(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जीद्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “मकर संक्रांति – साधना पर्व…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)
(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)
जीवन के कुछ अनमोल क्षण
तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित।
मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी से भेंट करते हुए।
बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए।
आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय व्यंग्य – अंतिम विदाई का इवेंट मैनेजर।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ७६ – व्यंग्य – अंतिम विदाई का इवेंट मैनेजर ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’☆
(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)
उस वृद्ध पिता की आँखों में अब आंसू भी नहीं बचे थे, बस एक पथराई हुई शून्यता थी जो अपने इकलौते बेटे की ‘सफलता’ को देख रही थी। बेटा विदेश से लौटा था, पर संवेदनाएँ शायद कस्टम ड्यूटी पर ही छोड़ आया था। उसने पिता के मरणासन्न शरीर के पास बैठकर दुख जताने के बजाय अपने आईफोन पर ‘फ्यूनरल प्लानर’ से बात करना बेहतर समझा, क्योंकि उसे डर था कि कहीं पिता की अंतिम विदाई उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा के अनुरूप ‘ग्रैंड’ न हो जाए। व्यंग्य तो देखिए, जिस पिता ने अपनी पूरी उम्र फटे जूतों में काटकर बेटे को ब्रांडेड जूते पहनाए, आज वही बेटा पिता के मृत शरीर के लिए सबसे महंगे ‘इको-फ्रेंडली’ चंदन के ताबूत का मोलभाव कर रहा था। घर में मातम से ज्यादा शोर इस बात का था कि फेसबुक और इंस्टाग्राम पर शोक संदेश की ड्राफ्टिंग कैसी हो, ताकि फॉलोअर्स को बेटे के ‘अगाध प्रेम’ का पता चल सके। कारुणिक दृश्य वह नहीं था कि एक वृद्ध शरीर शांत पड़ा था, बल्कि वह था जहाँ एक जीवित आत्मा अपने पिता की अर्थी को एक ‘इवेंट’ में बदल रही थी।
अंतिम संस्कार के दिन श्मशान घाट किसी फिल्म के सेट जैसा प्रतीत हो रहा था, जहाँ सफेद लिबास में आए लोग दुख मनाने नहीं, बल्कि अपनी उपस्थिति दर्ज कराने आए थे। बेटे ने विशेष रूप से एक ‘कैटरिंग सर्विस’ का इंतजाम किया था, क्योंकि उसके अनुसार “आने वाले मेहमानों को खाली पेट नहीं भेजना चाहिए, यह हमारी इमेज का सवाल है।” लोग जलती हुई चिता के पास खड़े होकर शोक संतप्त होने का नाटक कर रहे थे, लेकिन उनकी चर्चाओं के केंद्र में शेयर बाजार की गिरावट और शहर के नए खुले रेस्तरां थे। व्यंग्य की पराकाष्ठा तब हुई जब एक सज्जन ने अर्थी के पास खड़े होकर सेल्फी ली और कैप्शन लिखा—’फीलिंग इमोशनल विद ब्रदर’। चिता की आग अभी पूरी तरह सुलगी भी नहीं थी कि रिश्तेदारों के बीच इस बात पर कानाफूसी शुरू हो गई कि बूढ़े की वसीयत में शहर वाली जमीन किसके नाम होगी। वह आग जो शरीर को पंचतत्व में विलीन कर रही थी, उससे कहीं ज्यादा भयंकर आग उन सगे-संबंधियों के भीतर लालच की धधक रही थी, जो सिर्फ रस्म अदायगी के लिए वहां मौजूद थे।
