हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ४२८ ☆ व्यंग्य – ऊँट के मुँह में जीरा ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४२८ ☆

?  व्यंग्य – ऊँट के मुँह में जीरा ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

ऊँट के मुँह में जीरा डालने से न ऊँट का पेट भरता है, न जीरे की ही प्रतिष्ठा बढ़ती है। पर हमारे देश में यह व्यवस्था का स्थायी चरित्र बन चुका है। जहाँ देखिए, वहीं जीरे बाँटे जा रहे हैं और ऊँट मुस्कुराते हुए भूखे रहने का अभ्यास कर रहे हैं।

सरकार हर 6 माह में मंहगाई राहत  की घोषणा करती है, । कर्मचारी पूछता है, कितना? जवाब आता है, इतना कि समाचार की हेडलाइन बन जाए, मगर जेब की सिलवट भी न बदले। यानी ऊँट के मुँह में जीरा।

 लेखक को वर्षों की तपस्या , प्रकाशक की मिन्नत , जोड़ तोड़ के बाद पुरस्कार घोषित होता है। पुरस्कार राशि देखकर लेखक भावुक हो गया। इसलिए नहीं कि रकम अधिक थी, बल्कि इसलिए कि यात्रा भत्ता उससे महँगा था । सम्मान का शॉल इतना बड़ा कि उसमें पूरा लेखक लिपट जाए, लेकिन लिफाफा इतना हल्का कि हवा भी उसे उड़ा ले जाए। साहित्य ने फिर कहा, “सम्मान अमूल्य होता है।” लेखक मन ही मन बोला, “हाँ, इसलिए उसका मूल्य कोई नहीं देता।”

आजकल संस्थाएँ भी जीरा वितरण अभियान चला रही हैं। पाँच सौ रुपये का मानदेय देकर लिखती हैं, “आपका अमूल्य सहयोग मिला।” अमूल्य सहयोग का मूल्य पाँच सौ! लगता है शब्दकोश भी अब महँगाई से डर गया है।

ज्यादा साहित्य प्रेमी आयोजक अपनी इज्जत बचाने के लिए स्वयं ही मानदेय को पत्रम पुष्पम लिख देते हैं, या सुदामा के चावल कहकर उसे थोड़ा ललित टच दे कर अपनी झेंप पता नहीं किससे मिटा लेते हैं।

डिजिटल दुनिया ने तो जीरे को और आधुनिक बना दिया है। घंटों का वेबिनार, दर्जनों स्लाइड, अंत में धन्यवाद और एक ई-प्रमाणपत्र।

प्रमाणपत्र डाउनलोड करते-करते बिजली का बिल ज़्यादा आ जाए तो आयोजक की आत्मा प्रसन्न हो जाती है कि ज्ञान का प्रसार सफल रहा।

शिक्षा में भी यही हाल है। बच्चों से कहा जाता है, बड़े सपने देखो। फिर स्कूल की लाइब्रेरी में तीन किताबें और उन पर चार ताले। खेलो, आगे बढ़ो, मगर मैदान पार्किंग बन चुका है। सपनों का ऊँट दौड़ना चाहता है, व्यवस्था उसे जीरा चबाने का प्रशिक्षण दे रही है।

महँगाई सबसे बड़ी जीरा विशेषज्ञ है। वेतन बढ़ा दो प्रतिशत, खर्च बढ़ा बीस प्रतिशत। फिर अर्थशास्त्री बताते हैं कि आपकी आय में वृद्धि हुई है। सचमुच हुई है, कैलकुलेटर पर, जेब में तो वही पुराना ऊँट बैठा जुगाली कर रहा है।

सोशल मीडिया ने इस मुहावरे को लोकतांत्रिक बना दिया है। किसी ने एक पौधा लगाया, सौ सेल्फियाँ खिंच गईं। किसी ने दो किताबें दान कीं, पचास पोस्ट लिख दीं। काम जीरा, प्रचार ऊँट। एक दर्जन केले मरीजो में बांटकर पुण्यात्मा बन कर ऊंट की तरह अस्पताल से निकलते नेता जी की फोटो अखबार में देखी ही होंगी ।

