हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – सतपुड़ा वन भ्रमण – भाग – ३० ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – सतपुड़ा वन भ्रमण – भाग- ३० ☆ श्री सुरेश पटवा ?

6.सतपुड़ा वन भ्रमण

तवा नर्मदा की सबसे लंबी सहायक नदी है, जिसकी लंबाई 117 किमी है। यह उद्गम से उत्तर और पश्चिम में बहते हुए होशंगाबाद जिले के बांद्रा भान गांव में नर्मदा में मिल जाती है। सारणी के पहाड़ों, जहां से तवा नदी निकली है, से बांद्राभान की दूरी अंदाज़न 100 किलोमीटर है लेकिन तवा नदी का बहाव 117 किलोमीटर कैसे हो सकता है? क्यों नहीं हो सकता? नदी रसिक आदमियों की तर्ज़ पर सीधी नहीं बल्कि टेढ़ी-मेढ़ी चाल से चलती है। आख़िर नदी भी झरनों से रस समेटते और जीवों को रसारस करते उद्गम से गंतव्य तक की यात्रा तय करती है। इस कारण उसकी वास्तविक लम्बाई सतही लम्बाई से अधिक होती है, जैसे मूर्ख व्यक्ति की ज्ञान पूर्ण बातें घुमावदार शब्दों से खिंचकर बहुत लम्बी होती जाती है।

श्री गोपाल ने दार्शनिक अन्दाज़ में बोलना प्रारम्भ किया- देनवा अपने पिता के घर सतपुड़ा से अपने आँचल में अमृत कलश भर-भर कर लाती है। अनादि काल से उसके उद्गम से लेकर तवा में समाहित होने तक उसके दामन में और आसपास जल-जंगल-ज़मीन पर जीवन-मृत्यु के अद्भुत खेल चलते आए हैं। मृत्यु के आश्चर्यजनक खेल को जितने नज़दीक से उसने देखा है और कोई नहीं देख पाता। मृत्यु-जीव का खेल शिकार-शिकारी सा होता है। मौत रूपी शिकारी के पंजे में जब जीव रूपी शिकार आता है याने शेर जब शिकार को दबोचकर उसकी इहलीला समाप्त करने लगता है तब जीव को जीवन का मोह और तेज़ी से जकड़ता है। मौत की तरह शेर एक सबसे कुशल और मज़बूत शिकारी और हिरण की तरह जीव सबसे आसान शिकार है। हिरण की नज़र एक बार शिकारी से मिली तो वह सम्मोहन में थगा सा रह जाता है। जीवन का मोह त्याग देता है। शेर मृत्यु की तरह दबे पाँव आ कर मोह रहित हिरण के गला को जबड़े से दबा उसकी गर्दन को झटके से तोड़ कर उसकी इहलीला क्षण मात्र में समाप्त कर देता है। देह के भीतर और बाहर समस्त ब्रह्मांड में शिकार का एकांकी अनवरत घटित हो रहा है।

शेर जब किसी सघन मोहग्रस्त बड़े जानवर जैसे भैंसा या हाथी का शिकार करने की कोशिश करता है तो संघर्ष लम्बा खिंचता है। नाटक में कई पटाक्षेप होते हैं। शिकार ताक़तवर होने के कारण जीवन का मोह आसानी से नहीं त्यागता है। शेर उसके पिछली टाँग की रान पजों के नाखूनों से खरोंच कर नस को काटने की कोशिश करता है ताकि शिकार का ख़ून बहने से वह कमज़ोर हो जाए, फिर काटी गई जगह को दाँतों से काट बड़े घाव में बदलता है। जीवन-मृत्यु का संघर्ष लम्बा खिंचता जाता है। जानवर दुलत्ती मारकर मृत्यु को भगाने की कोशिश भी करता रहता है। शेर बाजु में आकर शिकार के कंधे पर चढ़कर गर्दन पकड़ने की कोशिश करता है तो भैंसा उसे धनवान रोगी की तरह धन रूपी सींगों से उछालकर दूर फेंकना चाहता है। अस्पताल का बिल बढ़ता जाता है। शिकार जीवन से मोह में समर्पण नहीं करता तो तकलीफ़देह संघर्ष की अवधि और लहू-लूहान स्थिति लम्बी खिंचती जाती है। न यम हार मानता है और न जीव मोह त्यागता है। अंत में हारना जीव को ही है, उसे अंततः देह त्यागना ही होता है। बच नहीं सकता। इस संघर्ष को अस्पताल जितना लम्बा खींच सकें, खींचते चले जाते हैं। उस हिसाब से बिल भी लम्बा खिंचता जाता है।

हमने कहा- हाँ, देह त्याग में सबसे बड़ी बाधा मोह है। अनवरत जीवन का मोह, इंद्रियसुख का मोह, संतान का मोह, धन का मोह। ये सब मिलकर जीवन के मोह को सघन बनाते हैं। आदमी मृत्यु से भागता है। मृत्यु उतनी ही तेज़ी से उसे जकड़ती है। अधिकांश लोगों को अंत समय में अक्सर धन का मोह सर्वाधिक होने लगता है। धन मृत्यु को कुछ समय के लिए टाल सकता सा प्रतीत होने के कारण एक सुरक्षा बोध देता है। दुनिया में सबसे तकलीफ़देय मौत यमदूत शेर की होती है। कभी बूढ़े शेर को चिड़ियाघर में देखिए। वह कितना निरीह, बेबस और उदास जीवन से हारा नज़र आता है। जब वह खुले जंगल में शिकार करने योग्य नहीं रह जाता तो कई दिन तक तड़फ-तड़फ कर भूखा मरता है। पानी भी नहीं पी पाता है। उसकी माँस पेशियाँ लटक जातीं हैं। वह अपना बोझ भी नहीं उठा पाता। निशक्त एक जगह पड़ा रहता है। बड़ी दर्दनाक मौत मरता है। ऐसा लगता है कि प्रकृति उससे सारी निर्ममता और निर्दयता का हिसाब बराबर कर रही है।

श्री कृष्ण ने भी दार्शनिक हवन में हव्य अर्पित किया- देनवा के दामन में मौत का  खेल शिकार भी एक कारोबार रहा है। शेर जंगल का सबसे सुंदर और ताक़तवर जानवर होता है। उसकी दहाड़ सामने वाले के होश को हिलाकर रख देती है। वह जब तक भूखा न हो शिकार नहीं करता। आदमी पर वह दो दशाओं में हमला करता है। बूढ़ा या घायल हो जाने से शिकार करने लायक हालत में न रहने पर या उसे लगे कि कोई उस पर हमला करने वाला है। शेर यदि आदमखोर हो जाए तो वह फिर आदम माँस की जुगाड़ में रहता है। उसे मानव माँस का नमकीन स्वाद भाता है। इसलिए आदमखोर जानवर को मारना ही पड़ता है। लोग शिकार अपने शौक़ या लालच के कारण भी करते थे। पहले सतपुड़ा से नर्मदा तक शेरों की अच्छी ख़ासी आबादी थी। दसवीं और ग्यारहवीं सदी में राजस्थान और गंगा के मैदान से क़ाफ़िले के क़ाफ़िले आकर जंगलों को साफ़ करके खेती करने लगे। जानवरों को मजबूरी वश पहाड़ी तलहटी में खिसकना पड़ा। जंगल का नियम है कि हर ताक़तवर कमज़ोर को हज़म कर जाता है, यह जंगल में पूरी सच्चाई से लागू होता है परंतु  आदमियों के निष्ठुर समाज में सच्चाई-बेइमानी का कुछ पता ही नहीं चलता है। कौन कब सच्चा है और कब  झूठा। जानवर यदि शिकार कर रहा है तो पूरी जानकारी और चेतावनी के साथ। आदमी शिकार करता है परंतु न तो चेतावनी देता न सँभलने का मौक़ा और न ही कभी अहसास होने देता कि वह शिकार करने वाला है।

देनवा किनारे कई शिकारी आकर तंबू में कई रात बिताते थे। उनमें कई बहादुर होते थे और कई बहादुरी ओढ़ते थे। यह सिलसिला हुशंगशाह के एक उप-कोतवाल मुहम्मद शाह के समय से शुरू होता है। वह अफ़ग़ान शिकार का शौक़ीन था। अपनी बेगमों के साथ जंगल में डेरा डालता था। उसके सैनिक उसकी सुरक्षा और खाने-पीने का सारा इंतज़ाम करके आते थे। उसने जंगल में रहने वाले गौंड़ लोगों को शिकार में साथ देने के हिसाब से तीर चलाने, हाँका लगाने और जाल बिछाकर ख़ूँख़ार जंगली जानवरों को फंदा डालकर फाँसने की कला में प्रशिक्षित कर रखा था। वह नंगी तलवार और तीर कमान लेकर ऊँचे मचान पर बैठ जाता। चारों तरफ़ से घने ऊँचे पेड़ों से घिरे छोटे मैदान में नौ-दस गज़ गड्ढा करके जाल बिछा दिया जाता। उसके बाद बीस-पच्चीस लोग हथियार बंद होकर शेर को हाँका लगाकर उस मचान के नीचे गड्ढे की ओर हाँकते या गड्ढे के बीच में एक खम्भे पर पटिया रखकर एक बकरा शेर को ललचाने वास्ते बाँध दिया जाता था। शेर के जाल में गिरते ही चारों तरफ़ के पेड़ों पर बैठे तीरंदाज़ उसके शरीर को तीरों से भेद देते थे। जिसमें मुहम्मद शाह के तीर भी होते थे। मुहम्मद शाह के दरबारी शेर के मर्मस्थल पर लगे तीर को शाह का तीर बताकर ईनाम पाते। शाह का सीना गर्व से फूल जाता। वह नज़रों ही नज़रों में बेगम से शाबाशी पाकर पेड़ से नीचे उतर कर मृत शेर का मुआयना करके मर्मस्थल पर लगे तीर को बेगम को दिखाते हुए शिकार की कुछ बारीकियाँ बताता जो बेगम को बिलकुल भी समझ ना आतीं परंतु वह खाविंद की बलैयाँ लेने से न चूकती।

