हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अभिव्यक्ति # -९६ – सागर की लहरें… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता सागर की लहरें।)

☆ अभिव्यक्ति # ९६ ☆ सागर की लहरें☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

सागर की लहरें, लहर लहर,

कुछ उठती हैं, लहराती हैं,

कुछ धीरे से ही उठती हैं

कुछ जोर लगाकर उठती हैं,

उठती हैं, फिर गिर जाती हैं,

उठती अन्तस गहराई से,

उठती हैं, वो चतुराई से,

वो लहरों से कतराती हैं,

फिर लहरों पर गिर जाती हैं,

इनको देखो तो गिनना तुम,

कभी इनकी बातें, सुनना तुम,

बस शोर नहीं है इनका वो,

अंतर्द्वंद को सुनना तुम,

भागी आती हैं, किनारे पर,

तट पे सिमटती जाती हैं,

क्या कहा, कभी, कुछ तट ने था

कदमों में सर को पटकती हैं,

क्या कहा था तट ने न जाने,

लहरें बेचैन हुई क्यों हैं,

क्या रिश्ता है, तट से इनका,

क्यों सर को अब भी पटकती हैं,

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३२४ ☆ व्यंग्य – होनी को टालने के टोटके ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम विचारणीय व्यंग्य – ‘होनी को टालने के टोटके‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३२४ ☆

☆ व्यंग्य ☆ होनी को टालने के टोटके डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

कुछ समय पहले एक अखबार में मजे़दार खबर पढ़ी थी कि राजस्थान में हर साल करीब 200 नेता, अफसर, बिल्डर जेल का खाना खाते हैं। कारण यह बताया गया कि ज्योतिषी ने उनकी कुंडली में ‘कारागार योग’ या ‘जेल योग’ बताया था और कहा था कि जेल का खाना खाने से ‘जेल योग’ का संकट टल सकता है। यानी अगर वे जेल का खाना खा लेंगे तो ऊपर वाले के रिकॉर्ड में आगे संभावित सज़ा से बच जाएंगे। हमारे यहां इसे ‘अलफ़’ टालना कहते हैं। एक ज्योतिषी जी ने संवाददाता को बताया कि जेल का खाना खाने का टोटका 50% तक काम करता है।

एक विधायक प्रत्याशी ने अखबार  के संवाददाता को बताया कि उन्होंने केंद्र सरकार के खिलाफ कई प्रदर्शन किये हैं, इसलिए उन्हें भय है कि उन्हें किसी भी मामले में फंसा कर जेल में डाला जा सकता है। उन्होंने कहा कि वे जेल से बाहर रहकर समाज की सेवा करना चाहते हैं, इसलिए ‘जेल योग’ टालने के लिए जेल का खाना खाते हैं।

कुछ लोग लोकलाज के कारण जेल में ही खाने के बजाय खाने को बंधवाकर घर ले जाते हैं। यह भी पढ़ने को मिला कि कुछ आईएएस अधिकारियों को ज़मानत नहीं मिल रही थी तो उनके ज्योतिषी ने उन्हें घर का खाना मंगाने के बजाय जेल का खाना खाने की सलाह दी थी। पता नहीं इस टोटके का कुछ असर हुआ या नहीं।

मुझे अपने छात्र जीवन की याद आती है जब एक बार हम चार पांच छात्र किसी मरीज़ को देखने अस्पताल गये थे। हम में से एक वहां की एक ‘बेड’ पर लंबा हो गया। पूछने पर भाई ने बताया कि वह अपनी ‘अलफ़’ टाल रहा था, यानी यदि उसकी किस्मत में ‘अस्पताल योग’ हो तो वह अभी खारिज हो जाए। आदमी अब इतना होशियार हो गया है कि उसने होनी को भी टालने के जुगाड़ ढूंढ़ लिये हैं।

गांव में जब हमें किसी ‘अशुभ’ दिन पर बाहर निकलने की ज़रूरत होती थी तो एक दिन पहले अपने किसी सामान को आगे वाले पड़ोसी के घर में रखा दिया जाता था। माना जाता था कि ‘प्रस्थान’ एक दिन पहले हो गया और अब यात्रा दूसरे दिन निर्विघ्न की जा सकती है।

मृत्यु के बाद के कर्मकांड में भी अब ‘शॉर्टकट’ ढूंढ़े जा रहे हैं। आज के आदमी को कर्मकांडों के हिसाब से चलने की फुरसत नहीं है। उसके लिए अपना काम और अपनी कमाई सबसे ज़्यादा ज़रूरी है। इसलिए अब तेरहीं और ‘बरसी’ एक दिन के अंतर से निपटने लगी है, जब कि ‘बरसी’ एक बरस बाद होनी चाहिए। यह भी देखा कि मृतक की संतानें अग्निसंस्कार के बाद पंडित जी को बता देती हैं कि तेरहीं के लिए उनका आना संभव नहीं है, इसलिए जो कुछ भी करना है, तत्काल करा दीजिए। बेचारे पंडित जी भी अपनी जान बचाते हुए सुरक्षित रास्ता खोजते रहते हैं।

आज का आदमी नये और पुराने के बीच में झूलने के लिए अभिशप्त है। पुराने संस्कारों को छोड़ नहीं पाता, इसलिए उन्हें यथासंभव तोड़- मरोड़कर ज़िंदगी की गाड़ी को आगे ठेल रहा है।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य क्षणिका# ९५ – पराये भी अपने… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– पराये भी अपने…” ।

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य क्षणिका # ९५ — पराये भी अपने — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

दिवाली से चार दिन पहले हमारे पड़ोसी के घर में जवान बेटे की मृत्यु हुई थी इसलिए वहाँ दिवाली के दिये नहीं जले। शोक मानो स्वयं बोला हो। हमारे यहाँ दिवाली की भव्य तैयारी तो हो गई थी, लेकिन मेरे पिता ने हमसे कहा था हम दो ही दिये जलायें। पिता के कहने से हमने ऐसा ही किया। शोकग्रस्त घर के उधर के पड़ोसी ने भी दो ही दिये जलाये। इस बार मेरे पिता बोले थे, “पड़ोसी ऐसा ही होना चाहिए।”