तेरहवीं का दिन आया, जिसे बेटे ने ‘सेलिब्रेशन ऑफ लाइफ’ का नाम देकर एक आलीशान बैंकेट हॉल में आयोजित किया। वहां दुख की जगह ऐश्वर्य का प्रदर्शन था; दीवार पर पिता की एक विशाल तेल-चित्र वाली तस्वीर टंगी थी, जिसे मोगरे के महंगे फूलों से सजाया गया था। बेटा स्टेज पर खड़े होकर हाथ में माइक लेकर पिता के संघर्षों पर एक ‘इमोशनल स्पीच’ दे रहा था, जो उसने एक प्रोफेशनल राइटर से पांच हजार रुपये देकर लिखवाई थी। उसकी आवाज में वह कंपन नहीं था जो दिल से निकलता है, बल्कि वह सधा हुआ अभिनय था जो तालियाँ बटोरने के लिए किया जाता है। मेहमान पनीर टिक्का और रसमलाई का लुत्फ उठाते हुए कह रहे थे, “वाह! क्या व्यवस्था है, बेटे ने पिता का मान रख लिया।” यह विडंबना ही थी कि जिस पिता ने जीवन भर सूखी रोटियाँ खाकर बेटे की फीस भरी, आज उसी की मृत्यु के भोज में छत्तीस प्रकार के व्यंजन परोसे जा रहे थे, जिन्हें वह पिता जीते जी कभी चख भी न सका था।
समारोह खत्म होने के बाद, जब सब मेहमान विदा हो गए, तो बेटा अपने आलीशान ड्राइंग रूम में सोफे पर पसर गया और हिसाब लगाने लगा कि कुल कितना खर्च हुआ और कितने का ‘शगुन’ वापस आया। उसने पिता की उस तस्वीर को, जिसे चंद घंटों पहले वह पूज रहा था, एक कोने में रख दिया क्योंकि वह उसके घर के मॉडर्न इंटीरियर से मेल नहीं खा रही थी। तभी उसे अपनी माँ की याद आई, जो पिछले तीन दिनों से एक कोने में बैठी बस शून्य को निहार रही थी। उसने माँ के पास जाकर सांत्वना देने के बजाय कहा, “मम्मी, अब आप अकेले यहाँ बोर होंगी, मैंने आपके लिए शहर के सबसे अच्छे ‘लक्जरी ओल्ड एज होम’ में बात कर ली है, वहां आपकी उम्र के बहुत लोग मिलेंगे।” यह सुनते ही माँ की आँखों से वह एक कतरा आंसू टपक पड़ा जो पिता की मृत्यु पर भी नहीं गिरा था। यह उस आधुनिक समाज का क्रूर व्यंग्य था जहाँ रिश्तों को ‘रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेंट’ के तराजू पर तौला जाता है और बुजुर्गों को अनुपयोगी फर्नीचर समझकर बाहर कर दिया जाता है।
अंततः, उस बड़े बंगले की चकाचौंध में सन्नाटा पसर गया, सिर्फ पिता की तस्वीर पर टंगी माला के फूल धीरे-धीरे सूखकर गिर रहे थे। बेटा अगले दिन की फ्लाइट पकड़कर वापस अपनी ‘सफल’ दुनिया में जाने की तैयारी कर रहा था, जहाँ भावनाएँ नहीं, सिर्फ टारगेट और अचीवमेंट मायने रखते थे। उसने पिता की अस्थियों को गंगा में प्रवाहित करने का काम भी एक एजेंसी को आउटसोर्स कर दिया था, क्योंकि उसके पास समय की कमी थी। यह कहानी उस मरे हुए पिता की नहीं है, बल्कि उस मर चुकी संवेदना की है जो आज के चमक-धमक वाले दौर में हम सबके भीतर दफन हो रही है। हम अंतिम विदाई को भव्य बना सकते हैं, हम दिखावे के आंसू बहा सकते हैं, लेकिन उस रिक्तता को कभी नहीं भर सकते जो पिता के जाने से नहीं, बल्कि हमारे भीतर की मनुष्यता के मरने से पैदा हुई है। व्यंग्य यह नहीं है कि पिता मर गया, व्यंग्य यह है कि बेटा अब भी खुद को एक ‘सफल इंसान’ मान रहा है।
(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ” में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है।आज प्रस्तुत है एक विचारणीय लघुकथा – “पासवर्ड” ।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ३९५ ☆
लघुकथा – पासवर्ड श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
स्क्रीन पर तीसरी बार फिर वह संदेश फिर उभर आया “गलत पासवर्ड.”
