हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ काव्य धारा #२७६ ☆ आलेख – दीर्घ जीवी साहित्य रचा जावे तो बेहतर… ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

(आज प्रस्तुत है गुरुवर स्व  प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  द्वारा लिखित – “आलेख   – दीर्घ जीवी साहित्य रचा जावे तो बेहतर…” । हमारे प्रबुद्ध पाठकगण स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी  काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।) 

☆ काव्य धारा # २७६ ☆

☆ दीर्घ जीवी साहित्य रचा जावे तो बेहतर…  ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

(आज स्मृतिशेष प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी की प्रथम पुण्य तिथि पर ई-अभिव्यक्ति परिवार की ओर से सादर नमन) 

☆

अपनी प्रशंसा अच्छी नही मानी गयी है. यही कारण है कि महाकवि कालिदास का भी कोई वास्तविक परिचय उपलब्ध नहीं है. जहां तक मेरे संक्षिप्त परिचय की बात है, मेरा जन्म १९२७ में हुआ. मैने आजादी से पहले का भारत देखा है, स्वाधीनता आंदोलन में किसी न किसी तरह भागीदारी की है. मण्डला के अमर शहीद स्व उदय चंद जैन न केवल मेरे सहपाठी थे वरन स्कूल में मेरे साथ एक ही बैंच पर बैठा करते थे. आजादी के बाद मैने देखा है कि जिस भारत में एक सुई भी मेड इन इंगलैंड आती थी वहां से आज चंद्रमा तक राकेट जा रहे हैं. मैने लालटेन युग जिया है, और आज मेरे नाती, पोते दुनिया में न्यूयार्क, दुबई, हांगकांग में हैं, मैं उनके साथ विदेशों में अनेक जगह हो आया हूं. शिक्षा जगत ने मुझे यह सुअवसर दिये कि मैने पीढ़ियो का निर्माण किया है. साहित्य जगत ने मुझे सेवानिवृति के बाद भी आज तक लगातार कुछ न कुछ नया रचने, लिखने अध्ययन करने की प्रेरणा दी है.

बाल्यकाल में ही हम मित्रों ने नवयुग पुस्तकालय की स्थापना की थी. मण्डला के पढ़े लिखे परिवार होने के कारण मेरे पिताजी के पास लोग जिले में स्वातंत्र्य साहित्य के लिये संपर्क करते थे. मुझे अध्ययन के प्रति बचपन से ही लगाव था. संस्कृत साहित्य में मुझे आनन्द आता था. बस इस तरह साहित्य से लगाव बढ़ता गया.

स्कूल के दिनो में मैं हाकी बहुत अच्छी खेला करता था. नये नये स्थान घूमना, किताबें पढ़ना, गार्डनिंग मेरी साहित्येतर रुचियां रही हैं.

छंद बद्ध काव्य मेरी सबसे पसंदीदा विधा है. चांद व सरस्वती में १९४६ में मेरी कवितायें छपी थीं. आज भी कविता लिख कर मुझे नई उर्जा मिलती है. संस्कृत नई पीढ़ी नही पढ़ रही हे, जबकि गीता जैसे वैश्विक ग्रंथ संस्कृत में ही हैं, इसलिये मैंने हिन्दी में प्रायः प्रमुख संस्कृत ग्रंथो के अनुवाद करने की ठानी, और इस तरह काव्य अनुवाद मेरी विधा बन गई. महाकवि कालिदास का मेघदूतम विश्व का अप्रतिम श्रंगार रस का काव्य है, इसमें विरह की वेदना और श्रंगार का अद्भुत सौंदर्य भी है, मैंने इसका श्लोकशः हिन्दी काव्य अनुवाद किया है, मुझे साहित्य से सुकून मिला. आत्म केंद्रित रहकर मैं साहित्य सेवा में आजीवन लगा रहा हूं. सेवानिवृति के बाद मेरी पाण्डुलिपियों को मेरे पुत्र विवेक रंजन ने पुस्तको के रूप में छपवाया.

मेरा विवाह लखनऊ में हुआ, मेरी पत्नी श्रीमती दयावती श्रीवास्तव की रुचियां भी लिखने पढ़ने की थीं. हम दोनो ने साथ साथ पढ़कर एम ए किया. साथ ही शिक्षा जगत में नौकरी की. उनकी भी पुस्तकें छपी. वे मुझे बराबर नया लिखने के लिये उत्साहित करती थी। मेरी यह इच्छाशक्ति कि मुझे आगे पढ़ना है, मेरी उन्नति में हमेशा सहायक रही. सामान्यतः विवाह के बाद मेरी पीढ़ी के लोग अपनी नौकरी से संतुष्ट हो जाते थे, पर हम निरंतर आगे बढ़ने के यत्न करते रहे. यही कारण है कि हम समाज को सुशिक्षित संस्कारी बच्चे दे पाये, और स्वयं अपनी शिक्षा से साहित्य व समाज में अपना स्थान बनाते बढ़ते गया। आत्म सुखाय तो हर कवि लिखता ही है. रचना प्रक्रिया प्रसव वेदना होती है, जिसमें विचारो की परिपक्वता, और उसकी समुचित विधा में अभिव्यक्ति शमिल होती है, किन्तु रचना का अंतिम उद्देश्य जनहित ही होता है. समाज में मेरी पहचान शिक्षाविद व साहित्यकार के रूप में ही है. बिना व्यक्तिगत रूप से मिले भी दुनिया के अनेक हिस्सो के पाठक मेरी रचनाओ के जरिये मुझे पसंद करते हैं, तथा दूरभाष, पत्र आदि से संपर्क व प्रशंसा करते हैं.

