हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # ३०१ ☆ गीत – सुखद मृत्यु ही द्वारे आए ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘चक्र

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मानबाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान  के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंतउत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत। 

आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।

आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # ३०१ ☆ 

☆ गीत – सुखद मृत्यु ही द्वारे आए ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ 

सुखद मृत्यु ही गीत सुनाए,

शुभ कर्मों को कर लेना।

मत करना अपमान साधु का,

ईश्वर से कुछ डर लेना।

 **

पैसा-पैसा खूब कमाया,

जोड़-जोड़ जीवन बीता।

नहीं किसी की करी भलाई,

जाता फिर रोता, रीता।

 *

मत घमंड पैसे का करना,

दान, पुण्य कर तर लेना।

 **

त्रुटियाँ तो सबसे हो जाएँ,

पर स्वीकार करो इनको।

क्षमा शक्ति है यहाँ अपरिमित,

कर लो तुम अच्छे कल को।

 *

हँसते और हँसाते रहना,

झरनों-सा तुम झर लेना।

 **

अंत समय में किए कर्म सब,

आ जाते मन, आँखों में।

दृश्य हजारों घूम-घूम कर,

दर्शाते हैं लाखों में।

 *

पश्चाताप न रहे किसी का,

हँसते-हँसते मर लेना।

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश के नवगीत # १५० ☆ ज़रूरतमंद ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆ —

श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “ज़रूरतमंद” ।)

✍ जय प्रकाश के नवगीत # १५० ☆

☆ ज़रूरतमंद ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

शहर के हर चौराहे पर

आज भी इकट्ठे होते हैं लोग

काम की तलाश में

कहीं भटकते नहीं है

बस खड़े रहते है

इस आस में कि कोई ज़रूरतमंद

आकर उन्हें ले जाएगा

अपने साथ लेकर चलते हैं

दिन भर का भोजन पानी

जैसे-जैसे दिन ऊपर चढ़ता है

उनकी आस उसी तरह

कम होती जाती है

सर्वहारा वर्ग आज भी

आशाओं और व्यवस्था के बीच

झूलता लटकता अपना और

अपने परिवार का बोझ ढोता

ज़िंदा है इस कायनात में

इन असंगठित लोगों के लिए

सरकारों की प्रतिबद्धता

सिमट कर रह जाती है सिर्फ़ काग़ज़ों में

जो शायद ही कोई

साकार रूप ले पाती है

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १५७ ☆ मुमकिन नहीं है ज़ीस्त में दुश्वारियाँ न हों… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “मुमकिन नहीं है ज़ीस्त में दुश्वारियाँ न हों“)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १५७ ☆

✍ मुमकिन नहीं है ज़ीस्त में दुश्वारियाँ न हों… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे 

हिस्से में  खेत  घर न ही खलिहान चाहिए

ख़िदमत को माँ पिता मेरे भगवान चाहिए

 *

रब रूठ जाए मुझसे तो परवाह कब मुझे

माँ जैसा सिर्फ़ एक निगहबान चाहिए

 *

सर जिसके सामने न  उठा उम्र भर सकूँ

ऐसे बशर का कोई न अहसान चाहिए

 *

हालात हों बुरे तो उसूलों पे ही रहूँ

क़ायम मुझे पहाड़ सा ईमान चाहिए

 *

हर रंग के गुलों से महकता जो  हर समय

दुनिया बने इक एक ऐसा ही गुलदान चाहिए

 *

मुमकिन नहीं है ज़ीस्त में दुश्वारियाँ न हों

इंसान को  हयात पै आसान चाहिए

 *

गद्दार है जो देश के माफिक न सोचते

हमको वतन परस्त ही इंसान चाहिए

 *

क्या अगले पल हो इसका भरोसा नहीं है पर

सौ वर्ष का बशर को है सामान चाहिए

 *

ग़ैरों का ग़मगुसार खुदाया मैं हो सकूँ

मालिक मेरे अरुण को ये इमकान चाहिए

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ हेमंत साहित्य # ६१ – खामोश गूँज… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – खामोश गूँज।)

