(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “2 जून रोटी समारोह ”।)
☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २६६ ☆
🌻लघुकथा🌻 2 जून रोटी समारोह ☆ श्रीमती सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆
एक शानदार होटल में बड़े – बड़े पोस्टरों में रोटी की सुंदर सुंदर तस्वीरें लगा दिखाई दिया। डीजे बजाये जा रहे थे। बढ़िया डेकोरेशन चमचमाते टेबिल कुर्सीयाँ और मदमस्त लोग।
सुरमई शाम और हल्की सी बारिश के बीच मौसम खुशनुमा हो चला। परिवार सहित लोग आते जाते दिखे।
जो आसपास से निकल रहे थे बस भिन्न- भिन्न सजी रोटियों की तस्वीरें देख ठिठक जा रहे थे।
एक महिला दो बच्चों को लिए धीरे- धीरे दरवाजे पर पहुंच गई।
नया होटल खुला है क्या?
एक जोरदार ठहाका–
किसी ने कहा — इसे कौन बुला लिया। इस सेलिब्रेशन में।
महिला ने फिर पूछा — यदि होटल नया है तो किफायती दाम में आज रोटी मिल जायेगी। थोड़े से पैसे है मेरे पास बच्चों का पेट भर जायेगा।
धक्का देते किसी ने कहा — यहाँ दो जून रोटी सेलिब्रेशन हो रहा है। रोटी नही मिलेगी।
दोनों बच्चे पोस्टर पर ललचाते हुए हाथ फेर रहे थे। उनका पसीना शायद दो जून की रोटी के लायक नही बहा था।
(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)
☆ आलेख # १७९ ☆ देश-परदेश – हमारे जीवन पर सोशल मीडिया के साइड इफ़ेक्ट ☆ श्री राकेश कुमार ☆
सोशल मीडिया अपने आप को समाज का बहुत बड़ा शुभचिंतक मानता है। इसकी पैरवी करने वाले तो ये तक कह देते हैं, कि “सोशल मीडिया ही समाज का वास्तविक आईना है”।
दिल को बहलाने के लिए ख्याल बुरा नहीं है, ग़ालिब! अलग अलग तरह के आईने भी आपकी शक्ल को विभिन्न आकारों में दिखा देते हैं। पतले व्यक्ति को मोटा और मोटे व्यक्ति को पतला बताने वाले आईने हमने भी बहुत देखें हैं।
आज प्रातःकालीन भ्रमण पर एक परिचित के घर के सामने से निकलते हुए, एक पेशे से सेवानिवृत वकील साहब मिल गए, उनके चाय के आग्रह को मना नहीं करते हुए, हम उनके घर चले गए।
उनकी पत्नी टीवी के सामने कापी पेन लेकर बैठी थी। वो बोली अभी दस मिनट सब शांत बैठे रहें, उसके बाद ही चाय की व्यवस्था करूंगी।
टीवी के किसी समाचार चैनल पर भविष्य वक्ता कुछ जानकारी दे रहे थे, वो कॉपी में लिखती जा रही थीं। वकील साहब भी अपनी डायरी में कुछ लिख रहे थे। दस मिनट बाद बड़ी कठिनाई के बाद काग़ज़ के छोटे से कप में एक बड़ी चम्मच की मात्रा के बराबर चाय प्राप्त कर, हम अपने होठ ही गीले कर पाए।
वकील साहब की पुत्री एक बड़े हॉस्पिटल में महिला चिकित्सक हैं। भाभी जी भविष्य वक्ता द्वारा “सिजेरियन ऑपरेशन” के लिए अच्छे समय की जानकारी नोट कर रही थी। उनकी पुत्री उस समय किए जाने वाले ऑपरेशन का अधिक/ विशेष चार्ज, वसूल सकें। वकील साहब भी मुकदमा दायर करने का सबसे बढ़िया समय कौन सा है, की जानकारी बार काउंसिल को प्रतिदिन देते है, ताकि वकील उस विशेष समय के लिए अतिरिक्त राशि फीस के नाम पर लूटी जा सके।