साहित्य ने अभिव्यक्ति के माध्यम बदले हैं. आज डेली सोप, फिल्म, टेलीविजन, आ गये हैं पर प्रकाशित पुस्तको का महत्व यथावत निर्विवाद बना हुआ है. मुझे तो बिना किताब पढ़े नींद नही आती. पुस्तकालय संस्कृति की पुनर्स्थापना मुझे आवश्यक लगती है. पाश्चात्य देशो में बुक रीडिंग हाबी के रूप में बनी हुई है, जैसे जैसे हमारे देश की संपन्नता बढ़ेगी हमारे यहां भी पुस्तक संस्कृती फिर से लोकप्रिय होगी ऐसा मेरा विश्वास है.

नये माध्यमो जैसे फेसबुक आदि ने नई पीढ़ी को विचार आते ही लिख डालने की आजादी दी है पर संपादन का महत्व होता है. युवा रचनाकारो को अपना लिखा बारम्बार पढ़कर सुधारकर तब रचना रूप में प्रस्तुत करने की आवश्यकता समझ आती है. यह देखकर मुझे प्रसन्नता होती है कि साहित्य अब केवल हिन्दी के शोधार्थियो की बपौती नही रह गया है. कितने ही इंजीनियर, डाक्टर, प्रोफेशनल्स अच्छे साहित्यकार बनकर उभर रहे हैं. स्पष्ट है कि साहित्य मनोभावों की अभिव्यक्ति का संसाधन है. और यह मनोवृत्ति प्रकृति दत्त होती है. भाषाई ज्ञान उसे संप्रेषण की शक्ति देता है. नये कवियो से मेरा यही आग्रह है कि साहित्य के सौंदर्य शास्त्र की समझ विकसित करें और परिपक्व लेखन करें तो वह दीर्घ जीवी साहित्य रच सकेंगे.

☆

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

साभार – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

ए २३३ , ओल्ड मीनाल रेजीडेंसी  भोपाल ४६२०२३

मो. 9425484452

vivek1959@yahoo.co.in

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # ६१ – लघुकथा – नेक इन्सान ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ६१ ☆

☆ लघुकथा ☆ ~ नेक इन्सान ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

☆

आज सुबह से ही काफी बरसात हो रही थी। वैसे तो नन्हा छोटू रुई वाली मिठाई की स्टिक लेकर सुबह ही घर से निकल गया था, लेकिन आज ग्राहक नदारत थे। सुबह से बरसात शुरू हुई तो बंद होने का नाम नहीं ले रही थी। मनोहरलाल के समोसे वाली दुकान के आगे लगे टिन सेड में रखे बेंच का किनारा पकड़े छोटू बरसात के रुकने का इंतजार करता रहा। बरसात बिल्कुल ही बंद होने का नाम ही नहीं ले रही थी। सुबह से घर से निकले छोटू को बड़ी तेज भूख लगी थी, लेकिन पाकेट में एक भी रुपया नही था कि कुछ खरीद कर खा ले। पॉकेट में पैसा कहां से होता, उसकी तो अब तक एक भी मिठाई नहीं बिकी थी।

मनोहरलाल की दुकान पर बरसात के मौसम में चटक समोसे खाने वालों की लाइन लगी हुई थी।

अबे, यहां क्या बैठा है, हट किनारे, … एक साहब ने उसे डांटे हुए कहा।

बेचारा छोटू क्या ही जवाब देता। उसने थोड़ा सा सरकने में ही भलाई समझी। इसी बीच कार पर सवार तीन चार लोग मनोहरलाल की दुकान पर समोसे खाने के लिए उतरे। उन्हें देखते हैं, मनोहरलाल उनकी आव भगत में लग गया। उसकी सक्रियता को देखकर ऐसा लग रहा था कि ये लोग जरूर कोई विशेष लोग होंगे। उनके बैठने का इंतजाम मनोहरलाल को करना था सो मनोहरलाल सो उसने कड़े तेवर दिखाते हुए छोटू को डांटते हुए कहा..

अबे, बार-बार कह रहा हूँ कि भाग यहां से, यह नालायक जाने का नाम नही ले रहा है..

कैसे जाऊँ चाचा.. इतनी तेज बरसात हो रही है भीग जाऊँगा, मेरी मिठाईयाँ भीग जाएगीं।

तेरी मिठाईयाँ भींग जाएगीं, इससे मुझे क्या लेना देना, .. हता है कि नही। चाचा यह मेरी भी तो दुकान थी.. छोटू के इतना कहते ही मनोहरलाल ने उसे एक तगड़ा सा थप्पड़ नन्हें छोटू के गाल पर जड़ दिया।

नन्हा छोटू तिलमिला कर बेंच से नीचे गिर गया। उसके कपड़े कीचड़ में सन उठे। उसकी रुई वाली मिठाई कीचड में गिर कर पिचक गयी और ख़राब हो गयी। उस छोटे बच्चे की छोटी सी पूँजी बर्बाद हो गयी।

जमीन पर लुढ़का छोटू कभी खुद को देखता, तो कभी अपनी बर्बाद हो चुकी, रुई वाली मिठाई को देखता। उसने आरत दृष्टि से मनोहरलाल की ओर देखा। उसकी आंखों से आंसूओं की धारा फूट पड़ी। वह बिल्कुल बेचारा और विवश था। वह कर ही क्या सकता था।

आइये बाबूजी, आपलोग लोग बैठिए, ऐसा बोलते हुए मनोहरलाल ने कार से उतरे चारों लोगों को बेंच पर बैठने का अनुरोध किया। जगह की दिक्कत जैसी की तैसी थी। ग्राहकों से सारे बेंच भरे हुए थे।

मनोहरलाल की इस गंदी सी हरकत को देखकर कार से उतरे भद्र से दिखते सज्जन का चेहरा क्रोध से लाल हो उठा . अरे मनोहरलाल ! तुमसे इस लड़के को मारा क्यों? यह लड़का किसका है?… शायद उस सज्जन ने बच्चे की यह बात सुन ली थी कि “चाचा यह मेरी भी दुकान तो थी।”

 मनोहरलाल अब क्या ही जवाब देता, वह उस व्यक्ति का मुँह देखने लगा। थोड़ा हिचकते हुए बोला, साहब ! ये महेश का लड़का है। सभी एक दूसरे का मुँह देखने लगे।

अरे मनोहरलाल..महेश कहाँ है? क्या वह दुकान पर बिल्कुल नहीं आता ? उसको देखे तो मुझे महीना हो गए। तूँ उसकी दुकान पर काम करता था, मैं यह समझ रहा था कि महेश तुम पर बहुत विश्वास करता है, इसलिए सारी दुकान तुम्हारी जिम्मेदारी पर छोड़ रखा है।

उस सज्जन ने जब दुबारा डांटते हुए मनोहरलाल से पूछा तो मनोहरलाल ने सारी बातें उस नेक इंसान को बता दी ..

