हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३१९ – चक्षो: सूर्यो अजायत ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

विश्व हिंदी दिवस पर विशेष

☆  संजय उवाच # ३१९ चक्षो: सूर्यो अजायत… ?

वैदिक दर्शन सूर्य को ईश्वर का चक्षु निरूपित करता है। हमारे ग्रंथों में सूर्यदेव को जगत की आत्मा भी कहा गया है। विश्व की प्राचीन सभ्यताओं द्वारा सूर्योपासना के प्रमाण हैं। ज्ञानदा भारतीय संस्कृति में तो सूर्यदेव को अनन्य महत्व है। एतदर्थ भारत में अनेक प्राचीन और अर्वाचीन सूर्य मंदिर हैं।

भारतीय मीमांसा में प्रकाश, जाग्रत देवता है।  प्रकाश आंतरिक हो या वाह्य, उसके बिना जीवन असंभव है। एक-दूसरे के सामने खड़ी गगनचुंबी अट्टालिकाओं के महानगरों में प्रकाश के अभाव में विटामिन डी की कमी विकराल समस्या हो चुकी है।  केवल मनुष्य ही नहीं, सम्पूर्ण सजीव सृष्टि और वनस्पतियों के लिए प्राण का पर्यायवाची है सूर्य। वनस्पतियों में प्रकाश संश्लेषण या फोटो सिंथेसिस के लिए प्रकाश अनिवार्य घटक है।

सूर्यचक्र के अनुसार ही हमारे पूर्वजों का जीवनचक्र भी चलता था। भोर को उठना, सूर्यास्त होते-होते भोजन कर सोने चले जाना। सूर्यकिरणें भोजन की पौष्टिकता बनाए रखने में उपयोगी होती हैं।

वस्तुतः जीवन की धुरी है सूर्य। सूर्य से ही दिन है, सूर्य से ही रात है। सूर्य है तो मिनट है, सेकंड है। सूर्य है तो उदय है, सूर्य है तो अस्त है। सूर्य ही है कि अस्त की आशंका में पुनः उदय का विश्वास है। सूर्य कालगणना का आधार है, सूर्य ऊर्जा का अपरिमित  विस्तार है। सूर्यदेव तपते हैं ताकि जगत को प्रकाश मिल सके‌। तपना भी ऐसा प्रचंड कि लगभग 15 करोड़ किलोमीटर दूर होकर भी पृथ्वीवासियों को पसीना ला दे।   

सूर्य सतत कर्मशीलता का अनन्य आयाम है, सूर्य नमस्कार अद्भुत व्यायाम है। शरीर को ऊर्जस्वित, जाग्रत और चैतन्य रखने का अनुष्ठान है सूर्य नमस्कार। ऊर्जा, जागृति और चैतन्य का अखंड समन्वय है सूर्य।

‘सविता वा देवानां प्रसविता’…सविता अर्थात सूर्य से ही सभी देवों का जन्म हुआ है। शतपथ ब्राह्मण का यह उद्घोष अन्यान्य शास्त्रों की विवेचनाओं के भी निकट है। गायत्री महामंत्र के अधिष्ठाता भी सूर्यदेव ही हैं।

सूर्यदेव अर्थात सृष्टि में अद्भुत, अनन्य का आँखों से दिखता प्रमाणित सत्य। सूर्यदेव का मकर राशि में प्रवेश अथवा मकर संक्रमण खगोलशास्त्र, भूगोल, अध्यात्म, दर्शन  सभी दृष्टियों से महत्वपूर्ण है।

इस दिव्य प्रकाश पुंज का उत्तरी गोलार्ध से निकट आना उत्तरायण है। उत्तरायण अंधकार के आकुंचन और प्रकाश के प्रसरण का कालखंड है। स्वाभाविक है कि इस कालखंड में दिन बड़े और रातें छोटी होंगी।

दिन बड़े होने का अर्थ है प्रकाश के अधिक अवसर, अधिक चैतन्य, अधिक कर्मशीलता।

अधिक कर्मशीलता के संकल्प का प्रतिनिधि है तिल और गुड़ से बने पदार्थों का सेवन।

निहितार्थ है कि तिल की ऊर्जा और गुड़ की मिठास हमारे मनन, वचन और आचरण तीनों में देदीप्यमान रहे।

मकर संक्रांति/ उत्तरायण/ भोगाली बिहू / माघी/ पोंगल/ खिचड़ी की अग्रिम शुभकामनाएँ।

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  भास्कर साधना गुरुवार 1 जनवरी 2026 से  रविवार 11 जनवरी तक चलेगी।

💥 इसका साधना मंत्र होगा- ॐ सूर्याय नम: 💥

🕉️ ग्यारह दिवसीय इस साधना में मौन साधना एवं आत्म-परिष्कार भी साथ-साथ चलेंगे।🕉️

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सलिल प्रवाह # २६२ – विश्व हिंदी दिवस विशेष – हिंदी आरती ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है  – विश्व हिंदी दिवस विशेष – हिंदी आरती)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २६२ ☆

☆ विश्व हिंदी दिवस विशेष – हिंदी आरती ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

भारती भाषा प्यारी की।

आरती हिन्दी न्यारी की…  

लोककी भाषा है हिंदी,

तंत्रकी आशा है हिंदी।

करोड़ों जिव्हाओं-आसीन

न कोई सकता इसको छीन।

ब्रम्ह की, विष्णु-पुरारी की

आरती हिन्दी न्यारी की।।

वाक्-ध्वनि हिंदी का आधार,

पाँच वर्गों बाँटे उच्चार।

बोलते जो वह लिखते आप-

वर्तनी स्वर-व्यंजन अनुसार।

नागरी लिपि सुविचारी की

आरती हिंदी न्यारी की।।

० 

एकता पर हिंदी बलिहार

लिंग दो वचन क्रिया व्यापार।

संधियाँ काल शक्ति हैं तीन-

विशेषण हैं हिंदी में चार।

पाँच अव्यय व्यवहारी की

आरती हिंदी न्यारी की।।

वर्ण हिंदी के अति सोहें,

शब्द मानव मन को मोहें।

काव्य रचना सुडौल सुन्दर

वाक्य लेते सबका मन हर।

छंद-सुमनों की क्यारी की

आरती हिंदी न्यारी की।।

समेटे ज्ञान-नीति-विज्ञान,

सीख-पढ़-लिख हों हम विद्वान।

विषय जो कठिन जटिल नीरस-

बना देती हिंदी रसवान। 

विश्ववाणी गुणकारी की

आरती हिंदी न्यारी की।।

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

१९.११.२०२५

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ कविता – “लोग भूल जाते हैं” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

पुनर्पाठ में —

☆ कविता – “लोग भूल जाते हैं ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

लोग भूल जाते हैं

खराब मौसम और

गर्दिश के दिनों में

की गयी मदद ।

लोग भूल जाते हैं

संघर्ष के दौर में

अंधेरी काली रातों में

अपनी दहलीजों पर

दीया जला कर

राह दिखाने वालों को ।

लोग इस्तेमाल करते हैं

दूसरों के कंधों को

सीढ़ियों की तरह

और तमन्ना रखते हैं

आकाश छू लेने की ।

कोई नहीं जानता

वे लोग अपने अंधे सफर में

कहां गिर जाते हैं

कहां छूट जाते हैं

और कब लोग

उन्हें भूल जाते हैं ,,,,

कोई नहीं जानता

लोग कब भूल जाते हैं ,,,

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # ४० – आलेख ~ बेटी के विदाई से बहू बनने की कथा, भारतीय संस्कृति का अनुपम एक उदाहरण ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ४० ☆

