हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # २९२ – “अनंत खुशियों की राशी…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत “अनंत खुशियों की राशी...”।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २९२ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “अनंत खुशियों की राशी...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

☆

रिश्तों की अनुपम नक्काशी

जैसी रही बुआ ॥

जीते हुये किसी प्रत्याशी

जैसी रही बुआ ॥

 

बहुत रहीं खुद्दार कभी

उनने कुछ न चाहा ।

किसी घाव के लिये

रही वे, दवा लगा फाहा ।

 

जो भी सच होता उसको

मुँह पर ही कह देना ।

किन्तु दुआ की मथुरा काशी

जैसी रही बुआ ॥

 

घरकेसभी सदस्यों की

वह अधिक चहेती थीं ।

सदा किसी भी काम काज

को हाँ कह देती थीं।

 

अगर दिखें नाराज तनिक में

खुश हो जाती थीं।

आशुतोष थीं जो अविनाशी

जैसी रहीं बुआ ॥

 

जब भी चाहो उन्हें बुलालो

झट से आ जाती।

आते ही घर के कामों में

झट पट जुट जाती ।

 

हर शंका का समाधान थी

इस घर की जो भी ।

व अनंत खुशियों की राशी

जैसी रही बुआ ॥

☆

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

18-07-2026

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # ३४ – हास्य-व्यंग्य – “गधे अब गुलाब जामुन खा रहे !” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।

प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन

आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय हास्य-व्यंग्य  “गधे अब गुलाब जामुन खा रहे !”।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # ३४ ☆

☆ हास्य – व्यंग्य ☆ “गधे अब गुलाब जामुन खा रहे !” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

☆

यह तो सुना था कि गधों को पंजीरी खिलाई जाती है और वे बड़ी रुचि से इसे खा कर खिलाने वाले के वश में हो जाते हैं और उसके बताए अनुसार काम करने लगते हैं,  किन्तु यह पहली बार पता लगा कि गधों को गुलाब जामुन खिलने से भी वे मनोनुकूल परिणाम दिला सकते हैं। मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में मानसून की बेरुखी और बारिश न होने से परेशान लोगों ने इंद्र देव को प्रसन्न करने के लिए गधों को गुलाब जामुन खिला कर अच्छी बारिश की कामना की। इस अवसर पर बड़ी संख्या में उपस्थित लोगों ने गधों के माध्यम से इंद्र देव से झमाझम बारिश की प्रार्थना की। इससे आप सहज ही अनुमान लगा सकते हैं कि गधों की पहुंच कहां तक हो सकती है।

मुझे लगता है कि किसी की सत्ता को बनाए रखने में हमेशा गधों अर्थात विमूढ़ों (मूर्खो) का महत्वपूर्ण स्थान होता है। गोस्वामी तुलसी दास जी ने कहा है  –

सबसे भले विमूढ़,

जिन्हें न व्यापे जगत गति।

यों तो हर व्यक्ति के अंदर एक गधा छिपा रहता है जो अवसर आने पर प्रकट हो जाता है। महापंडित – ज्ञानी रावण का तो एक सिर ही गधे का प्रदर्शित किया जाता है। रावण के अंदर छिपे गधे ने ही उससे सीता हरण करवाया। उसके बाद भी वह उसके जीवन में अनेक बार प्रकट हुआ। रावण का अधिकांश दरबार गधों से भरा पड़ा था। लगता है कि सत्ता के शीर्ष पर बैठा हर व्यक्ति बुद्धिमान सहयोगियों से बचता है। बुद्धिमानों से उसे अपनी कुर्सी खतरे में नजर आने लगती है। सहयोगियों के रूप में हमेशा गधे उसकी पहली पसंद होते हैं। वह उन्हें पंजीरी अथवा गुलाब जामुन खिला कर संतुष्ट रखता है और उसकी सत्ता निर्विघ्न चलती रहती है। शायद इंद्र देव भी इसी नीति पर चलते हुए अनंत काल से देवराज बने बैठे हैं। इंद्रासन प्राप्त करने के लिए किसी बुद्धिजीवी  साधक के प्रयासों से इंद्रासन डोलने लगता है और इंद्र तत्काल एन – केन – प्रकारेण उसकी तपस्या अथवा प्रयत्नों पर पलीता लगाने अपने दरबार में शामिल गधत्व से भरे अपने सेवक – सेविकाओं को सक्रिय कर देते   हैं। मानव लोक में भी सत्ता पाने एवं सत्ता पर कब्जा बनाए रखने के लिए सत्ताधारी भी यही मंत्र अपनाते हैं। बुद्धिमानों से दूर रहो, पंजीरी खाकर खुश रहने वाले बुद्धि हीन, विचार हीन लोगों को सहयोगी बनाओ। … लेकिन ध्यान रहे कि जो आपकी नजरों में गधा या मूर्ख है वह स्वयं को मूर्ख नहीं अपितु आपके समकक्ष समझता है। अतः यदि आप मूर्खो का सहयोग लेकर अपना उल्लू सीधा करना चाहते हैं तो आपके मूर्ख साथियों को  कदापि यह आभास नहीं होना चाहिए कि आप उन्हें मूर्ख समझते हैं। नाराज होने पर मूर्ख याने गधे आपका खेल बिगाड़ सकते हैं, वे दुलत्ती झाड़ कर आपको आपके लक्ष्य से दूर फेंक सकते हैं।

अपना काम निकालने के लिए जहां तक संभव हो गधों  को पंजीरी रूपी रिश्वत देते रहें और उनके बेतुके (ढेंचू – ढेंचू) आलापों, प्रस्तावों, सुझावों की प्रशंसा करते रहें। ध्यान रखें बुद्धिमानों को अपने रंग में रंगने का प्रयास कभी सफल नहीं होता। जिसने गधों को अपना बना लिया वही बादशाह बन सकता है। “बुद्धम् शरणम् गच्छामि” बीते युग की बात थी, आज सफलता का मूल मंत्र मूर्खम् शरणम् गच्छामि है।

© श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर – पिन – 482002 मो. 9425153629

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २७४ ☆ # “शायद तूफान आने वाला है…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “शायद तूफान आने वाला है…”।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २७४  ☆

☆ # “शायद तूफान आने वाला है…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

☆

आसमान में बादल गरज रहे हैं

धुआंधार बरस रहे हैं

बिजलियाँ कड़क रहीं हैं 

हवाएं बेफाम बह रही हैं

बहते बहते कह रही हैं

शायद कोई तूफान आने वाला है

 