चाय के समय वकील साहब बोले, कल ही बिटिया की सगाई टूट गई है। हमें भी आश्चर्य हुआ, तब वो बोले लड़के वाले कहते है, किसी भी वकील की बेटी से विवाह नहीं करेंगे, वर्ना भोपाल वाली त्रिशा जैसा कुछ हो ना जाए। वो बहुत दुखी मन से बोले, समाज में लोग वकीलों से पारिवारिक संबंध जोड़ने से मना करने लगे हैं। आगे बोले पड़ोस में रहने से भी लोग डरते हैं। वकील के घर के आस पास जमीन भी तो सस्ती मिल जाती है।
बहुत देरी से मुंह में रखे हुआ गुटखा थूकने का समय आ गया है। इसलिए लेखनी को विराम देता हूँ।
(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया। वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – चिन्ताकुल…२।)
साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २८६ – चिन्ताकुल…२
ये बाढ़ / अनोखी है / अजब है
अछोर महत्वाकाँक्षाओं की
क्षुद्र स्वार्थी और
सर्वनाशी बाढ़
में
मनुष्य और प्रकृति
दोनों घिर गये हैं
गिर गये हैं
इरादे
आदमी के ।
हम / ढो रहे हैं
आजादी का दंभ
और आम आदमी
आज भी बेबस है, मजबूर है
चन्द्रमा भले पास आ गया हो
रोटी अभी भी दूर है
जाने कितने शिशुमन
दफन हो जाते है
किसी नदी के तट पर
या किसी स्कूल के अहाते में
बहुत कम जगह है
सुविधा के छाते में।
है
मेरे खाते में
जमा है
कुछ
घुटने चलती यादें
और कुछ असफल फरियादें
क्या करेंगें आप
और क्या करूँगा मैं
संकटों / यादों और फरियादों का
सिलसिला
अशेष है, असमाप्त है,
कविता अमर है
कविता समाप्त
है।
स्व डॉ. राजकुमार “सुमित्र”
साभार : डॉ भावना शुक्ल
112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश
≈ संस्थापकसंपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार, मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘जहाँ दरक कर गिरा समय भी’ ( 2014) कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत “मर्यादा को लाँघे था...”।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २८५ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆
☆ “मर्यादा को लाँघे था...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆
(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “बुझी बुझी आंखें…”।)
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता ‘ये दुनिया, ये दुनिया…‘।)
लंकेच्या रणभूमीवर ची ती काळ रात्र! नजर जाईल तिथे शवांचा खच पडलेला, रक्ताचे पाट वहाताहेत, आणि अशातच… चतुर्वेद, सहा उपनिषदे, आयुर्वेद यांचं संपूर्ण ज्ञान असलेला ज्ञानी, विश्रवा ऋषींचा आणि उच्च दानव कुळातील माता कैकसी चा पुत्र… दशानन… रावण… रक्तरंजित अवस्थेत, धराशायी होत मृत होऊन पडलेला. तिन्ही मुलं ही युद्धात मारली गेलेली.
पतीच्या आणि पुत्रांच्या मृत्युची वार्ता कानी येताच, जीवाच्या आकांताने, दु:खावेगाने वेडीपिशी होत धावत गेली रणभूमीवर! पतीच्या शवाजवळ बसली… शोकमग्न मंदोदरी च्या मुखातून शब्द बाहेर पडले…
राम विमुख अस हाल तुम्हारा,
रहा न को कुल रोवन हारा!
उठली दु:खावेगाने आणि आक्रंदन करीत विचारती झाली… ” कुठे आहे तो, ज्याने माझ्या पतीला मारलं?? “
तिला अंगुली निर्देशाने दाखविले आणि सांगितले गेलेल्या दिशेला ती गेली.
