मराठी साहित्य – समाजपारावरून साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ पुष्प पंधरावे # 15 ☆ नैसर्गिक आपत्ती☆ – कविराज विजय यशवंत सातपुते

कविराज विजय यशवंत सातपुते

 

(समाज , संस्कृति, साहित्य में  ही नहीं अपितु सोशल मीडिया में गहरी पैठ रखने वाले  कविराज विजय यशवंत सातपुते जी  की  सोशल मीडिया  की  टेगलाइन “माणूस वाचतो मी……!!!!” ही काफी है उनके बारे में जानने के लिए। जो साहित्यकार मनुष्य को पढ़ सकता है वह कुछ भी और किसी को भी पढ़ सकने की क्षमता रखता है।आप कई साहित्यिक,  सांस्कृतिक  एवं सामाजिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं ।  इस साप्ताहिक स्तम्भ के माध्यम से वे किसी न किसी सामाजिक  अव्यवस्था के बारे में चर्चा करते हैं एवं हमें उसके निदान के लिए भी प्रेरित करते हैं।  आज श्री विजय जी ने एक गंभीर विषय “नैसर्गिक आपत्ती ” चुना है।  श्री विजय जी ने प्राकृतिक आपदाओं  जैसे गंभीर मुद्दे पर इस आलेख में चर्चा की है।  ऐसे ही  गंभीर विषयों पर आप प्रत्येक शुक्रवार को उनके मानवीय संवेदना के सकारात्मक साहित्य को पढ़ सकेंगे।  )

 

☆ साप्ताहिक स्तंभ –समाज पारावरून – पुष्प पंधरावे # 15 ☆

 

☆ नैसर्गिक आपत्ती ☆

 

समाजपारावरून आज निसर्ग  आपत्ती विषयी जरा बोलावेसे वाटत आहे.  निसर्गाचे संरक्षण,  आणि संवर्धन जर  आपल्या हातून घडले तर हाच निसर्ग  आपल्याला वनौषधी, रानमेवा  आणि  आरोग्य संपदेने परीपूर्ण करू शकतो.

अतिवृष्टी, ढगफुटी, हिम वर्षाव, कोरडा दुष्काळ, उन्हाचा तडाखा, वाढते  उष्णता मान, वणवा, वन्यजीव,  पशुपक्षी यांच्या प्रजाती संख्या कमी होणे,  औषधी वनस्पतींचा -हास, चक्रीवादळ,भुकंप, (धरणीकंप),  कडाक्याची  थंडी,  हहवामानात झालेले प्रतिकूल बदल ,अशा प्रकारच्या नैसर्गिक आपत्ती आपण  अनुभवीत आहोत. …..

या  आपत्तीच्या काळात सर्व संकटग्रस्तांना  वेळेवर  मदत मिळतेच असे नाही.   वित्त हानी, जीवहानी, आणि मनस्ताप भोगत या नैसर्गिक आपत्तींना सामोरे जावे लागते. नैसर्गिक आपत्ती व्यवस्थापन यंत्रणा निश्चित करून  या समस्येवर मात करता येईल.  पण नैसर्गिक आपत्ती ही बहुधा  अचानक पणे उद्भवल्याने ही समस्या गंभीर स्वरूप धारण करते.  निसर्ग हानी देखील  अशा वेळी मोठय़ा प्रमाणावर झालेली दिसते.

पर्यावरण प्रेमी संघटना,  त्यांनी केलेले सर्वेक्षण याची नोंद कुठेतरी व्हायला हवी.   कारण  नैसर्गिक आपत्ती कोसळल्यावर  मनुष्य भांबावून गेलेला असतो.  त्याला  अन्न,  वस्त्र,  निवारा, या मुलभूत गरजा कशा लवकरात लवकर पुरवता येतील  याचा पाठपुरावा प्रसार माध्यमांनी करायला हवा.

जगाच्या  कानाकोप-यात घडणा-या घटनांना विविध नैसर्गिक घडामोडींना मिडीयाच जनतेपर्यंत पोहोचवतो.  मिडियाने  प्रसारीत केलेले लघुपट,  निवूदन  पाहून  अनेक वेळा विविध उपाय योजना सरकारने राबलिल्या आहेत.

आजकाल मिडिया  हेच प्रभावी माध्यम आहे की ज्याचे मुळे आपण सावधान आणि जागरूक राहू शकतो. आदिवासी भागातील तसेच मागास वर्गीय लोकांना पुरेशा सेवा सुविधा उपलब्ध करून दिल्या. नैसर्गिक धन संपत्ती चे महत्त्व समजावून त्याचे संवर्धन करण्यासाठी प्रोत्साहन दिले तर बर्‍याच नैसर्गिक आपत्ती टाळता येतील.

