हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ काव्य कुञ्ज – # 3 – सवाल अभी बाकी हैं… ☆ – श्री मच्छिंद्र बापू भिसे

श्री मच्छिंद्र बापू भिसे

(श्री मच्छिंद्र बापू भिसे जी की अभिरुचिअध्ययन-अध्यापन के साथ-साथ साहित्य वाचन, लेखन एवं समकालीन साहित्यकारों से सुसंवाद करना- कराना है। यह निश्चित ही एक उत्कृष्ट  एवं सर्वप्रिय व्याख्याता तथा एक विशिष्ट साहित्यकार की छवि है। आप विभिन्न विधाओं जैसे कविता, हाइकु, गीत, क्षणिकाएँ, आलेख, एकांकी, कहानी, समीक्षा आदि के एक सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी रचनाएँ प्रसिद्ध पत्र पत्रिकाओं एवं ई-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहती हैं।  आप महाराष्ट्र राज्य हिंदी शिक्षक महामंडल द्वारा प्रकाशित ‘हिंदी अध्यापक मित्र’ त्रैमासिक पत्रिका के सहसंपादक हैं। अब आप प्रत्येक बुधवार उनका साप्ताहिक स्तम्भ – काव्य कुञ्ज पढ़ सकेंगे । आज प्रस्तुत है उनकी नवसृजित कविता “सवाल अभी बाकी हैं…”

 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – काव्य कुञ्ज – # 3☆

 

☆ सवाल अभी बाकी हैं…

 

कहीं धूप तो कहीं छाँव,

कहीं सुख तो कहीं दुःख,

कहीं जन्म तो कहीं मृत्यु,

कहीं अपना और कहीं दूजा भी है,

कभी मेरा है कभी तेरा है,

कभी मैं-मैं और कभी तू-तू है,

न जाने कितना कहीं

और कितना क्या-क्या है.

 

इस पहेली को सुलझाने के पीछे हर एक है,

शायद कहीं की हाँ और ना,

भविष्य की सोच में,

है और था में,

खुद को भूल गया,

आज हर एक है,

सँभालो मेरे प्यारों!

अभी का वक्त अपना-अपना,

इसे बनाए शाश्वत जीवन सपना.

 

न जाने कब साँस छूटे एक पल में,

और तमाशा देखनेवाले खुदा करें,

अपना ही तमाशा बना न करें,

चलो आज के पल में कुछ ऐसा करें,

हर दिल में अपना एहसास भरें,

फिर चाहे साँस का साथ लूटे,

चाहे अपनों का हाथ छूटे.

 

फिर देखना तमाशबीन और चिता की लौ को,

और भी धधकेगी कि वह,

आक्रोश और क्रंदन से,

नफरत के बदले प्यार में,

हर आँसू टपकेगा तुम्हारी याद में,

देखकर तेरे जीवन का शाश्वत तमाशा,

ऊपरवाला तमाशबीन रो पड़ेगा इस द्वंद्व में,

क्यों बनी मेरी हाथ से यह सूरत,

जिसकी बनेगी मेरे कारण धरती पर मूरत,

क्या हक है उसके अधीन विश्वास को तोड़ने का ?

हर एक रिश्ते को बिखरने का ?

 

वह ईश भी सोच में पड़े,

ऐसा चलो एक काम करें,

उस ईश पर हम हँस पड़े,

होकर उसके सामने खड़े,

करें एक सवाल उसे,

क्यों यह दुनियावाले फिर

क्षणिक सुख के पीछे है पड़े?

कई सवाल करेंगे,

कई बवाल करेंगे,

पर क्या मानव अपने रास्ते,

खुद ही चुनेंगे?

सवाल अभी बाकी हैं……….

 

© मच्छिंद्र बापू भिसे

भिराडाचीवाडी, डाक भुईंज, तहसील वाई, जिला सातारा – ४१५ ५१५ (महाराष्ट्र)

मोबाईल नं.:9730491952 / 9545840063

ई-मेलmachhindra.3585@gmail.com , hindiadhyapakmitra@gmail.com

Please share your Post !

Shares

मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कवितेच्या प्रदेशात # 14 – मानकुँवर ☆ – सुश्री प्रभा सोनवणे

सुश्री प्रभा सोनवणे

(आज प्रस्तुत है सुश्री प्रभा सोनवणे जी के साप्ताहिक स्तम्भ  “कवितेच्या प्रदेशात” में  उनकी ह्रदय स्पर्शी कविता मानकुँवर. सुश्री प्रभा जी जानती हैं  कि समय गहरे  से गहरे घाव भी भर देता है. किन्तु, एक नारी ह्रदय ही नारी की व्यथा को समझ सकती है. ऐसा नहीं कि सभी पुरुष संवेदनहीन होते हैं. महत्वपूर्ण यह है कि  ऐसी कविता की रचना का होना उनके संवेदनशील  ह्रदय  में  एक संवेदनशील  साहित्यकार का  जीवित होना है.  ऐसी रचना के लिए उस पात्र को जीना होता है और इतिहास के पात्रों को वर्तमान के पात्र के मध्य सामंजस्य बनाना होता है. 