तिथे एका शीळेवर प्रभू श्रीरामचंद्र खाली मान घालून, दु:खी, उदास, हताश बसलेले. युद्धात झालेल्या जीव हानी ने किंकर्तव्यमूढ बसलेले. अचानक एक सावली दिसते पायाजवळ… लक्षात येते की कुणा स्त्री ची सावली आहे… लगेच उभे रहातात, वळून मोठ्या अदबीने म्हणतात, ” माते, प्रणाम ! कोण आहेस तू? “…….. मर्यादा पुरूषोत्तम राम तिच्या पुढ्यात, विनम्रपणे नतमस्तक झालेला… मंदोदरी ला परस्त्रीचे अपहरण करणा- या रावणाला हरविणा-याची खरी ताकद दिसली आणि कळली ही !! तिच्या पुढ्यात झुकून उभा होता… ब्रह्मा पुत्र, मांधाता ला आव्हान देणा-या, कुबेराला खाली आणणा-या, सा-या जगाला हरविणा-या रावणाला ठार मारणारा… श्रीराम!!! तिला तिच्या प्रश्नाचं उत्तर मिळतं. मर्यादा पुरूषोत्तमाच्या या… स्त्री च्या सावलीचं ही भान ठेवणा-या, पर स्त्री मातेसमान मानणा-या या पुरूषोत्तमाच्या उंची पुढे तिला… परस्त्रीचं अपहरण करून आणणारा तिचा लंकापती दशानन अगदीच थिटा वाटला. ती वरमून परतली.
मंदोदरी…. नित्य स्मरणीय अशा पंचकन्यांपैकी एक! पण ही येवढीच तिची ओळख नाही. याच्या पलिकडे ही तिच्या व्यक्तिमत्वाचे अनेक पैलू, कंगोरे आहेत जे अलक्षित राहिले आहेत. रामायण म्हणजे… राम, सीता, लक्ष्मण, हनुमान… हेच डोळ्यासमोर येतात लगेच! पण यां व्यतिरिक्त ही अशी व्यक्ती चित्रे आहेत ज्यांच्या बद्दल फारशी माहिती नाही अधोरेखित झाली. त्यातीलच एक आहे… रावणाची पत्नी मंदोदरी!!
मंदोदरी… असुरांचा राजा मयासुर आणि अप्सरा हेमा यांची कन्या. पुराणात तिच्या जन्माविषयी वेग वेगळ्या कथा आहेत. तरीही मान्यतेनुसार ती मधुरा नावाची शापित अप्सरांचे, जी बेडकीरूपातून पूर्व रूपात आल्यावर मयासुर आणि हेमा तिला दत्तक घेतात.
…. सुंदरता, बुद्धीमत्ता, आणि नैतिकता याचा अद्वितीय संगम म्हणजे मंदोदरी! अतिशय धर्मपरायण!! रावणाशी विवाह होऊन लंकेला येते आणि सोन्याच्या लंकेची महाराणी बनते. वेद, शास्त्र, विविध कला संपन्न असलेली मंदोदरी, अगदी ख-या अर्थाने…
अशी… षट्कर्मयुता कुलधर्म पत्नी होती. तिचा भविष्याचा ही अभ्यास होता. असं म्हणतात की ती रावणाशी बुद्धिबळाचा खेळ ही खेळत असे. बुद्धिबळाची सुरुवात तिनेच केली असं म्हंटलं जातं!
अशा या बुद्धी मान आणि भविष्य जाणणा-या मंदोदरी ला जेव्हा रावणाने सीताहरण केल्याचे कळते तेव्हा तिला अतिशय क्लेष होतात. पर स्त्री, तीही विष्णू चा अवतार असलेल्या प्रभु रामचंद्रांची पत्नी सीता… हिच्या विषयी असा काम आणि मोह भाव जागृत होऊन तिचं हरण करणा-या रावणाला विनाशकाले विपरीत बुद्धी सुचली आहे हे तिला लक्षात आले… रावणावर निरतिशय प्रेम आणि निष्ठा असलेल्या मंदोदरी ने त्याला वारंवार धर्माच्या मार्गावर चालण्यासाठी समजावले, सल्ला दिला. तिने लंकेची नीती आणि रावणाची चेतना शक्ती बनून राहण्याची सतत धडपड केली.