वरातीमागून घोडे मिरविण्यापेक्षा मिडीया चा वापर दुर्गम भागातील नागरिकांना  उपलब्ध करून दिल्यास त्यांना काही संरक्षण दिले गेल्यास वनसंपदेचे जतन  आणि संवर्धन होऊ शकते.  नैसर्गिक आपत्ती हे संकट आले तरी त्याला तोंड देण्याची क्षमता आधुनिक तंत्रज्ञानात नक्कीचआहे. फक्त त्याचा वापर समयोचित व्हायला हवा.

प्रसारमाध्यमे ही केवळ पैसा आणि प्रसिद्धी साठी  अस्तित्वात नसून समाज कल्याण  आणि समाजप्रबोधनाचे महत्त्व पूर्ण कार्य सातत्याने करीत आहेत.  स्वतःचे संसार बाजूला ठेवून हे छायाचित्रकार,  तंत्रज्ञ पूर्ण ताकदीनिशी  अपु-या सेवा सुविधा  असताना मोठय़ा साहसाने सचित्र माहिती गोळा करून त्याचे अभ्यास पूर्ण संकलन करीत  असतात. त्याची शासकीय दरबारी कुठेतरी दखल घेतली जावी  असे मला वाटते.  प्रसार माध्यमांनी जीवावर उदार होऊन दिलेल्या माहितीवरून शासनाने झोपेतून जागे व्हायचे  आणि संकटग्रस्तांना मदत केल्याचा देखावा निर्माण करायचा हे कुठेतरी थांबायला हवे.  सरकारने  उपाययोजना करताना  अशा प्रसार माध्यमांना  आवश्यक त्या सेवा सुविधा उपलब्ध करून दिल्यास  ही निसर्गाची हानी काही प्रमाणात कमी करता येईल.  सध्याचे युग प्रगतीचे,  विकासाचे आणि माहिती व तंत्रज्ञानाचे आहे हे विसरून चालणार नाही.  नैसर्गिक आपत्ती व्यवस्थापनात याचा विचार शासकीय पातळीवर सर्वतोपरी व्हायला हवा असे मला वाटते.

 

✒  © विजय यशवंत सातपुते

यशश्री, 100 ब दीपलक्ष्मी सोसायटी,  सहकार नगर नंबर दोन, पुणे 411 009.

मोबाईल  9371319798.

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # 2 ☆ अवसर बार बार नहीं आए ☆ – श्री संतोष नेमा “संतोष”

श्री संतोष नेमा “संतोष”

 

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. 1982 से आप डाक विभाग में कार्यरत हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं.    “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष”  की अगली कड़ी में प्रस्तुत है उनकी रचना  “अवसर बार बार नहीं आए” . अब आप श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार पढ़ सकेंगे . ) 

 

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # 2  ☆

☆  अवसर बार बार नहीं आए ☆

 

अवसर बार बार नहीं आए ।

अहो भाग्य मानव तन पाए ।।

 

फूला फूला फिरे जगत में  ।

रात दिन दौलत की जुगत में ।।

समझ सत्य हम कभी न पाये ।

अवसर बार बार नहीं आए ।।

 

धन दौलत का ओढ़ लबादा ।

ओहदों का मद भी ज्यादा ।।

कभी किसी के काम न आये ।

अवसर बार बार नहीं आए ।।

 

दुख दर्द में न बने सहभागी ।

स्वार्थ के हो गए हम रागी  ।।

मानव मूल्यों को विसराए ।

अवसर बार बार नहीं आए ।।

 

अपना कोई रूठ न पाए ।

रूठा कोई छूट न जाये ।।

नेकी अपने साथ ही जाए ।

अवसर बार बार नहीं आए ।।

 

आओ सबसे प्रीति लगायें ।

दिल में हम “संतोष”बसायें ।।

जीवन में गर यह कर पाये ।

अवसर बार बार नहीं आए ।।

 

न जाने कल क्या हो जाये ।

चलो कुछ अच्छा हम कर जाएं ।।

अवसर बार बार नहीं आए ।

अहो भाग्य मानव तन पाए ।।

@ संतोष नेमा “संतोष”

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.)

मोबा 9300101799

Please share your Post !