गगन में यह कैसी जंग है

धरती पर हम सब दंग है

तबाही आ रही संग संग है

टूटती हर मन की उमंग है

टूटते टूटते कह रही है

शायद कोई तूफान आने वाला है

 

चारों दिशाओं में शोर है

नदी नालों में भी जोर है

बारिश भी घनघोर है

समंदर की नजरों में

यह तूफान कमजोर है

हर लहर कह रही है

शायद कोई तूफान आने वाला है

 

यह पानी का बहाव

 संकेत है बर्बादी का

यह बूंद बूंद का एक होना

संकेत है आजादी का

बादल का फटना

संकेत है जल समाधि का

सब कुछ डूब गया

तो क्या होगा अपराधी का

प्रकृति हम सबसे कह रही है

शायद कोई तूफान आने वाला है

☆

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अभिव्यक्ति # -११८ – बाबुल के बुलावे पर… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता ‘बाबुल के बुलावे पर…‘।)

☆ अभिव्यक्ति # ११८ ☆

☆ बाबुल के बुलावे पर… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

☆

तेरी इस दुनिया में, पल का ठिकाना है,

बाबुल के बुलावे पर, दूर चले जाना है।

*

दिया जले बाती से, तेल का समाना है,

तेल खत्म होते ही, दिया बुझ जाना है।

*

बाबुल के बुलावे पर, दूर चले जाना है,

अंगना में चिड़िया है, जब तक दाना है।

*

दाना खत्म होते ही, चिड़िया उड़ जाना है,

बाबुल के बुलावे पर, दूर चले जाना है।

*

रंगमंच दुनिया है, कला का जमाना है,

रोल खत्म होते ही, पर्दा गिर जाना है।

*

बाबुल के बुलावे पर, दूर चले जाना है,

राज की ये बात कह दूं, राज ये बताना है।

*

अच्छे काम करो जग में, नाम रह जाना है,

बाबुल के बुलावे पर, दूर चले जाना है।

☆

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३४२ ☆ व्यंग्य – शवयात्रा का इंतज़ाम ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम व्यंग्य – ‘शवयात्रा का इंतज़ाम‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३४२ ☆

☆ व्यंग्य ☆ शवयात्रा का इंतज़ाम ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

भाई नटवरलाल 70 साल की उम्र तक राजनीति का आनन्द लेते रहे। तीन बार अंतरात्मा की पुकार पर दल बदले, लंबे समय तक मंत्री रहे, लेकिन अब कई साल से राजनीति के कबाड़खाने में थे। अब कोई पूछ-कदर नहीं थी, जानने वाले मुंह फेर कर निकल जाते थे।

भाई नटवरलाल जब मंत्री थे तब उनका बड़ा जलवा था। जहां भी वे भाषण देने जाते वहां भारी भीड़ जुटती। मेला लग जाता। दरअसल उस भीड़ का इंतज़ाम नटवरलाल खुद करते थे। पार्टी के कार्यकर्ताओं को कोटा बांध दिया जाता था कि कितने लोगों को हांक कर लाना है। रेट पांच सौ रुपये प्रति व्यक्ति और भोजन। बसें ज़बरदस्ती बुला ली जातीं। शिक्षकों को निर्देश देकर स्कूली बच्चों को लाकर कार्यक्रम में बैठा दिया जाता,  जहां बैठे वे  ऊंघते रहते। बदले में मिलता नाश्ते का पैकेट। कार्यक्रम का सारा खर्च पार्टी या समर्थकों पर मढ़ दिया जाता और भाई नटवरलाल राजनीति के सुख- सागर में गोते लगाते रहते।

लेकिन अब भाई नटवरलाल चिन्ताग्रस्त थे। चिन्ता यह थी कि जीते जी तो उन्होंने अपने कार्यक्रमों में खूब भीड़ जुटायी, लेकिन मरने के बाद उनकी शवयात्रा में भीड़ नहीं जुटी तो उनकी नाक कट जाएगी। ज़िन्दगी भर की कमाई एक पल में राख हो जाएगी। लोगों का कोई भरोसा नहीं, आदमी के पद से हटते ही उससे कन्नी काटने लगते हैं। अब उन्हें बीच-बीच में सपने में यमराज दिखने लगे थे, इसलिए चिन्ता और गहरी हो गयी थी।

परेशान, वे राजनीति के अपने बड़े भैया रौनक भाई के पास पहुंचे। उनसे अपनी आशंका बतायी, बोले, ‘दादा, डर लगता है कि मौत के बाद हम हीरो की जगह जीरो साबित न हो जाएं। ज़िंदगी भर अपने कार्यक्रमों में झूठी भीड़ खड़ी करते रहे। लगता है अब सारी लोकप्रियता की कलई खुल जाएगी। सोच सोच कर रात को नींद नहीं आती।’

रौनक भाई उनकी बात सुनकर हंसे, बोले, ‘क्या बात करते हो! अब ज़माना बदल गया है। ए आई का ज़माना है। अब ज़मीन पर भीड़ भले ही न जुटे, सोशल मीडिया में जितनी चाहो भीड़ दिख जाएगी। ज़मीन की भीड़ देखने कौन जाता है, सब घर में बैठे मीडिया की भीड़ देखते हैं। ईरान के अयातुल्लाह के जनाज़े में कितनी बड़ी भीड़ दिखी थी, उसे ज़मीन पर देखने तुम ईरान गये थे क्या? ‘बाहुबली’ फिल्म में जो शानदार नगर दिखाया गया था वह सब नकली, कंप्यूटर का कमाल था। ‘जुरासिक पार्क’ का ख़ूंख़्वार डायनासोर वास्तव में कहीं था ही नहीं, लेकिन उसे देखकर दर्शकों की हालत खराब हो गयी। तुम बिलकुल चिन्ता मत करो। हम तुम्हारी शवयात्रा में ऐसी भीड़ दिखाएंगे कि अयातुल्लाह के जनाज़े की भीड़ फीकी पड़ जाएगी।’

बड़े भैया से ऐसा आश्वस्तिदायक आश्वासन पाकर भाई नटवरलाल निश्चिंतता को प्राप्त हुए। विश्वास हो गया कि उनके स्वर्ग सिधारने के बाद भी उनकी नाक सलामत रहेगी।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य भँवर # ११३ – शहरी जंगल राज… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य भँवर “– शहरी जंगल राज…” ।) 

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य भँवर # ११३  — शहरी जंगल राज — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