सीतेला सन्मानाने श्रीरामाकडे परत पाठविण्यातच लंका आणि लंकाधिपतीचं भलं आहे हे ती पुन:पुन्हा समजावत राहिली, विनवत राहिली…..
विनंती करी मंदोदरी|
वाया आणिली जानकी घरी|
*
लाज झाली तिहीं लोकी||
*
मज पाहता हे विवसी|
क्षय आणिला कुळासी||
अभिलाषिता पर सती|
हे तो नव्हे राजनीती|
ज्याते ध्यानी ध्याती योगी|
तो मज येतो भेटीलागी|
तया रामासी विन्मुख होणे|
जळो जीणे लाजिरवाणे||
– – संत नामदेव.
संत नामदेवांनी सुद्धा मंदोदरीच्या, रावणाला समजावण्याची, तिच्या पत्नी धर्माची, दखल घेतली आहे हे विशेष!! अधर्मात ही धर्म सांभाळण्याची पराकाष्ठा आणि निकराचे प्रयत्न करणा-या मंदोदरी चे पती प्रेम आणि विवेक ; रावणाच्या अहंकार आणि क्रोधापुढे हारलं!!
तिला पतीची हार, रक्तरंजित शेवट दिसत होता, पण तरीही या पतीला प्रेरित करणा-या, पतीची चेतना बनलेल्या समिधेचं तेज, सामर्थ्य, चेतना निस्तेज झाली, स्फुल्लिंग मंदावलं पतीच्या क्रोधाहंकाराच्या धगधगत्या होमकुंडापुढे!! आणि तिच्या नशिबी आलं ते एकटेपण!! एकटीने जळत रहाणं!!
…. जळो जिणे हे लाजिरवाणे!!…. हाच सल, हाच चटका, हाच डाग उरी घेऊन ही समिधा जळत राहिली!!
(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय डॉ कुन्दन सिंह परिहार जी का साहित्य विशेषकर व्यंग्य एवं लघुकथाएं ई-अभिव्यक्ति के माध्यम से काफी पढ़ी एवं सराही जाती रही हैं। हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहते हैं। डॉ कुंदन सिंह परिहार जी की रचनाओं के पात्र हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं। उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम एवं विचारणीय कथा – ‘अपना आकाश‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३३६ ☆
☆ कथा-कहानी ☆ अपना आकाश ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆
सुकुमार की नौकरी और कमाई अच्छी है। स्थानीय म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन में इंजीनियर है। अच्छी तनख्वाह के अलावा खासी ऊपरी आमदनी है। घर में उसके अलावा छोटा भाई दिनकर है, जो कॉर्पोरेशन में ही क्लर्क है। वह भी खाने पीने लायक कमा लेता है। एक छोटी बहन नंदिनी है, जो शादी के लायक हो रही है।