 © श्री रामदेव धुरंधर

12 – 02 — 2026

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३२५ – भाषाई अस्मिता ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३२४ भाषाई अस्मिता… ?☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

कुछ वर्ष पहले की घटना है। प्रश्नमंजूषा का एक कार्यक्रम चैनल पर चल रहा था। प्रश्न पूछा गया कि चौरानवे में से चौवन घटाने पर कितना शेष बचेगा? सुनने पर यह प्रश्न बहुत सरल लगता है पर प्रश्न के मूल में 94 – 54 = 40 है ही नहीं।  प्रश्न के मूल में है कि उत्तरकर्ता को चौरानवे और चौवन का अर्थ पता है या नहीं।

हमारी धरती पर हमारी ही भाषा के अंक और शब्द जिस तरह से निरंतर हमसे दूर हो रहे हैं, उनके चलते संभव है कि भविष्य में किसी प्रश्नमंजूषा में पूछा जाए कि माँ और बेटा साथ जा रहे हैं, बताओ कि उम्र में दोनों में कौन बड़ा है? प्रश्न बचकाना लग सकता है पर केवल उनको जिन्हें माँ और बेटा का अर्थ पता होगा। बाकियों को तो उत्तर से पहले इन शब्दों के परदेसी अर्थ क्रमश: ‘मदर’ और ‘सन’ तक पहुँचना होगा। कुछ मित्रों की दृष्टि में यह अतिश्योक्ति हो सकती है पर अतिश्योक्ति होते तो हम हर दिन देख रहे हैं।

आज, हमारी भाषाओं के अंकों का उच्चारण न केवल कठिन मान लिया गया है, बल्कि मज़ाक का विषय भी बनने लगा है। भविष्य में शब्द समाप्त होने लगेंगे.., लेकिन ठहरिए, समय अधिक नहीं है। भविष्य दहलीज़ पर खड़ा है। कुछ शब्द तो उसने वहाँ खड़े-खड़े ही गड़प लिए हैं। बकौल डेविड क्रिस्टल, ‘एक शब्द की मृत्यु, एक व्यक्ति की मृत्यु के समान है।’

प्रश्न है कि हमारी भाषाई संपदा की अकाल मृत्यु के लिए उत्तरदायी कौन है? क्या केवल  व्यवस्था पर इसका दोष मढ़ देना उचित है?  निश्चित ही व्यवस्था, विशेषकर शिक्षा के माध्यम का इसमें बड़ा हाथ है। तथापि लोकतांत्रिक व्यवस्था की इकाई नागरिक होता है। इकाई की भूमिका क्या है? अब यह बहाना न तलाशा जाय कि दिन भर रोज़ी-रोटी के लिए खटने के बाद समय और शक्ति कहाँ बचती है कि कुछ और किया जाय? समाचार, क्रिकेट, फिल्में, सोशल मीडिया, शेयर मार्केट, सीरियल, ओ.टी.टी. सबके लिए समय है पर अपनी भाषा की साँसें बचाये रखने के नाम पर विवशता का रोना है।

कहा गया है, ‘धारयेत इति धर्म:।’ अनेक घरों में अकादमिक शिक्षा के अलावा निजी स्तर पर अनिवार्य धार्मिक शिक्षा का प्रावधान है। क्या अपनी सभ्यता और संस्कृति से जुड़ी भाषा और  मातृभाषा में बच्चों को पारंगत करना हमारा धर्म नहीं होना चाहिए?  इकाई यदि सुप्त होगी तो समुदाय भी सुप्त होगा और जो सुप्त है, उसका ह्रास और कालांतर में विनाश निश्चित है।

अपने पुत्रों की मृत्यु से आहत गांधारी ने महाभारत युद्ध की समाप्ति पर श्रीकृष्ण को श्राप दिया कि उनके वंश का नाश हो जाएगा। माधव सारी स्थितियों से भली-भाँति परिचित थे। बोले, ‘जैसे आशीष, वैसे आपका श्राप भी सिर-माथे पर।..हाँ एक बात है, आप श्राप देती या न देती, हम जिस प्रकार अपने कर्मों से दूर होकर सुप्त हुए जा रहे हैं, उसे देखते हुए उनका नाश तो यूँ भी निश्चित है।’

मुद्दा यही है। अंग्रेजी शिक्षा व्यवस्था का श्राप तो है ही, प्रश्न हमारी अपनी सुप्त अवस्था का भी  है। शब्दों का भाषा से दूर होते जाना एक तरह से भाषा का चीरहरण है। शनै: शनै: चीर और छोटा होता जाएगा। क्या हम भाषाई अस्मिता को इसी कुचक्र में फँसते देखना चाहते हैं?

अभी भी समय है। सामूहिक प्रयत्नों से हम सब मिलकर योगेश्वर की भूमिका में आ सकते हैं, ताकि चीर अपरिमित हो जाए और उतारने वालों के हाथ थक कर चूर हो जाएँ।

आइए साथ में जुटें। अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस है और आपकी भाषा को आपकी प्रतीक्षा है।

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ 21 दिवसीय आशुतोष साधना रविवार दि. 8 फरवरी से शनिवार 28 फरवरी तक चलेगी 🕉️

💥 इस साधना में ॐ नमः शिवाय का मालाजप होगा। साथ ही शिव पंचाक्षर स्तोत्र का पाठ भी करेंगे 💥

॥ श्रीशिवपञ्चाक्षरस्तोत्रम् ॥

नागेन्द्रहाराय त्रिलोचनाय,
भस्माङ्गरागाय महेश्वराय ।
नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय,
तस्मै न काराय नमः शिवाय ॥१॥

मन्दाकिनी सलिलचन्दन चर्चिताय,
नन्दीश्वर प्रमथनाथ महेश्वराय ।
मन्दारपुष्प बहुपुष्प सुपूजिताय,
तस्मै म काराय नमः शिवाय ॥२॥

शिवाय गौरीवदनाब्जवृन्द,
सूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय ।
श्रीनीलकण्ठाय वृषध्वजाय,
तस्मै शि काराय नमः शिवाय ॥३॥