हम सब भी कहीं न कहीं इस खेल के हिस्सेदार हैं। रिश्तों में समय नहीं, लेकिन इमोजी भरपूर। पड़ोसी की खबर नहीं, मगर “टेक केयर” का संदेश तुरंत पहुँच जाता है। संवेदनाएँ भी अब इंस्टेंट जीरे की पुड़िया बन गई हैं। व्हाट्सएप पर ज्ञान त्वरित फॉरवर्ड कर देते हैं, किंतु अमल में नहीं लाते ।

दरअसल समस्या जीरे की नहीं, ऊँट की भूख को समझने की है। भूख बड़ी हो और समाधान प्रतीकात्मक, तो व्यंग्य अपने आप जन्म लेता है। समाज को रोटी चाहिए, हम उसे रिबन काटकर आशाई भरोसा परोस देते हैं। लेखक को सम्मान के साथ श्रम का मूल्य चाहिए, हम उसे स्मृति-चिह्न थमा देते हैं। नागरिक को सुविधा चाहिए, हम उसे घोषणा दे देते हैं।

अंत में लगता है कि इस मुहावरे का संशोधित संस्करण लिख देना चाहिए, “ऊँट अब जीरा नहीं माँगता, उसे इतना अनुभव हो गया है कि वह पहले लिफाफे का वजन तौलता है।”

और हमारे समय का सबसे बड़ा व्यंग्य यही है कि जीरा बाँटने वाले स्वयं को अन्नदाता समझते हैं।

 ☆

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

लंदन प्रवास पर

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

 

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # ३०८ ☆ राकेश चक्र के स्वास्थ्य सम्बन्धी दोहे… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘चक्र’

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मान, बाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान  के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंत, उत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत। 

आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।

आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # ३०८ ☆ 

☆ राकेश चक्र के स्वास्थ्य सम्बन्धी दोहे …  ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

☆

जीवनचर्या साध ले, रहना है यदि स्वस्थ।

मनमानी की बावरे, रोग बढ़ें मद मस्त।।

* 

अलमुनियम के पात्र में, जो भी भोज पकायं।

रोग बढ़ें तन बावरे, मूरख समझ न पायं।।

 *

सूर्योदय की धूप में, ले तू मित्र नहाय।

दही, पनीर, सब तेल से, अस्थि सबल हो जाय।।

 *

नर्व टॉनिक बी ट्वेल्व है, भोग अंकुरित अन्न।

पालक, सेव , अनार में, मिलें विटामिन टन्न।।

 *

चीनी, नमक, रिफाइंड से, रह ले प्यारे दूर।

यदि ना चेता बाबरे, आएँ रोग हुजूर।।

 *

रक्त चाप उनका बढ़े, करें कपट, मद, क्रोध।

वाणी मधु रख बावरे, जीवन बने सुबोध।।

 *

योग, ध्यान नियमित करो, तन-मन निर्मल होय।

सोए पैर पसार के, नहीं चैन भी खोय।।

 *

आपाधापी जो करें, रक्त चाप बढ़ जाय।

हार्ट फेल हो बावरे, जीवन कब बच पाय।।

 *

सोच समझ कर भोज कर, अल्ल-मल्ल मत खाय।

भूख लगे पर खाए नित, जीवन भर मुस्काय।।

 *

अति करता जो बावरे, ‘चक्र‘ सदा पछताय।

जिह्वा, मन को साध ले, जीवन भर सुख पाय।।

 *

घूँट-घूँट कर नीर पी, घूँट-घूँट कर दूध।

चबा-चबा कर भोज कर, बढ़े पेट ना गूद।।

 *

समय सोय से जाग ले, रहना है यदि स्वस्थ।

योग, सैर कर बावरे, यही मंत्र है मस्त।।

 *

मोबाईल, टीवी का, जो करते दुरुपयोग।

जो भी देखें लेट के, भोगें फिर दुर्योग।।

 *

रात रतजगा जो करें, रहते हैं अस्वस्थ।

मोबाइल में डूबकर, करें स्वयं को त्रस्त।।

 *

सब कुछ अति का हो रहा, गर्मी हो या शीत।

मोबाइल में डूबकर, खत्म हो रही प्रीति।।

☆

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश के नवगीत # १५८ ☆ कितना शेष है चलना ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “कितना शेष है चलना” ।)