☆ आलेख ☆ ~ बेटी के विदाई से बहू बनने की कथा, भारतीय संस्कृति का अनुपम एक उदाहरण ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

बेटी की विदाई कितनी कारूणिक होती है, इसको शब्दों में तो बयां किया ही नही जा सकता है। मैंने अपनी कई बड़ी रचनाओं में इस भाव को सजाने और समझने की कोशिश की है। लेकिन बेटी के बिछुडन – वियोग भाव की गहराई इतनी है कि मै इसमे अपने शब्दों की रस्सी डालता जाता हूँ, डालता जाता हूँ, वह छोटी ही पड़ती जाती है।

बेटी के विदाई की बेला, बाबुल से बिछड़ने की, भाई से लिपटकर रोने की, चाचा ताई को याद करने की, सहेलियों के साथ मुस्कुराने की, गांव परिवार के लोगों के बीच हंसी की ठिठोली करने की, आदि आदि जीवंत दृश्यो के यादों को शब्दों में बांधने के लिए लेखक के पास शब्द कम पड़ जाते हैं।

बेटी अनेकानेक स्नेहिल रिश्तो को त्याग कर जब एक नए घर की ओर प्रस्थान करती है, एक नए आशियाने की ओर कदम बढ़ाती है तो उस वक्त उसके और उसके परिजनों के दिल की पीड़ा, उस माहौल में उठने वाले रुदन की ध्वनि कलेजे को फाड़ कर रख देती है।

बाबुल घर से निकलकर, पिया घर में पहुंचने तक, पुराने रिश्तों से निकल कर नए रिश्तों तक पहुंचने की कठिन यात्रा पर बेटी के कदम जब निकल पड़ते हैं तो इस वृत्तांत को लिखते लिखते लेखक कलम भी स्वयं रो पड़ती है है।

लेकिन मां-बाप की जीविषिका सिर्फ इस बात पर निर्भर होती है कि मेरी प्राणों से प्रिय सिया कहीं अन्यत्र नही जा रही है है बल्कि वह किसी अवधपति दशरथ नंदन राम की प्राण प्रिया और उनके कुल की लक्ष्मी बनने जा रही है तब जाकर ये आंसू कहीं थमते हैं।

विदाई की बेला पर न सिर्फ परिजन, पुरजन एवं परिवारजन आँखे नम हो उठती है, बल्कि बाबुल के घर के सामने खड़े नीम के पत्ते, घर के पीछे की क्यारी में खिले फूल, घर की चौखट, कुंवें की जगत, खूंटे से बधी गाय और बछीया, सदैव दरवाजे पर रहकर दुम हिलाने वाला कुत्ते आदि जैसे बेजुबान जीवों एवं ये तथाकथित निर्जीव कही जाने वाली चीजो को भी लेखक ने विदाई के इस वियोग पल में आंसू बहाते देखता है।

बेटी को विदा कराकर ससुराल की ओर डोली को ले जाने कहारों के बढ़ते कदमों के पद चाप को पीछे से देखकर और या फूलों से सजी हुई कार घूमते चक्को को धीरे-धीरे आंखों से ओझल होने के साथ फिर ही, एक दिन पूर्व शहनाई की धुन से गुजते घर में गजब का सन्नाटा पसर जाता है। मानो सबकुछ ठहर गया हो। यहाँ सबके जुबा से एक ही स्वर निकलता है कि वह चली गई, वह हम सब को छोड़ कर चली गई, अपने प्रीतम के घर गई। फिर मन में एक भाव आता है, मेरी बेटी..तुम जहां भी रहना, सदैव खुश रहना। जिस रूप में रहना, सदा खुश रहना। जब तुम्हें अपने इस घर की याद आए, बिना पूछे चली आना, क्योंकि यह घर तुम्हारा ही घर है और इस घर के दरवाजे सदैव तुम्हारे लिए खुले रहेंगे।

हां मेरी बेटी तुम्हें किसी बुलावे की जरूरत नहीं, तुम तब भी परिवार की एक अंग थी, आगे भी बनी रहोगी। तुम्हारा मायका तुम्हारा वही अपना पुराना किला है, जिसकी तुम जागीर रही हो। जिसमें चलकर तुम्हारे नन्हे पाँव बड़े हुए। बेटी तुम अपरोक्ष रूप से आज भी इस महल की मालकिन हो। बस तुम एक पुराने महल से अपने नये महल में ही गयी हो, सिर्फ इतना ही अंतर है। हाँ एक बात ध्यान रखना, अपने नए महल में जाकर हम सभी को कभी भी मत भूलना। यहाँ बैठा पूरा परिवार हर वक्त बस इस बात की चर्चा करता है कि तुम जहाँ भी रहो खुश रहना।

बेटी अपने बाबुल के घर से बेटी के रूप में तो विदा हो जाती है, और जब उसके कदम किसी नये घर में पड़ते हैं, तो वह उस घर की बहू बन जाती है। बस यह उसका एक नाम का परिवर्तन हुआ। जहां वह बेटी अपने अधिकारों के साथ अपने बाबा के घर में रह रही थी, वहीं वह बहु के अधिकारों के साथ श्वसुर या पति के घर रहने चली जाती है।

यहाँ उसे बहू के अधिकारों के साथ प्रीतम का घर मिलता है, जहां उसके मां-बाप के रूप में उसके सास श्वसुर मिलते हैं, रिश्ते का नाम बदलता है, कुछ थोड़े बहुत फर्ज के अलावा अन्य कुछ भी नही बदलता है।

पिता के घर से विदाकर बहु के रूप में आयी उस बेटी की एक चाहत होती है कि उसका पिता के घर में मिला प्यार, सम्मान और अधिकार तो किसी भी हालत में नहीं बदलना चाहिए, जो उसे एक बेटी के रूप में मिला हुआ होता है। ऐसा ही प्यार, सम्मान एवं अधिकार उसे बहू के रूप में पति के घर में मिलना चाहिए। वहीं उस बेटी के भी मन में ऐसा ही प्यार बना रहना चाहिए कि उसे इस नये घर में सास ससुर के रूप में माता पिता मिले हैं। उनके मान, सम्मान और स्वाभिमान का आदर उसी प्रकार हो जैसा माँ -बाप के प्रति था।

उसके भीतर इस बात गौरव होना चाहिए कि वह इस नये घर की कुलबधु होकर आयी है। पुत्र को तो केवल एक कुल की मर्यादा होने का गौरव प्राप्त होता है, वहीं कन्या दो कुलों की मर्यादा होती है। उसके ऊपर दो कुलों की मर्यादा को निभाने का दायित्व होता है।

यह तो जीवन का एक चक्र है जो कि अपनी धुरी पर घूमता है और पूरा घूम कर वहीं पहुंच जाता है, जहां से वह चला होता है।