वसिष्ठकुम्भोद्भवगौतमार्य,
मुनीन्द्रदेवार्चितशेखराय।
चन्द्रार्क वैश्वानरलोचनाय,
तस्मै व काराय नमः शिवाय ॥४॥

यक्षस्वरूपाय जटाधराय,
पिनाकहस्ताय सनातनाय ।
दिव्याय देवाय दिगम्बराय,
तस्मै य काराय नमः शिवाय ॥५॥

पञ्चाक्षरमिदं पुण्यं यः पठेच्छिवसन्निधौ ।
शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते ॥

💥 मालाजप शिव पंचाक्षर स्तोत्र के साथ आत्मपरिष्कार एवं मौन-साधना भी नियमित रूप से चलेंगे 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सलिल प्रवाह # २६८ – ग़ज़लिका – किस्से ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है  – ग़ज़लिका – किस्से)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २६८ ☆

☆ ग़ज़लिका – किस्से ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

दग़ा कहानी, वफ़ा फ़साना, सनम हमारे यही हैं किस्से।

तुम्हें छिपाना, मुझे दिखाना, हुए दर-ब-दर, सही हैं किस्से।।

*

न किस्सागोई, नई खोज है, यही विरासत हमें मिली है।

कहे ना कहे, कहे जा रहे, न जाने कितने, बने हैं किस्से।।

*

डगर डगर पर, शहर शहर में, गढ़े-बढ़े जा रहे दिनों-दिन

मिला मसाले, भरे रिसाले, हुए चटपटे, कई हैं किस्से।।

*

सियासती ही सियासती हैं, बयान इनके, बयान उनके।

न संसदों में, विधायिका में, जम्हूरियत के रहे हैं किस्से।।

*

चुरा रहे हैं, निगाह खुद से, लुका-छिपी का मजा ले रहे।

कहीं हसीं हैं, कहीं जवां हैं, ठठा रहे सब सुना के किस्से।।

*

कहे आइए, नहीं जाइए, दिखा जिहादी लवों को ठेंगा।

खड़े हों पैरों पे आप अपने, बनें हमसफर तभी न किस्से।।

*

नहीं रहूँ मैं, नहीं रहो तुम, मगर सुनाएगा वक्त तब भी।

यहीं पले थे, फ़ना हुए जो, ‘सलिलमियाँ के अनाम किस्से।।

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

१९.११.२०२५

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ “बाबा आमटे आणि ‘ आंतरराष्ट्रीय गांधी शांतता पुरस्कार” – भाग १ – लेखक : श्री विकास आमटे ☆ श्री सुनील देशपांडे ☆

श्री सुनील देशपांडे

? इंद्रधनुष्य ?

☆ “बाबा आमटे आणि ‘ आंतरराष्ट्रीय गांधी शांतता पुरस्कार” – भाग १ – लेखक : श्री विकास आमटे ☆ प्रस्तुती – श्री सुनील देशपांडे

बाबा आमटें ना मिळालेल्या आंतरराष्ट्रीय गांधी शांतता पुरस्कारादरम्यान घडलेला किस्सा…

स्थळ : राष्ट्रपती भवन. दरबार हॉल.

१९९९ सालचा जानेवारी महिना. त्या दिवशी तापमान असेल ५-६ डिग्री सेन्टीग्रेड. बाबांचा पोशाख मात्र नेहमीचाच. खादीची बनियन आणि चड्डी. कंबरेला पट्टा. *पंतप्रधान अटलजी* मला बाजूला घेत म्हणतात,

‘‘विकास, तेरे बाप को ठंड नहीं लगती क्या?’’

मी त्यांना म्हणालो, ‘‘नहीं अटलजी, ये पैलवान आदमी है!’’

पुढे बाबांना राष्ट्रपती भवनातच आंबेडकर आंतरराष्ट्रीय पुरस्कार प्रदान करण्यात आला. त्यादरम्यान आणखी एक प्रसंग घडला. भारताने नुकतीच पोखरणमध्ये अणुचाचणी केली होती. अणुकार्यक्रमाचे जनक *डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम* या पुरस्कार सोहोळ्यास उपस्थित होते. पुरस्कार सोहोळ्यादरम्यान त्यांच्याकडे जात बाबांनी त्यांना सुनावलं,

‘‘Dr. Kalam, we don’t need bombs, we need toilets! ‘National Highways’ have become national toilets! If you say we are a nation of Mahavir, Buddha, Guru Nanak and Gandhi, we don’t need bombs!’’

डॉ. कलाम अचंब्याने पाहतच राहिले! (आजच्या परवलीच्या *‘स्वच्छ भारत अभियाना’*ची नीव बाबांनी कधीच रचली होती.)

‘मेरा बाप पैलवान आदमी था..’ असं मी कायम म्हणतो याचं कारण- जसे बाबांनी अनेक प्राणघातक हल्ले, अपघात, आजारपणं पचवली, तशी त्यांनी विधायक कार्य असो वा संघर्ष- ‘ठाम भूमिका’ ही घेतलीच. त्यांनी कधीही कचखाऊ धोरण अवलंबलं नाही. त्यामुळे बाबांचं शारीरिक अस्तित्व संपल्यानंतर माणसं रडली निश्चित; पण खचली मात्र नाहीत.

ब्लड कॅन्सरशी लढता लढता बाबांनी ९ फेब्रुवारी २००८ ला पहाटे पावणेपाचच्या सुमारास अखेरचा श्वास घेतला. बाबांच्या या अखेरच्या आजारपणात रात्रीचा दिवस करत उपचार करणारे डॉ. विजय पोळ आणि विलास मनोहर त्यावेळी बाबांसोबत होते. बाबांची मनोभावे सेवा करणारे देवानंद सलामे, कमल उमरोटकर होते. इंदू, रेणुका, मी आणि भारतीही आनंदवनातच होतो. प्रकाश-मंदा लोकबिरादरी प्रकल्पावर. आमची पोरं बाहेर होती.

रात्रीपर्यंत सर्वजण आले. तो पूर्ण दिवस, रात्र आणि दुसऱ्या दिवशी सकाळीसुद्धा बाबांना बघण्यासाठी लोकांची रीघ कायम होती. दोन किलोमीटरची माणसांची रांग. कुठलाही आवाज नाही. फक्त बाबांना बघून हात जोडण्याची आस असलेली, सर्वदुरून आलेली ही माणसं. हजारोंची गर्दी लोटली होती.

