(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि। संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – एक साथ देश की कुशल सदा मनाइए।।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २९० \ ☆
☆ एक साथ देश की कुशल सदा मनाइए।।☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆
विज्ञान की अन्य विधाओं में भारतीय ज्योतिष शास्त्र का अपना विशेष स्थान है। हम अक्सर शुभ कार्यों के लिए शुभ मुहूर्त, शुभ विवाह के लिए सर्वोत्तम कुंडली मिलान आदि करते हैं। साथ ही हम इसकी स्वीकार्यता सुहृदय पाठकों के विवेक पर छोड़ते हैं। हमें प्रसन्नता है कि ज्योतिषाचार्य पं अनिल पाण्डेय जी ने ई-अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों के विशेष अनुरोध पर साप्ताहिक राशिफल प्रत्येक शनिवार को साझा करना स्वीकार किया है। इसके लिए हम सभी आपके हृदयतल से आभारी हैं। साथ ही हम अपने पाठकों से भी जानना चाहेंगे कि इस स्तम्भ के बारे में उनकी क्या राय है ?
☆ ज्योतिष साहित्य ☆ साप्ताहिक राशिफल (24 अगस्त से 30 अगस्त 2026) ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆
जय श्री राम। कविवर श्रेष्ठ श्री कुमार विश्वास जी के द्वारा रचित भजन की एक लाइन है “राम राजा भी हैं और तपस्वी भी हैं”। यह पंक्ति श्री रामचंद्र जी के पूरे व्यक्तित्व को चित्रित करती हैं। भजन शब्द का अर्थ होता है किसी को बार-बार याद करना और अगर आप नियमानुसार भजन करेंगे तो मृत्यु के उपरांत रघुवर पुर अर्थात बैकुंठ या अयोध्या पहुंचेंगे और वहां पर आपको हरि भक्त कहा जाएगा। श्री राम जी के व्यक्तित्व में ही श्री हनुमान जी पूरी तरह से समाहित है। श्री हनुमान जी को पाने का एक अच्छा तरीका है श्री हनुमान चालीसा का भजन और श्री हनुमान चालीसा की आज की चौपाई है
अन्त काल रघुबर पुर जाई |
जहाँ जन्म हरि-भक्त कहाई ||
इस चौपाई के संपुट पाठ करने से हनुमत कृपा प्राप्त होती है। यह सभी दुखों का नाश करती है और आपका बुढ़ापा और परलोक दोनो सुधारती है।
नाशे रोग हरे सब पीरा” नाम की पुस्तक में श्रीहनुमान चालीसा की चौपाइयों से संबंधित सभी उपायों का विस्तृत विवरण दिया हुआ है। इस पुस्तक को आप हमारे यहां से प्राप्त कर सकते हैं।
अब मैं पंडित अनिल पाण्डेय आपको इस सप्ताह अर्थात 24 अगस्त से 30 अगस्त 2026 तक के सप्ताह के साप्ताहिक राशिफल के बारे में बताऊंगा। परंतु राशिफल के पहले मैं आपको इस सप्ताह में ग्रहों के गोचर के बारे में पूरी जानकारी दूंगा। इस सप्ताह शुक्र कन्या राशि में, सूर्य और बुध सिंह राशि में, मंगल मिथुन राशि में, गुरु कर्क राशि में, शनि वक्री होकर मीन राशि में तथा राहु कुंभ राशि में गोचर करेंगे। आईये अब राशिवार राशिफल की चर्चा करते हैं।
मेष राशि
इस सप्ताह आपके प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी। माता जी का स्वास्थ्य अच्छा रहेगा। भाग्य से मदद मिलेगी। छात्रों की पढ़ाई अच्छी चलेगी। आपको अपने संतान से सहयोग प्राप्त होगा। आपके संतान को विभिन्न क्षेत्रों में सफलता प्राप्त होगी। अगर आप बीमार चल रहे हैं तो आपके स्वास्थ्य में निरंतर सुधार होगा। अधिकारी और कर्मचारियों को इस सप्ताह सावधान रहकर अपने कार्यों को करना चाहिए। व्यापारियों के लिए सप्ताह ठीक रहेगा। इस सप्ताह आपके लिए 25, 26 और 27 तारीख सफलता दायक है। 30 तारीख को आपको सावधान रहकर अपने कार्यों को निपटाना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन काले उड़द की दाल का दान करें और शनिवार को शनि मंदिर में जाकर शनि देव की आराधना करें। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवार है।
वृष राशि
भाई बहनों के साथ आपके संबंध ठीक-ठाक रहेंगे। आपके प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी। आपके संतान के लिए यह सप्ताह अच्छा रहेगा। भाग्य से मदद मिलने की संभावना थोड़ा कम है। आपको अपने संतान से अच्छा सहयोग प्राप्त होगा। विद्यार्थियों की पढ़ाई ठीक चलेगी। माता जी का स्वास्थ्य उत्तम रहेगा। आपका और आपके जीवन साथी का स्वास्थ्य भी ठीक रहेगा। इस सप्ताह आपके लिए 27, 28 और 29 तारीख सफलता प्राप्त करने के लिए उचित है। 24 तारीख को आपको सचेत रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन राम रक्षा स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन शुक्रवार है।
मिथुन राशि
इस सप्ताह आपके धन लाभ में वृद्धि होगी। कर्मचारी एवं अधिकारियों के लिए यह सप्ताह ठीक रहेगा। दुर्घटनाओं से आप इस सप्ताह बचेंगे। भाई बहनों के साथ आपका संबंध ठीक रहेगा। आपको अपने प्रतिष्ठा के प्रति सचेत रहना चाहिए। कई लोग आपकी प्रतिष्ठा के हनन के लिए सक्रिय रहेंगे। भाई बहनों के साथ संबंध ठीक रहेगा। इस सप्ताह आपके लिए 24 और 30 तारीख कार्यों को करने के लिए उपयोगी है। 25, 26 और 27 तारीख को आपको सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन काले कुत्ते को तंदूर की बनी रोटी खिलाएं। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।
कर्क राशि
इस सप्ताह आपके पास धन होने का अच्छा योग है। थोड़े से प्रयास में अधिक धन की प्राप्ति होगी। कचहरी के कार्यों के प्रति सतर्क रहें। अगर आप सावधान नहीं रहेंगे तो आपको नुकसान होगा। भाग्य से थोड़ी बहुत मदद मिल सकती है। भाई बहनों के साथ संबंधों में तनाव हो सकता है। आपका स्वास्थ्य अच्छा रहेगा। माताजी और पिताजी का स्वास्थ्य भी ठीक रहेगा। प्रेम संबंध में वृद्धि संभव है। इस सप्ताह आपके लिए 25, 26 और 27 की दोपहर तक का समय कार्यों को करने के लिए मददगार है। सप्ताह के बाकी दिनों में आपको सचेत रहकर कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन हनुमान चालीसा का पाठ करें और शनिवार को दक्षिण मुखी हनुमान जी के सामने बैठकर कम से कम तीन बार हनुमान चालीसा का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।
सिंह राशि
इस सप्ताह आपका आत्मविश्वास अच्छा रहेगा। व्यापार में वृद्धि होगी। कार्यों को करने में आपकी दिलचस्पी बढ़ेगी। भाई बहनों के साथ संबंधों में थोड़ा तनाव हो सकता है। धन आने का योग है। खर्चों में वृद्धि संभव है। इस वर्ष आपके यहां शादी ब्याह या जमीन की खरीदी या ऐसा कोई अन्य कार्य हो सकता है जिसमें काफी मात्रा में धन व्यय हो। इस सप्ताह आपके लिए 27 की दोपहर के बाद से लेकर 28 और 29 तारीख कार्यों को करने में के लिए लाभप्रद है। 25, 26 और 27 की दोपहर तक तथा 30 अगस्त का समय कार्यों को करने के लिए कम उचित है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन सोमवार है।
