएं लीक हो जाती हैं, दस्तावेज लीक हो जाते हैं, वैज्ञानिकों के शोध लीक हो जाते हैं, कहावत है कि”दीवारों के कान होते हैं” – हमारी बंद कमरों में की गई बातें/ मीटिंग में लिए गए निर्णय लीक हो जाते हैं। दुनिया में ऐसा क्या है जो लीक नहीं होता ? यहां  विचार, बातें, गैस, द्रव तो लीक होते ही हैं, ठोस तक लीक हो जाते हैं। लीकेज कोई नहीं रोक सकता, वह तो होगा ही। हां, लीकेज होने पर सुधार किया जा सकता है पर स्थाई नहीं। लीक होने वाली चीजें रुकती नहीं वे सुधार के कुछ समय बाद ही बाहर निकलने का नया रास्ता खोज लेती हैं।

पुरानी सरकार के समय भी पेपर लीक होते रहे हैं, वर्तमान सरकार के समय भी हो रहे हैं और आगे भी होते रहेंगे। भ्रष्ट लोग इसके नए – नए रास्ते बनाते रहेंगे। सफेदपोश भ्रष्टों की पहचान आसान नहीं है। वे या तो पकड़े ही नहीं जाते और पकड़े जाएं तो रुतबे और धन बल से छूट जाते हैं अथवा छुटभैया साथियों को फंसा कर स्वयं बेदाग बने रहते हैं।

     बोलते – बोलते पत्नी ने सांस ली तो मैंने कमान सम्हाल ली। मैंने कहा भाई जी, सामान्य मानव की प्रवृत्ति है कि उसके दिमाग और पेट में कोई बात नहीं पचती फिर जो जानकारी बताने में फायदा है उसे वह कैसे छुपा सकता है ? तमाम गोपनीय विभागों में भी तो आम आदमी हैं, गोपनीय बात पचाने में सक्षम लोग बिरले ही होते हैं। एक बात और है, सभी चाहते हैं कि उनकी कोई भी महत्वपूर्ण जानकारियां व दस्तावेज लीक न हों, सुरक्षित रहें किंतु दूसरों की गोपनीय जानकारियां लीक करने / कराने के लिए घात लगाए रखते हैं। दुनिया भर के देशों ने तो एक दूसरे की जानकारियों को लीक करने के लिए जासूसों का जाल फैला रखा है। इतनी देर से बातें सुन रहे वर्मा जी का धीरज टूट गया। वे उठ खड़े हुए बोले – आदरणीय भाई साहब और भाभी जी मैं पूरी बात समझ गया हूं कृपया अब मुझे जाने दें। मैंने कहा – भाई जी रुकिये, आप आंदोलन प्रिय हैं। पेपर लीक विरोध का एक जवाबी आंदोलन कराइये जिसमें ऐसा कानून बनाने की मांग हो कि भले ही परीक्षा फीस बढ़ा दी जाए किन्तु  सभी परीक्षाओं के एक दिन पूर्व परीक्षार्थियों के मोबाइल पर प्रश्न पत्र प्रेषित कर दिए जाएं। इस कानून के आने से पेपर लीक होना बंद हो जाएंगे, बिचौलियों का धंधा चौपट हो जाएगा, परीक्षार्थियों का आत्मविश्वास बढ़ेगा। आत्म हत्याएं बंद होंगी। पेपर लीक हो जाने पर होने वाले आंदोलन और विपक्षी राजनीत के रास्ते बंद हो जाएंगे। सरकार सीना ठोक कर कह सकेगी कि हम पहले से प्रश्न बताकर परीक्षा लेते हैं। मेरी बात सुनकर वर्मा जी खुशी से उछल पड़े। बोले –  भाई साहब आपने तो मुझे राजनीति पकाने का नया मुद्दा दे दिया। बहुत बहुत धन्यवाद।

© श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर – पिन – 482002 मो. 9425153629

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २७५ ☆ # “नई रोशनी आई है…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “नई रोशनी आई है…”।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २७५

☆ # “नई रोशनी आई है…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

उदास आंखों में नई रोशनी आई है

नई सुबह ने एक उम्मीद जगाई है

अंधेरे के बादल

धीरे-धीरे छट रहे हैं

दुख भरे दिन

धीरे-धीरे कट रहे हैं

राह में तूफान

धीरे-धीरे घट रहे हैं

हर किरण ने मन में आस बधाई है

नई सुबह ने उम्मीद जगाई है

 

आसमान भी अब झुकने लगा है

तारों से उनका हाल पूछने लगा है

धरती का उन्माद देखकर छुपने लगा है

शायद उसे अपनी भूल समझ आई है

नई सुबह ने एक उम्मीद जगाई है

 

किसका यहां हमेशा

के लिए ठिकाना है

जो आया है

उसे एक दिन जाना है

क्या खोना और क्या पाना है

कुदरत ने अपनी बिसात बिछाई है

नई सुबह ने एक उम्मीद जगाई है

 

नए जोश ने

कई तख्त बदल डाले हैं

नसीहत है उनको

जो मुगालता पाले हैं

हर तानाशाह ने

आखिर में हथियार डालें है

याद रहते हैं वह जिन्होंने दिलों में

प्रीत की ज्योत जलाई है

नई सुबह ने एक उम्मीद जगाई है

उदास आंखों में नई रोशनी आई है/

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अभिव्यक्ति # -११९ – पानी तेरी अजब कहानी… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता ‘पानी तेरी अजब कहानी।)

☆ अभिव्यक्ति # ११९ ☆

☆ पानी तेरी अजब कहानी☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

पानी, तेरी अजब कहानी,

जैसा बर्तन, वैसा पानी,

पानी तेरी अजब कहानी।

*

बदली गगरी लेकर जाती,

सागर से भर लाती पानी,

धरती की वो प्यास बुझाने,

बनकर बूंद बरसता पानी,

पानी तेरी अजब कहानी।

*

सागर का खारा है पानी,

दरिया का मीठा है पानी,

संग्रह करता खारा होता,

जो दे उसका मीठा पानी,

पानी तेरी अजब कहानी।

*

मूरत पर भी, चढ़ता पानी,

अंत समय में लगता पानी,

संकल्प करो तो लगता पानी,

श्राप दिया तो लगता पानी,

पानी तेरी अजब कहानी।

*

बचपन में आँगन में पानी,

छमछम करती बिटिया रानी,

बिटिया की बिदाई ले आती,

माता पिता की आंख में पानी,

पानी तेरी अजब कहानी।

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३४३ ☆ व्यंग्य – बाबाओं का स्वर्णकाल ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम एवं विचारणीय व्यंग्य  – ‘बाबाओं का स्वर्णकाल‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३४३ ☆

