हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३३४ ☆ व्यंग्य – ‘बेजोड़’ जी की पीड़ा और परसाई ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम व्यंग्य – बेजोड़’ जी की पीड़ा और परसाई  इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३३४ ☆

☆ व्यंग्य ☆ ‘बेजोड़’ जी की पीड़ा और परसाई ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

छोटेलाल ‘बेजोड़’ नगर के वज़नदार लेखक हैं। व्यंग्य लिखते हैं और व्यंग्य में ही बात करते हैं। अब तक पैंतालीस किताबें छपवा चुके हैं और  एक सौ अस्सी सम्मान या अभिनंदन करवा चुके हैं। उनकी तमन्ना भारत के हर शहर में सम्मान कराने की थी, जो पूरी हो चुकी है। हर शहर में उनका कोई न कोई चेला बैठा है जो सम्मान का जुगाड़ बैठाता रहता है।

यों तो ‘बेजोड़’ जी खासे मशहूर हैं, लेकिन लेखन में उन्हें वह मुकाम नहीं मिला जिसके वे आकांक्षी हैं। गंभीर साहित्य की दुनिया में उनकी पूछ-कदर नहीं है। यही बात ‘बेजोड़’ जी को सालती रहती है। उनकी सबसे ज़्यादा दुखती रग परसाई जी हैं। जब कहीं भी वे अपनी रचनाओं की चर्चा का जुगाड़ बैठाते हैं, घूम-घाम कर परसाई जी  रचनाओं से तुलना होने लगती है। हर बार निष्कर्ष यह निकलता है कि  ‘बेजोड़’ जी अच्छा  लिख रहे हैं, लेकिन परसाई जी से कुछ सीख लेते तो अच्छा होता। सुनकर ‘बेजोड़’ जी खिन्न हो जाते हैं। आयोजन वे जमाते हैं और तारीफ परसाई जी बटोर ले जाते हैं।

अपने वक्तव्यों में ‘बेजोड़’ जी अक्सर कहते हैं— ‘अब परसाई जी का ज़माना लद गया। अब हम जैसे लेखकों का ज़माना है। आलोचकों से  कहो कि परसाई जी को लांघ कर हम तक आयें।कब तक ‘परसाई’ ‘परसाई’ जपते रहेंगे?’

परसाई जी के वामपंथी होने पर भी बेजोड़ जी तल्ख टिप्पणी करते हैं। कहते हैं— ‘वामपंथी अच्छा लेखक हो ही नहीं सकता। वह एक विचारधारा में कैद हो जाता है, जड़ हो जाता है, कूपमंडूक हो जाता है। उसे अपनी नाक से आगे का कुछ दिखायी नहीं पड़ता। वह एक आंख से ही दुनिया को देखता है, दूसरी नहीं खोलता। इसीलिए मैं परसाई को महान लेखक नहीं मानता। लेखक को तो समुद्र की तरह विशाल हृदय वाला होना चाहिए। विचारधारा के फेर में नहीं पड़ना चाहिए। वामपंथियों ने ज़बरदस्ती तारीफ कर कर के परसाई को महान बना दिया है।’

कई बार वे कहते हैं— ‘परसाई जी ने लिखा क्या है? कहीं वे लिखते हैं कि जिन राज्यों में दंगे हुए हैं उन्हें गणतंत्र दिवस की झांकी में दंगे ही दिखाना चाहिए। कहीं कहते हैं कि लड़कों को अपने बाप का आदेश नहीं मानना चाहिए। कहीं लिखते हैं कि पुरानी पीढ़ी नयी पीढ़ी के कंधों पर सवार हो गयी है। कहीं सुशीला उस लड़की को कहते हैं जो भाग कर शादी कर लेती है और बाप का पीएफ का पैसा बचा देती है। यह सब नयी पीढ़ी को बरगलाना नहीं तो और क्या है? नयी पीढ़ी को उत्तम संस्कार देने के बजाय ऊलजलूल बातें सिखा रहे हैं और फिर भी महान बने हुए हैं।’

कुछ दिनों से ‘बेजोड़’ जी एक नयी थियरी लेकर सामने आये हैं। कहते हैं, ‘एक रात मुझे सोचते-सोचते अचानक समझ में आया कि परसाई को महान क्यों माना जाता है। दरअसल  वे इसलिए बड़े माने जाते हैं क्योंकि विरोधियों के हाथों उनकी पिटाई हो गयी थी। इसमें कोई शक नहीं कि व्यंग्यकार के जीवन में प्रताड़ना का बहुत महत्व होता है। पिटाई हो जाए तो व्यंग्यकार एकदम ऊपर उठ जाता है। परसाई जी के बड़प्पन का यही राज़ है।

‘यह समझ में आने के बाद मैं लगातार कोशिश में हूं कि मेरी भी वाजिब पिटाई हो जाए ताकि मैं परसाई जी से आगे निकल जाऊं। इसी कोशिश में दो बार पटना में छात्रों के धरने में शामिल हो गया, लेकिन मेरे बालों की सफेदी देखकर पुलिस ने छोड़ दिया। उत्तर प्रदेश के किसी आंदोलन में शामिल होने की सोची थी, लेकिन हिम्मत नहीं हुई क्योंकि वहां पिटाई से ज़्यादा ‘एनकाउंटर’ होते हैं। अब राजस्थान जाने की सोच रहा हूं, वहां बेरोज़गारों के आंदोलन की संभावना है। हरयाणा में एक कज़िन पुलिस में हैं, उनसे भी कह रखा है। वे बुलाएंगे तो वहां चला जाऊंगा। वे पिटाई का इंतज़ाम कर देंगे। परसाई जी का पैर खराब था, चलने फिरने से मजबूर थे, इसलिए उन्हें जबलपुर में ही पिटना पड़ा। मैं तो देश में कहीं भी पिट सकता हूं। पिटने  के बाद फोटो के साथ अखबारों में भेज दूंगा। छपते ही मेरा  कद एकदम बढ़ जाएगा। फिर परसाई को न कोई याद करेगा, न कोई पढ़ेगा। सब तरफ हम ही हम होंगे।’

अब ‘बेजोड़’ जी के चेले मनाते हैं कि ‘बेजोड़’ जी की मनोकामना शीघ्र पूरी हो और वे साहित्य में ऐसी बुलन्दी पर पहुंचें जहां उन्हें चुनौती देने वाला कोई न हो, परसाई भी नहीं।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य क्षणिका# १०५ – क्रांति वीर – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– क्रांति वीर …” ।

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य क्षणिका # १०५ — क्रांति वीर — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

सन् 1857 के अपने एक कल्पित दस्तावेज के हवाले से मैं यह कहानी रच रहा हूँ। इस तारीख से बात करने की मेरी एक भावनात्मक सोच है। बात यह है उन्हीं दिनों बलिया वासी मेरा परदादा मॉरिशस आया था। पर यह मेरे परदादा की कहानी नहीं है। यह एक भारतीय परम वीर की कहानी है। अंग्रेजों के अधीन अपनी जन्मभूमि में क्रांति के जुनून के कारण गिरफ्तार हुआ था। वह किसी तरह जेल से भागा था। भारतीय मजदूर मॉरिशस लाने वाले जहाज की एक खेप में वह यहाँ आ गया था। अगले जहाज में अंग्रेज सरकार के सिपाही उसे यहाँ ढूँढने आ गए थे, लेकिन वे उसे पा न सके थे। उसे एक गुफा में छिपा कर रखा गया था। दिनों बाद यहीं उसकी मृत्यु हुई थी। सम्मान के साथ उसका दाह संस्कार किया गया था।

 © श्री रामदेव धुरंधर

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३३५ – मैराथन ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३३५ मैराथन… ?