सुश्री प्रभा जी का साहित्य जैसे -जैसे पढ़ने का अवसर मिल रहा है वैसे-वैसे मैं निःशब्द होता जा रहा हूँ। हृदय के उद्गार इतना सहज लिखने के लिए निश्चित ही सुश्री प्रभा जी के साहित्य की गूढ़ता को समझना आवश्यक है। यह  गूढ़ता एक सहज पहेली सी प्रतीत होती है। आप  प्रत्येक बुधवार को सुश्री प्रभा जी  के उत्कृष्ट साहित्य का साप्ताहिक स्तम्भ  – “कवितेच्या प्रदेशात” पढ़ सकते  हैं।)

 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – कवितेच्या प्रदेशात # 14 ☆

 

☆ मानकुँवर ☆

 

आज अचानक  आठवलीस तू

 

मानकुँवर —-

 

पब्लिक  मेमरी शॉर्ट असते म्हणतात, ते अगदी  खरं आहे  !

 

किती  अस्वस्थ  झाले  होते  मी,

वर्तमानपत्रातल्या तुझ्या  हत्येच्या

बातमी नं !

 

नखशिखांत हादरलेच होते,

ज्यांनी  केला तुझा  खून ते तुझे बाप, भाऊच सख्ये !

 

आणि  तुझा गुन्हा तरी काय ??

 

तू केलंस प्रेम–

जातिधर्मात किंचित  फरक असलेल्या—

तुला आवडलेल्या  तरूणावर !

 

मानकुँवर

तू होतीस उच्चशिक्षित–

डॉक्टर !!

 

तुझं नाव मानकुँवर ठेवणारांनी

तुला मानानं जगूच दिलं नाही,

आणि  मरण ही किती  अपमानास्पद  !

 

मानकुँवर आज आठवलीस तू,

“भूले बिसरे गीत” मधल्या दर्दभ-या गाण्या सारखी!

 

मानकुँवर —

तू खानदान की ईज्जत,

तू शालीनता, तू मर्यादा,

तू नंदिनी  तू बंदिनी ——-

 

युगानुयुगे भळभळणारी एक जखम —-

स्री जाती च्या प्रारब्धावरची !

तू चिरंजीवी ——

तुला मरण नाही !

 

पण तू मागत नाहीस तेल—-

द्रौपदी च्या  पाच पुत्रांना मारणा-या पापी आश्वत्थाम्यासारखी,

 

कारण तू स्री आहेस,

तू ब-या करतेस स्वतःच्या जखमा,युगानुयुगे—-

 

आणि  ते करतच आहेत  वार  आजतागायत  !

 

डॉ. मानकुँवर सहगल  !!

 

© प्रभा सोनवणे,  

“सोनवणे हाऊस”, ३४८ सोमवार पेठ, पंधरा ऑगस्ट चौक, विश्वेश्वर बँकेसमोर, पुणे 411011

मोबाईल-९२७०७२९५०३,  email- sonawane.prabha@gmail.com

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी का काव्य संसार # 6 ☆ दो लफ़्ज़ों की कहानी ☆ – सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा ☆

सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा

 

(सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी  सुप्रसिद्ध हिन्दी एवं अङ्ग्रेज़ी की  साहित्यकार हैं। आप अंतरराष्ट्रीय / राष्ट्रीय /प्रादेशिक स्तर  के कई पुरस्कारों /अलंकरणों से पुरस्कृत /अलंकृत हैं । हम आपकी रचनाओं को अपने पाठकों से साझा करते हुए अत्यंत गौरवान्वित अनुभव कर रहे हैं। सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी का काव्य संसार शीर्षक से प्रत्येक मंगलवार को हम उनकी एक कविता आपसे साझा करने का प्रयास करेंगे। आप वर्तमान में  एक्जिक्यूटिव डायरेक्टर (सिस्टम्स) महामेट्रो, पुणे हैं। आपकी प्रिय विधा कवितायें हैं। आज प्रस्तुत है आपकी  कविता “दो लफ़्ज़ों की कहानी”। )

 

साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी का काव्य संसार # 6  

☆ दो लफ़्ज़ों की कहानी 

 

दो लफ़्ज़ों की ही ये कहानी होती

कितनी आसान ये जिंदगानी होती

 

न ही कोई ग़म, न ज़ख्म होता

कितनी खूबसूरत ये रवानी होती

 

यूँ ही ख़ुशी गले से लिपट जाती

मासूम सी ज़िंदगी की कहानी होती

 

ये सितारे हरदम झिलमिलाते रहते

रात कितनी हसीं और सुहानी होती

 

हाँ, मुहब्बत भी अमर हो जाती

शाम की कहकशां आशिकानी होती

 

© नीलम सक्सेना चंद्रा

आपकी सभी रचनाएँ सर्वाधिकार सुरक्षित हैं एवं बिनाअनुमति  के किसी भी माध्यम में प्रकाशन वर्जित है।

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा – # 2 ☆ बाल साहित्य – रोचक विज्ञान बाल कहानियां ☆ – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

 

(हम प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के आभारी हैं जिन्होने  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा”  शीर्षक से यह स्तम्भ लिखने का आग्रह स्वीकारा। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।  अब आप प्रत्येक मंगलवार को श्री विवेक जी के द्वारा लिखी गई पुस्तक समीक्षाएं पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है श्री विवेक जी  की पुस्तक चर्चा  “रोचक विज्ञान बाल कहानियां।)

यह एक संयोग ही है क़ि पुस्तक के लेखक श्री ओम प्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी को 2 सितम्बर 2019 को ही शब्द निष्ठा सम्मान से सम्मानित किया गया.