(गद्य – भँवर’: मेरा एक अभिनव गद्यात्मक प्रयोग)

(शब्द सीमा : 150)

ऐसे लोग संख्या में अपरिमित होते हैं जो मात्र अपनी जाति की बढ़ोत्तरी चाहते हैं। पर सवाल यह भी है क्या ये लोग अपने उद्देश्य में सफल हो पाते हैं? ये रौंद कर जाएँ, लेकिन वापसी के क्षण में देखें अपना रौंदा हुआ तो यथावत अपनी काया में वापसी कर चुका है। रौंदे जाने की इसी रौ के बीच से मैं एक भावभीनी छोटी सी कहानी लिखने की कोशिश कर रहा हूँ। गाँव के चौराहे पर तंबू लगा कर बैठे हुए लोगों ने बालक का जाति परिवर्तन किया और उसे रोटी थमा दी। उसने रोटी लिये घर आने पर अपनी अपाहिज माँ के साथ बाँट कर खाया। अगली सुबह वह रोटी की चाह में वहाँ पहुँचा तो वे लोग न हो कर एक कुत्ता बैठा हुआ था। वह तो इस कुत्ते से बातें करता था। कुत्ते ने ही उसे बताया वे लोग कहीं और तंबू लगाने चले गये। 

 © श्री रामदेव धुरंधर

19 — 04 — 2025

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३४६ – सच्चा गुरु ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३४६ ☆ सच्चा गुरु… ?

मनुष्य अशेष विद्यार्थी है। प्रति पल कुछ घट रहा है, प्रति पल मनुष्य बढ़ रहा है। घटने का मुग्ध करता विरोधाभास यह कि  प्रति पल, पल भी घट रहा है। 

हर पल के घटनाक्रम से मनुष्य कुछ ग्रहण कर रहा है। हर पल अनुभव में वृद्धि हो रही है, हर पल वृद्धत्व समृद्ध हो रहा है।

समृद्धि की इस यात्रा में प्रायः हर पथिक सन्मार्ग का संकेत कर सकने वाले मील के पत्थर को तलाशता है। इसे गुरु, शिक्षक, माँ, पिता, मार्गदर्शक,  सखा, सखी कोई भी नाम दिया जा सकता है।

विशेष बात यह कि जैसे हर पिता किसी का पुत्र भी होता है, उसी तरह अनुयायी या शिष्य,  मार्गदर्शक भी होता है। गुरु वह नहीं जो कहे कि बस मेरे दिखाये मार्ग पर चलो अपितु वह है जो तुम्हारे भीतर अपना मार्ग ढूँढ़ने की प्यास जगा सके। गुरु वह है जो तुम्हें ‘एक्सप्लोर’ कर सके, समृद्ध कर सके। गुरु वह है जो तुम्हारी क्षमताओं को सक्रिय और विकसित कर सके।

एक संत थे जिनके लिए कहा जाता था कि वे ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग जानते हैं। स्वाभाविक था कि उनके शिष्यों की संख्या में उतरोत्तर वृद्धि होती गई। हरेक के मन में ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग जानने की सुप्त इच्छा थी। एक दिन दैनिक साधना के उपरांत उनके परम शिष्य ने इस बाबत पूछ ही लिया। गुरुजी बोले, मैं तुम्हें ईश्वर तक पहुँचने के मार्गदर्शक तत्व बता सकता हूँ पर अपना मार्ग तुम्हें स्वयं ढूँढ़ना होगा।

ज्ञानी जानता है कि पुल पार करने से नदी पार नहीं होती। नदी पार करने के लिए उसमें कूदना पड़ता है। लहरों के थपेड़ों के साथ अन्य सभी आशंकाओं को भी तैरकर परास्त करना होता है। तैराकी के गुर सिखाये जा सकते हैं पर तैरते समय हरेक को अपने हिस्से की चुनौतियों से स्वयं दो-दो हाथ करने पड़ते हैं।

आधुनिक परिप्रेक्ष्य में समझना चाहें तो जीपीएस लगाकर गंतव्य तक पहुँचा तो जा सकता है पर रास्ते का ज्ञान नहीं होता। रास्ता समझने के लिए स्वयं भटकना होता है। अपना रास्ता स्वयं ढूँढ़ना होता है। स्वयं की क्षमताओं को सक्रिय करना होता है।  स्वयं को स्वयं ही अपना शोध करना होता है, स्वयं को स्वयं ही अपना बोध  करना होता है।

ध्यान रहे कि पथ तो पहले से ही है। तुम उसका अनुसंधान भर करते हो, आविष्कार नहीं। यह भी भान रहे कि पथ का अनुसंधान करनेवाले तुम अकेले नहीं हो, असंख्य दूसरे भी अपने-अपने तरीके से अनुसंधान कर रहे हैं। सारे मार्गों का अंतिम लक्ष्य एक ही है। अत: यह एकाकार का मार्ग है।

सच्चा गुरु वह है जो  तुम्हें एकल नहीं एकाकार की यात्रा कराये। एकाकार ऐसा कि पता ही न चले कि तुम गुरु के साथ यात्रा पर हो या तुम्हारे साथ गुरु यात्रा पर है। दोनों साथ तो चलें पर कोई किसी की उंगली न पकड़े।

यदि ऐसा गुरु तुम्हारे जीवन में है तो तुम धन्य हो। तुम्हारा मार्ग प्रशस्त है।

जिनकी गुरुता ने जीवन का मार्ग सुकर किया, उनका वंदन। जिन्होंने मेरी लघुता में गुरुता देखी, उन्हें नमन।

गुरु पूर्णिमा की अग्रिम शुभकामनाएँ।

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

गुरु साधना 19 जुलाई से बुधवार 29 जुलाई तक चलेगी। 🕉️ 

इसका मंत्र होगा-

ॐ गुं गुरुभ्यो नम:

(उच्चारण- ओम गुम गुरुभ्यो नमह)

💥 आप अपने गुरु / मानस गुरु / मार्गदर्शक / माता /पिता / प्रेरक व्यक्तित्व आदि जिस किसी में भी आपकी श्रद्धा हो, को स्मरण कर इस मंत्र का पाठ कर सकते हैं। यदि ऐसा कोई व्यक्तित्व आपके जीवन में नहीं है तो भी अपनी सैद्धांतिक / वैचारिक प्रतिबद्धता को यह मंत्र समर्पित कर सकते हैं। सनातन ठहराव नहीं बहाव है। अतः प्रवाह की दिशा स्वयं तय करें। 💥

इसके साथ नीचे दिए श्लोक का भी अपनी सुविधा के अनुसार 11 /21 /31 /51 बार पाठ करें। 

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः। गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः॥

≈≈

≈ संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सलिल प्रवाह # २८७– नवगीत – असमय मँझधार ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है  – नवगीत – असमय मँझधार।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २८७ ☆

☆ नवगीत – असमय मँझधार ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

☆

मौसम के सीने में

भोंके तलवार।

डूब रहा आदमी

असमय मँझधार।।

.