बेटी ही बहू होती है और बहू ही बेटी होती है। बस बेटी से बहू के रूप में नाम परिवर्तन की यात्रा में एक मार्मिक पल आता है, जिसे हम विदाई की वेला कहते हैं। बेटी जो आज एक घर की बेटी के रूप में एक परिवार सदस्य होती है, बहु के रूप में दूसरे घर की सदस्य बनती है और फिर व्यस्कता की ओर बढ़ते हुए, उस घर की मालिकिन बन जाती है। फिर वह एक बेटी की माँ बनती है और पुनः उस अपनी जायी बेटी को बेटी के रूप में विदा करती है, जो किसी दूसरे कुल की बहु बनने जा रही होती है। यही वह सामाजिक क्रम है जो लगातार अनवरत चलता रहता है।

बस आवश्यकता इस बात की है कि इस व्यवस्था के भीतर का आदर, प्रेम, सम्मान, मर्यादा, अधिकार, आदि नीति नियमों में कहीं भी घृणा द्वेष, लोभ असम्मान एवं अनीति का समावेश न हो। जब कभी ऐसा होता है तभी वहां सामाजिक व्यवस्था विद्रूप रूप में दिखाई देने लगती है। नहीं तो हमारी सामाजिक व्यवस्था एक आदर्श सामाजिक व्यवस्था है। इसी व्यवस्था को भारतीय सामाजिक व्यवस्था कहते हैं। यही हमारी भारतीयता है, यही हमारे भारत की सांस्कृतिक व्यवस्था है। यही हमारे बहुरंगी फूलों से सजे गमले सदृश्य भारत की खुशबू है। भारतीय संस्कृति का एक संकल्प है कि उसे किसी भी भाषा, क्षेत्र, समुदाय, संप्रदाय मैं नहीं बदलना है और न ही यह बदलती है। हमारी भारतीय संस्कृति अनेकता में एकता का गान करती है और हमारे भारत को महान बनाती है

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

कवि, लेखक एवं समीक्षक

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – लद्दाख़ यात्रा – भाग-२० – नेपाल यात्रा – हिमालय की गोद में – १७ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – लद्दाख़ यात्रा – भाग- २० ☆ श्री सुरेश पटवा ?

10 जुलाई 2022 को गुलमर्ग में सर्द रात गुज़ारने के बाद नाश्ता निपटाया। गाड़ी वालों ने गुलमर्ग के पर्यटन स्थलों के भ्रमण हेतु एक वाहन का खर्चा 4,000/- बताया। लम्बी बातचीत और बोलियों के उतार चढ़ाव के बाद 3,000/- में सौदा पट गया। लेकिन ईद के कारण गाड़ी नहीं आ पायी इसलिए कार्यक्रम निरस्त करना पड़ा। बारह बजे दोपहर को हमारी टैक्सी आ गयी। हम हाउसबोट में शिफ़्ट होने को श्रीनगर रवाना हुए। वहाँ हाउसबोट में रुकना है। हमने सोचा भीड-भाड से परे शांत वातावरण में किसी हाउसबोट में रहने की इच्छा है तो नागिन लेक या झेलम नदी पर खडे हाउसबोट में ठहर सकते हैं। नागिन झील भी कश्मीर की सुंदर और छोटी-सी झील है। यहां प्राय: विदेशी सैलानी ठहरना पसंद करते हैं। झेलम नदी में छोटे हाउसबोट होते हैं।

आज कश्मीर में बक़रीद मनाई जा रही है। गुलमर्ग से श्रीनगर के लिए निकले। चीड़, चिनार, देवदार के पेड़ जो आते वक्त स्वागत द्वार थे, अब बिदाई तोरण नज़र आ रहे हैं। जल के कई रिसाव स्थान पार करते विचार आ रहा है कि भारत के हिमालयी क्षेत्र सभी एक जैसे ही हैं। पूरे हिमालयी क्षेत्र के इलाकों में चश्मों को अलग-अलग नामों से जाना जाता है, सिक्किम में धारा, तो उत्तराखण्ड में जलस्रोत, बावली, तो हिमाचल में नौले, खात्री या छुरुहरा और मेघालय में जलकुण्ड और सतपुड़ा इलाक़े में झरने।

प्रतिभा की तबियत ख़राब होने से उन्हें नूरा अस्पताल में दिखाना पड़ा। दो घंटे इलाज करने में व्यतीत हुए। तीन बजे हाउसवोट पहुँचे। चीयरफ़ुल चार्ली नामक हाउसवोट में पहुँचे। हाउसवोट मालिक को बुकिंग लेकर कुछ कठिनाई थी। उसने दो-तीन लोगों को फ़ोन घुमाया तब जाकर वोट में कमरा मिला। यहाँ से किनारे का नजारा बेहद खूबसूरत है। शिकारे बहते नज़र आ रहे हैं। आज बक़रीद की छुट्टी होने से सभी शिकारे काम पर लगे हैं। असलम भाई डाँगोला की मिशन कश्मीर हाउसवोट में एक रात का आशियाना है। उन्होंने बताया कि यदि आप सात दिनों के लिए कश्मीर आते हैं तो आपको सिर्फ़ 40,000/- रुपयों में यहाँ रहना, खाना, टैक्सी उपलब्ध रहेगी। उनका मोबाईल नम्बर 9419065385 है। हाउसवोट में सामने बैठे हैं। यहाँ से सामने शंकराचार्य पहाड़ी और बाजू में जबरवन पहाड़ी दिख रही है। शाम हो रही है। अब शिकारों की भीड़ बढ़ती जा रही है। शिकारों में शराब, चिकन टिक्का, पनीर टिक्का और दूसरी चीजें मिल रही हैं।

हाउसबोट एक तरह की लग्जरी में तब्दील हो चुके हैं। कुछ लोग दूर-दूर से केवल हाउसबोट में रहने का लुत्फ उठाने के लिए ही कश्मीर आते हैं। हाउसबोट में ठहरना सचमुच अपने आपमें एक अनोखा अनुभव है। परंतु वास्तव में इसकी शुरुआत लग्जरी नहीं, बल्कि मजबूरी में हुई थी। कश्मीर में हाउसबोट का प्रचलन डोगरा राजाओं के काल में तब शुरू हुआ था, जब उन्होंने किसी बाहरी व्यक्ति द्वारा कश्मीर में स्थायी संपत्ति खरीदने और घर बनाने पर क़ानूनी प्रतिबंध लगा दिया था। उस समय कई अंग्रेजों और अन्य आसामियों ने बडी नाव पर लकडी के केबिन बना कर यहां रहना शुरू कर दिया। फिर तो डल झील, नागिन झील और झेलम पर हाउसबोट में रहने का चलन हो गया। बाद में उनकी देखादेखी स्थानीय लोग भी हाउसबोट में रहने लगे। आज भी झेलम नदी पर स्थानीय लोगों के हाउसबोट तैरते देखे जा सकते हैं। शुरुआती दौर में बने हाउसबोट बहुत छोटे होते थे, उनमें इतनी सुविधाएं भी नहीं थीं, लेकिन अब वे लग्जरी रूप ले चुके हैं। सभी सुविधाओं से लैस आधुनिक हाउसबोट किसी छोटे होटल के समान हैं। डबल बेड वाले कमरे, अटैच बाथ, वॉर्डरोब, टीवी, डाइनिंग हॉल, खुली डैक आदि सब पानी पर खडे हाउसबोट में है। लकडी के बने हाउसबोट देखने में भी बेहद सुंदर लगते हैं। अपने आकार एवं सुविधाओं के आधार पर ये विभिन्न दर्जे के होते हैं। शहर के मध्य बहती झेलम नदी पर बने पुराने लकडी के पुल भी पर्यटकों के लिए एक आकर्षण है। कई मस्जिदें और अन्य भवन झेलम नदी के निकट ही स्थित है।