☆ व्यंग्य ☆ बाबाओं का स्वर्णकाल ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

शिब्बू ऐसे ही दोस्तों के कहने पर बाबा के दरबार में चला गया था। दरबार में हज़ारों की भीड़ थी, महिलाएं संख्या में ज़्यादा। बाबा का प्रवचन चल रहा था। एक तरफ गायन-मंडली बैठी थी। बाबा प्रवचन के बीच में कोई धुन छेड़ देते और फिर गायन मंडली उसे उठा लेती। इस तरह बाबा को थोड़ी राहत मिल जाती थी।

बाबा की शोहरत कुछ दिनों में बड़ी तेज़ी से फैली थी। चर्चा थी कि वे  बड़े ज्ञानी थे। सब शंकाओं का समाधान कर देते थे। इसीलिए देर रात तक आश्रम में भक्तों की भीड़ बनी रहती थी।

शिब्बू और उसके दोस्त बाबा की गद्दी के पास ही बैठे थे। बाबा के दाढ़ी-मूंछ से ढंके चेहरे को देखते-देखते शिब्बू को लगा बाबा को उसने पहले देखा है। अचानक वह उठकर खड़ा हो गया, बाबा को संबोधन करके बोला, ‘आप तिरलोकी नाथ मासाब तो नहीं हैं?’

सवाल सुनकर बाबा का चेहरा उतर गया, संभल कर बोले, ‘अरे शिवदयाल, तुम यहां कैसे?’

शिब्बू बोला, ‘बस ऐसे ही दोस्तों के साथ आ गया।’

बाबा बोले, ‘इस सत्संग के बाद हमारे कक्ष में मिलना।’

सत्संग खत्म हुआ तो शिब्बू बाबा के कक्ष में पहुंचा। बाबा मसनद के सहारे उठंगे थे। शिब्बू उनके चरन छूकर बैठ गया। फिर पूछा, ‘आपने तीन साल मुझे स्कूल में पढ़ाया था। आप बाबा कैसे बन गये?’

बाबा कुछ असमंजस में दिखे, फिर बोले, ‘यह मेरा दूसरा जनम है। पिछला सब छोड़ दिया है।’

शिब्बू बोला, ‘आप तो अच्छा पढ़ाते थे, फिर यह बाबा बनने की बात कैसे आपके मन में आयी?’

बाबा कुछ देर आंखें बंद किये मौन बैठे रहे, फिर बोले, ‘एक घटना के बाद मेरा मन अचानक मास्टरी से उचट गया। हमारे क्षेत्र के मंत्री चमनलाल के पास एक दिन स्कूल के लिए अतिरिक्त फंड मंज़ूर कराने का प्रस्ताव लेकर गया था। मंत्री जी अपने चुनाव क्षेत्र का दौरा करके लौटे थे। सोफे पर लंबे लेटे थे। मुझे जानते थे लेकिन देख कर भी उठे नहीं। लेटे ही लेटे बात की। बीच-बीच में झपकी लेते रहे। मुझे बैठने को भी नहीं कहा। कहा कि आवेदन बाहर पीए को दे दूं। तीन चार दिन बाद स्थानीय अखबार में देखा कि वे एक बीस पच्चीस साल के बारहवीं पास बाबा के चरणों में औंधे पड़े हैं। बस तभी मास्टरी छोड़कर बाबा बनने का निश्चय कर लिया। हमारे पास इन बाबाओं से ज़्यादा ज्ञान है, बोलने की कला है, लेकिन ये अनपढ़ बाबा हमसे ज्यादा इज़्ज़त पाते हैं। यही ऐसा धंधा है जिसमें पैसा और सम्मान दोनों एक साथ मिलते हैं। जो बाबा भक्तों को माया से दूर रहने का उपदेश देते हैं वे खुद चार करोड़ की गाड़ी में घूमते हैं और पांच करोड़ का सोना शरीर पर पहनते हैं। पूछने पर जवाब मिलता है सब भक्तों का दिया हुआ है, उनकी नज़र में तो सोने और मिट्टी में कोई फर्क नहीं है। पुलिस वाले इन पर हाथ डालने से डरते हैं। इन पर आयकर लागू नहीं होता। मास्टर को देश की भावी पीढ़ी का निर्माता कहा जाता है, लेकिन समाज में बाबा ज़्यादा पुज रहे हैं। हमारी क्लास में बीस छात्र भी नहीं जुटते, इनके दरबार में लाखों जुटते हैं क्योंकि इनके अनुसार इनके पास आदमी के हर दु:ख की दवा मिलती है।

‘मास्टर से अपेक्षा की जाती है कि मेहनत से पढ़ाये और अच्छा रिज़ल्ट लाये। अच्छा रिज़ल्ट न लाने पर मास्टर को दंड मिलता है। लेकिन एक बाबा बिना पढ़े पास होने का नुस्खा बताते हैं और उन पर कोई कार्रवाई नहीं होती। इन बाबा के हिसाब से पढ़ाई-लिखाई की कोई ज़रूरत नहीं है। यही बाबा भक्तों से पूछते हैं कि उन्हें रात में सफेद साड़ी और बड़ी बिन्दी वाली चुड़ैल दिखी थी या नहीं। एक बाबा सीधे रावण और हनुमान जी से बात करते हैं और अपने दरबार में प्रेतबाधा से ग्रस्त आदमी को बीस पच्चीस फीट दूर से थप्पड़ मारते हैं। आदमी भी उनके हाथ की हरकत के साथ ज़मीन पर लुढ़कता पुढ़कता है, जैसे कि बाबा का थप्पड़ उसे लग रहा हो। विडंबना यह है कि सैकड़ों उच्च शिक्षा प्राप्त लोग दरबार में हाजि़र होकर चुपचाप यह तमाशा देखते हैं। सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश और सेनाध्यक्ष उनके सामने सिर नवाते हैं। कई साल पहले उत्तर प्रदेश के एक बाबा भक्तों से कहते थे कि रात को उनके घर शिवजी आये थे, फिर पूछते थे कि क्या उन्होंने डमरू की आवाज़ सुनी थी, और भक्त एक स्वर में जवाब देते थे कि उन्होंने सुनी थी।