शरद बाबू ने चश्मा ठीक किया, उँगलियाँ धीमे धीमे कुंजियों पर चलीं, पर मन डगमगा गया।
पासवर्ड कभी लिख कर नहीं रखना चाहिए, जानते हुए भी इसी समस्या से बचने के लिए वे अपनी डायरी में पासवर्ड लिख लिया करते हैं। सावधानी के लिए बस किस अकाउंट का पासवर्ड है यह याददाश्त पर छोड़ रखा है, लेकिन फिर भी गड़बड़ हो ही जाती है।
नोटबुक के वे पन्ने पलटे हर जगह दर्ज अंक, प्रतीक और अंग्रेजी के छोटे बड़े अक्षर । मेल , बैंकों के अकाउंट , वाई फाई , नेटलिक्स , पेंशन ऐप वगैरह वगैरह के ढेर सारे विस्मृत, गड्डम गड्ड होते पासवर्ड अब प्रायः उन्हें चिढ़ाते लगे हैं।
वे कमरे की छत देखते सोच रहे थे, अपने पुराने दिन जब उनकी याददाश्त का ऑफिस में सब लोहा मानते थे, उन्हें दस अंकों के मोबाइल नंबर तक जबानी याद रहते थे, जिन्हें वे जेब में मोबाइल होते हुए भी ऑफिस के लैंडलाइन से डायल कर लिया करते थे, शायद पैसे बचाने ।
उन्हें खीजता देख ,बेटा हँसकर बोला, “पापा, इतनी दिक्कत है तो पासवर्ड मैनेजर एप रख लीजिए।”
शरद बाबू मुस्करा कर रह गए ।
*
रिटायरमेंट को पांच महीने भर तो हुए हैं।
पहले समय पीछे भागता था, अब वे उसके पीछे दौड़ रहे हैं।
पत्नी ने रसोई से पुकारा “ओटीपी आया क्या?”
स्क्रीन पर छह अंकों का नंबर चमका… फिर एस एम एस ही गुम हो गया, सेशन टाइम आउट हो चुका था।
शरद बाबू ने लंबी साँस ली, लैपटॉप बंद किया।
खिड़की से छनती धूप में धूल के कण चमक रहे थे, जैसे यादें कमरे में घुसी आ रही हों, रोशनी की एक बीम की तरह।
(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत। भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मान, बाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंत, उत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत।
(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जीका हिन्दी बाल -साहित्य एवं हिन्दी साहित्य की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 ₹51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य” के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ. अमित जैनजी द्वारा संपादित “चाणक्य वार्ता (पाक्षिक)” की समीक्षा।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २३६ ☆
☆ पुस्तक समीक्षा – चाणक्य वार्ता (पाक्षिक) – सम्पादक: डॉ. अमित जैन ☆ समीक्षक – श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆
पत्रिका: चाणक्य वार्ता (पाक्षिक)
अंक: 1-15 जनवरी, 2026 (बाल साहित्य विशेषांक)
सम्पादक: डॉ. अमित जैन
पृष्ठ: 152 | मूल्य: 150 रुपये
समीक्षक: ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश‘
☆ नई पीढ़ी के नैतिक और बौद्धिक विकास का सारथी — ‘बाल साहित्य विशेषांक’ – श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆
आज के तकनीकी युग में, जहाँ वीडियो गेम और सोशल मीडिया बच्चों के कोमल मन को अपनी गिरफ्त में ले रहे हैं, बाल साहित्य की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। ऐसे चुनौतीपूर्ण समय में ‘चाणक्य वार्ता’ पत्रिका का ‘बाल साहित्य विशेषांक’ (जनवरी 2026) एक मशाल की तरह सामने आया है। 152 पृष्ठों का यह विशाल कलेवर न केवल संख्यात्मक दृष्टि से समृद्ध है, बल्कि गुणवत्ता के मामले में भी यह बाल साहित्य के प्रति सम्पादकीय टीम की निष्ठा को दर्शाता है।
संपादकीय दृष्टि और विरासत का सम्मान