…मैं यह काम करना चाहता था पर उसने अड़ंगा लगा दिया।

…मैं वह काम करना चाहती थी पर इसने टांग अड़ा दी।

…उसमें है ही क्या, उससे बेहतर तो इसे मैं करता पर मेरी स्थितियों के चलते..!

 ….अलां ने मेरे खिलाफ ये किया, फलां ने मेरे विरोध में यह किया…!

स्वयं को अधिक सक्षम, अधिक स्पर्धात्मक बनानेे का कोई प्रयास न करना, आत्मावलोकन न कर व्यक्तियों या स्थितियों को दोष देना, हताशाग्रस्त जीवन जीनेवालों से भरी पड़ी है दुनिया।

वस्तुतः जीवन मैराथन है। अपनी दौड़ खुद लगानी होती है। रास्ते, आयोजक, प्रतिभागी, मौसम किसी को भी दोष देकर पूरी नहीं होती मैराथन।

निदा फाज़ली जी ने लिखा है,

रास्ते को भी दोष दे, आँखें भी कर लाल,

चप्पल में जो कील है, पहले उसे निकाल।

अधिकांश लोग जीवन भर ये कील नहीं निकाल पाते। कील की चुभन पीड़ा देती है। दौड़ना तो दूर, चलना भी दूभर हो जाता है।

जिस किसीने यह कील निकाल ली, वह दौड़ने लगा। हार-जीत का निर्णय तो रेफरी करेगा पर दौड़ने से ऊर्जा का प्रवाह तो शुरू हुआ।

प्रवाह का आनंद लेने के लिए इसे पढ़ने या सुनने भर से कुछ नहीं होगा। इसे अपनाना होगा।

उम्मीद करता हूँ अपनी-अपनी चप्पल सबके हाथ में है और कील के निष्कासन की कार्यवाही शुरू हो चुकी है।

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ हनुमान साधना संपन्न हुई। अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र दी जावेगी। 🕉️ 💥 

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सलिल प्रवाह # २७९ – ममता के गाँव में… ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका गीत – ममता के गाँव में…)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २७९ ☆

☆ गीत – ममता के गाँव में… ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

मेरा बसना है

ममता के गाँव में…

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नेह नर्मदा कलकल बहती

शीतल अस्थि हुई हर दहती

कलकल करती लहर-लहर हँस-

श्वेत-श्याम पत्थर से कहती

कंकर को शंकर कर दूँ मैं

मेरा रहना

अमरकंटकी ठाँव में,

मेरा बसना है

ममता के गाँव में…

.

सरला तरला मेरी धारा

पग-पग मठ मंदिर गुरुद्वारा

धुनी रमाए तीर कबीरा-

बंबुलिया दस दिश गुंजारा।

बहा पसीना

लक्ष्य मिलेगा पाँव में,

मेरा बसना है

ममता के गाँव में…

.

वन-वन में भटके रघुवीर

दीन-दुखी की हर ली पीर

कान्हा पांडव का वनवास-

कहता चुके न संयम-धीर।

द्रुपद-सुता हर रक्षित

स्नेहिल दाँव में,

मेरा बसना है

ममता के गाँव में…

.

धान-कटोरा भरे बिलासा

बैलाडीला रहे न प्यासा

बमलेश्वरि-दंतेश्वरि की जय-

राम ते अधिक राम का दासा

जन-मन रमता

गौ-गौरैया-काँव में,

मेरा बसना है

ममता के गाँव में…

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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ज्योतिष साहित्य ☆ साप्ताहिक राशिफल (18 मई से 24 मई 2026) ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆

ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय

विज्ञान की अन्य विधाओं में भारतीय ज्योतिष शास्त्र का अपना विशेष स्थान है। हम अक्सर शुभ कार्यों के लिए शुभ मुहूर्त, शुभ विवाह के लिए सर्वोत्तम कुंडली मिलान आदि करते हैं। साथ ही हम इसकी स्वीकार्यता सुहृदय पाठकों के विवेक पर छोड़ते हैं। हमें प्रसन्नता है कि ज्योतिषाचार्य पं अनिल पाण्डेय जी ने ई-अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों के विशेष अनुरोध पर साप्ताहिक राशिफल प्रत्येक शनिवार को साझा करना स्वीकार किया है। इसके लिए हम सभी आपके हृदयतल से आभारी हैं। साथ ही हम अपने पाठकों से भी जानना चाहेंगे कि इस स्तम्भ के बारे में उनकी क्या राय है ? 

☆ ज्योतिष साहित्य ☆ साप्ताहिक राशिफल (18 मई से 24 मई 2026) ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆

जय श्री राम, आज मैंने यूट्यूब पर एक बहुत बड़े कथावाचक का वीडियो देखा। थंबनेल की हेडिंग थी हनुमान जी कोई देवता नहीं है। हालांकि उन्होंने एक नया शब्द देकर बताया की हनुमान जी ब्रह्मा विष्णु और महेश के बराबर शक्तिमान पुरुष हैं। उनकी बात मेरी समझ में नहीं आई। मेरे समझ में तो यही आता है कि मेरे सभी कष्टों का निवारण श्री हनुमान जी कर सकते हैं। हमें केवल उनके उनको याद करना है। श्री हनुमान जी को याद करने के लिए आज की चौपाई है :-

सब सुख लहै तुम्हारी सरना |

तुम रच्छक काहू को डर ना ||

चौपाई के संपुट पाठ करने से अगर आपको कोई डराने की कोशिश कर रहा है या आपके सुख में कमी आ रही है तो वह दूर हो जाएगा।

नासे रोग हरे सब पीरा” नाम की पुस्तक में श्रीहनुमान चालीसा की चौपाइयों से संबंधित सभी उपायों का विस्तृत विवरण दिया हुआ है। इस पुस्तक को आप हमारे यहां से प्राप्त कर सकते हैं।

आइये अब हम आपको इस सप्ताह, ग्रहों के विचरण की जानकारी देते हैं।

इस सप्ताह सूर्य और बुध वृष राशि में, मंगल मेष राशि में, गुरु और शुक्र मिथुन राशि में, शनि मीन राशि में और राहु कुंभ राशि में गोचर करेंगे।

राशिवार साप्ताहिक राशिफल में सबसे पहले हम हमेशा की तरह मेष राशि की चर्चा करेंगे।

मेष राशि

इस सप्ताह व्यापारियों का व्यापार बहुत अच्छा रहेगा। धन आने का योग है। भाई बहनों के साथ आपके संबंध सामान्य रहेंगे। कचहरी के कार्यों में आपको ज्यादा रिस्क नहीं लेना चाहिए। आपके आत्मविश्वास में वृद्धि होगी, परंतु क्रोध की मात्रा भी बढ़ सकती है। आपको अपने संतान से सहयोग प्राप्त हो सकता है। आपकी प्रतिष्ठा में क्षति संभव है। कृपया अपने प्रतिष्ठा के प्रति सतर्क रहें। आपका और आपके पिताजी का स्वास्थ्य उत्तम रहेगा। इस सप्ताह आपके लिए 21 और 22 तारीख किसी भी कार्य को करने के लिए सफलता दायक है। सप्ताह के अन्य दिन भी कार्यों को संपन्न करने के लिए ठीक-ठाक है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन राम रक्षा स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन बृहस्पतिवार है।

