हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ८२ – व्यंग्य – पाइपलाइन में पड़ा स्वर्ग ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय व्यंग्य – पाइपलाइन में पड़ा स्वर्ग।)  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ८२ – व्यंग्य  – पाइपलाइन में पड़ा स्वर्ग ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

शहर के पास वाले उस ढाबे पर, जहाँ चाय कम और धूल ज़्यादा मिलती है, मेरी भेंट एक ‘डिजिटल स्वामी’ से हो गई। स्वामी जी ऐसे थे कि अगर उन्हें किसी मल्टीनेशनल कंपनी के बोर्डरूम में बैठा दिया जाए, तो वे वहाँ भी ‘परमपिता की कृपा’ का प्रेजेंटेशन पावर-प्वाइंट पर दे दें। बदन पर मलमल का कुर्ता, गले में रुद्राक्ष की ऐसी माला जिसे देखकर किसी भी जौहरी का ईमान डोल जाए, और बगल में एक आईपैड, जिस पर वे निरंतर ‘स्टॉक मार्केट’ और ‘अध्यात्म’ का संतुलन बिठा रहे थे।

मैंने पूछा, “स्वामी जी, यह झोला और लैपटॉप लेकर किस महाकुंभ की ओर प्रस्थान हो रहा है?”

स्वामी जी ने एक ऐसी रहस्यमयी मुस्कान फेंकी, जो केवल उन लोगों के पास होती है जिनके पास स्विस बैंक का खाता और मोक्ष का नक्शा, दोनों साथ होते हैं। बोले, “बच्चा, हम ‘स्मार्ट विलेज’ का शिलान्यास करने जा रहे हैं। गाँव की मिट्टी को सिलिकॉन वैली बनाना है।”

मैंने चाय का घूँट भरा—जिसमें चीनी इतनी थी कि मधुमेह को भी शर्म आ जाए। पूछा, “महाराज, गाँव में तो बिजली आठ घंटे रहती है और सड़कें ऐसी हैं कि आदमी चलते-चलते ही योग की कठिन मुद्राएं सीख जाए। वहाँ आप स्मार्टनेस का कौन सा इत्र छिड़केंगे?”

स्वामी जी ने आईपैड पर एक ग्राफ दिखाया। “यही तो तुम्हारी अज्ञानता है। हम गाँव वालों को यह नहीं सिखाएंगे कि खेती कैसे करें, हम उन्हें यह सिखाएंगे कि ‘खेती को इवेंट’ कैसे बनाएं। हम वहाँ एक ऐसा आश्रम बना रहे हैं जहाँ शहर के अमीर लोग आकर ‘गरीबी का अनुभव’ करेंगे। वे देखेंगे कि गोबर कैसे थापा जाता है और फिर उसकी सेल्फी लेकर इंस्टाग्राम पर ‘मिट्टी की सौंधी खुशबू’ लिखेंगे। इसे ही हम ‘ग्रामीण पुनरुद्धार’ कहते हैं।”

मैंने कहा, “पर महाराज, गाँव का असली किसान तो कर्ज में दबा है, उसे तो खाद और बीज चाहिए।”

स्वामी जी हँसे, जैसे किसी ने उनसे कह दिया हो कि कद्दू के पेड़ पर आम लगते हैं। बोले, “बच्चा, किसान को खाद मिल गई तो वह आत्मनिर्भर हो जाएगा, फिर हमारे प्रवचनों में भीड़ कौन लगाएगा? हमें उसे ‘संतोष’ सिखाना है। हम उसे समझाते हैं कि ‘साईं इतना दीजिए जामे कुटुंब समाए’। जब उसके पास कम होगा, तभी तो वह चमत्कार की उम्मीद में हमारे पास आएगा। और रही बात खाद की, तो हमने योजना बनाई है कि गाँव के पास एक बड़ा गोल्फ कोर्स बनाएंगे। वहाँ की घास को ‘पवित्र घास’ घोषित कर देंगे, जिसे उगाने के लिए किसान मुफ्त में श्रम करेगा। इसे हम ‘श्रमदान’ का नाम देंगे।”

मैंने कहा, “वाह! यानी ‘आम के आम और गुठलियों के दाम’। पर स्वामी जी, आप तो खुद गाँव में रुकेंगे नहीं, आपकी काया तो एसी की आदी लगती है?”

स्वामी जी ने एक डकार ली, जो सीधे देसी घी के पराठों की गवाही दे रही थी। “बच्चा, शरीर तो नश्वर है, पर इसे ठंडा रखना आत्मा का कर्तव्य है। हम शहर में रहकर गाँव का ‘विजन’ तैयार करते हैं। देखो, विकास का सबसे बड़ा नियम यह है कि वह कभी ज़मीन पर नहीं दिखना चाहिए। अगर विकास दिख गया, तो वह खत्म हो गया। उसे हमेशा ‘पाइपलाइन’ में रहना चाहिए। जैसे हमारे यहाँ की सरकारी फाइलें—चलती रहती हैं, पहुँचती कभी नहीं।”

मैंने पूछा, “और इन सबमें धर्म का क्या योगदान होगा?”