✍ जय प्रकाश के नवगीत # १५८ ☆

☆ कितना शेष है चलना ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

☆

फिर समय ने हाँक दी

गाड़ी उमर की

और कितना शेष है चलना।

बोझ दिन का उठाए

हम रात भर जागे

स्वप्न आँखों में लिए

बुनते रहे धागे

भोर ने फिर खोल दी

खिड़की ख़बर की

साँझ तक बस स्वयं को छलना।

यादें सब ठहर गईं

आइनों के दर पर

प्रतिबिंबित होता है

चेहरों वाला घर

छतों के झरोखे से

झाँकते शहर की

खुली हुई हर किताब पढ़ना।

रोशनी के पृष्ठ पर

अंधकार व्याप्त

सुलगते हैं हाशिए

संभावना समाप्त

बाँच रही हैं रातें

इबारत सफर की

सूरज का भी तय है ढलना।

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १६५ ☆ चल रही राह ऐसी कुछ दुनिया… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “चल रही राह ऐसी कुछ दुनिया…“)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १६५ ☆

✍ चल रही राह ऐसी कुछ दुनिया… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे  ☆

☆

ख़त्म होगी मेरी सज़ा कब तक

ज़िंदगी की करूँ दुआ कब तक

* 

 दर्दे-दिल दूर करने पी तो लूँ

रंग लाएगी ये दवा कब तक

 *

 हार मानी नहीं अभी मैंने

तू करेगा ग़ज़ल-सरा कब तक

 *

रह गुज़र ज़ीस्त की थका डाली

जिस्म अपना निचोड़ता कब तक

 *

मैं जलाता ही जा रहा दीपक

चल बुझाती है तू हवा कब तक

 *

चल रही राह ऐसी कुछ दुनिया

आख़िरश रुकना ज़लज़ला कब तक

 *

रंगे ज़िद्दत में जी रहा है तू

ज़ीस्त का समझे फ़लसफ़ा कब तक

 *

बेवफ़ाई के घन चलाते अरुण

प्यार का घर रहे टिका कब तक

☆

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ हेमंत साहित्य # ६९ – समतल वृत्त… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – समतल वृत्त…।)

☆ हेमंत साहित्य # ६९ ☆

✍ समतल वृत्त… ☆ श्री हेमंत तारे  ☆

☆

पहले

एक हाथ थामता है,

और

दूसरा

सीखता है चलना।

 

फिर,

किसी दिन,

दोनों हाथों के बीच

दूरी नापता रहता है

समय।

 

बदलता है मौसम,

पर, स्नेह

बदलता नही नाम अपना

तथापि,

बदल जाता है

उच्चारण उसका।

 

मनुहार,

अब होती है उँगली पकड़कर

यदा- कदा

पर

होती है नियमित

मौन रहकर।

 

अपेक्षाएँ

छायाओं की तरह

बदलती है कद अपना

और

हो लेती है

लम्बी- नाटी

जब, बह रही हो बयार जैसी

 

फिर एक दिन

हो जाते हैं पहाड समाप्त

और

पैरों के तले

होती है धरती समतल

जहाँ

हो जाते हैं कद बराबर

 

तब,

धीमे पड़ते कदमों के पास

तेज़ चलने वाले कदम

अनायास

चल देते हैं आगे

छोड़कर,

सुस्त कदम पीछे

 

बस

एक वृत्त

चुपचाप होता है पूरा,

और

उसी क्षण

कहीं एक और वृत्त

हो जाता है आरम्भ।

 

रिश्ते चलते हैं यूँही

बिना घोषणा,

बिना विराम,

और अक्सर

बिना बताए

अपना अर्थ।

 

रिश्ते

बँधते नही उम्र से,

ये

थमते नही

बंद घडी के हाथों से।

वे बस

समय के वृत्त पर

बदलते रहते हैं जगह अपनी।

 

शायद,

प्रेम का,

यही

सबसे मौन

पर

शाश्वत रूप है।

☆

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ७७ ☆ आलेख – माह सितंबर और हिंदी… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक आलेख – “माह सितंबर और हिंदी…“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ७७ ☆

✍ आलेख ☆ माह सितंबर और हिंदी… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