शिकारी शेर की दहाड़ को छोड़कर उसके शरीर के हर हिस्से का उपयोग करते थे। उसकी खाल को तुरंत ही उतारना ज़रूरी होता था। आठ-दस घंटे की देरी होने से खाल उतारने में कठिनाई होती और खाल ख़राब हो जाती थी। खाल उस ज़माने में 700-800 कलदारों में बिकती थी जबकि कोतवाल का वेतन मात्र 125 कलदार होता था। उसके नाख़ून, बाल, दाँत और आँख भी अच्छी क़ीमत में बिकते थे। सूबे और दिल्ली के दरबारी इन चीज़ों को ख़रीदते थे। इन चीज़ों को उपयोग धीमा ज़हर बनाने में होता था या कमोत्ताजक दवाइयों में काम आती थीं। माँस को मसाला लगाकर और सुखाकर लिवर किडनी की बीमारी ठीक करने में और हड्डियों का चूरा बनाकर कमर घुटनो और हड्डियों की कमज़ोरी दुरुस्त करने में उपयोग किया जाता था। उसकी हड्डियों को शराब में कई दिन तक डुबो कर शराब को ज़्यादा उत्तेजक और पाचक बनाया जाता था। शायद तभी से दो पैग गले के नीचे उतरने के साथ ही शराबी शेर सा दहाड़ने लगता है।

मुग़लों के साथ बारूद आ गई थी तो भरमार शिकार के काम में लाई जाने लगीं थीं। अंग्रेज़ों के आने के बाद सतपुड़ा शिकारगाह का स्वर्ग हो गया था। शेर की खाल, बाल, दाँत, आँख और नाख़ून की यूरोप के बाज़ारों में अच्छी क़ीमत मिलती थी। लोग समझते हैं शिकार बहादुरी दिखाने के लिए किया जाता था। शिकार की जड़ में लालच थी। इन जंगलों में अनगिनत शेर थे। जिनका बेरहमी से शिकार करके धन कमाया गया था। अब शेरों को बचाने के लिए पैसा बहाया जाता है। मेरे चारों तरफ़ बियाबांन जंगल में अनगिनत शेर थे। शेरों और अन्य जानवरों के शिकार का यह आलम था कि सोहागपुर में पुराने “बी” केबिन के सामने एक हड्डा साईडिंग रेल लाइन अंग्रेज़ रेल्वे ऑफ़िसर द्वारा बनाया गया था। जहाँ मालगाड़ी के डिब्बों में लादने हेतु जंगली और पालतू पशुओं की हड्डियों के ढेर लगाए जाते थे। सागौंन की लकड़ी जानवरों की हड्डियाँ और शेर के विभिन्न अंग सोहागपुर से बॉम्बे होकर पानी के जहाज़ से इंग्लैंड भेजे जाने लगे थे। अंग्रेज़ लॉटसाहब स्मिथ ने पारसी ठेकेदार पेस्टोंन ने साथ मिलकर इस धंधे से ख़ूब कमाई की थी। बहुत बाद में मौलवी साहिब और वॉन साहिब भी अपने दोस्तों के साथ शिकार खेलने जाते थे।

हमने बताया- जब कैप्टन जैम्स फॉरसोथ 1861 में पचमढ़ी की मुहिम पर था तब उसने मिट्टी की खुदाई करने हिंदुस्तानी लोगों को काम पर लगाया। जिन्हें कुली कहा जाता था। वे मिट्टी खोदकर सड़क बनाते थे। तब कुलियों की एक बस्ती पिपरिया-पचमढ़ी के बीच एक छोटे से पठार पर बस गई, वही बस्ती मटकुली (मिट्टी खोदने वाले कुली) नाम से अब तक आबाद है।

कैप्टन जैम्स फॉरसोथ पिपरिया से पचमढ़ी तक सड़क बनाता चल रहा था। पिपरिया से मटकुली तक सड़क बनने के बाद आगे काम जारी रहा। मटकुली से पचमढ़ी के बीच एक जगह पर कुलियों को पगार देने के लिए बुलाया जाता था, वह जगह पगारा नाम से आबाद हो गई। आगे आम के पेड़ों से आबाद एक जगह थी। जहां लोग थकान से राहत पाने सुस्ताते थे। वहाँ एक गाँव बस गया। वह बारीआम हुआ। इस तरह पचमढ़ी की खोज में मटकुली, पगारा और बारीआम आबाद हुए थे।

जनश्रुति के अनुसार भभूत सिंह पचमढ़ी के पास पगारा के निवासी थे, सही जान नहीं पड़ता। वे क्षेत्र में अंग्रेजों के दखल के खिलाफ थे। उन्होंने पगारा तक मार करके जीत लिया होगा इसलिए पगारा उनके नाम के साथ जुड़कर किंवदंती में चल पड़ा। वे हर्राकोट के निवासी हो सकते हैं। उन्होंने 1857 की पहली क्रांति के दौरान तात्या टोपे को छुपने में मदद की। अंग्रेजों ने भभूतसिंह को अपने झांसे में लेने की बहुत कोशिश की। कोरकू जाति के मवासी आदिवासी भभूतसिंह का कहना मानते थे। इस कारण अंग्रेज यहां के प्राकृतिक सौंदर्य पर कब्जा नहीं जमा पा रहे थे। अंग्रेज पचमढ़ी को हथियाना चाहते थे। उनको रास्ते से हटाने का षडयंत्र रचा गया। उस समय भभूत सिंह के साथ हुल्ली भोई का भी एकछत्र राज्य था। अंग्रेजों ने फतहपुर के नबाव आदिल मोहम्मद खान को लालच देकर पगारा भेजा। जब वह कोशिश में नाकाम रहा तो दोनों को घेर कर मरवा देने का निर्णय किया गया।  

पिपरिया के समाजवादी चिंतक गोपाल राठी ने फ़ोन पर बताया कि “फतहपुर बनखेड़ी के पास एक गौंड रियासत थी जो तीन भागों में विभाजित थीl नदी पूरा, बीच पूरा और फतेहपुर। इन तीनो के जागीरदार अलग-अलग थेl भभूत सिंह मालगुज़ार थे। पचमढ़ी के लिए बनखेड़ी से फतहपुर होते हुए मटकुली और मटकुली से पचमढ़ी जाने का मार्ग बनाने की तैयारी थी, लेकिन फतहपुर के गौंड राजा ने यह मंज़ूर नहीं किया इसलिए यह मार्ग पिपरिया से मटकुली और मटकुली से पचमढ़ी तक बना। भभूत सिंह को अंग्रेजों ने धोखे से उस समय पकड़ा था जब वे फतहपुर में सो रहे थे।

बाघों की गिनती करने साथ आए श्री गोपाल गांगुड़ा बता रहे हैं – भैया, नागद्वारी यात्रा के दौरान अंडमान-निकोबार और केरल-कन्यकुमारी से आए काले बादल गोंड़-कोरकु की तरह महादेव पहाड़ पर चढ़ने के लिए आपस में खूब लड़ते-झगड़ते हैं, गरजते और चमकते हैं, गुत्थम-गुत्था होते हैं, कोई नहीं जीतता तो दोनों छोटे बच्चों जैसे झारझार रोने लगते हैं। तब ये सब पर्वत उनके आँसुओं से तरबतर होकर असंख्य झरनों को बहाने लगते हैं। लोगों के नौतपा से तपे चेहरे खिल जाते हैं। उनकी आँखों में ख़ुशी से आँसू झरझर बहने लगते हैं। बादलों के आँसुओं से बहकर कविता लोगों के आँसुओं के झूले में आनंद की पीगें भरकर हिलोरें ले सावनी गीत गाने  लगती है।

कुछ बादल महादेव पर्वत पर बरसते हैं तो कुछ धूपगढ़ और ऊँचा चौंड़ा पर्वत पर धूनी रमा कर बैठ जाते हैं। ऐसा लगता है कि धरती पर इंद्रसभा की तैयारी हो रही है। ग़रज़, कलकल, चहचहाहट, पत्तों पर बूँदों की सरगम इंद्रसभा के नृत्य की तैयारी में झूमने लगते हैं। वक्ष पर कंचुकी कसी उत्तरीय ओढ़े मेनका का ठुमक पदचाप करते प्रवेश का इंतज़ार है। इंद्र देव मदिरा का एक घूँट लेकर इशारा करेंगे और ता—थई—ता-ता- थई- के साथ जल देव और भी रिसाकर बरसेंगे, पवन देव जल देव को किनारे कर नृत्य भंगिमा को उड़ा ले जाने का प्रयत्न करेंगे। लेकिन अभी इंद्र देव की अनुमति नहीं है।

सतपुड़ा के ऊँचे पहाड़, गहरी घाटियाँ और घने जंगल ऐसे रहस्यों को समेटे हुए हैं जिन्हें कोई भी इसके घने इलाके में जाकर ही इसे खोज सकता है। मध्य प्रदेश के होशंगाबाद, बैतूल और छिंदवाड़ा जिलों में स्थित सतपुड़ा टाइगर रिजर्व, पचमढ़ी बायोस्फीयर रिजर्व का एक हिस्सा है, जो हर साल पर्यटकों की एक बड़ी भीड़ को आकर्षित करता है। रिजर्व को हाल ही में प्रतिष्ठित यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल के लिए संभावित सूची में शामिल किया गया था।