कमाई बढ़ाने के साथ सुकुमार की पत्नी शोभा को उड़ने की इच्छा होती है। अब इस घर में मन नहीं लगता। नया फर्नीचर, नये पर्दे लेने की इच्छा होती है। अपनी नर्सरी और लॉन बनाने की इच्छा होती है। यह भी इच्छा होती है कि मिलने जुलने वाले आएं तो उसका वैभव देखकर प्रभावित हों। मुख़्तसर यह कि वे सब इच्छाएं सिर उठाती हैं जो समृद्धि के साथ पैदा होती हैं। अपना अलग आकाश हो और उसमें परवाज़ भरने की पूरी स्वतंत्रता हो।
नंदिनी के विवाह की ज़िम्मेदारी सामने है, लेकिन सुकुमार और शोभा के लिए यह बड़ी अड़चन है। इस काम में ज़्यादा सहयोग देने के लिए अपनी इच्छाओं और आकांक्षाओं पर अंकुश लगाना पड़ेगा, अपने कुछ सपने स्थगित करने पड़ेंगे। इसलिए बेहतर यह है कि घर से जल्दी से जल्दी निकल जाया जाए। उसके बाद जो सहयोग बने, देकर मुक्ति पाई जा सकती है।
अब घर छोड़ने के लिए बहाने ढूंढ़े जा रहे हैं। जिसे घर छोड़ना ही है उसके लिए बहानों की क्या कमी? शोभा, सास और ननद को सुना कर अपने असंतोष को ज़ाहिर करती रहती है ताकि घर छोड़ने का मार्ग प्रशस्त किया जा सके। कभी बच्चों का स्कूल दूर होने का रोना रोया जाता है, कभी ज़रूरत के हिसाब से जगह कम होने की शिकायत की जाती है। सुना सुना कर परिवार वालों को उनकी विदाई के लिए मानसिक रूप से तैयार किया जा रहा है।
फिर ‘क्लाइमेक्स’ की तैयारी की जाती है। छोटी-छोटी बातों पर झगड़े किये जाते हैं, कभी ननद के द्वारा भाभी का साबुन इस्तेमाल कर लेने पर, कभी देवर द्वारा सब्ज़ी-भाजी न लाने पर। जिसे विवाद करना है उसके लिए मुद्दों की क्या कमी? सुकुमार ने बिना किसी को बताये एक घर किराये पर ले लिया था। जब सब तैयारी हो गयी तो शोभा ने एक दिन बात का बतंगड़ बनाकर घर सिर पर उठा लिया और फिर गुस्से के नाटक के साथ फटाफट घर छोड़ दिया। बात सिर्फ इतनी थी कि ननद ने उसके छोटे बच्चे को शरारत करने पर थप्पड़ लगा दिया था। घर से बाहर निकल कर शोभा को खूब राहत और खुशी महसूस हुई। अब उड़ान भरने के लिए सामने खुला आकाश है।
पिता के घर से निकल कर सुकुमार और शोभा अपना घोंसला सजाने में लग गये। नया फर्नीचर आया, नये पर्दे, नया फ्रिज। अब अपने और अपने बच्चों के लिए खाने पीने का सामान बेहिचक लाया जा सकेगा, किसी के साथ बांटने की समस्या नहीं रहेगी। शोभा के लिए साड़ी लाते वक्त मां या बहन का ख़याल उलझन पैदा नहीं करेगा। अब सुकुमार-शोभा को लगता कि उनका कोई वजूद है, उनकी भी कोई हस्ती है। परिवार के साथ रहने पर ऐसा गहरा संतोष, ऐसी तृप्ति कहां मिलती है?