केळीच्या पानात गुंडाळून आणि वरनं मीठ टाकून आपलं दफन केलं जावं, ही बाबांची इच्छा होती. त्याला दोन वैज्ञानिक कारणं होती. बाबा म्हणत, *‘‘एका मृतदेहाचं दहन करायला जेवढी लाकडं लागतात तेवढ्यात हजार माणसांचा तीन-चार दिवसांचा स्वयंपाक होऊ शकतो! ’’* (हा विचार अहमदाबादच्या ‘सद्विचार परिवारा’ने रुजवला होता. म्हणून बाबा-इंदूने त्यांचे फॉर्म्स भरत दहनाऐवजी दफन जाणीवपूर्वक स्वीकारलं होतं.)

दुसरं म्हणजे _‘पशूपंछी भोजन करे, तन भंडारा होएँ’_ या संत कबिरांच्या दोह्याप्रमाणे, मर्त्य शरीरावर पशुपक्ष्यांचा, किड्यामुंग्यांचा अधिकार असतो. तेव्हा मृतदेह त्यांच्या हवाली केला जावा; जेणेकरून हे शरीर भंडाऱ्याप्रमाणे विरून जाईल! त्याप्रमाणे बाबांच्या देहाचं दफन केलं गेलं. ही तीच अनाम कुष्ठरुग्णांच्या स्मरणशिलेची जागा- जिथे बाबांच्या जिवाला जीव देणारे त्यांचे शेकडो कुष्ठमुक्त सोबती वास करत होते.

९ फेब्रुवारी काय किंवा १० फेब्रुवारी- आनंदवनाला सुट्टी नव्हती. त्या दिवशीही काम सुरूच होतं. पॉवरलूम्स तशाच धडधडत होत्या. हातमाग खट्खट् आवाज करत चादरी-टॉवेल्स विणत होते. वेल्डिंग मशीन्स चरचर आवाज करत जोडणी करत होत्या. आनंदवन थांबलं नव्हतं.

२०१४ हे बाबा आमटेंचं जन्मशताब्दी वर्ष होतं. हे वर्ष कसं ‘साजरं’ करणार, याबाबत नेहमीच कुणी ना कुणी विचारत. अशी विचारणा करणाऱ्यांना मी सांगत असे की, आनंदवनात साजरं होतं ते *‘कार्याचं गुणात्मक विस्तृतीकरण’! * समाजातील जास्तीत जास्त दुर्बल घटकांपर्यंत कार्याचा विस्तार हाच आमच्यासाठी सोहोळा. आनंदवनाच्या इतिहासात कधी कुणाची जयंती, पुण्यतिथी साजरी झाल्याचं मला स्मरत नाही. आणि भविष्यातही असं होणं नाही.

*बाबा आमटे* या व्यक्तीशी किती माणसं जोडली गेली होती याचा प्रत्यय आम्हाला ते गेल्यानंतर आला. बाबांना श्रद्धांजली वाहणाऱ्या सुमारे तीन लक्ष तारांचा खच आनंदवनात पडला! अक्षरश: पोती भरभरून तारा येत होत्या.

असं काय होतं बाबांमध्ये ज्याने ही माणसं त्यांच्याकडे ओढली गेली आणि कायमची जोडली गेली? यात जशी राजकारण, प्रशासन, उद्योग, कला, संगीत, साहित्य, पत्रकारिता, विज्ञान-तंत्रज्ञान, अध्यात्म या क्षेत्रांतली नावाजलेली मंडळी होती, तशीच देश काय आणि विदेश काय, समाजातल्या प्रत्येक स्तरातली लाखो सर्वसामान्य माणसंही होती. या अनुषंगाने मला काही छोटे-मोठे प्रसंग आठवतात ते सांगतो…

ते बहुधा १९५९ साल असावं. जबलपूरच्या ‘नवभारत’ दैनिकात साहाय्यक संपादक म्हणून काम करणारी *चंद्र मोहन जैन* नावाची एक व्यक्ती आनंदवनात येते आणि काम बघून प्रभावित होत बाबांना म्हणते,

_‘‘बाबा, आपके हाथों को सेवा कि खुशबू आती है. ’’_ परत जाऊन जैन ‘नवभारत’मध्ये बाबांबद्दल विस्तृत लेख लिहितात. या लेखावरून जैन यांचा दैनिकाच्या मालकाशी वाद होतो. मालक म्हणतात,

_‘‘तू माझं दिवाळं काढणार! राजकारण, हत्या, भानगडी यांच्या बातम्या सोडून असे विधायक कार्याविषयीचे लेख छापून आले तर माझं दैनिक लवकरच बंद पडेल. ’’_

यावर जैन उत्तरतात, _‘‘जगात खून, आत्महत्या, अत्याचार यांव्यतिरिक्त चांगल्या गोष्टीही खूप घडत असतात. बाबा आमटेंनी आपलं आयुष्य कुष्ठकार्यासाठी वेचलं आहे. या माणसाचं काम सर्वांपर्यंत पोहोचलंच पाहिजे. बाबा आमटेंविषयी छापल्यामुळे दैनिकाचं सक्र्युलेशन वाढणार नाही हे मला माहिती आहे. पण काळजी नसावी. मी बाहेर पडतो. तुम्ही तुमचं सक्र्युलेशन वाढवा, ’’_ असं म्हणत तत्क्षणी ते आपला राजीनामा मालकाच्या तोंडावर फेकतात.