कन्या राशि
अविवाहित जातकों के लिए यह सप्ताह अच्छा रह सकता है। विवाह के प्रस्ताव आएंगे। पुराने संबंधों में वृद्धि होगी। नए संबंध भी बन सकते हैं। धन आने का सुंदर योग है। भाई बहनों के साथ संबंध ठीक रहेगा। कचहरी के कार्यों में सावधानी बरतें। सफलता मिल सकती है। कर्मचारी और अधिकारियों को इस सप्ताह सावधान रहकर अपने कार्यों को करना चाहिए इस सप्ताह आपके लिए 24 और 30 अगस्त विभिन्न प्रकार से फल दायक हैं 27 28 और 29 तारीख को आपको होशियार रहकर अपने कार्यों को करना चाहिए इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन लाल मसूर की दाल का दान करें और मंगलवार को हनुमान जी के मंदिर में जाकर कम से कम तीन बार हनुमान चालीसा का वचन करें सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।
तुला राशि
इस सप्ताह आपके पास धन आएगा। धन आने की मात्रा आपके द्वारा किए जा रहे कर्म पर निर्भर होगी। अगर आप योजनाबद्ध ढंग से अधिक मेहनत करेंगे तो अधिक धन आएगा। परंतु अगर आप मेहनत नहीं करेंगे तो अल्प मात्रा में धन की प्राप्ति हुई होगी। व्यापारियों का व्यापार अच्छा चलेगा। कर्मचारी एवं अधिकारियों के लिए भी यह सप्ताह काफी अच्छा रहेगा। आपको अपने संतान से इस सप्ताह सहयोग नहीं मिल पाएगा। भाग्य से भी आपको कम मदद मिलेगी अर्थात आप जितना मेहनत करेंगे उतना ही आपको प्राप्ति होगी। इस सप्ताह आपके लिए 25, 26 और 27 तारीख परिणाम दायक है। 30 अगस्त को आपको सजग रहकर अपने कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गाय को हरा चारा खिलाएं। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।
वृश्चिक राशि
कर्मचारी और अधिकारियों के लिए सप्ताह काफी अच्छा रहेगा। व्यापारियों के व्यापार में वृद्धि हो सकती है। अगर आप सरकारी ठेके लेते हैं तो आपको इस सप्ताह उसमें काफी लाभ हो सकता है। धन लाभ होने की पूर्ण संभावना है। भाग्य से भी आपको मदद मिलेगी। भाई बहनों के साथ तनाव हो सकता है। आपको अपने संतान से सहयोग प्राप्त होगा। इस सप्ताह आपको दुर्घटनाओं से सतर्क रहने की आवश्यकता है। इस सप्ताह आपके लिए 27, 28 और 29 तारीख शुभ है। सप्ताह के बाकी दिन भी ठीक-ठाक हैं। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन शिव पंचाक्षर मंत्र का जाप करें। सप्ताह का शुभ दिन बृहस्पतिवार है।
धनु राशि
इस सप्ताह आपको भाग्य से मदद मिलेगी। थोड़े से प्रयासों से भी आपको अधिक मात्रा में सफलता मिलेगी। अर्थात सफलता की मात्रा प्रयास से अधिक रहेगी। कर्मचारी एवं अधिकारियों को इस सप्ताह सतर्क रहना चाहिए। आपका स्वास्थ्य उत्तम रहेगा। पिताजी और जीवनसाथी के स्वास्थ्य के प्रति आपको थोड़ा सतर्क रहना चाहिए। भाई बहनों के साथ इस सप्ताह आपके संबंध थोड़ा दूरी के हो सकते हैं। इस सप्ताह आपके लिए 24 और 30 अगस्त लाभप्रद हैं। सप्ताह के बाकी दिन भी ठीक-ठाक हैं। इस सप्ताह आपको चाहिए कि प्रतिदिन रुद्राष्टक का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।
मकर राशि
आपके जीवनसाथी के लिए यह सप्ताह अच्छा रहेगा। उनको जीवन के हर क्षेत्र में सफलता प्राप्त हो सकती है। आपके माता-पिता जी का स्वास्थ्य सामान्य रहेगा अर्थात जैसे पहले था वैसा ही रहेगा। कचहरी के कार्यों में सफलता मिल सकती है, परंतु उसके लिए आपको अत्यंत सावधानी पूर्वक कार्य करना होगा। इस सप्ताह आपको अपने भाग्य से मदद नहीं मिल पाएगी। आपको अपने कर्म पर ही विश्वास करना होगा। भाई बहनों के साथ संबंध थोड़ा सामान्य नहीं रह पाएंगे। इस सप्ताह आपके लिए 25, 26 और 27 तारीख विभिन्न कार्यों को करने के लिए उचित है। 24 तारीख को आपको होशियार रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन भगवान शिव का दूध और जल से अभिषेक करें। सप्ताह का शुभ दिन शनिवार है।
कुंभ राशि
यह सप्ताह आपके जीवनसाथी के लिए उत्तम है। व्यापारियों के व्यापार में वृद्धि होगी। आपके जीवनसाथी को कार्य के हर क्षेत्र में सफलता प्राप्त होगी। अगर आपके पेट में कोई पुराना रोग है तो वह भी इस सप्ताह दूर हो सकता है। इस सप्ताह आपको अपने संतान से सहयोग प्राप्त नहीं होगा। छात्रों की पढ़ाई में रुकावट आ सकती है। परीक्षाओं में उनका असफलता प्राप्त हो सकती है। भाई बहनों के साथ संबंध सामान्य रहेंगे। मामूली धन प्राप्त होने का योग है। इस सप्ताह आपके लिए 27 के दोपहर से लेकर 28 और 29 तारीख कार्यों को करने के लिए परिणाम मूलक है। 25, 26 और 27 की दोपहर तक आपको सावधान रहकर अपने कार्यों का निष्पादन करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन शिव पंचाक्षर स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन शनिवार है।
मीन राशि
कर्मचारी एवं अधिकारियों के लिए यह सप्ताह अच्छा रहेगा। उनको अपने कार्य क्षेत्र में सफलता प्राप्त हो सकती है। आपको अपने प्रयासों से अपने शत्रुओं पर सफलता प्राप्त हो जायेगी। मानसिक तनाव थोड़ा बढ़ सकता है, परंतु आप उस पर कंट्रोल कर लेंगे। यह सप्ताह आपके संतान के लिए भी ठीक रहेगा। आपको अपने संतान से अच्छा सहयोग भी प्राप्त होगा। आपको इस सप्ताह अपने प्रतिष्ठा के प्रति सतर्क रहना चाहिए। आपके दुश्मन इस बात का पूरा प्रयास कर सकते हैं कि वे आपकी प्रतिष्ठा को गिरायें। थोड़े मात्रा में धन आने की संभावना है। इस सप्ताह आपके लिए 24 और 30 तारीख प्रभावशाली हैं। 27, 28 और 29 तारीख को आपको सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गणेश अथर्वशीर्ष का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।
ध्यान दें कि यह सामान्य भविष्यवाणी है। अगर आप व्यक्तिगत और सटीक भविष्वाणी जानना चाहते हैं तो आपको मुझसे दूरभाष पर या व्यक्तिगत रूप से संपर्क कर अपनी कुंडली का विश्लेषण करवाना चाहिए। मां शारदा से प्रार्थना है या आप सदैव स्वस्थ सुखी और संपन्न रहें। जय मां शारदा।
☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक ९७ आणि ९८ ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆
श्लोक क्र. ९७ – – –
मुखी नाम नाही तया मुक्ती कैंची ।
अहंतागुणे यातना ते फुकाची ।
पुढे अंत येईल तो दैन्यवाणा ।
म्हणोनि म्हणा रे म्हणा देवराणा ।।९७।।
अर्थ :ज्याच्या मुखी भगवंताचे नाम येत नाही त्याला मुक्ती कशी मिळणार? कर्तेपणाच्या अहंकारातून माणसाला विनाकारण यातना भोगाव्या लागतात. शेवटी मृत्यू येतो तो सुद्धा अत्यंत करुणाजनक. म्हणून सर्वानी भगवंताचे नाम घ्यायलाच हवे.