लो सितंबर का महीना भी आ गया। सितंबर का महीना मतलब हिंदी का महीना। आम जनता पर तो कोई अंतर नहीं पड़ता परंतु केंद्रीय सरकारी कार्यालयों, राष्ट्रीयकृत बैंकों, उपक्रमों पर पड़ता है और वे हिंदी मय हो जाते हैं। विश्वविद्यालय, महाविद्यालय और हिंदी के प्रचार प्रसार में लगीं संस्थाओं में हिंदी के प्रति एक जागृति की भावना पैदा हो जाती है जो साल भर तक उन्हें अनुप्राणित करती रहती है। हिंदी के सुनामधन्य लेखक व कवि प्रतिस्फूर्त हो जाते हैं और स्वर्गीय लेखक कवि भी जीवन पा जाते हैं। क्या हिंदी और क्या हिंदीतर राज्य व क्षेत्र सभी हिंदीमय हो जाते हैं। किसी समारोह या कार्यक्रम में जिन्हें कोई स्थान नहीं मिल पाता वे हिंदी के साथ हो रहे छल के हिमायती बन जाते हैं। पर सितंबर माह हिंदी का माह तो होता ही है।

जहाँ जहाँ हिंदी विभाग हैं उनसे जुड़े अधिकारी, कर्मचारी, प्राध्यापक व अध्यापक स्फूर्ति से भर उठते हैं। सभी किसी न किसी हिंदी के विद्वान को बुला कर अपने संस्थान के अन्य अधिकारियों व कर्मचारियों में हिंदी के प्रति एक नया जोश भर देना चाहते हैं। कोई अपने संस्मरण सुनाते हैं हिंदी की गौरव गाथा व अधोमुखी गाथा के। वे अपने सामने उपस्थित वृंद को मोहित कर देना चाहते हैं।  ऐसा ही एक उदाहरण याद आता है। बात पुरानी है। हिंदीतर क्षेत्र में एक विश्वविद्यालय में हिंदी की एम.फिल के विद्यार्थियों को प्रोफेसर साहब पढा रहे थे कि हम हिंदी दिवस इसलिए मनाते हैं कि 1936 में कांग्रेस ने हिंदी को अपने एक अधिवेशन में राजभाषा के रूप में मान्यता प्रदान की थी।  जब उनसे पूछा गया कि संविधान में हिंदी को  भारत संघ की राजभाषा बनाया गया था लेकिन आप यह क्या बता रहे हैं तो वे प्रोफेसर साहब मायूस होकर बोले कि विभाग बना दिया, प्रयोजन मूलक हिंदी की उच्च शिक्षा भी प्रारंभ कर दी लेकिन उसका न तो कोई पाठ्यक्रम है और न ही पुस्तकें। हम जहाँ तहाँ से नोट्स बनाकर पढ़ाते हैं। संस्थान जो केवल सितंबर में हिंदी संबंधी कार्यक्रम करते हैं वे वक्ताओं से उच्च स्तर की नई बात जानना चाहते हैं।

वाक्पटु वक्ता वाह-वाही पाकर अपनी पीठ थपथपा लेते हैं और जो श्रोताओं को प्रभावित नहीं कर पाते वे ऐसे आमंत्रण से वंचित हो जाते हैं। ऐसा लगता है कि न वक्ता अपनी जिम्मेदारी समझते हैं और न ही श्रोता। हिंदी को मान्यता न देने के इच्छुक तो संविधान की ही आलोचना करते हैं कि संविधान में 15 वर्ष तक हिंदी को राजभाषा बनाया गया परंतु अंग्रेजी में काम करते रहने की छूट को अनिश्चितकालीन छूट दे दी तो हिंदी का राजभाषा पद अपने आप ही लुप्त हो गया। तमाम तर्क वितर्क प्रस्तुत होते हैं परंतु हिंदी को भारत संघ की राजभाषा के रुप में सम्मान नहीं देना चाहते। भारत संघ कोई स्थान या क्षेत्र विशेष नहीं है, संपूर्ण भारत है जिसमें सभी प्रदेश व क्षेत्र शामिल हैं और भारत का अस्तित्व उसके सभी मंत्रासय और उनसे संबद्ध अधीनस्थ कार्यालय, विभाग व उपक्रम आदि हैं चाहे वे कहीं भी स्थित हों।  हिंदीतर प्रदेशों में हिंदी को केंद्र सरकार की राजभाषा के रूप में सम्मान दिया जाएगा तो वहाँ की क्षेत्रीय भाषाओं का सम्मान कम नहीं होता।