वृष राशि

व्यापारियों के लिए यह सप्ताह अच्छा रहेगा। व्यापार में उन्नति संभव है। कर्मचारी एवं अधिकारियों को अपने वाणी पर थोड़ा कंट्रोल करना चाहिए अन्यथा उनको नुकसान हो सकता है। भाई बहनों के साथ आपका संबंध इस सप्ताह थोड़ा कम ठीक रहेगा। । वृष राशि के जातकों के लिए इस सप्ताह धन आने का योग है। भाग्य से सप्ताह आपको कोई विशेष लाभ प्राप्त नहीं हो पाएगा। आपको कोई भी कार्य संपन्न करने के लिए अपने परिश्रम और अपने कर्म पर विश्वास करना पड़ेगा। इस सप्ताह आपके लिए 18, 23 और 24 तारीख कार्यों में सफलता प्राप्त करने के लिए ठीक है। सप्ताह के अन्य दिन भी ठीक-ठाक है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन शनिवार है।

मिथुन राशि

अविवाहित जातकों के लिए यह सप्ताह ठीक रहेगा। विवाह के प्रस्ताव आएंगे। प्रेम संबंधों में वृद्धि होगी। नए संबंध बन सकते हैं। कचहरी के कार्यों में आप बिल्कुल किसी भी तरह का रिस्क नहीं ले। अगर आपने नौकरी प्राप्त करने के लिए कोई प्रतियोगी परीक्षा दी है तो उसमें आप इस सप्ताह सफल हो सकते हैं। कर्मचारी एवं अधिकारियों के लिए यह सप्ताह ठीक रहेगा। भाई बहनों के साथ संबंध ठीक रहेंगे। इस सप्ताह आपके लिए 19 और 20 तारीख उपयोगी हैं। 18 तारीख को आपको सावधान रहना चाहिए। आपको हानि हो सकती है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन काले कुत्ते को तंदूर की रोटी खिलाएं। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।

कर्क राशि

इस सप्ताह आपके पास धन आने का योग है। व्यापारियों का व्यापार अच्छी तरह से चलेगा। कर्मचारी और अधिकारियों के लिए यह सप्ताह अच्छा रहेगा। जनप्रतिनिधियों को अपनी प्रतिष्ठा में कमी देखने को मिल सकती है। प्रतिष्ठा के लिए उनको सावधान रहना चाहिए। दुर्घटनाओं के प्रति इस सप्ताह आपको सतर्क रहना चाहिए। सतर्कता पूर्वक कार्य करने पर कचहरी के कार्यों में सफलता प्राप्त हो सकती है। इस सप्ताह आपके लिए 21 और 22 तारीख लाभदायक है। 19 और 20 तारीख को आपको सतर्क रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन आदित्य हृदय स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन बृहस्पतिवार है।

सिंह राशि

इस सप्ताह आपके पास धन आने का योग है। व्यापार में उन्नति होगी। शासन के साथ व्यापार में आपको लाभ होगा। अधिकारियों से आपको सावधान रहना चाहिए। भाग्य से इस सप्ताह आपको मदद मिलेगी। दुर्घटनाओं से आपको सतर्क रहना चाहिए। कचहरी के कार्यों में आपको इस सप्ताह रिस्क नहीं लेना चाहिए। आपकी प्रतिष्ठा में इस सप्ताह वृद्धि हो सकती है। भाई बहनों के साथ संबंध सामान्य रहेंगे। आपको अपने संतान से मदद मिल सकती है। छात्रों की पढ़ाई ठीक-ठाक चलेगी। इस सप्ताह आपके लिए 18, 23 और 24 तारीख फलदायक है। इन तारीखों में आपको किसी भी कार्य के अच्छे परिणाम प्राप्त होंगे। इस सप्ताह आपको 21 और 22 तारीख को सतर्क होकर कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन तांबे के पत्र में जल अक्षत और लाल पुष्प लेकर भगवान सूर्य को जल अर्पण करें। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।

कन्या राशि

इस सप्ताह अधिकारियों एवं कर्मचारियों को अपने सहयोगियों से तथा अपने अधिकारियों से अच्छा सहयोग प्राप्त होगा। आपको अच्छी पदस्थापना भी प्राप्त हो सकती है। इस सप्ताह आपको भाग्य पर आश्रित नहीं रहना चाहिए। अपने कर्म पर आपको विश्वास करना चाहिए। अगर आप कर्म पर विश्वास करके कार्य करेंगे तो आपको निश्चित रूप से सफलता प्राप्त होगी। इस सप्ताह आपके लिए 19 और 20 तारीख कार्य करने के लिए अनुकूल हैं। 23 और 24 तारीख को आपको सजग रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन हनुमान चालीसा का पाठ करें और शनिवार को दक्षिण मुखी हनुमान जी के मंदिर में जाकर कम से कम तीन बार हनुमान चालीसा का वाचन करें। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।

तुला राशि

इस सप्ताह भाग्य आपका साथ दे सकता है, मगर कार्यों को करते समय आपको थोड़ी सी सावधानी भी रखना चाहिए। दुर्घटनाओं से आपको सावधान रहना चाहिए। यह सप्ताह आपके जीवनसाथी के लिए अच्छा रहेगा। उनके क्रोध की मात्रा में थोड़ी वृद्धि हो सकती है। इस सप्ताह आपको अपने संतान से सहयोग प्राप्त नहीं हो पाएगा। छात्रों की पढ़ाई में रुकावट आएगी। इस सप्ताह आपके शत्रु शांत रहेंगे परंतु समाप्त नहीं हो पाएंगे। धन आने का योग है। इस सप्ताह आपके लिए 21 और 22 तारीख कार्यों को करने में परिणाम दायक है। इन तारीखों में काम करने पर आपको अच्छे परिणाम प्राप्त होंगे। 18 तारीख को कार्य करते समय आपको बहुत सचेत रहने की आवश्यकता है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन काले उड़द की दाल का दान करें तथा शनिवार को शनि मंदिर में जाकर शनि देव का पूजन करें। सप्ताह का शुभ दिन शुक्रवार है।

वृश्चिक राशि

इस सप्ताह आपका मनोबल बहुत ऊपर रहेगा। अपने आत्मविश्वास से ही आप बहुत सारे कार्यों को निपटा सकते हैं। आपका व्यापार बहुत अच्छा चलेगा। इस सप्ताह आपको दुर्घटनाओं से सावधान रहने की आवश्यकता है। आप अपने शत्रुओं को इस सप्ताह थोड़ा सा प्रयास करने पर पराजित तथा समाप्त कर सकते हैं। इस सप्ताह आपको भाग्य के मामले में सावधान रहना चाहिए। कचहरी के कार्यों में किसी भी प्रकार का रिस्क नहीं लेना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए 18, 23 और 24 तारीख विभिन्न प्रकार के कार्यों के लिए लाभप्रद है। 21 और 22 तारीख को आपको अपने भाग्य से मदद मिल सकती है। 19 और 20 तारीख को आपको होशियार रहकर कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन रुद्राष्टक का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।

धनु राशि

अगर आपका विवाह नहीं हुआ है तो इस सप्ताह आपके विवाह के प्रस्ताव आएंगे। प्रेम संबंधों में वृद्धि हो सकती है। नए संबंध भी बन सकते हैं। लंबी यात्रा का योग भी बन सकता है। व्यापार ठीक-ठाक चलेगा। शत्रु शांत रहेंगे। आपको संतान से अच्छा सहयोग प्राप्त हो सकता है। छात्रों की पढ़ाई अच्छी चलेगी। भाई बहनों के साथ संबंधों में थोड़ा तनाव आ सकता है। दुर्घटनाओं से आपको सावधान रहना चाहिए। सावधानी पूर्वक कार्य करने पर कचहरी के कार्यों में सफलता प्राप्त हो सकती है। इस सप्ताह आपके लिए 19 और 20 तारीख परिणाम मूलक है। 18 तथा 21 और 22 तारीख को आपको सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन शिव पंचाक्षर स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवार है।