विवेचन : आयुष्यभर भगवंताचे नाम घ्यायचे नाही, भक्ती करायची नाही आणि अंतकाळी भगवंताने आपल्याला मुक्ती द्यावी अशी अपेक्षा करायची. पण काही केलेच नाही तर मुक्ती मिळेल कशी? मुक्तीची अशी अपेक्षा करणे म्हणजे शेतात धान्य पेरण्याचे श्रम करायचे नाहीत आणि आयते धान्य किंवा पीक आपल्या घरात येईल अशी अपेक्षा करण्यासारखेच आहे. आपल्याला आपल्या कर्तेपणाचा भयंकर अभिमान असतो. मी हे केले, मी ते केले. माझ्यामुळेच सगळे होते आहे असा अभिमान मनुष्य बाळगतो. पण शेवटी एक दिवस हा कर्तेपणाचा फुगा फुटतो. वृद्धापकाळी मुले, सुना विचारत नाहीत तेव्हा मनात निराशा घर करते. मी आयुष्यभर एवढे कष्ट केले, मुलांना शिकवून मोठे केले, त्यांचे लग्न केले. पण एवढे असूनही ते माझ्याकडे लक्ष देत नाहीत. आपण दुर्लक्षित आहोत ही भावना सर्वात जास्त अस्वस्थ करणारी असते.
गोंदवलेकर महाराज म्हणतात, ” देहाने कर्म करा, पण कर्तेपण स्वतःकडे घेऊ नका. कर्ता राम आहे असे म्हणा. ” आपले चुकते ते इथेच. आपण कर्तेपण रामाकडे देत नाही. म्हणून आपल्याला अपेक्षाभंगाचे दुःख भोगावे लागते. त्याशिवाय कर्तेपणाच्या धुंदीत भगवंताचे नाम घेतो कोण? निदान निवृत्त झाल्यावर तरी भगवन्नामात रमण्याची सवय लावून घ्यावी. ही सवय लागली तर संसाराचा मोह हळूहळू कमी होतो, आसक्ती कमी होऊ लागते. अशा परिस्थितीत मृत्यू आला तरी तो सुखाचा होतो. पण ही सवय नसेल तर मृत्यूप्रसंगी देखील संसारातील आसक्ती कमी होत नाही. जो मनुष्य नाम घेत नाही त्याचा अंत दीनवाणा होतो. म्हणून समर्थ म्हणतात प्रत्येकाने देवाचे नाव घ्यावेच घ्यावे. समर्थ आपल्या एका अभंगात म्हणतात, ” काळ जातो क्षणक्षणा । मूळ येईल मरणा । काही धावाधाव करी । जंव तो काळ आहे दूरी ।।”
स्वसंवाद ::
१. माझ्या कुटुंबासाठी किंवा व्यवसायासाठी केलेल्या कष्टांमध्ये मी ‘मी केले’ हा कर्तेपणाचा अहंकार बाळगून विनाकारण मानसिक यातना तर ओढवून घेत नाहीये ना?
२. गोंदवलेकर महाराजांनी सांगितल्याप्रमाणे, मी माझे कर्तव्य चोख पार पाडताना “या सगळ्याचा कर्ता-धर्ता तो प्रभू श्रीराम आहे” हा भाव मनात ठेवू शकतो का?
३. “मी मुलांसाठी एवढे केले तरी ते मला विचारत नाहीत” या विवंचनेत जगण्याऐवजी, मी आतापासूनच भगवंताच्या नामात रमून संसाराची आसक्ती कमी करण्याचा प्रयत्न करतोय का?
४. समर्थांच्या म्हणण्याप्रमाणे जर काळ क्षणोक्षणी पुढे जात आहे आणि मृत्यू अटळ आहे, तर मग माझ्या उद्धारासाठी ‘देवराणा’ श्रीरामाचे नाव घेण्यास मी अजून उशीर का करत आहे?
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श्लोक क्र. ९८ – – –
हरीनाम नेमस्त पाषाण तारी ।
बहु तारिले मानवदेहधारी ।
तया रामनामीं सदा जो विकल्पी ।
वदेना कदा जीव तो पापरूपी ।।९८।।
अर्थ :भगवंताच्या नामाने खरोखर पाषाणही तरले आहेत. रामनामाने अनेक माणसे तरून गेली आहेत. पण काही माणसांच्या मनात रामनामाबद्दल नेहमी विकल्प म्हणजे संशय असतो. असे जीव म्हणजे खरोखर पापी समजावे की ज्यांच्या मुखात रामनाम येत नाही.
विवेचन :रामनामाचे महत्व वर्णन करताना समर्थ म्हणतात की रामनामाने खरोखरीच पाषाण देखील तरले. पाषाण म्हणजे दगड. बुडणे हाच त्याचा धर्म आहे. जो त्याचा संग करील त्याला देखील तो घेऊन बुडतो. परंतु रामनामाची महती एवढी आहे की पाषाणाच्या या मूळ स्वभावात देखील अंतर्बाह्य बदल झाला. पाण्यात बुडणारा पाषाण चक्क रामनामामुळे पाण्यावर तरंगू लागला. या ठिकाणी रामायणातील सेतुबंधनाचा संदर्भ आहे. श्रीरामांना लंकेला जाण्यासाठी समुद्र उल्लंघून जायचे होते. पण जायचे कसे हा मोठा प्रश्न होता. अशा वेळी वानर सेनेतील नल, नील, जांबुवंत आणि हनुमान यांच्या साहाय्याने हा सेतू बांधण्यात आला. अर्थात यात प्रत्येकाचीच मदत झाली. अगदी खारीची देखील! रामनाम लिहिलेले दगड सागरावर तरंगू लागले आणि पाहता पाहता चक्क समुद्रावर पूल तयार झाला. हा पूल पार करून रामाची सेना लंकेला पोचली.
दगड हे रूपक आहे. या संसारसागरात ज्याने रामनामाचा आश्रय घेतला नाही असा मनुष्य देखील पाषाणासमानच आहे. पण जर तो रामनामाचा आश्रय घेईल तर या भवसागरातून तो निश्चितपणे तरून जाईल यात शंका नाही. रामनामाने तयार झालेला हा पूल माणसाला भवसागर पार करण्यासाठी मदत करेल आणि त्याच्या मदतीने तो निश्चितपणे परमेश्वरापर्यंत पोहोचेल यात शंका नाही. ‘ नाम आहे आदी अंती, नाम सर्व सार, आहे बुडत्याला नौका ठेवली आधार ‘ हे अगदी खरे आहे. म्हणून आपले सर्व कर्म नाममय झाले पाहिजे.
परंतु एवढे उदाहरण डोळ्यासमोर असूनही माणसाच्या मनात रामनामाबद्दल शंका असतात. खरेच रामनामात एवढे सामर्थ्य आहे का? नुसते रामनाम मला तारील का? असा माणूस नाम घेण्याचे टाळतो. रामनामाचे विस्मरण होणे हे पाप आहे. पण माणसाची देहबुद्धी अत्यंत प्रबळ असते. बाह्य दृश्यात त्याचे मन रमलेले असते. त्याची दृष्टी अंतराकडे म्हणजे आतमध्ये वळत नाही. अंतरात्म्याला तो जाणून घेऊ इच्छित नाही. अशा माणसाला वेद, पुराणे, शास्त्रे किंवा संतांनी कितीही समजावून सांगितले तरी त्याची खात्री पटत नाही. अशा माणसांच्या मुखी भगवंताचे नाम येत नाही. भगवंताचे नाम मुखी यायला देखील भाग्य लागते. पूर्व जन्मीच्या पापामुळे अशा व्यक्तींना भगवंताचे नाम घेण्याची बुद्धी होत नाही. पण ज्यांना कळते आहे त्यांनी तरी रामनाम अवश्य घ्यावे. कोणाच्या सांगण्याची वाट पाहू नये.
स्वसंवाद ::
१. ज्याप्रमाणे रामनामाने समुद्रावरील जड पाषाणही तरंगले, त्याप्रमाणे माझ्या मनातील संसाराचे जड विचार आणि चिंता दूर करण्यासाठी मी रामनामाची नौका धरली आहे का?