‘स्वतंत्रता के पचहत्तर साल बाद तरक्की यह हुई है कि बाबागीरी का विस्फोट हुआ है। रोज़ दस बीस बाबा पैदा हो रहे हैं। कोई जीभ निकाले दौड़ रहा है तो कोई आंखें फाड़े। एक युवा साध्वी दिखीं जो शरीर पर भभूत लपेटे थीं और भभूत को घिस घिस कर, उतारकर भक्तों में बांट रही थीं। संविधान के मूल कर्तव्यों में कहा गया है कि देश में वैज्ञानिक सोच को प्रोत्साहन मिलना चाहिए, लेकिन वैज्ञानिक सोच कितना बढ़ रहा है यह सबके सामने है। ऐसे में बेचारा मास्टर बच्चों को क्या पढ़ाये?

‘बाबाओं के दरबार में शंका करने की इजाज़त नहीं होती। ज़्यादा सवाल पूछोगे तो भक्त लाठी लेकर दौड़ेंगे और शंकालु की कपाल-क्रिया हो जाएगी। बाबा स्त्रियों पर ज़्यादा भरोसा करते हैं क्योंकि वे सवाल नहीं पूछतीं, बाबा जिस तरफ इशारा करे उधर ही सिर पर कलश रखकर चल पड़ती हैं।’

शिब्बू ने पूछा, ‘तो क्या आप अब बाबा ही बने रहेंगे?’

मासाब बोले, ‘हम धर्म का असली मर्म समझाने के लिए इस लाइन में आये हैं। अभी धर्म के नाम पर महज़ कर्मकांड और अंधानुकरण हो रहा है। हम तो कुछ अच्छा करने की कोशिश करेंगे, लेकिन देखना यह है कि ये धंधे वाले बाबा हमें कब तक टिकने देते हैं।’

—–

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य क्षणिका# ११४ – वरदानी कलंक… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– वरदानी कलंक…” ।

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य भँवर # ११४  — वरदानी कलंक — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

(गद्य – भँवर’: मेरा एक अभिनव गद्यात्मक प्रयोग)

इतिहास साक्षी है राजा एवं ऋषि भगवान की तपस्या करने पर अमरता का वरदान प्राप्त करते थे। पर वरदानी राजा अथवा ऋषि तो नीच अधम निकलते थे। वे भगवान को भस्म करते और स्वयं भगवान हो जाते। इतिहास और भी साक्षी है वैसे तपस्वियों को अमरता का वरदान मिलने पर भी वे मृत्यु की न टूटने वाली नींद में समाये। तभी तो युग बीते, लेकिन आज तक वरदानी अमरता का कोई प्राणी दृष्टिगत होता नहीं है। एक ऋषि हुआ उसने तपस्या से भगवानी वरदान पाया और उलटे भगवान पर टूट पड़ा। पर वह विस्मयकारी ऋषि हुआ। वह भगवान को भस्म नहीं करता। वह भगवान को अपनी परिभाषा से ललकारता। उसने शेर के जबड़ों में हाथ डाल कर भगवान से कहा मेरी अमरता दागदार न हो। पर उसकी अमरता दागदार हुई। शेर ने उसे निगल लिया। भगवान को अच्छा लगा, इस वरदानी झट्टू को भी मरना तो था ही।

 

 © श्री रामदेव धुरंधर

२६ — ०७ — २०२६

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३४७ – अग्निधर्मा ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३४७ अग्निधर्मा… ?

प्राय: हम सबके घर की ठाकुरबाड़ी में तड़के और सांझ, दीया प्रज्ज्वलित किया जाता है। सामान्यत:  दीये के मध्य भाग में घी में डूबी बाती रखकर उसका अग्रभाग ठाकुर जी की ओर करके उसे प्रदीप्त करते हैं।

आज देखता हूँ कि बाती का मुँह ठाकुर जी की ओर न होकर साधक की ओर हो चला है। इसके चलते ज्योति भी साधक की ओर आ रही है।

दृश्य से विचार उपजा, विचार का आलोक मस्तिष्क में प्रभासित हुआ। अपने देखे पर विचार किया, ज्योति की दिशा पर चिंतन किया तो फिर विचार पर,  चिंतन पर और स्वयं पर हँसी आने लगी।

लौ का अग्रभाग, उसका मुँह कौनसा है, यह कौन निर्धारित करेगा? अग्नि तो अग्नि है। उसका हर अंश दहकता है। हर दिशा में अग्रभाग है। पत्थरों की रगड़ से उद्भूत स्फुलिंग से लेकर अरण्य को चट कर जाने वाले दावानल तक और आकाश में लावा बिखेरती दामिनी से लेकर सागर के पेट में सुलगते बड़वानल तक, हर प्रकार की अग्नि का गुणधर्म है दाहकता।

भारतीय परंपरा का एक गुणधर्म, मानवीकरण भी है। अग्नि का मानवीकरण करते समय एक दूसरे की विपरीत दिशा में  दो चेहरे दिखाए जाते हैं। अग्नि के प्रवाह की कोडिंग हैं ये दो चेहरे। एक ओर ऊर्जा का, जीवन का प्रतीक है अग्नि। दूसरी ओर ऊर्जा के गमन के बाद देह का लपटों को समर्पण का प्रतीक है अग्नि।