Shares

मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ सुजित साहित्य # 16 – अक्षरांशी माझ नातं…. ! ☆ – श्री सुजित कदम

श्री सुजित कदम

 

(श्री सुजित कदम जी  की कवितायेँ /आलेख/कथाएँ/लघुकथाएं  अत्यंत मार्मिक एवं भावुक होती हैं। इन सबके कारण हम उन्हें युवा संवेदनशील साहित्यकारों में स्थान देते हैं। उनकी रचनाएँ हमें हमारे सामाजिक परिवेश पर विचार करने हेतु बाध्य करती हैं।  मैं श्री सुजितजी की अतिसंवेदनशील एवं हृदयस्पर्शी रचनाओं का कायल हो गया हूँ। पता नहीं क्यों, उनकी प्रत्येक कवितायें कालजयी होती जा रही हैं, शायद यह श्री सुजितजी की कलम का जादू ही तो है!  निश्चित ही श्री सुजित  जी इस हृदयस्पर्शी रचना के लिए भी बधाई के पात्र हैं। हमें भविष्य में उनकी ऐसी ही हृदयस्पर्शी कविताओं की अपेक्षा है।  श्री सुजित जी द्वारा  वर्णित कविता  संभवतः प्रत्येक साहित्यकार की कविता है. किसी भी साहित्यकार के लिए शब्दों का सम्बन्ध जन्म जन्मांतर का होता है. फिर अक्षर तो शब्दों की ही इकाई हुई न. अक्षरों से हम सभी का नाता है किन्तु ऐसा सामंजस्य कोई श्री सुजित जी जैसा संवेदनशील कवि ही कर सकता है. प्रस्तुत है श्री सुजित जी की अपनी ही शैली में  हृदयस्पर्शी  कविता   “अक्षरांशी माझ नातं…. !”। )

☆ साप्ताहिक स्तंभ – सुजित साहित्य #16☆ 

 

☆ अक्षरांशी माझ नातं…. ! ☆ 

 

ब-याच दिवसांनंतर

पुस्तक हातात घेतलं की

मेंदूत धूळ खात पडलेली

अक्षर खडबडून जागी होतात

आणि शोधू लागतात

पुस्तकात दडलेल त्यांचं अस्तित्व

जोपर्यंत.. . .

हातातलं पुस्तक

नजरेआड होत नाही तोपर्यंत.

आणि  . . त्यांनी पुस्तकात

शोधलेल्या त्यांच्या अस्तित्वाने

मी मात्र,

अस्वस्थ होत राहतो,

पुढचे कित्येक दिवस.. . !

शोधत राहतो

अक्षरांशी

असणार माझ नातं. . . . !

सुजित

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक के व्यंग्य – # 14 ☆ डाग शो बनाम कुत्ता नहीं श्वान ☆ – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

 

(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक के व्यंग्य”  में हम श्री विवेक जी के चुनिन्दा व्यंग्य आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। अब आप प्रत्येक गुरुवार को श्री विवेक जी के चुनिन्दा व्यंग्यों को “विवेक के व्यंग्य “ शीर्षक के अंतर्गत पढ़ सकेंगे।  आज प्रस्तुत है श्री विवेक जी का व्यंग्य “डाग शो बनाम कुत्ता नहीं श्वान”)

 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक के व्यंग्य – # 14 ☆ 

 

 ☆ डाग शो बनाम कुत्ता नहीं श्वान☆

 

मेरे एक मित्र को पिछले दिनो ब्लडप्रेशर बढ़ने की शिकायत हुई, तो अपनी ठेठ भारतीय परम्परा के अनुरुप हम सभी कार्यलयीन मित्र उन्हें देखने उनके घर गये, स्वाभाविक था कि अपनी अंतरंगता बताने के लिये विशेषज्ञ एलोपेथिक डाक्टरो के इलाज पर भी प्रश्न चिन्ह लगाते हुये उन्हें और किसी डाक्टर से भी क्रास इक्जामिन करवाने की सलाह हमने दी, जैसा कि ऐसे मौको पर किया जाता है किसी मित्र ने जड़ी बूटियो से शर्तिया स्थाई इलाज की तो किसी ने होमियोपैथी अपनाने की चर्चा की। मुफ्त की सलाह के इस क्रम में एक जो विशेष सलाह थोड़ा हटकर थी वह एक अन्य मित्र के द्वारा, कुत्ता पालने की सलाह थी। बड़ा दम था इस तथ्य में कि रिसर्च के मुताबिक जिन घरों में कुत्ते पले होते हैं वहां तनाव जन्य बीमारियां कम होती हें, क्योकि आफिस आते जाते डागी को दुलारते हुये हम दिनभर की मानसिक थकान भूल जाते हैं, इस तरह ब्लड प्रैशर जैसी बीमारियों से, कुत्ता पालकर बचा जा सकता है। ये और बात है कि पड़ोसियो के घरो के सामने खड़ी कार के पहियो पर, बिजली के खम्भो के पास जब आपका कुत्ता पाटी या गीला करता है तो उसे देखकर पड़ोसियो का ब्लड प्रैशर बढ़ता है।