हमारे पैकेज में डल झील में एक घंटे का शिकारा सफ़र तय था लेकिन आज शिकारों पर भारी भीड़ होने से सात बजे शिकारा आया। पानी की बोतल में स्कॉच के दो पेग भरकर एक घंटा शिकारा सैर से डल झील का भरपूर मज़ा लिया। चारों तरफ़ पहाड़ों पर हरियाली का आलम था। गवर्नर हाउस, शंकराचार्य पहाड़ी और मुग़ल क़ालीन क़िला ढलते सूरज की मद्धिम रोशनी में सुहाने लग रहे थे। जी भरकर फ़ोटो उतारीं। कश्मीर की डल झील को मन भरकर जी लिया।

हाऊसबोट पर तीन कश्मीरी थे। उनसे बातें होती रहीं। उन्होंने बताया कि पहाड़ों की चट्टानों और भूमि में स्थित जल ही चश्मों में फूटता है। चश्मे अक्सर ऐसे क्षेत्रों में प्राकृतिक होते हैं जहाँ धरती में दरारें और रिसाव हो, जिनमें बारिश का पानी प्रवेश कर जाये। फिर यह पानी जमीन के अन्दर ही प्राकृतिक नालियों और गुफ़ाओं में घूमता हुआ किसी और जगह से चश्मे के रूप में उभर आता है।

कश्मीर के गाँवों में अभी भी चश्में ही पानी का मुख्य स्रोत हैं। कश्मीर के गाँवों में ज़मीनी खेती ही रोजी-रोटी का एक बड़ा सहारा है। ज्यादा ऊँचाई वाले इलाकों में खासकर चश्में ही पानी और सिंचाई के स्रोत थे। उपेक्षा और नए ‘विज्ञानियों के नजर में अनुपयोगी’ चश्मों को लोग भूलते गए। कई प्राकृतिक चश्में सालों पहले बन्द हो गए या कर दिए गए। लोगों ने उनके आस-पास और उनके ऊपर घर बना लिये। लोग भूल गए कि कभी यहाँ कोई चश्मा भी था। पिछले साल जब ज्यादा बारिश हुई तो उनके घर के नीचे से कमरों में पानी आने लगा। तब याद आया कि वे किसी पानी की ‘जगह’ पर बैठे हुए हैं। उन्होंने पानी का आशियाना हथिया लिया है।

चश्में हालांकि बहुत ज्यादा पानी नहीं देते, पर चश्में आज भी कश्मीरी गाँवों में पीने के पानी के सबसे बड़े स्रोत हैं। हाँ! सिंचाई के लिये जरूर चश्मों से थोड़ा आगे बढ़कर 8वीं शताब्दी में कश्मीर के शासक ललितादित्य ने ऊँचे पठारों तक पानी पहुँचाने के लिये एक नए यंत्र का इस्तेमाल कराना शुरू किया था जिसका नाम था ढेंकी। इसमें किसान को एक बड़े खम्बे का इस्तेमाल करना था। जिसके मुँह पर पानी के लिये बाल्टीनुमा पात्र बँधा होता था। अपने पैरों से सन्तुलन बनाते हुए उसे पानी के कुएँ या किसी जलधारा से खींचना होता था। यह सारा काम मानवीय ऊर्जा से होता था, तब तक सब ठीक ही रहा। भूजल में कोई खास दिक्कत नहीं थी। पर पम्पिंग मशीनों ने दृश्य बदल दिया। भूजल की गिरावट ने चश्मों को सुखाना शुरू कर दिया है। अब तो कश्मीरी सिंचाई का वर्तमान तरीक़ा धीरे-धीरे ‘डीपवेल’ और ‘लिफ्ट इरिगेशन’ की तरफ जा चुका है। स्थान विशेष की योजना वहाँ की ज़मीनी हकीक़त से ही बनाई जानी चाहिए। हर कीमत पर इस बात को ध्यान में रखा जाना चाहिए। इसकी गहराई में वहाँ की संस्कृति, भौगोलिक, आर्थिक और सामाजिक स्थितियाँ सभी कुछ शामिल होती हैं। विकासवादी गतिविधियों और गलत निर्णयों के चलते चश्में खत्म होते जा रहे हैं।

पहले इस इलाके में भरपूर जंगल थे, जो चश्मों के पुनर्भरण में मददगार होते थे, लेकिन धीरे-धीरे जंगल कम हुए और चश्मों में जलापूर्ति कम होती गई। साथ ही पुनर्भरण क्षेत्रों में बिना समझे-बूझे पक्के निर्माण चश्मों की जल-भण्डारण क्षमता को घटा रहे हैं। कश्मीरी पहाड़ जो खुद ही ‘वाटर टैंक’ थे, उनको सुखा के सरकारों का जनस्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग टैंकों और टैंकरों से पीने का पानी मुहैया करवाने की कोशिश कर रहा है। श्रीनगर और कुछ नगरों के नागरिकों को तो यह सुविधा उपलब्ध हो जाएगी, और होती रहेगी पर गाँवों को कौन पूछेगा। उनको तो अपने प्राकृतिक और टिकाऊ पानी के टैंक ‘चश्मों’ को ही ठीक-ठाक रखना होगा।

फिर विचार आया कि कश्मीरियत क्या है? “आज़ादी-आज़ादी, हम माँगते आज़ादी” और “भारत तेरे टुकड़े होंगे” नारे लगाने वाले कोई मिले नहीं। एक भले से दिखते पढ़े लिखे कश्मीरी से बातचीत कश्मीरियत को कुछ इस तरह बयाँ करती है।

इस्लाम आने के बाद सूफी संतों का दर्शन यहां की सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। मध्ययुग में मुस्लिम आक्रान्ता सिकंदर बुतशिकन कश्मीर पर क़ाबिज़ हो गये। कुछ भले शाह ज़ैन-उल-आबदीन जैसे मुसलमान हिन्दुओं से अच्छा व्यवहार करते थे पर सुल्तान सिकन्दर बुतशिकन जैसों ने यहाँ के मूल कश्मीरी हिन्दुओं को मुसलमान बनने या राज्य छोड़कर जाने या मरने पर मजबूर कर दिया। कुछ ही सदियों में कश्मीर घाटी मुस्लिम बहुल हो गई। चौदहवीं शताब्दी में यहां मुस्लिम शासन आरंभ हुआ। उसी काल में फारस से सूफी संतों के रूप में इस्लाम का भी आगमन हुआ। यहां पर ऋषि परम्परा, त्रिखा शास्त्र और सूफी इस्लाम का संगम मिलता है, जो कश्मीरियत का सार है।

यहाँ की सूफ़ी-परम्परा बहुत विख्यात है, जो कश्मीरी इस्लाम को परम्परागत शिया और सुन्नी इस्लाम से थोड़ा अलग और हिन्दुओं के प्रति सहिष्णु बनाती है। यह हमने भी महसूस किया। सभी कश्मीरियों को आतंकी कह देना बहुत बड़ी नादानी और सिरे से बेमानी है। जन्नत-ए-कश्मीर भारत छोड़ कर जाते अंग्रेजों, रुकते हिंदुओं और बँटते मुसलमानों के बीच एक राजनीतिक मोहरा बन गया था। अब चुनावी बिछात पर शकुनि पाँसा है। चुनाव के वक़्त मंदिर-मस्जिद, कश्मीर और आतंक एक साथ परोसे जाते हैं।

हमने कहा- लेकिन 370 का समापन भारतीय राष्ट्र के लिए एक बड़ी उपलब्धि है। एक राष्ट्र, एक संविधान, राष्ट्रीय एकता और प्रभुसत्तावादी राज्य की अनिवार्यता होती है। आप क्या कहेंगे?