परिवार से अलग होने पर सुकुमार के लिए कई बंदिशें भी ख़त्म हुईं। अब देर रात तक कहीं रुकने पर मां-बाप के परेशान सवालों का सामना नहीं करना पड़ेगा। पहले सुकुमार कभी-कभी दोस्तों के साथ थोड़ी शराब ले लेता था। अब लड़खड़ाने की हद तक भी पी जा सकती थी। शोभा से उसे डर नहीं लगता था क्योंकि उसने शोभा को समझा दिया था कि शराबख़ोरी अब हर ऊंचे समाज में आम है और बिना शराबख़ोरी ऊंचे समाज में गुज़र नहीं हो सकती।
इस सारे सुख के बावजूद शोभा को कभी-कभी अड़चन होती है। अब तबियत ख़राब होने पर भी बच्चों को स्कूल के लिए तैयार करने से लेकर सारे काम निपटाने पड़ते हैं। समय से खाना न मिले तो सुकुमार चिड़चिड़ाने लगता है। पहले अस्वस्थ होने पर सास और ननद से मदद मिल जाती थी। अब किसी का सहारा नहीं है। पड़ोसियों से सलाम-दुआ से ज़्यादा संबंध नहीं हैं। इन दिक्कतों के बावजूद शोभा के लिए अपनी गृहस्थी की मालकिन होने का सुख और गर्व बहुत बड़ा है। उस सुख के सामने सभी दिक्कतें छोटी पड़ जाती हैं।
अब सुकुमार और शोभा उस घर में मेहमानों की तरह जाते हैं। अब कोई ज़िम्मेदारी नहीं। अब माता-पिता, भाई-बहन के लिए थोड़ा बहुत जो कर दिया, उस पर कोई सवालिया निशान नहीं लगता। माता-पिता स्वाभिमानी हैं, वे बेटे बहू से कुछ मांगते नहीं। सुकुमार-शोभा जब उस घर में जाते हैं तो अपनी दिक्कतों का ऐसा दफ्तर खोलते हैं कि किसी दूसरे को अपना दुख प्रकट करने की हिम्मत नहीं होती।
सुकुमार अब रात को देर से सोता है और सवेरे देर से उठता है। पहले देर से और देर तक सोने पर पिताजी की बातें सुननी पड़ती थीं। अब रोकने वाला कोई नहीं। नये घर में आकर उसकी तोंद बढ़ गयी है। खर्च बढ़ने के साथ वह ऊपरी आमदनी के नये-नये साधन ढूंढ़ रहा है। आमदनी बढ़ने के साथ उसकी आदतें बिगड़ती जा रही हैं।
मुश्किल यह है कि सुख के घी में कभी न कभी मक्खी पड़ती ही है। कई दिनों से सुकुमार रात को देर से लौटता था और अक्सर वह नशे की हालत में होता था। शोभा उसका इंतज़ार करते-करते सो जाती थी। एक रात लौटते वक्त कॉलोनी के छोर पर सुकुमार का स्कूटर लुढ़क गया। ख़ासी चोट खाकर वह बेहोश हो गया। सौभाग्य से कॉलोनी के कुछ लड़कों की नज़र उस पर पड़ गयी। वे उसे लाद-फांद कर घर ले आये।
ज़िन्दगी में पहली बार शोभा को इतने बड़े संकट का सामना अकेले करना था। वह बदहवासी की हालत में थी। सुकुमार ख़ून से सना पलंग पर पड़ा था और दोनों बच्चे नींद में ग़ाफ़िल थे। सुकुमार के सिर और चेहरे में चोट थी। कमीज़ फट गयी थी और शरीर कई जगह से छिल गया था। कॉलोनी के लड़के भले थे, दौड़कर डॉक्टर को बुला लाये। डॉक्टर ने आंखों की जांच की, हाथ- पांव की दुरुस्ती देखी और घावों को साफ कर उनमें दवा लगायी। फिर कहा, ‘हेड इंजरी हो सकती है। इन्हें दो दिन के लिए किसी नर्सिंग होम में रख दीजिए। मैं चिट्ठी लिख देता हूं।’
अब और बड़ा संकट था। कॉलोनी के लड़के सुकुमार को नर्सिंग होम ले जाने के लिए तैयार थे, लेकिन शोभा के सामने समस्या यह थी कि कौन रात भर बच्चों के पास रहे और कौन सुकुमार के साथ नर्सिंग होम जाए। रात के बारह बज चुके थे और पूरी कॉलोनी नींद में डूबी थी। किसी परिवार से ऐसे संबंध नहीं बन पाये थे कि किसी को बच्चों की देखभाल के लिए बुलाया जा सके।