बाबूजी, महेश अब इस दुनिया में नहीं है। उसके गुजरे लगभग छः महीने से ऊपर हो गए। यह लड़का महेश का ही लड़का है।

महेश का लड़का है !..अरे महेश की पत्नी भी तो बरसों पहले गुजर गई थी। और उसका यह लड़का इस हाल में। अब तो यह बिल्कुल अकेला और अनाथ हो गया होगा।

अबे नालायक तुम अपने मालिक से इस तरह की वफादारी निभा रहे हो। उसके बेटे की जिम्मेदारी निभाने की जगह, तुम इस छोटे लड़के से ऐसा व्यवहार कर रहे हो, उसको इस तरह से पीट रहे हो।

अभी के अभी खाली कर दे इस गुमटी को, नहीं तो तुम्हारी हड्डी पसली तोड़ दूँगा। बिल्कुल अभी के दफा हो जा यहाँ से, नहीं तो पुलिस बुलाकर तुम्हें बंद करता हूँ। मैंने यह दुकान ( बड़ी सी गुमटी ) तुम्हें नहीं दी थी, मैंने यह दुकान उस महेश को दी थी जो की एक नेक और सज्जन इंसान था। मेरे बचपन का दोस्त था।

उस सज्जन ने छोटे छोटू के दोनों हाथों को पड़कर उठाया और उसे अपने बाहों में समेट लिया। उनके कपड़े गंदे हो गए लेकिन उनको इससे कुछ लेना देना नहीं था। इस वक्त तो उसके बचपन के दोस्त महेश का बेटा, छोटू उसकी बाहों में था। छोटू और वह सज्जन दोनों ही रो रहे थे। धूर्त मनोहरलाल दुकान छोड़कर फरार हो चुका था। दुकान में बैठे अन्य ग्राहक इस नेकइंसान के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त कर रहे थे।

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

कवि लेखक एवं समीक्षक

लखनऊ, उप्र, (भारत )

 दिनांक 23 जुलाई 2026

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – पग-पग नर्मदा यात्रा – भाग – ४२ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “, गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर।)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – पग-पग नर्मदा यात्रा – भाग- ४२ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

7.पग-पग नर्मदा यात्रा

नर्मदा परिक्रमा:दूसरा चरण

साँकल  से घुग़री 10 नवम्बर 2019

जबलपुर जिले की सीमा तक सतपुड़ा नर्मदा का बायाँ हाथ पकड़े हुए चलता है धरतीकछार गाँव के नज़दीक सनेर नदी संगम पर सतपुड़ा नर्मदा का हाथ छोड़कर आज़ाद कर देता है। झाँसीघाट से साँकल घाट तक नर्मदा स्वतंत्र प्रवाहित होती है फिर दमोह जिले से विन्ध्याचल आकर नर्मदा का दाहिना हाथ हीरापुर रेंज के रूप में बढ़कर थाम लेता है। यदि विन्ध्याचल महाशय रास्ते में न आते तो नर्मदा रायसेन जिले से होती हुई भोपाल जिले निकल जाती या बेतवा से  मिलकर यमुना से भेंट करके गंगा से गले मिल गंगासागर में एकाकार हो जाती। साँकल से अविनाश बेहतरीन फ़ोटोग्राफ़ी के लिए अपना केमरा सभी के लिए भोजन, दवाई और विभिन्न खाद्य वस्तुएँ और हमारा चार्जर, चड्डी और बानियान लेकर जुड़ गए। 

अब हम लोग बरगी बाँध से आती नहर के किनारे-किनारे चलते हुए गुड़वारा पहुँचे। गाँव का नाम गुड़वारा बिलकुल सही है क्योंकि वहीं से करेली तहसील शुरू होती है चारों तरफ़ गन्ने के खेतों का सिलसिला पूरे इलाक़े में नज़र आता है। गुड़वारा के पहले एक किसान कैलाश दांगी किसानी का काम करते मिले उन्होंने हमें चाय पीने का निवेदन किया हम लोगों ने तत्काल उनके निवेदन को स्वीकार कर लिया उनके निवास स्थान पर उनके साथ चाय पीने के लिए चल दिए। उनका लड़का आईपीएस परीक्षा की तैयारी इंदौर में रहकर कर रहा है, वह गांव आया था उसके साथ उनका एक दोस्त भी आया हुआ था तीन-चार दिन पहले उनका दोस्त नर्मदा में स्नान के लिए उनके साथ गया और वह गहरे पानी में डूबने से उसकी मृत्यु हो गई इसलिए इस परिवार के सभी लोग दुःखी थे। उनके घर पहुँचकर चाय ग्रहण की, बरंडा में एक बड़ी गागर में इलेक्ट्रिक मथनी से मक्खन निकाला जा रहा था उसमें से निकला मही दो लीटर की बोतल में भरवा कर चल पड़े। जो दोपहर की बाटी-दाल के बाद गटक लिया। गुड़वारा से उतरकर नीचे नर्मदा घाट पर पहुँच स्नान करके साँकल से जुड़े नए साथी अविनाश दवे के द्वारा लाईं मैथीपूड़ी आँवला आचार के साथ खाईं और चल पड़े अगली मंज़िल की ओर, रास्ते में बुधघाट में एक किलोमीटर ऊँची पहाड़ी चढ़कर एक आश्रम पहुँचे वहाँ पड़ी कुर्सियों पर बैठ गए। एक सेवक ने पानी पिलाया। थोड़ी देर में साधु लिबास में शैतान नज़र आया, उसने आते ही घुड़कियाँ देनी शुरू कीं, और साफ़तौर से कह दिया कि न आप यहाँ नहा सकते हैं और ना भोजन परसादी की कोई व्यवस्था है। हम लोग नीचे उतर कर अगले पड़ाव की खोज में चल दिए। शाम को पाँच बजे घुग़री पहुँचे। जिस घाट रुकने की सोचते हैं वहीं घाट पर दो-तीन कुत्ते स्वागत करते हैं, फिर वे आपके साथ आश्रम तक आकर वहीं अड्डा जमा लेते हैं मानो हम उनके पाहूँने हों। दूसरे दिन सुबह थोड़ी दूर विदाई देने साथ आते हैं। साधु लिबास में शैतान से कुत्ते समझदार हैं, बेचारे स्वागत-विदाई में पूँछ हिलाते हैं।