(शब्द निष्ठा सम्मान समारोह 2019 अजमेर में 2 सितम्बर 2019 को  बालसाहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ जी को सम्मानित करते हुए बाएँ से डॉ अजय अनुरागीजी, विमला भंडारीजी, आशा शर्माजी, (स्वयं) ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’,अनुविभगीय अधिकारी साहित्यकार सूरजसिंह नेगी जी संयोजक डॉ अखिलेश पालरिया जी। ई-अभिव्यक्ति की ओर से   श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ जी  को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं.)

 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा – # 2 ☆ 

 

 ☆ बाल साहित्य – रोचक विज्ञान बाल कहानियां ☆

पुस्तक चर्चा

बाल साहित्य .. रोचक विज्ञान बाल कहानियां

लेखक.. ओम प्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

पृष्ठ ६०, मूल्य  १०० रु,

संस्करण पेपर बैक

प्रकाशक.. रवीना प्रकाशन गंगा नगर दिल्ली ९४

 

☆ बाल साहित्य  – रोचक विज्ञान बाल कहानियां – चर्चाकार…विवेक रंजन श्रीवास्तव ☆

 

मस्तिष्क की ग्रह्यता का सरल सिद्धांत है कि  कहकर बताई गई   या पढ़ाकर समझाई गई बात की अपेक्षा यदि उसे करके दिखाया जावे या चित्र से समझाया जावे तो वह अधिक सरलता से बेहतर रूप में समझ भी आती है और स्मरण में भी अधिक रहती है. इसी तरह खेल खेल में समझे गये सिद्धांत या कहानियो के द्वारा बताई गई बातें बच्चो पर गहरा प्रभाव छोड़ती हैं, क्योकि कहानियो मे कथ्य के साथ साथ बच्चे मन में एक छबि निर्मित करते जाते हैं

जो उन्हें किसी तथ्य को याद करने व समझने में सहायक होती है.

विज्ञान कथा कहानी की वह विधा है जिसमें वैज्ञानिक सिद्धांतो या परिकल्पनाओ को कहानी के माध्यम से अभिव्यक्त किया जाता है. विज्ञान कथा के द्वारा लेखक अपनी वैज्ञानिक कल्पना को उड़ान दे पाता है. मैने अपनी १९८८ में लिखी विज्ञान कथा में कल्पना की थी कि सड़को में स्ट्रीट लाइट की जगह एक कम ऊंचाई पर छोटा सा भू स्थिर उपग्रह हर शहर के लिये छोड़ा जावे, मेरी यह कहानी विज्ञान प्रगति में छपी है. हाल ही चीन ने इस तरह की परियोजना को लगभग मूर्त रूप दे दिया है, जिसमें वे आर्टीफीशियल मून लांच कर रहे हैं. इसी तरह मेरी एक विज्ञान कथा में मैने सेटेलाईट में लगे कैमरे से अपराध नियंत्रण की कल्पना की थी जो अब लगभग साकार है. देखें बिना तार के रेडियेशन से एक जगह से दूसरी जगह बिजली  पहुंचाने की मेरी विज्ञान कथा में छपी हुई परिकल्पना कब साकार होती है.

ओम  प्रकाश क्षत्रिय प्रकाश एक शिक्षक हैं. वे बच्चो को विज्ञान पढ़ाने के लिये रोचक कथा में पिरोकर उन्हें विज्ञान के गूढ़ सिद्धांत समझाते हैं. कहानी बुनने के लिये वे कभी बच्चे की नींद में देखे स्वप्न का सहारा लेते हैं तो कभी पशु पक्षियो, जानवरो को मानवीय स्वरूप देकर उनसे बातें करते हैं. संग्रह में कुल १७ छोटी छोटी कहानियां हैं, हर कहानी में एक कथ्य है. पहली कहानी ही  गुरुत्वाकर्षण का नियम समझाती है. इंद्रढ़नुष के सात रंग श्वेत रंग के ही अवयव हैं यह वैज्ञानिक तथ्य  बताने के साथ ही परस्पर मिलकर रहने की शिक्षा भी देते हुये इंद्रढ़नुष बिखर गया कहानी बुनी गई है. इसी तरह प्रत्येढ़क कहानी बच्चो पर अलग शैक्षिक प्रभाव छोड़ती है.