स्वामी जी की आँखें चमक उठीं। “धर्म ही तो वह गोंद है, बच्चा, जो टूटे हुए विकास को चिपका कर रखता है। जब सड़क पर गड्ढा हो, तो वहाँ एक पत्थर रखकर उसे ‘स्वयंभू महादेव’ घोषित कर दो। फिर जनता सड़क की शिकायत नहीं करेगी, बल्कि वहाँ मत्था टेकेगी। जब पानी न आए, तो ‘वरुण देव’ की उपेक्षा पर प्रवचन दो। राजनीति और धर्म का यही तो गठबंधन है—एक हाथ से स्वर्ग दिखाओ, दूसरे हाथ से जेब साफ करो।”

मैंने अंतिम सवाल किया, “स्वामी जी, क्या इस ‘स्मार्ट विलेज’ में आम आदमी के लिए भी कुछ है?”

स्वामी जी ने अपना बैग उठाया और खड़े होते हुए बोले, “आम आदमी के लिए ‘उम्मीद’ है, बच्चा! और उम्मीद ही वह चीज़ है जो आदमी को तब भी जीवित रखती है जब उसकी थाली खाली हो। हम उसे सपने बेचते हैं और वह हमें श्रद्धा देता है। सौदा खरा है।”

इतने में उनकी लग्जरी गाड़ी धूल उड़ाती हुई आ गई। स्वामी जी उसमें ऐसे ओझल हुए जैसे चुनावी वादे चुनाव के बाद होते हैं। मैं वहीं बैठा रहा, और ढाबे वाले से कहा, “भाई, एक चाय और दे, ज़रा चीनी कम रखना, क्योंकि कड़वा सच सुनने के बाद मीठा अब झेला नहीं जाता।”

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # २८६ ☆ बाल गीत – नित मुश्किल आसान बनाएँ… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘चक्र

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मानबाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान  के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंतउत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत। 

आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।

आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # २८६ ☆ 

☆ बाल गीत – नित मुश्किल आसान बनाएँ ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ 

झूले का पुल झूल – झूल कर

मुश्किल को आसान बनाएँ।

जाते हम स्कूल हमेशा,

रस्सा से सरिता उतराएँ।।

 *

अपना लक्ष्य रहा है पढ़ना

हँसते – हँसते काम करेंगे।

ज्ञान और विज्ञान समझकर

जग में अपना नाम करेंगे।।

 *

खुशियाँ ही जीवन की कुंजी

सबसे ही हम प्रेम बढ़ाएँ।

* *

सोच – समझ कर काम करें हम

बाधाओं से हम लड़ते हैं।

हम हैं पूरे शाकाहारी,

योग हमेशा हम करते हैं।।

विश्वासों को कभी न तोड़ें

मस्ती करें और हर्षाएँ।।

 **

पावन है सच्चा है मन भी

देते नहीं किसी को गच्चा।

ज्योति ज्ञान की जलती अंतस

मुस्काता हर बच्चा – बच्चा।।

 *

मूल्य समय का हम पहचानें

मिले सफलता वंदन गाएँ।।

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २४० – बाल कहानी — जबान फिसली – ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है  आपकी बाल कहानी — जबान फिसली।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २४०

☆ बाल कहानी — जबान फिसली ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ 

बेक्टो नींद में था. तभी जबान ने पूछा, ” आप मुझे जानते हो ? मैं कौन हूं ?”

यह सुन कर बेक्टो हंसा, ” आप को कौन नहीं जानता है. आप हमारी जबान हो. आप को जिह्वा भी कहते हैं.”

” बिलकुल ठीक कहा बेक्टो, ” जबान बोली, ” मगर, आप यह नहीं जानते हो कि मैं एक मांसपेशी हूं. भले ही आप ने मुझे एक नाम दे दिया हो. मगर, मैं कहलाती हूं एक मांसपेशी.”

बेक्टो को यह पता नहीं था. जबान एक मांशपेशी है. वह खुश हो कर बोला, ” मुझे आज मालुम हुआ कि आप एक मांसपेशी हो.”

तब जबान ने कहा, ” मैं शरीर की सब से मजबूत मांसपेशी हूं. केवल एक जगह जुड़ी रहती हूं. मगर, काम बहुत करती हूं. जब चलती हूं तो अच्छेअच्छे की छूटी कर देती हूं. मेरी वजह से कई लोग मार खा जाते हैं. मेरे मुंह के आसपास जो दांत देख रहे हो. ये बहुत मजबूत होते है.