हमने उन्हें बताया कि पचमढ़ी बायोस्फीयर रिजर्व मध्य भारत में मध्य प्रदेश राज्य के सतपुड़ा रेंज में एक गैर-दख़लंदाज़ी  संरक्षण क्षेत्र और बायोस्फीयर रिजर्व है। इसे 1999 में भारत सरकार द्वारा संरक्षण क्षेत्र बनाया गया था। इसमें हिमालय की चोटियों और निचले पश्चिमी घाटों के जानवर भी लाए गए हैं। यूनेस्को ने 2009 में इसे बायोस्फीयर रिजर्व नामित किया था। पचमढ़ी बायोस्फीयर रिजर्व भारत में मध्य प्रदेश राज्य के होशंगाबाद, बैतूल और छिंदवाड़ा जिलों के क्षेत्रों में स्थित है। बायोस्फीयर रिजर्व का कुल क्षेत्रफल 4,926.28 वर्ग किलोमीटर (1,217,310 एकड़) है। इसमें तीन वन्यजीव संरक्षण इकाइयां शामिल हैं:-

बोरी अभयारण्य (518.00 किमी)

पचमढ़ी अभयारण्य (461.37 किमी)।

सतपुड़ा राष्ट्रीय उद्यान (524.37 किमी)

सतपुड़ा पर्वत श्रृंखलाओं के बीच स्थित रिजर्व की स्थलाकृति अद्वितीय है, इसकी पश्चिमी सीमा तवा नदी के बैकवाटर द्वारा और उत्तर में देनवा नदी के बैकवाटर द्वारा बनती है। इन विशाल जलाशयों में घूमते समय आपको समुद्र में खो जाने का एहसास होता है। सतपुड़ा पर्वत श्रंखला की ऊँची चोटियाँ दूर से ही दिखाई देती हैं। ये पहाड़ लाखों साल पुराने हैं और टाइगर रिजर्व का हिस्सा हैं। मध्य प्रदेश की सबसे ऊंची चोटी (1351 मी) धूपगढ़ इस रिजर्व के अंदर स्थित है। मानसून के मौसम में कई गहरी घाटियां शानदार झरने बनाती हैं। रिजर्व के अंदर कई जगहों पर प्राचीन शैल चित्रों को देखा जा सकता है, जो उस समय के आदिम कृतियों को दर्शाते हैं।

यह पेड़ों की लगभग 92 प्रजातियों, स्तनधारियों की 52 प्रजातियों, पक्षियों की 300 प्रजातियों, तितलियों की 130 प्रजातियों और सरीसृपों की 30 से अधिक प्रजातियों का घर है। जिनमें चित्तीदार हिरणों के बड़े झुंड भी शामिल हैं।

यह रिजर्व बड़े पैमाने पर प्रमुखत: साल और सागौन के मिश्रित जंगलों से भरा है। इन मिश्रित वनों में जामुन, बहेड़ा, पलाश, महुआ, साजा, बीजा, तेंदू, अर्जुन, सेमल, सलाई, कुसुम, आचार, आंवला, धामन, लेंदिया, हर्रा और कई अन्य पेड़ प्रजातियां शामिल हैं। मध्य भारत में पाए जाने वाले पेड़ों की सूची प्रदीप कृष्ण की उत्कृष्ट पुस्तक “जंगल ट्री ऑफ सेंट्रल इंडिया” में पाई जा सकती है। रिजर्व के पहाड़ी इलाकों में पाई जाने वाली प्रमुख प्रजाति बांस है। घास के मैदानों में भी इलाके का अपना हिस्सा होता है। समय के साथ खाली किए गए गांव समृद्ध घास के मैदानों में बदल गए हैं और विभिन्न प्रकार की जड़ी-बूटियों के ख़ज़ाने हैं। नर्मदा नदी मध्य प्रदेश की जीवन रेखा है। नर्मदा को जल देने वाले ये वन इसके पारिस्थितिकी तंत्र की तुलना में कहीं अधिक मूल्य रखते हैं। ये मानसूनी वर्षा के लीवर हैं।

आज, मध्य प्रदेश को भारत के बाघ राज्य के रूप में जाना जाता है, जहां देश में सबसे अधिक बाघ रहते हैं। 2018 की गणना के अनुसार मध्य प्रदेश में 526 बाघ दर्ज किए गए। यहां सतपुड़ा में इन शानदार बिल्लियों की उपस्थिति देखने से महसूस की जा सकती है। रिजर्व के माध्यम से यात्रा करते समय बड़ी बिल्ली की उपस्थिति के बहुत सारे सबूत देखे जा सकते हैं, लेकिन इसे देखने के लिए थोड़ी किस्मत की जरूरत होती है क्योंकि वे अभी तक आने वाले वाहनों और पर्यटकों के साथ समायोजित नहीं हुए हैं। हालांकि पगमार्क और अन्य जानवरों के स्कैट और अलार्म कॉल सफारी के दौरान पूरी तरह से व्यस्त रख सकते हैं।

चित्तीदार हिरण, सांभर, भौंकने वाले हिरण, चौसिंघा, भारतीय गौर, ब्लू बुल, जंगल बिल्ली, जंगली सूअर, भारतीय सियार, बंगाल फॉक्स, धारीदार लकड़बग्घा और रीसस मकाक इस रिजर्व में पाए जाने वाले अन्य स्तनधारी हैं।

बारिश के बाद अक्टूबर में एक बार रिजर्व खुलने के बाद, भारतीय गौर के बड़े झुंडों के दर्शन के साथ पहाड़ियाँ देदीप्यमान हो जाती हैं। गौर के झुंड भोजन की तलाश में पहाड़ियों की ओर चले जाते हैं क्योंकि तराई पानी में डूब जाती है और बांस के बड़े इलाकों में यह प्रजाति बहुतायत में पाई जाती है। जैसे-जैसे गर्मी का मौसम आता है, वे पीछे हटने वाले बैकवाटर्स द्वारा बनाई गई हरी चरागाहों में लौट आते हैं। स्लॉथ बियर को देखने के लिए पहाड़ियाँ भी एकदम सही हैं।

रिजर्व में जंगली कुत्तों याने ढोल की भी अच्छी संख्या है। लेकिन जंगली कुत्तों की एक स्वस्थ आबादी का मतलब उन इलाकों में शाकाहारी आबादी को काफी नुकसान होना है। ढोल क्रूर शिकारी होते हैं, और एक बार जब वे एक लक्ष्य पर ध्यान लगा लेते हैं, तो वे लगभग हमेशा अपना शिकार पाते हैं। हाल के वर्षों में, चूरना द्वार के पास मुख्य क्षेत्र में चित्तीदार हिरणों की संख्या हजारों से घटकर कुछ सौ रह गई है। जंगली कुत्तों का एक झुंड एक चित्तीदार हिरण का शिकार करता है और कुछ ही मिनटों में उसकी हड्डियों को साफ कर देता है।

मध्य प्रदेश के राज्य पशु बारासिंघा या हार्ड-ग्राउंड दलदल हिरण के वितरण और आबादी को बढ़ाने के लिए, 2015 में कान्हा टाइगर रिजर्व से एक झुंड को यहां स्थानांतरित किया गया था। तब से सतपुड़ा में बारासिंघा की आबादी फली-फूली है।

भारतीय विशालकाय गिलहरी रिजर्व के कई हिस्सों में देखी जाती है। यदि भाग्यशाली रहे, तो दुर्लभ भारतीय विशालकाय उड़न गिलहरी को भी देखा जा सकता है। यूरेशियन ओटर, जिसे भारत में पाए जाने वाले सबसे दुर्लभ स्तनधारियों में से एक माना जाता है, को भी सतपुड़ा में देखा गया है। यहां पाई जाने वाली सरीसृप प्रजातियों में मगरमच्छ, मॉनिटर छिपकली और सांप जैसे इंडियन रॉक पायथन शामिल हैं। स्थानिक सतपुड़ा तेंदुआ गेको भी यहाँ देखा जाता है। सतपुड़ा पर्वत श्रृंखलाओं के नाम पर, गेको केवल मध्य भारतीय राज्यों मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ में पाया जाता है। उभयचरों की कई प्रजातियाँ भी यहाँ देखी जाती हैं।

श्री कृष्ण बोले- सतपुड़ा टाइगर रिजर्व बर्डवॉचर्स के लिए एक खजाना है। एवियन विविधता अधिक है, जिसमें 300 से अधिक पक्षी प्रजातियां दर्ज हैं। लुप्तप्राय ब्लैक-बेलिड टर्न यहां प्रजनन के लिए जाना जाता है। भारतीय स्किमर, एक और लुप्तप्राय प्रजाति, यहाँ देखी जाती है, हालाँकि कम संख्या में। गंभीर रूप से लुप्तप्राय भारतीय लंबे-चोंच वाले गिद्ध उच्च सतपुड़ा पर्वत श्रृंखलाओं की चट्टानों में सुरक्षित शरण पाते हैं। वे पार्क के अंदर अच्छी संख्या में नजर आ रहे हैं। ग्रे और रेड जंगलफॉवल दोनों को देखा गया है। सतपुड़ा ग्रे-हेडेड फिश-ईगल जैसे शिकार के खतरे वाले पक्षियों का भी घर है।

