English Literature – Poetry ☆ Anonymous litterateur of Social Media# 18 ☆ गुमनाम साहित्यकारों की कालजयी रचनाओं का भावानुवाद ☆ कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम्

कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम्

(हम कैप्टन प्रवीण रघुवंशी जी द्वारा ई-अभिव्यक्ति के साथ उनकी साहित्यिक और कला कृतियों को साझा करने के लिए उनके बेहद आभारी हैं। आईआईएम अहमदाबाद के पूर्व छात्र कैप्टन प्रवीण जी ने विभिन्न मोर्चों पर अंतरराष्ट्रीय स्तर एवं राष्ट्रीय स्तर पर देश की सेवा की है। वर्तमान में सी-डैक के आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और एचपीसी ग्रुप में वरिष्ठ सलाहकार के रूप में कार्यरत हैं साथ ही विभिन्न राष्ट्र स्तरीय परियोजनाओं में शामिल हैं।

स्मरणीय हो कि विगत 9-11 जनवरी  2020 को  आयोजित अंतरराष्ट्रीय  हिंदी सम्मलेन,नई दिल्ली  में  कैप्टन  प्रवीण रघुवंशी जी  को  “भाषा और अनुवाद पर केंद्रित सत्र “की अध्यक्षता  का अवसर भी प्राप्त हुआ। यह सम्मलेन इंद्रप्रस्थ महिला महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय, दक्षिण एशियाई भाषा कार्यक्रम तथा कोलंबिया विश्वविद्यालय, हिंदी उर्दू भाषा के कार्यक्रम के सहयोग से आयोजित  किया गया था। इस  सम्बन्ध में आप विस्तार से निम्न लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं :

हिंदी साहित्य – आलेख ☆ अंतर्राष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन ☆ कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम्

☆ Anonymous Litterateur of Social Media # 18 सोशल मीडिया के गुमनाम साहित्यकार # 18 ☆ 

आज सोशल मीडिया गुमनाम साहित्यकारों के अतिसुन्दर साहित्य से भरा हुआ है। प्रतिदिन हमें अपने व्हाट्सप्प / फेसबुक / ट्विटर / यूअर कोट्स / इंस्टाग्राम आदि पर हमारे मित्र न जाने कितने गुमनाम साहित्यकारों के साहित्य की विभिन्न विधाओं की ख़ूबसूरत रचनाएँ साझा करते हैं। कई  रचनाओं के साथ मूल साहित्यकार का नाम होता है और अक्सर अधिकतर रचनाओं के साथ में उनके मूल साहित्यकार का नाम ही नहीं होता। कुछ साहित्यकार ऐसी रचनाओं को अपने नाम से प्रकाशित करते हैं जो कि उन साहित्यकारों के श्रम एवं कार्य के साथ अन्याय है। हम ऐसे साहित्यकारों  के श्रम एवं कार्य का सम्मान करते हैं और उनके कार्य को उनका नाम देना चाहते हैं।

सी-डैक के आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और एचपीसी ग्रुप में वरिष्ठ सलाहकार तथा हिंदी, संस्कृत, उर्दू एवं अंग्रेजी भाषाओँ में प्रवीण  कैप्टन  प्रवीण रघुवंशी जी ने  ऐसे अनाम साहित्यकारों की  असंख्य रचनाओं  का कठिन परिश्रम कर अंग्रेजी भावानुवाद  किया है। यह एक विशद शोध कार्य है  जिसमें उन्होंने अपनी पूरी ऊर्जा लगा दी है। 

इन्हें हम अपने पाठकों से साझा करने का प्रयास कर रहे हैं । उन्होंने पाठकों एवं उन अनाम साहित्यकारों से अनुरोध किया है कि कृपया सामने आएं और ऐसे अनाम रचनाकारों की रचनाओं को उनका अपना नाम दें। 

कैप्टन  प्रवीण रघुवंशी जी ने भगीरथ परिश्रम किया है और इसके लिए उन्हें साधुवाद। वे इस अनुष्ठान का श्रेय  वे अपने फौजी मित्रों को दे रहे हैं।  जहाँ नौसेना मैडल से सम्मानित कैप्टन प्रवीण रघुवंशी सूत्रधार हैं, वहीं कर्नल हर्ष वर्धन शर्मा, कर्नल अखिल साह, कर्नल दिलीप शर्मा और कर्नल जयंत खड़लीकर के योगदान से यह अनुष्ठान अंकुरित व पल्लवित हो रहा है। ये सभी हमारे देश के तीनों सेनाध्यक्षों के कोर्स मेट हैं। जो ना सिर्फ देश के प्रति समर्पित हैं अपितु स्वयं में उच्च कोटि के लेखक व कवि भी हैं। वे स्वान्तः सुखाय लेखन तो करते ही हैं और साथ में रचनायें भी साझा करते हैं।