” जब मैं चलती हूं तो लोग इन्हें भी तोड़ डालते हैं. मैं इन मजबूत दांतों के बीच आराम से रह लेती हूं. यह बात दूसरी है कि ये मजबूत दांत कभीकभी मुझे भी खा जाते हैं. इस कारण मेरे अंदर घाव हो जाता है. मगर, मैं इस घाव को जल्दी भर देती हूं.”

जबान बोले जा रही थी. बेक्टो ने कहा, ” अपने मुंह मियां मिटठु मत बनो. यह अच्छी बात नहीं है.”

जबान को इस मुहावरे का अर्थ मालुम था. उस ने कहा, ” अरे हां. मैं तो भूल ही गई कि मैं मांसपेशियों के बारे में बता रही थी. मैं अपने मुंह अपनी ही प्रशंसा करने लगी. इसे ही अपने मुंह मिया मिटठू बनना कहते हैं.”

” खैर जाने दो.” जबान ने कहना शुरू किया, ”आप के पूरे शरीर में 600 तरह की मांसपेशियां होती हैं. इन्हीं की वजह से शरीर को गति और ऊर्जा मिलती है. मुंह से बोलना हो या खाना चबाना सब में मेरा उपयोग होता है. यदि शरीर में मांसपेशियां न हो तो आप लोग जिंदा नहीं रह सकते हो. यह बात बहुत कम लोग जानते होंगे.”

” क्या ! ” बेक्टो को यह मालुम नहीं था. वह चौंक उठा, ” बिना मांसपेशी के हम जिंदा नहीं रह सकते हैं ! ” उस की आंखे फेल गई.

” हां, ” जबान ने कहा, ” आप के हृदय और फेफड़े भी मांसपेशियों के बने होते हैं. जिन की वजह से आप पूरे शरीर में खून पंप कर पाते हो. सांस लेना इन्हीं की वजह से संभव है. यदि ये मांसपेशियों के न बने होते तो आप जीवित न होते.

” शरीर का अधिकांश भाग इन्हीं मांसपेशियों से बना होता है. जब आप मुस्कराते हो तो चेहरे पर प्रसन्नता के भाव इन्हीं मांसपेशियो की वजह से आता है. यदि ये काम न करें तो तुम मुस्करा नहीं पाओ. रोने में इन्हीं का हाथ होता है. लिखने में इन्हीं के कारण आप लिख पाते हो. यानी हरेक काम जो आप करते हो सभी में इन का हाथ होता है ?”

” तब तो हम सब काम अपनी मरजी से इन्हीं मांसपेशियों की वजह से करते हैं ?”

” नहींनहीं, ” जबान झट से कैंची की तरह चलती हुई बोली, ” कुछ मांसपेशियां ऐसी होती है जो स्वयं संचालित होती रहती है. उन्हें किसी के द्वारा चलाने की आवश्यकता नहीं होती है. इन्हें अस्वैचिछक मांसपेशिया या स्वचलित मांसपेशियां कहते हैं. जैसे हृदय का धड़कना और फेफड़े का खून पंप करना. ये काम स्वत: होते रहते हैं. इन्हें हम स्वयं नहीं करते हैं. इसलिए इन्हें स्वसंचालित या अस्वैच्छिक मांसपेशियां कहते हैं.

” कुछ मांसपेशियां हमारी मरजी से चलती है. जैसे अभी तुम कुछ सोच रहे हो. इस के पहले मुझसे कुछ पूछ रहे थे. ये कार्य तुम्हारी द्वारा नियंत्रित हो रहा था. इसलिए इस तरह के कार्य करने वाली पेशियों को स्वैच्छिक पेशी कहते हैं. इस पर आप का नियंत्रण होता है.”

जबान अभी कुछ कहना चाह रही थी. दांत को उस का बोलना अच्छा नहीं लगा. उस ने उसे रोकना चाहा, ” ज्यादा बोलना अच्छा नहीं रहता है,” मगर, जबान कब मानने वाली थी. वह जब एक बार चलना शुरू हो जाती है तो बंद नहीं होती है. इसलिए कहते हैं कि जबान बहुत ज्यादा चलती है.

” अब चुप हो जा ! ” दांत ने उसे ललकारा. मगर, जबान बंद नहीं हुई. इस पर दांत ने जबान को काट लिया. उस पर घाव हो गया. वह चुप हो गई.

इस वक्त बेक्टो सोया हुआ था. उसे जोर का दर्द हुआ. वह उठ बैठा. उस ने देखा कि उस की जबान दर्द कर रही थी. उस ने जबान मुंह से बाहर निकाल कर देखी. उस पर घाव था. सोते समय वह अपनी जबान स्वयं काट चुका था.