२. “नुसते नाम घेऊन काय होणार? ” अशा कुठल्यातरी ‘विकल्पाने’ (संशयाने) माझे मन घेरलेले आहे का? हा संशय दूर करण्यासाठी मी कधी नाम घेऊन अनुभव पाहीला आहे का?
३. सेतुबंधनातील खारीप्रमाणे, मी माझ्या आयुष्यात परमेश्वराच्या कार्यात किंवा सत्कर्मात माझा खारीचा वाटा उचलण्यास तयार असतो का?
४. माझी दृष्टी केवळ बाह्य दृश्य विश्वातील आकर्षणांमध्येच गुंतून पडली आहे, की मी माझ्या अंतरात्म्याला जाणून घेण्यासाठी कधी अंतर्मुख होतो?
(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब) शिक्षा- एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)
☆ लघुकथा – कसक ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆
वह घर आया और रूठ कर दादी के पास पहुच गया। उसकी बाजू पकड कर बोला- दादी , फोन पर मेरी पापा से बात करवा दे।
– क्यों ?
– दादी , कहां रहता है , मेरा पापा ?
– वो तो काम के लिए दूर रहता है ।
– बुला उसे अभी ।
– क्यों ?
– मैं अभी जाॅय के साथ खेल रहा था । उसका पापा आया और हम दोनों को कार में घुमाने ले गया ।
– फिर क्या हुआ ?
– जब मेरे पापा के पास गाड़ी है, तो मैं जाॅय के पापा की गाडी में सैर क्यों करूं ?
– बेटे , तेरे पापा नहीं आ सकते ।
– कह दे फिर मैं उनसे बात नहीं करूंगा ।
-नहीं बेटे, ऐसे नहीं कहते ।
– बस फिर, करवा दे मेरी बात। वह अपनी जिद्द पूरी करके ही माना । उसके बाद सपनों में खो गया और पापा की गाड़ी में सैर करने निकल गया ।
☆ आलेख ☆ ~ बलिया बलिदान दिवस – १९ अगस्त ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆
(क्रांतिकारियों की कहानी – श्रेयस की जुबानी)
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१९ अगस्त बलिया बलिदान दिवस है। यानी १९ अगस्त १९४२ को जब पूरे भारत में ब्रिटिश साम्राज्य का शासन था, यूँ कहे अपना बृहद भारत अंग्रेजी दासता के अधीन गुलाम था।
मैं कहानी कह रहा हूँ उस वक्त की, कि जब पूरे देश में क्रांति की ज्वाला जल उठी थी।
बलिया का अपना एक अलग इतिहास रहा है। पौराणिक काल से लेकर आज तक इस जनपद ने समय-समय पर कुछ नया कर दिखाया है। तभी तो हमारे जिले में आज भी युवाओं के मुंह से एक आवाज निकल जाती है।
“सब जिला जिला ह, हमार जिला बलिया ह”..
और इसके बाद एक नारा लगता है..”बोल बोल भृगु बाबा की जय”
आखिर सब जिला, जिला ह, त बलिया हमार जिला खास काहे ह..
इसका उत्तर मुझे जो समझ में आया वह यह कि-
जैसा कि पुराणो में विदित है कि बलिया भक्त प्रहलाद के पौत्र असुरराज बली की राजधानी हुआ करती थी। वही राजा बलि जिनके १०८ यज्ञॉ के प्रभाव ने देवराज इंद्र के भी सिंहासन को हिला कर रख दिया था, जिसके कारण भगवान विष्णु को वामन स्वरूप में दानवीर बलि के यहाँ याचक के रूप में आना पड़ा था। चूँकि राजा बलि ने १०८ यज्ञ किए थे, जिसके चलते बलिया का नाम बलियाग फिर कालांतर में बलिया पड़ा। महर्षि भृगु और भगवान विष्णु की कहानी को तो हम सभी जानते हैं,। उसके बाद १९५७ में पंडित मंगल पाण्डेय का बाकी तेवर ने मेरठ छावनी में बगावत करते हुए अंग्रेज ऑफिसर को गोली मार दिया। बाद में उन्हें फांसी हुई और आजादी का यह ऐतिहासिक बलिदान बलिया के खाते में जुड़ गया, फिर आता है वर्ष १९४२,.. वर्ष १९४२ में बलिया आज ही के दिन 19 अगस्त को बलिया चार दिनों के लिए आजाद हो गया था। फिर आया इमरजेंसी कॉल जब बलिया के लोकनायक जयप्रकाश नारायण का बिगुल बजा था और तरुणाई जग गई। इसके बाद समय-समय पर कोई न कोई ऐसे महापुरुष हुए, और उन्होंने कुछ ऐसा किया कि उनका नाम इतिहास में जुड़ गया जैसे हमारे पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय श्री चंद्रशेखर जी जैसे महापुरुषों को इस धरती ने जन्मा, जिन्होंने बलिया को अपनी अलग पहचान दी। यह पहचान का सिलसिला अभी भी खत्म नहीं हुआ है।
आज १९ अगस्त है, अब भी अगस्त का महीना अपनी पहचान पर कायम। बलिया नित नवीन इतिहास और नवभारत का इतिहास लिख रहा। हम ऐसे महापुरुषों को हम नमन करते हैं।
बलिया में क्रांति का बिगुल कैसे बजा? इसके सार संक्षेप में कहते हुए यदि हम आगे बढ़ते हैं तो कहानी कुछ यूँ बनती है-
९ अगस्त को रेडियो की खबरों के द्वारा पता चला कि महात्मा गांधी,जवाहरलाल नेहरू और सरदार पटेल जैसे नेताओं की गिरफ्तारी हो चुकी है, और पूरे देश में जरूर क्रांति की शुरुआत हो गयी थी। इसमे बलिया पीछे नही था लेकिन बलिया की क्रांति कुछ हटकर हुई, क्योंकि… बात तो वही है कि –सब जिला जिला ह..
इस कहानी को बताने पहले मैं एक ऐसे एक दो जीवित क्रांतिकारी के मुंह से सुनी हुई कहानी से इसका प्रारंभ करना चाहता हूँ जिनके साथ मुझे कुछ वक्त बिताने का अवसर मिला और उनके मुंह से कही हुई बात, उनके पौत्र श्री रजनीश सिंह जी की जुबानी है इसे आपके बीच में रख रहा हूँ, यह हम सभी की जानकारी हेतु जरूर विशेष होगी।
मैं बात कर रहा हूं जनपद बलिया के तहसील बांसडीह के अंतर्गत आने वाले गांव कैथवली के बाबू रामदयाल सिंह की जुबानी। मैं उनके नजदीक इसलिए भी हूं कि उनकी नतिनी (बेटी की बेटी) की शादी मुझसे हुई थी। और जब कभी हम लोग एक पास बैठते थे वे अक्सर वे अपनी पुरानी यादों को साझा किया करते थे.