आतंकी आदमी

रेतता गला।

कुतर-काट वृक्ष कहे

शाख का भला।

बरगद की बोनसाई

समय कहे बो न साई

था विराट

वामन अब

हुआ है दईमार।

मौसम के सीने में

भोंके तलवार।

डूब रहा आदमी

असमय मँझधार।।

.

छाया से भीत है

आप मनचला।

औरों को देख-देख

दुखी मनजला।

अपनी चुपड़ी न खाए

गैर की रूखी लुभाए

अंधभक्त

चारण वर

सच रहा बिसार।

मौसम के सीने में

भोंके तलवार।

डूब रहा आदमी

असमय मँझधार।।

.

नहा रहा पातकी

खून की नदी।

अभिशापित कलप रही

सिसकती सदी।

भाई का सगा न भाई

वृथा प्रेम की दुहाई

खड़ी खाट

अमानव हो

खुद से शर्मशार।

मौसम के सीने में

भोंके तलवार।

डूब रहा आदमी

असमय मँझधार।।

☆

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

१०.६.२०२६

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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ज्योतिष साहित्य ☆ साप्ताहिक राशिफल (27 जुलाई से 2 अगस्त 2026) ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆

ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय

विज्ञान की अन्य विधाओं में भारतीय ज्योतिष शास्त्र का अपना विशेष स्थान है। हम अक्सर शुभ कार्यों के लिए शुभ मुहूर्त, शुभ विवाह के लिए सर्वोत्तम कुंडली मिलान आदि करते हैं। साथ ही हम इसकी स्वीकार्यता सुहृदय पाठकों के विवेक पर छोड़ते हैं। हमें प्रसन्नता है कि ज्योतिषाचार्य पं अनिल पाण्डेय जी ने ई-अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों के विशेष अनुरोध पर साप्ताहिक राशिफल प्रत्येक शनिवार को साझा करना स्वीकार किया है। इसके लिए हम सभी आपके हृदयतल से आभारी हैं। साथ ही हम अपने पाठकों से भी जानना चाहेंगे कि इस स्तम्भ के बारे में उनकी क्या राय है ? 

☆ ज्योतिष साहित्य ☆ साप्ताहिक राशिफल (27 जुलाई से 2 अगस्त 2026) ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆

जय श्री राम।  हम सभी श्री हनुमान जी के भक्त अच्छी तरह से जानते हैं कि श्री हनुमान जी राक्षसों को समाप्त करने वाले हैं और वे श्री रामचंद्र जी को अत्यंत प्रिय है। साधु संत और सज्जन पुरुषों की वे रक्षा करते हैं। वैसे तो श्री हनुमान जी हमारे सभी कष्टों को दूर कर सकते हैं परंतु अगर आप श्री रामचंद्र जी से कोई कार्य करना चाहते हैं तो आप श्रीहनुमानजी को माध्यम बना सकते हैं। हनुमान जी से संपर्क श्री हनुमान जी से संपर्क का सबसे अच्छा साधन श्री हनुमान चालीसा है और श्री हनुमान चालीसा की आज की चौपाई है:-

साधु सन्त के तुम रखवारे |

असुर निकन्दन राम दुलारे ||

हनुमान चालीसा की इस चौपाई के संपुट पाठ करने से दुष्टों का नाश होता है, जातक रक्षा होती है और उसकी सभी इच्छाएं पूर्ण होती हैं।

“नासे रोग हरे सब पीरा” नाम की पुस्तक में श्रीहनुमान चालीसा की चौपाइयों से संबंधित सभी उपायों का विस्तृत विवरण दिया हुआ है। इस पुस्तक को आप हमारे यहां से प्राप्त कर सकते हैं।

आइये अब मैं पंडित अनिल पाण्डेय आपको इस सप्ताह अर्थात 27 जुलाई से 2 अगस्त 2026 तक के सप्ताह के, ग्रहों के विचरण की जानकारी दे रहा हूं।

इस सप्ताह सूर्य और गुरु कर्क राशि में, मंगल वृष राशि में, बुध मिथुन राशि और राहु कुंभ राशि में गोचर करेंगे।

शुक्र प्रारंभ में सिंह राशि में रहेगा तथा एक तारीख को 5:54 प्रातः से कन्या राशि में गोचर करेगा। शनि प्रारंभ मीन राशि में मार्गी रहेगा तथा 27 तारीख के 11:29 दिन से वक्री हो जाएगा।

आईये अब हम राशिवार राशिफल की चर्चा करते हैं।

मेष राशि

इस सप्ताह आपकी प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी। जनप्रतिनिधियों के लिए यह सप्ताह अच्छा रहेगा। आपको इस सप्ताह अपने संतान से कोई विशेष मदद नहीं मिल पाएगी। भाई बहनों के साथ संबंध ठीक होंगे। उनसे आपके सहयोग भी प्राप्त होगा। कर्मचारी और अधिकारियों को इस सप्ताह सावधान रहकर कार्यों को करना चाहिए। कचहरी के कार्यों में सावधान रहें। इस सप्ताह आपके लिए 29 और 30 तारीख उल्लेखनीय रूप से अनुकूल है। रविवार को दोपहर के बाद से आपको सावधान रहने की आवश्यकता है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन आदित्य हृदय स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन बृहस्पतिवार है।

वृष राशि

इस सप्ताह व्यापारियों का व्यापार अच्छा चलेगा। धन आने की संभावना है। भाई बहनों से अच्छा सहयोग प्राप्त होगा। भाग्य के स्थान पर आपको कर्म पर विश्वास करना चाहिए। भाग्य के सहारे नहीं बैठना चाहिए। आपको अपने प्रतिष्ठा के प्रति भी इस सप्ताह जागरूक रहना चाहिए। अगर आप सचेत नहीं रहेंगे तो आपकी प्रतिष्ठा में कमी हो सकती है। आपके स्वास्थ्य में मामूली गड़बड़ी हो सकती है। आपके जीवनसाथी का स्वास्थ्य उत्तम रहेगा। इस सप्ताह आपके लिए 31 जुलाई, एक और 2 अगस्त कार्यों को करने के लिए उचित है। 27 और 28 जुलाई को आपको सचेत होकर कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन लाल मसूर की दाल का दान करें और मंगलवार को हनुमान जी के मंदिर में जाकर कम से कम तीन बार हनुमान चालीसा का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन शुक्रवार है।