घुग़री में एक परकम्मा कर चुके बम-बम बाबा के नाम से आश्रम चलाते हैं। वे गाँव से दान लेकर भोजन का सामान देते हैं। उन्हें मेहनताना पर भोजन बनाने की बात कही तो वे आटा-दाल एक गौंड़ के घर दे आए। आठ बजे भोजन बनकर आया तब ग्रहण किया। आश्रम के सामने चार विशाल बट वृक्ष आश्रम को एक छतरी की तरह ढँके हुए है, वृक्षों के पत्तों से छनकर आती चाँदनी की रोशनी एक अजीब सी रूमानियत पैदा कर रही थी, लिहाज़ा परकम्मा वासियों का प्रेमिल हृदय गीत-ग़ज़ल की लहरियों में गोते खाने लगे।

पिछले बीस-पच्चीस सालों में भारत के गाँवों का जीवन तेज़ी से बदला है। खेतों को बैलों से बखरने  और बैलगाड़ी की जगह ट्रैक्टर और लोडिंग वाहन ने ली है, हरेक किसान के घर एक-दो मोटर साइकिल और समृद्ध किसानों के पास जीप-कार आ गईं हैं। पुरुषों के पहनावे से धोती-क़मीज़ या कुर्ता ग़ायब हो चुके हैं। उनकी जगह जींस टी-शर्ट स्पोर्ट बानियाँन ले चुके हैं। लड़कियाँ जींस टाप पर आ गईं हैं। लड़के-लड़कियाँ आपस में खुले हैं, अब वे आपस में बातचीत करने लगे हैं। सरकारी स्कूल में सह-शिक्षा और मध्याह्न भोजन से खुलापन आया है लेकिन विकृति नहीं आई है इसका कारण घरों का सांस्कृतिक वातावरण और धार्मिक आस्था में पिरोए नैतिक मूल्य है।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

≈ संस्थापक सम्पादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # ४० – कविता – फल धीरज का… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर ☆

डॉ.राजेश ठाकुर

( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का  मंतव्य उनके ही शब्दों में – “पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “फल धीरज का…“.)  

? साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # ४०  ?

? कविता – फल धीरज का… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर  ? ?

?

=1=

दूजों के मामले में, टाँग मत अड़ाइये

पराये माल पे न आँख यूँ गड़ाइये

=2=

दिल है उसका भी,इंसान है वो भी

देख उसको त्यौरियाँ न यूँ चढ़ाइए

=3=

दूजों के मामले में दखल काए को देना

बनिये न ट्रम्प दूजों को न यूँ लड़ाइए

=4=

साँसों की चहलकदमी है जीवन का ये सफ़र

पाना है अगर मंज़िल, मत लडखड़ाइये

=5=

ज़ोरू के आगे ज़ोर से न बोलना कभी

सुविधा ये है कि नींद में बस बड़बड़ाइये

=6=

पूछ-परख ज्ञान की होती है हर तरफ़

जाइये मंचों को शिखर पर चढ़ाइये

=7=

इश्क़ के मकां में मेरे दिल के द्वार पर

नजाकत से कुंडी आप खड़खड़ाइये

=8=

आप हैं नगीना मेरा दिल है अँगूठी

इश्क़ का हसीन एक नग जड़ाइए

=9=

धीरज का फल है मीठा ‘राजेश’आप भी

इत्मीनान रखिये यूँ न हड़बड़ाइये

☆

© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर

शासकीय कॉलेज़ केवलारी

संपर्क — ग्राम -धतूरा, पोस्ट – जामगाँव, तहसील -नैनपुर, जिला -मण्डला (म.प्र.) मोबा. 9424316071

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ “श्री हंस” साहित्य # २१३ ☆ मुक्तक – ।। आज खुद अपने पांव कुल्हाड़ी मार रहा है आदमी ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

श्री एस के कपूर “श्री हंस”

☆ “श्री हंस” साहित्य # २१३ ☆

☆ मुक्तक ।। आज खुद अपने पांव कुल्हाड़ी मार रहा है आदमी ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

☆

=1=

हर पल हर क्षण    बदल  रहा है आदमी।

पाने कोऔर हीऔर मचल रहा है आदमी।।

प्रभु तेरी दुनिया का क्या   रूप हो रहा है।

जाने किस ओर आज चल रहा है आदमी।।

=2=

दया दुआऔर भावना सब गौण हो गए हैं।

धन के समक्ष जैसे सब ही मौन हो गए हैं।।

पैसे की ही बोली भाषा समझते हैं लोगअब।

रिश्ते गहरे वाले जैसे अब कौन हो गए हैं।।

=3=

कमियां ही कमियां आज निकाल रहा आदमी।

दिल में नफरत के बीज बस पाल रहा आदमी।।

प्यार के लिए भी बहुत कम है यह एक जिंदगी।

फिर भी किस रूप में खुद को ढाल रहाआदमी।।

=4=

स्नेह प्रेम भावआज कर तार-तार रहा हैआदमी।

कई-कई मखोटेआज तो उतार रहा है आदमी।।

जाने कैसा भविष्य होगा   हमारे इस संसार का।

अपने ही पांव खुद कुल्हाड़ी मार रहा है आदमी।।

☆

© एस के कपूर “श्री हंस”