मकर राशि

इस सप्ताह आपके प्रतिष्ठा में वृद्धि हो सकती है। इसके लिए आपको मामूली प्रयास करने पड़ेंगे। माता जी का स्वास्थ्य अच्छा रहेगा। आपका और आपके जीवनसाथी का स्वास्थ्य भी ठीक रहेगा। पिताजी के डायबिटीज या ब्लड प्रेशर में वृद्धि हो सकती है। आपको अपने संतान से थोड़ी मदद मिल सकती है। भाई बहनों के साथ संबंध सामान्य रहेंगे। पेट में कुछ तकलीफ हो सकती है। धन प्राप्त करने के लिए आपको विशेष प्रयास करने पड़ेंगे। इस सप्ताह आपके लिए 21 और 22 तारीख विभिन्न प्रकार के कार्यों में असरकारी है। सप्ताह के बाकी दिनों में आपको सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन भगवान शिव का दूध और जल से अभिषेक करें। सप्ताह का शुभ दिन शुक्रवार है।

कुंभ राशि

इस सप्ताह आपका अपने भाई बहनों के साथ अच्छा संबंध रहेगा। आपके भाई बहनों की उन्नति भी हो सकती है। सामान्य धन आने का योग है। व्यापार ठीक चलेगा। आपको अपने प्रतिष्ठा के प्रति इस सप्ताह सावधान रहना चाहिए। कुछ लोग इसमें रुकावट खड़ी कर सकते हैं। आपके संतान के लिए यह सप्ताह ठीक रहेगा। आपको संतान से सहयोग भी प्राप्त होगा। छात्रों की पढ़ाई में समस्या हो सकती है। इस सप्ताह आपके लिए 18 तथा 23 और 24 तारीख विभिन्न प्रकार के कार्यों के लिए प्रभावशाली है। 21 और 22 तारीख को आपको सावधान रहकर अपने कार्यों को अंजाम देना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन शिव पंचाक्षर मंत्र का जाप करें। सप्ताह का शुभ दिन शनिवार है।

मीन राशि

इस सप्ताह आपके प्रतिष्ठा में वृद्धि संभव है। मगर इसके लिए आपको प्रयास भी करनी पड़ेंगे। धन आने का अच्छा योग है। इस सप्ताह आपको धन प्राप्ति का पूरा प्रयास करना चाहिए। व्यापारियों का व्यापार इस सप्ताह ठीक चलेगा आपको अपने भाई बहनों से थोड़ा सावधान रहना चाहिए। आपके संतान को इस सप्ताह कष्ट हो सकता है। आपको इस पर ध्यान देना चाहिए। भाग्य से आपको लाभ होगा। इस सप्ताह आपके लिए 19 और 20 तारीख कार्यों को करने के लिए उपयुक्त है। 21 और 22 तारीख आपकी संतान के लिए अच्छी है। 23 और 24 तारीख को आपको सजग रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गायत्री मंत्र का जाप करें। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवार है।

ध्यान दें कि यह सामान्य भविष्यवाणी है। अगर आप व्यक्तिगत और सटीक भविष्वाणी जानना चाहते हैं तो आपको मुझसे दूरभाष पर या व्यक्तिगत रूप से संपर्क कर अपनी कुंडली का विश्लेषण करवाना चाहिए। मां शारदा से प्रार्थना है या आप सदैव स्वस्थ सुखी और संपन्न रहें। जय मां शारदा।

 राशि चिन्ह साभार – List Of Zodiac Signs In Marathi | बारा राशी नावे व चिन्हे (lovequotesking.com)

निवेदक:-

ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय

(प्रश्न कुंडली विशेषज्ञ और वास्तु शास्त्री)

सेवानिवृत्त मुख्य अभियंता, मध्यप्रदेश विद्युत् मंडल 

संपर्क – साकेत धाम कॉलोनी, मकरोनिया, सागर- 470004 मध्यप्रदेश 

मो – 8959594400

ईमेल – 

यूट्यूब चैनल >> आसरा ज्योतिष 

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – “मोमबत्तियां” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ लघुकथा – “मोमबत्तियां” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

– मां ये मोमबत्तियां जलाकर क्यों चल रहे हैं अंकल लोग?

– बेटा, ये कुछ अक्ल के अंधों को रोशनी दिखाने निकले हैं !

– मम्मी, मोमबत्तियां पिघलने लगेंगीं तो गर्म मोम उंगलियों‌ पर गिरेगा, ये तो किसी का क्या बिगड़ा? अपना ही हाथ जलेगा !

– बात तो ठीक है तेरी। फिर तेरी नज़र में क्या करना चाहिए?

– मैं तो कहती हूँ कि ये मोमबत्तियां लेकर उस पापी को जलाओ, जिसने यह गंदा काम किया है !

मां अपनी नन्ही सी बेटी का मुंह देखती रह गयी !!

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # ३० – आशनाई… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर ☆

डॉ.राजेश ठाकुर

( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का  मंतव्य उनके ही शब्दों में –पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “आशनाई“.)  

? साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # ३० ?

? आशनाई… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर  ? ?

?

=1=

क्यों आप मेरी ओर कभी झाँकते नहीं

चाहत की कीमतों को कभी आँकते नहीं

=2=

है साथ निभाने का अटल वादा हमारा

हम इश्क़ में कभी भी डींग हाँकते नहीं

=3=

हम इश्क के धागे में पिरोते हैं मुहब्बत

पर आप कभी उसमें वफ़ा टाँकते नहीं

=4=

अपना पड़ाव दिलरुबा की रहगुजर में है

हम दूसरी गलियों की धूल फाँकते नहीं

=5=

अपनी खुली क़िताब है ‘राजेश’ ज़िन्दगी

हम अपनी आशनाई  कभी ढाँकते नहीं

© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर

शासकीय कॉलेज़ केवलारी

संपर्क — ग्राम -धतूरा, पोस्ट – जामगाँव, तहसील -नैनपुर, जिला -मण्डला (म.प्र.) मोबा. 9424316071

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – पग-पग नर्मदा यात्रा – भाग – ३२ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – पग-पग नर्मदा यात्रा – भाग- ३२ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