किताब बहुत बढ़िया है व शालाओ में बड़ी उपयोगी है.

टिप्पणी… विवेक रंजन श्रीवास्तव, ए १, शिला कुंज नयागांव जबलपुर

मो ७०००३७५७९८

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी की लघुकथाएं – # 14 – सुघड़ बहू ☆ – श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

 

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी की लघुकथाएं शृंखला में आज प्रस्तुत हैं उनकी एक बेहतरीन लघुकथा “सुघड़ बहू ”।  श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ़ जी की कलम को इस बेहतरीन लघुकथा के माध्यम से  समाज  को अभूतपूर्व संदेश देने के लिए  बधाई ।)

 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी की लघुकथाएं # 14 ☆

 

☆ सुघड़ बहू ☆

 

माधवी  बहुत सुशील संस्कार वान लड़की शादी से दुल्हन बन कर ससुराल आई। कुछ दिनों के बाद सभी मेहमानों के जाने के बाद घर के सदस्य बच गये। वहां एक बहुत ही खराब आदत थी, खाना खाने के बाद उसी थाली में कुल्ली कर हाथ धोने की। जो माधवी को  कहीं से भी अच्छा नहीं लग रहा था। उसने अपने पतिदेव से कही, उन्होंने भी कह दिया हमारे यहां सभी ऐसा ही करते है। तुम नया कुछ नहीं कर सकती।

माधवी ने भी सब को अच्छी आदत डालने का बीडा उठाया।

खाना परोसने के बाद वह वहीं खड़ी रहती। एक हाथ में पानी और दूसरे हाथ पर हाथ धोने वाला बर्तन। सबको हाथ धुलाती थी। और फिर बर्तन बाहर रख कर आ जाती थी। सबको बहुत बुरा लगता था। कई बातें भी बनती थी। परन्तु जो गलत था उसे वह सुधार रहीं थीं। धीरे-धीरे सभी को समझ आने लगा। वास्तव मे जो जूठे बर्तन उठाये जिसमें सुबह शाम हाथ धोकर कुल्ला किया जाये, तो उसको कितना खराब लगता होगा।

अब तो सब बाहर एक निश्चित जगह पर जाकर हाथ धोने लगे। पतिदेव भी खुश थे कि जो अच्छा काम है। उसे अपना लेना चाहिए। अब तो देखा-देखी सभी इस का ख्याल करने लगे।

माधवी सब के लिये अब “सुघड़ बहु ‘बन गई। उसे भी एक नयी पहल पर अच्छा लगा। अपनी जीत पर मुस्कुराने लगी।

 

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

Please share your Post !

Shares

मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ श्री अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती #14 – शुद्र मागण्या* ☆ – श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

 

(वरिष्ठ मराठी साहित्यकार श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे जी का अपना  एक काव्य  संसार है । आप  मराठी एवं  हिन्दी दोनों भाषाओं की विभिन्न साहित्यिक विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं।  आज साप्ताहिक स्तम्भ  – अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती  शृंखला  की अगली  कड़ी में प्रस्तुत है एक सामयिक एवं सार्थक कविता  “शुद्र मागण्या*”।)

 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # 14 ☆

 

? शुद्र मागण्या* ?

 

हवा कशाला रंग नि कागद

हृदयावरती चित्र काढण्या

नजर एकदा टिपून घेते

साऱ्या बाबी अशा देखण्या

 

तुझे देखणे रूप मनोहर

नकोच अंबर नको चांदण्या

ओठांवरती मधाळ पोळे

पराग जाऊ कशा शोधण्या

 

पानामागे खरडुन पाने

हृदयी टोचू नको टाचण्या

हृदयाचे हृदयी प्रक्षेपण

नको पाठवू पत्र वाचण्या

 

अंधाराशी वाद न काही

त्याच्या काही शुद्र मागण्या

काळोखाशी भिडेल मी या

मिटून घे तू तुझ्या पापण्या

 

© अशोक श्रीपाद भांबुरे

धनकवडी, पुणे ४११ ०४३.

मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८

ashokbhambure123@gmail.com

Please share your Post !

Shares

मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ रंजना जी यांचे साहित्य #-13 – कविता – सांजवात ☆ – श्रीमती रंजना मधुकरराव लसणे

श्रीमती रंजना मधुकरराव लसणे 

 

(श्रीमती रंजना मधुकरराव लसणे जी हमारी पीढ़ी की वरिष्ठ मराठी साहित्यकार हैं।  सुश्री रंजना  एक अत्यंत संवेदनशील शिक्षिका एवं साहित्यकार हैं।  सुश्री रंजना जी का साहित्य जमीन से  जुड़ा है  एवं समाज में एक सकारात्मक संदेश देता है।  निश्चित ही उनके साहित्य  की अपनी  एक अलग पहचान है। आप उनकी अतिसुन्दर ज्ञानवर्धक रचनाएँ प्रत्येक सोमवार को पढ़ सकेंगे।  आज  प्रस्तुत है संध्या -वंदना पर आधारित कविता  “सांजवात । )

 

? साप्ताहिक स्तम्भ – रंजना जी यांचे साहित्य #- 13? 