वैसे कुत्ते और हमारा साथ नया नहीं है, इतिहासज्ञ जानते हैं कि विभिन्न शैल चित्रों में भी आदमी और कुत्ते के चित्र एक समूह में मिलते हैं। धर्मराज युधिष्ठिर की स्वर्ग यात्रा में एक कुत्ता भी उनका सहयात्री था यह कथानक भी यही रेखांकित करता है कि कुत्ते और आदमी का साथ बहुत पुराना है। कुत्ते अपनी घ्राण, व श्रवण शक्ति के चलते कम से कम इन मुद्दो पर इंसानो से बेहतर प्रमाणित हो चुके हैं। अपराधो के नियंत्रण में पुलिस के कुत्तों ने कई कीर्तीमान बनायें है। सरकस में अपने करतब दिखाकर कुत्ते बच्चों का मन मोह लेते है और अपने मास्टर के लिये आजीविका अर्जित करते हैं। संस्कृत के एक श्लोक में विद्यार्थियो को श्वान निद्रा जैसी नींद लेने की सलाह दी गई है। भाषा के संदर्भ में यह खोज का विषय है कि कुत्ते शब्द का गाली के रूप में प्रयोग आखिर कब और कैसे प्रारंभ हुआ क्योकि वफादारी के मामले में कुत्ता होना इंसान होने से बेहतर है। काका हाथरसी की अगले जन्म में विदेशी ब्रीड का पिल्ला बनने की हसरत भी महत्वपूर्ण थी क्योकि शहर के पाश इलाके में किसी बढ़िया बंगले में, किसी सुंदर युवती के साथ उसकी कार में घूमना उसके हाथों बढ़िया खाना नसीब होना इन पालतू डाग्स को ही नसीब हो सकता है। फालतू देशी कुत्तो को नही, जो स्ट्रीट डाग्स कहे जाते हैं। यूं तो स्लम डाग मिलेनियर, फिल्म को आस्कर मिल जाने के बाद से इन देशी कुत्तो का स्टेटस भी बढ़ा ही है।

पिछले दिनों मुझे एक डाग शो में जाने का अवसर मिला। अलशेसियन, पामेरियन, पग, डेल्मेशियन, बुलडाग, लैब्राडोर, जर्मन शेफार्ड, मिनिएचर वगैरह वगैरह ढ़ेरो ब्रीड के तरह तरह की प्रजातियो के कुत्तो से और उनके सुसंपन्न मालिकों से साक्षात्कार का सुअवसर मिला। ऐसे ऐसे कुत्ते मिले कि उन्हें कुत्ता कहने भी शर्म आये। और यदि कही कोई उन्हें कुत्ता कह दें तो शायद उनके मालिक बुरा मान जाये, बेहरत यही है कि हम उन्हें श्वान कहें। थोड़ा इज्जतदार शब्द लगता है। वैसे भी घर में पले हुये कुत्ते घर के बच्चो की ही तरह सबके चहेते बन जाते है, वे परिवार के सदस्य की ही तरह रहते, उठते बैठते हैं। उनके खाने पीने इलाज में गरीबी रेखा के आस पास रहने वाले औसत आदमी से ज्यादा ही खर्च होता है।