☆ हेमंत साहित्य # ६१ ☆

✍ खामोश गूँज… ☆ श्री हेमंत तारे  

कोई नहीं सीखाता

खामोशियों को पढना

यां कि

उन्हें सुनना, समझना, सुलझाना |

 

खामोशियों का होता है

स्वरचित व्याकरण, गणित

और

हिज्जों का खेल,

जो आ ही जाता है

हर किसी को, देर – सबेर

जीवन पाठशाला के

मुडे – तुडे पन्नों में सिमटे पाठों से

जिन्हें बार – बार पढा जाते हैं

जाने अन्जाने में,

गुरू घंटाल बहुतेरे |

 

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ६९ ☆ पर्यावरण मुक्तक ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – “पर्यावरण मुक्तक“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ६९ ☆

✍ पर्यावरण मुक्तक ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

कौन कहता है दरख्तों में ज़िंदगी नहीं होती,

पर हाँ इनकी अपनी कोई बंदगी नहीं होती।

धूप में खड़े सरे राह सबको बाँटते हैं छाँव

इतनी बड़ी मिसाल जहान में कहीं नहीं होती।

*

कौन कहता है दरख्तों में ज़िंदगी नहीं होती,

हर डाल पर कुदरत की रोशनी नहीं होती।

पक्षियों का बसेरा, राहगीरों का भी सहारा,

बिन इनके धरा पर कभी हरियाली नहीं होती।

*

कौन कहता है दरख्तों में ज़िंदगी नहीं होती,

इनके मन की भाषा किसी ने यूँ सुनी होती।

पतझड़ में भी हँसी नवपल्लव की सजावटें

हार मान लेना तो इनकी रवानी नहीं होती।

*

कौन कहता है दरख्तों में ज़िंदगी नहीं होती,

इनकी कथा किसी किताब में लिखी नहीं होती।

फल फूल छाँव दे जीवन सँवारना ही किताब है

बिना इस किताब के कोई जिंदगी नहीं होती।

© डॉ सत्येंद्र सिंह

एम.ए. विद्यावाचस्पति(मानद)

दिनांक 28 मार्च, 2026

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # ११९ – कौन अपना?… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – कौन अपना?।)

☆ लघुकथा # ११९ – कौन अपना? श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

श्मशान की लपटें शांत हो चुकी थीं। माँ की सूनी आँखें अब भी बेटी की चिता की राख को निहार रही थीं। जिस बेटी को उसने नौ महीने कोख में रखा, उँगली पकड़कर चलना सिखाया, उसी को आज अपने हाथों विदा करना पड़ा।

सबसे अधिक पीड़ा बेटी की मृत्यु की नहीं, बल्कि उन रिश्तों की थी जो उसके साथ ही मर गए। जीते-जी जिसे घर की लक्ष्मी कहा गया, उसके अंतिम सफ़र में वही लोग साथ छोड़ गए।

पास खड़ी एक वृद्धा की भर्राई आवाज़ गूँजी—

“हे ईश्वर! यदि संतान ऐसी हो, जो अपने ही रिश्तों का धर्म भूल जाए, तो निःसंतान रहना ही कहीं अधिक अच्छा है।”

चिता की राख हवा में उड़ रही थी और उसके साथ समाज के खोखले रिश्तों का सच भी।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – मराठी कविता ☆ कवितेच्या प्रदेशात # ३२० ☆ जीवलगा… ☆ प्रभा सोनवणे ☆

प्रभा सोनवणे

? कवितेच्या प्रदेशात # ३२० ?

☆ जीवलगा ☆  प्रभा सोनवणे ☆

रात्र काजळी

भासते आगळी

तू असता जवळी

जीवलगा!

 

पहाट प्राजक्ती

तुझीच आसक्ती

तूच माझी प्रीती

जीवलगा!

 

सकाळ सोनेरी

येता सामोरी

नाव तुझे अधरी

जीवना!

 

येता दुपार

तुझाच विचार

न पडे विसर

जीवलगा!

 

सांज कातर

गेलास तू दूर

मनी हुरहूर

जीवलगा  !