अंत में वही विकल्प चुनना पड़ा जो सबसे ज़्यादा भरोसेमंद था और जिसमें सबसे कम धर्मसंकट था। उसने ससुराल को फोन लगाकर सारी जानकारी दी।
खबर पाते ही ससुर, सास, ननद और देवर हाज़िर हो गये। शोभा को बड़ी देर के आत्मनियंत्रण के बाद रोने को कंधा मिला। परिवार के इन चारों सदस्यों को देखकर उसकी जान में जान आयी। अब न सुकुमार की देखभाल की चिन्ता रही, न बच्चों की देखभाल की। बड़ी देर से उसे जकड़े रखने वाला अकेलापन एक झटके में छंट गया।
ससुर को साथ लेकर वह सुकुमार को नर्सिंग होम ले गयी। कॉलोनी के लड़कों ने इसमें पूरी मदद की। नर्सिंग होम पहुंचने के बाद शोभा ने लड़कों को भरे दिल से विदा किया। नर्सिंग होम में जल्दी ही सुकुमार की हालत काबू में आ गयी, लेकिन अड़तालीस घंटे ऑब्ज़र्वेशन में रखना ज़रूरी था।
थोड़ी देर में सुकुमार को नींद आ गयी और शोभा ज़मीन पर उसकी बगल में कंबल बिछाकर सो गयी। सुकुमार के पिता बाहर बरामदे में सोने चले गये।
सवेरे सुकुमार पूरी तरह होश में था। ससुर को उसकी देखभाल के लिए छोड़कर शोभा घर आ गयी। उस दिन बच्चे स्कूल नहीं गये थे। वे बुआ और दादी से मां और पिता की अनुपस्थिति के बारे में पूछताछ में लगे थे। दादी और बुआ उन्हें गोलमोल जवाब देकर बहला रही थीं।
घर आकर शोभा ने देवर को चाय नाश्ता लेकर नर्सिंग होम भेज दिया। अचानक आये संकट ने उसके स्नायुओं को बिल्कुल थका दिया था। वह पस्ती की हालत में पलंग पर लेट गयी। थकान ज़रूर थी, लेकिन अब चिन्ता दूर हो गयी थी।
पलंग पर आंखें बन्द किये लेटी शोभा भीतर से बच्चों जैसी बेचारगी महसूस कर रही थी। उसे किसी ऐसे हमदर्द की ज़रूरत महसूस हो रही थी जो उसके सिरहाने बैठकर उसके उद्विग्न माथे पर हाथ रखे और उसे सुकून दे। वह बीच बीच में आंखें खोलकर बड़ी उम्मीद से अपनी सास की तरफ देख रही थी। उधर सास, उसकी हालत से बेख़बर, बच्चों को नहलाने धुलाने में मशगूल थी।
(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।
आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– अनिवार्य निर्णय…” ।)
~ मॉरिशस से ~
☆ कथा कहानी ☆ गद्य क्षणिका # १०८ — अनिवार्य निर्णय —☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆
एक सुनी सुनायी कहानी पर मेरा विश्वास होने से उसे लिख रहा हूँ ताकि वह सुनी सुनायी न रह कर शब्दों के घेरे में सदा के लिए अडिग रह जाए। धरती रहने से मनुष्य भी तो रहेंगे। यह कहानी मनुष्य के साथ रहे और रह कर उन्हें विवेचन के लिए विवश करे कि किस तरह उन्हें ठगा जाता है और वे होते हैं कि ठगी को शायद भगवानी प्रसाद मान कर स्वीकार कर लेते हैं। नीच अधम साधु नदी के किनारे बैठ कर अपने पाँव धो रहा था। वह आत्म केन्द्रित भाव से इस चिंतन में पड़ा हुआ था कि क्या लोगों से विश्वासघात करने के लिए वह पैदा हुआ था? तभी नदी में एक विशाल धारा प्रकट हुई जो उसे बहा ले गयी। वक्त को यही इंतजार था वह किसी मोड़ पर कमजोर तो पड़े। अन्यथा भक्तों के घेरे में वह बहुत बलिष्ठ होता था।