विश्व के सभी देशों में हिंदी बोली समझी जाती है और वह विश्व में दूसरे स्थान पर है लेकिन भारत में हिंदीतर क्षेत्रों में हिंदी बोलना तक अपराध जैसा माना जाता है, ऐसा महसूस होता है।  विश्व में अनेक देश ऐसे हैं जहाँ राष्ट्रभाषा नहीं है और अनेक राजभाषाएं भी हैं, परंतु नफ़रत की भावना होने का कोई समाचार नहीं मिलता। भारत में यही अफ्सोस  जताया जाता है कि भारत की कोई राष्ट्रभाषा नहीं है। राजभाषा हिंदी को राष्ट्रभाषा बनने नहीं दिया जाता और राष्ट्रभाषा चाहते भी हैं।

प्रौद्योगिकी, कंप्यूटरीकरण और ए.आई. ने विश्व में भाषायी अंतर बहुत कम कर दिया है और एक भाषा न जानने वाला भी उस भाषा में काम कर सकता है। अब जरूरत है हर भाषा के प्रति प्रेम की। फिर भी जिस तरह विश्व के सभी देशों में भारत की भाषा हिंदी मानी जाती है वैसे ही भारत में भारत संघ की राजभाषा को हर नागरिक द्वारा  माना जाए और उसे केंद्र सरकार की राजभाषा के रूप में सम्मान दिया जाए तो हिंदी को संविधान सम्मत स्थान व सम्मान अवश्य प्राप्त होगा। हिंदी का उत्थान चाहने वाले विद्वानों व संस्थाओं के प्रयासों को सम्मान दिया जाए।  विश्व के हर देश में हिंदी का प्रचार प्रसार व उसका उत्थान करने वाली संस्थाओं व उनसे जुड़े विद्वानों को हृदय से सम्मान दिया जाए। फिर केवल सितंबर माह ही हिंदी मय नहीं होगा, पूरा वर्ष हिंदी मय होगा।

☆

© डॉ सत्येंद्र सिंह

एम.ए. विद्यावाचस्पति(मानद)

दिनांक 28 मार्च, 2026

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # १२७ – लौट आना, मेरे पंखों के साथी… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – लौट आना, मेरे पंखों के साथी।)

☆ लघुकथा # १२७ – लौट आना, मेरे पंखों के साथी ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

साँझ नदी के जल पर धीरे-धीरे उतर रही थी। आकाश की आखिरी सुनहरी किरणें लहरों पर काँप रही थीं। पक्षियों के झुंड अपने घोंसलों की ओर लौट रहे थे, मगर नीर अब भी उसी किनारे पर अकेला बैठा था।

कभी इसी जगह पिहू उसके पास आकर कहती थी— “शाम चाहे कितनी भी लंबी हो, तुम मेरा इंतज़ार करना।”

नीर ने उस वाक्य को जीवन बना लिया था।

अचानक पीछे से धीमी-सी आवाज़ आई—“नीर…”

उसका हृदय जैसे एक पल को रुक गया।

वह पलटा।

सामने पिहू थी—कमज़ोर, थकी हुई और एक घायल पंख को समेटे हुए।

नीर कुछ क्षण उसे देखता रहा। फिर उसकी आँखें छलक उठीं।

“पिहू… तुम?”

पिहू ने काँपते स्वर में कहा—

“लौटना तो हर दिन चाहती थी… मगर पंखों ने साथ नहीं दिया।”

नीर उसके पास गया और अपना पंख उसके घायल पंख पर रख दिया।

“मैंने तुम्हारा इंतज़ार किया।”

पिहू की आँखों से आँसू बह निकले—

“मुझे विश्वास था।”

नीर ने पूछा—

“कैसे?”

पिहू ने नदी की ओर देखते हुए कहा—

“क्योंकि हर शाम डूबते सूरज में मुझे तुम्हारी प्रतीक्षा दिखाई देती थी।”

कुछ पल दोनों मौन रहे।

फिर पिहू ने धीरे से पूछा—

“नीर, अगर मैं अब कभी उड़ न सकी तो?”