 

पंचप्राण माझे

तुलाच वाहिले

मुक्त मी जाहले

जीवलगा!

© प्रभा सोनवणे

संपर्क – “सोनवणे हाऊस”, ३४८ सोमवार

पेठ, पंधरा ऑगस्ट चौक, विश्वेश्वर बँकेसमोर, पुणे 411011

मोबाईल-९२७०७२९५०३,  email- sonawane.prabha@gmail.com

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) –  उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित / मंजुषा मुळे/ गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ श्री रविंद्रनाथ टागोर यांची “गीतांजली”… भाग – ३० ☆ सौ.मंजिरी येडूरकर ☆

श्री मंजिरी येडूरकर

? इंद्रधनुष्य ?

☆ श्री रविंद्रनाथ टागोर यांची “गीतांजली”… भाग – ३० ☆ श्री मंजिरी येडूरकर ☆

श्री रविंद्रनाथ टागोर

गीतांजलीतील कविता वाचत असताना कवी आणि देव यांच्या भावनिक नात्यांतील वैविध्यतेचे पदर जसजसे उलगडत जातात तसतसा एक प्रश्न वाचकांच्या मनात रुंजी घालू लागतो; तो म्हणजे या दोघांचं नातं तरी कोणतं आहे? आणि आश्चर्य म्हणजे हाच प्रश्न टागोरांना देखील पडतो. गीत क्र. ७७ मधे ते देवाला म्हणतात, “तू माझा कोण आहेस? पिता आहेस? बंधू आहेस? सखा आहेस? तू आहेस तरी कोण? समजा मी तुला पिता मानलं तर या नात्यातला जो आदर आहे तो मला तुझ्यापासून लांब ठेवेल. मग मी तुझ्याजवळ कसा येऊ? तुझा हात कसा धरू? तुला जर सखा मानलं तर मी कायमचा तुझ्याजवळ राहू शकणार नाही. तुला जर बंधू मानलं तर माझं जे संचित आहे त्यात तुला वाटणी द्यावी लागेल. ती कशी देऊ? शेवटी कवी म्हणतो मी तुला सरळ माझं जीवन समर्पित करतो. म्हणजे या नात्याचा प्रश्नच निर्माण होणार नाही कारण मग मी तुझ्याशी एकरूप होऊन जाईन. ”

देव पिता म्हणून:-

ते देवाला पिता मानून प्रार्थना करतात की जिथे मनात भीती नसेल, मान ताठ असेल, जिथे ज्ञान मुक्त असेल, अशा स्वातंत्र्याच्या स्वर्गात मला घेऊन चल. तिथे सत्य, शांती, प्रेम, अहिंसा यांचेच राज्य असेल. (गीत ३५)

देव माता म्हणून:-

ते देवाला माता मानतात. त्यांना मातेला काहीतरी अर्पण करण्याची इच्छा होते. पण त्यांच्या लक्षात येतं की, सुख, आनंद, कीर्ती, संपत्ती या गोष्टी तर तिनेच दिल्या आहेत. त्याच तिला कशा परत द्यायच्या. त्यामुळे ते म्हणतात, माझ्या दुःखावर फक्त माझी सत्ता आहे. म्हणून त्या दुःखाश्रूंची माळच मी तुला वाहीन. ती तुझ्या वक्षावर रूळत राहील आणि तुझ्या हृदयाशी हितगुज करेल. (गीत ८३)

देव बालक म्हणून:-

त्यांना कधी कधी देव हा बालकाच्या रूपातही दिसतो. कवीने सागर किनारी वाळूत खेळणाऱ्या बालकांना वैश्विकरूप दिले आहे. त्या बालकांच्या निरागसपणात कवीला देव दिसतो. बालकांच्या हास्यात, नृत्यात, गोबऱ्या गालात त्यांना देवाची किमया दिसते, निसर्ग दिसतो आणि तो सर्व व्यापी परमेश्वर भेटतो. (गीत ६०, ६१)