*हीच चंद्रमोहन जैन नावाची व्यक्ती पुढे जाऊन सुप्रसिद्ध आध्यात्मिक विचारक बनते… ज्यांना आपण सर्व ‘रजनीश-आचार्य- भगवान- ओशो’ म्हणून ओळखतो. *

जेआरडी टाटांना बाबांविषयी प्रचंड स्नेहादर होता. मणक्याच्या शस्त्रक्रियेदरम्यान बाबा मुंबईला असताना जेआरडींनी त्यांची भेट घेतली. ते बाबांना म्हणाले, _‘‘मी आनंदवनाला काय मदत करू शकतो? ’’_

बाबा उत्तरले, _‘‘मी आपला ऋणी आहे. पण आनंदवनाला मदतीची गरज नाही. उलट, समाजाने नाकारलेल्या ज्या माणसांच्या कष्टांतून आनंदवन उभं राहिलं आहे, त्यांच्यात आज समाजातल्या मूलभूत समस्यांवर मात करण्याची जिगर आहे! ’’_

२०१३ च्या जूनमध्ये मी आणि माझा मुलगा कौस्तुभ एका कामासाठी पंतप्रधान डॉ. मनमोहन सिंग यांना भेटायला दिल्लीला गेलो होतो. महाराष्ट्र भवनातून आम्ही दोघं ऑटोरिक्षा घेऊन ७, रेस कोर्स रोडला पोहोचलो. आता ऑटोरिक्षामधनं ७, रेस कोर्स रोडला येणारी माणसं कदाचित विरळाच असतील. कारण गेटवरच्या सुरक्षारक्षकांच्या चेहऱ्यावर तरी तेच भाव होते!

_‘‘क्या है? ’’_ असं विचारताच मी माझं व्हिजिटिंग कार्ड दिलं. कार्ड आत काय गेलं, मिनिटभरातच सगळे पहारे खटाखट बाजूला झाले आणि काय चाललंय याचा थांगपत्ता लागण्याआधीच आम्ही पंतप्रधानांच्या ‘Special Protection Group’चे प्रमुख चतुर्वेदी यांच्या कार्यालयात पोहोचलोसुद्धा!

– क्रमशः भाग पहिला 

लेखक : श्री विकास आमटे

प्रस्तुती : सुनील देशपांडे

ईमेल : sunil68deshpande@outlook.com

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – “मनीप्लांट, मैं और आप ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ लघुकथा – “मनीप्लांट, मैं और आप” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

अड़ोसियों-पड़ोसियों, नाते रिश्तेदारों और दोस्तो -दुश्मनों के ड्राइंगरूम्ज में मनीप्लांट की फैलती लहराती बेलों की हरियाली ने मुझे मोहित कर लिया। इस बात ने तो और भी कि जिस घर में मनीप्लांट फलता फूलता है, उस घर में धन की बारिश हो जाती है। शायद इसीलिए मनीप्लांट ड्राइंगरूम में लगाया जाता है। जितना मनीप्लांट फैलता है, उतना ही ड्राइंगरूम सजाया संवारा जाता है। मनीप्लांट और ड्राइंगरूम की खूबसूरती में गहरा नाता है। इस बात पर मुझे ईमान लाना पड़ा। मैंनै भी मनीप्लांट लगाने की ठानी।

 वैसे भी श्रीमती जी अड़ोसियों पड़ोसियों, नाते रिश्तेदारों और दोस्तों दुश्मनों को दिन प्रतिदिन ऊंचाइयां फलांगते देख देख कर चिड़चिड़ी रहने लगी थी। दिन रात बिना पानी पिये ही मुझे कोसती रहती थी। मेरे निकम्मेपन और अपनी किस्मत को लेकर माथा पीटने के साथ साथ मेरे साथ हुई शादी को एक मनहूस सपने और हादसे से कम नहीं मान रही थी। इस सारे नाटक में भी अपने मेकअप को रत्ती भर भी बिगड़ने नहीं थी। उसका विचार था कि ड्राइंगरूम सुंदर हो न हो उसमें बैठने वाली तो बनी ठनी होनी ही चाहिए।

अपनी श्रीमती जी के कोसने से घबरा कर और फूटी किस्मत सुधारने के लिए मैंने मनीप्लांट लगा तो लिया पर एकदम अनाड़ी जो ठहरा। मैंने मनीप्लांट को उजाले में, धूप में रख दिया और वो बजाय फैलने के दिन प्रतिदिन पीला पड़ने लगा। श्रीमती जी को मुझे कोसने का एक और बहाना मिल गया। श्रीमती जी को मेरे अनाड़ीपन को देखकर कोसने का एक और बहाना मिल गया। वे उस दिन को रोने लगी जब इस लाल बुझक्कड़ के पल्ले बांध दी गयी थी। यह मेरी हार थी।

अब मैं हारने के लिए कतई तैयार नहीं था। इसलिए मैंने बारीकी से आसपास के लोगों के यहां मनीप्लांट को देखना शुरू किया। तब कहीं जाकर पता चला कि मनीप्लांट को छाया और अंधेरे कोने में रखने पर ही इसके फैलने की उम्मीद की जा सकती है।

तब से मैं मनीप्लांट को लेकर कम औ, खुद को लेकर अधिक चिंतित हूं कि किसकी छाया में बैठकर ऐसे काले धंधे करूं जिससे मेरे ड्राइंगरूम में नयी से नयी चीज़ें आती जायें और सबसे बढ़कर मेरे मनीप्लांट की तरक्की दूसरों को जला भुनाकर राख कर दे। पर उसके लिए मैं अभी सोच रहा हूं .., आपकी कोई राय बने तो मुझे लिख भेजिएगा।

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # ४४ – कथा कहानी – एक चित्र ऐसा भी ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ४४ ☆

☆ लघुकथा ☆ ~ एक चित्र ऐसा भी ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

जरा सोचिए! अगर शब्दों में आग हो और भावना में राग हो, तो ऐसा व्यक्तित्व तो अनूठा ही होगा! एक ऐसा साहित्यकार जिसकी कलम ने संवेदना को नया स्वर दिया और संघर्ष को उद्घोष के अक्षय शब्द| ऐसे हैं बहु आयामी प्रतिभा के धनी राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ – यथा नाम: तथा गुण! अपने गांव की मिट्टी से लेकर साहित्य की दुनिया में जो पहचान बनाई, वह किसी चमत्कार से कम नहीं है। कभी-कभी शब्द उनके आँसुओं जैसे बहे… तो कभी तीर बनकर समाज को झकझोर गए। कहते हैं, उन्होंने मात्र लिखा ही नहीं अपितु यथार्थ ज़िंदगी को काग़ज़ पर जिया भी है। हर रचना में उनकी आत्मा बोलती है, और हर पंक्ति में एक नया प्रश्न उभरता है — क्या शब्द सच में दुनिया बदल सकते हैं? हाँ क्यों नहीं? आइए, जानते हैं ऐसे विलक्षण साहित्यकार – राजेश कुमार सिंह श्रेयस की जीवंत कहानी, जिसने सिद्ध कर दिया — कलम अगर ईमानदार हो, तो वह इतिहास भी लिख देती है!