 

? सांजवात  ?

 

देवाजींच्या मंदिरात

तेवणारी सांजवात।

घोर अंधारल्या मना

देई उजाळा क्षणात।

 

प्रकाशली सांजवात

घरदार प्रकाशित ।

सायं प्रार्थना शमवी

विचारांचे झंजावात।

 

सांजवात लावूनिया

आळवावे योगेश्वरा।

विनाशावी शत्रू बुद्धी

सुख शांती येवो घरा।

 

मंद प्रकाश निर्मळ

धूप देई परिमळ।

सांजवात प्रकाशता

दूर पळे अमंगळ।

 

©  रंजना मधुकर लसणे✍

आखाडा बाळापूर, जिल्हा हिंगोली

9960128105

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ जय प्रकाश पाण्डेय का सार्थक साहित्य # 11 – बेचारा प्यारा बिझूका ☆ – श्री जय प्रकाश पाण्डेय

श्री जय प्रकाश पाण्डेय

 

(श्री जयप्रकाश पाण्डेय जी   की पहचान भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी के अतिरिक्त एक वरिष्ठ साहित्यकार की है। वे साहित्य की विभिन्न विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। उनके  व्यंग्य रचनाओं पर स्व. हरीशंकर परसाईं जी के साहित्य का असर देखने को मिलता है। परसाईं जी का सानिध्य उनके जीवन के अविस्मरणीय अनमोल क्षणों में से हैं, जिन्हें उन्होने अपने हृदय  एवं  साहित्य में  सँजो रखा है । प्रस्तुत है साप्ताहिक स्तम्भ की   ग्यारहवीं कड़ी में उनकी कविता  “बेचारा प्यारा बिझूका” । आप प्रत्येक सोमवार उनके  साहित्य की विभिन्न विधाओं की रचना पढ़ सकेंगे।)

☆ जय प्रकाश पाण्डेय का सार्थक साहित्य # 11 ☆

 

☆ बेचारा प्यारा बिझूका ☆ 

 

बेचारा प्यारा बिझूका

मुफ्त में ड्यूटी करता

करता कारनामे गजब

फटे शर्ट में मुस्कराता

चिलचिली धूप में नाचता

पूस की रातों में कुकरता

कुत्ते जैसा कूं कूं करता

खेत मे फुल मस्त दिखता

मुफ्त का चौकीदार बनता

हरदम अविश्वास करता

न खुद खाता न खाने देता

क्यों मोती की माला गिनता

 

……………….

 

बेचारा हमारा बिझूका

हितैषी कहता किसान का

देशहित में हरदम बात करता।

वोट मांगता और झटके देता

पशु पक्षियों को झूठ में डराता

और हर दम हाथ भी मटकाता

 

…………………..

 

बेचारा उनका बिझूका

सिनेमा में बंदूक चलाता

व्यंग्य में चौकीदारी करता

कविता में बेवजह घुस जाता

और

भूत की अपवाह फैलाता

योगी और किसान को डराता

रात को मोती माला जपता

 

© जय प्रकाश पाण्डेय

416 – एच, जय नगर, आई बी एम आफिस के पास जबलपुर – 482002  मोबाइल 9977318765

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ सकारात्मक सपने – #14 – देश बनाने की जिम्मेदारी युवाओं पर ☆ सुश्री अनुभा श्रीवास्तव

 

सुश्री अनुभा श्रीवास्तव 

(सुप्रसिद्ध युवा साहित्यकार, विधि विशेषज्ञ, समाज सेविका के अतिरिक्त बहुआयामी व्यक्तित्व की धनी  सुश्री अनुभा श्रीवास्तव जी  के साप्ताहिक स्तम्भ के अंतर्गत हम उनकी कृति “सकारात्मक सपने” (इस कृति को  म. प्र लेखिका संघ का वर्ष २०१८ का पुरस्कार प्राप्त) को लेखमाला के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। साप्ताहिक स्तम्भ – सकारात्मक सपने के अंतर्गत आज अगली कड़ी में प्रस्तुत है “देश बनाने की जिम्मेदारी युवाओं पर”  इस लेखमाला की कड़ियाँ आप प्रत्येक सोमवार को पढ़ सकेंगे।)  

 

Amazon Link for eBook :  सकारात्मक सपने

 

Kobo Link for eBook        : सकारात्मक सपने

 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सकारात्मक सपने  # 14 ☆

 

☆ देश बनाने की जिम्मेदारी युवाओं पर ☆

 