उन्होंने कहा- रियासत की परम्पराओं से मुक्त होना कठिन होता है। थोड़ा वक़्त लगेगा। कश्मीरी हिन्दुओं को कश्मीरी पंडित कहा जाता है और वो सभी ब्राह्मण माने जाते हैं। सभी कश्मीरियों को कश्मीर की संस्कृति, यानि कि कश्मीरियत पर बहुत नाज़ है। वादी-ए-कश्मीर अपने चिनार के पेड़ों, कश्मीरी सेब, केसर (ज़ाफ़रान, जिसे संस्कृत में काश्मीरम् भी कहा जाता है), पश्मीना ऊन और शॉलों पर की गयी कढ़ाई, गलीचों और देसी चाय (कहवा) के लिये दुनिया भर में मशहूर है। यहाँ का सन्तूर भी बहुत प्रसिद्ध है। कश्मीरी व्यंजन भारत भर में बहुत ही लज़ीज़ माने जाते हैं। ज़्यादातर कश्मीरी पंडित मांस खाते हैं। कश्मीरी लोगों के मांसाहारी व्यंजन हैं, नेनी (बकरे के ग़ोश्त का) क़लिया, नेनी रोग़न जोश, नेनी यख़ियन (यख़नी), मच्छ (मछली), इत्यादि। कश्मीरी पंडितों के शाकाहारी व्यंजन हैं : चमनी क़लिया, वेथ चमन, दम ओलुव (आलू दम), राज़्मा गोआग्जी, चोएक वंगन (बैंगन), इत्यादि। कश्मीरी मुसलमानों के (मांसाहारी) व्यंजन में कई तरह के कबाब और कोफ़्ते, रिश्ताबा, गोश्ताबा, इत्यादि शामिल होते हैं। परम्परागत कश्मीरी दावत को वाज़वान कहा जाता है। कहते हैं कि हर कश्मीरी की ये ख़्वाहिश होती है कि ज़िन्दगी में कम से कम एक बार अपने दोस्तों के लिये वो वाज़वान परोसे।

हमने पूछा- यदि कश्मीरियत कश्मीरी पंडितों की खैर ख़्वाह है तो कश्मीरी पंडित कब लौटेंगे, अभी माहौल ठीक नहीं लगता।

उन्होंने कहा- आग ठंडी होने में वक़्त लगता है, जनाब।

इतने में गिलासों में कहवा पेय आ गया। चुस्कियों के बीच कश्मीरी खान-पान पर चर्चा निकल पड़ी। उन्होंने बताया- कश्मीर घाटी की प्रसिद्ध फसल चावल यहाँ के निवासियों का मुख्य भोजन है। मक्का, गेहूँ, जौ और जई भी अन्य फसलें हैं। इनके अतिरिक्त विभिन्न फल एवं सब्जियाँ यहाँ उगाई जाती हैं। अखरोट, बादाम, नाशपाती, सेब, केसर, तथा मधु आदि का प्रचुर मात्रा में निर्यात होता है। कश्मीर केसर की कृषि के लिए प्रसिद्ध है। शिवालिक तथा मरी क्षेत्र में कृषि कम होती है। दून क्षेत्र में विभिन्न स्थानों पर अच्छी कृषि होती है। जनवरी और फरवरी में कोई कृषि कार्य नहीं होता। यहाँ  झीलों का बड़ा महत्व है। उनसे मछली, हरी खाद, सिंघाड़े, कमल एवं मृणाल तथा तैरते हुए बगीचों से सब्जियाँ उपलब्ध होती हैं। कश्मीर की मदिरा मुगल बादशाह बाबर तथा जहाँगीर को बड़ी प्रिय थी किंतु अब उसकी इतनी प्रसिद्धि नहीं रही। कृषि के अतिरिक्त, रेशम के कीड़े तथा भेड़ बकरी पालने का कार्य भी यहाँ पर होता है।

कश्मीर राज्य में प्रचुर खनिज साधन हैं किंतु अधिकांश अविकसित हैं। कोयला, जस्ता, ताँबा, सीसा, बाक्साइट, सज्जी, चूना पत्थर, खड़िया मिट्टी, स्लेट, चीनी मिट्टी, अदह (ऐसबेस्टस) आदि तथा बहुमूल्य पदार्थों में सोना, नीलम आदि यहाँ के प्रमुख खनिज हैं।

श्रीनगर का प्रमुख उद्योग कश्मीरी शाल की बुनाई है जो मुग़लों के समय ठीक से विकसित हुई थी और तभी से ही चली आ रही है। कश्मीरी कालीन भी प्रसिद्ध औद्योगिक उत्पादन है, किंतु आजकल रेशम उद्योग सर्वप्रमुख प्रगतिशील धंधा हो गया है। चाँदी का काम, लकड़ी की नक्काशी तथा पाप्ये-माशे यहाँ के प्रमुख उद्योग हैं। कश्मीर का प्रमुख धंधा पर्यटन  है जिससे राज्य को और स्थानीय निवासियों को बड़ी आय प्राप्त होती है। लगभग एक दर्जन औद्योगिक संस्थान स्थापित हुए हैं परंतु प्रचुर औद्योगिक क्षमता के होते हुए भी बड़े उद्योगों का विकास अभी तक नहीं हो पाया है। मुख्य नदियाँ सिन्धु, झेलम और चेनाब हैं। यहाँ कई ख़ूबसूरत झीलें हैं जैसे: डल, वुलर और नगीन।

उनसे विदाई लेकर हम हरि पर्वत किला की सैर को निकल गये। श्रीनगर के डल झील के पश्चिम में हरि पर्वत किला स्थित है। अता मोहम्मद खान ने किले का निर्माण कराया। हरि पर्वत को कोह-ए-मारन के नाम से भी जाना जाता है। यह किला श्रीनगर की डल झील के पश्चिम में स्थित है। जिला प्रशासन के मुताबिक इस किले का निर्माण 18वीं सदी में अफगान गवर्नर अता मोहम्मद खान ने कराया। बाद में 1590 में बादशाह अकबर ने किले में एक लंबी दीवार का निर्माण कराया। इस किले से डल झील की खूबसूरती देखते बनती है। किले की देख-रेख एवं रखरखाव भारतीय पुरातत्व विभाग करता है। हरि पर्वत किले के प्राचीन खंभे इसके सौंदर्य को और बढ़ाते हैं। यहां से मखदूम साहिब की दरगाह भी अच्छी तरह दिखती है। ऊंचाई पर स्थित होने के नाते यह किला श्रीनगर के सभी इलाके से नजर आता है। इस पर्वत की पश्चिमी ढलान पर भगवती पार्वती का मंदिर है। इस किले पर आने के लिए पर्यटकों को पुरातत्व विभाग से अनुमति लेनी होती है।