बरेली ईमेल – Skkapoor5067@ gmail.com, मोब  – 9897071046, 8218685464

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सविता साहित्य # १२ – हरी भरी वसुंधरा!! ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆

सुश्री सविता खण्डेलवाल ‘भानु’

(लेखन-प्रकाशन – गत 2022 से छंद लेखन, एकल प्रकाशन– कलम के नवांकुर, अनुग्रह नवप्रस्तारित छंद पर लेखन (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), साझा संकलन – तकरीबन 10, द्वादश ज्योतिर्लिंग (लंदन बुक आफ रिकार्ड), अनेकता में एकता (एशिया बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड), छंदावली – (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), महाकाल साहित्य सम्मान से सम्मानित। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता हरी भरी वसुंधरा!!)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सविता साहित्य # १२ ☆

☆ हरी भरी वसुंधरा!! ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆

☆

हमें भली सदा लगे हरी भरी वसुंधरा ।

करे सभी प्रयास ये सुखे नहीं कभी जरा ।।

मृदा बहाव रोकते तने खड़े यहाँ घने ।

बचा रहे जहान को समान देवता बने ।।

*

कटाव वृक्ष का थमे नवीन संपदा बने ।

उमंग में रहे समाज पर्व ये नया मने ।।

लगे मुझे समान नार वृक्ष भी यहांँ कदा ।

करे महान कार्य देख दर्द भी सहे सदा ।।

*

सदैव नेह डोर बाँधती हरेक भावना ।

सजा रही जहान को मिले भले प्रताड़ना ।।

विडम्बना मिटे सभी करो प्रयास ये जरा ।

प्रसन्न नार वृक्ष हो हरी भरी वसुंधरा ।।

☆

© सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु”

झालरापाटन राजस्थान

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक ७९ आणि ८० ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

श्री विश्वास देशपांडे

? इंद्रधनुष्य ?

☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक ७९ आणि ८० ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

श्लोक क्र. ७९ – – 

मना पावना भावना राघवाची ।

धरी अंतरी सोडी चिंता भवाची ।

भवाची जिवा मानवा भूलि ठेली ।

नसे वस्तूची धारणा वेर्थ गेली ।

अर्थ : हे मना श्रीरामांचे स्मरण पवित्र करणारे आहे. त्यांचे स्मरण कायम आपल्या अंतरात म्हणजे म्हणजे मनामध्ये ठेव. संसाराची चिंता सोडून दे. या संसाररूपी मायेची भूल मानवाला पडते. जी गोष्ट अस्तित्वातच नाही, अशा गोष्टीची कास धरणे व्यर्थ आहे.

(पावना – पवित्र, भावना- विश्वास/स्मरण, धरी – धारण कर, भवाची – संसाराची, भूलि – भ्रम, वेर्थ – व्यर्थ)

विवेचन : आधीच्या श्लोकात आपल्याला समर्थांनी देह, संसाराची व्यर्थ चिंता वाहू नका असे सांगितले. या श्लोकात ते आपल्याला हा संसार कसा नश्वर आहे ते सांगत आहेत. आपल्या मनामध्ये नेहमीच या संसाराबद्दल एक आंतरिक ओढ किंवा ममत्व असते. शिक्षण, नोकरी, विवाह, मुलेबाळे, पैसा, जमीनजुमला यातच आपल्या जीवनाचे सार्थक आहे असे आपल्याला वाटते. माणूस आयुष्यभर त्यासाठी धडपडत राहतो. परंतु या संसाराची व्यर्थता त्याला शेवटी लक्षात येते. पण त्यावेळी वेळ निघून गेलेली असते.

राघवाचे स्मरण, त्याच्यावरील दृढ श्रद्धा मनाला पवित्र करणारी आहे. कारण तो पतितांना पावन करणारा आहे. आपल्या अंतरात अनेक बऱ्या वाईट भावना, वासना ठाण मांडून असतात. परंतु भगवंताच्या नामाने वासना शुद्ध होत जाते. म्हणूनच समर्थ म्हणतात की हे मना पवित्र करणाऱ्या राघवाची श्रद्धा अंतर्यामी बाळग. त्यासाठी ‘ धरी अंतरी ‘ हे शब्द समर्थांनी वापरले आहेत. अंतर्यामी काय धारण करायचे?  तर राघवाचा विश्वास. आणि काय सोडायचे?  तर ‘ चिंता भवाची ‘ आपण संसारात असताना एवढे त्यात गुंतलेले असतो, की पुढे माझे कसे होईल, म्हातारपणी मुले मला विचारतील ना?  एक ना दोन अशा अनंत चिंता मन करीत राहते. संसाराची व्यर्थ चिंता करून उपयोग नाही. म्हणूनच ही चिंता टाकून द्यावी असे समर्थ सांगतात.

ही चिंता का टाकून द्यायची?  कारण जी गोष्ट मुळात नाहीच आहे, तिच्याबद्दल चिंता करून काय उपयोग?  मोहमायेमुळे हा संसार आपल्याला खरा वाटतो. त्याची भूल आपल्याला पडते. पण खऱ्या सत्यापासून आपण लांब जातो. वाळवंटातील तहानलेल्या माणसाला मृगजळ दृष्टीस पडते. तिथे आपल्याला नक्कीच पाणी मिळेल या आशेने तो त्याच्या शोधात पुढे पुढे जात राहतो. शेवटी त्याला लक्षात येते की आपल्याला जे पाणी वाटले होते, ते तर केवळ मृगजळ! मृगजळ म्हणजे भ्रम. पाणी नाही हे सत्य. त्याप्रमाणेच हा संसार! खरा वाटतो पण अखेरीस त्याची व्यर्थता लक्षात येते. खरी वस्तू एकच. ती म्हणजे भगवंताचे नाम. ते नाम पवित्र करणारे आहे. सत्याची जाणीव करून देणारे आहे. संसाराची व्यर्थता लक्षात आणून देणारे आहे. म्हणून हे मना, असे पवित्र नाम तू हृदयात धारण कर आणि संसाराची व्यर्थ चिंता सोडून दे. जी गोष्ट मुळात नाहीच तिची चिंता करण्यात काय अर्थ?