विशेषांक की शुरुआत संपादक डॉ. अमित जैन के सारगर्भित संपादकीय से होती है, जो वर्तमान समय में बाल साहित्य की प्रासंगिकता पर बल देता है। पत्रिका ने अपनी परंपरा को भूलने नहीं दिया है। ‘विरासत’ स्तंभ के अंतर्गत महान बाल साहित्यकारों— चंद्रपाल सिंह यादव ‘मयंक’, डॉ. अश्वघोष, डॉ. श्याम सिंह शशि और डॉ. राष्ट्रबंधु के योगदान को रेखांकित करना सराहनीय है। यह खंड नई पीढ़ी के लेखकों को अपने दिग्गजों से परिचित कराने का एक सेतु है।
कहानियों और नाटकों का इंद्रधनुष
पत्रिका में संकलित कहानियाँ मनोरंजन के साथ-साथ सूक्ष्म उपदेशात्मकता लिए हुए हैं। प्रकाश मनु की रचना जहाँ कौतूहल पैदा करती है, वहीं डॉ. रमेश यादव की ‘दादा-दादी पार्क’ पारिवारिक मूल्यों और रिश्तों की अहमियत समझाती है। नाटकों का समावेश इस अंक की एक बड़ी उपलब्धि है। अलका प्रमोद और बलराम अग्रवाल के नाटक न केवल पढ़ने के लिए हैं, बल्कि स्कूलों में मंचन के लिए भी बेहद उपयुक्त हैं। ये नाटक बच्चों में संवाद कौशल और आत्मविश्वास विकसित करने में सहायक सिद्ध हो सकते हैं।
काव्य और अन्य विधाओं का सौंदर्य
विशेषांक में कविताओं का चयन बहुत ही सलीके से किया गया है। लक्ष्मीनारायण भाला, सूर्य कुमार पांडे, संजीव जायसवाल ‘संजय’ और शकुंतला कालरा जैसे वरिष्ठ कवियों की रचनाओं में जहाँ गेयता और लय है, वहीं समकालीन विषयों पर लिखी गई कविताएँ बच्चों की जिज्ञासाओं को शांत करती हैं। पहेलियाँ, चित्रकथाएँ और बाल-गीत पत्रिका को मनोरंजक बनाते हैं, जिससे बच्चों की रुचि अंत तक बनी रहती है।
वैश्विक संदर्भ और विमर्श
इस विशेषांक की सबसे अनूठी विशेषता इसका ‘अंतरराष्ट्रीय’ स्वरूप है। ‘प्रवासी पन्ने’ में अमेरिका से डॉ. अनूप भार्गव, ऑस्ट्रेलिया से डॉ. शैलजा चतुर्वेदी और लंदन से दिव्या माथुर जैसे रचनाकारों की उपस्थिति यह बताती है कि सात समंदर पार भी भारतीय संस्कृति और हिंदी बाल साहित्य की खुशबू महक रही है। इसके अतिरिक्त, प्रो. उषा यादव और प्रो. सुरेन्द्र विक्रम के आलेख बाल साहित्य के गिरते स्तर और समीक्षा की कमी जैसे गंभीर विषयों पर सार्थक बहस छेड़ते हैं।
प्रस्तुति और साज-सज्जा
पत्रिका का आवरण चित्र अत्यंत आकर्षक है, जो देखते ही बच्चों को अपनी ओर खींचता है। कागज़ की गुणवत्ता और छपाई साफ-सुथरी है। चित्रों का प्रयोग कहानियों के भाव के अनुरूप किया गया है, जिससे पठन-पाठन की प्रक्रिया उबाऊ नहीं लगती।
निष्कर्ष
‘चाणक्य वार्ता’ का यह ‘बाल साहित्य विशेषांक’ केवल एक पत्रिका का अंक मात्र नहीं है, बल्कि यह हिंदी बाल साहित्य के वर्तमान परिदृश्य का एक प्रामाणिक दस्तावेज है। इसमें जहाँ एक ओर परंपरा का सम्मान है, वहीं दूसरी ओर भविष्य की आधुनिक सोच भी है। 150 रुपये के मूल्य में यह विशेषांक हर पुस्तकालय और हर उस घर की शोभा बनना चाहिए जहाँ बच्चे पल रहे हैं।
यह अंक निश्चित रूप से बाल साहित्य की दुनिया में एक नए मील के पत्थर के रूप में याद किया जाएगा।
(पूर्वसूत्र- नाईकसरांचं फक्त एक दोन दिवसांच्या सवडीने पुण्यात येणं, त्यांना त्यावेळी माझी नेमकी आठवण होणं, त्यांनी मला आवर्जून फोन करणं, त्यांच्या लेक, जावयाच्या घरी आमची भेट होणं, त्या दोघांनी नेमकी अलिकडेच त्यांची नवीन प्रकाशन संस्था सुरु केलेली असणं, सरांचा माझ्यावर अतिशय लोभ असल्यामुळे त्यांना माझा नवीन कथासंग्रह या त्यांच्या घरच्याच प्रकाशन संस्थेतर्फे प्रकाशित व्हावा असं वाटणं, यासारख्या फार फार तर महिन्याभरातच घडून गेलेल्या अचंबित करणाऱ्या घटनांच्या रूपातल्या ‘त्या’च्या कृपालोभाच्या असंख्य धाग्यादोऱ्यांनी घातली गेलेली घट्ट वीण अखेर माझ्या उर्वरित आयुष्याला एक अनोखी कलाटणी देऊन जाणार आहे हे मात्र माझ्या गावीही नव्हतं! …)
पण त्याची प्रचिती देणाऱ्या अशा कांही घटना नंतर घडत गेल्या कीं मनात हे सगळं खरंच सत्य कीं स्वप्न असा संभ्रम निर्माण व्हावा!