अनवरत परम्परा  

नर्मदा परिक्रमा के विषय में प्रसिद्ध साहित्यकार अमृतलाल बेगड़ ने अपने अनुभव साझा किए हैं। जेडीए अध्यक्ष डॉ. विनोद मिश्रा ने भी अपनी पुस्तक में नर्मदा परिक्रमा के अद्भुत अनुभवों को साझा किया है। रमनगरा निवासी वयोवृद्ध ज्योतिषाचार्य पं.मोतीराम शास्त्री की रचना पय: पानम् को राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त हो चुका है। मनीषियों ने लिखा है कि नर्मदा का स्वरूप आल्हादित करने वाला है। नर्मदा के कल-कल निनाद में शिवत्व का बोध होता है। नर्मदा की उछलती लहरों का नृत्य अंत:पुर के दरवाजों को खोल देता है। इसका आध्यात्मिक सुख अवर्णनीय है। वहीं भू-जल विद विनोद दुबे का कहना है कि नर्मदा जल में वैक्टीरिया को खत्म करने की अद्भुत शक्ति है। नर्मदा घाटी में युगीन सभ्यता बिखरी पड़ी है। लोगों की इस पर नजर पड़े, वे इसके महत्व को समझें। संभवत: इसलिए ही नर्मदा परिक्रमा की परम्परा प्रारंभ हुई होगी। पाषाण में तब्दील हो चुके नर्मदा के किनारे पेड़-पौधों व पत्थरों के अलावा नर्मदा घाटी के रहस्यों पर आज भी अनेक शोध चल रहे हैं। तीन बार नर्मदा परिक्रमा कर चुके रामदास अवधूत का मानना है कि आज भी कई अदृश्य शक्तियां और देवता नर्मदा की परिक्रमा करते रहते हैं। नर्मदा की परिक्रमा उद्गम स्थल अमरकंटक से या फिर ओंकारेश्वर से प्रारंभ की जाती है, जो पैदल तीन साल, तीन माह और तेरह दिन में (दोनों तट) पूर्ण होती है। वाहनों पर लोग इसे 108 दिन में भी पूरा कर लेते हैं। परिक्रमा प्रारंभ करने से पहले श्रद्धालु इसका संकल्प लेते हैं और फिर पूजन के बाद मां नर्मदा को एक कड़ाही प्रसाद भेंट करते हैं। कड़ाही प्रसाद से ही कन्याओं और सुपात्र ब्राम्हणों को भोजन कराया जाता है।

हमारी पहली परिक्रमा रामलला के आशीर्वाद और शनि महाराज के दर्शन से शुरू हुई। पुराने साथी मित्र और पड़ौसी श्री एल पी दुबे जी ने पुष्पमालाओं और मिठाई से परिक्रमा वासियों को विदाई दी। उनका प्रेममय व्यवहार आज की पूरी यात्रा मे परिक्रमा वासियों के बीच चर्चित रहा। अरुण श्रीवास्तव, आर.व्ही. अग्रवाल, एल.एन. अग्रवाल, अनिल मिश्रा, के.एल, सोनीजी आदि भी ग्वारी घाट मिलने और सद्भावना व्यक्त करने आये। अमृत लाल बेगड की धर्मपत्नी श्रीमती कांता बेगड के ममतामयी सानिध्य से परिक्रमा की शुरुआत हुई। उन्होंने सर्वाधिक मान बढ़ाया, जब हम और अरुण दनायक उनसे आशीर्वाद  लेने  पहुँचे तब उन्होंने छोटी-छोटी अनेक बातें नर्मदा यात्रा को लेकर बताई। श्री टी. पी. चौधरी दम्पत्ति ने तिलवारा घाट पर पहुँच कर अत्यंत प्रेमपूर्वक परिक्रमा वासियों का उत्साहवर्धन किया। उन्होंने सपत्नीक फूल मालाओं से परिक्रमा वासियों का स्वागत किया। फल नारियल भेंट किए। स्नेही जनों का प्रेम इस यात्रा मे मिलना अपने आप मे आह्लादकारक रहा। हमारे मित्र श्रीवर्धन नेमा जी स्टेट बैंक अधिकारी संघ के उप-महासचिव हैं। उन्होंने अत्यंत विनम्रतापूर्वक जबलपुर में रहवास भोजन की व्यवस्था कराई और ग्वारीघाट से तिलवारा घाट तक परिक्रमा यात्रा में साथ चले। उनके विनम्र स्वभाव से हमारा मन अभिभूत हो गया।

नर्मदा परिक्रमा:पहला चरण

ग्वारी घाट से झाँसी घाट

पहली यात्रा 13 अक्टूबर 2018 को ग्वारी घाट से प्रारम्भ हुई। हमारे दल में एक रिटायर्ड सैनिक कोलिता थे। वे अपनी उम्र 100 से ऊपर बताते थे, परंतु लगते नहीं थे। बुज़ुर्ग लोगों को अक्सर अपनी उम्र बढ़ाकर बताने की आदत हो जाती है। फिर भी वे 80-90 के बीच के तो थे। उनके दाहिने पैर में गोली लगी थी। उनका बैग सबसे भारी था। चैन भी ख़राब हो गई तो सेफ़्टी पिन लगाकर बैग पीछे डंडे में फँसाकर थोड़ा लँगड़ा कर चलते थे। फिर भी कई बार सबसे आगे निकल जाते थे। उनकी याददाश्त कमज़ोर हो गई है। अक्सर भूल जाते थे। हर बार पूछते थे कि अब होशंगाबाद आएगा। चलते-चलते जब लोग चिड़चिड़े हो जाते तो भुनभुनाने लगते। जगमोहन अग्रवाल कई ट्रैकिंग अभियान में जा चुके हैं। वे कोलिता जी को साथ लाए थे। दनायक जी ने अग्रवाल जी से कहा कि यार अगली बार इनको मत लाना। कहीं भी आगे निकल जाते हैं, भूल जाते हैं। अग्रवाल जी ने कोलिता जी को झिड़की पिलाई कि बीच में चला करो। जब थकान उतरती तो सब सामान्य हो जाते थे। लेकिन तब से कोलिता जी मेरे के पीछे चलने लगे। कोलिता जी सेना की ट्रेनिंग के हिसाब से क़दम गिन कर किलोमीटर का हिसाब लगाने में माहिर हैं। उनका अन्दाज़ कभी ग़लत नहीं हुआ। एक बार मैंने उनको जानबूझकर बातों में लगा लेने के बाद तय दूरी किलोमीटर में पूछी तो उन्होंने कहा कि क़दम गिनना भूल गए। अन्दाज़ से दूरी बताई वह वास्तविक दूरी के आसपास थी। एक बात है यदि क़दम गिनते रहो तो थकान का अहसास नहीं होता।

एक जगह भूख पर चर्चा चल पड़ी। सृष्टि का आधार भूख है। ऋग्वेद में ऋचाओं के सूत्र हैं कि कहीं कुछ नहीं था, अंतरिक्ष भी नहीं, ब्रह्माण्ड भी नहीं। सब कुछ शून्य था। एक शून्य हिरण्य गर्भ कहा गया है। दूसरा ब्रह्म अस्तित्व शिव तत्व। बिग बेंग सिद्धांत से हॉकिंग ने इसी की पुष्टि की है। गैसों का एक महावलय पूरी तीव्रता से गोलाकार घूमने लगा। उसकी गहराई में सृष्टि का अंड जन्मा। शिव के बीज तत्व ने पूरी तीव्रता से उसके अंदर प्रवेश किया तब वह अंड प्रस्फुटित हुआ और ब्रह्माण्ड अस्तित्व में आया, अंतरिक्ष में ऐसे कई ब्रह्माण्ड हैं। हम सब सृजन करने के लिए उसी प्रक्रिया को दोहराते हैं। अंड की फूटने की भूख और शिवतत्व की सघन ऊर्जा की सृजन भूख से जगत निर्माण हुआ है। ब्रह्म का अंड से मिलन हुआ ब्रह्माण्ड। सृष्टि का यह विधान हम सब अनिवार्यत: पूरा करने को प्रकृति के वशीभूत हैं। परिक्रमा यात्रा में सुबह से भूखे पेट आठ-दस किलोमीटर चलने के बाद भी भूख का अहसास न होना चमत्कारी तो है ही, वैज्ञानिक भी है। सूर्य ऋग्वेद का देवता है। ब्रह्माण्ड में ऊर्जा का सबसे बड़ा श्रोत सूर्य है। जिसमें अणुओं के खंडन-विखंडन की सतत प्रक्रिया चल रही है। वह बिना कुछ खाए ऊर्जा पैदा कर रहा है। परिक्रमा यात्री जब लगातार चलता है तब उसकी देह सूर्य के समान सतत ऊर्जा पैदा करने लगती है। सूर्य जैसा हो जाना ही सूर्योंपासना है। यात्री की अस्थियाँ, मांसपेशियाँ, स्नायुतंत्र और ग्रंथियाँ ऊर्जा का सघन वलय बनकर शरीर में शक्ति पैदा करतीं हैं। विजातीय पदार्थ द्रव्य बनकर पसीने के साथ देह से बाहर होता जाता है। मनुष्य की भूख के कई स्तर हैं। पेट की भूख, शरीर की भूख, मन की भूख, मस्तिष्क की भूख और आत्मा की भूख। पेट की भूख पूरी होते ही शरीर की भूख जागती है। शरीर की भूख पूरी होने पर मन की भूख जागती है। अंत में आत्मा की भूख अन्तरात्मा को जानने की जागती है। भूखों का नियोजन ही मानव जीवन है। इसी भूख के नियोजन में छुपे हैं पाप-पुण्य, नैतिकता-अनैतिकता और सदाचार-भ्रष्टाचार के मूल्य। देह की भूख भोजन की भूखी है, मस्तिष्क की भूख प्रशंसा माँगती है। मन की भूख रंजन की और आत्मा की भूख समर्पित आस्था की दरकार है। भूख से आध्यात्म का यह अर्थगहन नर्मदा यात्रा की अद्भुत उपलब्धि है।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