मिथुन राशि

इस सप्ताह आपका और आपके जीवन साथी का स्वास्थ्य ठीक रहेगा। धन आने की पूरी उम्मीद है। कचहरी के कार्यों में सावधान रहें। अन्यथा नुकसान हो सकता है। इस सप्ताह आपको भाग्य से बहुत कम मदद मिल पाएगी। भाई बहनों से संबंध तनाव पूर्ण हो सकते हैं। व्यापारियों को लाभ हो सकता है। इस सप्ताह आपके लिए 27, 28 जुलाई और 2 अगस्त लाभदायक है। 29 और 30 तारीख को आपको सावधान रहकर कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन चावल का दान करें और शुक्रवार को मंदिर में जाकर गरीबों के बीच में सफेद वस्त्रो का दान करें। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।

कर्क राशि

 इस सप्ताह आपका आत्मविश्वास अत्यंत उत्तम रहेगा। आपके कई कार्य आपके आत्मविश्वास के कारण हो जाएंगे। यह सप्ताह आपके संतान के लिए भी उत्तम है। उनका आपको अच्छा सहयोग मिलेगा। उनके कार्य भी संपन्न होंगे। छात्रों के लिए सप्ताह ठीक है। परीक्षाओं में उनको सफलता प्राप्त होगी। भाग्य से इस सप्ताह आपको मदद प्राप्त होगी। इस सप्ताह आपके लिए 29 और 30 तारीख उत्तम है। अगर आप अपने लिए जीवनसाथी ढूंढ रहे हैं तो यह दोनों तारीख आपके लिए फल दायक रहेगी। सप्ताह के बाकी दिनों में आपको सचेत रहना चाहिए। भगवान शिव का दूध और जल से अभिषेक करें। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।

सिंह राशि

इस सप्ताह कचहरी के कार्यों में अत्यंत परिश्रम करने पर आपको सफलता मिल सकती है। व्यापार में लाभ का योग है। आपको भी धन लाभ होगा। कर्मचारी एवं अधिकारियों को इस सप्ताह सावधान रहकर कार्यों को करना चाहिए। अविवाहित जातकों के लिए यह सप्ताह ठीक है। उनके विवाह के नए-नए प्रस्ताव आएंगे। आपकी प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी। संतान से आपको अच्छा सहयोग प्राप्त हो सकता है। परीक्षार्थियों को परीक्षा में अच्छी सफलता प्राप्त होगी। इस वर्ष आप का धन काफी अच्छे कार्यों में खर्च होगा। इस सप्ताह आपके लिए 31 जुलाई 1 अगस्त तथा 2 अगस्त के दोपहर तक का समय कार्यों के लिए लाभकारी है। 29, 30 जुलाई और 2 अगस्त की दोपहर के बाद के समय के दौरान आपको सावधान रहकर कार्यों को निपटाना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन काले कुत्ते को तंदूर की रोटी खिलाएं। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवार है।

कन्या राशि

इस सप्ताह आपके पास धन आने का सुंदर योग है। व्यापार में आपको लाभ होगा। व्यापारियों को इस समय का फायदा उठाना चाहिए। आपकी प्रतिष्ठा में सामान्य वृद्धि संभव है। अविवाहित जातकों के लिए यह समय अच्छा है। उनके विवाह के प्रस्ताव आएंगे। कचहरी के कार्यों में आपको सावधानी बरतना चाहिए। भाई बहनों के साथ संबंध अच्छे रहेंगे। आपके संतान को थोड़ा कष्ट हो सकता है। संतान से आपके सहयोग नहीं मिल पाएगा। इस सप्ताह आपके लिए 27 और 28 जुलाई तथा 2 अगस्त के दोपहर के बाद का समय कार्यों को करने के लिए सफलता दायक है। 31 जुलाई तथा एक और दो अगस्त के दोपहर तक के दौरान आपको सजग रहकर कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन हनुमान चालीसा का पाठ करें तथा मंगलवार को हनुमान जी के मंदिर में जाकर कम से कम तीन बार हनुमान चालीसा का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।

तुला राशि

अधिकारी एवं कर्मचारियों के लिए यह सप्ताह अत्यंत उत्तम है। उनके प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी। उनको अपने अधिकारियों से सम्मान प्राप्त होगा। इस सप्ताह आपको अपने भाग्य से भी मदद प्राप्त होगी। आपके संतान को कष्ट हो सकता है। इस सप्ताह आपके शत्रु शांत रहेंगे परंतु समाप्त नहीं होंगे। मामूली धन आने की उम्मीद है। व्यापारियों का व्यापार अच्छा चलेगा। ‌भाई बहनों के साथ संबंध थोड़ा कम ठीक रहेंगे। इस सप्ताह आपके लिए 29 और 30 जुलाई विभिन्न प्रकार के कार्यों को करने के लिए शुभ है। 2 अगस्त के दोपहर के बाद से आपको सावधान रहकर कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन रुद्राष्टक का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।

वृश्चिक राशि

इस सप्ताह भाग्य आपका भरपूर साथ देगा। आपके कई कार्य भाग्य के कारण हो सकते हैं। आपके जो भी कार्य भाग्य के कारण रुक रहे हों उनको इस सप्ताह करना चाहिए। आपका स्वास्थ्य इस सप्ताह उत्तम रहेगा। भाई बहनों के साथ संबंधों में थोड़ा तनाव आ सकता है। अधिकारी एवं कर्मचारियों को इस सप्ताह सावधान होकर कार्य करना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए 31 जुलाई तथा 1 अगस्त एवं 2 अगस्त की दोपहर तक का समय कार्यों को करने हेतु लाभप्रद है। सप्ताह के बाकी दिन भी ठीक-ठाक है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन राम रक्षा स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।