डाग शो में जाकर मुझे स्वदेशी मूवमेंट की भी बड़ी चिंता हुई। जिस तरह निखालिस देशी ज्वार और देशी भुट्टे, या गन्ने से, भारत में ही बनते हुये, यहीं बिकते हुये सरकार को खूब सा टैक्स देते हुये भी और पूरी की पूरी बोतल यही कंज्यूम होते हुये भी आज तक विदेशी शराब, विदेशी ही है,जिस तरह भारत के आम मुसलमान आज तक भी भारतीय नही हैं,या माने नही जाते हैं ठीक वैसे ही डाग शो में आये हुये सारे के सारे कुत्ते बाई बर्थ निखालिस हिन्दुस्तानी नागरिकता के धारक थे, पर स्वयं उनके मालिक ही उन्हें देशी कहलाने को तैयार नही थे, विदेशी ब्रीड का होने में जो गौरव है वह अभिजात्य होने का अलग ही अहं भाव जो पैदा करता है। एक जानकार ने बताया कि रामपुर हाउण्ड नामक देसी प्रजाति का कुत्ता भी डाग शो में प्रदर्शन के लिये पंजीकृत है, तो मेरे स्वदेसी प्रेम को किंचित शांति मिली, वैसे खैर मनाने की बात है कि स्वदेशी,दुत्कारे जाने वाले, टुकड़ो पर सड़को के किनारे पलने वाले ठेठ देशी कुत्तो के हित चिंतन के लिये भी मेनका गांधी टाइप के नेता बन गये हैं, पीपुल्स फार एनीमल, जैसी संस्थायें भी सक्रिय हैं। नगर निगम की आवारा पशुओ को पकड़ने वाली गाड़ी इन कुत्तो की नसबंदी पर काम कर रही है अतः हालात नियंत्रण में है, मतलब चिंता जनक नहीं है, विदेशी श्वान पालिये, ब्लड प्रैशर से दूर रहिये। श्वानों के डाग शो में हिस्सा लीजिये, और पेज थ्री में छपे अपने कुत्ते की तस्वीर की मित्रो मे खूब चर्चा कीजीये। पर आग्रह है कि अब विदेशी ब्रीड के कुत्तो को देशी माने न माने पर कम से कम देश में जन्में हुये आदमी को भले ही वह मुसलमान ही हो देसी मान ही लीजीये।

 

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव 

ए-1, एमपीईबी कालोनी, शिलाकुंज, रामपुर, जबलपुर, मो. ७०००३७५७९८

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ श्री ओमप्रकाश जी की लघुकथाएं – #16 ☆ साथी ☆ – श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी की लघुकथाएं ”  के अंतर्गत उनकी मानवीय दृष्टिकोण से परिपूर्ण लघुकथाएं आप प्रत्येक गुरुवार को पढ़ सकते हैं।  आज प्रस्तुत है उनकी लघुकथा  “साथी  ”। )

 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी की लघुकथाएं – #16 ☆

 

☆ साथी  ☆

 

“चल भाई  ! महफ़िल जमाते है”  रमण ने कहा तो उस ने प्याला उठ लिया. आगे-आगे रमण और पीछे-पीछे वह चलने लगा.

कुछ ही देर में महफ़िल जम गई.  एक गिलास में वह कुछ बियर  डाल लेता. दूसरे प्याले में कुछ बियर  उंडेल  देता.

“अरे भाई  ! तू बेईमानी मत करना” कहते हुए रमण कागज में रखी सेव का थोड़ा सा भाग उस के सामने रख देता और थोडा सा अपने सामने रख लेता. फिर दोनों सेव  खाते हुए मस्ती से बियर  का मजा ले रहे थे.

तभी मोहन वहाँ आ पहुँचा ,” क्यों भाई, महफ़िल जम रही है ?”

“हाँ  यार, तू भी बैठ.”

“इस कुत्ते के साथ ?”

“हाँ  यार ! यही तो मेरा वफादार साथी है. जो हर समय मेरा साथ निभाता है.” कह कर रमण और उस का साथी दोनों बारी-बारी से बियर पीने लगे .

 

© ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

पोस्ट ऑफिस के पास, रतनगढ़-४५८२२६ (नीमच) मप्र

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com

मोबाइल – 9424079675

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ तन्मय साहित्य # 14 – बहे विचारों की सरिता…… ☆ – डॉ. सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

डॉ  सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

 

(अग्रज  एवं वरिष्ठ साहित्यकार  डॉ. सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी  जीवन से जुड़ी घटनाओं और स्मृतियों को इतनी सहजता से  लिख देते हैं कि ऐसा लगता ही नहीं है कि हम उनका साहित्य पढ़ रहे हैं। अपितु यह लगता है कि सब कुछ चलचित्र की भांति देख सुन रहे हैं।  आप प्रत्येक बुधवार को डॉ सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’जी की रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज के साप्ताहिक स्तम्भ  “तन्मय साहित्य ”  में  प्रस्तुत है  एक अतिसुन्दर भावप्रवण रचना  “बहे विचारों की सरिता……”। )

 

☆  साप्ताहिक स्तम्भ – तन्मय साहित्य – # 14 ☆

 

☆ कविता – बहे विचारों की सरिता…… ☆  

 

सुखद कल्पनाओं में

मन के स्वप्न सुनहरे से

बहे विचारों की सरिता

हम, तट पर ठहरे से।

 