वतायो फ़क़ीर सिंध के गहन दार्शनिक एवं विद्वान संत थे। उनके अनेक आख्यान प्रसिद्ध हैं। कहा जाता है कि कंपकंपाने वाली शीत लहर की एक रात में वतायो और उनकी माँ, दोनों ठिठुर रहे थे। माँ ने बेटे से कहा, “वतायो, सुनते हैं, तू ईश्वर के निकट है। मैं भी यही महसूस करती हूँ। आज जाड़ा बहुत है। अपने ईश्वर से कह कि नर्क की थोड़ी-सी आग हम ग़रीबों के लिए दे दे।”

वतायो हँस पड़े। फिर बोले, “माँ, नर्क में कोई आग नहीं होती। सब अपनी-अपनी आग साथ लेकर आते हैं।”

अपनी अग्नि के साथ किस पथ पर और किस दिशा में यात्रा करनी है, इसका निर्णय निजी स्तर पर ही करना होता है। हाँ, अपनी अग्नि के आलोक में अग्निधर्मा हो सकने का स्वर्णिम अवसर प्रकृति हरेक को देती है। इति।

© संजय भारद्वाज 

संध्या 5:25 बजे, 01 अगस्त 2026

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  श्रावण साधना गुरुवार दि. 30 जुलाई से आरंभ होकर शनिवार 28 अगस्त (रक्षाबंधन) तक चलेगी 🕉️

  💥 

इस साधना में-

ॐ नमः शिवाय का मालाजप होगा।

गोस्वामी तुलसीदास रचित रुद्राष्टकम् का पाठ करेंगे।

इस बार हम आदि शंकराचार्य के निर्वाण षटकम् / वैराग्य षटकम् का भी प्रतिदिन कम से कम एक पाठ अवश्य करेंगे।

मालाजप, रुद्राष्टकम्, निर्वाण षटकम् के साथ आत्मपरिष्कार व ध्यानसाधना भी नियमित रूप से चलेंगे।

हमारा प्रयास है कि महत्वपूर्ण स्तोत्रों का अधिकाधिक प्रसार हो।

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सलिल प्रवाह # २८८ – ग़ज़लिका – लोकतंत्र ने जिनको पोसा ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है  – ग़ज़लिका – लोकतंत्र ने जिनको पोसा)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २८८ ☆

☆ ग़ज़लिका – लोकतंत्र ने जिनको पोसा ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

इसने ताका, उसने ताका

कौन न जिसने जी भर ताका

.

मौका देख न चूका कोई

दोस्त यार फूफा या काका

.

चीख न अबला की सुनता जग

सबला की झट सुनता आका

.

जिन पर जिम्मा संरक्षण का

वे ही डाल रहे हैं डाका

.

मन की बातें हैं मनमानी

कमीशनों का निश्चित खाका

.

हुए पड़ोसी सभी विरोधी

आँख दिखा गुर्राए ढाका

.

फेंक रहे हैं लाखों हँसकर

पोस्टिंग हो पा जाएँ नाका

.

खाते जाते जो डकार ले

उनके कारण होता फाका

.

लोकतंत्र ने जिनको पोसा

उनके कारण करता साका

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

१६.७.२०२६

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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ज्योतिष साहित्य ☆ साप्ताहिक राशिफल (3 अगस्त से 9 अगस्त 2026) ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆

ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय

विज्ञान की अन्य विधाओं में भारतीय ज्योतिष शास्त्र का अपना विशेष स्थान है। हम अक्सर शुभ कार्यों के लिए शुभ मुहूर्त, शुभ विवाह के लिए सर्वोत्तम कुंडली मिलान आदि करते हैं। साथ ही हम इसकी स्वीकार्यता सुहृदय पाठकों के विवेक पर छोड़ते हैं। हमें प्रसन्नता है कि ज्योतिषाचार्य पं अनिल पाण्डेय जी ने ई-अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों के विशेष अनुरोध पर साप्ताहिक राशिफल प्रत्येक शनिवार को साझा करना स्वीकार किया है। इसके लिए हम सभी आपके हृदयतल से आभारी हैं। साथ ही हम अपने पाठकों से भी जानना चाहेंगे कि इस स्तम्भ के बारे में उनकी क्या राय है ? 

☆ ज्योतिष साहित्य ☆ साप्ताहिक राशिफल (3 अगस्त से 9 अगस्त 2026) ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆

जय श्री राम और जय श्री हनुमान। आप सभी को आश्चर्य हो रहा होगा कि मैं जय श्री राम के साथ में जय हनुमान भी क्यों कह रहा हूं मेरा अपना व्यक्तिगत विचार है कि हमें अपने कार्यों को करने के लिए श्री राम भक्त श्री हनुमान जी का ही सहारा लेना चाहिए। हम सभी जानते हैं कि माता जानकी ने श्री हनुमान जी को अष्ट सिद्धियों और नौ निधियों का वरदान दिया हुआ है। इस वरदान के कारण वे किसी को भी अष्ट सिद्धियां और नौ निधियां प्रदान कर सकते हैं इसके अलावा वे किसी भी कार्य को अपनी इन सिद्धियों के कारण बड़े आसानी से कर सकते हैं। श्री हनुमान चालीसा में गोस्वामी तुलसीदास जी ने कहा है कि –

अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता |

अस बर दीन जानकी माता ||

 इस चौपाई के संपुट पाठ करने से दुष्टों का नाश होता है, जातक की रक्षा होती है और जातक की सभी इच्छाएं पूर्ण होती हैं।

जब हमारे सभी इच्छाएं श्री हनुमान की पूर्ति कर सकते हैं तो हम फिर उनके स्थान को छोड़कर के किसी और के पास क्यों जाएं।

“नासे  रोग हरे सब पीरा” नाम की पुस्तक में श्रीहनुमान चालीसा की चौपाइयों से संबंधित सभी उपायों का विस्तृत विवरण दिया हुआ है। इस पुस्तक को आप हमारे यहां से प्राप्त कर सकते हैं।

मैं पंडित अनिल पाण्डेय आज आपको 3 अगस्त से 9 अगस्त 2026 तक के सप्ताह के साप्ताहिक राशिफल के बारे में बताऊंगा। परंतु राशिफल से पहले मैं आपको इस सप्ताह के ग्रहों के विचरण की जानकारी दूंगा।