नीर ने उसके पंख को सहलाते हुए कहा—

“तो मैं तुम्हारे साथ चलूँगा।”

“और अगर मैं चल भी न सकी?”

“तो यहीं बैठकर तुम्हारे साथ साँझ देखूँगा।”

पिहू ने अपना सिर उसके पंख पर रख दिया।

उस क्षण नीर को लगा—वर्षों से जिस लौटने की प्रतीक्षा थी, वह केवल पिहू का लौटना नहीं था; वह उसके विश्वास का लौटना था।

सूरज डूब चुका था।

नदी अँधेरी हो रही थी, मगर दोनों के बीच वर्षों बाद एक उजाला जन्म ले चुका था।

कुछ प्रेम कहे नहीं जाते, बस प्रतीक्षा में जीवित रहते हैं।

और जब कोई लौट आता है, तो पता चलता है—सच्चा अपनापन दूरी से नहीं, विश्वास से बँधा होता है।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कादम्बरी # १६० – बुन्देली दिवस विशेष – ”तुम धोरखा धरदारी बारे” ☆ आचार्य भगवत दुबे ☆

आचार्य भगवत दुबे

(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे। 

आज प्रस्तुत हैं बुन्देली कविता – “तुम धोरखा धरदारी बारे“।)

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १६० ☆

☆  बुन्देली कविता – “तुम धोरखा धरदारी बारे“ ☆ आचार्य भगवत दुबे ✍

☆

तुम धोरखा धरदारी बारे 

हम यारों की यारी बारे 

* 

तुम नइ कविता, और इतै हम 

राई, करमा, गारी बारे 

 *

हम हैं बरसा की बौछारें 

तुम दंगा, चिन्गारी बारे 

 *

तुम हौ स्वर्ण भसम के आदी 

हम भूखे बीमारी बारे 

 *

हम हैं पेड़, छाँव, फल देउत 

तुम हौ बका, कुल्हारी बारे 

 *

तुमइ नामवर, मुक्तिबोध तुम 

हम रसखान, बिहारी बारे 

 *

तुम्हें चाउने दारू, गाँजा 

‘भगवत’ पान-सुपारी बारे

☆

© आचार्य भगवत दुबे

82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # २३२ – बुन्देली दिवस विशेष – सच्चई-मुच्चई लड़वे ठाँढे़… ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “बुन्देली गीत – सच्चई-मुच्चई लड़वे ठाँढे़…”। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २३२ ☆

☆  बुन्देली गीत – सच्चई-मुच्चई लड़वे ठाँढे़… ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