☆ गुमनाम साहित्यकार की कालजयी  रचनाओं का अंग्रेजी भावानुवाद ☆

(अनाम साहित्यकारों  के शेर / शायरियां / मुक्तकों का अंग्रेजी भावानुवाद)

❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ 

बहुत ही नादान है वो,

ज़रा समझाइए ना उसे,

बात न करने से कभी,

मोहब्बत कम नहीं होती…

 

She is too innocent,

Please explain to her that

Not talking to someone

Doesn’t reduce love for him!

❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ 

रूह से जुड़े रिश्तों पर

फरिश्तों के पहरे होते है

कोशिशें कर लो तोड़ने की

ये और भी गहरा जाते हैं…

Soul-related relationships

are guarded by the angels

If you try breaking them

they consolidate further…

❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ 

नींद लेने का मुझे ऐसा

कोई शौक भी नहीं

अगर तेरे ख्वाब न देखूँ

तो गुजारा भी नहीं होता…

 

Though not so very

fond of falling asleep…

But then can’t even live

without seeing your dreams

❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ 

छोटा सा लफ्ज है मुहब्बत

मगर तासीर है इसकी गहरी

गर दिल से करोगे इसे तुम

तो कदमों में होगी ये दुनिया सारी…

 

Love is a little word, though

But its effect is so deep

If you do it with all your heart

Whole world lies at your steps

❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ 

© Captain Pravin Raghuvanshi, NM

≈  Blog Editor – Shri Hemant Bawankar/Editor (English) – Captain Pravin Raghuvanshi, NM ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ काव्य धारा # 6 ☆ यहाँ यादें बचपन की ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ 

( श्री गणेश चतुर्थी पर्व के शुभ अवसर पर प्रस्तुत है गुरुवर प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  की  बचपन की यादों से परिपूर्ण कविता यहाँ यादें बचपन की। हमारे प्रबुद्ध पाठक गण  प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी  काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे।  ) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ काव्य धारा # 6 ☆

☆ यहाँ यादें बचपन की ☆

 

आता है याद मुझको बचपन का घर वो प्यारा
अपनो के साथ मैने जीवन जहाँ गुजारा

खुशियों के साथ बीता जहॉ बालपन बिना भय
नहीं थी न कोई चिन्ता न ही कोई जय पराजय

घर वह कि पूर्वजो ने जिसे था कभी बनाया
जिसने मुझे बढ़ाया दे अपनी स्नेह छाया

आँगन था जिसका सुदंर औं बाग वह सुहाना
मैने जहाँ सुना नित चिड़ियों का चहचहाना

फूलों की छवि निरख खिंच तितलियाँ जहाँ आती
जो मेरे बालमन को बेहद रही लुभाती

जिनको पकड़ने गुपचुप हम बार बार जाते
पर कोशिशें भी कर कई उनको पकड़  न पाते

कैसा था मस्त मोहक बचपन का वह जमाना
कभी बेफिकर थिरकना कभी साथ मिल के गाना

कभी गिल्ली डण्डा गोली लट्टू कभी घुमाना
कभी छत पै चढ़  के चुपके ऊँचे पंतग उड़ाना

कभी साथियो के संग मिल कुछ पढना या पढाना
कभी घूमने को जाना या सायकिल चलाना

नजरों मे बसी हुई है माँ नर्मदा की धारा
सब घाट और मंदिर पावन हरा किनारा

स्कूल, क्लास, शिक्षक, बस्ती, गली बाजारें
पिताजी की शुभ सिखावन माँ की मधुर पुकारे

ताजी है अब भी मन मे सारी पुरानी बातें
खुशियों भरे मनोहर सुबह शाम दिन औं रातें

बदलाव ने समय के दुनियां बदल दी सारी
दुनियाँ  के संग बदल गई सब जिंदगी हमारी

पर चित्त मे बसे है अब भी मधुर वे गाने
होकर भी जो पुराने नये से हैं क्यों न जाने

एकान्त में उभरता अब भी वो सौम्य सपना
जिससे अधिक सुहाना लगता न कोई अपना

ले आई खींच आगे बरसो समय की दूरी
लगता है मन की सारी इच्छाएं हुई न पूरी

आते हैं पर कभी क्या वे दिन जो बीत जाते
बस याद बन ही मन को रहते सदा रिझाते

जिनसे भरी रसीली सुखदायी शांति सारी
हर व्यक्ति के लिये है जीवन की निधि जो प्यारी

 