इस सप्ताह सूर्य और गुरु कर्क राशि में, मंगल मिथुन राशि में, शुक्र कन्या राशि में, शनि मीन राशि में और राहु कुंभ राशि में गोचर करेंगे। बुध प्रारंभ में मिथुन राशि में रहेगा तथा 5 तारीख के 7:06 रात से कर्क राशि में प्रवेश करेगा।

आई अब राशिवार राशिफल की चर्चा करते हैं।

मेष राशि

इस सप्ताह आपके प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी। थोड़े प्रयास से ही आपकी प्रतिष्ठा में अच्छी वृद्धि होगी। भाई बहनों के साथ संबंधों में थोड़ा सा तनाव आ सकता है। आपको अपने संतान से थोड़ा सहयोग प्राप्त हो सकता है। भाग्य से इस सप्ताह थोड़ी मदद मिल सकती है। शत्रुहन्ता योग भी बन रहा है, जिसके कारण आप अपने शत्रुओं को आसानी से पराजित कर सकते हैं। थोड़ा ही प्रयास करना पड़ेगा। इस सप्ताह आपके लिए 5 और 6 तारीख सफलता दायक है। 3 और 4 तारीख को आपको बहुत सावधानी से अपने कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन चावल का दान करें और शुक्रवार को मंदिर में जाकर पुजारी जी को सफेद वस्त्रो का दान दें। सप्ताह का शुभ दिन बृहस्पतिवार है।

वृष राशि

इस सप्ताह आपके भाई बहनों को लाभ हो सकता है। उनका अच्छा सहयोग भी आपको मिलेगा। भाग्य से आपको मदद मिलेगी परंतु उसकी मात्रा बहुत कम होगी। अतः आपको मुख्य रूप से अपने कर्म पर विश्वास करना पड़ेगा। आपका, आपके जीवनसाथी का और आपके माताजी का स्वास्थ्य सामान्य रहेगा अर्थात पहले जैसा ही रहेगा। कर्मचारी एवं अधिकारियों को अपने वाणी पर नियंत्रण रखना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए सात और आठ अगस्त विभिन्न प्रकार के कार्यों में सफलता प्राप्त करने हेतु अनुकूल हैं। 5 और 6 अगस्त को आपको सचेत रहकर अपने कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन लाल मसूर की दाल का दान करें और मंगलवार को हनुमान जी के मंदिर में जाकर कम से कम तीन बार हनुमान चालीसा का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन शुक्रवार है।

मिथुन राशि

इस सप्ताह आपके पास धन आने का उत्तम योग है। आपको प्रयास कर इस सप्ताह का भरपूर उपयोग करना चाहिए। आप जितना प्रयास करेंगे उससे ज्यादा धन की प्राप्ति होगी। आपको इस सप्ताह अपने प्रसिद्धि के प्रति सतर्क रहना चाहिए। आपको अपने माता जी के स्वास्थ्य के प्रति थोड़ा सावधान रहना चाहिए। भाग्य से इस सप्ताह आपको मदद नहीं मिल पाएगा। आपको अपने कर्म पर विश्वास करना पड़ेगा। इस सप्ताह आपके लिए तीन, चार तथा 9 अगस्त उपयोगी है। 7 और 8 अगस्त को कचहरी के कार्यों के मामले में आपको सतर्क होकर कार्य करना चाहिए। सफलता प्राप्त हो सकती है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गाय को हरा चारा खिलाएं। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।

कर्क राशि

यह सप्ताह आपके लिए कई मामलों में उपयोगी रहेगी। आपको अपने भाइयों से अच्छा सहयोग प्राप्त हो सकता है। कचहरी के कार्यों में आपको सावधान रहने की आवश्यकता है। भाग्य से सामान्य मदद ही प्राप्त होगी। अधिकारी कर्मचारियों के लिए सप्ताह ठीक-ठाक है। इस सप्ताह आपके लिए 5 और 6 अगस्त विभिन्न प्रकार से मददगार है। सात और आठ अगस्त को थोड़े से धन की प्राप्ति हो सकती है। 9 अगस्त को आपको होशियारी से अपने कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन काले उड़द की दाल का दान करें और शनिवार को शनि मंदिर में जाकर शनि देव का पूजन करें। सप्ताह का शुभ दिन सोमवार है।

सिंह राशि

कचहरी के कार्यों में इस सप्ताह शुभ संदेश मिल सकता है। भाग्य से आपको सामान्य मदद मिलेगी। भाई बहनों के साथ संबंधों में टकराव हो सकता है। धन के प्रति इस सप्ताह आपको सतर्क रहना चाहिए, नहीं तो आपका धन व्यर्थ के कार्यों में बर्बाद हो सकता है। संतान से इस सप्ताह आपको थोड़ा सा सहयोग मिलेगा। आपका या आपके जीवनसाथी का स्वास्थ्य थोड़ा खराब हो सकता है। इस सप्ताह आपके लिए सात और आठ अगस्त लाभदायक है। 7 और 8 अगस्त को किए गए कार्यों में आप सफल रहेंगे। तीन और चार अगस्त को आपको बहुत सावधानी से कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन काले कुत्ते को तंदूर की रोटी खिलाएं। सप्ताह का शुभ दिन बृहस्पतिवार है।

कन्या राशि

इस सप्ताह आपके पास धन आने की पूर्ण उम्मीद है। धन अच्छी मात्रा में आ सकता है, परंतु आपको इसके लिए विशेष परिश्रम करना पड़ेगा। अविवाहित जातकों के लिए यह सप्ताह ठीक रहेगा। उनके विवाह के प्रस्ताव प्राप्त होंगे। प्रेम संबंधों में भी वृद्धि संभव है। अधिकारी और कर्मचारियों को अपने कार्यालय में सतर्कता पूर्वक कार्य करना चाहिए। आपको अपने स्वास्थ्य के प्रति भी थोड़ा सतर्क रहना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए तीन-चार और 9 अगस्त फलदायक है। 5 और 6 अगस्त को आपको सतर्क रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन हनुमान चालीसा का पाठ करें तथा शनिवार को दक्षिण मुखी हनुमान जी के मंदिर में जाकर हनुमान चालीसा का वाचन करें। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।