11 जुलाई 2022 को अब कश्मीर से बिदाई लेने का वक़्त आ गया है। सुबह आठ बजे श्रीनगर से अमृतसर फ़्लाइट है। शिकारे में सोए थे, नींद अच्छी आई और समय पर खुल भी गई। जब तक भूख और नींद ज़िंदा है, तब तक सब ठीक समझना चाहिए। आठ बजे फ़्लाइट पकड़ने के लिए पाँच बजे निकलना पड़ा। श्रीनगर विमानतल पर सघन चौकसी और सूक्ष्म जाँच परीक्षण से गुजरना पड़ा। गो-एयर की सेवा का स्तर ठीक नहीं है। हमेशा अफ़रातफ़री में काम होता है। विमान श्रीनगर से अमृतसर-दिल्ली होकर मुंबई जाना था। श्रीनगर से अमृतसर की सवारियाँ बहुत थीं। लगभग पूरा विमान ख़ाली हो गया। जबसे कश्मीर से धारा 370 हटी है। तब से पंजाब के सिक्ख कश्मीर में प्रॉपर्टी ख़रीदने लगे हैं। उन्होंने बताया अभी सस्ती मिल रही हैं। भविष्य में निजी क्षेत्र के अस्पताल और कारोबारी आएँगे तब महंगाई चरम पर पहुँचेगी। उस समय बेंच कर कमाई कर लेंगे। आज धर्मशाला के लिए टैक्सी से निकलना है। अमृतसर में विमान के उतरने के पहले ही अमृतसर के टैक्सी चालक का फ़ोन आ गया। संदीप सिंह टैक्सी नम्बर PB 01 B 4742 लेकर गेट पर खड़े मिले। उन्हें सीधा धर्मशाला जाना था। हमारे कहने पर स्वर्ण मंदिर दर्शन करने का कार्यक्रम बन गया।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

*≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ काव्य धारा #२५४ ☆ कविता – आत्मचिंतन से विमुख ये आज का संसार… ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

(आज प्रस्तुत है गुरुवर स्व  प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  द्वारा रचित – “कविता  – पंद्रह अगस्त-स्वतंत्रता दिवस। हमारे प्रबुद्ध पाठकगण स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी  काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।) 

☆ काव्य धारा # २५४

☆ आत्मचिंतन से विमुख ये आज का संसार…  स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

मै कौन हूं आया कहां से और है जाना कहाँ?

इन सरल प्रश्नों के उत्तर कठिन है पाना यहां ।

 आदमी उलझा है बहुत जाति  के व्यवहार में

लाभ-हानि की जोड़-बाकी में फँसा बाजार में ।

 *

 है कहाँ सुधी आप की, मन में भरी है कामना

स्नेह और सद्भाव कम है द्वेष की है भावना ।

 *

 दृष्टि ओछी आज की है कल की न परवाह है

व्यर्थ ही अभिमान है सुनता न कोई सलाह है।

 चाह उसकी सदा होती स्वार्थ औ सम्मान की

है कहाँ अवकाश इतना सोचे आत्म ज्ञान की ।

 *

 खुद से शायद कम है उसको धन के ज्यादा प्यार है

इसी से आत्म अध्ययन को न कोई तैयार है।

 *

ध्यान मन में आत्म सुख है और निज परिवार है

आत्मचिन्तन से विमुख  आजकल संसार है।

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

साभार – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

ए २३३ , ओल्ड मीनाल रेजीडेंसी  भोपाल ४६२०२३

मो. 9425484452

vivek1959@yahoo.co.in

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # १८ – कविता – इस दौर के… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर ☆

डॉ.राजेश ठाकुर

( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का  मंतव्य उनके ही शब्दों में –पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी  समसामयिक विषय पर एक विचारणीय रचना “इस दौर के“.)  

? साप्ताहिक स्तम्भ ☆ नेता चरित मानस # १८ ?

? कविता – इस दौर के… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर  ? ?

?

पानी  पीकर  स्वर्ग सिधारो अमृतकाल के दौर में

गुरूघण्टाल बजा रये घण्टा,स्वच्छ शहर इन्दौर में

*

घूँट-घूँट की क़ीमत हमने दो-दो लाख चुकायी है

मातम की आवाज़  दब  गई ,  हर्ज़ाने के शोर में

*

साफ-सफाई में नंबर वन,उनकी इस गारण्टी को

देखो – देखो  लील  गई , लापरवाही एक कौर में 

*

सीवर का फीवर ले दूषित पानी घर-घर पहुँच रहा

चुल्लू  भर  पानी  भी  पहुँचे , भ्रष्ट ठिकाने-ठौर में

*

तीन – तीन इंज़न वाली ,गाड़ी की है रफ़्तार ग़ज़ब

पानी  से  पानी  टकराया  , पानी    मरा हिलोर में

*

गौर  से  देखो  तो  पाओगे  आस्तीन  में साँप पले,

छुपे  बबूलों  के  काँटे हैं , आज‌  आम   के बौर में

*

चुप रहना ‘राजेश’ मुनासिब,व्यर्थ झमेला क्यों करना

ठनी बहस जबसे सफाई पर,मीडिया औ महापौर में

© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर

शासकीय कॉलेज़ केवलारी

संपर्क — ग्राम -धतूरा, पोस्ट – जामगाँव, तहसील -नैनपुर, जिला -मण्डला (म.प्र.) मोबा. 9424316071

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ “श्री हंस” साहित्य # १९१ ☆ मुक्तक – ।। नूतन नवीन वर्ष संदेश देता कुछ नया करने का ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

श्री एस के कपूर “श्री हंस”

 

☆ “श्री हंस” साहित्य # १९१ ☆

☆ मुक्तक।। नूतन नवीन वर्ष संदेश देता कुछ नया करने का ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

=1=

किसी की हार किसी की जीत होती है।

कुछ दोस्तों की जगह पाती नए मीत है।।

नई बात नया अंदाज  रखो नए साल में।

भरो मन प्रेम से जो रहे  न बिन प्रीत है।।

=2=

नववर्ष खत्म न हो ये तो जीवन गीत है।

प्रेम की धुन बनाओ   जीवन संगीत है।।

नव संकल्प का आगाज  हो नए साल में।

चलना साथ समय के यही   सही रीत है।।

=3=

अतीत नहीं भविष्य का दर्पण है नया साल।

नए विचारों नव   उत्साह सा है विशाल।।

जीवन ने दिया एक और मौका नए साल सा।

नववर्ष में सोचना चाहिए कुछ नए ख्याल।।

=4=

उम्र का वर्ष कम  नहीं  अनुभव बढ़ा है।

उत्साह का  पैमाना और  ऊपर चढ़ा है।।

नया साल पैगाम देता कुछ नया करने का।

वो ही जीता मुश्किलों सामने रहता खड़ा है।।

© एस के कपूर “श्री हंस”

बरेली ईमेल – Skkapoor5067@ gmail.com, मोब  – 9897071046, 8218685464

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #३०५ ☆ प्रतिशोध नहीं परिवर्तन… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख प्रतिशोध नहीं परिवर्तन। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # ३०५ ☆