देश, जितना व्यापक शब्द है, उससे भी अधिक व्यापक है यह सवाल कि देश कौन बनाता है ? नेता, सरकारी कर्मचारी, शिक्षक, मजदूर, वरिष्ठ नागरिक, साधारण नागरिक, महिलाएं, युवा… आखिर कौन ? शायद हम सब मिलकर देश बनाते हैं. लेकिन फ़िर भी प्रश्न है कि इनमें से सर्वाधिक भागीदारी किसकी ? तब तत्काल दिमाग में विचार आता है कि यथा राजा तथा प्रजा. नेतृत्व अनुकरणीय उदाहरण रखे, व आम नागरिक उसका पालन करें तभी देश बनता है. देश बनाने की जिम्मेदारी सर्वाधिक युवाओं पर है. भारत के लिये खुशी की बात यह है कि हमारी जनसंख्या का पचास प्रतिशत से अधिक हिस्सा पच्चीस से चालीस वर्ष आयु वर्ग का है.. जिसे हम “युवा” कहते हैं, जो वर्ग सामाजिक, आर्थिक, शारीरिक, मानसिक सभी रूपों में सर्वाधिक सक्रिय रहता है, यह तो उम्र का तकाजा है । वहीं दूसरी तरफ़ लगातार हिंसक, अशिष्ट, उच्छृंखल होते जा रहे… चौराहों पर खडे़ होकर फ़ब्तियाँ कसते..यौन अपराधो में लिप्त तथाकथित युवाओं को देखकर मन वितृष्णा से भर उठता है । इस महत्वपूर्ण समूह की आज भारत में जो हालत है वह कतई उत्साहजनक नहीं कही जा सकती.पर सभी बुराईयों को युवाओं पर थोप देना उचित नहीं है ।

प्रश्न है, आजकल के युवा ऐसे क्यों हैं ? क्यों यह युवा पीढी़ इतनी बेफ़िक्र और मनमानी करने वाली है । जब हम वर्तमान और भविष्य की बातें करते हैं तो हमें इतिहास की ओर भी देखना होगा । भूतकाल जैसा होगा, वर्तमान उसकी छाया होगा ही  और भविष्य की बुनियाद बनेगा ।  आज के युवा को पिछले समय ने ‘विरासत’ में क्या दिया है, कैसा समाज और संस्कार दिये हैं ? आजादी के बाद से हमने क्या देखा है… तरीके से संगठित होता भ्रष्टाचार, अंधाधुंध साम्प्रदायिकता, चलने-फ़िरने में अक्षम लेकिन देश चलाने का दावा करने वाले नेता, घोर जातिवादी नेता और वातावरण, राजनीति का अपराधीकरण या कहें कि अपराधियों का राजनीतिकरण, नसबन्दी के नाम पर समझाने-बुझाने का नाटक और लड़के की चाहत में चार-पाँच-छः बच्चों की फ़ौज… अर्थात जो भी बुरा हो सकता था, वह सब विगत में देश में किया जा चुका है  । इसका अर्थ यह भी नहीं कि उस समय में सब बुरा ही बुरा हुआ, लेकिन जब हम पीछे मुडकर देखते हैं तो पाते हैं कि कमियाँ, अच्छाईयों पर सरासर हावी हैं । अब ऐसा समाज विरासत में युवाओं को मिला है, तो उसके आदर्श भी वैसे ही होंगे ।  राजीव गाँधी कुछ समय के लिये, इस देश के प्रधानमन्त्री नहीं बने होते, तो शायद हम आज के तकनीकी प्रतिस्पर्धा के युग में नहीं जी रहे होते । देश के उस एकमात्र युवा प्रधानमन्त्री ने देश की सोच में जिस प्रकार का जोश और उत्साह पैदा किया, उसी का नतीजा है कि आज हम कम्प्यूटर और सूचना तन्त्र के युग में जी रहे हैं “दिल्ली से चलने वाला एक रुपया नीचे आते-आते पन्द्रह पैसे रह जाता है” यह वाक्य उसी पिछ्ली पीढी को उलाहना था, जिसकी जिम्मेदारी आजादी के बाद देश को बनाने की थी, और दुर्भाग्य से कहना पड़ता है कि, उसमें वह असफ़ल रही । परिवार नियोजन और जनसंख्या को अनियंत्रित करने वाली पीढी़ बेरोजगारों को देखकर चिन्तित हो रही है, पर अब देर हो चुकी है। भ्रष्टाचार को एक “सिस्टम” बना देने वाली पीढी युवाओं को ईमानदार रहने की नसीहत देती है । देश ऐसे नहीं बनता… अब तो क्रांतिकारी कदम उठाने का समय आ गया है… रोग इतना बढ चुका है कि कोई बडी “सर्जरी” किये बिना ठीक होने वाला नहीं है । विदेश जाते सॉफ़्टवेयर या आईआईटी इंजीनियरों तथा आईआईएम के मैनेजरों को देखकर आत्ममुग्ध मत होईये… उनमें से अधिकतर तभी वापस आयेंगे जब  यहाँ वातावरण बेहतर होगा.  कस्बे में, गाँव में रहने वाले युवा जो असली देश बनाते है,  हम उन्हें बेरोजगारी भत्ता दे रहे हैं, आश्वासन दे रहे हैं, राजनैतिक रैलियाँ दे रहे हैं,  पान-गुटखे दे रहे हैं, मर्डर-हवस सैक्स, सांस्कृतिक अधोपतन को बढ़ावा देने वाली फिल्में दे रहे हैं, “कैसे भी पैसा बनाओ” की सीख दे रहे हैं, कानून से ऊपर कैसे उठा जाता है, बता रहे हैं….आज के ताजे-ताजे बने युवा को भी “म” से मोटरसायकल,और  “म” से मोबाईल  चाहिये, सिर्फ़ “म” से मेहनत के नाम पर वह जी चुराता है.स्थितियां बदलनी होंगी.  युवा पीढ़ी को देश बनाने की चुनौती स्वीकारनी ही होगी.उन्हें अपना सपना स्वयं देखना होगा,और एक सुखद भविष्य के निर्माण करने हेतु जिम्मेदारी का निर्वहन करना होगा. संवैधानिक व्यवस्था में रहकर बिना आंदोलन हड़ताल या प्रदर्शन किये, पाश्चात्य अंधानुकरण के बिना युवा चेतना का उपयोग राष्ट्र कल्याण में उपयोग आज देश में जरूरी है.  इन दिनों वातावरण तो राष्ट्र प्रेम का बना है, सरकार ने डिजिटल लिटरेसी बढाने हेतु कदम उठाये है, विश्व में भारत की साख बढ़ती दिख रही है, अब युवा इस मौके को मूर्त रूप दे सकते हैं।