उस वक्त चंद परिवारों को छोड़कर अन्य सामान्य परिवार आर्थिक तंगी में रहता ही था। कुछ खेती बारी होने के बावजूद भी लोगों को अपनी आर्थिक जरूर पूरा करने के लिए बाहर जाना होता था। विशेष रूप से बलिया की यह विशेषता ही रही। गंगा,सरयू (घाघरा) और तमसा (टोंस) जैसी नदियों से घिरे हुए इस जनपद, के लोग बाढ़ की विभीषिका झेलते हुए बार-बार बेघर हो जाया करते थे। हर बार जब घर लौट कर आते तो एक छप्पर डालते, एक छोटा सा नव सृजित फूस के घरों से बने का गाँव को बनाते तो कोई दुबे छपरा, दल छपरा, गोहिया छपरा बन जाता है। मैं प्रवास की बात इसलिए कर रहा हूँ कि यह प्रवास जहां एक तरफ यहाँ के लोगों के लिए अभिशाप होता था तो वहीं, यहां के लिए लोगों के लिए शैक्षिक,आर्थिक,सामाजिक उन्नति का कारण बनता रहा है। यह प्रवास सिर्फ भारत तक नहीं रहा बल्कि भारत के बाहर सुदूर मॉरीशस सहित अन्य करेबियन देशों तक पहुंचता है और वहाँ स्वयं को स्थापित करता था। मॉरीशस की कहानी मैंने अपने साहित्यिक गुरु श्री रामदेव धुरंधर से बार-बार सुनी है। उनके पूर्वज भी वर्ष 1838 में बलिया से ही मॉरीशस गए थे।
स्व.राम दयाल सिंह जी भी मिडिल पास करने के बाद आर्थिक तंगी और पारिवारिक परेशानियों को लेकर कोलकाता नौकरी पर चले गए, अपने मातृभूमि से कई सो किलोमीटर दूर वे कलकत्ता अवश्य गए लेकिन उनके दिल से, उनके मन में मातृभूमि की यादें बनी रहतीं। ६ या ७ वर्ष नौकरी करने के बाद वे बनारस लौट आए, और वहां कहीं किसी सेठ साहूकार के रहकर मुंशी गिरी का काम करने लगे। वाराणसी में गांधी जी की सभा हुई और उन्होंने क्रांतिकारियों के भाषण को सुना उनके मन में क्रांति की आग जल गई और फिर क्या था, बनारस में उन्होंने सेठ की नौकरी को लात मारा और बलिया चले आए। बलिया आकर क्रांतिकारियों के आंदोलन में जमकर जुड़ गए।
श्री राम दयाल सिंह जी (नाना जी)बताते हैं कि उस जमाने में संचार के कोई साधन नहीं हुआ करते थे। पूरे देश में क्या हो रहा है इसकी जानकारी उन्हें मात्र रेडियो,वह भी किसी खास बीबीसी न्यूज़ से पता चलती थी। अब युवाओं में जोश कैसे जगे। हर रोज की जानकारी कैसे मिले युवा रामदायल सिंह उस समय एक रेडियो लेकर आते थे और अपने गाँव कैथोलिक में एक जगह बड़की दलान हुआ करती थी, वही बैठकर रेडियो खोलने और स सारे लोग समाचार सुनते थे और उन्हें पता चलता था कि पूरे देश में क्रांति और आजादी की लड़ाई किस ढंग से लड़ी जा रही है और क्या-क्या घटनाएं घट रही है.
इन लोगों के लिए यह सिर्फ एक समाचार नहीं था, यह तो एक जलती हुई चिंगारी थी जो हर वक्त उनके भीतर जल रही थी आखिरकार यह चिंगारी शोले के शक्ल में बदल गई –
अब आगे बढ़ते हुए मैं बलिया के अंदर 1942 कि उसे क्रांति की तिथि वार घटना का वर्णन संछिप्त कर रहा हूं। इसका संदर्भ मैंने बलिया के इतिहास विद श्री शिव कुमार कौशिकेय जी की पुस्तक बलिया विरासत से लिया है –
9 अगस्त को बलिया में महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल आज की गिरफ्तारी की खबर मिलने के बाद स्थानीय स्तर पर तत्कालीन नगर मंत्री श्री उमाशंकर सोनार अपने साथी सरजू प्रसाद के साथ मिलकर 10 अगस्त को बलिया में जुलूस निकाले और सभी छात्रों और व्यापारियों ने उसमें भाग लिया।
11 अगस्त को इस जुलूस के बाद एक भाषण शहीद पार्क पर हुआ। इस भाषण के दौरान पंडित राम अनंत पांडे जी को गिरफ्तार कर लिया गया। आंदोलन की चिंगारी शहर से गांवों की तरफ बढ़ गई। 12 अगस्त को बलिया और बैरिया में विशाल जुलूस निकाला गया। पुलिस और छात्रों के बीच का मार पीट और झड़प हुई। 30 छात्रों को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया 13 अगस्त को बनारस से बलिया पहुंची ट्रेन को छात्रों ने चित्त बड़ा गांव रेलवे स्टेशन पर फूंक दिया और रेल की पटरी को उखाड़ कर प्रदर्शन किया . खेजूरी बेल्थरा रोड में जनसभाएं हुई 14 अगस्त को चितबड़ागांव ताजपुर में रेल की पटरिया उखाड़ दी गई। बेल्थरा रोड में भी आंदोलन तीव्र हो गया वहां पर भी यही सारी चीजे हुई। सिकंदरपुर में मिडिल स्कूल में जुलूस निकाला गया वहां क्या स्थानीय थानेदार ने क्रूरता दिखाते हुए बच्चों पर घोडों को दौड़ा दिया। सैकड़ो छात्र घायल हुए 15 अगस्त को बलिया जनपद के जहाज घाट, माल गोदाम डाकघर आदि पर स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने लूट पाट करना शुरु किया। चितबड़ागांव में तमसा नदी पर लकड़ी के बने पिपरा घाट पुल को तोड़कर सेनानियों ने सारे रास्ते बंद कर दिए। जहां-जहां क्रांतिकारी आंदोलन करते धीरे-धीरे वहां वह एक सरकारी कार्यालय पर कब्जा करते और अपना शासन चलाने लगे। पंचायत की राज शासन व्यवस्था काम करने लगी बैरिया,नगरा ताखा आदि कई जगहों पर भी क्रांतिकारियों ने ऐसे ही कार्रवाई की। 16 अगस्त को जिला मुख्यालय पर अपनी हनक जमाने के लिए जिला प्रशासन ने धारा 144 का कड़ाई से पालन करने का आदेश दिया लेकिन सेनानियों पर इसका कोई असर नहीं हुआ। इसका प्रतिरोध खोरी पाकर गांव के युवा दुखी कोइरी ने किया। पुलिस फायरिंग में दुखी कोईरी समेत 7 लोग शहीद हो गए। चिलकहर रेलवे स्टेशन फूंक दिया गया, नौरंगा घाट पर खड़े माल भाग जहाज को बहा दिया गया। 17 अगस्त 1942 को हुए ऐतिहासिक स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ा है। महात्मा गांधी के ‘करो या मरो’ के आह्वान पर क्रांतिकारियों ने रसड़ा तहसील को अंग्रेजी हुकूमत से मुक्त कराया था। इस संघर्ष में चार वीर सपूत अमर हो गए थे। तहसील और थाने पर सेनानियों ने बहुत आसानी से अधिकार जमा लिया। इसी दिन बांसडीह तहसील पर बगैर किसी प्रतिरोध के स्वराज सरकार का अधिकार हो गया। 18 अगस्त 1942 को स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और ब्रितानी पुलिस के बीच चूहा बिल्ली का खेल चल रहा था। वह खूनी संघर्ष में बदल गया बैरिया थाने पर तिरंगा फहराने और स्वराज सरकार के अधिकार को लेकर हुई जंग में 18 सेनानी शहीद हो गए।
अब आया 19 अगस्त 1942 का वह दिन जब बलिया के क्रांतिकारियों ने इतिहास रच दिया। ब्रिटानी दास्ताँ का दंश झेल रहे लोगों के लिए एक नजीर बनी लाखों की साथ-साथ भीड़ में जिला मुख्यालय को घेर लिया। मजबूर होकर ब्रिटिश सरकार के तत्कालीन कलेक्टर जगदीश चंद्र निगम एवं पुलिस कप्तान जियाउद्दीन अहमद ने आत्मसमर्पण कर दिया। जेल में बंद कांग्रेस के तात्कालिक जिला अध्यक्ष पंडित चित्तू पांडे, महानंदा मिश्रा, विश्वनाथ चौबे आदि सभी राजनीतिक कैदियों को जेल से जेल का फाटक खोलकर रिहा कर दिया गया और बलिया आजाद हो गया।
मैं बात श्री राम दयाल सिंह जी की कर रहा था, बॉसडीह कचहरी पर कब्जे के दौरान आंदोलन का कर रहे रामदयाल सिंह और अन्य लोगों को आखिरकार गिरफ्तारी से बचने के लिए फरारी का रास्ता चुना पड़ा लेकिन यह बहुत ज्यादा दिन नहीं रही। श्री रामदयालु सिंह गिरफ्तार करके बनारस जेल भेज दिए गए .