देव पती म्हणून:-

मधुरा भक्ती ही आपल्या अध्यात्मात महत्त्वाची मानली जाते. त्याचे उत्तम उदाहरण म्हणजे चैतन्य महाप्रभू! या भक्तीमध्ये देव प्रियकर म्हणजे जोडीदार असतो. कवी स्वतः पत्नीच्या भूमिकेत जाऊन प्रियकराच्या रूपात देवाला पाहतो. या कवितेत (गीत ५२) कवीला म्हणजे पत्नीला वाटतं प्रियकराच्या गळ्यात असणारा हार खूप सुंदर आहे. पण त्याला विचारायचं कसं, देतोस कां म्हणून? पण सकाळ झाल्यावर तिला वाटतं तो आपल्यासाठी काहीतरी आठवण म्हणून नक्की ठेवून जाईल. तो जाता क्षणी ती धावत शेजेकडे येते. निदान एखादं फूल, निदान फुलाची‌ पाकळी ठेवून जाईल. प्रत्यक्ष पाहते तो एक तळपणारी तलवार ठेवलेली असते. प्रेयसी/पत्नी (म्हणजे कवी) खूप घाबरते. पण तिच्या लक्षात येतं की ज्याअर्थी प्रियकराने दिलेली वस्तू आहे त्या अर्थी त्यामागे काहीतरी त्याचा उद्देश असेल. या तलवारीने आता आपल्याला पाश तोडण्याची भीती वाटणार नाही आणि एकदा पाश तोडले की आपण आपलं सगळं आयुष्य त्याच्यावर ओवाळून टाकू शकतो. तोपर्यंत ही तलवार जपून ठेवायला हवी.

(अपूर्ण, पुढील भागात)

—–

गीत : ८८

DEITY of the ruined temple! The broken strings of Vina sing no more your praise. The

bells in the evening proclaim not your time of worship. The air is still and silent about you.

In your desolate dwelling comes the vagrant spring breeze. It brings the tidings of

flowers ⎯ the flowers that for your worship are offered no more.

Your worshipper of old wanders ever longing for favour still refused. In the eventide, when fires and shadows mingle with the gloom of dust, he wearily comes back to the ruined temple with hunger in his heart.

Many a festival day comes to you in silence, deity of the ruined temple. Many a night of worship goes away with lamp unlit.

Many new images are built by masters of cunning art and carried to the holy stream of

oblivion when their time is come.

Only the deity of the ruined temple remains unworshipped in deathless neglect.

—–

मराठी भावानुवाद : गीत : ८८

तुटल्या तारा अन् भग्न वीणा।

इथे न भाकित कोणी करूणा॥

*

पूजन, अर्चन कधी नसे जरी।

सहजच कोणी घंटानाद करी॥

*

भग्न तुझ्या या मंदिरी निर्जन।

उनाड वारा, बनुनी सज्जन॥

*

पुष्पांचा गंधीत निरोप आणी।

जी नच पडली तुझिया चरणी॥

*

जो होता कधी तुझा पुजारी।

कृपाप्रसादा वंचित तो मुरारी॥

*

मनःशांती त्या कुठे मिळेना।

म्हणुनि येई तुझिया स्तवना॥

*

येई परतुनि तो भग्न मंदिरी।

घेऊनि तशीच आर्तता उरी॥

*

संध्याप्रकाश अन् छाया जेंव्हा।

मिसळत धूलीकणांशी तेंव्हा॥

*

असो दिवाळी, दसरा, होळी।

कुणी न दर्शना ये वेळोवेळी॥

*

काळोख्या रात्री अंधारातून।

कोणी न लावी समई परतून॥

*

लबाड, व्यवहारी लोकांनी।

मंदिरे निर्मिली, जुनी त्यागुनि॥

*

विस्मरतील सारे, ती ही नंतर।

दुर्लक्षाचे दुर्लक्षित अंतर॥

*

भग्न न होई पुन्हा, भग्न ते।

मृतास पुन्हा, मरण न येते॥

भावानुवाद © मंजिरी येडूरकर 

संपर्क: ९४२१०९६६११

—–

गीत : ८९

NO more noisy, loud words from me ⎯ such is my master’s will. Henceforth I deal in

whispers. The speech of my heart will be carried on in murmurings of a song.