☆ प्रतिशोध नहीं परिवर्तन… ☆

‘ऊंचाई पर पहुँचते हैं वे, जो प्रतिशोध के बजाय परिवर्तन की सोच रखते हैं।’ प्रतिशोध उन्नति के पथ में अवरोधक का कार्य करता है तथा मानसिक उद्वेलन व क्रोध को बढ़ाता है; मन की शांति को मगर की भांति लील जाता है… ऐसे व्यक्ति को कहीं भी कल अथवा चैन नहीं पड़ती। उसका सारा ध्यान विरोधी पक्ष की गतिविधियों पर ही केंद्रित नहीं होता, वह उन्हें नीचा दिखाने के अवसर की तलाश में मग्न रहता है। उसका मन अनावश्यक उधेड़बुन में उलझा रहता है, क्योंकि उसे अपने दोष व अवगुण नज़र नहीं आते और अन्य सब उसे दोषों व बुराइयों की खान नज़र आते हैं। फलत: उसके लिए उन्नति के सभी द्वार बंद हो जाते हैं। उन विषम परिस्थितियों में अनायास सिर उठाए कुकुरमुत्ते, हर दिन सिर उठाए उसे प्रतिद्वंद्वी के रूप में नज़र आते हैं और हर इंसान उसे उपहास अथवा व्यंग्य करता-सा दिखाई पड़ता है।

ऊंचा उठने के लिए पंखों की ज़रूरत पक्षियों को पड़ती है। परंतु मानव जितना विनम्रता से झुकता है; उतना ही ऊपर उठता है। सो! विनम्र व्यक्ति सदैव झुकता है; फूल-फल लगे वृक्षों की डालियों की तरह… और वह सदैव ईर्ष्या-द्वेष व स्व-पर के भाव से मुक्त रहता है। उसे सब मित्र-सम भासते हैं और वह दूसरों में दोष-दर्शन न कर आत्मावलोकन करता है… अपने दोष व गुणों का चिंतन कर वह ख़ुद को बदलने में प्रयासरत रहता है। प्रतिशोध की बजाय परिवर्तन की सोच रखने वाला व्यक्ति सदैव उन्नति के अंतिम शिखर पर पहुंचता है। परंतु इसके लिए आवश्यकता है– अपनी सोच व रुचि बदलने की; नकारात्मकता से मुक्ति पाने की; स्नेह, प्रेम व सौहार्द के दैवीय गुणों को जीवन में धारण करने की; प्राणी-मात्र के हित की कामना करने की; अहं को कोटि शत्रुओं-सम त्यागने की; विनम्रता को जीवन में धारण करने की; संग्रह की प्रवृत्ति को त्याग परमार्थ व परोपकार को अपनाने की; सबके प्रति दया, करुणा और सहानुभूति भाव जाग्रत करने की। यदि मानव उपरोक्त दुष्प्रवृत्तियों को त्याग, सात्विक वृत्तियों को जीवन में धारण कर लेता है, तो संसार की कोई शक्ति उसे पथ-विचलित व परास्त नहीं कर सकती।

इंसान, इंसान को धोखा नहीं देता, बल्कि उम्मीदें धोखा देती हैं; जो वह दूसरों से करता है। इससे  संदेश मिलता है कि हमें दूसरों से उम्मीद नहीं रखनी चाहिए, क्योंकि इंसान ही नहीं, हमारी अपेक्षाएं व आकांक्षाएं ही हमें धोखा देतीं हैं, जो इंसान दूसरों से करता है। वैसे यह कहावत भी प्रसिद्ध है कि ‘पैसा उधार दीजिए; आपका पक्का दोस्त भी आपका कट्टर निंदक अर्थात् दुश्मन बन जाएगा।’ सो! उधार देने के पश्चात् भूल जाइए, क्योंकि वह पैसा लौट कर कभी भी नहीं आने वाला है। यदि आप वापसी की उम्मीद रखते हैं, तो यह आपकी ग़लती ही नहीं, मूर्खता है। जिस प्रकार दुनिया से जाने वाले लौट कर नहीं आते; वही स्थिति ऋण के रूप में दिये गये धन की है। यदि वह लौट कर आता भी है, तो वह आपके सबसे प्रिय मित्र भी शत्रु के रूप में सीना ताने खड़ा दिखाई पड़ता है। सो! प्रतिशोध की भावना को त्याग, अपनी सोच व विचारों को बदलें– जैसे एक हाथ से दिए गए दान की खबर, दूसरे हाथ को कदापि नहीं लगनी चाहिए। उसी प्रकार उधार देने के पश्चात् उसे भुला देने में ही सबका मंगल है। सो! जो इंसान अपने हित के बारे में ही नहीं सोचता; वह दूसरों के लिए क्या ख़ाक सोचेगा?

समय परिवर्तनशील है और प्रकृति भी पल-पल रंग बदलती है। मौसम भी यथा-समय बदलते रहते हैं। सो! मानव को श्रेष्ठ संबंधों को कायम रखने के लिए स्वयं को बदलना होगा। जैसे अगली सांस लेने के लिए मानव को पहली सांस को छोड़ना पड़ता है; उसी प्रकार आवश्यकता से अधिक संग्रह करना भी मानव के लिए कष्टकारी

होता है। सो! अपनी ‘इच्छाओं पर अंकुश लगाएं और तनाव को दूर भगाएं…दूसरों से उम्मीद मत रखें, क्योंकि वह तनाव का कारण होती हैं।’ महात्मा बुद्ध की यह उक्ति अत्यंत सार्थक है कि ‘आवश्यकता से अधिक सोचना, संचय करना व सेवन करना– दु:ख और अप्रसन्नता का कारण है, जो हमें सोचने पर विवश करता है कि मानव को व्यर्थ के चिंतन से दूर रहना चाहिए। परंतु यह तभी संभव है, जब वह आत्मचिंतन करता है और दुनियादारी व दोस्तों की भीड़ से दूरी बनाकर रखता है।

वास्तव में दूसरों से अपेक्षा करना हमें अंध-कूप में धकेल देता है, जिससे मानव चाह कर भी बाहर निकल नहीं पाता। वह आजीवन ‘तेरी-मेरी’ में उलझा रहता है तथा ‘लोग क्या कहेंगे’–यह सोचकर अपने हंसते-खेलते जीवन को अग्नि में झोंक देता है। यदि इच्छाएं पूरी नहीं होती, तो क्रोध बढ़ता है और पूरी होती हैं तो लोभ। सो! उसके लिए हर स्थिति में धैर्य बनाए रखना अपेक्षित है। ‘इच्छाओं को हृदय में अंकुरित मत होने दें, अन्यथा आपके जीवन की खुशियों को ग्रहण लग जाएगा और आप क्रोध व लोभ के भंवर से कभी मुक्त नहीं हो पाएंगे। कठिनाई की  स्थिति में केवल आत्मविश्वास ही आपका साथ देता है, इसलिए सदैव उसका दामन थामे रखिए। ‘तुलना के खेल में स्वयं को मत झोंकिए, क्योंकि जहां इसकी शुरुआत होती है, वहां अपनत्व व आनंद समाप्त हो जाता है और कोसों दूर चला जाता है।’ इसलिए जो मिला है, उससे संतोष कीजिए। स्पर्द्धा भाव रखिए, ईर्ष्या भाव नहीं। ख़ुद को बदलिए, क्योंकि जिसने संसार को बदलने की कोशिश की, वह हार गया और जिसने ख़ुद को बदल लिया, वह जीत गया। दूसरों से उम्मीद रखने के भाव का त्याग करना ही श्रेयस्कर है। सो! उस राह को त्याग दीजिए, जो कांटों से भरी है, क्योंकि दुनिया भर के कांटों को चुनना व दु:खों को मिटाना संभव नहीं। इसलिए उस विचार को समूल नष्ट करने में सबका कल्याण है। इसके साथ ही बीती बातों को भुला देना कारग़र है, क्योंकि गुज़रा हुआ समय कभी लौटकर नहीं आता। इसलिए वर्तमान में जीना सीखिए। अतीत अनुभव है। उससे शिक्षा लीजिए तथा उन ग़लतियों को वर्तमान में मत दोहराएं, अन्यथा आपके भविष्य का अंधकारमय होना निश्चित है।