तुला राशि

यह सप्ताह अधिकारी और कर्मचारियों के लिए उत्तम है। उनको अपने कार्यालय में प्रतिष्ठा प्राप्त होगी। अपने वरिष्ठ अधिकारियों से उनको सम्मान भी प्राप्त हो सकता है। भाग्य से इस सप्ताह आपको विशेष मदद नहीं मिलेगी। आपको अपने परिश्रम पर यकीन करना पड़ेगा। कचहरी के कार्यों में सफलता प्राप्त हो सकती है परंतु इसके लिए आपको विशेष ध्यान देकर प्रयास करना होगा। आपके प्रतिष्ठा में वृद्धि हो सकती है। आपके शत्रु इस सप्ताह शांत रहेंगे परंतु समाप्त नहीं होंगे। इस सप्ताह आपके लिए 5 और 6 अगस्त विभिन्न प्रकार से अनुकूल हैं। सप्ताह के बाकी दिनों में आपको सतर्क रहकर कार्यों को करने की आवश्यकता है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन रुद्राष्टक का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।

वृश्चिक राशि

इस सप्ताह भाग्य आपका अच्छा साथ देगा। आपके कई कार्य भाग्य के सहारे हो जाएंगे। लंबी यात्रा का योग भी बन सकता है। आपको प्रतिष्ठा की हानि हो सकती है। भाई बहनों के साथ संबंध सामान्य रहेंगे। कर्मचारी एवं अधिकारियों को अपने कार्यालय में कार्य करते समय थोड़ा सतर्क रहना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए 7 और 8 अगस्त विशेष रूप से परिणाम दायक हैं। 5, 6 और 9 अगस्त को आपको सावधानी के साथ कार्यों को अंजाम देना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन शिव पंचाक्षर मंत्र का जाप करें। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवार है।

धनु राशि

इस सप्ताह आपका स्वास्थ्य अच्छा रहेगा। धन आने का योगहै। दुर्घटनाओं से आप बच जाएंगे। लंबी यात्रा का योग बन सकता है। कर्मचारी एवं अधिकारियों को कार्यालय में बहुत सतर्क रहना चाहिए। अगर वे सतर्क नहीं रहेंगे तो उनका नुकसान संभव है। भाई बहनों के साथ संबंध ठीक नहीं रहेंगे। संतान के साथ सामान्य संबंध रहेगा। इस सप्ताह आपके लिए तीन-चार और 9 अगस्त कार्यों के लिए शुभ और लाभप्रद हैं। सात और 8 अगस्त को आपको अपने कार्यों को थोड़ा सावधानी से करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन भगवान शिव का दूध और जल से अभिषेक करें। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवार है।

मकर राशि

अविवाहित जातकों के लिए यह सप्ताह ठीक है। उनको विवाह के प्रस्ताव प्राप्त होंगे। भाग्य से आपको थोड़ी बहुत मदद मिल सकती है। आप अपने शत्रुओं को आसानी से पराजित कर सकते हैं। आपका स्वास्थ्य उत्तम रहेगा। कचहरी के कार्यों में सावधानी पूर्वक कार्य करने पर सफलता प्राप्त हो सकती है। भाई बहनों के साथ सामान्य संबंध रहेगा अर्थात जैसे पहले था वैसा ही रहेगा। इस सप्ताह आपके लिए 5 और 6 तारीख कार्यों को करने के लिए उचित और लाभदायक है। 9 अगस्त को आपको सजग रहकर अपने कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन शिव पंचाक्षर स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन शनिवार है।

कुंभ राशि

इस सप्ताह कचहरी के कार्यों में आपको सफलता मिल सकती है। परंतु कार्यों में सावधानी बरतना आवश्यक है। धन आने का मामूली योग है। आपका या आपके जीवन साथी दोनों में से किसी एक का स्वास्थ्य थोड़ा खराब हो सकता है। शत्रुओं को आप आसानी से पराजित कर सकते हैं। धन आने की मात्रा कम रहेगी। इस सप्ताह आपके लिए सात और आठ तारीख उत्तम है। सप्ताह के बाकी दिन भी ठीक-ठाक है। सात या 8 तारीख को आपकी प्रतिष्ठा में वृद्धि भी हो सकती है। आपको चाहिए कि आप इस सप्ताह प्रतिदिन गायत्री मंत्र का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन शनिवार है।

मीन राशि

यह सप्ताह आपके संतान के लिए अत्यंत उत्तम है। आपको अपनी संतान का बहुत अच्छा सहयोग भी प्राप्त होगा। छात्रों की पढ़ाई के लिए भी यह सप्ताह बहुत अच्छा रहेगा। उनको परीक्षाओं में सफलता भी प्राप्त होगी। आपको इस सप्ताह अपने प्रतिष्ठा पर ध्यान देना होगा। इस सप्ताह आपको अपने माता जी के स्वास्थ्य के प्रति भी सतर्क रहना चाहिए। कर्मचारी और अधिकारियों के लिए यह सप्ताह ठीक रहेगा। धन आने का भी योग है। इस सप्ताह आपके लिए तीन चार और नौ अगस्त विभिन्न प्रकार के कार्यों के लिए उत्तम है। सप्ताह के बाकी दिन भी ठीक-ठाक हैं। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गणेश अथर्वशीर्ष का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।

ध्यान दें कि यह सामान्य भविष्यवाणी है। अगर आप व्यक्तिगत और सटीक भविष्वाणी जानना चाहते हैं तो आपको मुझसे दूरभाष पर या व्यक्तिगत रूप से संपर्क कर अपनी कुंडली का विश्लेषण करवाना चाहिए। मां शारदा से प्रार्थना है या आप सदैव स्वस्थ सुखी और संपन्न रहें। जय मां शारदा।

 राशि चिन्ह साभार – List Of Zodiac Signs In Marathi | बारा राशी नावे व चिन्हे (lovequotesking.com)

निवेदक:-

ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय

(प्रश्न कुंडली विशेषज्ञ और वास्तु शास्त्री)

सेवानिवृत्त मुख्य अभियंता, मध्यप्रदेश विद्युत् मंडल 

संपर्क – साकेत धाम कॉलोनी, मकरोनिया, सागर- 470004 मध्यप्रदेश 

मो – 8959594400

ईमेल – 

यूट्यूब चैनल >> आसरा ज्योतिष 

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक ८५ आणि ८६ ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

श्री विश्वास देशपांडे

? इंद्रधनुष्य ?

☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक ८५ आणि ८६ ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

श्लोक क्र. ८५ – – – 

भजा राम विश्राम योगेश्वरांचा ।

जपू नेमिला नेम गौरीहराचा ।

स्वये नीववी तापसी चंद्रमौळी । 

तुम्हा सोडवी राम हा अंतकाळी ।।८५।।

अर्थ : योगेश्वरांचे विश्रांतीस्थान असलेले रामनाम जपा. प्रत्यक्ष गौरीहर म्हणजे शंकर देखील नित्यनेमाने आपला ठरलेला रामनामाचा जप पूर्ण करतात. या नामजपाने भगवान शंकरांना देखील शांती मिळते. असा हा श्रीराम अंतकाळी आपली सुटका करील.

विवेचन : रामनामाचे महत्व सांगताना समर्थ म्हणतात की रामनाम हे योग्यांचा विश्राम म्हणजे विश्रांती आहे. इथे समर्थांनी त्यासाठी ‘ योगेश्वर ‘ शब्द वापरला आहे. या शब्दाचे तीन अर्थ घेता येतात. पहिला अर्थ जो समर्थांना अपेक्षित आहे तो म्हणजे योगेश्वर भगवान शंकर. आपण श्रीकृष्णाला देखील योगेश्वर म्हणतो. पांडुरंगशास्त्री आठवले तर आपल्या स्वाध्यायात श्रीकृष्णाला ‘ योगेश्वर भगवानच ‘ म्हणतात. हा दुसरा अर्थ. आणि तिसरा अर्थ म्हणजे जे योगी साधक आहेत, तप करणारे आहेत ते. तेव्हा यातील कोणत्याही अर्थाने योगेश्वर शब्द घेतला तरी सर्व श्रेष्ठ पुरुष शेवटी रामनामाचाच आश्रय घेतात. रामनाम हे त्यांचे विश्रांतीस्थान आहे हेच यातून स्पष्ट होते.

श्रीकृष्ण देखील रामनामाचा जप करत असत असा पुराणात उल्लेख आहे. कलियुगात रामनाम हेच तारक आहे असे त्यांनी युधिष्ठिराला सांगितले होते. श्रीकृष्ण आणि श्रीराम दोघेही विष्णूचेच अवतार. त्यांच्यामध्ये भेद नाही. पण कलियुगात भक्तीचा सोपा मार्ग म्हणून श्रीकृष्णांनी रामनाम घेण्याचा उपदेश केला आहे. राम, कृष्ण आणि शंकर यांच्यातही भेद नाही. जसे भगवान शंकर रामनामाचा जप करीत असतात तसेच श्रीराम देखील भगवान शंकराचे पूजन करीत असतात. शंकराचार्यांनी याच अद्वैत सिद्धांताचे प्रतिपादन केले होते. परमेश्वर एकच आहे. आपण त्याचे जे कोणते नाम घेऊ, त्यावर आपली दृढ श्रद्धा हवी.

भगवान शंकरांसारखा योगिराणा देखील नित्यनेमाने श्रीरामांचे नामस्मरण करतो. आपल्या नामस्मरणाचा जो नेम आहे, त्यात खंड पडू देत नाही. तपस्वी आणि मस्तकावर चंद्र धारण करणाऱ्या भगवान शंकरांचा दाह रामनामानेच शांत झाला. रामनाम हेच त्यांचे विश्रांतीचे ठिकाण आहे. तिथेच ते रमतात. आपणही या रामनामाचे नित्यनेमाने स्मरण करावे. रामनामाची जीवाला सवय असली तरच अंतकाळी आपल्या मुखात रामनाम येईल. रामनामामुळे आपली ऊर्जा ऊर्ध्वगामी होते. विकारांमुळे आपली ऊर्जा अधोगामी होते. आयुष्यात जाणीवपूर्वक जर नियमितपणे रामनाम घेतले तर अंतकाळी देखील मुखातून तेच बाहेर पडेल. गोंदवलेकर महाराज म्हणतात, ” रामनाम ही अंतकाळी आपल्या मुखातून बाहेर पडणारी शेवटची गोष्ट असली पाहिजे. ” असे नाम आपल्या मुखात अंतकाळी आले तर श्रीराम आपली या जन्ममरणाच्या फेऱ्यातून सुटका करील.

स्वसंवाद :: 

१. ज्याप्रमाणे श्रेष्ठ योगेश्वरांचे ‘रामनाम’ हे विश्रांतीस्थान आहे, तसे माझे मन संसाराच्या धावपळीतून थकल्यावर रामनामात विसावा शोधते का? 

२. वेगवेगळ्या देवांमध्ये किंवा पंथांमध्ये श्रेष्ठ-कनिष्ठ असा भेद करून मी माझे चित्त कलुषित करतो आहे, की सर्वांभूति एकच तत्त्व पाहण्याचा प्रयत्न करतो? 

३. माझ्या दैनंदिन जीवनातील विकारांमुळे माझी ऊर्जा ‘अधोगामी’ (खाली) जात आहे की नामस्मरणामुळे ती ‘ऊर्ध्वगामी’ (सकारात्मकतेकडे) प्रवास करत आहे? 

४. गोंदवलेकर महाराजांनी म्हटल्याप्रमाणे, “रामनाम ही अंतकाळी मुखातून निघणारी शेवटची गोष्ट असावी” यासाठी मी आजपासूनच नामस्मरणाचा ‘नित्यनेम’ आणि त्याची गोडी मनाला लावली आहे का?