 

© अनुभा श्रीवास्तव

Please share your Post !

Shares

मराठी साहित्य – ☆ साप्ताहिक स्तंभ –केल्याने होतं आहे रे # 3 ☆ ग्रामीण युवकांना रोजगार सुवर्ण संधी ☆ – श्रीमति उर्मिला उद्धवराव इंगळे

श्रीमति उर्मिला उद्धवराव इंगळे

 

(वरिष्ठ  मराठी साहित्यकार श्रीमति उर्मिला उद्धवराव इंगळे जी का धार्मिक एवं आध्यात्मिक पृष्ठभूमि से संबंध रखने के कारण आपके साहित्य में धार्मिक एवं आध्यात्मिक संस्कारों की झलक देखने को मिलती है।  इसके अतिरिक्त  ग्राम्य परिवेश में रहते हुए पर्यावरण  उनका एक महत्वपूर्ण अभिरुचि का विषय है। श्रीमती उर्मिला जी के    “साप्ताहिक स्तम्भ – केल्याने होतं आहे रे ”  की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है  उनका आलेख ग्रामीण युवकांना रोजगार सुवर्ण संधी

 

☆ साप्ताहिक स्तंभ –केल्याने होतं आहे रे # 3 ☆

 

☆ ग्रामीण युवकांना रोजगार सुवर्ण संधी ☆

 

“चरखा,चपला आणि चेंजमेकर ” या लेखात श्री.संदीप वासलेकर यांनी म्हटलंय.

“आईसलंडसारख्या  फक्त तीन लाख लोकवस्तीच्या छोट्या देशातले ग्रामीण उद्योजक जगभर  कोळंबीच्या कवचाचं मलम लोकप्रिय करु शकतात.जगातले अनेक देश तिथल्या पारंपरिक पदार्थांना व वस्तूंना बाजारपेठेत स्थान मिळवून देण्याचा प्रयत्न करतात तर आपण कां नाही ? मला हे त्यांचं म्हणणं अतिशय मोलाचं वाटलं

श्री.वासलेकर यांच्या एका बेल्जियमच्या मित्राच्या मुलानं उच्चविद्यविभूषित असूनही एकदा काही मित्रांच्या सांगण्यावरून इंटरनेटद्वारा चपला विकण्याचा व्यवसाय सुरू केला व त्याला काहीही अनुभव नव्हता, फक्त काहीतरी नवीन,वेगळं करायचं म्हणून त्यानं तीन वर्षांत चपला विकून एवढी संपत्ती मिळवली की ती त्याच्या वडिलांनी ३०वर्ष आंतरराष्ट्रीय संघटनांमधे काम करुन जी बचत केली होती तिच्या दुप्पट होती.

लेखक पुढं म्हणतात महाराष्ट्रातही जर काही आभिनव पद्धतीने विचार करणारे व धडाडी असणारे तरुण पुढं आले तर कोल्हापुरी चप्पल ही जागतिक बाजारपेठेत मानाचं स्थान मिळवू शकेल.

महाराष्ट्र शासनाने ,राज्य खादी ग्रामोद्योग मंडळाचा सभापती म्हणून विशाल चोरडिया या युवकाची नियुक्ती केली.त्याला औद्योगिक पार्श्र्वभूमी होती व ग्रामीण भागात नाविन्यपूर्ण उद्योग सुरू करण्याची त्याची प्रबळ इच्छा होती.