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ 

ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी , रामपुर , जबलपुर

vivek1959@yahoo.co.in

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

 

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ प्रस्तर की छाती तोड़ चलें ☆ श्री अमरेंद्र नारायण

श्री अमरेंद्र नारायण

( आज प्रस्तुत है सुप्रसिद्ध साहित्यकार एवं  देश की एकता अखण्डता के लिए समर्पित व्यक्तित्व श्री अमरेंद्र नारायण जी की ओजस्वी कविता प्रस्तर की छाती तोड़ चलें)

☆ प्रस्तर की छाती तोड़ चलें ☆

प्रस्तर की छाती तोड़ चलें

निर्झर का कलकल गान करें

उत्साह ,शक्ति और भक्ति से

संजीवन हम पाषाण करें!

 

ईश्वर ने मन की शक्ति दी

संघर्ष हेतु क्षमता दी है

बाधाओं को कर सकें पार

मानव में कर्मठता दी है

 

हम एक पांव आगे धरते

दूजा तो स्वयं उठ जाता है

जो लक्ष्य दूर था दीख रहा

कुछ और निकट आ जाता है!

 

जब साथ हमारे हों अपने

संघर्ष गान बन जाता है

हर प्रस्तर में जीवन आता

उत्साह और बढ़ जाता है

 

आओ हम मिलकर साथ चलें

मरुथल में हरियाली लायें

हर मुखड़े पर मुस्कान खिले

जीवन संगीत सुना जायें!

 

यह सर्वसहा वसुधा अपनी

भला कब तक इतनी व्यथा सहे

पाषाण तोड़ निर्झर लायें

रसवंती जल की धार बहे!

 

©  श्री अमरेन्द्र नारायण 

जबलपुर

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि ☆ चुप्पी- दो चित्र ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। )

☆ संजय दृष्टि  ☆ चुप्पी- दो चित्र ☆

1)

कई दिन चुप रही

फिर लौट गई चुप्पी,

कुछ प्रश्न खो गए

कुछ प्रश्न अनावृत्त हो गए!

2)

लौट आई है चुप्पी

जैसे लौट आई हो

टूटती साँस….,

चुप्पी का लौटना

कितनी अनुभूतियों को

शब्द दे गया….!

 

©  संजय भारद्वाज 

2.9.18, संध्या 6:40 बजे।

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆

मोबाइल– 9890122603

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कोहरे के आँचल से # 43 ☆ कोरोना अपने घर जाओ ना! ☆ सौ. सुजाता काळे

सौ. सुजाता काळे

(सौ. सुजाता काळे जी  मराठी एवं हिन्दी की काव्य एवं गद्य विधा की सशक्त हस्ताक्षर हैं। वे महाराष्ट्र के प्रसिद्ध पर्यटन स्थल कोहरे के आँचल – पंचगनी से ताल्लुक रखती हैं।  उनके साहित्य में मानवीय संवेदनाओं के साथ प्रकृतिक सौन्दर्य की छवि स्पष्ट दिखाई देती है। आज प्रस्तुत है  सौ. सुजाता काळे जी  द्वारा  प्राकृतिक पृष्टभूमि में रचित एक अतिसुन्दर भावप्रवण  कविता  “कोरोना अपने घर जाओ ना!”। )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कोहरे के आँचल से # 43 ☆

☆ कोरोना अपने घर जाओ ना! ☆

बात पते की आज कह रहे

तुम घर वापस जाओ ना!

छह महिनों से  यहाँ टिके हो

कोरोना अपने घर जाओ ना!

 

बहुत दिनों से टिके हुए हो

काफी मिट्टी खोद चुके हो

आर्थिक सीमाओं की चट्टान

गरदन मरोड़ के तोड़ चुके हो।

 

कितना दुष्कर्म कर रहे हो

दुर्बल को ही छल रहे हो।

चुपके से गलियों में उसकी

बेवजह क्यों घूम रहे हो?

 

कैसा नरसंहार मचा रखा है?

उम्र का कोई लिहाज नहीं है

बुढ़ा- बच्चा, जवान न देखो

गर्भवती को ना छोड़ रहे हो।

 

गरीब हमारी जनता सारी

पाई पाई को मोहताज हुई है

सबके पेट में लात मारकर

छाती पर तुम मूँग दल रहे हो।

 

क्या तुम्हारी धरती तुमको

क्यों पुकार नहीं रहीं है?

जहाँ से आए हो तुम अब

वापस घर जाओ ना…

कोरोना अपने घर जाओ ना!