== == == == == == == 

श्लोक क्र. ८६ – – – 

मुखी राम विश्राम तेथेचि आहे ।

सदानंद आनंद सेऊनि राहे ।

तयावीण तो सीण संदेहकारी ।

निजधाम हे नाम शोकापहारी ।।८६।।

अर्थ : विश्राम म्हणजे विश्रांती कुठे आहे तर ज्याच्या मुखात रामनाम आहे तेथेच ! ज्याच्या मुखी रामनाम आहे असा मनुष्य अखंड आनंदाचे सेवन करीत असतो. रामनामाशिवाय अन्य काही करणे म्हणजे व्यर्थ शिणवणे आणि संदेह उत्पन्न करणारे आहे. नाम हेच निजधाम असून ते सर्व शोक हरण करणारे आहे.

(सदानंद – अखंडित आनंद, सीण – शीण/कष्ट/ताप, संदेहकारी – संशय निर्माण करणारा, शोकोपहारी – शोक/दुःख हरण करणारा)

विवेचन :  रामनामाचे महत्व वर्णन करताना समर्थ म्हणतात की ज्याच्या मुखी हे रामनाम आहे त्याला त्या ठिकाणी शांती, समाधान आणि आनंद या गोष्टी प्राप्त होतात. विश्राम म्हणजे विश्रांती. विश्राम शब्दातही ‘ राम ‘ आहे. आपण आनंद मिळावा म्हणून किंवा विश्रांती मिळावी म्हणून आयुष्यभर केवढी खटपट करत असतो ! घर, पत्नी, मुलेबाळे ही सर्व आनंदाची ठिकाणे आहेत असे आम्ही सांसारिक मानतो. तिथेच विश्रांती मिळते असे समजतो. विश्रांतीसाठी काही लोक निसर्गरम्य ठिकाणी जाऊन राहतात. व्यावहारिक दृष्ट्या हे सर्व बरोबरच आहे. परंतु ज्याला अध्यात्मसाधना करायची आहे, अशा व्यक्तीने अंतर्मुख होऊन या बाह्य गोष्टींकडे दुर्लक्षच करणे श्रेयस्कर.

कोणत्याही प्रापंचिक माणसाचा संसाराचा अनुभव संपूर्णपणे सुखद आहे असे होत नाही. तो तिथे सुख शोधू पाहतो पण क्षणिक सुखाचे काही क्षण सोडले तर त्याला दुःख आणि विषादाचीच प्राप्ती होते. मात्र ज्याच्या मुखात रामनाम आहे किंवा भगवंताचे नाम आहे असा माणूस कितीही विपरीत परिस्थिती असली तरी विचलित होत नाही. त्याचा आनंद सुखाने वाढत नाही किंवा दुःखाने कमी होत नाही. म्हणून तर भगवंताच्या नामात असलेले संत एका अनोख्या मस्तीत राहताना आपल्याला आढळतात. त्यांच्या मुखावर तेज असते, ते अंतर्यामी असणाऱ्या आनंदामुळे विलसत असते. हा आनंद अखंडित असतो. ‘ आनंदाचे डोही आनंद तरंग ‘ अशी संतांची अवस्था असते ती याचमुळे.

प्रापंचिक माणूस कधी कधी केवळ नामाने मला भगवंताची प्राप्ती खरंच होईल का अशी शंका घेतो. हा संशय वाढत गेला की नामस्मरणावरील त्याचा विश्वास कमी होऊ लागतो. तो पुन्हा विषयविकारात अडकतो. तिथे आनंद शोधू लागतो. पण त्याची ही खटपट व्यर्थ शिणवणारी असते. संत ज्ञानेश्वर महाराज म्हणतात,

” नामपरते तत्व नाही रे अन्यथा । वाया आणिक पंथा जाशील झणी । 

ज्ञानदेवा मौन जपमाळ अंतरी । धरोनि श्रीहरी जपे सदा ।।”

गोंदवलेकर महाराज म्हणतात, ” नामातच भगवंताचा वास आहे. ” म्हणून नाम हेच निजधाम आहे. आपल्याला स्वस्वरूप जाणून घ्यायचे असेल तर त्यासाठी नाम हेच साधन आहे. परमेश्वर वेदांनाही अगम्य आहे म्हणजे वेदही त्याला पूर्णपणे जाणू शकत नाहीत. तो आपल्या कल्पनेपलिकडे आहे. पण नामात त्याचा वास आहे. म्हणून आपण नाम घ्यावे. वैखरी, मध्यमा, पश्यन्ती आणि परा या वाणीच्या चार अवस्था आहेत. अखंड नामस्मरण करीत राहिल्याने एक वेळ अशी येते की आपले नाम परा वाणीपर्यंत पोहोचते. नामस्मरण अखंड सुरु राहते. देहाला सुखदुःखे जाणवत नाहीत. माणूस त्याच्यापलीकडे जातो. तो अखंड आनंदाचे सेवन करतो.

स्वसंवाद :: 

१. मी ज्या घर, कुटुंब किंवा निसर्गरम्य ठिकाणी ‘विश्रांती’ शोधत आहे, ती मला कायमची शांतता देऊ शकते का ?

२. “केवळ नामाने भगवंत मिळेल का?” अशा ‘संदेहकारी’ (संशयी) विचारांमुळे मी माझे नामस्मरण अर्धवट सोडून पुन्हा संसाराच्या चक्रात तर अडकत नाहीये ना ? 

३. माउलींनी हरिपाठात म्हटल्याप्रमाणे, “वाया आणिक पंथा जाशील झणी” हे ठाऊक असूनही माझे मन इतर निरर्थक मार्गांवर का भटकत असते ? 

४. माझे नामस्मरण केवळ वरवरच्या ‘वैखरी’ वाणीत सुरू आहे, की ते माझ्या अंतर्मनाचा ठाव घेऊन ‘परा’ वाणीपर्यंत पोहोचण्यासाठी मी प्रयत्नशील आहे?

– क्रमशः श्लोक श्लोक ८५  आणि ८६ 

© श्री विश्वास देशपांडे

चाळीसगाव

प्रतिक्रियेसाठी ९४०३७४९९३२

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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