माझ्या बँकेचे रोजचे रुटीन आणि न संपणाऱ्या कामांच्या व्यापात एक प्रूफ रिडिंग (तेही मी माझ्या समाधानासाठीच केलेले..) वगळता माझा कथासंग्रह आकाराला येण्याच्या प्रोसेसमधे मी इच्छा असूनही माझा प्रत्यक्ष सहभाग फारसा देऊच शकलो नव्हतो. मुखपृष्ठ, चांगल्या मुद्रकाचा शोध, मुद्रितांच्या कॉपीज् काळजीपूर्वक तपासणे, प्रकाशन समारंभाचे नियोजन, त्यासाठी आमंत्रितांच्या येण्या-जाण्याच्या सोयीचा विचार करून पुण्यात मध्यवर्ती भागातला हॉल शोधणे, प्रमुख पाहुण्यांची निवड, त्यांच्याशी चर्चा, त्यांना आमंत्रण, त्यांच्या वयाचा विचार करून त्यांच्या प्रवासाची, वास्तव्याची, स्वास्थ्याची विशेष काळजी घेणे, या सगळ्याबरोबरच कार्यक्रमाच्या निमंत्रण पत्रिका छपाईच्या व्यवस्थेपर्यंतच्या सगळ्याच आघाड्या वेळोवेळी अतिशय व्यवस्थित सांभाळत होते ते स्वतः राजू आणि नितीन हेच दोघे!
मी पुण्यात फॅमिली शिफ्ट केलेली नसली तरी टिळक रोडवरील ‘अपूर्वा अपार्टमेंट’ मधे वन रूम किचनचा एक फ्लॅट भाड्याने घेतलेला होता. स्वैपाक न् भांड्याला बाई यायच्या. त्यामुळे शाळा/काॅलेजना सुट्ट्या असतील तेव्हा आरती/सलिल येऊ शकतील आणि बदल म्हणून आईही इथे येऊन सलग कांही दिवस राहू शकेल हा त्यामागे उद्देश होता. या कथासंग्रहाचं नियोजन सुरू झालं त्याच दरम्यान योगायोगाने आई इथे आलेलीच होती. प्रकाशन समारंभाचं नियोजन सुरू झालं त्याच दरम्यान माझ्या सासूसासऱ्यांचंही पुण्यात येणं होणार होतं. माझी मोठी बहिण-मेव्हणेही आवर्जून येणार होते. मोठा भाऊ तर पुण्यातच होता. या खेरीज अगदी जवळचे असे इतर बरेच नातेवाईकही पुण्यातच होते. ते सर्वजणही येणार होते. एरवी आवर्जून ठरवायचं म्हटलं तरी सर्वांना एकत्रित आणणारा अशा कौटुंबिक सोहळ्याचा योग सहजासहजी येणं शक्यच नव्हतं. आणि हे सगळं आता शक्य होणार होतं ते असं अगदी अचानक ठरलेलं असूनही अल्पकाळातच आकाराला येऊ लागलेल्या माझ्या ‘स्पर्श प्रकाशाचा’ या कथासंग्रहाच्या प्रकाशनाचा योग आला होता म्हणूनच!
या सगळ्या घटनांना निमित्त झाल्या त्या नाईकसरांच्या मनातल्या माझ्याबद्दलच्या सद्भावना आणि त्यामुळेच त्यांचा मला आलेला त्या दिवशीचा ‘तो’ अनपेक्षित फोन!