संस्थापक सम्पादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # ५१ – आलेख – मेरी माँ….मेरा बचपन….मेरा सामाजिक जीवन.. मेरा साहित्यिक संसार.. ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ५१ ☆

☆ आलेख ☆ ~ मेरी माँ….मेरा बचपन….मेरा सामाजिक जीवन.. मेरा साहित्यिक संसार.. ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

मेरी माँ….मेरा बचपन….मेरा सामाजिक जीवन..मेरा साहित्यिक संसार.. मेरी एक दुनियां  एवं मेरे जीवन के विविध आयाम ।

साहित्य और अध्यात्म की बेल कहीं न कहीं से मेरे मन में, मेरी माँ के द्वारा ही विरोपित की गई थी । उनकी ( माँ ) यह अभिरुचि कब मेरी अभिरुचि बन गई यह नहीं कह सकता लेकिन मैंने बचपन मे अपने माँ के सानिध्य में रहते हुए इस चीज को तो अवश्य महसूस किया था कि पढ़ना,आध्यात्मिक प्रवृत्ति का होना और उसके अनुरूप अपने जीवन में उसे उतारना, हमारे संस्कारों की यात्रा है । जहाँ तक मैं जब इस वीडियो को आपको दिखा रहा था तो  वीतराग महात्मा श्री श्री 1008 श्री स्वामी स्वतंत्रतानंद जी महाराज द्वारा रचित तत्वदर्शनी गीता टीका की पवित्र पुस्तक मेरे हाथ में थी और मैं जो बात मै कर रहा था और जिस श्री सूर्य नारायण सिंह की बात कर रहा था, वह कोई और नहीं थे, वे मेरे नाना जी थे और मेरे नाना जी के संस्कार और  उनकी रुचि और उनके जीवन जीने की शैली इस सब का प्रभाव मेरी माँ पर पड़ा और माँ के बाद शायद मुझे लगता है कि ये  सारी चीजे इस तरह से नीचे उतर कर चली आयीं । मेरा बचपन माँ के साथ बीता तो मुझे लगता है कि जो कुछ भी मैं आज  लिखता हूँ या  अपनी कलम चलाता हूँ तो उस साहित्य में आध्यात्मिक पुट और अध्यात्मिक दर्शन जो दर्शन होते हैं,वह सब बचपन में माँ के सानिध्य में उसके द्वारा पढ़े गए गीतों, भजन, श्रीमद् भागवत गीता के प्रति उसकी आकर्षण रामायण, नारी कल्याण, श्री रामचरितमानस, श्री राधेश्याम रामायण आदि का वाचन यह सब कुछ, मुझे अपने माँ से मिला। आज संयोग से मातृ दिवस है मातृ दिवस के इस अवसर पर मैं अपनी पूज्यनीया मां को प्रणाम करता हूँ ।

एक वार्ता के दौरान डॉ.शिवम तिवारी ने जब मुझसे पूछा , या एक लंबी प्रश्नावली के माध्यम से मेरे मार्गदर्शक साहित्यिक प्रेरणा स्रोत डॉ. महेश दिवाकर जी ने  जब यह जानना चाहा था  कि  मेरे अंदर यह साहित्य कहाँ से आया, तो मैंने इस बात को स्पष्ट रूप से कहा था कि आज मेरा साहित्य जो कुछ भी है वह मेरी माँ के कारण ही है। यह मेरी माँ में  कहां से आया तो वह उसका पूरा श्रेय मेरे नाना जी तक जाता है । मेरा ननिहाल उत्तर प्रदेश के जनपद देवरिया के तहसील रुद्रपुर के सन्नीकट ग्राम अकटहा में है , जो श्रीनेत वंशीय ( सूर्यवंशी)  क्षत्रियों का गांव है।

मेरा जन्म संवरा बलिया में हुआ जहाँ हमारी पारिवारिक विरासत थी । यहां पर खेती-बारी, अध्ययन अध्यापन, के साथ-साथ कुश्ती पहलवानी या फिर सामाजिक रूप से अपने रुतबे को एक ऐसे आदर्श के रूप में रखने की परंपरा थी, जिसकी सुगंध कोसों  तक जाए। यानि परिवार का संस्कार इतना उच्च हो कि उसे और उस परिवार को कई कोसो तक लोग जाने । कुछ ऐसी  ही परंपरा का परिवार मेरे गांव का परिवार था । मेरे बाबाजी और विशेष रूप से मेरे छोटे चाचा जी श्री उदय शंकर सिंह जो हमारे गांव संवरा के अट्ठारह वर्षो तक प्रधान रहे, उनकी जीवन शैली और उनके कार्य करने की पद्धति और मेरे ननिहाल पक्ष की संस्कृति कुछ अलग थी।

इन दोनों संस्कारों और संस्कृतियों का प्रभाव  मैं कहीं न कहीं अपने जीवन में पाता हूँ । मेरे भीतर जो सामाजिकता है वह मुझे मेरे परिवार यानी मेरे पिताजी के पक्ष से मिला, जहां हर छोटे बड़े तबके के लोगों के साथ कैसे सामंजस्य बैठाते हुए सब की भावनाओं का आदर करते हुए,  सब के दुख सुख में भागीदारी करते हुए, अपने को स्थापित किया जाता है यह सब मुझे अपने पितृ पक्ष यानी अपने पिताजी के परिवार से मिला, पूर्वजों के समय में शायद हमारे परिवार में एक मलिकार बाबा होते थे उनके पास ऐसे संस्कार थे और फिर  यदि अपनी पीढ़ी में कहें तो मुझे  थोड़ा बहुत जो सीखने को मिला यह मुझे मेरे अपने सबसे छोटे चाचा श्री  उदय शंकर सिंह जी से  मिला।