श्री राम दयाल सिंह जी बताते हैं कि जेल में उन लोगों को जी बैरक में रखा गया था। पांच सोटा की सजा सुनाई गई। यानी प्रतिदिन इन क्रांतिकारियों को डंडे से पीटा जाता था, जिसे वे लोग हंसते-हंसते बर्दाश्त करते थे। स्वर्गीय श्री राम दयाल सिंह जी एक और बात बताते थे उसे समय उसे जेल में केवल एक अखबार आता था। वह सब लोग पढ़े लिखे नहीं थे क्योंकि वह पढ़े लिखे थे तो और जेल के साथी कैदी उनसे कहते थे कि ए रामदयाल के खबर पढ कर के सुनाओ। बाबू राम दयाल सिंह उसे पढ़ कर अपने कैदी साथियों को सुनाते थे इस तरह से उनके मुंह से कही हुई बातों को भी मैं यहां रखा।
देश आजाद हो गया,ये क्रांतिकारी रिहा हुए इनको तात्कालिक मुख्यमंत्री श्री गोविंद बल्लभ पंत जी ने तराई में जंगलों के बीच कुछ जमीन इनके लिए जमीने आवंटित की और यह वर्तमान में इनका परिवार उधम सिंह जनपद के आनंदपुर नमक के गांव में रहता है
दूसरे बड़े क्रांतिकारी जो बलिया की आजादी की लड़ाई में बड़ा नेतृत्व कर रहे थे उनकी चर्चा भी करना चाहूंगा क्योंकि उनके साथ तो मैं अपने बचपन के बहुत समय बिताए हैं। मेरे गाँव को संवरा नहीं, बोलते हैं संवरा को,संवरा -गोपालपुर बोलते हैं। गोपालपुर और संवरा दोनों जुड़वा नाम के रूप में एक साथ लिया जाता था। इसी गोपालपुर में जन्मे हुए क्रांतिकारी पंडित विश्वनाथ चतुर्वेदी जी, श्री चित्तू पाण्डेय के साथ उस आंदोलन के हिस्सा थे। जिसका वर्णन मैंने पहले भी किया था। आजादी की लड़ाई से जुड़ी हुई बहुत सारी घटनाओं की जानकारी बहुत सारी बातें वे हमसे बताते थे। अत्यंत सरल और सहज प्रकृति के लेकिन अनैतिकता के घोर विरोधी विश्वनाथ चतुर्वेदी जी हमारे सबसे नजदीक के क्रांतिकारियों में से एक थे। पूर्व प्रधानमंत्री श्री चंद्रशेखर जी उनको बहुत आदर करते थे। जिसे मैंने स्वयं अपनी आंखों से देखा है। चंद्रशेखर जी जब हमारे गांव संवरा चट्टी पर आते थे तो वह चट्टी नहीं कहते थे,चौराहा कहते थे। यहां पहुंचते हुए बोलते थे कि चौबे जी (श्री विश्वनाथ चतुर्वेदी) को बुलाओ।
यह बात मेरे बचपन की है। मै एक और क्रांतिकारी की बात करके मैं अपनी बात को समाप्त करूंगा। वह एक ऐसे क्रांतिकारी थे जो गुमनाम क्रांतिकारी थे। उनकी कहानी को मैं अपने पुस्तक काव्य कथा विथिका के द्वितीय खंड में स्थान दिया है। हमारे गांव के सिंहा मिसिर जो कि कभी जेल नहीं गए नहीं वह क्रांतिकारी घोषित किए गए उनके न पत्नी थी नाही उनके बच्चे थे। वे पूरे जीवन ऐसे ही रह गए वह हमसे कहा करते थे।
बाबू.. हमनी के रेल लाइन के काटी जा और आंदोलन करी जा, लेकिन पुलिस के डर से हम भाग जाईजा।
क्योंकि उनकी गिरफ्तारी नही हुई, उनका नाम डर से भाग जाने वाले क्रांतिकारियों के लिस्ट में था। सबको पेंशन मिलता रहा लेकिन स्व. सिघा मिसिर जी आज वह हमारे बीच में नहीं है लेकिन जब हम 19 अगस्त बलिया बलिदान दिवस में क्रांतिकारियों को याद कर रहे हैं तो मैं उन्हें भी याद करता हूँ ऐसे गुमनाम अनेकों क्रांतिवीरों को भी याद करते हुए अपनी बात समाप्त करता हूँ।
(श्री सुरेश पटवा जी भारतीय स्टेट बैंक से सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों स्त्री-पुरुष “, गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर।)
यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – पग-पग नर्मदा यात्रा – भाग- ४५ ☆ श्री सुरेश पटवा
7.पग-पग नर्मदा यात्रा
नर्मदा परिक्रमा:दूसरा चरण
समनापुर से पिपरहा 13 नवम्बर 2019
समनापुर पहुँचते-पहुँचते अरुण भाई की पीठ में दाहिनी तरफ़ दर्द होने लगा, समनापूर में जगमोहन भाई ने उनकी पीठ दबाई, अविनाश भाई ने दर्द-नाशक क्रीम लगाकर कंबिफ़्लेम गोली खिलाई। उन्हें आराम लगा, लेकिन दर्द हुआ क्यों?
पहली बात है कि हम केवल पैरों से नहीं चलते बल्कि पूरे शरीर से चलते हैं, दाहिना पैर आगे बढ़ाकर रखते समय पीठ के बाँए तरफ़ की मांसपेशियाँ सक्रिय होतीं हैं, बाँए पैर बढ़ाते समय दाहिना हिस्सा ज़ोर लगाता है। इस प्रकार पीठ भी चलने में थकती है।
दूसरी बात सुबह ख़ाली पेट दस किलोमीटर चलने से शरीर में मांसपेशियाँ में ऊर्जा ख़त्म होती है तो हड्डियों को ज़ोर लगाना पड़ता है, वे दर्द करने लगती हैं।
तीसरा ख़ाली पेट रहने से गैस बनने से भी दर्द होता है।
चौथा नींद पूरी न होने से माँसपेशियों को आराम न मिलने से शरीर में जान नहीं रहती, चलने में थकावट से दर्द हो सकता है।
आपस में चर्चा करके निश्चय किया कि आगे इन बातों का ध्यान रखना होगा। कुछ साथियों ने छोटा धुँआधार नहीं देखा था, वे सुबह छः बजे वहाँ चले गए इसलिए सात बजे निकलने के बजाय आठ बजे पिपरहा के लिए यात्रा शुरू की। खेत में बखर चल जाने से रास्ता बहुत ऊबड़-खाबड़ था उस पर मुसीबत यह कि तीन चौड़े नाले किनारदार पगडंडियों से पार करने पड़े। पहले बम्होरी गाँव पड़ा वहाँ किसान के खेत से गन्ना काट कर खाया। उसके बाद हथिया, झामर, घूरपुर और घाट-पिपरिया होते हुए पिपरहा पहुँचना था।
सुबह आठ बजे पंद्रह किलो वज़न लाद कर चल पड़े दो किलोमीटर चलकर नर्मदा का बहुत सुंदर घाट हथिया घाट आया वहाँ नर्मदा संगमरमर की शिलाओं का निर्माण करते हुए भारी खरखराहट से बह रहीं हैं नहाने योग्य किनारा नहीं है। थोड़ा नाश्ता खाया फिर आगे बढ़े तो चिंकी घाट आश्रम में सेवक ने चाय पिलाई। इसे च्यवन ऋषि का आश्रम स्थान बताया, वे औषधि विज्ञान के प्रणेता माने जाते हैं। च्यवन ऋषि का आश्रम इन भूमध्य सागरीय पर्वतीय वनस्पतियों के बीच होना सही प्रतीत होता है, क्योंकि औषधीय पौधे कर्क और मकर रेखा के बीच ऐसी ही जलवायु में पनपते हैं। उसके बाद झामर गाँव से होते हुए घूरपुर आश्रम पहुँचे। वहाँ एक महाराष्ट्रियन युवक चार महीने से चौमासा बिता रहा रहे हैं। वे निरंतर चिल्ला कर बोलते रहते, शायद अंदरूनी ख़ालीपन को भरने की कोशिश में पूरे ख़ाली होकर समाधि के चरम