 साभार – युग संवाद  (यूट्यूब)

मेरे जेहन में आज एक कहानी आ रही है। इस कहानी को मैं अक्षरश: कहना चाह रहा था , लेकिन इस कहानी को अक्षरश: कहने में स्वयं को विवश पा रहा हूँ। चलिए कहानी को कुछ आगे बढ़ा कर बताते हैं।

एक चित्रकार था उसको एक चित्र बनाने को कहा गया। जब वह चित्रकार चित्र बनाने बैठा तो उस चित्रकार की विबशता यह हुई कि चित्र बनाने के पहले ही उसके पास ढेर सारे सुझाव आने लगे। पुरानी कहानी में चित्र बनने के बाद सुझाव आये थे, लेकिन इस कहानी में तो चित्र बनने के पहले ही सुझाव आने लगे थे। यह सुझाव, खाली सुझाव नहीं थे। लोग सुझाव के साथ साथ अपने अपने रंग भी भेज रहे थे। किसी ने लाल पीला हरा, किसी ने हरा नीला लाल, किसी ने लाल सफेद काला, नाना प्रकार के रंग भेज दिये। शुरू में चित्र रंगीन हुआ। बाद में रंग इतने हो गए कि चित्रकार के ऊपर ही रंग छिटक छिटक कर पढ़ने लगा। चित्रकार को लग गया कि अब इन्हीं रंगों से सुन्दर दिखने वाला चित्र ही बदरंग होने वाला है। लेकिन चित्रकार की मजबूरी यह थी कि सुझावो के साथ भेजे रंगों को भरना ही भरना था।

चित्रकार पर दबाव बढ़ता गया, और अधिक बढ़ता गया। अब उसे समझ में नहीं आ रहा था कि इसमें क्या रंग डालूं और कौन सा रंग निकालूं। चित्रकार ने अपने चित्रकला के नीचे अपना छोटा सा नाम हस्ताक्षर स्वरूप लिखा था। लेकिन ऊपर का फरमान यह आया कि सुझाव देने वालों की भी नाम भी उसके रंग के साथ लिखना है। अब चित्रकार परेशान हुआ कि सबके भेजे गए रंगों को भरूं कि सबका नाम लिखूं। उसको तो एक खूबसूरत पेंटिंग बनानी थी। यहां तो पूरे पेंटिंग की किताब का मटेरियल आ गया। अब वह परेशान हो गया कि उसे पेंटिंग बनानी है की पूरी पेंटिंग की किताब बनानी है। खैर फरमान तो फरमान ही होता है और कहा भी गया है कि प्रभुता संपन्न व्यक्ति गलती नहीं करता है। राजा कभी गलती करता ही नहीं है। अब फरमान आया है तो फरमान को पूरा करना ही था।

सभी रंग भरे जाने लगे। रंगों को भेजने वालों के नाम भरे जाने लगे। पूरी पेंटिंग रंगीन हो उठी रंग पर रंग, रंग पर रंग। पेंटिक घना होता गया.. घना होता गया.. घना होता गया , घना होते होते पेंटिंग रंग डिब्बे का पूरा बॉक्स बन गया . अंततः चित्रकार की ब्रश ऐसी मजबूरी में फंसी कि सुझाव देने वालों के रंग और उनके नाम डालते डालते मूल चित्रकार का नाम ही है गायब गया। चित्रकार ने इतने पर भी संतोष किया। उसने यह सोचकर संतोष किया कि चलो अगर चित्र बढ़िया बन गया, तो लोग कहेंगे कि वाह क्या सुंदर सा चित्र बना है। भाई..कमाल का चित्रकार है। गजब का चित्र बनाया है। अब उस चित्र पर उसका नाम न लिखा होने के बाद भी वह अपनी प्रशंसा को सुनकर वह खुश होगा। यह सोचकर, उसने चित्र बनाना जारी रखा।

आखिरकार उसने एक भारी भरकम चित्र बना ही गया। जब चित्र बन गया और वह प्रदर्शित हुआ तो जितने लोगों ने ढेर सारे रंग भरे थे। अपने ही भेजें रंगों को देखकर, लोगों ने उनका नुक्स निकालना शुरू किया। अरे यार, यह छूट गया, यह भरना था,यह नहीं भरना था, यह रंग गया, यह नहीं रखता था। लेकिन सारे सुझाव भेजने वाले भूल गए कि चित्रकार की जगह नाम तो उन्हीं का लिखा है, जिन्होंने खाली सुझाव नही भेजे, बल्कि सुझावों के साथ अपने अपने रंग भी भेजें थे। और अपने ही रंग से पेंटीन को बर्बाद किया, तो चित्रकार का कहां दोषी हुआ।

उसकी चित्रकारिता का हुनर तो वहीं समाप्त हो गया जहां सुझाव देने वालों की संख्या थोड़ी नहीं एक भीड़ के सरीखे आ गई।

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – ऋषिकेश-हरिद्वार – भाग-२५ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – ऋषिकेश-हरिद्वार – भाग- २५ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

हरिद्वार

हरिद्वार शहर गंगा नदी के दक्षिणी किनारे पर शिवालिक पर्वतमाला की तलहटी में स्थित है। हरिद्वार कई प्रमुख तीर्थ स्थलों का प्रवेश द्वार है। धार्मिक आयोजनों में सबसे महत्वपूर्ण कुंभ मेला है, जो हर 12 साल में हरिद्वार में भरता है। हरिद्वार कुंभ मेले के दौरान लाखों तीर्थयात्री हरिद्वार में गंगा नदी में स्नान कर मोक्ष प्राप्ति की आकांक्षा से आते हैं।

समुद्र मंथन की पौराणिक मान्यता के अनुसार उज्जैन, नासिक और प्रयागराज (इलाहाबाद) के साथ हरिद्वार में अमृत की बूंदें घड़े से झलक गिरी थीं। जहां अमृत गिरा वह स्थान ब्रह्म कुंड हर की पौड़ी (भगवान के कदम) पर स्थित है और इसे हरिद्वार का सबसे पवित्र घाट माना जाता है। यह कांवड़ तीर्थयात्रा का प्रमुख स्थान भी है, जहाँ से लाखों श्रद्धालु गंगा का पवित्र जल लेकर शिव मंदिरों में चढ़ाने के लिए सैकड़ों मील दूर पैदल जाते हैं।

हरिद्वार भारतीय संस्कृति और विकास का बहुरूपदर्शक प्रस्तुत करता है। पवित्र ग्रंथों में, इसे कपिलस्थान, गंगाद्वार और मायापुरी के रूप में अलग तरह से निर्दिष्ट किया गया है। यह छोटा चार धाम (उत्तराखंड में चार प्रमुख तीर्थ स्थलों, बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री) के लिए एक मुख्य पड़ाव  है।

शहर के आधुनिक नाम में दो वर्तनी हैं: हरिद्वार और हरद्वार। इन नामों में से प्रत्येक का अपना अर्थ है। संस्कृत में, हिंदू धर्म की प्रचलित भाषा, हरि का अर्थ है “भगवान विष्णु”, जबकि द्वार का अर्थ है “प्रवेश द्वार”। तो, हरिद्वार का अनुवाद “भगवान विष्णु का प्रवेश द्वार” है। क्योंकि यह आमतौर पर वह स्थान है जहां तीर्थयात्री भगवान विष्णु के एक प्रमुख मंदिर बद्रीनाथ के दर्शन करने के लिए अपनी यात्रा शुरू करते हैं। इसी तरह, हर का अर्थ “भगवान शिव” है। इसलिए, हरद्वार “भगवान शिव के प्रवेश द्वार” कैलाश पर्वत, केदारनाथ, सबसे उत्तरी ज्योतिर्लिंग और छोटे चार धाम तीर्थयात्रा सर्किट के स्थलों तक पहुंचने के लिए एक विशिष्ट स्थान है। पौराणिक कथा के अनुसार, हरिद्वार में देवी गंगा अवतरित हुईं जब भगवान शिव ने अपने बालों की जटाओं में गंगा नदी को धारण मृत्यलोक में अवतरित किया था। गंगा नदी, गंगोत्री ग्लेशियर के किनारे पर गौमुख स्रोत से 253 किलोमीटर (157 मील) बहने के बाद, हरिद्वार में पहली बार मैदान में प्रवेश करती है, जिसने शहर को इसका प्राचीन नाम गंगाद्वार दिया।

महाभारत के वनपर्व में ऋषि धौम्य ने युधिष्ठिर को भारत के तीर्थों के बारे में बताया, तब गंगाद्वार, यानी हरिद्वार और कनखल का उल्लेख किया गया है, यह भी उल्लेख है कि अगस्त्य ऋषि ने अपनी पत्नी लोपामुद्रा के साथ यहां तपस्या की थी। कहा जाता है कि ऋषि कपिला का यहां एक आश्रम है, जिसका प्राचीन नाम कपिला या कपिलस्थान है। पौराणिक राजा, भगीरथ, सूर्यवंशी राजा सागर (राम के पूर्वज) के परपोते के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने 60,000 पुरखों की मुक्ति के लिए, सतयुग में वर्षों की तपस्या से गंगा नदी को स्वर्ग से नीचे लाए थे। भगवान विष्णु ने हर की पौड़ी की ऊपरी दीवार में स्थापित पत्थर पर अपने पदचिह्न छोड़े थे, जहां हर समय पवित्र गंगा इसे छूती है।

पुरातत्व संबंधी निष्कर्षों से सिद्ध होता है कि इस क्षेत्र में 1700  ईसा पूर्व और 1200 ईसा पूर्व के बीच टेराकोट्टा संस्कृति मौजूद थी। हरिद्वार का प्रथम आधुनिक युग का लिखित प्रमाण एक चीनी यात्री ह्वेनसांग के वृत्तांतों में मिलता है, जो 629 ईस्वी में भारत आया था। राजा हर्षवर्धन (590-647) के शासनकाल के दौरान हरिद्वार को ‘मो-यू-लो’ के रूप में दर्ज किया गया, जिसके अवशेष अभी भी मायापुर में मौजूद हैं, जो आधुनिक शहर के दक्षिण में है। खंडहरों में एक किला और तीन मंदिर हैं, जिन्हें टूटी हुई पत्थर की मूर्तियों से सजाया गया है, उन्होंने मो-यू-लो के उत्तर में एक मंदिर की उपस्थिति का भी उल्लेख किया है, जिसे ‘गंगाद्वारा’ कहा जाता है। 13 जनवरी 1399 को यह शहर तैमूर लैंग (1336-1405) के अधीन आया।

गुरु नानक (1469-1539) ने हरिद्वार की अपनी यात्रा के दौरान, ‘कुशावर्त घाट’ पर स्नान किया, जिसमें प्रसिद्ध, ‘फसलों को पानी देना’ प्रकरण हुआ। गुरुद्वारा (गुरुद्वारा नानकवाड़ा) की दो सिख जन्मसखियों के अनुसार, यह यात्रा 1504 ईस्वी में बैसाखी के दिन हुई थी। बाद में उन्होंने गढ़वाल में कोटद्वार के रास्ते में कनखल का भी दौरा किया। 

आइन-ए-अकबरी, मुगल सम्राट अकबर के शासनकाल के दौरान 16 वीं शताब्दी में अबुल फजल द्वारा लिखी गई, इसे माया (मायापुर) के रूप में संदर्भित करती है, जिसे गंगा पर हरद्वार के रूप में जाना जाता है, हिंदुओं के सात पवित्र शहरों के रूप में। इसमें आगे इसका उल्लेख है। अठारह कोस (प्रत्येक लगभग 2 किमी) लंबा है, और चैत्र की 10 तारीख को बड़ी संख्या में तीर्थयात्री इकट्ठा होते हैं। अपनी यात्रा के दौरान और घर पर रहते हुए, मुगल सम्राट, अकबर ने गंगा का पानी पिया जिसे उन्होंने ‘अमरता का पानी’ कहा। सोरुन और बाद में हरिद्वार में सीलबंद जार में भेजने के लिए विशेष लोग तैनात किए गए थे।