दुनियावी बातों से

बार-बार ये मन भागे

जुड़ने के प्रयास में

रिश्तों के टूटे धागे,

हैं प्रवीण,

फिर भी जाने क्यूं

जुड़े ककहरे से

बहे विचारों की सरिता

हम तट……………….।

 

रागी, भ्रमर भाव से सोचें

स्वतः  समर्पण  का

उथल-पुथल अंतर की

शंकाओं के तर्पण का,

पर है डर,

बाहर बैठे

मायावी पहरे से

बहे विचारों की सरिता

हम तट पर………….।

 

जिसने आग लगाई उसे

पता नहीं पानी का

क्या होगा निष्कर्ष

अजूबी अकथ कहानी का,

भीतर में हलचल,

बाहर हैं

गूंगे- बहरे से

बहे विचारों की सरिता

हम तट पर………….।

 

चाह तृप्ति की, अंतर में

चिंताओं को लादे

भारी मन से किये जा रहे

वादों पर वादे,

सुख की सांसें तभी मिले

निकलें

जब गहरे से

बहे विचारों की सरिता

हम तट पर ठहरे से।।

 

© डॉ सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

जबलपुर, मध्यप्रदेश

मो. 9893266014

(अग्रज डॉ सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी की फेसबुक से साभार)

 

 

 

Please share your Post !

Shares

मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कवितेच्या प्रदेशात # 16 – लवंगलता– वृत्त ☆ – सुश्री प्रभा सोनवणे

सुश्री प्रभा सोनवणे

 

(आज प्रस्तुत है सुश्री प्रभा सोनवणे जी के साप्ताहिक स्तम्भ  “कवितेच्या प्रदेशात” में  उनकी जीवन के अनुभव और सत्य को उजागर करती हुई कविता लवंगलता– वृत्त.  सुश्री प्रभा जी की प्रत्येक कविता  हमें जीवन के अनुभवों और गूढ़ रहस्यों से रूबरू कराती हैं. उनके सांकेतिक प्रतीक अद्भुत एवं हृदयस्पर्शी हैं.   इस जन्म का लेखा जोखा रखना है और इस जीवन का  सांकेतिक उत्सव  ह्रदय में है.   वास्तव में हम अपने जीवन में  अक्सर  घानी के बैल की भाँति  गृहस्थी -परिवार के एक ही पथ पर चलते रहते हैं .  जीवन में कई क्षण आते हैं जब हमें और कोई पथ सूझता ही नहीं है.  कई क्षण ऐसे भी आते हैं  जब हम वह नहीं पाते हैं जिसकी अपेक्षा करते हैं, हम फूल बोते हैं और कांटे उग आते हैं. जन्म मृत्यु का प्रश्न सदैव अनुत्तरित है और ऐसे कई प्रश्न हैं जिनका कोई उत्तर हमारे पास नहीं है.  फिर कभी वह क्षण भी आता है जब एक चिंगारी  हमें नवजीवन प्रदान करती  है. जैसे -जैसे पढ़ने का अवसर मिल रहा है वैसे-वैसे मैं निःशब्द होता जा रहा हूँ।  यह भी संभव है कि प्रत्येक पाठक कवि के विचारों की विभिन्न व्याख्या करे.   हृदय के उद्गार इतना सहज लिखने के लिए निश्चित ही सुश्री प्रभा जी के साहित्य की गूढ़ता को समझना आवश्यक है। यह  गूढ़ता एक सहज पहेली सी प्रतीत होती है। आप  प्रत्येक बुधवार को सुश्री प्रभा जी  के उत्कृष्ट साहित्य का साप्ताहिक स्तम्भ  – “कवितेच्या प्रदेशात” पढ़ सकते  हैं।)

 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – कवितेच्या प्रदेशात # 16 ☆

 

☆ लवंगलता– वृत्त  ☆

 

आयुष्याचा लेखाजोखा मांडायाचा आहे

या जन्माचा सौख्य सोहळा मनात भरुनी राहे

ओंजळ माझी रिक्त राहिली असे आजही वाटे

फुले वाहिली ज्या वाटेवर, तिथे उगवले काटे

 

त्या काट्यांनी बहरुन आल्या इथल्या मळक्या वाटा

रानामधल्या मूक फुलांचा उगाच का बोभाटा

काही केल्या या प्रश्नाचे उत्तर गवसत नाही

पराधीन हे जगणे मरणे, नसे कशाची ग्वाही

 