तुकाराम महाराज म्हणतात, “हेचि थोर भक्ती आवडते देवा, संकल्पावी माया संसाराची. “ भक्ती करणे म्हणजे जी गोष्ट आपल्याला अत्यंत प्रिय असते, ती परमेश्वराला अर्पण करावी. संसार, मुलेबाळे या गोष्टी आपल्या अत्यंत प्रिय असतात. त्यांच्यावर आपले जीवापाड प्रेम असते. हेच प्रेम भगवंताला अर्पण करावे. आणि भगवंताचे प्रेम अंतर्यामी धारण करावे.

स्वसंवाद :: 

१. ज्या शिक्षण, नोकरी, संपत्ती किंवा नात्यांना मी माझ्या ‘जीवनाचे सार्थक’ मानून बसलो आहे, ते खरंच चिरंतन सत्य आहे की केवळ एक तात्पुरता भ्रम (मृगजळ) आहे?

२. “म्हातारपणी माझे कसे होईल?  मुले मला सांभाळतील ना? ” अशा भविष्यातील ‘भवाच्या’ (संसाराच्या) व्यर्थ चिंतांमध्ये मी माझा आजचा दिवस आणि मनाची शांतता गमावत आहे का?

३. माझ्या अंतर्मनात साचलेला बऱ्या-वाईट वासनांचा कचरा साफ करण्यासाठी मी ‘पतितांना पावन करणाऱ्या’ राघवाच्या नामाचा आश्रय किती वेळा घेतो?

४. तुकाराम महाराजांनी सांगितल्याप्रमाणे, मी प्रपंचातील माझी सर्व आसक्ती आणि प्रेम भगवंताच्या चरणी अर्पण करून ‘निर्वासन’ भक्तीचा अनुभव घ्यायला तयार आहे का?

===== 

श्लोक क्र. ८० – – 

धरा श्रीवरा त्या हरा अंतराते ।

तरा दुस्तरा त्या परा सागराते ।

सरा वीसरा त्या भरा दुर्भराते ।

करा नीकरा त्या खरा मछराते ।।८०।।

अर्थ : हे मना, श्रीमहादेवांच्या अंतर्यामी वसलेल्या सीतापती श्रीरामांना आपल्या हृदयात धारण कर. श्रीरामांना अखंड हृदयी धारण करून पार करण्यास अतिशय कठीण असा संसाररूपी सागर तरून जा. जे कितीही भरले तरी अपूर्णच राहते अशा पोटाला (संसाराला)विसरून जा. मत्सराशी निग्रहपूर्वक झगडून साधुसंतांनी सांगितलेल्या मार्गाने जा.

(श्रीवरा – सीतापती श्रीराम /लक्ष्मीपती विष्णू, हरा अंतराते – महादेवांच्या अंतर्यामी वसलेल्या, दुस्तर – कठीण, परा – मोठा, सरा – अंश/छटा, दुर्भर – भरण्यास अतिशय कठीण, नीकरा – प्रयत्नपूर्वक/हट्टाने, खर – गाढव, मच्छराते – मत्सर)

विवेचन : या श्लोकाची रचना भाषिक दृष्टया फार सुंदर आहे. ‘ र ‘ या अक्षराची पुनरावृत्ती झाल्याने अनुप्रास अलंकार साधला गेला आहे. त्याशिवाय रचनेत सहजता आहे. श्रीवर म्हणजे भगवान विष्णू. श्री म्हणजे लक्ष्मी. राम हाही विष्णूचाच अवतार असल्याने येथे सीतापती राम असा देखील अर्थ घेता येतो. अशा या भगवंताला आपल्या हृदयात प्रत्यक्ष महादेव धारण करतात. त्या भगवंताला आपणही आपल्या हृदयी धारण करावे. श्रीरामांची योग्यता किंवा महती एवढी थोर की प्रत्यक्ष देवाधिदेव महादेव त्यांना आपल्या हृदयात स्थान देतात. त्यांचे ध्यान करतात. त्यामानाने आपण तर सामान्य माणसे! तेव्हा अशा या भगवंताला आपण देखील आपल्या हृदयात स्थान द्यावे.

समर्थ संसाराला संसार सागर म्हणतात. एक वेळ एखादी नदी पोहून पार करणे सोपे पण सागर पार करणे महाकठीण. हनुमंत सागर पार करून लंकेला पोहोचला होता. त्याने हृदयात रामनाम धारण केले होते. रामनाम ही एक अशी नौका आहे की जी आपल्याला हा महाकठीण असलेला भवसागर पार करण्यासाठी साहाय्यभूत ठरते. जो या नौकेत बसला, तो हा भवसागर तरून गेला.

पण हा भवसागर म्हणजे एक मायाजाल आहे. ते भल्याभल्यांना सोडवत नाही. भगवंताची माया अत्यंत प्रबळ आहे. एखाद्या कोळ्याच्या जाळ्यात मासे अडकावेत तसा माणूस या मायेच्या जाळ्यात अडकतो. रामकृष्ण परमहंसांनी याबाबत बोलताना एका ठिकाणी अतिशय सुंदर दाखला दिला आहे. ते म्हणतात जे मासे कोळ्याच्या अवतीभवती असतात, ते जाळ्यात अडकतात. पण जे मासे कोळ्याच्या पायाजवळ असतात, ते मात्र जाळ्यात अडकत नाहीत. आपण संसारी माणसे म्हणजे या संसारसागरातील मासे. मायारूपी जाळ्यात आपण अडकतो. पण आपण जर भगवंताच्या पायाशी राहिलो, त्याचे चरण जवळ केले तर मायेच्या जाळ्यातून आपण सहीसलामत सुटू शकतो.