यदि मैं बौद्धिक ज्ञान की बात करूं तो बौद्धिक ज्ञान मुझे अपने चाचा श्री शिवशंकर सिंह श्री शिवजी सिंह से मिला और सामाजिक ज्ञान अपने सबसे छोटे चाचा श्री उदय शंकर सिंह से मिला । मेरे छोटे चाचा श्री उदयशंकर सिंह जी जैसा व्यक्तित्व का व्यक्ति बिरले,ही पैदा होते हैं यह मैं बड़े विश्वास के साथ कह सकता हूं ।

अपने परिवार के दो संस्कारों की अगर बात करे तो हमारा परिवार में जो कि एक कलचुरी बंशीय क्षत्रिय परिवार है, इसमें आदर करने का भाव जबरदस्त था । हमारे परिवार में ब्राह्मण के प्रति बहुत सम्मान था और ब्राह्मण हमारे लिए पूजनीय होते थे। हमें ब्राह्मण का कितना सम्मान करना चाहिए, किस प्रकार करना चाहिए इसका ज्ञान मेरे चाचा श्री शिव शंकर सिंह जी से मिला। यही कारण है कि मेरे मन में भी ब्राह्मण एवं गुरुजनों के प्रति असीम स्नेह है ।

होली जैसे त्योहारों पर पंडित जी को आदर के साथ अपने घर बुलाना, उन्हें बैठना, उनको प्रसाद ग्रहण कराना और फिर उनको विदा करना, ये सारे संस्कार, मेरे चाचा शिवजी सिंह से मिले थे।

वही समाज के हर एक वर्ग के प्रति चिंता करना, उनके दुख दर्द को महसूस करना,उनकी मदद करना, हर छोटे -बड़े गरीब अमीर के घर जाना,जाति बिरादरी के विभेद से दूर होकर, सबकी मदद करना, और सबका प्रिय होना, यह सामाजिक ज्ञान मुझे अपने सबसे छोटे जैसा श्री उदय शंकर सिंह जी से मिला ।

उनके आहाते में कौन व्यक्ति कहाँ का है,  किस बिरादरी का है, किस गांव का है,कितने लोग बैठे हुए हैं,यह समझ पाना और सबको एक साथ, लेकर चलना उनसे सीखा जा सकता था।

छोटी-छोटी गतिविधियों और क्रियाकलाप हमारे संस्कारों को परिवार को श्रेष्ठता प्रदान करती है । उदाहरण  स्वरूप, मेरे चाचा श्री शिव शंकर सिंह जब रोड से घर की तरफ चलते थे तो उस समय उनके पाकेट में कुछ चॉकलेट,कुछ सिक्के हुआ करते थे । गाँव छोटे-छोटे बच्चे जो छोटे -छोते घरों से, हर तपके के लोगों के बच्चे होते थे जिनकी उम्र यही 2 साल 3 साल 4 साल 5 साल 6 साल होती थी वह उनके पास आते थे,  उनको पैर छु कर प्रणाम करते थे, वे उनको एक टॉफी देते थे, या पैसे पढ़ते थे या आशीर्वाद दे देते थे । वे सबसे मिलते हुए चलते थे ।इस प्रकार वे बच्चों के भी लोकप्रिय थे ।

गांव के किसी भी जाति बिरादरी उच्च नीच,अमीर गरीब किसी के घर में जब शादी होती थी तो शादी में  बेटी के अंतिम सिंदूरदान तक रुकना, सारे  ब्राह्मणजन और पौनी जन को दक्षिणा दिलाना, बाहर से आए हुए किसी भी जाति बिरादरी के बाराती को बराती से ज्यादा अपने गांव का अतिथि समझ कर सम्मान देना,   मेरे चाचा की सबसे बड़ी विशेषता होती थी ।

वहीं मेरे छोटे चाचा की मदद का तरीका कुछ और होता था किस रूप में शारीरिक या आर्थिक रूप से, कहां और कैसा मदद कर रहे हैं, यह कोई जान नहीं पता था लेकिन मदद तो करते थे, यही कारण था कि यह सारे लोग उनके मुरीद हो जाते थे । हर जाति और वर्ग के लोगो का प्रेम कैसे पाया जाता है, कोई उनसे सीखे ।

शायद मेरे जीवन में भी इसका बड़ा प्रभाव रहा जब तक मैं जनपद बलिया में रहा हर छोटे-बड़े के दुख सुख में जाना और कौन बीमार है, किसको दवा की जरूरत,है किसको क्या मदद की जा सकती है,यह सब कुछ संस्कार मुझे मेरे अपने परिवार से ही मिला है ।अपने चाचा और अपने परिवार के इन्हीं संस्कारों का प्रभाव शायद मेरे व्यक्तित्व पर पड़ा होगा इसीलिए मैं मेरे मन में प्रत्येक व्यक्ति के प्रति समाज के हर एक व्यक्ति के प्रति विशेष प्रेम अनुराग आज भी है । यदि मैं बहुत नजदीक जाकर अपने व्यक्तिगत जीवन को देखूं तो मेरे जीवन में मेरे भाई श्री चंदेश्वर प्रताप सिंह जिन्हें मैं पिता तुल्य मानता हूं उनका अपरोक्ष सहयोग सदैव मिला । वह मेरे लिए ध्वज दंड के स्वरूप है । जिस प्रकार एक दंड ( डंडा ) ध्वज के भीतर छिपा रहता है, ध्वज फहरता है । लेकिन वह ध्वज कहीं न कहीं उस दंड के सहारे ही फहरता है ।

यदि सामाजिक प्रतिष्ठा की बात करें तो उम्र कम होने के बावजूद भी गांव के इर्द-गिर्द के सम्मानित लोगों के बीच बैठना,  उनसे बात करना, उनके प्रति अपने मन के आदर भाव को प्रदर्शित करना मेरा व्यक्तिगत स्वभाव होता था । आसपास के गांव के सम्मानित जान जिनकी उम्र मुझे काफी अधिक हुआ करती थी लेकिन वह भी हमसे बहुत प्रेम करते थे और हमारे मन में उनके प्रति बहुत आदर था ।

विभाग और विभाग से जुड़े हुए लोग मुझसे बहुत प्रिय प्रेम करते थे। यह नहीं की जो फार्मासिस्ट है वही प्रेम करें, स्वास्थ्य विभाग से जुड़ा हुआ प्रत्येक व्यक्ति बहुत स्नेह करता था । बलिया से स्वास्थ्य विभाग का कोई अधिकारी कर्मचारी कोई व्यक्ति जिसकी गाड़ी लखनऊ की तरफ, रसड़ा की तरफ या अन्य किसी तरफ जा रही हो और रास्ते में यदि संवरा चट्टी आ गई तो वह गाडी रुकती थी, वे लोग हमारे गांव की दुकान पर चाय पीते थे, और कहते थे कि यह किसका गांव है यह राजेश सिंह का गांव है । मैं उसे वक्त रहूं या ना रहूं श्याम लाल की दुकान तो रहेगी न,  धूमन तो रहेंगे न। यह सब कहीं ना कहीं मुझे समाज से जोड़ता था । मेरे नामौजूदगी में  बड़े भैया डॉक्टर शमशेर सिंह और मेरे और दूसरे भाई श्री कमलेश्वर प्रताप सिंह ( मुन्नू भईया,) जो अब इस दुनिया में नहीं रहे वे बिना कुछ समझे,केवल यह जान जाते थे कि मेरा परिचित कोई आ रहा है तो उसको वही आव भगत मिलता था जो मेरे रहने पर मिलता था । इस कार्य को मेरे भतीजे.डा पंकज कुमार सिंह, आज भी बाखूबी निभाते हैं।