कई जगहों पर सुंदर रैकेट-टेल्ड ड्रोंगो मिश्रित शिकार दलों के भीतर घूमते हुए दिखाई देते हैं। मालाबार पाइड हॉर्नबिल प्रचुर मात्रा में मिश्रित जंगलों के भीतर बड़े पेड़ों की छतरियों में ऊपर की ओर देखा जाता है। यदि आप भाग्यशाली हैं तो आप फलों के पेड़ों पर उनके बड़े झुंड देख सकते हैं। भारतीय चित्तीदार लता यहाँ पाई जाती है। सर्दियों के मौसम में, पीले पैरों वाले हरे-कबूतरों के बड़े झुंड को सुबह के समय नंगे पेड़ों पर चहकते देखा जा सकता है। ब्लैक-कैप्ड किंगफिशर, ब्लैक-क्रेस्टेड बुलबुल और ब्लू-बर्डेड बी-ईटर अन्य स्टार आकर्षण हैं जो हर बर्डवॉचर्स की सूची में उच्च स्थान पर हैं। बड़ी संख्या में प्रवासी बार-हेडेड गीज़, जो दुनिया की सबसे ऊंची उड़ान भरने वाली पक्षी प्रजाति है, को इसके बैकवाटर में देखा जा सकता है। उनके साथ प्रवासी बत्तखों की अन्य प्रजातियां जैसे यूरेशियन विजोन, नॉर्दर्न पिंटेल और नॉर्दर्न शॉवेलर भी हैं।

टाइगर रिजर्व के आसपास के स्थानीय लोग गोंड, भारिया और कोरकू जनजाति के हैं। रिजर्व के प्रबंधन ने इन स्वदेशी समुदायों की आजीविका के लिए ध्यान रखा है। उनमें से कई वन गाइड और गार्ड के रूप में कार्यरत हैं, और रिजर्व के पास अन्य प्रतिष्ठान इन गांवों के युवाओं को रोजगार प्रदान करते हैं।

हमने कहा- रिजर्व के पांच द्वार हैं: मडई, सहेरा/जमानीदेव, धसाई/चूरना, परसापानी और नीमधान। कोर और बफर दोनों क्षेत्र वनस्पतियों और जीवों में समृद्ध हैं। इन क्षेत्रों को विवेकपूर्ण ढंग से प्रबंधित किया गया है और पर्यटकों को उत्कृष्ट स्तनपायी दृश्य प्रदान करते हैं। परसापानी, बिनाका और जमनीदेव जैसे बफर जोन वन्यजीवों को देखने के लिए एकदम सही हैं, क्योंकि मुख्य क्षेत्रों में ज्यादातर समय भीड़भाड़ रहती है। रिजर्व के बफर जोन में नाइट सफारी के रोमांच का भी आनंद लिया जा सकता है। दुनिया की सबसे छोटी जंगली बिल्ली निशाचर और शर्मीली रस्टी-स्पॉटेड कैट पर्यटकों के बीच पसंदीदा है। रात की सफारी के दौरान उल्लू, नाईटजार, सिवेट और अन्य निशाचर वन्यजीव भी देखे जाते हैं। जीप सफारी के अलावा, जंगल में सैर और नाव की सवारी जैसी गतिविधियों की अनुमति है। हमें पता चला कि चूरना की माँदीखो चौकी आवंटित हुई थी। जहां पहुँचने का रास्ता सुखतवा से जाता है। हम भौंरा में बैठे चर्चा कर रहे थे।

तभी चूरना रेंज के अनुविभागीय अधिकारी ने बताया कि हमें मांदीखो चौकी आवंटित की गई है। भौंरा रेंज के रेंज आफ़िसर ने बताया कि बाघों की गणना हेतु हम तीन में से दो की तैनाती चूरना रेंज की मादीखो चौकी पर की गई है और एक को बहुत दूर कोड़ार चौकी पर जाना होगा। यह सुनते ही हम तीनों के दिमाग़ ख़राब हो गए। हम लोग सोच रहे थे कि तीनों की तैनाती नज़दीकी चौकियों पर होगी तो शाम को हमप्याला हमनिवाला की महफ़िल छः दिनों तक जमती रहेगी।

हमने भौंरा के रेंज अधिकारी से कहा कि हम चूरना रेंज अधिकारी से बात करना चाहते हैं ताकि तीनों नज़दीकी चौंकियों पर तैनात रहें। उन्होंने बताया कि  चूरना रेंज अधिकारी श्री विनोद वर्मा आपको केसला के बोरी रेंज अधिकारी के कार्यालय में मिलेंगे। हमने वर्मा जी से बात की तो उन्होंने अपना निर्णय सुनाते हुए कहा कि आप लोगों में से एक गोपाल गांगुड़ा को कोड़ार चौकी पर जाना होगा जो कि मादीखो चौकी से लगभग सौ किलोमीटर दूरी पर थी। रोज़ शाम को मिलना सम्भव नहीं था। हम लोगों ने निर्णय किया कि हम केसला पहुँच कर वर्मा जी से मिलकर अपनी तैनातियाँ नज़दीक चौकियों पर करवा लेंगे।

हमने वर्मा जी से फ़ोन पर सम्पर्क साध कर अपनी गुहार उनके सामने रखी। वे टस से मस नहीं हो रहे थे। बोले कि आप दो लोग केसला पहुँच जाएँ, आपको मादीखो पहुँचा दिया जाएगा। एक आदमी कोड़ार निकल जाए जो कि भौंरा से चालीस किलोमीटर घने जंगल में था। वे इसी बात पर अड़ गए। आख़िर में हमने कहा कि साहब हम आपसे मिलकर चौकियों पर जाना चाहते हैं इसलिए अपनी कार से केसला पहुँच रहे हैं। उन्होंने कहा कि वो तीन बजे तक केसला पहुँचेंगे, आप बोरी रेंज के केसला स्थित कार्यालय पहुँचें। हम तीनों तीन बजे केसला में चाय पीकर केसला के सतपुड़ा टाइगर रिज़र्व पहुँच गए। उनको फ़ोन से सम्पर्क साधने की कोशिश की तो पहले कवरेज से बाहर मिला परंतु लगातार प्रयास से उनसे बात हुई तो उन्होंने बड़े रूखे अन्दाज़ में कहा कि वे देरी से पहुँचेंगे। बोरी रेंज स्टाफ़ से बातचीत होती रही। वर्तमान में जंगल विभाग तीन तरह की कमान में बँटा है- सामान्य, उत्पादन और आरक्षित-वन देखभाल। फ़ील्ड में इनकी कमांड अनुविभागीय अधिकारी के हाथ में होती है। उनके नीचे रेंज आफ़िसर और रेंज आफ़िसर के नीचे पूरा अमला होता है। सबसे नीचे वन रक्षक फिर वन पाल इत्यादि पद होते हैं।

शाम के छः बजने लगे परंतु वर्मा जी का कोई पता नहीं चल रहा था। आख़िर सवा छः बजे उनका अवतरण हुआ। नमस्कार जुआर के बाद हमने अपनी बात रखी कि तीनों को या तो मादीखो और आसपास कर दें या फिर कोड़ार के आसपास रख दें। उन्होंने कहा कि उन्हें वहाँ भेजा जा रहा है जहां का स्टाफ़ शेरों की गणना का विवरण एप में दर्ज नहीं कर पाएगा, इसलिए आपको उनकी सहायता करना होगी। हम लोगों ने कहा कि हमको भी एप चलाना नहीं आता है। तब उन्होंने कहा कि यदि उनका बस चलता तो वे हम जैसों का चयन ही नहीं करते। हम चुप रहकर अपनी एक जगह रहने की माँग पर डटें रहे। आख़िर में उन्होंने तंग होकर कहा कि आप तीनों यहाँ से मादीखो चले जाएँ। इस राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक 69 पर इटारसी तरफ़ जाने पर दो किलोमीटर पर दाहिनी तरफ़ एक रास्ता कटेगा। उस पर छः किलोमीटर के बाद मोरपानी गाँव की तरफ़ एक रास्ता दाहिनी ओर कटेगा उसे छोड़कर आप हल्का सा बाईं तरफ़ को जाने वाला रास्ता पकड़ना जो आपको एक स्थान पर पहुँचाएगा। वहाँ सामने कच्चा जंगली रास्ता मिलेगा वहीं हमारे दो आदमी आपको खड़े मिलेंगे। वो आपको तवा नदी किनारे स्थित मादीखो रेस्ट हाउस पहुँचा देंगे।

हम चलते गए, मोरपानी गाँव से हमारी दाहिनी तरफ़ सुखतवा नदी चलने लगी और बाईं तरफ़ घने जंगलों से भरी पहाड़ियाँ, बीच में ऊबड़-खाबड़ पथरीला रास्ता। नियत स्थान पहुँचने पर दो लड़के मोटर साइकिल सहित मिले। बहुत ही ऊबड़-खाबड़ रास्ते पर डोलते-डालते सात बजे शाम नियत स्थान पर पहुँचे। वहाँ वन रक्षक प्रजापति मिले। साथ में आठ-दस लोग आग तापते बैठे थे। पूछने पर पता चला कि चोरी से मछली पकड़ने के लिए आए थे। जाल सहित पकड़ाए हैं। साहिब के आने तक यहीं रहेंगे। साहिब कब आएँगे किसी को पता नहीं था। हम गेस्ट हाउस में कपड़े उतार कर सुस्ता रहे थे। तभी वे मछुआरे हमें साहिब समझ हमारे पास आकर सफ़ाई देने लगे। हमने उन्हें वास्तविकता बताई तो वे मायूस होकर फिर आग तापने लगे। सुबह पता चला कि उनके जाल वग़ैरह जप्त करके उन्हें जाने दिया। वन अधिकारियों पर उन्हें छोड़ने हेतु राजनीतिक दबाव बनना शुरू हो चुका था। उनके जाने के बाद हम लोगों ने कमर सीधी की और सिग्नेचर चरणामृत सेवन से दिमाग़ और देह में भरी दिन भर की थकान उतारी। हम पाँच-छः दिन के हिसाब से खाना पीना बनाने का सामान तीन बोरियों में साथ लेकर चले थे। एक बोरी वन सेवक प्रजापति के हवाले कर दी। प्रजापति ने आलू की सब्ज़ी और मोटे टिक्क रोटी लाकर दिए जिन्हें गप्प लड़ाते हुए खाकर दस बजे सो गए।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

संस्थापक सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # २८ – कविता – परिन्दे… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर ☆

डॉ.राजेश ठाकुर

( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का  मंतव्य उनके ही शब्दों में –पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “परिन्दे“.)  