धनु राशि

इस सप्ताह व्यापारियों का व्यापार अच्छा चलेगा। आपका और आपके जीवनसाथी का स्वास्थ्य उत्तम रहेगा। इस सप्ताह आप अपने शत्रुओं को थोड़े से प्रयास से ही पराजित कर सकते हैं। खून संबंधी रोगों से बचने का प्रयास करें। कचहरी के कार्यों को सावधानी पूर्वक कार्य करने से सफलता प्राप्त हो सकती है। भाग्य से आपको इस सप्ताह मामूली सहयोग ही मिल पाएगा। इस सप्ताह आपके लिए 27 और 28 जुलाई तथा 2 अगस्त को दोपहर की बाद का समय कार्यों को करने हेतु आपके लिए प्रभावशाली है। सप्ताह के बाकी सभी दिन ठीक-ठाक हैं। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन शिव पंचाक्षर मंत्र का जाप करें। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवार है।

मकर राशि

यह सप्ताह आपके जीवन साथी के लिए उत्तम है। उनका स्वास्थ्य अच्छा रहेगा। अगर वह कोई कार्य करते हैं जहां से धन प्राप्त हो सकता है तो उनको धन प्राप्ति का अच्छा योग है। उनके व्यापार में लाभ होगा। इस सप्ताह आपको अपने संतान से कम सहयोग प्राप्त होगा। इस सप्ताह आपको दुर्घटनाओं से बचने का प्रयास करना चाहिए। कचहरी के कार्यों में परिश्रम के बाद सफलता मिल सकती है। इस सप्ताह आपके लिए 29 और 30 जुलाई अनुकूल है। 27 और 28 जुलाई को आपको सजग रह करके कार्यों का निष्पादन करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन शिव पंचाक्षर स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।

कुंभ राशि

यह सप्ताह आपके संतान के लिए उत्तम है। उनका आपको अच्छा सहयोग भी प्राप्त होगा। छात्रों की पढ़ाई अच्छी चलेगी। परीक्षाओं में उनको सफलता प्राप्त होगी। आपका या आपके जीवनसाथी का स्वास्थ्य थोड़ा खराब हो सकता है। आपको अपने प्रतिष्ठा के प्रति सतर्क रहना चाहिए, अन्यथा लोग आपकी प्रतिष्ठा को खराब करने का प्रयास कर सकते हैं। धन आने का मामूली योग है। कर्मचारी और अधिकारियों के लिए यह सप्ताह ठीक रहेगा। इस सप्ताह आपके लिए 31 जुलाई तथा एक और दो अगस्त की दोपहर तक का समय सफलता प्राप्त करने के लिए अनुकूल है। 29 और 30 जुलाई को आपको सतर्क रहकर कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गणेश अथर्व शीर्ष का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन शनिवार है।

मीन राशि

इस सप्ताह आपकी प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी। आपको अपने संतान से अच्छा सहयोग मिलेगा। छात्रों की पढ़ाई ठीक-ठाक चलेगी। उनको परीक्षाओं में सफलता का योग है। आपके माता-पिता जी का स्वास्थ्य उत्तम रहेगा। भाई और बहनों के साथ आपके संबंधों में थोड़ा तनाव आ सकता है। कर्मचारी एवं अधिकारियों के लिए यह सप्ताह उत्तम है। भाग्य से भी आपको मदद मिल सकती है। आप अपने शत्रुओं को इस सप्ताह आसानी से पराजित कर सकते हैं। थोड़ा सा प्रयास करना पड़ेगा। इस सप्ताह आपके लिए 27 और 28 जुलाई का समय विभिन्न प्रकार के कार्यों के लिए मददगार है। 31 जुलाई तथा एक और दो अगस्त को किसी भी कार्य को करने के लिए अधिक परिश्रम करना पड़ेगा। आपको चाहिए कि आप इस सप्ताह विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवार है।

 

ध्यान दें कि यह सामान्य भविष्यवाणी है। अगर आप व्यक्तिगत और सटीक भविष्वाणी जानना चाहते हैं तो आपको मुझसे दूरभाष पर या व्यक्तिगत रूप से संपर्क कर अपनी कुंडली का विश्लेषण करवाना चाहिए। मां शारदा से प्रार्थना है या आप सदैव स्वस्थ सुखी और संपन्न रहें। जय मां शारदा।

 राशि चिन्ह साभार – List Of Zodiac Signs In Marathi | बारा राशी नावे व चिन्हे (lovequotesking.com)

निवेदक:-

ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय

(प्रश्न कुंडली विशेषज्ञ और वास्तु शास्त्री)

सेवानिवृत्त मुख्य अभियंता, मध्यप्रदेश विद्युत् मंडल 

संपर्क – साकेत धाम कॉलोनी, मकरोनिया, सागर- 470004 मध्यप्रदेश 

मो – 8959594400

ईमेल – 

यूट्यूब चैनल >> आसरा ज्योतिष 

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक ८१ आणि ८२ ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

श्री विश्वास देशपांडे

? इंद्रधनुष्य ?

☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक ८१ आणि ८२ ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

श्लोक क्र. ८१ – – 

मना मच्छरे नाम सांडू नको हो ।

अती आदरे हा निजध्यास राहो ।

समस्तांमधे नाम हे सार आहे ।

दुजी तूळणा तूळिता ही न साहे ।।८१।।

अर्थ : हे मना, कोणत्याही प्रकारच्या मत्सराच्या आहारी जाऊन देवाचे नामस्मरण कधीही सोडू नकोस. इतरांचा हेवा करण्यात वेळ वाया घालवण्याऐवजी, अत्यंत आदराने व निष्ठेने भगवंताच्या नामाचा अखंड ध्यास घे. देवाचे नामस्मरण हेच सर्व श्रेष्ठ साधन आहे. त्याची तुलना अन्य कशाशीही करवत नाही.