मुझे एक वाकया याद है एक बार श्री बीपी मिश्रा जी और मेरे यूनियन के महासचिव डा. के के सचान,बलिया एक दौरे पर जा रहे थे और मैं लखनऊ में था मैंने उनसे कहा कि बीच में मेरा गांव पड़ता है आप वहां रुक सकते हैं । वे लोग वहां रुके, और जिस प्रकार का आदर्श सम्मान उनको मिला उसकी चर्चा वे बाद तक करते रहे ।

अभी विगत दिनों में गांव गया था और मैंने अपने गाड़ी का खलीलपुर की तरफ मोड़ दिया मेरी इच्छा थी कि उस पीढ़ी को जिस पीढ़ी के साथ हमने बहुत सीखा था, जिनमें से बहुत थोड़े लोग आज भी है उनसे मिलना और उनसे मिलकर बात करना मुझे अच्छा लगता है । मैं खलीलपुर पहुंच गया खलीलपुर के प्रधान जी श्री रमाशंकर सिंह जी घर पर थे गौरीशंकर सिंह जी से मुलाकात नहीं हो पायी । परिवार के बच्चे हमारे कुल पुरोहित चौबे जी, और परिवारजन वहां मौजूद थे, वास्तव बड़ी सुखद अनुभूति हो रही थी ।  या तो हमारे पिता पक्ष का प्रभाव था ।

दूसरा पक्ष, मेरे ननिहाल पक्ष का है जहां पर शिक्षा, जीवन शैली, पहनावा वेशभूषा, बात करने की तौर तरीके, सब कुछ कहीं ना कहीं भिन्न थे, लेकिन यह सारे गुण मेरे भी अंदर कहीं न कहीं वहीं से आए । सबसे खास और विशेष आध्यात्मिक और सांस्कृतिक पक्ष तो ननिहाल से ही आया। यानी मेरे साहित्य के पीछे कहीं न कहीं   मेरे ननिहाल पक्ष मेरे मेरे नाना जी का प्रभाव है ।

आज वर्तमान में मैं जिस जिंदगी को जी रहा हूं या अपनी सेवा अवधि जहां समाप्त करने के मोड पर खड़ा हूं , यहां दो प्रकार के व्यक्तियों का समावेश रहा । दो प्रकार के बौद्धिक साथियों का साथ रहा जिसमें एक वर्ग फार्मासिस्ट है । राजकीय सेवा में आने के बाद में डिप्लोमा फार्मासिस्ट एसोसिएशन से जुड़ गया और जनपद इकाई बलिया के डिप्लोमा फार्मासिस्ट एसोसिएशन का अध्यक्ष 12 वर्षों तक रहा, प्रदेश उपाध्यक्ष रहा, प्रदेश संगठन मंत्री रहा।   आप इसे समझ सकते हैं कि फार्मासिस्टों के बीच मेरी पकड़, उनके साथ मेरा बात- व्यवहार किस हद तक कितना  था और वे लोग कितने मेरे प्रिय थे,यह मेरा दिल ही समझता है।

यद्यपि आजकल मैं  उस दिशा में उतना सक्रिय नहीं हूँ, यह यू कहिए कि मैं संगठन अभी काफी दूर हूँ और साहित्य एवं क्षय उन्मूलन प्रोग्राम के नजदीक हूँ । ऐसे में स्वाभाविक सी बात है कि क्षय उन्मूलन कार्यक्रम से जुड़े हुए मेरे प्यारे साथियों का सहयोग मुझे मिलता है उनसे बात करता हूँ साथ ही साथ साहित्य दुनिया से जुड़े हुए लोग भी मेरे मित्र हैं।

यदि मैं उत्तर प्रदेश की टीबी ड्रग टीम की बात करूं तो ड्रग टीम के जो जनपदों के साथी हैं, वह मेरे लिए कोई हमारे सरकारी विभाग में काम करने वाले साथियों के साथ जो संबंध है उसके कारण नहीं है।  उनके साथ मेरे संबंध आत्मिक एवं पारिवारिक संबंधों जैसे संबंध है ।  पिता पुत्र, भाई-भाई, मित्र जैसे संबंध है। जिसका कारण यह है कि वह मुझसे बात करना चाहते हैं,मैं उनसे बात करना चाहता हूं,वह मुझे देखना चाहते हैं,मै उनको देखना चाहता हूं,  वह मेरे पास रहना पसंद करते हैं, मुझे सुनना पसंद करते हैं यही सब सामाजिकता है । यही सब चीज आती तक याद की जाएगी सेवानिवृत्ति के बाद भी मेरे जेहन में बनी रहेगी मेरे साहित्य में बनी रहेगी मेरे कलम के साथ चलती रहेगी ।

यदि मैं साहित्यिक दुनिया की बात करूँ तो साहित्य में श्री रामदेव धुरंधर जी जैसे अनेकों ऐसे साहित्यकार मेरे जीवन में आए जिन्होंने मुझे साहित्यिक कलम पकड़ा दी और आज जो कुछ भी लिख रहा हूँ या यह कहिए कि इस आलेख को ही यदि लिख रहा हूं तो इसके पीछे इन बड़े साहित्यकारों की बहुत बड़ी भूमिका है । इनकी फेहरिस्त इतनी लंबी है कि मैं सबका नाम नहीं ले सकता, लेकिन मेरी कृतज्ञता उन सभी श्रेष्ठ साहित्यकारों के प्रति मेरे मन में आधार है, जिन्होंने मुझे साहित्य ज्ञान एवं संबल प्रदान किया ।

इस प्रकार मैं कह सकता हूं कि विविध आयामों के साथ मेरी एक दुनिया है। जो अत्यंत दिव्य, भव्य और चीरकाल तक याद रखने वाली, दुनिया है।

सादर

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ मन और वाणी ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆

सुश्री सविता खण्डेलवाल ‘भानु’

(सुश्री सविता खण्डेलवाल ‘भानु’ जी का ई-अभिव्यक्ति में  स्वागत। लेखन-प्रकाशन – गत 2022 से छंद लेखन, एकल प्रकाशन– कलम के नवांकुर, अनुग्रह नवप्रस्तारित छंद पर लेखन (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), साझा संकलन – तकरीबन 10, द्वादश ज्योतिर्लिंग (लंदन बुक आफ रिकार्ड), अनेकता में एकता (एशिया बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड), छंदावली – (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), महाकाल साहित्य सम्मान से सम्मानित। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता मन और वाणी।)

☆ कविता ☆ मन और वाणी ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆

हो कमान जब वाणी पर तो, दे अलग पहचान।

सोच समझकर मीठा बोलो, जग में मिले मान।।

क्यों लड़ना है प्यारे तुझको, जीवन क्षणभंगुर।

पल का भी क्या तनिक भरोसा, किस नशे में चूर।।

प्रेमभाव की बोली से ही, तेरी बढ़े शान।

सोच समझकर मीठा बोलो, जग में मिले मान।।

शब्द चीर देते हैं मन को, गहरा लगे घाव।

बरसों के संबंध मिटाता, कुछ पलों का ताव।।

करो मौन ये वाणी जब हो, मन में घमासान।

सोच समझकर मीठा बोलो, जग में मिले मान।।

बातें सुन मिश्री सी मीठी, मन में जगे आस।

हो अवसाद दूर जीवन से, सारा मिटे त्रास।।

त्याग करें कटुता का हम भी, दो हमे वरदान।

सोच समझकर मीठा बोलो, जग में मिले मान।।

© सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु”

झालरापाटन राजस्थान

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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