 

© सुजाता काळे

7/7/20

पंचगनी, महाराष्ट्र, मोबाईल 9975577684

sujata.kale23@gmail.com

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुंज # 58 ☆ भावना के दोहे ☆ डॉ. भावना शुक्ल

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं   “भावना के दोहे”। ) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # 58 – साहित्य निकुंज ☆

☆ भावना के दोहे ☆

रोटी

तरसें रोटी के लिए,

दीनहीन  लाचार।

रोटी उनकी जिंदगी,

तन-मन मूलाधार।।

 

अनुवाद

संबंधों का कीजिए,

मधुर सरस अनुवाद।

जीवन जीना प्रेम से,

होगा नहीं विवाद।।

 

उल्लास

दृष्टि-दृष्टि को देखकर,

जाग उठा उल्लास।

मोह लिया मन आपने,

जगी प्रेम की आस।।

 

दर्पण

दर्पण में छवि देखकर,

आई मुझको लाज।

सीरत को पहचानकर,

बजे हृदय के साज।।

 

घाव

भूले से  देना नहीं,

इतने गहरे घाव।

सहन न कर पाएँ कभी,

जिनके दुखद प्रभाव।।

 

पंछी

पंछी की पीड़ा हमें,

करती है बेचैन।

बिना नीड़ के हो गया,

जिसका कलरव चैन।।

 

पहाड़

सुंदरता है प्रकृति की,

नदियाँ  पेड़ पहाड़।

फिल्मों की शोभा बढ़ी,

लेकर इनकी आड़।।

 

प्यास

जल बिन जीवन व्यर्थ है,

सूखी नदिया मौन।

सावन अंगारा लगे,

प्यास बुझाए कौन।।

 

© डॉ.भावना शुक्ल

सहसंपादक…प्राची

प्रतीक लॉरेल , C 904, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब  9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com
≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष # 49 ☆ संतोष के दोहे ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष”

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. 1982 से आप डाक विभाग में कार्यरत हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं.    “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में प्रस्तुत है  “संतोष के दोहे”। आप श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार  आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # 49☆

☆ संतोष के दोहे ☆

रोटी

रोटी की खातिर चले,पैदल ही मजदूर

दबकर नीचे ट्रेन के,सपने चकनाचूर

 

घाव

कोरोना ने दे दिया,दिल पर ऐसा घाव

जीवन के प्रति कम हुआ,सब का आज लगाव

 

पंछी

पंछी को उन्मुक्त गगन,आजादी की चाह

मस्त पवन के संग उड़े,करें कहाँ परवाह

 

प्यास

धन-दौलत से कब बुझी,कभी किसी की प्यास

ये वो लालच है यहाँ,जिसकी खत्म न आस

 

पहाड़

अक्सर मुश्किल में लगे,जीवन हमें पहाड़

संकट में जब शेर हो,होती मन्द दहाड़

 

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

सर्वाधिकार सुरक्षित

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.)

मो 9300101799

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # 38 ☆ गीत – धरती गई उसारे में ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’

डॉ राकेश ‘ चक्र’

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक शताधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।  जिनमें 70 के आसपास बाल साहित्य की पुस्तकें हैं। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  इनमें प्रमुख हैं ‘बाल साहित्य श्री सम्मान 2018′ (भारत सरकार के दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी बोर्ड, संस्कृति मंत्रालय द्वारा  डेढ़ लाख के पुरस्कार सहित ) एवं उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा ‘अमृतलाल नागर बालकथा सम्मान 2019’। अब आप डॉ राकेश ‘चक्र’ जी का साहित्य प्रत्येक गुरुवार को  उनके  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  आत्मसात कर सकेंगे । इस कड़ी में आज प्रस्तुत हैं  एक भावप्रवण  गीत  “धरती गई उसारे में ”.)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # 38 ☆

☆ गीत – धरती गई उसारे में ☆ 

अनगिन दीपक नए जले हैं

कुछ डूबे अँधियारे में

रिश्तों के ये महाबन्ध हैं

बात गईं चौबारे में।।

 

कभी बजे थे ढोल-मृदंगा

नर्तन की शहनाई थी

वही पड़ा शमशान लोक में

डूब गई तरुणाई थी

थे जिससे मधु-राग-फाग से

फिर से चौड़ी खाई थी

 

सावन की मल्हारें छूटीं

छूटा मेड़ों-हारों में।।

 

भाग रहे सब यंत्रवती से

बूढ़े हैं तन्हाई में

कोई श्रम कर स्वेद बहाए

कुछ हैं माल-मलाई में

जीवन के सब अर्थ खो रहे

छूटा धान गहाई में

 