☆

सच्चई-मुच्चई लड़वे ठाँढे़,

जरा-जरा सी बातन में ।

धज्जी खें तो साँप बता रये,

जरा-जरा सी बातन में ।

*

जी खों देखो हाँक रहो है,

ज्ञान बघारें साँचन में ।

इनखों तो भूगोल रटो है,

झूठी-मूठी बातन में ।

सच्चई-मुच्चई लड़वे ठाँढे़,

जरा-जरा सी बातन में ।

*

धरम के पंडा सबई बने हैं,

मंदिर, मस्जिद, गिरजा में।

जी खों देखो राह बता रये,

छोटी-ओटी बातन में।

सच्चई-मुच्चई लड़वे ठाँढे़,

जरा-जरा सी बातन में ।

*

बऊ-दद्दा ने पढ़वे भेजो,

बडे़-बडे़ कॉलेजन में ।

बे तो ढपली ले कें गा रये,

उल्टी-टेढ़ी रागन में।

सच्चई-मुच्चई लड़वे ठाँढे़,

जरा-जरा सी बातन में ।

*

आजादी बे कैसी चाहत,

कौनऊँ उनसे पूछो भाई।

पढ़वो-लिखवो छोड़कें भैया ,

धूल झोंक रहे आँखन में।

सच्चई-मुच्चई लड़वे ठाँढे़,

जरा-जरा सी बातन में ।

*

पढ़वे खें कालेज मिलो है,

रहवे खों कोठा भी दे दये।

पढ़वे में मन लगत है नईयाँ,

जोड़-तोड़ की बातन में ।

सच्चई-मुच्चई लड़वे ठाँढे़,

जरा-जरा सी बातन में ।

*

नेता सबरे कहत फिरत हैं,

हम तो जनता के सेवक हैं।

जीत गए तो पाँच बरस तक,

घुमा देत हैं बातन में।

सच्चई-मुच्चई लड़वे ठाँढे़,

जरा-जरा सी बातन में ।

*

राजनीति में झूठ-मूठ की ,

खबर छपीं अखबारन में ।

नूरा-कुश्ती रोजइ हो रही,

गली-मुहल्लै आँगन में।

सच्चई-मुच्चई लड़वे ठाँढे़,

जरा-जरा सी बातन में ।

*

कोनउ नें कओ सुनरै भैया

तोरो कान है कऊआ ले गओ।

अपनों कान तो देखत नैयाँ,

दौर गये बस बातन में।

सच्चई-मुच्चई लड़वे ठाँढे़,

जरा-जरा सी बातन में ।

धज्जी खें तो साँप बता रये,

जरा-जरा सी बातन में ।

☆

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ४२७ ☆ यात्रा संस्मरण – लंदन डायरी – लंदन के घरों की छत पर उल्लू और दरवाजे पर सिंह ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४२७ ☆

?  यात्रा संस्मरण – लंदन डायरी – लंदन के घरों की छत पर उल्लू और दरवाजे पर सिंह ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

लंदन में चलते हुए मेरी एक आदत बन गई है। सड़क पर चलते हुए अब मैं केवल सामने नहीं देखता, कभी ऊपर भी देखने लगता हूं। यह आदत इस शहर ने ही डाली है।

किसी पुराने भवन की खिड़की के ऊपर अचानक कोई पत्थर का चेहरा दिखाई दे जाता है। किसी दरवाजे के दोनों ओर दो छोटे सिंह बैठे मिल जाते हैं। कहीं छत के किनारे कोई पक्षी पंख समेटे बैठा है और कहीं भवन की दीवार पर कोई विचित्र सा जीव मानो सदियों से आने जाने वालों को देख रहा हो।

पहले मुझे लगता था कि यह सब वास्तुशिल्प की सजावट भर है। लेकिन थोड़ा खोजने पर पता चला कि लंदन के इन पत्थर और धातु के जीवों की भी अपनी एक भाषा है।

मिसाल के लिए सिंह।

लंदन में सिंह केवल चिड़ियाघर में नहीं मिलते। वे भवनों की रखवाली भी करते हैं। Bank of England की वास्तुकला में सिंहों की उपस्थिति को शक्ति का प्रतीक माना गया है और उन्हें बुरे इरादों से रक्षा करने वाली छवि से भी जोड़ा गया है। वहां सिंह दरवाजों, दीवारों और भवन के भीतर तक दिखाई देते हैं। उसी भवन में उल्लू भी हैं, जिन्हें ज्ञान और विवेक का प्रतीक माना गया है।

यहां एक तथ्य खास तौर पर ध्यान खींचता है। सिंह लंदन या ब्रिटेन के जंगलों का स्वाभाविक प्राणी नहीं है। ब्रिटेन में सिंह कभी जंगली पशु के रूप में नहीं रहे। फिर भी ब्रिटिश प्रतीक संसार में सिंह की उपस्थिति इतनी गहरी है कि वह राजसत्ता, शक्ति, साहस और संरक्षण का मानो स्वाभाविक प्रतीक बन गया है। शायद इसी कारण लंदन की इमारतों पर पत्थर के सिंह इतने सहज दिखाई देते हैं, जैसे वे इस शहर के पुराने निवासी हों। Bank of England स्वयं सिंह को शक्ति का प्रतीक और बुरे इरादों से रक्षा करने वाली स्थापत्य छवि के रूप में बताता है।

अर्थात भवन भी शायद कह रहा होता है, बाहर से मजबूत दिखो पर भीतर से समझदार रहो।

लंदन में सिंहों की कहानी इससे भी पुरानी और रोचक है। Trafalgar Square में Nelson’s Column के नीचे बैठे चार विशाल कांस्य सिंहों को Sir Edwin Landseer ने बनाया था और 1867 में उन्हें वहां स्थापित किया गया। उनकी भूमिका केवल सौंदर्य बढ़ाने की नहीं, बल्कि Nelson की स्मृति की रक्षा करने वाले प्रहरी जैसी कल्पित की गई।