Men hasten to the King’s market. All the buyers and sellers are there. But I have my

untimely leave in the middle of the day, in the thick of work.

Let then the flowers come out in my garden, though it is not their time and let the midday bees strike up their lazy hum.

Full many an hour have I spent in the strife of the good and the evil, but now it is the

pleasure of my playmate of the empty days to draw my heart on to him; and I know not why is this sudden call to what useless inconsequence!

—–

मराठी भावानुवाद : गीत : ८९

हळुवार सुरांनी, गाईन गाणी

बोल हृदीचे, गीतात गुणगुणी॥

*

नित्यच येथे चाले, देणे घेणे

मी परि जाईन, येता बोलावणे॥

*

ऐनपणाच्या भरात असता

साद तयाची, कानी घुमता॥

*

वसंत नसता, फुले फुलावी

मधु त्यातला, भ्रमरा खुणवी॥

*

काळ जातो, भल्याबुर्‍या कलही

सखा सौंगडी, भेटो लवलाही॥

*

असे अचानक त्याचे बोलवणे

असो सार्थ वा अर्थहीन भेटणे॥

भावानुवाद © मंजिरी येडूरकर

संपर्क: ९४२१०९६६११

—–

गीत ९०

ON the day when death will knock at thy door what wilt thou offer to him?

Oh, I will set before my guest the full vessel of my life ⎯ I will never let him go with empty hands.

All the sweet vintage of all my autumn days and summer nights, all the earnings and gleanings of my busy life will I place before him at the close of my days when death will knock at my door.

—–

मराठी भावानुवाद : गीत : ९०

पुसे मज आज, सखा पांडुरंग।

पाहुणा यमासम, येता दारी सांग॥

*

करिसि का स्वागता, तुझ्या घरी।

दडपुनि दार का, पाठवी माघारी॥

*

शिकवण हीच, देई मम संस्कृती।

पाहुणा न जाये, रिकाम्या हाती॥

*

दिस शरदाचे, ग्रीष्मातल्या रात्री।

गोड समजुनी, वाढीन मी पात्री॥

*

ठेवीन सामोरी आयुष्याचा पेला। 

कमाई नि कोठी देईन त्याजला॥

*

मृत्यूचे दूत, माझ्या दारी आले।

स्वागता तयांच्या, प्राण माझे दिले॥

*

– क्रमशः भाग ३०

मूळ इंग्लिश काव्य : श्री. रविंद्रनाथ टागोर.

भावानुवाद : कवयित्री : © सौ.मंजिरी येडूरकर

लेखिका व कवयित्री, मो – 9421096611

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कादम्बरी # १५४ – बुन्देली कविता – ”तीन दिना की धरी कढ़ी है” ☆ आचार्य भगवत दुबे ☆

आचार्य भगवत दुबे

(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे। 

आज प्रस्तुत हैं बुन्देली कविता – तीन दिना की धरी कढ़ी है।)

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १५४ ☆

☆  बुन्देली कविता – तीन दिना की धरी कढ़ी है ☆ आचार्य भगवत दुबे ✍

तीन दिना की धरी कढ़ी है ओइ खुबाउत जौन सड़ी है

सिर पे उठा लेत घर सारो रार मचाउत नाक चढ़ी है

 *

जबरइँ मो से खुआ लेत है बिना बात के काल लड़ी है

 बेंच खाइ है लाज-सरम सब बा अकड़ैलू बिना पढ़ी है

 *

ओ खें नोंइँ मान-मरजादा लाल छड़ी, मैदान खड़ी है

 माँग रई दस तोला सुन्नो हँड़िया नोंई इतै गड़ी है

बा दद्दा की धौंस बताउत ‘भगवत’ देउत रोज तड़ी है

© आचार्य भगवत दुबे

82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक की पुस्तक चर्चा # २०९ ☆ “प्रबोध-बोध ” – संपादक – डॉ कृष्णा रावत,  सह संपादक – इंद्र भंसाली ‘अमर’ ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  जी के आभारी हैं जो  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं।