खरंतर आत्तापर्यंतच्या योगायोगानेच घडाव्यात तशा घडत गेलेल्या या घटनाही त्यामधे लपलेल्या ‘त्या’च्या कृपालोभाची जाणीव करून द्यायला पुरेशा होत्या माझ्यासाठी. पण याही पेक्षा आश्चर्यकारक आणि तितक्याच सुखद योगायोगाचे धागेदोरेही याच सगळ्या घडामोडींशी घट्ट जुळणार होते ज्यामुळे माझ्या उर्वरित आयुष्याला तोवर मी कधी कल्पनाही केली नव्हती असं अनोखं वळणही मिळणार होतं!!
ते सगळं आज आठवतानाही स्वप्नवतच वाटत रहातं!
याच संदर्भात त्या कार्यक्रमाची रूपरेषा ठरवण्यासाठी आम्ही बसलो होतो तेव्हा नितीन म्हणाला,
” ‘स्पर्श प्रकाशाचा’ शं. ना. नवरे यांच्या हस्ते प्रकाशित व्हावं असं मला वाटतं. “
शं. ना. नवरे माझेही आवडते लेखक होतेच. पण तरीही या छोट्याशा कामासाठी ते डोंबिवलीहून पुण्यापर्यंत यायला तयार होतील का? हा प्रश्न होताच. पण नितीनने त्यांना फोन केल्यावर प्रकाशन समारंभ कधी आहे हे विचारून घेऊन, ते कसलेही आढेवेढे न घेता ‘हो’ म्हणाले, हा एक शुभशकूनच आहे असंच मला वाटलं. राजू, नितीन आणि मी तिघेही कार्यक्रम व्यवस्था, निमंत्रितांचं स्वागत, या सगळ्या देखभालीत व्यस्त असताना शं. नां. ची लोकप्रियता आणि त्यांचं वय लक्षात घेता त्यांना पुणे स्टेशनवर रिसीव्ह करण्यापासून परतीच्या प्रवासात निरोप देईपर्यंत त्यांच्या सोबत राहू शकणारी दुसरी एखादी जबाबदार व्यक्ती आवश्यक होती. पण सहज उपलब्ध होणारं त्यावेळी कुणीच नजरेसमोर येईना. अखेर नितीननेच शन्नांना कार्यक्रमाच्या दिवशी रविवारी सकाळी पुणे स्टेशनवर रिसिव्ह करण्यापासूनची सगळी जबाबदारी स्वत:कडे घेतली आणि प्रकाशक म्हणून राजू आणि लेखक म्हणून मी अशा आम्हा दोघांना त्याने प्रकाशन समारंभाच्या हॉलवरची सर्व व्यवस्था पहाण्यासाठी पूर्ण वेळ उपलब्ध करून दिला.
प्रकाशन समारंभ टिळक रोडवरच्या ‘टिळक स्मारक मंदिर’ मधील हाॅलमधे करायचं ठरलं तो रविवार होता.
अर्थात त्या आधीचे शुक्रवार आणि शनिवार अशा दोन दिवसांच्या रजेचं नियोजनही मी आधीपासूनच करून ठेवलं होतं. पण… ऐनवेळी अचानक अशी विचित्र परिस्थिती उद्भवली कीं त्या दोन्ही दिवसांची रजा रद्द करून मला पूर्णवेळ आॅफिस अॅटेंड करणं अपरिहार्यच होऊन बसलं!
याला निमित्त झालं ते सेंट्रल आॅफिसमधून अचानक आलेला एक महत्वाचा फॅक्स आणि पाठोपाठ आलेल्या त्याला पुष्टी देणाऱ्या फोनचं! आमच्या जी. एम्. मॅडम नेमक्या शुक्रवारीच झोनल आॅफिस व्हिजीटसाठी येणार होत्या. आणि शनिवारी इथल्या लोकल ब्रॅंचेसपैकी दोन ब्रॅंचेस् ना भेट देऊन त्या पुढे कोल्हापूर रिजनल आॅफिसला मिटिंगसाठी जाणार होत्या! त्यामुळे आमच्या आॅफिसमधे महत्वाच्या बाबींबद्दल धोरणात्मक चर्चा, दुपारी उशीरपर्यंत सुरू राहू शकणारी लंच मिटींग आणि शनिवारच्या लोकल ब्रॅंच व्हिजीटची व्यवस्था यासाठी आम्हा सर्वांची उपस्थिती आणि सहभाग अपरिहार्यच होता हे ओघानं आलंच!