काम हो रहे बड़े-बड़े अब

धरती गई उसारे में।।

 

मूल्यों पर आघात प्रपंची

शोर शराबा मेला है

जो था हीरा कभी कैरटी

आज वही अब धेला है

गुरू हो रहे गुड़ गोबर अब

चीनी-शक्कर चेला है

 

सत्ता-कुर्सी उलझ रही हैं

सब कुछ डूबा नारे में।।

 

डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001

उ.प्र .  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ तन्मय साहित्य # 59 – कुछ दोहे…. ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

(अग्रज  एवं वरिष्ठ साहित्यकार  श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी  जीवन से जुड़ी घटनाओं और स्मृतियों को इतनी सहजता से  लिख देते हैं कि ऐसा लगता ही नहीं है कि हम उनका साहित्य पढ़ रहे हैं। अपितु यह लगता है कि सब कुछ चलचित्र की भांति देख सुन रहे हैं।  आप प्रत्येक बुधवार को श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’जी की रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज के साप्ताहिक स्तम्भ  “तन्मय साहित्य ”  में  प्रस्तुत है  आपके अतिसुन्दर कुछ दोहे…. । )

☆  साप्ताहिक स्तम्भ – तन्मय साहित्य  # 59 ☆

☆ एक बाल कविता – कुछ दोहे…. ☆  

 

तप्त धरा शीतल हुई, खिली खिली सुप्रभात।

जड़-चेतन,जन हर्ष मय, शुभागमन बरसात।।

 

झिरमिर झिरमिर सावनी, पावस प्रीत फुहार।

हुलस-हुलस उफना रहा, मन में संचित प्यार।।

 

निर्मल मन की वाटिका, सौरभ पवन प्रवाह।

अंतस को पावन करे, भरे उमंग उछाह।।

 

ईर्ष्यालु दंभी मनुज, रचते सदा कुचक्र।

सीधे पथ पर भी चले, सांपों जैसे वक्र।।

 

मुफ्तखोर ललचाउ के, मन में ऊंची चाह।

छल, प्रपंच, पांसे चले, पकड़े उल्टी राह।।

 

सावन के झूले कहाँ, कहाँ आम के पेड़।

बचपन बस्ते से निकल, सीधे हुआ अधेड़।।

 

© सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

जबलपुर/भोपाल, मध्यप्रदेश

मो. 9893266014

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – कृष्णा साहित्य # 39 ☆ कविता – लिख देना ☆ श्रीमती कृष्णा राजपूत ‘भूमि

श्रीमती कृष्णा राजपूत ‘भूमि’  

( श्रीमती कृष्णा राजपूत ‘भूमि’ जी  एक आदर्श शिक्षिका के साथ ही साहित्य की विभिन्न विधाओं जैसे गीत, नवगीत, कहानी, कविता, बालगीत, बाल कहानियाँ, हायकू,  हास्य-व्यंग्य, बुन्देली गीत कविता, लोक गीत आदि की सशक्त हस्ताक्षर हैं। विभिन्न पुरस्कारों / सम्मानों से पुरस्कृत एवं अलंकृत हैं तथा आपकी रचनाएँ आकाशवाणी जबलपुर से प्रसारित होती रहती हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक अतिसुन्दर रचना  लिख देना । श्रीमती कृष्णा जी की लेखनी को  इस अतिसुन्दर रचना के लिए  नमन । ) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – कृष्णा साहित्य # 39 ☆

☆ सजल – लिख देना ☆

कलम से इस हथेली पर

समर्पण त्याग लिख देना

मिलने सेउस  हवेली पर

मेरा पैगाम  लिख देना।

 

गुजरे है कई दिन रात

हवाओं ने है समझाया

सूरज की धूप का कहर

उसने जी भर  बरसाया

दी है चाँदनी  ने दुआ

कोई  न श्राप  लिख देना ।

 

जिल्लतों की जी जिन्दगी

उफ भी नहीं किया हमने

गलत थे कभी  भी  ना हम

उठाए फिरे नाज नखरे

माला है आज  ये मौके

दर्पण  साफ लिख देना

 

निकल आया वहाँ  से जो

कभी  न जाना  होगा अब

हवेली  ने सताया है

गले गमों को लगाया है

मिला अब छुटकारा  हमें

राम  मनाया लिख  देना ।

 

© श्रीमती कृष्णा राजपूत  ‘भूमि ‘

अग्रवाल कालोनी, गढ़ा रोड, जबलपुर -482002 मध्यप्रदेश

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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