(मच्छरे – मत्सराने, सांडू नको – सोडू नको, निजध्यास – मनाला ध्यास/ओढा लागणे, समस्तांमधे – ईश्वरप्राप्तीच्या सर्व साधनांमध्ये, दुजी – दुसरी, तूळिता – तुलना करता)

विवेचन : या श्लोकातही समर्थ नामाचा महिमा आपल्याला सांगतात. आधीच्या श्लोकात निर्धारपूर्वक ज्या मत्सराचा त्याग करायला समर्थांनी आपल्याला सांगितले, त्याचा उल्लेख या ठिकाणी पुन्हा येतो. मानवी स्वभाव असा आहे की जी गोष्ट आपल्याकडे नाही पण दुसऱ्याकडे आहे असे पाहिल्यावर त्या व्यक्तीबद्दल पहिली प्रतिक्रिया मनात येते ती म्हणजे मत्सर. हा मत्सर वाढत गेला की अनर्थ घडतो. नको त्या गोष्टी माणसाच्या हातून घडतात. गीतेत सांगितल्याप्रमाणे ‘ मत्सर ‘ हा आसुरी गुण आहे. मागील काही श्लोकात हिरण्यकश्यपूचे उदाहरण आपण पाहिले आहे. हिरण्यकश्यपू राजा होता, सामर्थ्यवान होता, स्वतःच्या शक्तीचा त्याला गर्व होता, इथपर्यंत सर्व ठीक आहे. पण जेव्हा लोक त्याची स्तुती करायची सोडून परमेश्वराची स्तुती करतात, तेव्हा मात्र त्याच्या मनात भगवंताच्या नामाविषयी मत्सर निर्माण होतो. मग प्रजेने आपलेच नाम घ्यावे, भगवंताचे नाम कोणी घेऊ नये असा आदेश तो काढतो. पण त्याचा स्वतःचा मुलगाच विष्णुभक्त असतो. शेवटी मत्सर आणि द्वेषामुळे हिरण्यकश्यपूचा नाश होतो हे आपल्याला माहिती आहे.

काही लोकांना नकळत नामाबद्दलही द्वेष असतो. नामाने असे काय होणार आहे? त्याला कशाला एवढे महत्व द्यायचे? मग नकळत नामाबद्दल मनात मत्सर निर्माण होतो. नाम घ्यायला सुरुवात केली असेल तरी मग असा मनुष्य नाम घेणे सोडून देतो. म्हणून समर्थ म्हणतात की बाबारे, मत्सराच्या अधीन होऊन नाम घेणे सोडू नकोस.

मत्सराच्या अधीन झालेल्या माणसाला नामाचे महत्वच कळलेले नसते. महत्व कळण्यासाठी नामाचे सामर्थ्य माहित असावे लागते. त्यासाठी संतांचा उपदेश मनापासून ऐकावा लागतो. तो उपदेश नुसता ऐकून चालत नाही तर तो पटला पाहिजे. इथे बळजबरी उपयोगाची नसते. हे महती जेव्हा पटते, तेव्हा भगवंताबद्दल, नामाबद्दल आदर निर्माण होतो. म्हणून भगवंताचे नाम आदरपूर्वक घेतले पाहिजे. त्यात प्रेम हवे. आणखी महत्वाची गोष्ट म्हणजे त्याचा ध्यास लागला पाहिजे. आपल्या आवडीची एखादी गोष्ट असते. मग तिचा आपल्याला ध्यास म्हणजेच छंद लागतो. हा छंद लागला म्हणजे मन पुन्हापुन्हा तिकडे ओढ घेते. कोणी सांगावे लागत नाही. तुकाराम महाराज म्हणतात, ” गोविंद गोविंद, मना लागलिया छंद. ” एखाद्या विद्यार्थ्याला अभ्यासाची आवड निर्माण झाली की त्याला कोणी अभ्यास कर म्हणून सांगावे लागत नाही. साधकाला नामाची गोडी लागली की मग नाम घ्या असे त्याला सांगावे लागत नाही.

परमेश्वर प्राप्तीची अनेक साधने आहेत. अनेक मार्ग आहेत. पण त्या सर्वांमध्ये ‘ नाम ‘ हे साधन श्रेष्ठ आहे. त्यासाठी कोणतीही उपाधी, कोणतेही साधन लागत नाही. जपमाळ नसली तरी चालते. आपले काम करताना देखील नाम जपता येते. ‘ हरी मुखे म्हणा, हरी मुखे म्हणा । पुण्याची गणना कोण करी ।। असे ज्ञानेश्वर माउली म्हणतात. त्याचे तात्पर्य हेच आहे. ते नाम सोपे रे रामकृष्ण गोविंद असे ते सांगतात ते याचसाठी. समर्थही आपल्याला हीच गोष्ट सांगतात. संतांच्या उपदेशात एकवाक्यता असते. लोककल्याणाची तळमळ आढळते. शब्द भलेही वेगळे असतील पण तात्पर्य एकच असते.

तेव्हा हे मना, कोणत्याही परिस्थितीत तू नाम घेणे सोडू नकोस. ते अत्यंत आदरपूर्वक घे. समस्त साधनांमध्ये ते सारभूत आहे. त्याची महती एवढी की त्याची तुलना अन्य कशाशीही होऊ नाही. ‘ नामपरते तत्व नाही रे अन्यथा. ‘ हे लक्षात ठेव.

स्वसंवाद : 

१. माझ्याकडे जे नाही आणि इतरांकडे आहे, ते पाहून माझ्या मनात नकळत ‘मत्सर’ किंवा हेवा निर्माण होतो का? त्यामुळे माझे मनस्वास्थ्य हरवते का?

२. संतांनी सांगितल्याप्रमाणे, माझ्या मनाला संसार किंवा इतर भौतिक गोष्टींऐवजी कधी भगवंताच्या नामाचा ‘निजध्यास’ (छंद) लागला आहे का?

३. नाम घेताना भगवंताबद्दल आदर आणि प्रेम माझ्या मनात असते का?

४. माउलींनी सांगितल्याप्रमाणे “नामापरते तत्त्व नाही रे अन्यथा” यावर माझा पूर्ण विश्वास बसला आहे का? की माझे मन अजूनही इतर साधनांच्या गराड्यात फिरत असते?

===== 

श्लोक क्र. ८२ – – 

बहू नाम या रामनामी तुळेना ।

अभाग्या नरा पामरा हे कळेना ।

विषा औषध घेतले पार्वतीशे ।

जिवा मानवा किंकरा कोण पूसे? ।।८२।।

अर्थ : रामनामाची तुलना अन्य कोणत्याही नामाशी होऊ शकत नाही. परंतु जी माणसे पारमार्थिक दृष्ट्या अभागी असतात, त्यांना (रामनामाचे हे महत्व) कळत नाही. अहो, प्रत्यक्ष भगवान शंकरांनी विषाचा दाह शांत करण्यासाठी रामनाम हे औषध म्हणून घेतले. मग आपल्यासारख्या सामान्य जीवांची त्यासमोर किंमत काय?