? साप्ताहिक स्तम्भ ☆ नेता चरित मानस # २८ ?

? कविता – परिन्दे… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर  ? ?

?

=1=

ऋतु विशेष में दूर देश से, ख़ास परिंदे आते हैं

बच्चे यूँ त्यौहारों में, मेहमान सरीखे आते हैं

 =2=

हेलमेल के मिसरी जैसे, जाने कहाँ गये वो दिन

अब रिश्तों की नीरसता ज्यों, फल भी फीके आते हैं

=3=

पीढ़ी नई, मृदंग नगड़िया रसिया फगुआ क्या जाने

इनको तो बस डी.जे.वाले, तौर-तरीक़े आते हैं

=4=

हँसी-ठिठोली न पहले-सी, हुई दिल्लगी भी ग़ायब

रंग लगाने के वो दिलकश, किसे सलीक़े आते हैं

=5=

देख दूसरों को संकट में, जश्न मनाती है दुनिया

लम्हे आगे-पीछे अच्छे-बुरे सभी के आते हैं

=6=

हमसे मिलने उमड़-घुमड़कर, देखो काले बादल भी

प्यार जताने समय-समय पर, पास ज़मीं के आते हैं

=7=

हमको भी ताउम्र फर्ज़ की, रीत निभानी होती है

तब जीवन के हिस्से में कुछ, ख़ास वज़ीफ़े आते हैं

=8=

इम्तिहान से सीख सबक़, अंज़ाम की कर न फ़िक्र ज़रा

पल जीवन में खट्टे-मीठे, कड़वे-तीखे आते हैं

=9=

‘ठाकुर’ ठसक दिखाने से यूँ, काम नहीं चलने वाला

कथनी-करनी के दम, ख़ुशियों के दिन नीके आते हैं

© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर

शासकीय कॉलेज़ केवलारी

संपर्क — ग्राम -धतूरा, पोस्ट – जामगाँव, तहसील -नैनपुर, जिला -मण्डला (म.प्र.) मोबा. 9424316071

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ “श्री हंस” साहित्य # २०१ ☆ मुक्तक – ।। समाज राष्ट्र का सजग सतर्क प्रहरी पत्रकार ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

श्री एस के कपूर “श्री हंस”

 

☆ “श्री हंस” साहित्य # २०१ ☆

☆ मुक्तक ।। समाज राष्ट्र का सजग सतर्क प्रहरी पत्रकार ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

=1=

कभी बोल मीठे तो कभी चीत्कार लिखता है।

कभी विपक्ष  तो  कभी सरकार लिखता है।।

यह कलम  का  सिपाही रुकता नहीं  कभी।

सही बात हो   तो  वह बार – बार लिखता है।।

=2=

कभी आर -पार तो कभी कारोबार लिखता है।

कभी विसंगति और कभी  प्रचार लिखता है।।

समाज राष्ट्र के  हर एक बिंदु को छूती कलम।

हर विषय को  छूता  वह सरोकार लिखता है।।

=3=

कभी ओज तो कभी  रस श्रृंगार   लिखता है।

कभी खिजा तो कभी खूब बहार   लिखता है।।

खुशी गम के   हर   एक पहलू को छूता वह।

कभी जीत तो कभी  कोई हार  लिखता   है।।

=4=

कभी व्यंग तो कभी बन के हास्यकार लिखता है।

कभी शांति  तो कभी वह अंगार  लिखता  है।।

छू जाती है कलम उसकी दिल  को    कभी।

जब भावनाओं का  पूरा ही संसार लिखता है।।

=5=

सब पढ़ते हैं   कि  बहुत जोरदार  लिखता है।

कभी दब के या  बन कर असरदार लिखता है।।

हर हालात को   लिखता वह खूब समझ कर।

सब कोई   और नहीं बस पत्रकार लिखता है।।

© एस के कपूर “श्री हंस”

बरेली ईमेल – Skkapoor5067@ gmail.com, मोब  – 9897071046, 8218685464

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ काव्य धारा #२६४ ☆ कविता – भगवान हमें प्यार का वरदान दीजिये… ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

(आज प्रस्तुत है गुरुवर स्व  प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  द्वारा रचित – “कविता  – भगवान हमें प्यार का वरदान दीजिये। हमारे प्रबुद्ध पाठकगण स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी  काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।) 

☆ काव्य धारा # २६४

☆ भगवान हमें प्यार का वरदान दीजियेस्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

भगवान हमें प्यार का वरदान दीजिये ।

औरों के कष्ट का सही अनुमान दीजिये ॥

*

दुनिया में भाई-भाई से हिलमिल के सब रहें

है द्वेष जड़ लड़ाई की – यह ज्ञान दीजिये ॥

*

होता नहीं लड़ाई से कुछ भी कभी भला

सुख-शांति के निर्माण का अरमान दीजिये ॥

*

निर्दोष मन औ’ शुद्ध भावनाओं के लिये

हर व्यक्ति को सबुद्धि औ’ सद्ज्ञान दीजिये ॥

*

दुनिया सिकुड़ के  आज हुई एक नीड़ सी

इस नीड़ के कल्याण का विज्ञान दीजिये ॥

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

साभार – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

ए २३३ , ओल्ड मीनाल रेजीडेंसी  भोपाल ४६२०२३

मो. 9425484452

vivek1959@yahoo.co.in

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक २७ आणि २८ ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

श्री विश्वास देशपांडे

? इंद्रधनुष्य ?

☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक २७ आणि २८ ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

श्लोक क्र. २७ – – – 

भवाच्या भये काय भीतोस लंडी ।

धरी रे मना धीर धाकासि सांडी ।

रघुनायका सारिखा स्वामि शीरी ।

नुपेक्षी कदा कोपल्या दंडधारी ।।२७।।

अर्थ : हे मना, एखाद्या भित्र्या माणसासारखा तू प्रपंचाला का घाबरतोस? भीती सोडून धैर्य धारण कर. कारण तुझ्या पाठीशी रघुनायकासारखा स्वामी असताना घाबरण्याचे काहीच कारण नाही. अगदी यमाचा कोप झाला तरी तो तुला कधीही सोडणार नाही, तुझी उपेक्षा करणार नाही.

(भव – प्रपंच, लंडी – भित्रा/कमजोर मनाचा, दंडधारी – यम)

विवेचन : मानवी जीवन हे अनेक अनिश्चिततांनी भरलेले आहे. उद्या काय होईल याची चिंता, नोकरीची काळजी, मुलाबाळांचे भविष्य, आरोग्य, आर्थिक स्थिती अशा असंख्य विचारांनी मन व्यापलेले असते. त्यामुळे माणूस आतून अस्वस्थ आणि भयग्रस्त होतो.

प्रपंचाची काळजी वाटणे स्वाभाविक आहे, पण त्या भीतीने खचून जाणे योग्य नाही. म्हणून समर्थ या ठिकाणी आपल्या मनाला धीर देतात…

“धरी रे मना धीर, धाकासि सांडी”

… हे मना, तू भीती झटकून टाक आणि धैर्याने उभा रहा.

आपले जीवन हे जर एक रणांगण मानले, तर या रणांगणावर शूरवीराप्रमाणे लढणे आवश्यक आहे. हातात तलवार किंवा बंदूक आहे पण हात पाय कापताहेत, तर लढाई कशी लढणार ? शत्रूसाठी मग तुम्ही सोपे लक्ष्य असाल. मनात भीती असेल तर विजय शक्य नाही.

संकटेही अशीच असतात. आपण त्यांना जेवढे घाबरतो, तेवढी ती अधिक मोठी वाटतात. धैर्याने सामना केला, तर ती हळूहळू नाहीशी होतात.

या संदर्भात स्वामी विवेकानंद यांच्या बालपणातील प्रसंग अत्यंत बोलका आहे. त्यांचे बालपणीचे नाव नरेंद्र. ते अत्यंत अवखळ आणि खोडकर होते. ते झाडावर चढत. आईला असे वाटले की झाडावर चढून हा खाली पडला तर त्याला इजा होईल. त्यामुळे त्यांच्या आईने त्यांना झाडावर चढू नकोस. तिथे ब्रह्मराक्षस राहतो असे सांगितले. पण नरेंद्राने आईला विचारले, “ब्रह्मराक्षस ? कुठे आहे तो मला त्याला पाहायचेच आहे. ?” ब्रह्मराक्षस प्रत्यक्षात नव्हताच. आपली मनच अशा गोष्टींची निर्मिती करते. म्हणूनच भित्यापाठी ब्रह्मराक्षस असे आपण म्हणतो.

समर्थ पुढे आपल्याला एक मोठा आधार देतात…

… रघुनायकासारखा स्वामी आपल्या पाठीशी आहे.

राम म्हणजे केवळ एक ऐतिहासिक किंवा पौराणिक पात्र नाही, तर तो धैर्य, धर्मनिष्ठा आणि संरक्षणाचे प्रतीक आहे. वाल्यासारख्या बलाढ्याला संपवणारा, रावणासारख्या अहंकारी व्यक्तीचा नाश करणारा हा राम सज्जनांचा त्राता आहे. म्हणूनच समर्थ म्हणतात 

प्रत्यक्ष यम जरी कोपला, तरी राम तुला कधीही सोडणार नाही. तुझी उपेक्षा करणार नाही. याचा अर्थ असा नाही की की श्रीरामांना शरण जाण्यामुळे आपला मृत्यू टळणार आहे. मृत्यू तर अटळ आहे परंतु श्रीराम आपल्या पाठीशी आहेत हा विश्वास जेव्हा आपल्या मनात निर्माण होतो तेव्हा मृत्यूची भीती कमी होते. संकटांना सामोरे जाण्याचे धैर्य मिळते.

शेवटी, भय, आनंदी आणि धैर्याचे जीवन जगण्यासाठी समर्थांचा स्पष्ट संदेश आहे की श्रीरामावर (भगवंतावर) श्रद्धा ठेवा, धैर्य धरा आणि निर्भयपणे जगायला शिका. श्रीराम तुमच्या पाठीशी आहेतच.

स्वसंवाद :: 

  • मी माझ्या आयुष्यातील समस्यांना धैर्याने सामोरे जातो का, की त्यांना घाबरून जातो?
  • माझी भीती वास्तव आहे की ती माझ्या मनाने निर्माण केली आहे ?
  • संकटांच्या वेळी मला ईश्वरावर खरोखर विश्वास वाटतो का?
  • माझ्या मनातील श्रद्धा आणि धैर्य वाढवण्यासाठी मी काही प्रयत्न करतो का?

– – – – 

श्लोक क्र. २८ – – – 

दिनानाथ हा राम कोदंडधारी |

पुढे देखता काळ पोटी थरारी |

जना वाक्य नेमस्त हे सत्य मानी |

नुपेक्षी कदा राम दासाभिमानी |२८|

अर्थ: श्रीराम हा दीनांचा कैवारी/रक्षणकर्ता आहे. धनुर्धारी रामाला समोर पाहिल्यानंतर प्रत्यक्ष काळ म्हणजे यमराजाला देखील धडकी भरते. हे वाक्य सत्य समजा की भगवंत आपल्या भक्ताचा अभिमान बाळगणारा आणि त्याचे रक्षण करणारा आहे. तो त्याची कधीही उपेक्षा करत नाही.

(कोदंडधारी म्हणजे धनुष्य धारण केलेला, वाक्य – वचन, नेमस्त – निश्चितपणे)

विवेचन : मागील श्लोकात समर्थ आपल्याला सांगतात की भवाच्या भये काय भीतोस लंडी म्हणजे प्रपंचाच्या भीतीने हे मानवा तू का घाबरतोस ? या श्लोकात ते भगवंत आपला रक्षणकर्ता कसा आहे आणि तो आपल्या भक्तांची उपेक्षा कशी करीत नाही हे समर्थ निरनिराळ्या प्रकारे आपल्या मनावर बिंबवतात. त्यासाठीच भगवंत आपल्या दासाची/भक्ताची उपेक्षा करीत नाही हे सांगणारे (नुपेक्षी कदा राम दासाभिमानी)हे पालुपद असलेले बरेच श्लोक आहेत.

मनुष्य अनेक अर्थाने दुबळा किंवा परावलंबी असतो. संकटप्रसंगी त्याला कोणाचा तरी आधार हवा असतो. कधी कधी हा आधार तो आपल्या नातलगांमध्ये किंवा मित्रांमध्ये शोधत असतो. परंतु या सगळ्याच गोष्टी बेभरवशाच्या असतात. परिस्थिती फिरली की ही मंडळी सुद्धा पाठ फिरवतात. पैसा सुद्धा सर्वप्रसंगी उपयोगी पडेलच असे नाही. म्हणून संत आपल्याला कळकळीने सांगतात की आधार हा एकमेव परमेश्वराचाच असला पाहिजे कारण सर्व परिस्थितीत तोच आपल्याला साथ देईल. तो दीनानाथ आहे.

आपल्याला नुसता कोणाचातरी आधार आहे ही जाणीव सुद्धा खूप मानसिक बळ देणारी असते. स्वामी समर्थांच्या फोटोखाली, ” भिऊ नकोस मी तुझ्या पाठीशी आहे” असे वचन लिहिलेले असते. हे वचन लाखो भक्तांना जगण्याची शक्ती देते. स्वामी प्रत्यक्ष आपल्या पाठीशी आहेत या भावनेतून भक्त कठीण प्रसंगातूनही तरुन जातो. गीतेतील नवव्या अध्यायात भगवान श्रीकृष्ण म्हणतात – – 

अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।

तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्।।

– – जो भक्त निष्ठेने आणि माझ्यावर श्रद्धा ठेवून माझी उपासना करील त्याचे मी रक्षण करतो.

आजकाल बरीच शिकलेली मंडळी माझा देवावर विश्वास नाही असे म्हणत असतात आणि त्याचे निरनिराळ्या प्रकारे समर्थन करीत असतात. आपण आस्तिक म्हणून जगायचे की नास्तिक म्हणून जगायचे हा ज्याच्या त्याचा प्रश्न आहे. परंतु अशा मंडळींनी आस्तिक लोकांचा बुद्धिभेद करून त्यांच्या जगण्याचा आधार काढून घेऊ नये. ईश्वराला विज्ञानाच्या कसोटीवर अनुभवता येत नाही. त्याची अनुभूती श्रद्धेच्या कसोटीवर घेता येते ही गोष्ट त्यांनी लक्षात घ्यावी. परमेश्वराची अनुभूती येण्यासाठी त्याच्यावर दृढ श्रद्धा असावी लागते, निष्ठा असावी लागते. त्या भावनेने जोपर्यंत आपण त्याची भक्ती करीत नाही तोपर्यंत त्याचा अनुभव येणार नाही.

समर्थांना प्रिय असलेला आणि त्यांचे आराध्य दैवत असलेला राम हा कोदंडधारी म्हणजे धनुष्य धारण केलेला आहे. त्याच्या नुसत्या धनुष्याच्या टणत्काराने काळ देखील थरारतो. तो दीनांचा, दुःखितांचा रक्षण करणारा आहे. तो आपल्या भक्तांची कधीही उपेक्षा करीत नाही. फक्त आपली त्याच्यावर दृढ श्रद्धा हवी.

संकटातून परमेश्वर आपले रक्षण करतो असे समर्थ जे म्हणतात त्याचा अर्थ संकटांशी सामना करण्याची शक्ती तो आपल्याला देतो आणि त्याच्या कृपेनेच हा भवसागर आपण तरुन जातो असा आहे. तेव्हा हे मना, तू अन्य सगळे आधार सोडून केवळ एका रामावर श्रद्धा ठेव. तोच तुझे कल्याण करील. जेव्हा आपल्याला आतून जाणवते की एक दिव्यशक्ती आपल्या सोबत आहे, तेव्हा चिंता, राग, भविष्याची भीती यासारख्या गोष्टी आपोआपच कमी होतात. परमेश्वर आपल्या हृदयात आहे, आपल्याजवळ आहे ही अनुभूती आली की माणूस कोणत्याही संकटांना सहजपणे तोंड देऊ शकतो.

स्वसंवाद :: 

१) मी खरोखरच परमेश्वराला अंतिम आधार मानतो का ? की पैसा, मित्र नातेवाईक हेच अंतिम प्रसंगी उपयोगी पडतील असे मला वाटते ?

२) संकटसमयी देवावरील माझा विश्वास डळमळतो का की अधिक दृढ होतो? 

३) “राम दासाभिमानी आहे” या गोष्टीवर माझी श्रद्धा आहे का ? 

४) मी परमेश्वराला केवळ सुखात आठवतो की दुःखातही त्याच्यावर भार टाकतो ? (क्रमशः)

– क्रमशः श्लोक २७ आणि २८.

© श्री विश्वास देशपांडे

चाळीसगाव

प्रतिक्रियेसाठी ९४०३७४९९३२

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #३१८ ☆ रिश्ते नहीं रिसते… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

 

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख रिश्ते नहीं रिसते। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # ३१८ ☆

☆ रिश्ते नहीं रिसते… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

इक्कीसवीं सदी में संबंध व रिश्तों की परिभाषा बदल गई है। कोई संबंध पावन रहा नहीं; न ही रही है उसकी अहमियत व मर्यादा। रिश्ते आजकल दरक़ रहे हैं– उस इमारत की भांति, जो खंडहर के रूप में खड़ी तो दिखाई पड़ती है, परंतु उसके गिरने का अंदेशा सदा बना रहता है। यही दशा है आज के संबंधों की। संबंध अर्थात् सम+बंध, समान रूप से बंधा हुआ अर्थात् दोनों पक्ष के लोग उसकी महत्ता को समान रूप से समझें व स्वीकारें। परंतु आजकल तो संबंध स्वार्थ पर आधारित हैं। वैसे तो कोई ‘हेलो-हाय’ करना भी पसंद नहीं करता। इसमें दोष हमारी सोच व तीव्रता से जन्मती-पनपती आकांक्षाओं का है; जो सुरसा के मुख की भांति निरंतर बढ़ती चली जा रही हैं और मानव उनकी पूर्ति हेतु जी-जान से स्वयं अपने जीवन को खपा देता है। उस स्थिति में न उसे दिन की परवाह रहती है; न ही रात की। वह तो प्रतिस्पर्द्धा के चलते; दूसरे को पछाड़ आगे बढ़ने के लिए विभिन्न हथकंडे अपनाता है। इस परिस्थिति में वह रिश्ते-नातों को भुला कर दोस्ती को दाँव पर लगा, निरंतर उन्नति के पथ पर अग्रसर होता रहता है और अपने आत्मजों व प्रियजनों से बहुत दूर निकल जाता है…सांसारिक चकाचौंध में वह सबको भुला बैठता है। उसे दिखायी पड़ता है–केवल-मात्र अपना स्वार्थ-सिक्त लक्ष्य; जो पुच्छल तारे की भांति उसके विनाश का कारण बनता है। उस स्थिति में उसके पास पीछे मुड़कर देखने का समय भी नहीं होता।

‘रिश्तों की माला जब टूटती है, तो दोबारा जोड़ने से छोटी हो जाती है, क्योंकि कुछ जज़्बात के मोती बिखर जाते हैं।’ यह कथन कोटिश: सत्य है–इसलिए उन्हें बहुत प्यार व सावधानी से सहेजने व संजोने की दरक़ार है। ‘सावधानी हटी, दुर्घटना घटी।’ सो! रिश्ते कांच की भांति नाज़ुक होते हैं; किसी भी पल दरक़ जाते हैं और रिश्तों में आयी दरार कहीं खाई न बन जाए; उसका ख्याल रखना अत्यंत आवश्यक है। एक फिल्म की ये पंक्तियां, ‘चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनों’ व ‘ताल्लुक बोझ बन जाए, तो उसको तोड़ना अच्छा’ इन्हीं भावों को परिपुष्ट करती हैं। हृदय में संशय, संदेह, अविश्वास के भावों के अति-विषाक्त हो जाने से पूर्व अजनबी बन जाना बुद्धिमत्ता का प्रतीक है, ताकि संबंधों को पुन: स्थापित करने की संभावना बनी रहे। इसी संदर्भ में मनोमस्तिष्क में दस्तक दे रही हैं वे पंक्तियां, ‘दुश्मनी इतनी करो कि पुन: दोस्त बनने की संभावना शेष बनी रहे।’ सो! संभावना जीवन में अपना अहम् दायित्व निभाती है और वह सदैव बनी रहनी चाहिए। रहीम जी का दोहा ‘रहिमन धागा प्रेम का, मत तोरो चट्काय/ जोरै से पुनि न जुरै, जुरै गांठ परि जाइ’ भी यही संदेश देता है… जैसे धागे के टूटने पर वह दोबारा नहीं जुड़ पाता; उसमें गांठ पड़ना अवश्यंभावी है। उसी प्रकार रिश्तों में भी शक़, आशंका, संशय व ग़लतफ़हमी ऐसी दरारें उत्पन्न कर देते हैं, जिन्हें पाटना अत्यंत दुष्कर होता है।

परंतु आजकल माधुर्यपूर्ण रिश्ते तो गुज़रे ज़माने की बात हो गए हैं। संबंध-सरोकार शेष बचे ही नहीं। हर रिश्ते में अजनबीपन का अहसास व्याप्त है। रिश्ता चाहे पति-पत्नी का हो या भाई-भाई का हो; पिता-पुत्र का हो या मां बेटी का– सब एकांत की त्रासदी झेल रहे हैं; यहां तक कि बच्चे भी अकेलेपन से जूझ रहे हैं। पति-पत्नी में स्नेह, प्रेम, त्याग व समर्पण के अभाव होने का ख़ामियाज़ा सबसे अधिक बच्चे भुगत रहे हैं तथा उनके हृदय में अनगिनत प्रश्न ग़ाहे-बेग़ाहे कुनमुनाते हैं और वे अपने माता-पिता को कटघरे में खड़ा कर देते हैं, जिसे सुनकर वे स्तब्ध रह जाते हैं। ‘यदि उनके पास उनके पालन-पोषण करने का समय ही नहीं था, तो उन्होंने उन्हें जन्म ही क्यों दिया?’

अक्सर माता-पिता बच्चों को खिलौने व सुख-सुविधाएं प्रदान कर अपने दायित्वों की इति-श्री समझ लेते हैं; परंतु बच्चों को उनकी दरक़ार नहीं होती, बल्कि उन्हें तो माता-पिता के प्यार-दुलार व सान्निध्य-साहचर्य की आवश्यकता होती है; जिसके अभाव में उन मासूमों के हृदय में आक्रोश की स्थिति पनपने लगती है– जिसका परिणाम हमें बच्चों के नशे के आदी होने व अपराध जगत् की ओर प्रवृत्त होने के रूप में दिखने को मिलता है। इस स्थिति में उनका सर्वांगीण विकास कैसे संभव हो सकता है? मोबाइल, टी•वी• व मीडिया से उनका जुड़ाव व सर्वाधिक प्रतिभागिता सर्वत्र झलकती है; जो उनके जीवन का हिस्सा बन जाती है, जिसके परिणाम-स्वरूप वे मानसिक रोगी बन जाते हैं।

आजकल अहंनिष्ठता के कारण माता-पिता में अलगाव की स्थिति पनप रही है, जिसके कारण सिंगल-पेरेंट का प्रचलन तेज़ी से बढ़ रहा है। सो! बच्चों को माता का स्नेह-दुलार व पिता का सुरक्षा-दायरा नसीब नहीं हो पाता और वे कुंठा-ग्रस्त हो जाते हैं। उनके जीवन से आस्था व विश्वास के भाव नदारद हो जाते हैं और जीवन के प्रति उनका नज़रिया अथवा दृष्टिकोण सदैव नकारात्मक रहता है। सब्र, संतोष, करुणा, सहानुभूति, त्याग व  सहनशीलता से उनका दूर का नाता भी नहीं रहता। वे उसके श्रेय-प्रेय व शुभ-अशुभ पक्षों की ओर ग़ौर नहीं फ़रमाते; न ही निर्णय लेने व उसे कार्यान्वित करने में समय लगाते हैं; जिसका परिणाम हमें उनके प्रतिदिन फ़िरौती, अपहरण, लूटपाट, दुष्कर्म आदि के हादसों में लिप्त होने के रूप में दिखाई पड़ता है।

आज की युवा-पीढ़ी चार्वाक दर्शन से प्रभावित है तथा हर क्षण का तुरंत उपभोग कर लेना चाहती है। वे अगले पल अर्थात् कल व भविष्य की प्रतीक्षा नहीं करते। सो! युवावस्था में पदार्पण करने से पूर्व ही वे मासूम बच्चियों की अस्मत लूटने, एकतरफ़ा प्यार में तेज़ाब फेंकने व सरेआम गोलियां चलाने से गुरेज़ नहीं करते। दुष्कर्म करने के पश्चात् पीड़िता की दर्दनाक हत्या कर देना भी आजकल सामान्य सी घटना स्वीकारी जाती है, क्योंकि वे अपनी सुरक्षा-हेतु कोई भी सबूत छोड़ना नहीं चाहते। उस स्थिति में बहन, बेटी व मां के संबंध की सार्थकता उनकी दृष्टि में कहाँ महत्व रखती है? पहले पत्नी को छोड़कर हर महिला को मां, बहन, बेटी के रूप में मान्यता प्रदान की जाती थी और उनके आत्म-सम्मान पर आंच आने की स्थिति में वे अपने प्राणों की बाज़ी तक लगा देने को तत्पर रहते थे। परंतु आजकल तो दुधमुंही मासूम बच्चियां भी अपने माता-पिता के आंचल तले महफूज़ नहीं हैं… गिद्ध नज़रें हर-पल उनके चारों ओर मंडराती दिखाई पड़ती हैं।

चलिए! प्रकाश डालते हैं– पति-पत्नी के विवाहेतर संबंधों पर–पति-पत्नी और वो अर्थात् पर-स्त्री-गमन आज के समाज का फैशन हो गया है। ‘लिव-इन’ व ‘मी-टू’ के दुष्परिणाम तलाक़ के रूप में हमारे समक्ष हैं, जिसके कारण परिवार टूट रहे हैं। वैसे पैसा भी रिश्तों में दरार उत्पन्न करने में अहम् भूमिका अदा करता है। भाई-भाई, भाई-बहन, पिता-पुत्र, मां-बेटी व गुरू-शिष्य के पावन संबंध भी दाँव पर लगे रहते हैं। अक्सर वे एक-दूसरे की जान लेने पर सदैव आमादा रहते हैं। संतान द्वारा माता-पिता की हत्या के किस्से सामान्य हो गये हैं। पहले संयुक्त परिवार-प्रथा का प्रचलन था। एक कमाता था, दस खाते थे। परंतु आजकल हर इंसान अधिकाधिक धन कमाने में व्यस्त है, परंतु स्थिति सर्वथा भिन्न है। परिवार पति-पत्नी व बच्चों तक सिमट कर रह गये हैं और संवादहीनता के कारण पनप रही संवेदनशून्यता की स्थिति के परिणाम-स्वरूप रिश्तों में ग्रहण लग गया है– माता-पिता को वृद्धाश्रमों में शरण लेनी पड़ रही है। वे कमरे के बंद दरवाज़ों व शून्य छत की ओर ताकते; उन आत्मजों की प्रतीक्षा में रत रहते हैं; जिनके लौटने की संभावना नगण्य होती है। अक्सर बच्चों के विदेश-गमन के पश्चात् वे जीवन में अकेले जूझते व संघर्ष करते रहते हैं; जिसका परिणाम दस माह पश्चात् एक फ्लैट में किसी महिला व पुरुष का कंकाल प्राप्त होना है। यह आधुनिक समाज के सभी वर्ग के लोगों को कटघरे में खड़ा कर प्रश्न करता है– ‘क्या बच्चों का माता-पिता के प्रति कोई दायित्व नहीं है?’

वैसे इस अप्रत्याशित व भयावह स्थिति के लिए अपराधी केवल बच्चे नहीं, उनके माता-पिता भी हैं, जो उनके विदेश में होने पर फ़ख्र महसूस करते हैं। परंतु जब बच्चे वहाँ से लौट कर नहीं आते, तो उनकी जान पर बन आती है। सो! मैं अमुक घटना पर आपकी तवज्जो चाहूंगी; जिसे सुनकर आपके पाँव तले से ज़मीन खिसक जाएगी। चंद दिन पहले पिता ने अपने बेटे को उसकी मां की गंभीर बीमारी के बारे में सूचित करते हुए कहा कि वह उसे बहुत याद करती है। एक बार आकर वह उसे मिल जाए। परंतु वह नहीं आया। इतना ही नहीं– उसका अपने भाई से यह आग्रह करना कि भविष्य में मां के निधन पर वह चला जाए और पिता के निधन पर वह चला जाए। क्या यह संवेदनहीनता की पराकाष्ठा नहीं है?