देवाने आपल्याला पोट दिले आहे. पोट ही अशी गोष्ट आहे की ती कधी भरतच नाही. अग्निमध्ये आहुती टाकल्यानंतर अग्नी आणखी प्रज्वलित होतो. तसेच हे आहे. संसाराची आसक्ती देखील अशीच आहे. ती कधीच संपत नाही. म्हणून ती थोडी का होईना पण विसरण्याचा प्रयत्न करावा. ते सोपे नाही. पण भगवंत प्राप्ती करून घ्यायची असेल तर ती बाजूला ठेवता आली पाहिजे.

आपली संसाराची हाव कधी संपत नाही. ‘ हवेपण ‘ सुरूच राहते. त्यातून मग एखादी गोष्ट नाही मिळाली आणि ती दुसऱ्याकडे असेल तर मत्सर किंवा द्वेष निर्माण होतो. मत्सराला काही कारण लागत नाही. म्हणून त्याची तुलना समर्थ गाढवाशी करतात. परमार्थात तर मत्सर अतिशय हानिकारक. तेव्हा अशा मत्सराचा निकराने म्हणजे सर्वशक्तीनिशी सामना करायला हवा. त्यासाठी विवेक आणि वैराग्य ही दोन प्रभावी शस्त्रे आहेत. मत्सर आणि संसाराची आसक्ती टाकून देऊन श्रीरामाला हृदयी धारण करा म्हणजे हा भवसागर तरून जाल असे समर्थांचे सांगणे आहे. ‘ नाम आहे आदी अंती, नाम सर्व सार, आहे बुडत्याला नौका ठेवली आधार. ‘

स्वसंवाद :: 

१. मी या संसारसागरात ‘मायेच्या जाळ्यात’ अडकलो आहे हे मला जाणवते का?

२. “कितीही दिले तरी न भरणारे हे दुर्भर पोट (आसक्ती)” याच्या मागे धावताना, मी कधी समाधानाचा अनुभव घेतला आहे का?

३. जेव्हा मला एखादी गोष्ट मिळत नाही आणि ती दुसऱ्याकडे दिसते, तेव्हा माझ्या मनात नकळत ‘मत्सर’ निर्माण होतो का?

४. संसाररूपी जाळ्यातून सहीसलामत सुटण्यासाठी माझ्या ठायी भगवंताप्रती अनन्य शरणागती आहे का?

– क्रमशः श्लोक श्लोक ७९ आणि ८०

© श्री विश्वास देशपांडे

चाळीसगाव

प्रतिक्रियेसाठी ९४०३७४९९३२

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #३३१ ☆ दर्द की इंतहा… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख दर्द की इंतहा। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

(डॉ मुक्ता जी द्वारा रचित एक भजन – कब रे मिलोगे राम / स्वर/ प्रस्तुति – योगाश्रम धाम भिवानी, सौजन्य – तरूनम चैनल)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # ३३१ ☆

☆ दर्द की इंतहा… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

‘दर्द को भी आधार कार्ड से जोड़ दो/ जिन्हें मिल गया है दोबारा ना मिले’ बहुत मार्मिक उद्गार, क्योंकि दर्द हमसफ़र है; सच्चा जीवन-साथी है; जिसका आदि-अंत नहीं। ‘दु:ख तो अपना साथी है’ गीत की ये पंक्तियां मानव में आस्था व विश्वास जगाती हैं; मन को ऊर्जस्वित व संचेतन करती है। वैसे तो रात्रि के पश्चात् भोर, अमावस्या के पश्चात् पूर्णिमा व दु:ख के पश्चात् सुख का आना निश्चित है; अवश्यंभावी है। सुख-दु:ख दोनों मेहमान हैं और एक के जाने के पश्चात् ही दूसरा दस्तक देता है।

समय निरंतर अबाध गति से चलता रहता है; कभी रुकता नहीं। सो! जो आया है अवश्य जाएगा। इसलिए ऐ मानव! तू किसी के आने की ख़ुशी व जाने का मलाल मत कर। ‘कर्म-गति अति न्यारी/ यह टारे नहीं टरी।’ इसके मर्म को आज तक कोई नहीं जान पाया। परंतु यह तो निश्चित् है कि ‘जैसा कर्म करता, वैसा ही फल पाता इंसान’ के माध्यम से मानव को सदैव सत्कर्म करने की सीख दी गयी है।

अतीत कभी लौटता नहीं और भविष्य अनिश्चित् है। परंतु भविष्य सदैव वर्तमान के रूप में दस्तक देता है। वर्तमान ही शाश्वत् सत्य है, शिव है और सुंदर है। मानव को सदैव वर्तमान के महत्व को स्वीकारते हुए हर पल को ख़ुशी से जीना चाहिए। चारवॉक दर्शन में भी ‘खाओ-पीओ, मौज उड़ाओ’ का संदेश निहित है। आज की युवा पीढ़ी भी इसका अनुसरण कर रही है। शायद! इसलिए ‘वे यूज़ एंड थ्रो’ में विश्वास रखते हैं और ‘लिव इन’ व ‘मी टू’ की अवधारणा के पक्षधर हैं। वे पुरातन जीवन मूल्यों को नकार चुके हैं, क्योंकि उनका दृष्टिकोण उपयोगितावादी है। वे अहंनिष्ठ क्षणवादी सदैव हर पल को जीते हैं। संबंध-सरोकारों का उनके जीवन में कोई मूल्य नहीं तथा रिश्तों की अहमियत को भी वे नकारने लगे हैं, जिसका प्रतिफलन पति-पत्नी में बढ़ते अजनबीपन के एहसास के परिणाम-स्वरूप तलाक़ों की बेतहाशा बढ़ती संख्या को देखकर लगाया जा सकता है। सब अपने-अपने द्वीप में कैद एकांत की त्रासदी झेलने को विवश हैं, जिसका सबसे अधिक ख़ामियाज़ा उनके आत्मज भुगत रहे हैं। वे मोबाइल व मीडिया में आकण्ठ डूबे रहते हैं और नशे की लत के शिकार हो रहे हैं जिसका विकराल रूप मूल्यों के विघटन व सामाजिक विसंगतियों के रूप में हमारे समक्ष है। संयुक्त परिवार टूट रहे हैं, रिश्तों की अहमियत रही नहीं और अपहरण, फ़िरौती, दुष्कर्म व हत्या के हादसों में निरंतर इज़ाफा हो रहा है। चहुंओर संशय व अविश्वास का वातावरण व्याप्त है, जिसके कारण इंसान पल भर के लिए भी सुक़ून की साँस नहीं ले पाता।