मुगल काल के दौरान, हरिद्वार में अकबर के तांबे के सिक्के के लिए टकसाल थी। ऐसा कहा जाता है कि अंबर के राजा मान सिंह ने वर्तमान शहर हरिद्वार की नींव रखी और हर की पौड़ी में घाटों का जीर्णोद्धार भी किया। कहा जाता है कि उनकी मृत्यु के बाद उनकी अस्थियों को भी ब्रह्म कुंड में विसर्जित कर दिया गया था। सम्राट जहांगीर (1596-1627) के शासनकाल में इस शहर का दौरा करने वाले एक अंग्रेज यात्री थॉमस कोर्याट ने इसे शिव की राजधानी ‘हरिद्वार’ के रूप में वर्णित किया है।

सबसे पुराने जीवित शहरों में से एक होने के नाते, हरिद्वार का उल्लेख प्राचीन हिंदू शास्त्रों में मिलता है क्योंकि यह बुद्ध की अवधि से लेकर हाल के ब्रिटिश आगमन तक के जीवन और समय के माध्यम से बसा माना जाता है। हरिद्वार की एक समृद्ध और प्राचीन धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत है। इसमें अभी भी कई पुरानी हवेलियां हैं जिनमें उत्तम भित्ति चित्र और जटिल पत्थर का काम है।

गंगा नदी पर दो प्रमुख बांधों में से एक, भीमगोड़ा, यहाँ स्थित है। 1840 के दशक में निर्मित, यह गंगा के पानी को ऊपरी गंगा नहर की ओर मोड़ता है, जिससे आसपास की भूमि की सिंचाई होती है। हालांकि इससे गंगा के जल प्रवाह में गंभीर गिरावट आई, और अंतर्देशीय जलमार्ग के रूप में गंगा के क्षय का एक प्रमुख कारण है, जो 18 वीं शताब्दी तक ईस्ट इंडिया कंपनी के जहाजों द्वारा भारी उपयोग किया जाता था। गंगा नहर प्रणाली का मुख्यालय हरिद्वार में स्थित है। अप्रैल 1842 में काम शुरू होने के बाद 1854 में ऊपरी गंगा नहर खोली गई, नहर की अनूठी विशेषता रुड़की में सोलानी नदी के ऊपर आधा किलोमीटर लंबी एक्वाडक्ट है, जो मूल नदी से 25 मीटर (82 फीट) ऊपर नहर को उठाती है।

हरिद्वार संघ नगर पालिका’ का गठन 1868 में किया गया था, जिसमें मायापुर और कनखल के तत्कालीन गाँव शामिल थे। हरिद्वार पहली बार लक्सर के माध्यम से 1886 में रेलवे से जुड़ा था। जब अवध और रोहिलखंड रेलवे लाइन को रुड़की से सहारनपुर तक बढ़ाया गया था, इसे बाद में 1900 में देहरादून तक बढ़ा दिया गया था। 1901 में, इसकी जनसंख्या 26,597 थी और यह संयुक्त प्रांत के सहारनपुर जिले में रुड़की तहसील का एक हिस्सा था, और 1947 में उत्तर प्रदेश के निर्माण तक ऐसा ही रहा।

हरिद्वार तन, मन और आत्मा के थके हुए लोगों का धाम रहा है। यह विभिन्न कला, विज्ञान और संस्कृति के लिए भी आकर्षण का केंद्र रहा है। आयुर्वेदिक दवाओं और हर्बल उपचार के एक महान स्रोत के रूप में गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय सहित अद्वितीय गुरुकुल (पारंपरिक शिक्षा का स्कूल) का घर है, जिसमें एक विशाल परिसर है, और पारंपरिक शिक्षा प्रदान कर रहा है। हरिद्वार के विकास ने 1960 के दशक में आधुनिक मंदिर की स्थापना के साथ, 1975 में एक ‘महारत्न पीएसयू’, की स्थापना के साथ एक गति पकड़ी, जो न केवल बीएचईएल की अपनी एक बस्ती को साथ लेकर आई, tबल्कि इस क्षेत्र में सहायक इकाइयों का एक समूह भी है। रुड़की विश्वविद्यालयहै। विज्ञान और इंजीनियरिंग के क्षेत्र में सीखने के सबसे पुराने और सबसे प्रतिष्ठित संस्थानों में से एक है।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

*≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कथा कहानी # २३ – मोबाइल में खोया बचपन… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर ☆

डॉ.राजेश ठाकुर

( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का  मंतव्य उनके ही शब्दों में –पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय रचना “मोबाइल में खोया बचपन “.)  

? साप्ताहिक स्तम्भ ☆ नेता चरित मानस # २३ ?

? लघुकथा – मोबाइल में खोया बचपन… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर  ? ?

?

 स्मरण आता है, वह स्वर्णिम बचपन… l घर में जब कोई डिब्बा खाली हो जाता था, उसे लेकर हमारे साथी, हमारे भाई-बहन एक कोने में खड़े हो जाते थे, दूसरा खाली डिब्बा लेकर दूसरे कोने में हम l दोनों खाली डिब्बों को एक धागा अथवा किसी डोर से बाँध लिया जाता था l

 उस कोने से हमारे साथी या हमारे भाई-बहन खाली डिब्बे में मुँह लगाकर बोलते थे, इधर हम सुनते थे….. कभी इधर से हम बोलते थे, उधर वो सुनते थे l

 खाली डिब्बे का स्थान अब मोबाइल ने ले लिया है l बात तब भी होती थी, बात अब भी होती है l….. लेकिन बीच की स्नेहिल डोर न जाने कहाँ ग़ायब हो गई है l

 “रिश्ते-नातों के प्रति उदासीन हो गए

मोबाइल आया और हम मशीन हो गए”

© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर

शासकीय कॉलेज़ केवलारी

संपर्क — ग्राम -धतूरा, पोस्ट – जामगाँव, तहसील -नैनपुर, जिला -मण्डला (म.प्र.) मोबा. 9424316071

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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