आज प्रस्तुत है संपादक – डॉ कृष्णा रावत,  सह संपादक – इंद्र भंसाली ‘अमर’ द्वारा सम्पादित  “प्रबोध-बोध पर चर्चा।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा#  २०९ ☆

☆ “प्रबोध-बोध ” – संपादक – डॉ कृष्णा रावत,  सह संपादक – इंद्र भंसाली ‘अमर’ ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

पुस्तक – प्रबोध-बोध (प्रबोध कुमार गोविल के व्यक्तित्व और कृतित्व पर आधारित)

संपादक – डॉ कृष्णा रावत,  सह संपादक – इंद्र भंसाली ‘अमर ‘

प्रकाशक – साहित्यागार

चर्चा : विवेक रंजन श्रीवास्तव, भोपाल

प्रबोध जी पर विभिन्न एंगल से साहित्यिक सामाजिक शोध बोध – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

( इन दिनों लंदन से)

किसी लेखक पर लिखी गई पुस्तक तभी सार्थक बनती है जब वह केवल व्यक्ति का परिचय न दे, बल्कि उसके रचना संसार के भीतर छिपे उस जीवंत मनुष्य को भी सामने लाए जो अपने समय, समाज और संवेदनाओं से निरंतर संवाद करता है।

लेखक को समझने के लिए उसके परिवेश , का ज्ञान महत्वपूर्ण होता है, इसीलिए रचना के साथ फुटनोट में सूक्ष्म लेखक परिचय प्रकाशित किया जाता है। पाठक और लेखक के बीच दूरी मिटाती यह पुस्तक स्वागतेय साहित्यबोध है।

प्रबोध कुमार गोविल के व्यक्तित्व और कृतित्व पर आधारित पुस्तक प्रबोध बोध इसी अर्थ में एक महत्त्वपूर्ण साहित्यिक दस्तावेज के रूप में अब पाठकों के साथ है।

यह पुस्तक प्रबोध जी के बहाने से उस रचनात्मक चेतना की पड़ताल है जिसने दशकों तक हिंदी साहित्य को अपनी विशिष्ट दृष्टि, वैचारिक निर्भीकता और मानवीय सरोकारों से समृद्ध किया है।समय के साथ लेखक के चश्मे के नम्बर , उनके फ्रेम परिस्थितियों की पृष्ठ भूमि बदलती रहती है, किंतु उसके लेखकीय लक्ष्य , उसका दृष्टिकोण उम्र की परिपक्वता के साथ विकसित होता  चलता है।

इस पुस्तक का आकर्षक पक्ष यह है कि इसमें प्रबोध कुमार गोविल को केवल एक साहित्यकार के रूप में नहीं देखा गया है। उनके भीतर के मनुष्य, चिंतक, समाज दृष्टा और संवेदनशील रचनाकार को समान महत्त्व दिया गया है।

 पुस्तक पढ़ते हुए यह अनुभव बार बार होता है कि साहित्य अंततः जीवन से ही जन्म लेता है और जीवन के विविध रंग ही किसी लेखक की रचनाओं में रूपांतरित होकर पाठक तक किताबों और स्फुट रचनाओं के माध्यम से पहुंचते हैं , यही लेखकीय यात्रा का जीवन संदेश बन जाता है।

प्रबोध कुमार गोविल का साहित्य अपने समय की धड़कनों को दर्ज करता है। उनके पात्र केवल कथा को आगे बढ़ाने वाले माध्यम नहीं हैं। वे समाज के भीतर छिपे प्रश्नों, अंतर्विरोधों, इच्छाओं और संघर्षों के प्रतिनिधि बनकर सामने आते हैं। पुस्तक इस तथ्य को अनेक दृष्टियों से प्रमाणित करती है। उनके लेखन में महानगरीय अकेलापन भी है। बदलते सामाजिक मूल्य भी हैं। संबंधों की जटिलताएँ भी हैं। मनुष्य की आंतरिक बेचैनियाँ भी हैं। यही कारण है कि उनका साहित्य,  पाठक को केवल मनोरंजन नहीं देता बल्कि उसे वैचारिक मंथन के लिए भी बाध्य करता है।