बिंदु की तलाश में भटक रहे हों। उनसे मिलने लातूर से गाड़ी भरकर एक परिवार आया हुआ था। उनका भोजन तैयार हो रहा था यहां महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले से एक साधु चौमासा कर रहे थे। उनके भक्तों ने भंडारा आयोजित किया था सो पूरन पोली, हलुआ, लड्डू, पूरी, सब्जी, दाल, चावल सब कुछ भरपेट खाया। एक घंटे आराम करके निकल पड़े। रास्ता अत्यंत दूभर था दो साथी तो आसानी से पार कर गए लेकिन तीन साथी भय से थरथराते नाला पार न कर सके। वे ऊपर चढ़कर दो किलोमीटर घूम कर पिपरहा के किनारे पहुँचे। दो साथी छोटा धुँआधार पहुँचे उन्होंने एक घंटे धुँआधार निहारा फिर एक किलोमीटर ऊपर चढ़ कर बिछड़े साथियों से जा मिले। एक निजी धर्मशाला में विश्राम करने रुक गए। थोड़ी देर बाद शरण पाने पाँच परिक्रमा यात्री वहाँ पहुँचे लेकिन जगह की कमी महसूस कर वे गाँव के स्कूल में जाकर रुके। करण सिंह ढीमर ने हमारे भोजन की व्यवस्था कर दी।
कुछ आश्रमों में अहमन्य, अहंकारी और धनलिप्सा में डूबे मठाधीशों के क्रोधी, वैमनस्य और लोभी चरित्र पर एक महाराज जी से चर्चा हुई तो हमने उनसे जानना चाहा कि :- “महाराज! काम, क्रोध, लोभ, मद, मोह और मत्सर इन छः दोषों को हिंदू धर्मशास्त्रों में षठरिपु कहा गया है इनमें से एक भी दोष का लेशमात्र साधु के समस्त ज्ञान वैराग्य को नष्ट करने हेतु पर्याप्त है।”
महाराज बोले “ये सब शास्त्रों में लिखी बातें हैं, ये लोग यम, नियम, संयम और समाधि द्वारा सन्यास की स्थिति तक पहुँचने की विभिन्न दशाओं में भटक रहे हैं, जब उन्हें ज्ञान प्राप्त हो जाएगा तब उनके षठरिपु शांत हो जाएँगे।”
हमने कहा “महाराज गीता तो प्रपंचियों को भी ईश्वर को समर्पण द्वारा मुक्ति का मार्ग बताती है, सांख्ययोग, कर्मयोग, ज्ञानयोग, सन्यासयोग और पतंजलि योग भगवान तक पहुँचने के मार्ग हैं। अंत में भगवान कहते हैं कि मनुष्य कितना भी बड़ा पापी हो लेकिन अंत में सच्ची समर्पित भक्तियोग द्वारा मुझे प्राप्त कर सकता है, अतः मेरी शरण में आओ, मम शरणम ब्रज! क्या ये बाबा बनावटी भक्ति के अज्ञान योग से सम्पत्ति लोभ में डूबे हुए नहीं हैं।”
महाराज ने यह कहकर वार्ता समाप्त की, “शायद आप ठीक कह रहे हैं। संसार में सब प्रकार के लोग होते हैं।”
( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का मंतव्य उनके ही शब्दों में – “पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “सावन का अंधा…“.)
साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # ४२
कविता – सावन का अंधा… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर
मुझको हरा ही हरा दिख रहा है
मैं सावन का अंधा हुआ जा रहा हूँ ll
प्रभारों के बोझों से इतना लदा हूँ, हम्मालों का कंधा हुआ जा रहा हूँ ll
मैं सावन का…
=1=
रंगा न लहू से, वो अख़बार कैसा
हिंसा क़त्ल चोरी कपट काला पैसा
कालाबाज़ारी दलालों की मण्डी, मैं उफ़ गोरखधंधा हुआ जा रहा हूँ ll
=2=
डायनिंग सैट सोफा किचन सैट सब हैं, अपसैट माइण्ड चुप्पी साधे लब हैं
फँसते चुनिन्दा ही जालों के फन्दे, मैं बेबस परिन्दा हुआ जा रहा हूँ ll
मैं सावन का…
=3=
चंदा जुटाने में मशगूल बंदा, ज़माना बख़ाने भले इसको गंदा
मुनाफ़े की अब न गुंज़ाइश तनिक़ भी, मैं बिजनिस इक मन्दा हुआ जा रहा हूँ ll
मैं सावन का….
=4=
‘राजेश’ मन-ही-मन, बेशुमार प्यार भी, पर हो न पाया कभी दिल से इज़हार भी
चुपके तकिये में छुपाके पढ़ें कई, मैं यूँ गुलशन नंदा हुआ जा रहा हूँ ll
(लेखन-प्रकाशन – गत 2022 से छंद लेखन, एकल प्रकाशन– कलम के नवांकुर, अनुग्रह नवप्रस्तारित छंद पर लेखन (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), साझा संकलन – तकरीबन 10, द्वादश ज्योतिर्लिंग (लंदन बुक आफ रिकार्ड), अनेकता में एकता (एशिया बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड), छंदावली – (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), महाकाल साहित्य सम्मान से सम्मानित। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता हिन्दुस्तानी शान !!)
☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक ९५ आणि ९६ ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆
श्लोक क्र. ९५ – – –
अजामेळ पापी वदे पुत्रकामे ।
तया मुक्ति नारायणाचेनि नामे ।
शुकाकारणे कुंटणी राम वाणी ।
मुखे बोलता ख्याति झाली पुराणी ।।९५।।
अर्थ :दुराचारी असलेल्या अजामेळाने अंतकाळी आपल्या नारायण पुत्राचे नाव घेतले. त्या मुलाचे सतत नाम घेतल्याने त्याला मुक्ती मिळाली. एका गणिकेने ‘ राम राम ‘ हे आपल्या पोपटाचे नाम सतत घेतल्याने तिचा देखील उद्धार झाला. आपल्या अंतकाळी भगवंताचे नाम घेणाऱ्या व्यक्तींच्या या कथा पुराणात प्रसिद्ध झाल्या.
(शुक – पोपट, कुंटणी – गणिका/वेश्या)
विवेचन : भगवंताच्या नामाचे महत्व पटवून देण्यासाठी समर्थ या श्लोकात पुराणातील दोन वेगळी उदाहरणे आपल्या देतात. अजामेळ ब्राह्मणाची कथा भागवतात आली आहे. अजामेळ हा दुराचारी होता. आपल्या आयुष्यात त्याने कधी भगवंताचे नाम घेतले नाही. आपला अंतकाळ जेव्हा जवळ आला तेव्हा त्याला आपल्या लाडक्या नारायण या पुत्राची आठवण होऊन तो त्याच्या नावाचा जप करू लागला. तेव्हा विष्णुदूतांनी येऊन त्याला मुक्ती दिली अशी कथा आहे. दुसरी कथा आहे पिंगला या गणिकेची. तिने देखील आपल्या संपूर्ण आयुष्यात परमेश्वराची भक्ती केली नाही. परमेश्वराबद्दल तिला एक प्रकारचा तिरस्कार होता असे म्हटले तरी चालेल. त्याच भावनेतून तिने आपल्या आवडत्या पोपटाचे नाव ‘राम ‘ असे ठेवले. अजाणतेपणी का होईना पण त्यानिमित्ताने ती रामनाम घेत गेली. त्यामुळे तिचा उद्धार झाला. खरी गोष्ट अशी आहे या सगळ्यांना मृत्यूसमयी आपल्या चुकीचा पश्चाताप होऊन त्यांनी भगवंताचे नाम घ्यायला सुरुवात केली. पुढे त्यातूनच त्यांचा उद्धार झाला.