प्रत्येकाची नवी लढाई, नवा लढाऊ बाणा

माझे जगणे  मात्र  असे की, बैल चालवी घाणा

एकेजागी फिरत राहिले, मार्ग मिळाला नाही

सौख्य जरासे असे लाभले, दिशा मिळाल्या दाही

 

कधी  अचानक ठिणगी मधुनी पेटून उठे ज्वाला

पुन्हा नव्याने एक झळाळी येई आयुष्याला

 

© प्रभा सोनवणे,  

“सोनवणे हाऊस”, ३४८ सोमवार पेठ, पंधरा ऑगस्ट चौक, विश्वेश्वर बँकेसमोर, पुणे 411011

मोबाईल-९२७०७२९५०३,  email- sonawane.prabha@gmail.com

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ काव्य कुञ्ज – # 5 – खुशियाँ मनाए शाम ☆ – श्री मच्छिंद्र बापू भिसे

श्री मच्छिंद्र बापू भिसे

(श्री मच्छिंद्र बापू भिसे जी की अभिरुचिअध्ययन-अध्यापन के साथ-साथ साहित्य वाचन, लेखन एवं समकालीन साहित्यकारों से सुसंवाद करना- कराना है। यह निश्चित ही एक उत्कृष्ट  एवं सर्वप्रिय व्याख्याता तथा एक विशिष्ट साहित्यकार की छवि है। आप विभिन्न विधाओं जैसे कविता, हाइकु, गीत, क्षणिकाएँ, आलेख, एकांकी, कहानी, समीक्षा आदि के एक सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी रचनाएँ प्रसिद्ध पत्र पत्रिकाओं एवं ई-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहती हैं।  आप महाराष्ट्र राज्य हिंदी शिक्षक महामंडल द्वारा प्रकाशित ‘हिंदी अध्यापक मित्र’ त्रैमासिक पत्रिका के सहसंपादक हैं। अब आप प्रत्येक बुधवार उनका साप्ताहिक स्तम्भ – काव्य कुञ्ज पढ़ सकेंगे । आज प्रस्तुत है उनकी नवसृजित कविता “खुशियाँ मनाए शाम”।

 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – काव्य कुञ्ज – # 5☆

 

☆ खुशियाँ मनाए शाम ☆

 

रात धीरे रंग चढ़े सजने लगी शाम,

थके-हारे जीव करने लगे आराम,

सपने देखें नींद में रोटी लगे महान,

स्वार्थी दिन के रंग अनेक खुशियाँ मनाए शाम।

 

सच का साथ सिर्फ मन की ही बात,

बेईमानी चाल चले घनी अँधेरी रात,

नींद गहरी हो रही मन मचता कुहराम,

स्वार्थी दिन के रंग अनेक खुशियाँ मनाए शाम।

 

नींद तो है पर नींद नहीं,

सपने है बहुत अपना कोई साथ नहीं,

किसे कोसे किसे अपनाएँ दिखता कहीं न राम,

स्वार्थी दिन के रंग अनेक खुशियाँ मनाए शाम।

 

नींद से डर लगे साँस चैन की कहाँ मिले,

अब डर का सामना करना होगा,

चाहे अँधियारा खौफ साथ चले,

नींद के होश उड़ जाए ऐसा करूँ,

उम्मीद और विश्वास से करूँगा प्रयाण,

फिर अँधेरा भी रोशनी फैलाएगा,

न होगा डर न डर का कोई पैगाम,

स्वार्थी दिन के रंग अनेक खुशियाँ मनाए शाम।

 

© मच्छिंद्र बापू भिसे

भिराडाचीवाडी, डाक भुईंज, तहसील वाई, जिला सातारा – ४१५ ५१५ (महाराष्ट्र)

मोबाईल नं.:9730491952 / 9545840063

ई-मेल: machhindra.3585@gmail.com , hindiadhyapakmitra@gmail.com

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी का काव्य संसार # 8 ☆ इबादत ☆ – सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा

सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा

 

(सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी  सुप्रसिद्ध हिन्दी एवं अङ्ग्रेज़ी की  साहित्यकार हैं। आप अंतरराष्ट्रीय / राष्ट्रीय /प्रादेशिक स्तर  के कई पुरस्कारों /अलंकरणों से पुरस्कृत /अलंकृत हैं । हम आपकी रचनाओं को अपने पाठकों से साझा करते हुए अत्यंत गौरवान्वित अनुभव कर रहे हैं। सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी का काव्य संसार शीर्षक से प्रत्येक मंगलवार को हम उनकी एक कविता आपसे साझा करने का प्रयास करेंगे। आप वर्तमान में  एक्जिक्यूटिव डायरेक्टर (सिस्टम्स) महामेट्रो, पुणे हैं। आपकी प्रिय विधा कवितायें हैं। आज प्रस्तुत है आपकी  कविता “इबादत”। )

 

साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी का काव्य संसार # 8 

☆ इबादत  ☆

 

एक मुट्ठी धूल सी

मेरी हैसियत;

और एक मामूली तिनके सी

मेरी हस्ती!