दूसरी ओर अमीर-गरीब की खाई सुरसा के मुख की भांति बढ़ती जा रही है और हमारा देश इंडिया व भारत दो रूपों में विभाजित परिलक्षित हो रहा है। एक ओर मज़दूर, किसान व मध्यमवर्गीय लोग, जो दिन-भर परिश्रम करने के पश्चात् दो जून की रोटी भी नहीं जुटा पाते और आकाश की खुली छत के नीचे अपना जीवन बसर करने को विवश हैं। दूसरी ओर बाल श्रमिक शोषण व बाल यौन उत्पीड़न का घिनौना रूप हमारे समक्ष है। एक घंटे में पांच बच्चे दुष्कर्म का शिकार होते हैं; बहुत भयावह व चिंतनीय स्थिति है। दूसरी ओर धनी लोग और अधिक धनी होते जा रहे हैं, जिनके पास असंख्य सुख-सुविधाएं हैं और वे निष्ठुर, संवेदनहीन, आत्मकेंद्रित व निपट स्वार्थी हैं। शायद! इसी कारण गरीब लोग दर्द को आधार-कार्ड से जोड़ने की ग़ुहार लगाते हैं, ताकि छल-कपट से लोग पुन: वे सुविधाएं प्राप्त न कर सके। उनके ज़हन में यह भाव दस्तक देता है कि यदि ऐसा हो जायेगा तो उन्हें जीवन में पुन: अभाव व असहनीय दर्द सहन नहीं करना पड़ेगा, क्योंकि वे अपने हिस्से का दर्द झेल चुके हैं। परंतु इस संसार में यह नियम लागू नहीं होता। भाग्य का लिखा निश्चित् होता है, अटूट होता है, कभी बदलता नहीं। सो! उन्हें इस तथ्य को सहर्ष क़ुबूल कर लेना चाहिए कि कृत-कर्मों का फल जन्म-जन्मांतर तक मानव के साथ-साथ चलता है और उसे अवश्य भोगना पड़ता है। इसलिए सुंदर भविष्य की प्राप्ति हेतू सदैव अच्छे कर्म करें ताकि भविष्य उज्ज्वल व मंगलमय हो सके।

●●●●

© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रचना संसार # १०४ – गीत – घूँघट पट से झाँके गोरी… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆

सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीत – घूँघट पट से झाँके गोरी…।

? रचना संसार # १०४ ?

☆ गीत – घूँघट पट से झाँके गोरी…  ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ? ☆

☆

बैरन कोयल कूके प्रियतम,

प्रीति गगरिया छलकाती।

कंगन खनकें नथनी डोले,

सजनी चलती बलखाती।।

*

अधर गुलाबी कंपन करते,

कुंतल लट मुख पर आए।

घूँघट पट से झाँके गोरी,

छम-छम पायल झनकाए।।

अल्हड़ यौवन ललचाता मन,

चंचल चितवन शरमाती।

*

प्रेम-वलय उर बगिया पलती,

कलियाँ लेतीं अँगड़ाई।

कत्थक करती मोहक मणियाँ,

झूला झूले तरुणाई।।

डाल-डाल मधुमासी डेरा,

चतुर चमेली इतराती।

*

करें सुवासित मस्त बयारें,

गुल मकरंद लुटाते हैं।

अठखेली करते भँवरे हैं,

प्रेमिल उर मुस्काते हैं।

मन में निश्छल प्रेम पला है,

कामदेव छवि बहकाती।

*

मनभावन गीतों की लड़ियाँ,

रस पीयूष भरी प्याली।

बौराते हैं बौर प्रीति के,

कहती होठों की लाली।।

प्रेम पताका फैली नभ तक,

चूमे माथा लहराती।

☆

© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)

संपर्क –1308 कृष्णा हाइट्स, ग्वारीघाट रोड़, जबलपुर (म:प्र:) पिन – 482008 मो नं – 9424669722, वाट्सएप – 7974160268

ई मेल नं- meenabhatt18547@gmail.com, mbhatt.judge@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुज #३३१ ☆ भावना के दोहे – रथ यात्रा ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भावना के दोहे  – रथ यात्रा ।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # ३३१ – साहित्य निकुंज ☆

☆ भावना के दोहे – रथ यात्रा ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

☆

जन मन में उत्साह है, रथ यात्रा का हर्ष।

जगन्नाथ करते भ्रमण, करें वही उत्कर्ष।।

 *

संग सुभद्रा बलभद्र, जग के पालनहार।

रथ यात्रा उनकी चले, दर्शन दें सब द्वार।।

 *

भक्त हृदय के भाव में, होती जय-जयकार।

तेरा महिमा गान हो, हो तुम! तारणहार।।

 *

कृपा बरसती आपकी, महिमा अपरंपार।

भाव हृदय में भक्ति का, होती नैया पार।।

☆

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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