त्याने नुकत्याच काही जागतिक नेत्यांना भेटून महाराष्ट्रातल्या ग्रामोद्योगावर माहिती देण्याची इच्छा व्यक्त केली.त्याला  फक्त पाचच मिनिटं वेळ देण्यात आला या पाचच मिनिटं मिळालेल्या वेळात विशालने पाहुण्यांना मसाले म्हणजे भारतीय मसाल्यांचे अनेक नमुने दिले व हे सर्व लोक भारतीय मसाल्यांचे व इतर पदार्थांचे  इतके फॅन बनले आहेत.असे लेखकाला महिन्याभरात जगभरातून निरोप यायला लागले.व राजकीय वर्तुळात भारतीय मसाल्याबाबत अनेक ठिकाणी चर्चा झाली.विशालनं हे फक्त पाच मिनिटांत सिद्ध केलं होतं.आता त्यानं कोल्हापूरी चप्पल ,मध,खादी, बांबू यांना देशभर व आंतरराष्ट्रीय बाजारपेठेत स्थान मिळवून देण्यासाठी  जोरदार प्रयत्न सुरू केले आहेत.

लेखकाचे म्हणणे आहे की, रोजगार निर्माण करणारे प्रत्येक जिल्ह्यात  किमान १० ते १५ म्हणजे संपूर्ण महाराष्ट्राच्या ग्रामीण भागात नाविन्यपूर्ण रोजगार निर्माण करणाऱ्या ५००चेंजमेकर्स युवकाची गरज आहे.असे युवक तयार होणं गरजेचं आहे.नुसतं आम्ही बेकार आहोत, बेरोजगार आहोत अशी टिमकी बडवत बसण्यापेक्षा अशा कृतीशील गोष्टीत रस घेऊन ते केले पाहिजेत.’केल्याने होतं आहे रे !आधि केलेचि पाहिजे !! इतर घटक म्हणजे मित्रमंडळे, गणेशोत्सव मंडळांच्या सभासद यांचा सहभाग होणे गरजेचे आहे.उत्सवाचेवेळी फक्त ढोल बडवून आयुष्यभर पोट भरत नाही   त्याबरोबरच हेही करणे आवश्यक आहे हे युवकांनी लक्षात घ्यावे.

विशालने आता खादी व ग्रामोद्योग महामंडळाच्या प्रयत्नातून महाराष्ट्रातील कृषी व ग्रामीण विभागात चेंजमेकर तयार करण्याचा उपक्रम आखला पाहिजे. युवकांना डोंगरात भरपूर आवळ्याची झाडे असतात विशेषतः सह्याद्रीच्या कुशीत तेथून आवळ्याची उपलब्धता होऊ शकेल त्यापासून अनेक औषधी व खाद्यपदार्थ बनविता येतील.आवळ्याची शेती करुन भरपुर उत्पादन मिळू शकते.नाचणीपासूनही अनेक सुरेख खाद्यपदार्थ बनतात.ह्यासारखे उत्पादन करणाऱ्या  युवकांना  शासनाने मदत केली पाहिजे.शिवाय सकाळ समूह चे ‘ यिन ‘ हे नेटवर्क ,व सामाजिक संस्था , औद्योगिक संघटना व समाजाच्या इतर घटकांनीही योगदान दिले तर हे परिवर्तन होणं शक्य आहे.

त्यासाठी आपल्याला अनेक मार्गांनी प्रयत्न करण्याची गरज आहे.विविध विषयात मूलभूत संशोधन, ग्रामोद्योग व शेतीमालाची निर्यात या तीन क्षेत्रात प्रचंड वाव आहे.

जर आईसलंडसारख्या तीन लाख लोकवस्तीच्या छोट्याशा देशातील ग्रामीण उद्योजक जगभर कोळंबीच्या कवचाचं मलम लोकप्रिय करु शकतात तर आपल्या युवकांना , कोल्हापूरी चप्पल,सौरचरख्यानं केलेली उच्च दर्जाची खादी, आंबा, केळी,आवळा  नाचणी या पदार्थांच्या  प्रक्रियेतून. केलेले पदार्थ बाजारपेठेत नेणं आणि त्यांचं तिथं बस्तान बसवणं सहज शक्य होईल,पण युवकांनी हे मनावर घेतलं तर ग्रामीण महाराष्ट्रात आपण नक्कीच समृद्धी आणू शकतो.

सर्वांना हा सप्तरंग मधील लेख वाचणे शक्य झाले नसेल तर त्यांना ही माहिती नक्कीच उपयुक्त ठरेल.ज्यांना शक्य आहे त्यांनी मूळ लेख जरुर वाचावा.

ही माहिती उपयुक्त आहेच ती आपापल्या ग्रुपवर टाकून शक्य तितकी प्रसिद्धी द्यावी व ग्रामीण युवकांना रोजगार मिळून ते देशाचे ‘धनवान ‘ नागरिक व्हावेत ही उर्मी मनाशी बाळगून या उर्मिलेने या लेखाद्वारे ही  शुभेच्छा धरुन अल्पसा प्रयत्न केला आहे.

श्री समर्थ म्हणतात नां ‘ यत्न तो देव ‘ !

युवकांनो हे वाचा आणि नक्की प्रयत्न करा यश तुमचेच आहे.करणाऱ्यांना खूप सुंदर शुभेच्छा!!

 

©®उर्मिला इंगळे, सातारा 

Please share your Post !

Shares