 

ए ख़ुदा!

इबादत है तुझसे

कि बिछ जाने दे मुझे

उस धूल ही की तरह

तेरी राहों पर,

बिना किसी मंज़िल की

तमन्ना किये!

या फिर उड़ जाने दे मुझे

उस तिनके की तरह

हवाओं के साथ,

तब तक,

जब तक ख़त्म न हो जाएँ

मेरी सारी आरज़ू!

 

राख़ हो जाने दे

मेरा गुरूर,

मिट जाने दे

मेरा अहम्,

और दूर हो जाने दे

मेरा गुमान!

 

ए ख़ुदा!

मैं आना चाहती हूँ पास तेरे

एकदम खाली-खाली सी,

किसी कोरे कागज़ की तरह!

 

© नीलम सक्सेना चंद्रा

आपकी सभी रचनाएँ सर्वाधिकार सुरक्षित हैं एवं बिनाअनुमति  के किसी भी माध्यम में प्रकाशन वर्जित है।

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा – # 5 ☆ काव्य – बुंदेली गीता ☆ – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

 विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

 

(हम प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के आभारी हैं जिन्होने  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा”  शीर्षक से यह स्तम्भ लिखने का आग्रह स्वीकारा। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।  अब आप प्रत्येक मंगलवार को श्री विवेक जी के द्वारा लिखी गई पुस्तक समीक्षाएं पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है श्री विवेक जी  की पुस्तक चर्चा  “काव्य – बुंदेली गीता ”।)

 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा – # 4☆ 

 

 ☆ काव्य – बुंदेली गीता  ☆

 

पुस्तक चर्चा

काव्य – बुंदेली गीता 

लेखक –  विनोद कुमार खरे

मूल्य –  251 रु

 

☆ काव्य  – बुंदेली गीता– चर्चाकार…विवेक रंजन श्रीवास्तव ☆

 

☆ बुंदेली गीता ☆

भगवत गीता के संस्कृत श्लोक, हिंदी भाषा अनुवाद सहित बुंदेली काव्य 

 

भगवत गीता विश्व ग्रंथ है ।अनेक भाषाओं में अनेक लोगों ने इसका अनुवाद किया है।  प्रोफेसर चित्र भूषण श्रीवास्तव ने हिंदी काव्य अनुवाद, अंग्रेजी अर्थ सहित किया है जो संस्कृत न समझने वाले युवाओं में बहुत लोकप्रिय हो रहा है । इसी क्रम में क्षेत्रीय भाषाओं को भी समय के साथ महत्व मिलता दिखता है।

बुंदेली भाषा में विनोद कुमार खरे जी का यह अनुवाद प्राप्त हुआ । सरल सुंदर प्रस्तुति के साथ हर श्लोक का बुंदेली अनुवाद और हिंदी भावार्थ प्रस्तुत करने हेतु खरे साहब को बहुत-बहुत बधाई। निश्चित ही बुंदेली में गीता का इस तरह प्रस्तुतीकरण बुंदेलखंड के दूरदराज भीतरी क्षेत्रों में भगवत गीता के शाश्वत संदेश को पहुंचाने में महत्वपूर्ण कार्य है । बुंदेलखंड की लोक भाषा में भगवत गीता का यह प्रस्तुतीकरण प्रशंसनीय है एवं यह बुंदेली साहित्य को और समृद्धि करेगा । सोलहवें अध्याय के पहले ही श्लोक में 26 वे गन धर्म बिंदुवार बताये गए हैं जो जीवन सूत्र हैं । जैसे भगवान में समर्पित आस्था, दान, दया, सत्य, अक्रोध, क्षमा, त्याग आदि शाश्वत भाव ही भगवान की कृपा पाने के मूल तत्व हैं ।

 

चर्चाकार.. विवेक रंजन श्रीवास्तव, जबलपुर .

ए १, शिला कुंज, नयागांव,जबलपुर ४८२००८

मो ७०००३७५७९८

Please share your Post !

Shares