तर्कशास्त्राच्या कसोटीवर या कथा आजच्या काळात टिकणाऱ्या नाहीत. नास्तिक आणि बुद्धिवादी लोक तर या पुराणातील भाकडकथा आहेत म्हणून सहज उडवून लावतील. पण समर्थांच्या काळात या कथा प्रचलित होत्या. लोकांनी परमेश्वराचे नाम कोणत्याही प्रकारे का होईना पण घ्यावे आणि त्यांना रामनामाचे महत्व पटावे एवढाच समर्थांचा या कथा सांगण्यामागील उद्देश असावा. आपणही तो उद्देश लक्षात घेऊ या. आपल्यासाठी त्या कथांपेक्षा समर्थांचा संदेश महत्वाचा आहे. ज्याप्रमाणे आपण धान्य निवडताना आपण फोलपट टाकून देऊन सार आपल्याकडे ठेवतो त्याप्रमाणे बाकी निरुपयोगी फोलपट टाकून सार तेवढे ग्रहण करू या. रामनाम हेच सार आहे. सुज्ञास अधिक सांगणे नलगे.
स्वसंवाद ::
१. पुराणातील कथांमधील चमत्कारिक गोष्टींवर तर्क लढवत बसण्यापेक्षा, त्यामागे संतांनी दिलेला ‘नामस्मरणाचा’ मूळ संदेश (सार) मी स्वीकारू शकतो का?
२. “अजाणतेपणी किंवा मुलाच्या ओढीने घेतलेले नाम जर अजामेळाला तारू शकते, ” तर मग मी जाणीवपूर्वक आणि मनापासून नाम घेतले तर माझ्या आयुष्यात किती सकारात्मक बदल घडू शकेल?
३. संसाराच्या वेगवेगळ्या विवंचनेत अडकलेला असतानाही, मी माझ्या रोजच्या बोलण्यात किंवा व्यवहारात भगवंताच्या नामाचे अधिष्ठान ठेवतो का?
४. संतांनी सांगितल्याप्रमाणे, “रामनाम हेच अंतिम सार आहे” हे स्वीकारून मी मनातील निरर्थक शंकांचे ‘फोलपट’ टाकून द्यायला तयार आहे का?
=====
श्लोक क्र. ९६ – – –
महाभक्त प्रल्हाद हा दैत्यकूळी ।
जपे रामनामावळी नित्यकाळी ।
पिता पापरूपी तया देखवेना ।
जनीं दैत्य तो नाम मूखे म्हणेना ।।९६।।
अर्थ :भगवंताचा महान भक्त असलेला प्रल्हाद याचा जन्म दैत्यकुळात झाला. परंतु तो नित्य भगवंताच्या नामाचा जप करीत असे. अत्यंत पापी असलेला त्याचा पिता हिरण्यकश्यपू याला ते पाहवेना. त्याने आपल्या आयुष्यात कधीही नामस्मरण केले नाही.
विवेचन :
भगवंताच्या नामाचे महत्व पटवून देण्यासाठी समर्थ आपल्याला प्रत्येक श्लोकात वेगवेगळी उदाहरणे देत आहेत. एखाद्या कुशल शिक्षकाने ज्याप्रमाणे विविध उदाहरणे देऊन आपल्या विद्यार्थ्यांना समजावून सांगावे तसे समर्थ आपल्याला सांगत आहेत. या अर्थाने समर्थ हे लोकशिक्षक आहेत. जन उद्धाराची तळमळ त्यांना आहे. ‘बुडते हे जन न देखवे डोळा ‘ या भावनेतून ते आपल्याला रामनामाचे महत्व सांगत आहेत.
प्रल्हाद हा विष्णूचा महान भक्त होता. पण त्याचा जन्म एका दैत्यकुळात झाला होता. दैत्यकुळातील मंडळी म्हणजे साधारणपणे भगवंताला विरोध करणारी किंवा त्याला आपला शत्रू मानणारी होती. अशा प्रतिकूल ठिकाणी प्रल्हादाचा जन्म झाला. पण भगवद्भक्तीचे संस्कार प्रल्हादाला गर्भातूनच मिळाले होते. त्याची आई कयाधू ही गर्भारपणी महर्षी नारदांच्या आश्रमात राहिली होती. तिथेच भगवद्भक्तीचे संस्कार प्रल्हादावर झाले.
प्रल्हादाला आपल्या घरातील परिस्थिती भगवंताचे नामस्मरण करण्यासाठी अनुकूल नव्हती. पण भगवंताचा खरा भक्त होण्यासाठी जे गुण लागतात, त्या गुणांनी तो परिपूर्ण होता. त्याच्या मुखात भगवंताचे नाम अखंड येत असे. ‘ ओम नमो भगवते वासुदेवाय ‘ या मंत्राचा नित्य जप तो करीत असे. इथे आपण एक गोष्ट लक्षात घेतली पाहिजे की प्रल्हाद नारायणाचे म्हणजे विष्णूचे नाम जपत होता. पण वरील श्लोकात समर्थांनी ‘ जपे रामनामावळी ‘ असे म्हटले आहे. नारायण असो की राम, तो सर्वव्यापी ईश्वर एकच आहे हेच समर्थ या श्लोकातून आपल्याला दाखवून देतात. त्यामुळे आपण देखील भगवंताच्या नामात भेदभाव करणे योग्य नाही.
परमेश्वराला आपला शत्रू मानणाऱ्या हिरण्यकश्यपूला अर्थातच हे आवडणे शक्य नव्हते. हिरण्यकश्यपू हा भगवान शंकराचा भक्त होता. त्याने कठोर तपश्चर्या करून शंकरांकडून असा वर मागून घेतला होता की ज्या वरामुळे त्याला सहजासहजी कोणी मारू शकत नव्हते. त्यामुळे तो स्वतःला अमर समजू लागला. आणखीनच उन्मत्त झाला. प्रजेवर आणि भगवंताच्या भक्तांवर जुलूम करू लागला. पण आपला स्वतःचाच मुलगा आपले ऐकत नाही असे पाहिल्यावर त्याने प्रल्हादाला मारण्यासाठी कोणतीही कसूर बाकी ठेवली नाही. पण प्रल्हादाची भगवंतावर अविचल श्रद्धा होती. भगवंताने हर प्रकारे त्याचे सर्व संकटातून रक्षण केले. हिरण्यकश्यपू पापी असला तरी प्रल्हादासारखे भगवंतावर अविचल निष्ठा असणारे पुत्ररत्न त्याच्या उदरी जन्मले हे त्याचे केवढे भाग्य! त्यामुळेच आपल्या अंत्यसमयी हिरण्यकश्यपूला नरसिंहरूपाने भगवंताचे दर्शन झाले आणि त्याला मुक्ती मिळाली.
प्रल्हादाचा जन्म जरी दैत्यकुळात झाला तरी इच्छा असली तरी विपरीत परिस्थितीत देखील भगवंताचे नाम घेऊन तरून जाता येते हेच समर्थ या श्लोकातून आपल्याला सांगतात. आपणही प्रल्हादाप्रमाणे भगवंताचे नाम घेऊन या भवसागरातुन तरून आपला उद्धार करून घेऊ शकतो. तो आपल्याला सर्व संकटातून सोडवेल.
स्वसंवाद ::
१. माझ्या सभोवतालची परिस्थिती किंवा घरचे वातावरण परमार्थ साधण्यासाठी अनुकूल नाही, असे रडत न बसता मी प्रल्हादासारखा ‘अविचल’ राहून नामस्मरण करू शकतो का?
२. राम, कृष्ण, विष्णू किंवा शिव यांच्यामध्ये श्रेष्ठ-कनिष्ठ असा भेद करून मी माझ्या मनाची ऊर्जा वाया घालवतो आहे, की सर्वव्यापी ईश्वर एकच आहे हे सत्य स्वीकारतो?
३. हिरण्यकश्यपूप्रमाणे मीही उन्मत्त होऊन माझ्या जवळच्या माणसांवर किंवा सत्प्रवृत्तींवर अन्याय तर करत नाहीये ना?