या सर्व अनिश्चिततेला सामोरं जाताना मी खूप अस्वस्थ होतो. हातातोंडाशी आलेलं खूप कांही हातून निसटून जात असल्याच्या भावनेने ती अस्वस्थता अधिकच वाढत गेली. हाकेच्या अंतरावर आलेल्या प्रकाशन समारंभाचा आनंद हिरावून घेणारी, फार मोठा अडसर होऊन बसलेली परिस्थिती निर्माण करणारी आमच्या जी. एम्. मॅडमची ही व्हिजीट मला त्या अस्वस्थतेत एखाद्या भयंकर संकटासारखीच वाटत राहिली! .. पण प्रत्यक्षात मात्र ती माझ्यासाठी ‘त्या’नेच घडवून आणलेली इष्टापत्तीच ठरणार होती हे मला कुठं माहित होतं?
इष्टापत्तीच नाही तर काय? कारण ठरल्याप्रमाणे शुक्रवारी मॅडम आल्या आणि अचानक घटनाच अशा घडत गेल्या कीं मनातली अस्वस्थता क्षणार्धात विरूनच गेली..!
फार मोठ्ठं संकट भासणारी ही जी. एम्. मॅडमची व्हिजीट संकट नव्हे तर माझ्या पुरता तरी एक शुभशकूनच ठरला होता!!
☆ श्री रविंद्रनाथ टागोर यांची “गीतांजली”… भाग – ६ ☆ श्री मंजिरी येडूरकर ☆
श्री रविंद्रनाथ टागोर
रविंद्रनाथ टागोरांना कलेचा वारसा त्यांच्या कुटुंबातूनच मिळाला होता. ते स्वत: तसेच त्यांच्या परिवारातील अनेक जण लेखक, नाटककार, कवि, संगीतकार, चित्रकार होते; बॅरिस्टर, वकील, समाजसुधारक, आय सी एस होते. रविंद्रनाथांची पहिली कविता ‘भानुसिंह’ या टोपणनावाने वयाच्या बाराव्या वर्षी प्रसिद्ध झाली तर त्यांचा पहिला काव्यसंग्रह ‘कबी कहानी’ वयाच्या १७ व्या वर्षी प्रकाशित झाला. त्यांनी पहिली लघुकथा ‘भिखारिनी’ १६ व्या वर्षीच लिहिली. बॅरिस्टर होण्यासाठी ते १८७८ मधे लंडनला गेले पण दोन वर्षांनी परत आले. नंतरच्या २० वर्षात त्यांचे अनेक काव्यसंग्रह, एकांकिका, नाटकं, कथासंग्रह, कादंबऱ्या, निबंधसंग्रह प्रकाशित झाले. त्यांचे वडील बंधू सत्येंद्रनाथ आय सी एस होणारे पहिले भारतीय होते. त्यांची बदली बॉम्बे प्रेसिडेन्सी मधे झाल्यावर ते मुंबई, पुणे, सातारा अशा ठिकाणी राहिले होते. त्यावेळी रविंद्रनाथ त्यांच्याकडे येऊन रहात असत. सत्येंद्रनाथांमुळेच रविंद्रनाथांनी देखील संत तुकारामांची अभंग गाथा वाचली व त्यातील कांही अभंगांचे बंगाली भाषांतर देखील केलं आहे. हे भाषांतरित अभंग ‘रूपांतर’ या त्यांच्या पुस्तकात समाविष्ट करण्यात आले आहेत.
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☆ गीत : १६ ☆
I have had my invitation to this world’s festival, and thus my life has been blessed. My eyes have seen and my ears have heard.
It was my part at this feast to play upon my instrument, and I have done all I could.
Now I ask, has the time come at last when I may go in and see thy face and offer thee my silent salutation?
I am only waiting for love to give myself up at last into his hands. That is why it is so late and why I have been guilty of such omissions.
They come with their laws and their codes to bind me fast; but I evade them ever, for I am only waiting for love to give myself up at last into his hands.
People blame me and call me heedless; I doubt not they are right in their blame.
The market day is over and work is all done for the busy. Those who came to me in vain have gone back in anger. I am only waiting for love to give myself up at last into his hands.