बेक्टो तुरंत बैठ गया. वह एक अच्छे सपना देख चुका था. इसलिए वह बहुत खुश था.

—–

© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

27/03/2019

संपर्क – 14/198, नई आबादी, गार्डन के सामने, सामुदायिक भवन के पीछे, रतनगढ़, जिला- नीमच (मध्य प्रदेश) पिनकोड-458226

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com मोबाइल – 9424079675 /8827985775

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ तो आणि मी…! – भाग ९२ ☆ श्री अरविंद लिमये ☆

श्री अरविंद लिमये

? विविधा ?

☆ तो आणि मी…! – भाग ९२ ☆ श्री अरविंद लिमये ☆

(पूर्वसूत्र- प्रकाशन समारंभाची सांगता झाली पण त्या आठवणी मात्र इतकी वर्ष उलटून गेल्यानंतर मनात आजही तितक्याच ताज्या आहेत! कारण त्या कार्यक्रमाचं चोख नियोजन जसं, तसंच या समारंभाच्या निमित्ताने माझ्या उर्वरित आयुष्याला मिळालेलं एक अनोखं वळणसुद्धा! ते वळण म्हणजे त्या दिवशीच्या पहाटे मला पडलेल्या स्वप्नाचं ‘त्या’च्या कृपेने अकल्पितपणे सत्यात होणारं परिवर्तनच होतं!!)

आणि याला सुरूवात होणार होती मी सोमवारी बॅंकेत पोचल्यानंतर लगेचच!

सोमवारी मी बँकेत गेलो तेव्हा याच सर्क्युलरच्या संदर्भात सविस्तर चर्चा करण्यसाठी वखरेसाहेबांनी मला आणि माझ्या असिस्टंटना तातडीने केबिनमधे बोलावून घेतलं. मी डायरीत सर्व महत्त्वाचे मुद्दे त्या रात्री व्यवस्थित लिहून ठेवले होतेच. त्यामुळे सुरूवातीलाच मी या योजनेचे सर्व नियम व अटीं यांची थोडक्यात माहिती सांगितली. या स्वेच्छानिवृत्ती योजनेला प्रतिसाद म्हणून स्वेच्छानिवृत्ती साठी आता स्टाफमेंबर्सकडून येणाऱ्या अर्जांची अक्षरश: रीघ लागणार होती. त्यामुळे मुदत संपेपर्यंतचा पुढचा संपूर्ण महिना आम्ही याच कामाच्या चक्रात फिरत रहाणार होतो!

या स्वेच्छानिवृत्ती योजनेतून मिळणारे आर्थिक लाभ आणि त्यामुळे उर्वरीत आयुष्यात मिळणारी निश्चिंतता यांचा विचार केला तर कुणालाही मोह पडावा अशीच ही योजना होती. कमीतकमी वीस वर्षे सर्व्हिस झालेलं कुणीही या योजनेचा लाभ घेऊ शकणार होतं. आर्थिक लाभ म्हणजे उर्वरीत सर्व्हिस मुदतीच्या ५०% मुदतीचा पगार अतिरिक्त लाभ म्हणून मिळणार होता!

असं असूनही ज्यांच्या कौटुंबिक जबाबदाऱ्या अद्याप पूर्ण झालेल्या नाहीत ते मात्र इच्छा असूनही या योजनेचा लाभ घेण्याचं धाडस करणं शक्य नव्हतं. तसंच ज्यांच्या विरूध्द कामामधील अनियमिततांमुळे अंतर्गत चौकशी सुरू आहे तेही या योजनेच्या लाभापासून वंचित रहाणार होते. अशा केवळ नाईलाजाने मागे रहाणाऱ्यांना अचानक निर्माण होणारं स्टाफ शाॅर्टेज, बॅंकांमधे लगेचंच सुरू होणाऱ्या काॅम्प्युटरायझेशनमुळे नवीन भरतीची फारशी शक्यता नसणे या सगळ्यामुळे बॅंकेतलं रूटीन मॅनेज करण्यासाठीही तारेवरची कसरत करावी लागणार होती! आणि अर्थातच माझी तेव्हा अजून नऊ वर्षे सर्व्हिस शिल्लक असल्याने मीही मागे रहाण्यातलाच एक असल्याने मलाही त्या तारेवरच्या कसरतीची मानसिक तयारी आत्तापासूनच करायला हवी होती,.. पण त्याचं आत्तापासून दडपण घेण्यात अर्थ नव्हता.

या सर्क्युलरबद्दलची आमची चर्चा पुढे तासभर सुरू होती आणि मग चहा येईपर्यंत आपल्या प्रत्यक्ष झोनल आॅफिसमधून कोण कोण स्वेच्छानिवृत्ती स्विकारू शकेल याविषयीचे अंदाज बांधणं सुरू झालं. कारण त्याचा थेट नकारात्मक परिणाम आमच्यापैकी मागे रहाणाऱ्या मोजक्या स्टाफलाच सहन करावा लागणार होता! याचं दडपण आमच्यापैकी इतर कुणाला त्याक्षणी फारसं जाणवलं नसलं तरी संपूर्ण झोनल आॅफिसचे सर्वेसर्वा म्हणून वखरे साहेबांना जाणवलं असणारच. कारण याच अनुषंगाने त्यांची आलेली प्रतिक्रिया प्रथमदर्शनी तरी मला बुचकळ्यात टाकणारीच होती.

“खरं सांगू कां? .. मला शक्य असतं ना, तर या योजनेनुसार पहिला अर्ज मी स्वत:च केला असता… ” ते वरवर हसत गंमतीने बोलावं तसं म्हणाले होते!

मीटिंग संपवून मी केबिनमधे आलो ते मनात तरंगत राहिलेले हे सगळे विचार सोबत घेऊनच. अर्थात मी त्यात फार वेळ गुंतून पडणं योग्य नव्हतं. समोरच्या कामांचा निपटारा अधिक महत्त्वाचा होता!

त्यादिवशी सगळी कामं आवरून मी ड्राॅवर लॉक केला आणि ऑफिसमधून बाहेर पडलो तेव्हा मात्र दुर्लक्ष करून मी दूर सारलेले तेच सगळे विचार मनात पुन्हा डोकावू लागले. त्या विचारांचं दडपण नव्हतं, फारशी उत्सुकता नव्हती, चलबिचल नव्हती, तरीही ते विचार झटकून टाकावेत असंही वाटेना. ‘मला शक्य असतं तर स्वेच्छानिवृत्ती स्वीकारण्यासाठी मीच पहिला अर्ज केला असता.. ‘ असं वखरे साहेब म्हणाले होते. पण आपल्याला ते त्यांच्याइतकं अशक्य कुठं आहे? आजवर मी आणि आरती दोघांनीही आमच्या संसाराची गरज म्हणून तिची नोकरी कधीच गृहीत धरलेली नव्हती. जेव्हा जेव्हा वेळ आली, तेव्हा आरती नोकरी सोडून त्या क्षणीच्या कर्तव्यभावनेने घरी राहिली होतीच. आता यावेळी तिची नोकरी आहे म्हणून स्वतः स्वेच्छानिवृत्ती घेणं मलाच योग्य वाटत नव्हतं. अर्थात या योजनेमुळे निर्माण झालेल्या असंख्य व्हेकन्सीज् पैकी थोड्या फार जागा तरी तातडीने भरण्याची निकड निर्माण होणार असल्यामुळे पुढचं प्रमोशन प्रोसेस तात्काळ सुरू व्हायची शक्यता होतीच. आणि अर्थातच प्रत्येक स्टेटमधे उच्चाधिकार पदांच्या जागा मोजक्याच असल्याने आऊट ऑफ स्टेट पोस्टिंग देखील अपरिहार्यच होतं! थोडक्यात आमच्यापैकी मागे रहाणाऱ्या जवळजवळ सर्वच अधिकाऱ्यांच्या आयुष्यांत या आकर्षक स्वेच्छानिवृत्ती योजनेमुळे प्रचंड उलथापालथ होणार होती!!

मनातले हे सगळे उलट सुलट विचार दूर सारून मी दारावरची बेल वाजवली. घरी आई होतीच आणि आरती आणि सलिलही प्रकाशन समारंभाला येताना दोन-तीन दिवसांची सवड घेऊनच आले होते. दार सलिलनेच उघडले. जेवायला बसण्यापूर्वीपर्यंत गप्पांचे सगळे विषय कालच्या प्रकाशन समारंभाबद्दलचेच होते आणि ते अपेक्षितही होतं. या तिघांसाठीही तो एक वेगळा आणि आनंददायी अनुभव होताच!

रात्रीची जेवणं आवरली. गप्पागोष्टी झाल्यावर आई झोपायला गेली. आरती/सलिलला आता लवकरच घडू शकणाऱ्या महत्त्वाच्या घडामोडींची अंधूक कां होईना कल्पना देणं मला आवश्यक वाटलं.

“तुम्हा दोघांशी एका महत्त्वाच्या विषयावर बोलायचंय.. ” मी म्हणालो. दोघांनीही प्रश्नार्थक नजरेने माझ्याकडे पाहिलं.

“कां? काळजी करण्यासारखं आहे कां कांही? ” आरतीनं विचारलं.

“आज नाही पण पुढं लवकरच थोडं फार काळजी करण्यासारखं घडू शकेल.. “

“तुम्ही क.. कशाबद्दल बोलताय? “

“बँकेत बरेच फेरबदल होऊ पहातायत. कोणत्याही क्षणी कांहीही घडू शकेल. माझ्यापुरतं बोलायचं तर आमचं प्रमोशन प्रोसेसही लवकरच सुरू होईल आणि त्यानंतरचं पोस्टिंग मात्र आऊट ऑफ स्टेटच असणार हे ठरलेलंच आहे. मला कुठेही जावं लागेल आणि त्यासाठी आपल्या तिघांचीही तयारी हवी. म्हणूनच आज बँकेत याविषयी बोलणं सुरू झाल्यापासून एकच विचार माझ्या मनात येतोय. त्याबद्दलच बोलायचंय. तशीच वेळ आली तर आरती, तू जॉब रिझाईन करून माझ्याबरोबर येशील? ” मी विचारलं. याआधी प्रत्येक वेळी मी कांहीं दिवस एकटा राहून निभावत आलो होतो पण यापुढे वय आणि जबाबदाऱ्या वाढत जातील तेव्हा मला ती ओढाताण नको होती. तिला सौम्य शब्दांत मी कल्पना दिली ती यासाठीच.

आरतीने चमकून माझ्याकडे पाहिलं. तिचा चेहरा खरकन् उतरलेला होता न् नजरेत हातून कांहीतरी निसटून जात असल्याची भावना!

” तुम्हाला लगेच कुठं जावं लागणार नाहीये ना? तशीच वेळ आली, तर तेव्हा ठरवूया ना आपण. आत्ताच त्याची चर्चा कशाला? ” बोलतानाही तिचा आवाज भरून आला होता.

” कां? तुला कंटाळा नाही आला नोकरीचा? ” मी विचारलं.

“नाही. मला आवडतो हा जाॅब. पण तरीही वेळ येईल तेव्हा सोडेन ना मी. ” ती त्याच भिजल्या आवाजात म्हणाली.

“पण मला कंटाळा आलाय आता नोकरीचा. मी सोडू? ” मी दोघांचा अंदाज घेत गंमतीने विचारलं.

” होs.. कंटाळा आला असेल तर खरंच सोडा. ” आरतीचा चेहरा खुलला. ती अगदी मनापासून म्हणाली.

आता मात्र त्यांना अधांतरी ठेवणं मला योग्य वाटेना. मी त्यांना नवीन स्वेच्छा निवृत्ती योजनेची सविस्तर माहिती दिली. ते ऐकून तोवर कांही न बोलता लक्षपूर्वक सगळं ऐकत राहिलेला सलिल म्हणाला, “बाबा, तुम्ही ही चांगली संधी खरंच सोडू नका. तुमचं सगळं व्यवस्थित आर्थिक नियोजन आहे, त्यामुळे निवृत्त व्हायचं ठरवलंत तर पुढं तुमचे आत्तापर्यंत शक्य न झालेले सगळे छंद जोपासत रहायचं आणि अर्निंग साठी कांहीही करायचं नाही. तसं असेल तरच.. ” तो म्हणाला. ते ऐकलं आणि मी पूर्ण निश्चिंत झालो. आता जे कांही करायचं ते आरतीची नोकरी आणि पगार गृहीत न धरता जे शक्य असेल तेच करायचं. आणि तेही पूर्ण विचारांती..!

हे मी मनाशी ठरवलं आणि पुढं अल्पावधीतच जे कांही घडलं ते आपसूकच घडत जावं तसंच सगळं.. आणि मी कधी कल्पनाही केली नव्हती अशा अनपेक्षित वळणापर्यंत मी येऊन थबकलो! इथे वळायचं कीं आहे त्याच रस्त्याने पुढं चालत रहायचं? .. माझी क्षणकाळाची ही द्विधा मनोवस्था ओळखल्या सारखा ‘तो’ स्वत:शीच हसत उभाच असणार तिथंच कुठंतरी.. माझ्याजवळ. कारण पुढं जे जे घडत गेलं ते सगळं त्यानेच घडवल्यासारखं! प्रत्येकवेळी मला दिलासा देणारं आणि बरंच कांही एरवी मी कधी कल्पनाही केली नसती असं सगळं..!!

क्रमश:…  (प्रत्येक गुरूवारी)

©️ अरविंद लिमये

सांगली (९८२३७३८२८८)

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ.मंजुषा मुळे/सौ.गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ तन्मय साहित्य # ३१३ – कविता – ☆ पीपल बड़ की छाँव गाँव की बातें करते… ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ ☆

श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

(सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी द्वारा गीत-नवगीत, बाल कविता, दोहे, हाइकु, लघुकथा आदि विधाओं में सतत लेखन। प्रकाशित कृतियाँ – एक लोकभाषा निमाड़ी काव्य संग्रह 3 हिंदी गीत संग्रह, 2 बाल कविता संग्रह, 1 लघुकथा संग्रह, 1 कारगिल शहीद राजेन्द्र यादव पर खंडकाव्य, तथा 1 दोहा संग्रह सहित 9 साहित्यिक पुस्तकें प्रकाशित। प्रकाशनार्थ पांडुलिपि – गीत व हाइकु संग्रह। विभिन्न साझा संग्रहों सहित पत्र पत्रिकाओं में रचना तथा आकाशवाणी / दूरदर्शन भोपाल से हिंदी एवं लोकभाषा निमाड़ी में प्रकाशन-प्रसारण, संवेदना (पथिकृत मानव सेवा संघ की पत्रिका का संपादन), साहित्य संपादक- रंग संस्कृति त्रैमासिक, भोपाल, 3 वर्ष पूर्व तक साहित्य संपादक- रुचिर संस्कार मासिक, जबलपुर, विशेष—  सन 2017 से महाराष्ट्र शासन के शैक्षणिक पाठ्यक्रम कक्षा 9th की  “हिंदी लोक भारती” पाठ्यपुस्तक में एक लघुकथा ” रात का चौकीदार” सम्मिलित। सम्मान : विद्या वाचस्पति सम्मान, कादम्बिनी सम्मान, कादम्बरी सम्मान, निमाड़ी लोक साहित्य सम्मान एवं लघुकथा यश अर्चन, दोहा रत्न अलंकरण, प्रज्ञा रत्न सम्मान, पद्य कृति पवैया सम्मान, साहित्य भूषण सहित अर्ध शताधिक सम्मान। संप्रति : भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स प्रतिष्ठान भोपाल के नगर प्रशासन विभाग से जनवरी 2010 में सेवा निवृत्ति। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय कविता पीपल बड़ की छाँव गाँव की बातें करते” ।)

☆ तन्मय साहित्य  # ३१३ 

☆ पीपल बड़ की छाँव गाँव की बातें करते… ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ ☆

पीपल बड़ की छाँव, गाँव की बातें करते

दूर निकल आये, मुश्किल अब लौटें कैसे।

*

बदल गया है देश, वेश भाषा औ’ बोली

कहाँ रही वे सहज सरल इच्छाएँ भोली

जीवन के अब रंग-ढंग कुछ नये-नये से

दूर निकल आये मुश्किल अब लौटें कैसे

*

वह संझा की दीपक-बाती भजन आरती

गप-सप कथा वार्ताएँ,  दादी उचारती

यादें सँजो रखी अब तक हमने अच्छे से

दूर निकल आये, मुश्किल अब लौटें कैसे।

*

खेत और खलिहान बैलगाड़ी पर चलना

गेहूँ की बालियाँ सेंक, हाथों पर मलना

ताजे ऋतुफल खाते थे, तब बड़े मजे से

दूर निकल आये, मुश्किल अब लौटें कैसे।

*

माँ बापू के संघर्षों को, भूल न पाते

हाड़तोड़ मेहनत से, घर को रहे चलाते

है आशीष उन्हीं के हम हैं सजे-धजे से

दूर निकल आये मुश्किल अब लौटें कैसे।

*

भीड़ और बाजारों के, इस बड़े शहर में

मुरझाये मन से, वय के इस प्रथम पहर में

मूल्य यहाँ जीवन का, बस रुपये-पैसे से

दूर निकल आये, मुश्किल अब लौटें कैसे।

*

मौजू मन ये रोज, गाँव की सैर कराता

सुविधाभोगी तन को, गाँव नहीं है भाता

विवश जिंदगी बीत रही अब जैसे-तैसे

दूर निकल आये, मुश्किल अब लौटें कैसे।

☆ ☆ ☆ ☆ ☆

© सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय

जबलपुर/भोपाल, मध्यप्रदेश, अलीगढ उत्तरप्रदेश  

मो. 9893266014

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश के नवगीत # १३४ ☆ फागुन और वसंत के दोहे ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “फागुन और वसंत के दोहे”।)       

✍ जय प्रकाश के नवगीत # १३४ ☆ फागुन और वसंत के दोहे ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

महुआ के रस में पगा, आ पहुँचा ऋतुराज

टेढ़ी नाक पलाश ले, स्वागत करता आज।

पीर विचारी हो गई, ज्यों गरीब की आस

दुख के आगे कौन है, जो गाये मधुमास।

 *

कली-कली के होंठ से, टपक रहा मकरंद

भँवरों की हैं टोलियाँ, घूम रहीं स्वच्छंद ।

 *

फागुन के कालीन पर, सेमल के मनुहार

पीकर रस मकरंद के, कामदेव अवतार।

 *

फागुन रंग अबीर ले, आ पहुँचा है द्वार

सेमल टेसू कर रहे, रंगों का व्यापार।

 *

फागुन वाली हाट में, टेसू की दूकान

सेमल बाँटे मुफ्त में, रंग भरे पकवान।

 *

गुझिया खाओ भाँग की, लेकर हाथ गुलाल

फिर निकलो हुरयार बन, खूब करो भूचाल।

 *

महफ़िल रंग गुलाल की, छायी चारों ओर

कौन बड़ा हुरियार है, कौन बड़ा चितचोर।

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १३९ ☆ कह रहे है सब ग़ज़ल… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “कह रहे है सब ग़ज़ल“)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १३९ ☆

✍ कह रहे है सब ग़ज़ल… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे 

हम तने-तन्हा चले थे आसरा कोई न था

राह थी दुश्वार मंज़िल का पता कोई न था

हो गए है हम ज़ुदा मर्ज़ी ये रब की मानकर

बेवफ़ा कोई नहीं था बावफ़ा कोई न था

 *

है नहीं बेटी सुरक्षित कोख में या जन्म ले

मर्द हक़ में  बोलने आगे बढ़ा कोई न था

 *

कौन गुलशन की फ़ज़ा में  ज़हर इतना भर गया

नफ़रतें ही नफ़रतें थी दूसरा कोई न था

 *

साथ चलती भीड़ से तुम मुतमइन क्यों हो रहे

सब किराए के है टट्टू काम का कोई न था

 *

तुमसे मिलने में रिवायत की खड़ी दीवार जब

सबसे की मैंने बगावत रास्ता कोई था

 *

कह रहे है सब ग़ज़ल उस्ताद खुद को मानकर

हो नहीं तनक़ीद अब और तब्सिरा कोई न था

 *

आज भी इंसानियत ज़िंदा अरुण संसार में

खून जो मुझको दिया था राब्ता कोई न था

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

सिरThanks मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ कविता # ४५ – महरी और ठण्ड का मौसम… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – महरी और ठण्ड का मौसम।)

✍ महरी और ठण्ड का मौसम… ☆ श्री हेमंत तारे  

एक साथ खिल गये,

गुलाब कई

देख कर महरी के चेहरे पर मुस्कान

जब मिला उसे गर्म पानी

बर्तन धोने,

पोछा लगाने l

 

अभागे

है वो,

सूझता नहीं जिन्हें,

गर्म पानी देना महरी को

बर्तन धोने,

पोछा लगाने

और तभी

देख नहीं पाते हैं वो

कभी भी

एक साथ खिलते

गुलाब कई l

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ५३ ☆ कविता – फा़सला… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय कविता – “फा़सला“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ५३ ☆

✍ कविता – फा़सला… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

तेरे मेरे बीच फा़सला

क्या है, कितना है

न मैं जानूँ, न तुम जानो।

 

हो सकता है

तुम जानते हो

पर मुझे नहीं मालूम कि

तुम जानते हो।

 

बस कुछ महसूस होता है,

न शब्द जानें, न अर्थ जानें।

 

कल्पना कैसे होती है भला,

बिन आधार कौन जाने।

 

तुमसे दूर रहने का दुख,

न दिल जाने, न दिमाग जाने,

पर होता है जरूर।

 

आकर तुम ही बताओ,

मेरे क्या माने?

तुम्हारे क्या माने?

 

कितना है, क्यों है

यह फ़ासला।

© डॉ सत्येंद्र सिंह

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # १०२ – रेत की दीवार… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – रेत की दीवार।)

☆ लघुकथा # १०२ – रेत की दीवार श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

शांति दास जी सोच रहे थे कि आसपास इतना सन्नाटा है।आजकल कोई सुबह की सैर को भी नहीं जाता?

सुबह हो गई अब चाय तो बना कर पी लेता हूँ, तभी आवाज आई कचरे वाली गाड़ी आई।

“चलो कचरा डालकर ही चाय पीता हूँ।”

कचरा उठाकर  बाहर डालने के लिए गए, तभी कचरे वाले  ने कहा – “बाबा आज बाहर बहुत ठंड है और आपने बस एक स्वेटर पहनना है, टोपी क्यों नहीं पहनी, आपको खांसी  आ रही है।”

शांति दास जी ने कहा- “बेटा बहू ऊपर की मंजिल में रहते हैं नीचे मुझे अकेला छोड़ दिया। पत्नी के गुजर जाने के बाद जिंदगी बोझ हो गई है। बुढ़ापे का  बोझ मुझसे अब सहन भी नहीं होता? ऐसा लगता है कि मरुस्थल के चारों ओर में गिरा हूँ। सब तरफ अंधेरा दिखाई दे रहा है।”

कचरे की गाड़ी वाले ने कहा- “बाबा आपकी बात तो मेरे सिर के ऊपर से जा रही है, ठीक है आपका जीवन आप जानो, मैं आगे के घर का कचरा लेता हूं।”

“बाबूजी आपने अपने आसपास रेत की दीवार क्यों खड़ी की है?”

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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