Oxford Street के पास Stratford Place के प्रवेश द्वार पर सिंह की मूर्ति लगी है। अठारहवीं शताब्दी में बने इस परिसर के प्रवेश पर सिंहों की मौजूदगी मानो आने वाले को बता रही थी कि भीतर कोई साधारण जगह नहीं, एक विशिष्ट आवासीय संसार है।

और फिर है South Bank Lion,

कभी यह सिंह Lambeth की Lion Brewery की छत के ऊपर बैठकर Thames की ओर देखता था। 1837 में William Frederick Woodington ने इसे Coade Stone में बनाया था। Brewery खत्म हुई, भवन भी चला गया, लेकिन सिंह बचा रहा। वह लंदन में इधर से उधर घूमता हुआ अंततः Westminster Bridge के पास पहुंच गया। आज वह Grade II* listed ऐतिहासिक मूर्ति है।

एक सिंह ने मानो नौकरी बदल ली, लेकिन शहर नहीं छोड़ा।

उल्लुओं की कहानी कुछ और दिलचस्प है।

Southwark में एक पुराने मकान की ऊपरी मंजिल की दीवार पर एक उल्लू और एक बिल्ली की छोटी मूर्तियां लगी हैं। स्थानीय तौर पर यह जगह “Owl and the Pussy-Cat” house के नाम से जानी जाती है। इन मूर्तियों का वास्तविक कारण आज भी निश्चित रूप से ज्ञात नहीं है। अनुमान लगाया जाता है कि शायद इनका संबंध Edward Lear की प्रसिद्ध कविता से हो, लेकिन यह भी केवल संभावना है।

मुझे लंदन की यही बात अच्छी लगती है। यहां हर चीज का अर्थ जरूरी नहीं कि एक ही हो।

कभी मूर्ति वास्तुशिल्प है, कभी प्रतीक, कभी इतिहास की बची हुई निशानी और कभी किसी व्यक्ति की निजी शरारत।

सबसे बड़ी बात आम लोग भी अपने घरों में ये प्रतीक मूर्तियाँ लगवाये हुए हैं।

हमारे यहां भी घरों के बाहर हाथी, सिंह, घोड़े, हंस और देवी देवताओं की प्रतिमाएं दिखाई देती हैं। उनके पीछे अक्सर धार्मिक विश्वास, वास्तु संबंधी धारणाएं या शुभता की कामना होती है। लंदन में भी प्रतीक हैं, लेकिन उनका अर्थ अधिक बार इतिहास, शक्ति, पेशे, कला, स्मृति या निजी रुचि से जुड़ता दिखाई देता है।

और शायद इसीलिए यहां चलते हुए ऊपर देखना भी एक तरह का इतिहास पढ़ना है।

नीचे फुटपाथ पर आज का लंदन चल रहा है। लोग मोबाइल पर बातें कर रहे हैं, बसें आ जा रही हैं, साइकिलें निकल रही हैं, कोई टु गो कप कॉफी लेकर जल्दी में है।

और ठीक उनके ऊपर, किसी पुराने भवन की छत पर बैठा एक पत्थर का उल्लू चुपचाप सब देख रहा है।

वह न मोबाइल देखता है, न घड़ी।

सिंह भी वहीं है, अपनी जगह अडिग।

सदियों से शायद उसका काम ही यही है, शहर को मूक रहकर देखते रहना।

मैं सोचता हूं, लंदन के भवन केवल ईंट, पत्थर और शीशे से नहीं बने हैं। उनके चेहरे भी हैं, कान भी हैं, आंखें भी हैं और कभी कभी छत पर बैठे हुए उल्लू भी।

बस फर्क इतना है कि लंदन की इन मूर्तियों से दोस्ती करने के लिए आपको ऊपर देखना पड़ता है।इस शहर में इतिहास अक्सर संग्रहालय में बंद नहीं मिलता।कभी वह आपके सिर के ऊपर छत पर बैठा होता है।

 ☆

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

लंदन प्रवास पर

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

 

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