आजकल तो लहू का रंग लाल ही नहीं रहा; श्वेत हो गया है। संवेदना-सरोवर सूख चुके हैं। अब उनमें कोई हलचल नहीं रही। संवाद संबंधों की जीवन-रेखा हैं। जब आप बात करना बंद कर देते हैं; अमूल्य संबंध खोने लगते हैं। उन्हें जीवित रखने के लिए आवश्यकता है– विवाद से बचने की और संबंधों को शाश्वत बनाए रखने की…जिसकी शर्त है, झुकना; सहन करना व प्रसन्नता से ख़ुद पराजय स्वीकार कर दूसरों को विजयी बनाने की बलवती इच्छा होना। सच्चे संबंध जीवन की वास्तविक पूंजी व धरोहर होते हैं, जो विषम परिस्थितियों में भी सहायक सिद्ध होते हैं। इनसे निबाह करने के लिए मानव को अहम् का त्याग करना अनिवार्य होता है, अन्यथा उसी के बोझ से वे टूट जाते हैं। ‘तूफ़ान में कश्तियों का बचना तो संभव है, परंतु अहं से हस्तियों का डूबना अनिवार्य है, निश्चित है।’

सो! आजकल सब संबंध दिखावे के हैं, जो मात्र छलावा हैं। वास्तव में हर शख्स भीतर से अकेला है। यही है जिंदगी की कशमकश; जिस से जूझता हुआ इंसान आवागमन के चक्र से मुक्ति नहीं प्राप्त कर सकता, बल्कि उसे आजीवन सुनामी की आशंका बनी रहती है। वह हर पल इसी आशंका में जीता है कि वे रिश्ते किसी पल भी दरक़ सकते हैं, क्योंकि अविश्वास, संदेह व शंका रूपी दीमक उसे खोखला कर चुकी होती है और वे संबंध नासूर बन आजीवन रिसते रहते हैं। परंतु फिर भी एक आशा, एक उम्मीद अवश्य बनी रहती है।

आइए! पारस्परिक मनोमालिन्य को त्याग सहज रूप से जीवन जीएं व अहं का त्याग कर मंगल-कामना करें कि वे ईर्ष्या-द्वेष व स्व-पर से ऊपर उठ सकें। संसार में जो सत्य है; वह सुंदर व कल्याणकारी है। सो! सत्य को सदैव संजोकर रखना व विषम परिस्थितियों में सम बने रहना श्रेयस्कर है।। क्रोध मानव का सबसे बड़ा शत्रु है, क्योंकि वह पल-भर में सब रिश्तों में सेंध लगाकर उन्हें नष्ट कर देता है। सो! दूसरों की भावनाओं का सदैव सम्मान करें व उनसे वैसा व्यवहार करें, जिसकी अपेक्षा हम उनसे करते हैं। पहले लोग भावुक होते थे; भावना में बहकर रिश्ते निभाते थे। फिर लोग प्रैक्टिकल हुए और भावना का जीवन में कोई स्थान नहीं रहा; रिश्तों से फायदा उठाने लगे। अब वे प्रोफेशनल हो गए हैं और वही रिश्ते निभाने लगे हैं; जिनसे अपने स्वार्थ साधे जा सकें।

‘रिश्ते नम्रता से निभाए जा सकते हैं; छल-कपट से तो केवल महाभारत रची जा सकती है।’ इसलिए बुरा मत मानिए–अगर लोग आपको ज़रूरत के समय याद करते हैं, बल्कि गर्व कीजिए, क्योंकि मोमबत्ती की याद तभी आती है, जब अंधेरा होता है। सो! रिश्तों की गहराई को अनुभव कीजिए-समझिए। सहृदय बनिए और स्नेह-सौहार्द बनाए रखिए। रिश्तों में प्रतिदान की अपेक्षा मत रखिए; केवल देना सीखिए अर्थात् समर्पण व त्याग की महत्ता व अहमियत स्वीकारिए, ताकि रिश्ते स्वस्थ बने रहें और उनमें ताज़गी बरक़रार रहे। रिश्ते रिसते न रहें, बल्कि रिश्तों का अहसास बना रहे और वे जीवन को आंदोलित करते रहें; जिससे जीवन-बगिया महकती रहे; लहलहाती रहे। वहां चिर-वसंत का वास हो और मलय वायु के झोंके सभी दिशाओं को आलोड़ित व अलौकिक आनंद से सराबोर करते रहें–यही अनमोल रिश्तों की सार्थकता है।

●●●●

© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुंज #३१८ ☆ सरस्वती वंदना ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं आपके द्वारा रचित – सरस्वती वंदना )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # ३१८ – साहित्य निकुंज ☆

🙏 सरस्वती वंदना 🙏 डॉ भावना शुक्ल ☆

माँ शारदे तुम्हें आना होगा।

ज्ञान सुधा बरसाना होगा।

तेरे चरणों में मैया मेरा माथा होगा।

ज्ञान सुधा बरसाना होगा।

श्वेत कमल पर तू राजे

कर में वीणा धार।

मधुर-मधुर स्वर निकले

प्यारी – सी झंकार।

मन मंदिर में आना होगा।

माँ सरस्वती तुम्हें आना होगा।

ज्ञान सुधा बरसाना होगा।

 *

नाद से तेरे गूंजे जग सारा

चारों दिशी  फैले उजियारा।

ज्ञान सुधा का अमृत बरसता

जीवन रस  बरसाना होगा।

माँ शारदे तुम्हें आना होगा।

ज्ञान सुधा बरसाना होगा।

 *

 तेरी कृपा से मिलता  ज्ञान।

मन में सुमंगल गाते गान।

चरणों में तेरे शीश झुकाता।

भक्ति भाव का पुष्प चढ़ाता  ।

हर हृदय में प्रकाश फैलाना होगा।

माँ शारदे तुम्हें आना होगा।

ज्ञान सुधा बरसाना होगा।

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रचना संसार # ९० – नवगीत – जीवन को वसंत करो… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆

सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीत – जीवन को वसंत करो

? रचना संसार # ९० – गीत – जीवन को वसंत करो…  ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ? ?

पतझड़ से इस जीवन को तुम,

आकर कंत वसंत करो।

नीरस ,नीरव संप्रेषण को,

गुप्त ,निराला ,पंत करो।।

*

शब्द -शब्द  माणिक कर  दो तुम,

भरो प्रेम की गागर तुम।

गुंजित सारा जग हो जाए,

वंशी तुम नटनागर तुम।।

भाव  सुपावन गंगाजल कर,

लेखन को जीवंत करो।

*

श्वेता की वीणा बजती हो,

सात सुरों की सरगम हो।

अलंकार रस छंद  निराले,

नवल सृजन का उद्गम हो,

नव रस की रसधारा में तुम,

पीडाओं का अंत करो।

*

निष्ठाओं की डोर पकड़कर ,

तन -मन अर्पण करना है।

दिनकर -सा उजियारा करने ,

सार्थक चिंतन  करना है।।

जग -कल्याण भावना रखकर,

मन को सज्जन संत करो ।

© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)

संपर्क –1308 कृष्णा हाइट्स, ग्वारीघाट रोड़, जबलपुर (म:प्र:) पिन – 482008 मो नं – 9424669722, वाट्सएप – 7974160268

ई मेल नं- meenabhatt18547@gmail.com, mbhatt.judge@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष #३०० ☆ गीत – बड़ो नटखट कृष्ण कन्हैया… ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका एक गीत – बड़ो नटखट कृष्ण कन्हैया आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # ३०० ☆

गीत – बड़ो नटखट कृष्ण कन्हैया☆ श्री संतोष नेमा ☆

इत पकड़त वो उत झट धावें, हाथ बढ़ावें मैया

दधि-माखन की मटकी फोड़ें, खाबें खूब मलैया

*

प्रेम -जाल सखियों पै फेंके, बाँके बंशी बजैया

बालापन बहु असुर संहारे, हर्षित यशुमति मैया

*

भू मंडल मुँह खोल दिखाया, चकित भई तब मैया

बाल रूप “संतोष” सुहावे, चाहे प्रभु की छैयां

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 70003619839300101799

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शशि साहित्य # २० – कविता – अभी बाकी है… ☆ श्रीमती शशि सराफ ☆

श्रीमती शशि सराफ

(श्रीमती शशिसुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता अभी बाकी है।)

☆ शशि साहित्य # २० ☆

? कविता – अभी बाकी है…  ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ  ? ?

🫟🫟🫟🫟🫟

बहुत लुटाया है…

उससे ज्यादा बाकी है..

 

थाम कर हाथ चल दूं, खुद का,

राह अभी वह बाकी है..

 

आईने में देख खुद को,

मुस्कुरा सकूं,

सम्मान अभी वह बाकी है..

 

आसमान दामन में भर लूं,

अरमान अभी वह बाकी है..

 

जरा तौल लूं पंखों को,

उड़ान अभी तो बाकी है..

 

आवाज सुनकर थम जाऊं..

पुकार में अब क्या बाकी है????

 

भोर का सूरज चमक उठा,

ना अब अंधियारा बाकी है..

 

मन उम्मीदों से भरा हुआ है,

“उसको”  गुहार  सुनना पड़ेगी,

प्रार्थना दिल से जारी है..

© श्रीमती शशि सराफ

जबलपुर, मध्यप्रदेश 

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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