(तुळेना – तुलना होऊ शकत नाही, अभागी नर – पारमार्थिक दृष्टया दुर्दैवी व्यक्ती, पार्वतीशे – भगवान शंकर/ पार्वतीचे पती, किंकर – चाकर/दास)

विवेचन : या श्लोकामध्ये देखील अन्य श्लोकांप्रमाणे समर्थ रामनामाचे महत्व आपल्या मनावर ठसवत आहेत. श्रीराम हे समर्थांचे आराध्य दैवत. त्यामुळे साहजिकच त्यांना रामनामापुढे अन्य नामाचे महत्व वाटत नाही. रामनामाची तुलना अन्य कशाशीही होऊ शकत नाही असे त्यांना वाटते. आणि त्यांना असे वाटणे हे अगदी बरोबर आहे. रामरक्षेचा समारोप करताना बुधकौशिक ऋषींनी रामनामाचे महत्व सांगताना, ” सहस्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने ” असे म्हणतात. अर्थात या श्लोकात भगवान शंकर पार्वतीला रामनामाचे महत्व सांगताना म्हणतात की राम राम या नामातच माझा जीव रमतो. रामनाम हे विष्णूच्या सहस्त्र नामांची बरोबरी करणारे आहे. खरे तर रामनामाचे महत्व स्पस्ट करणारे एवढे मोठे उदाहरण दिल्यानंतर अन्य काही सांगण्याची आवश्यकताच राहत नाही. पण तरीदेखील माता जशी तळमळीने आपल्या मुलाला एखादी गोष्ट समजावून सांगते, तसेच समर्थ आपल्याला सांगत आहेत.

आपली ज्या देवतेवर श्रद्धा असेल, त्या देवतेचे नाम हे अत्यंत श्रेष्ठ आहे असे आपल्याला वाटले पाहिजे. आपण जर शंकराची भक्ती करीत असू तर ‘ ओम नमः शिवाय ‘ या मंत्रावर आपली दृढ श्रद्धा असली पाहिजे. आपण जर विष्णूचे भक्त असू तर ‘ ओम नमो भगवते वासुदेवाय ‘ या मंत्रावर आपली दृढ श्रद्धा असली पाहिजे. तसेच रामनामाचे महत्व श्रीरामाच्या भक्तांना वाटले पाहिजे. ते सांगण्यासाठीच समर्थांची एवढी तळमळ!

पण समर्थ म्हणतात,” जी माणसे पारमार्थिक दृष्टया अभागी असतात त्यांना रामनामाचे हे महत्व (सांगूनही) कळत नाही. म्हणूनही असे जीव अभागीच आहेत. मुखामध्ये रामनाम यायला किंवा त्याची गोडी वाटायला देखील काही तरी पूर्वसंचित हवे. मुखात रामनाम येणे किंवा रामनाम घ्यावेसे वाटणे हे खरोखरच भाग्याचे लक्षण आहे. ज्यांना तसे वाटत नाही ते जीव अभागी!

देवांनी आणि राक्षसांनी मिळून समुद्रमंथन केले. त्यातून दिव्य अशा चौदा रत्नांसोबतच हलाहल (जहाल विष) देखील बाहेर आले. त्यामुळे सर्व प्राणिमात्रांच्या आणि सृष्टीच्या अस्तित्वालाच धोका उत्पन्न झाला. भगवान शंकरांनी हे हलाहल प्राशन करून सर्व सृष्टी आणि प्राणिमात्रांचे रक्षण केले. पण त्यांचा अंगाचा तीव्र दाह होऊ लागला. तो कशानेच शांत होईना. त्या हलाहलाने त्यांचा कंठ निळा झाला. ते नीलकंठ म्हणून ओळखले जाऊ लागले. विषाचा दाह शांत होण्यासाठी त्यांनी शीतल चंद्र मस्तकी धारण केला. गंगेला देखील मस्तकी धारण केले. पण शेवटी रामनामानेच त्यांचा दाह शांत झाला.

जालीमातील जालीम विषाचा देखील ज्या औषधाने दाह शांत होतो, असे औषध म्हणजे रामनाम आहे. सर्व भव म्हणजे संसाराचे भय हरण करणारे, दुःख दूर करणारे असे हे औषध आहे. ज्याप्रमाणे श्रीरामाचा बाण अचूक शरसंधान करतो, तसे रामनाम म्हणजे रामबाण औषध आहे. आधुनिक विज्ञानाने देखील रामनामाचे महत्व मान्य केले आहे. आजचे मानसशास्त्र आणि न्यूरो सायन्स रामनाम हे प्रभावी साउंड थेरपी आणि ध्यान पद्धतीसाठी अत्यंत उपयुक्त असल्याचे स्पष्ट करतात. तणावमुक्तीसाठी रामनाम ऊर्जा प्रदान करणारे असल्याचे ही आधुनिक शास्त्रे मान्य करतात.

प्रत्यक्ष भगवान शंकर जेव्हा रामनामाच्या आश्रय घेतात तेव्हा आपल्यासारख्या सामान्य नराची काय कथा? संत तुलसीदासजी म्हणतात, ” रामनाम में पावत पावन, रवी तेजोमय चंद्र सुधा धन. ” रामनाम हे पावन करणारे आहे. ज्याप्रमाणे सूर्याचा तेज आणि चंद्राची शीतलता आपल्याला जीवन प्रदान करते, तसेच हे रामनाम सर्व सुख, परम शांती आणि ऊर्जा देणारे आहे.

स्वसंवाद :: 

१. ज्याप्रमाणे भगवान शंकरांनी विषाचा दाह शांत करण्यासाठी रामनामाचा आश्रय घेतला, तसा मी माझ्या आयुष्यातील राग, मत्सर किंवा चिंतेचा दाह शांत करण्यासाठी नामस्मरणाचा आधार घेतो का?

२. “मुखामध्ये रामनाम येणे किंवा त्याची गोडी वाटणे हे भाग्याचे लक्षण आहे,” हे लक्षात घेऊन मी माझ्या या परम भाग्याचा रोज सुयोग्य वापर करतो का?

३. माझ्या आराध्य दैवताच्या नामावर आणि मंत्रावर माझी संपूर्ण आणि अनन्य श्रद्धा आहे, की माझे मन अजूनही डळमळीत होत असते?

४. संत तुलसीदासांनी म्हटल्याप्रमाणे, रामनामातील सूर्याचे तेज आणि चंद्राची शीतलता अनुभवण्यासाठी मी दिवसातून काही क्षण तरी शांत चित्ताने नाम घेतो का?

– क्रमशः श्लोक श्लोक ८१ आणि ८२

© श्री विश्वास देशपांडे

चाळीसगाव

प्रतिक्रियेसाठी ९४०३७४९९३२

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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