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☆ भावानुवाद : गीत १७ ☆
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तुझ्या कृपेचे द्वार उघडता
स्वाधीन करिन मज तुझिया हाता॥
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खोळंबुनि मी पाही वाटुली
रीत कळेना बुद्धी सानुली
ओढती मजला ऐहिक धागे
तव भेटीचा क्षण पडतो मागे
नामस्मरणे तुझाच धावा
करण्या होई उशीर देवा
तुझ्या कृपेचे द्वार उघडता
स्वाधीन करिन मज तुझिया हाता॥
*
दिवस, महिने, वर्षे गेली
भक्तीची परि ज्योत न तेवली
नियम येथले आणि कायदे
सरसावुनि मग केले वायदे
त्यांना तोडुनि मुक्त जाहलो
प्रेमा तुझिया मी आसुसलो
तुझ्या कृपेचे द्वार उघडता
स्वाधीन करिन मज तुझिया हाता॥
*
बुद्धीहीन मज लोक बोलती
आरोप तयांचे खरेच असती
बाजार इथला मला न कळला
समजाविण्यासि जो तो आला
मार्गच असला सोडुनि आलो
मागे नच निर्धारे वळलो
तुझ्या कृपेचे द्वार उघडता
स्वाधीन करिन मज तुझिया हाता॥
*
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☆ गीत : १८ ☆
Clouds heap upon clouds and it darkens. Ah, love, why dost thou let me wait outside at the door all alone?
In the busy moments of the noontide work I am with the crowd, but on this dark lonely day it is only for thee that I hope.
If thou showest me not thy face, if thou leavest me wholly aside, I know not how I am to pass these long, rainy hours.
I keep gazing on the far away gloom of the sky, and my heart wanders wailing with the restless wind.
(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆.आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे।
इस सप्ताह से प्रस्तुत हैं “आप बड़े हैं“।)
साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १३२ – आप बड़े हैं☆ आचार्य भगवत दुबे
संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी के साप्ताहिक स्तम्भ “मनोज साहित्य” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “सजल – पर पापा कभी नहीं बदले”। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।
मनोज साहित्य # २०५ – सजल – पर पापा कभी नहीं बदले ☆
(पदांत- पर पापा कभी नहीं बदले, मात्रा भार- 16+16=32)
(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “तिल गुड़ की मिठास”।)
☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २५१ ☆
🌻लघुकथा🌻 तिल गुड़ की मिठास🌻
माँ रेवा के घाट पर उतरने चढ़ने वाले सीढ़ियों पर दान की आस लगाए जो बैठे रहते हैं। उनमें से एक महिला बहुत ही साफ सुथरी परंतु गंभीर सोचनीय अवस्था में माला जाप करती दिखी।
मकर संक्रांति का पर्व सभी खिचड़ी कोई तिल चाँवल, कोई चाँवल दाल, कोई गुड़ तिल, कोई एक-एक लड्डू देते चला जा रहा था। मानो सारा पुण्य कमा रहे हो।
पंडितों की पंक्तियां बड़े-बड़े लकड़ी के तख्तों पर आसन जमाए बैठे थे। थोड़ी देर बाद वहीं महिला सुंदर से एक प्लेट पर दान से मिले कुछ लड्डुओं को कपकपाते हाथ से पंडित जी के पास आकर कुछ रुपए रख संकल्प करने के लिए कहने लगी।
उसकी शालीनता को देख पंडित जी भी मुस्कुरा दिए। उसी समय सामने के लकड़ी के तख्त पर नजर पर पड़ी। बड़ी श्रद्धा के साथ जो गाँव की महिला अपने बच्चों के साथ हाथ लगाकर संकल्प कर रही थी और कोई नहीं उसके अपने बेटा बहू थी।
पंडित ने नगद नारायण अपने कब्जे में लेते हुए बाकी कच्ची रसोई पुरी सब्जी उसी अम्मा को देते हुए कहा— ले जा रख तेरा आज का दिन अच्छा है। तुझे मकर संक्रांति मिल रही है तिल के लड्डू मिल रहे हैं। लेजा दान का सीधा आज अच्छे से भोजन करना।
उनके जाने के बाद आँचल फैला, वह दुआ देती कहने लगी जहाँ मैं हूँ, वहाँ कभी मेरे अपने बैठने ना आए।
बस यही दान की दुआ मै मांगती हूँ। बेटा बहू तिल महादान करके बड़े खुश नजर आ रहे थे। वही सर से मुँह छुपाई वह सोच रही थी– यह तिल गुड़ मिठास, या मिलने वाला त्रास।।