इस पुस्तक की एक विशेष उपलब्धि यह है कि यह लेखक की रचनात्मक यात्रा को उसके सामाजिक संदर्भों से जोड़कर देखती है। आज जब साहित्य को अक्सर केवल पाठ या विचार के रूप में पढ़ा जाता है, तब यह पुस्तक स्मरण कराती है कि हर रचना के पीछे एक जीवित अनुभव संसार होता है। प्रबोध कुमार गोविल ने जीवन को बहुत निकट से देखा है। समाज के विविध वर्गों, परिस्थितियों और मानवीय मनोदशाओं को समझा है। यही अनुभव उनकी रचनाओं को विश्वसनीय बनाते हैं।

पुस्तक में उनके व्यक्तित्व के जिन आयामों का उल्लेख किया गया है, वे भी कम रोचक नहीं हैं। सहजता, विनम्रता, संवेदनशीलता और मानवीय आत्मीयता उनके व्यक्तित्व की प्रमुख विशेषताओं के रूप में उभरती हैं। यह तथ्य विशेष रूप से ध्यान खींचता है कि उनकी रचनात्मकता केवल बौद्धिक उपक्रम नहीं है। उसके पीछे मनुष्य और समाज के प्रति गहरी प्रतिबद्धता दिखाई देती है। शायद यही कारण है कि उनके साहित्य में विचार और संवेदना साथ साथ चलते हैं।

प्रबोध कुमार गोविल के साहित्य की चर्चा करते हुए पुस्तक के आलेख उनके कथा साहित्य, उपन्यासों, कविताओं तथा बाल साहित्य की ओर संकेत करती है। इससे उनके बहुआयामी रचनाकार होने का परिचय मिलता है। वे किसी एक विधा तक सीमित लेखक नहीं हैं। उनकी रचनात्मक ऊर्जा अनेक साहित्यिक रूपों में व्यक्त हुई है। यह विस्तार उनके साहित्यिक व्यक्तित्व की शक्ति को रेखांकित करता है।

पुस्तक का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष उनकी भाषा और शिल्प पर किया गया विमर्श भी है। उनकी भाषा सरल है, पर साधारण नहीं। उसमें जीवन की सहजता है। संवाद की ऊष्मा है। विचार की स्पष्टता है। यही कारण है कि उनका साहित्य विद्वानों के साथ साथ सामान्य पाठकों तक भी पहुँचता है। साहित्य की सबसे बड़ी सफलता यही है कि वह पाठक के मन में उतर सके और उसके अनुभव का हिस्सा बन जाए।

इस पुस्तक को पढ़ते हुए यह भी महसूस होता है कि लेखक के मूल्यांकन का कार्य केवल प्रशंसा करना नहीं होता। उसका वास्तविक उद्देश्य उसके साहित्यिक अवदान को समझना और समझाना होता है। प्रबोध बोध इस कसौटी पर खरी उतरती दिखाई देती है। यह पुस्तक प्रबोध कुमार गोविल के साहित्य को व्यापक परिप्रेक्ष्य में रखकर देखने का अवसर प्रदान करती है। साथ ही यह बताती है कि किसी लेखक की वास्तविक पहचान उसके पुरस्कारों से नहीं, उसकी रचनाओं की जीवंतता और समय से संवाद करने की क्षमता से निर्मित होती है।

समग्र रूप से देखा जाए तो प्रबोध बोध एक ऐसी पुस्तक है जो व्यक्ति और कृतित्व के बीच सेतु का काम करती है। यह पाठक को लेखक के निकट ले जाती है। उसके साहित्य को नए सिरे से पढ़ने की प्रेरणा देती है। साथ ही यह विश्वास भी जगाती है कि सच्चा साहित्य समय के साथ पुराना नहीं होता। वह हर युग में नए अर्थों के साथ पाठकों के सामने उपस्थित होता रहता है। यही इस पुस्तक की सबसे बड़ी उपलब्धि है और यही उसकी स्थायी प्रासंगिकता भी है।

चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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