वैसे तो आजकल लोग अपने सिवाय किसी के बारे में सोचते ही नहीं, क्योंकि वे अपने अहं में इस क़दर मदमस्त रहते हैं कि उन्हें दूसरों का अस्तित्व नगण्य प्रतीत होती है। अब्दुल कलाम जी के शब्दों में ‘यदि आप किसी से सच्चे संबंध बनाए रखना चाहते हैं, तो आप उसके बारे में जो जानते हैं; उस पर विश्वास रखें… न कि जो उसके बारे में सुना है’…  यह कथन कोटिश: सत्य है। आंखों-देखी पर सदैव विश्वास करें, कानों-सुनी पर नहीं, क्योंकि लोगों का काम तो होता है कहना व आलोचना करना; संबंधों में कटुता उत्पन्न करने के लिए इल्ज़ाम लगाना; भला-बुरा कहना व अकारण दोषारोपण करना। इसलिए मानव को व्यर्थ की बातों में समय नष्ट न करने, बाह्य आकर्षणों व ऐसे लोगों से सचेत रहने की सीख दी गयी है, क्योंकि ‘बाहर रिश्तों का मेला है/ भीतर हर शख्स अकेला है/ यही ज़िंदगी का झमेला है।’ इसलिए ज़रा संभल कर चलें, क्योंकि तारीफ़ के पुल के नीचे सदैव मतलब की नदी बहती है अर्थात् यह दुनिया पल-पल गिरगिट की भांति रंग बदलती है। लोग आपके सामने तो प्रशंसा के पुल बांधते हैं, परंतु पीछे से फब्तियां कसते हैं; भरपूर निंदा करते हैं और पीठ में छुरा घोंपने से तनिक भी गुरेज़ नहीं करते।

‘इसलिए सच्चे दोस्तों को ढूंढना/ बहुत मुश्किल होता है/ छोड़ना और भी मुश्किल/ और भूल जाना नामुमक़िन।’ सो! मित्रों के प्रति शंका भाव कभी मत रखिए, क्योंकि वे सदैव तुम्हारा हित चाहते हैं। आपको गिरता हुआ देख, आगे बढ़ कर थाम लेते हैं। वास्तव में सच्चा दोस्त वही है, जिससे बात करने में खुशी दोगुनी व दु:ख आधा हो जाए…केवल वो ही अपना है, शेष तो बस दुनिया है अर्थात् दोस्तों पर शक़ करने से बेहतर है… ‘वक्त पर छोड़ दीजिए/ कुछ उलझनों के हल/ बेशक जवाब देर से मिलेंगे/ मगर लाजवाब मिलेंगे।’ समय अपनी गति से चलता है और समय के साथ मुखौटों के पीछे छिपे लोगों का असली चेहरा उजागर अवश्य हो जाता है। सो! यह कथन कोटिश: सत्य है कि ख़ुदा की अदालत में देर है, अंधेर नहीं। अपने विश्वास को डगमगाने मत दें और निराशा का दामन कभी मत थामें। इसलिए ‘यदि सपने सच न हों/ तो रास्ते बदलो/ मुक़ाम नहीं/ पेड़ हमेशा पत्तियां बदलते हैं/ जड़ नहीं।’ सो! लोगों की बातों पर विश्वास न करें, क्योंकि आजकल लोग समझते कम और समझाते ज़्यादा हैं। तभी तो मामले सुलझते कम, उलझते ज़यादा हैं। दुनिया में कोई भी दूसरे को उन्नति करते देख प्रसन्न नहीं होता। सो! वे उस सीढ़ी को खींचने में अपनी पूरी ऊर्जा लगा देते हैं तथा उसे सही राह दर्शाने की मंगल कामना नहीं करते।

इसलिए मानव को अहंनिष्ठ व स्वार्थी लोगों से सचेत व सावधान रहने का संदेश देते हुए कहा गया है, कि ‘घमंड मत कर ऐ!दोस्त!/  सुना ही होगा/ अंगारे राख ही बनते हैं’…जीवन को समझने से पहले मन को समझना आवश्यक है, क्योंकि जीवन और कुछ नहीं, हमारी सोच का साकार रूप है…’जैसी सोच, वैसी क़ायनात और वैसा ही जीवन।’ सो! मानव को प्रतिशोध के भाव को जीवन में दस्तक देने की कभी भी अनुमति नहीं प्रदान करनी चाहिए, क्योंकि आत्म-परिवर्तन को अपनाना श्रेयस्कर है। सो! मानव को अपनी सोच, अपना व्यवहार, अपना दृष्टिकोण, अपना नज़रिया बदलना चाहिए, क्योंकि नज़र का इलाज तो दुनिया में है, नज़रिए का नहीं। ‘नज़र बदलो, नज़ारे बदल जाएंगे। नज़रिया बदलो/ दुनिया के लोग ही नहीं/ वक्त के धारे भी बदल जाएंगे।

●●●●

© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रचना संसार #७७ – नवगीत – प्रीति गगरिया… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆

सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीत – प्रीति गगरिया

? रचना संसार # ७७ – गीत – प्रीति गगरिया…  ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ? ?

प्रीति गगरिया छलक रही है,

भटक रहा  उर बंजारा।

चातक मन निष्प्राण हुआ है,

मरुथल है जीवन सारा।।

*

प्रीत  घरौंदा टूट गया है,

करें चूड़ियाँ हैं क्रंदन।

मौन पायलों की रुनझुन है,

भूल गया है उर स्पंदन ।।

कैद पड़ी पिंजरे में मैना,

दूर करो अब अँधियारा।

*

अवसादों में प्रीत घिरी अब,

सहमी तो शहनाई है।

कुंठित हुई रागिनी सरगम,

प्रेम -वलय मुरझाई है।।

अवगुंठन में छिपा चाँद है,

पट खोलो हो उजियारा।

*

जर्जर ये जीवन की नैया,

हिचकोले पल -पल खाती।

बहती हैं विपरीत हवाएं,

भूले प्रिय लिखना पाती।।

गूँगी बहरी दसों दिशाएँ,

बहे आँसुओं की धारा।

© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)

संपर्क –1308 कृष्णा हाइट्स, ग्वारीघाट रोड़, जबलपुर (म:प्र:) पिन – 482008 मो नं – 9424669722, वाट्सएप – 7974160268

ई मेल नं- meenabhatt18547@gmail.com, mbhatt.judge@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares