हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # 70 ☆ व्यंग्य – साहित्यिक किसिम के दोस्त ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे  आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं। आज  प्रस्तुत है एक  अतिसुन्दर व्यंग्य रचना  ‘साहित्यिक किसिम के दोस्त’।  इस सार्थक व्यंग्य  के लिए डॉ परिहार जी की  लेखनी को  सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # 70 ☆

☆ व्यंग्य – साहित्यिक किसिम के दोस्त

सबेरे सात बजे फोन घर्राता है। आधी नींद में उठाता हूँ।

‘हेलो।’

‘हेलो नमस्कार। पहचाना?’

‘नहीं पहचाना।’

‘हाँ भई, आप भला क्यों पहचानोगे! एक हमीं हैं जो सबेरे सबेरे भगवान की जगह आपका नाम रट रहे हैं।’

‘हें, हें, माफ करें। कृपया इस मधुर वाणी के धारक का नाम बताएं।’

‘मैं धूमकेतु, दिल्ली का छोटा सा कवि। अब याद आया? सन पाँच में लखनऊ के सम्मेलन में मिले थे।’

याद तो नहीं आया,लेकिन शिष्टतावश वाणी में उत्साह भरकर बोला,’अरे, आप हैं? खू़ब याद आया। वाह वाह। कहाँ से बोल रहे हैं?’

‘यहीं ठेठ आपकी नगरी से बोल रहा हूँ।’

‘कैसे पधारना हुआ?’

‘विश्वविद्यालय ने बुलाया था एक कार्यशाला में।’

‘वाह! मेरा फोन नंबर कहाँ से मिला?’

‘अब यह सब छोड़िए। जहाँ चाह वहाँ राह। हमें आपसे मुहब्बत है, इसीलिए हमने हाथ-पाँव मारकर प्राप्त कर लिया।’

‘वाह वाह! क्या बात है!तो फिर?’

‘तो फिर, भई, यहाँ तक आकर आपसे मिले बिना थोड़इ जाएंगे। आपके लिए पलकें बिछाये बैठे हैं।’

मुझे खाँसी आ गयी। गला साफ करके बोला,’कहाँ रुके हैं?’

‘यूनिवर्सिटी के गेस्ट हाउस में। कमरा नंबर 15 ।’

‘ठीक है। मैं आता हूँ।’

‘ऐसा करें। शाम को कहीं बैठ लेते हैं। शहर के चार छः साहित्यिक मित्रों को बुला लें। परिचय हो जाएगा और चर्चा भी हो जाएगी। एक दो पत्रकारों को भी बुला लें तो और बढ़िया। आकाशवाणी वाले आ जाएं तो सोने में सुहागा। इतनी व्यवस्था कर लें तो मेरा आपके नगर में आना सार्थक हो जाए। मैं शाम छः बजे के बाद आपका इंतजार करूँगा। जैसे ही आप आएंगे, मैं चल पड़ूँगा।’

मैं चिन्ता में पड़ गया। कहा,’ठीक है, मैं कोशिश करता हूँ।’

‘अजी, कोशिश क्या करना! आप फोन कर देंगे तो शहर के सारे साहित्यकार दौड़े आएंगे। आपकी कूवत को जैसे मैं जानता नहीं। आप के लिए क्या मुश्किल है? तो फिर मैं शाम को आपका इंतजार करूँगा।’

‘ठीक है।’

मैंने फोन रखकर पहले अपने संकोची स्वभाव को जी भरकर कोसा, फिर अपने दिमाग़ को दबा दबा कर उसमें से धूमकेतु जी को पैदा करने की कोशिश में लग गया। बड़ी जद्दोजहद के बाद एक झोलाधारी कवि की याद आयी जो लखनऊ सम्मेलन में सब तरफ घूमते और खास लोगों को अपना कविता-संग्रह बाँटते दिखते थे। कुछ लोग ऐसे होते हैं जो भारी से भारी सम्मेलन में भी अपने तक ही कैद रहते हैं—अपनी चर्चा, अपनी प्रशंसा, अपनी कविता। धूमकेतु जी भी पूरी तरह आत्मप्रचार में लगे थे। तभी उनसे संक्षिप्त परिचय हुआ था। फिर दिल्ली के अखबारों में कभी कभी उनकी कविताएँ देखी थीं।

मैं फँस गया था। आयोजन-अभिनन्दन के मामले में मैं बिलकुल फिसड्डी हूँ और शायद इसीलिए अब तक लोगों ने मुझे अभिनन्दन के लायक नहीं समझा।

लेकिन साहित्य के क्षेत्र में संभावनाओं की कमी नहीं है। बहुत से साहित्यकर्मी चन्दन-अभिनन्दन को ही असली साहित्य समझते हैं। इसलिए मैंने एक स्थानीय स्तर के साहित्यकार ज्ञानेन्द्र को इन्तज़ाम का सारा भार सौंप दिया और उन्होंने सहर्ष कृतज्ञतापूर्वक स्वीकार भी कर लिया। उन्होंने एक सांध्यकालीन अखबार के प्रतिनिधि को भी खानापूरी के लिए पकड़ लिया। मैं निश्चिंत हुआ।

शाम को धूमकेतु जी की सेवा में उपस्थित हुआ तो उन्होंने दोनों बाँहें फैलाकर मुझे भींच लिया। फिर अपना बाहुपाश ढीला करके बोले, ’हमारे प्यार की कशिश देखी? हमने आपको ढूँढ़ ही निकाला। वो जो चाहनेवाले हैं तेरे सनम, तुझे ढूँढ़ ही लेंगे कहीं न कहीं।’

हमने उनके मुहब्बत के जज़्बे की दाद दी, फिर उन्हें कार्यक्रम की तैयारी की रिपोर्ट दी। वे प्रसन्न हुए, बोले, ’स्थानीय लोगों से मेल-मुलाकात न हो तो कहीं जाने का क्या फायदा?’

मैं उन्हें स्कूटर पर लेकर रवाना हुआ। कार्यक्रम-स्थल पर आठ दस भले लोग आ गये थे। हर शहर में कुछ ऐसे लोग होते हैं जो हर साहित्यिक कार्यक्रम की शोभा होते हैं। कार्यक्रम के आयोजक उन्हें याद करना कभी नहीं भूलते। वे हर कार्यक्रम को संभालने वाले स्तंभ होते हैं। उड़ती हुई सूचना भी उनके लिए पर्याप्त होती है। ऐसे ही तीन चार रत्न इस कार्यक्रम में भी डट गये थे।

कार्यक्रम बढ़िया संपन्न हुआ। ज्ञानेन्द्र ने धूमकेतु जी को कोने में ले जाकर उनका बायोडाटा लिख लिया था। धूमकेतु जी ने मुहल्ला-स्तर से लेकर अपनी सारी उपलब्धियों का विस्तृत ब्यौरा लिखा दिया था। उनको गुलदस्ता भेंट करने के बाद उनका परिचय हुआ और फिर आज की कविता पर उनका वक्तव्य हुआ। फिर जनता की फरमाइश पर उन्होंने अपनी पाँच छः कविताएं सुनायीं जिन पर हमने शिष्टतावश भरपूर दाद दी। फिर कुछ श्रोताओं ने हस्बमामूल उनके कृतित्व के बारे में कुछ सवाल पूछे और इस तरह कार्यक्रम  सफलतापूर्वक मुकम्मल हो गया। धूमकेतु जी गदगद थे। विदा होते वक्त एक बार फिर मुझे भींचकर उन्होंने इज़हारे-मुहब्बत किया। जाते वक्त हाथ हिलाकर बोले, ’स्नेह-भाव बनाये रखिएगा।’

पाँच छः माह बाद दिल्ली जाने का सुयोग बना। पहुँचकर मैंने उमंग से धूमकेतु जी को फोन लगाया। उधर से उनकी आवाज़ आयी,’हेलो।’

मैंने कहा,’मैं सूर्यकान्त। जबलपुर वाला।’

वे स्वर में प्रसन्नता भर कर बोले,’अच्छा,अच्छा। कहाँ से बोल रहे हैं?’

मैंने कहा, ’दिल्ली से ही। काम से आया था।’

वे बोले, ’वाह! बहुत बढ़िया! तो कब मिल रहे हैं?’

मैंने कहा, ’जब आप कहें। मैंने तो पहुँचते ही आपको फोन लगाया।’

वे जैसे कुछ उधेड़बुन में लग गये। थोड़ा रुककर बोले,’अभी तो मैं थोड़ा काम से निकल रहा हूँ। आप शाम चार बजे फोन लगाएं। मैं आपको बता दूँगा।’

मेरा उत्साह कुछ फीका पड़ गया। चार बजे फिर फोन लगाया। उधर से धूमकेतु जी की आवाज़ आयी,’हेलो।’

मैंने कहा,’मैं सूर्यकान्त।’

आवाज़ बोली, ’मैं धूमकेतु जी का बेटा बोल रहा हूँ। पिताजी एक साहित्यिक कार्य से अचानक बाहर चले गये हैं।’

मैंने कहा,’लेकिन यह आवाज़ तो धूमकेतु जी की है।’

जवाब मिला,’धूमकेतु जी की नहीं, धूमकेतु जी जैसी है। हम पिता पुत्र की आवाज़ एक जैसी है। कई लोग धोखा खा जाते हैं।’

मैंने पूछा,’कब तक लौटेंगे?

आवाज़ ने पूछा,’आप कब तक रुकेंगे?’

मैंने कहा,’मैं परसों वापस जाऊँगा।’

आवाज़ ने कहा,’वे परसों के बाद ही आ पाएंगे। प्रणाम।’

उधर से फोन रख दिया गया। मैं खासा मायूस हुआ।

जबलपुर वापस पहुँचा कि दूसरे ही दिन धूमकेतु जी का फोन आ गया—‘क्यों भाई साहब! दिल्ली आये और बिना मिले लौट गये? ऐसी भी क्या बेरुखी।’

मैंने कहा,’आपसे मिलना भाग्य में नहीं था, इसीलिए तो आप बाहर चले गये थे।’

वे बोले,’चले गये थे तो आप एकाध दिन हमारी खातिर रुक नहीं सकते थे? कैसी मुहब्बत है आपकी?’

मैंने कहा,’हाँ, लगता है हमारी मुहब्बत में कुछ खोट है।’

वे दुखी स्वर में बोले,’हमने सोचा था कि आपके सम्मान में छोटी मोटी गोष्ठी कर लेते। कुछ आपकी सुनते, कुछ अपनी सुनाते।’

मैंने कहा,’क्या बताऊँ! मुझे खुद अफसोस है।’

वे बोले,’खैर छोड़िए। वादा कीजिए कि अगली बार दिल्ली आएंगे तो मिले बिना वापस नहीं जाएंगे।’

मैंने कहा,’पक्का वादा है,भाई साहब। आपसे मिले बिना नहीं लौटूँगा। आप दुखी न हों।

वे बोले,’चलिए ठीक है। स्नेह बनाये रखें।’

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

 ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ गांधीजी के जन्मोत्सव पर विशेष – गांधी-150 (गांधी वादी मित्रों का आत्म चिंतन) ☆ श्री राकेश कुमार पालीवाल

श्री राकेश कुमार पालीवाल

(सुप्रसिद्ध गांधीवादी चिंतक श्री राकेश कुमार पालीवाल जी  वर्तमान में  प्रधान मुख्या आयकर आयुक्त ( प्रिंसिपल  चीफ कमिश्नर) मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के पद पर पदासीन हैं। गांधीवादी चिंतन के अतिरिक्त कई सुदूरवर्ती आदिवासी ग्रामों को आदर्श गांधीग्राम बनाने में आपका महत्वपूर्ण योगदान है। आपने कई पुस्तकें लिखी हैं जिनमें  ‘कस्तूरबा और गाँधी की चार्जशीट’ तथा ‘गांधी : जीवन और विचार’ प्रमुख हैं।

हम आदरणीय श्री राकेश कुमार पालीवाल जी की  फेसबुक वाल से  गांधीजी के जन्मोत्सव पर एक सार्थक  एवं विचारणीय कविता प्रस्तुत कर रहे हैं – गांधी – 150 (गांधी वादी मित्रों का आत्म चिंतन))

☆ गांधीजी के जन्मोत्सव पर विशेष ☆ 

☆ गांधी – 150 (गांधी वादी मित्रों का आत्म चिंतन)  ☆

 

बीत गया गांधी – एक सौ पचास भी

अब दो अक्तूबर दो हजार बीस में

दी जा रही है उसे अंतिम श्रद्धांजलि

 

इसकी शुरुआत में

गांधी वादी संस्थाओं ने

की थी बड़ी बड़ी घोषणाएं

मसलन एक सौ पचास गांवों को

बनाएंगे आदर्श गांधी गांव गांधी के सपनों के

और, और भी न जाने बनाई थी

कितनी भारी भरकम महत्वाकांक्षी योजनाएं

ठीक उसी तरह जैसे बनाते हैं बड़े बड़े घोषणापत्र

राजनीतिक दलों के बडबोले नेतागण

 

पदों की भूल भुलैया में

गांधी की संस्थाओं में जमे लोग

भूल गए हैं सहज सरल गांधी मार्ग

जिसमें कथनी करनी में अंतर नहीं होता

और कहने से पहले किए जाते हैं काम निस्वार्थ

 

गांधीवादी संस्थाओं के पदाधिकारियों को

अब इंतजार रहेगा गांधी एक सौ पचहत्तर का

तब तक बर्फ सा जमे रहना है गांधीवादी संस्थाओं में

भले ही शरीर साथ नहीं दे उम्र के नवें दशक में पहुंचकर

पद से गोंद सा चिपके रहना है हर हालत में हर मौसम में

 

गांधी एक सौ पचहत्तर में बनेंगी

और बड़ी योजनाएं गांधीवादी संस्थाओं में

भले ही उनका अंतिम हस्र भी

वैसा ही होगा जैसा हुआ है

गांधी एक सौ पच्चीस और एक सौ पचास में !

 

© श्री राकेश कुमार पालीवाल

भोपाल

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शेखर साहित्य # 8 – कवितेशी बोलू काही ☆ श्री शेखर किसनराव पालखे

श्री शेखर किसनराव पालखे

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – शेखर साहित्य # 8 ☆

☆ कवितेशी बोलू काही ☆

अनामिक हे सुंदर नाते

तुझ्यासवे ग जुळून यावे

तुझ्याच साठी माझे असणे

तुलाच हे ग कळून यावे

आनंदाने हे माझे मन

सोबत तुझ्या ग खुलून यावे

दुःखाचे की काटेरी हे क्षण

कुशीत तुझ्या ग फुलून यावे

भेटावी मज तुझी अशी ही

घट्ट मिठी ती हवीहवीशी

अथांगशा या तुज डोहाची

अचूक खोली नकोनकोशी

रुजावेस तू मनात माझ्या

प्रेमळ नाजूक सुजाणतेने

तूच माझे जीवन व्हावे

अन तुच असावे जीवनगाणे

 

© शेखर किसनराव पालखे 

पुणे

05/06/20

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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English Literature – Book-Review – Lines of Fate – Ms. Neelam Saxena Chandra

Lines of Fate

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e-abhivyakti.com congratulates Ms. Neelam Saxena Chandra ji for this most successful book released on 20th June 2020.  Excerpts from the Amazon as on 18th July 2020 itself describes the success story of less than one month.

Amazon Bestsellers Rank: #644

Ms Neelam Saxena Chandra

(Ms. Neelam Saxena Chandra ji is a well-known author. She has been honoured with many international/national/ regional level awards. We are extremely thankful to Ms. Neelam ji for permitting us to share her excellent poems with our readers. We will be sharing her poems on every Thursday. Ms. Neelam Saxena Chandra ji is  an Additional Divisional Railway Manager, Indian Railways, Pune Division. )

☆ Book Review – Lines of Fate: First Love and Other Stories by Ms. Neelam Saxena Chandra

Lines of Fate: First Love and Other Stories by AKS Publishing House written by Ms. Neelam Saxena Chandra

Often a simple encounter on the path of life can change one’s entire future. “Lines of Fate” by Neelam Saxena Chandra is a collection of such selected, distinctive and unique tales from different walks of life. She has come with this unique collection of short stories to entertain the readers.

When a dice is rolled, one does not know what the outcome will be. Similarly, in an encounter between people, the aftermath is simply indefinite and unidentifiable. Maybe, the lines of fate decide the final outcome. Twists and turns are a part and parcel of each of these stories, written in simple, easy-to-read and lucid language.

We are pleased to reproduce the Book Review by an enlightened reader Mr Javvad Rizvi, Age 33, Bhopal. He is GIS executive at MAPIT Center Bhopal.

Review:

My Ratings – ⭐⭐⭐⭐/5

Quote of the Day –

There are two types of people who will tell you that you cannot make a difference in this world: those who are afraid to try and those who are afraid you will succeed…….

Synopsis –

Lines of Fate by Neelam Saxena is a Short book contains 16 short stories. As I usually prefer reading short fiction this is the perfect book for short story lovers. In this book, the Author did a great job of explaining her point of view in the form of short tales that can be read by anybody without experiencing any boredom. Each and every story has lots of twists and turns in it. Out of 16 stories, I found some of them are really heart touching for me but some are just Okay but those stories contain some morals or messages for readers.

Each and every story comprises of lots of feelings and emotions which either makes you Happy or makes you Cry. Author plot each story in a very unique manner to catch their readers until the end of the book. The characterization of the personalities in this book has plotted very clearly by the Author. The twists and turns in every story make it more engaging and intriguing.

Each and every story seems realistic. This is the perfect book for beginners in the field of reading. I am really impressed with Authors work of writing this great book and never get enough of it. I must say i want more from the writer of this book to write more stories like this and entertain the readers with your writing concept.

Here’s a summary of some really good stories from this book.

First Love – This is the story about Sukriti and Bhushan and their little daughter Surili. They both love each other very much. Everything was going perfectly in their life until surili starts acting weirdly.
Their life changed after that incident.

The Book Store – This is the Story about a Book store owner name Mr. Gidlani and their costumers named Waheeda and Martin who loves each other. 10 years later they come to the same book store to thank Mr. Gidlani for supporting them. Their Love story started in his Book store in front of Mr. Gidlani.

The Second Chance – This is the story about College fellows named Toshi and Tushar. Toshi started feeling for Tushar after seeing a love note for her in his notebook but she never discusses this with anyone not even with Tushar due to her reserved nature. Years after her graduation she Met with Tushar again. What happened next is still hidden in this book.

There were more interesting stories in this book to read.

To read more, You have to grab this book and enjoy it till the end page of the book.

Amazon Link – >>>> Lines of Fate

Youtube Link >>>>   Neelam Saxena Chandra

 

© Ms. Neelam Saxena Chandra

Additional Divisional Railway Manager, Indian Railways, Pune Division, Pune

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ तन्मय साहित्य # 52 – तुमको भी कुछ सूत्र सिखा दें….☆ डॉ. सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

डॉ  सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

(अग्रज  एवं वरिष्ठ साहित्यकार  डॉ. सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी  जीवन से जुड़ी घटनाओं और स्मृतियों को इतनी सहजता से  लिख देते हैं कि ऐसा लगता ही नहीं है कि हम उनका साहित्य पढ़ रहे हैं। अपितु यह लगता है कि सब कुछ चलचित्र की भांति देख सुन रहे हैं।  आप प्रत्येक बुधवार को डॉ सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’जी की रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज के साप्ताहिक स्तम्भ  “तन्मय साहित्य ”  में  प्रस्तुत है इस सदी की त्रासदी को बयां करती  भावप्रवण रचना तुमको भी कुछ सूत्र सिखा दें….। )

☆  साप्ताहिक स्तम्भ – तन्मय साहित्य  # 52 ☆

☆ तुमको भी कुछ सूत्र सिखा दें…. ☆  

 

अपना यशोगान करना

पहचान हमारी

आओ तुमको भी अचूक

कुछ सूत्र सिखा दें।

 

थोड़े से गंभीर

मुस्कुराहट महीन सी

संबोधन में भ्रातृभाव

ज्यों नीति चीन की,

हो शतरंजी चाल

स्वयं राजा, खुद प्यादे

आओ तुमको भी अचूक

कुछ सूत्र सिखा दें।।

 

हो निशंक, अद्वैत भाव

मैं – मैं, उच्चारें

दिनकर बनें स्वयं

सब, शेष पराश्रित तारे,

फूकें मंत्र, गुरुत्व

भेद, शिष्यत्व लिखा दें

आओ तुमको भी अचूक

कुछ सूत्र सिखा दें।।

 

बुद्ध, प्रबुद्ध, शुद्धता के

हम हैं पैमाने

नतमस्तक सम्मान

कई, बैठे पैतानें,

सिरहाना,सदियों का सब

भवितव्य बता दे

आओ तुमको भी अचूक

कुछ सूत्र सिखा दें।।

 

हों विचार वैविध्य,साधते

सभी विधाएं

अध्ययन, चिंतन, मनन

व्यर्थ की, ये चिंताएं,

जो मन आये लिखें और

मंचों पर बाँचें

आओ तुमको भी अचूक

कुछ सूत्र सिखा दें।।

सुरेश तन्मय

 

© डॉ सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

12/06/2020

जबलपुर/भोपाल, मध्यप्रदेश

मो. 9893266014

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि ☆ चुप्पियाँ -12 ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) 

☆ संजय दृष्टि  ☆ चुप्पियाँ – 12 ☆

मेरे शब्द

चुराने आए थे वे,

चुप्पी की मेरी

अकूत संपदा देखकर

मुँह खुला का खुला

रह गया…..,

समर्पण में

बदल गया आक्रमण,

मेरी चुप्पी में

कुछ और पात्रों का

समावेश हो गया!

# दो गज़ की दूरी, है बहुत ज़रूरी।

©  संजय भारद्वाज, पुणे

(प्रातः 8:07 बजे, 2.9.18)
(कविता-संग्रह *चुप्पियाँ* से)

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

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मराठी साहित्य – कविता ☆ साप्ताहिक स्तम्भ # 1 – स्वप्नपाकळ्या ☆ ☆ श्री प्रभाकर महादेवराव धोपटे

श्री प्रभाकर महादेवराव धोपटे

ई-अभिव्यक्ति में श्री प्रभाकर महादेवराव धोपटे जी  के साप्ताहिक स्तम्भ – स्वप्नपाकळ्या को प्रस्तुत करते हुए हमें अपार हर्ष है। आप मराठी साहित्य की विभिन्न विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। वेस्टर्न  कोलफ़ील्ड्स लिमिटेड, चंद्रपुर क्षेत्र से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं। अब तक आपकी तीन पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं जिनमें दो काव्य संग्रह एवं एक आलेख संग्रह (अनुभव कथन) प्रकाशित हो चुके हैं। एक विनोदपूर्ण एकांकी प्रकाशनाधीन हैं । कई पुरस्कारों /सम्मानों से पुरस्कृत / सम्मानित हो चुके हैं। आपके समय-समय पर आकाशवाणी से काव्य पाठ तथा वार्ताएं प्रसारित होती रहती हैं। प्रदेश में विभिन्न कवि सम्मेलनों में आपको निमंत्रित कवि के रूप में सम्मान प्राप्त है।  इसके अतिरिक्त आप विदर्भ क्षेत्र की प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्थाओं के विभिन्न पदों पर अपनी सेवाएं प्रदान कर रहे हैं। अभी हाल ही में आपका एक काव्य संग्रह – स्वप्नपाकळ्या, संवेदना प्रकाशन, पुणे से प्रकाशित हुआ है, जिसे अपेक्षा से अधिक प्रतिसाद मिल रहा है। इस साप्ताहिक स्तम्भ का शीर्षक इस काव्य संग्रह  “स्वप्नपाकळ्या” से प्रेरित है । आज प्रस्तुत है होली के अवसर पर उनकी कविता “होळीचा रंग “.) 

(दिनांक २३-०२-२०२०ला राज्यस्तरीय साहित्य व संस्कृती महोत्सव २०२०चे कवि कट्टा मंचाचे अध्यक्ष पद स्विकारतांना , कविंना प्रमाणपत्र व सन्मानचिन्ह प्रदान करतांना श्री प्रभाकर महादेवराव धोपटे)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – स्वप्नपाकळ्या # 1 ☆

☆ कविता – होळीचा रंग  ☆ 

रंग खेळू, रंग उधळू, उधळू गुलाल

रंगात रंगू या, निळ्या पिवळ्या लाल ।।

 

काही रंग ओले, काही सुकलेले रंग

जीवनाच्या अंतरंगी, वेगळे  तरंग

माणुसकीचे काही, काही चवचाल।।

रंगात रंगू या…….

 

होळीच्या निमित्ताने, खरे खरे बोलू

रंगलेल्या चेह-याची, आज पोल खोलू

मानू नका वाईट, ही होळीची धमाल।।

रंगात रंगू या…….

 

मित्रांनो धुता येईल, तन रंगलेले

कसे धुता येईल हो, मन मळलेले

होळीच्या गुलालात, आहे ही कमाल ।।

रंगात रंगू या…..

 

©  प्रभाकर महादेवराव धोपटे

मंगलप्रभू,समाधी वार्ड, चंद्रपूर,  पिन कोड 442402 ( महाराष्ट्र ) मो +919822721981

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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कवितेच्या प्रदेशात # 39 – त्या हळूवार, अलवार  क्षणांची  साक्षीदार ……… ☆ सुश्री प्रभा सोनवणे

सुश्री प्रभा सोनवणे

(आज प्रस्तुत है सुश्री प्रभा सोनवणे जी के साप्ताहिक स्तम्भ  “कवितेच्या प्रदेशात” में  उनके चौदह वर्ष की आयु से प्रारम्भ साहित्यिक यात्रा के दौरान उनके साहित्य  के   ‘वाङमय चौर्य’  के  कटु अनुभव पर आधारित एक विचारणीय आलेख “त्या हळूवार, अलवार  क्षणांची  साक्षीदार ……….  सुश्री प्रभा जी  का यह आलेख इसलिए भी विचारणीय है, क्योंकि  हमारी समवयस्क पीढ़ी को साहित्यिक चोरी का पता काफी देर से चलता था जबकि सोशल मीडिया के इस जमाने में चोरी बड़ी आसानी से और जल्दी ही पकड़ ली जाती है। किन्तु, शब्दों और विचारों के हेर फेर के बाद  ‘वाङमय चौर्य’  के  अनुभव को आप क्या कहेंगे। प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन को अपने तरीके से जीता है।  जैसे वह जीता है , वैसा ही उसका अनुभव होता है।  इस अतिसुन्दर  एवं विचारणीय आलेख के लिए  वे बधाई की पात्र हैं। उनकी लेखनी को सादर नमन ।  

मुझे पूर्ण विश्वास है  कि आप निश्चित ही प्रत्येक बुधवार सुश्री प्रभा जी की रचना की प्रतीक्षा करते होंगे. आप  प्रत्येक बुधवार को सुश्री प्रभा जी  के उत्कृष्ट साहित्य का साप्ताहिक स्तम्भ  – “कवितेच्या प्रदेशात” पढ़ सकते  हैं।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – कवितेच्या प्रदेशात # 39 ☆

☆  त्या हळूवार, अलवार  क्षणांची  साक्षीदार ……… ☆ 

वयाच्या तेरा चौदाव्या वर्षी कविता माझ्या आयुष्यात आली. शाळेत असताना हस्तलिखिताच्या निमित्ताने!

विसाव्या वर्षा नंतर कविता थांबेल असं मला वाटलं होतं, पण काही  वर्षे थांबल्या नंतर….कवितेच्या पुन्हा प्रेमात पडले, कवितेला व्यासपीठ मिळालं, अनेक ग्रुप मिळाले,  एका ग्रुप मधल्या बारा तेरा वर्षांनी मोठ्या असलेल्या कवयित्री बरोबर मैत्री झाली. आमची घरे जवळ असल्यामुळे  एकमेकींच्या घरी जाणं, कविसंमेलनात एकत्र सहभागी होणं, रिक्षा शेअर करणं यामुळे मैत्री वाढली, पण काही वर्षापासून असा शोध लागला की त्या कवयित्री कडे स्वतःची चांगली कविता नाही, ती सादर करत असलेल्या, दाद घेणा-या सर्व कविता मान्यवर कवींच्या चोरलेल्या कविता आहेत, हल्ली फेसबुक, व्हाटस् अॅप मुळे तिच्या चो-या उघडकीस आल्या, तिने त्या त्या कवींची माफीही मागितली पण निर्ढावलेपण अंगी मुरलेलं, वयाची पंचाहत्तरी उलटून गेली तरी व्यासपीठावर कविता सादर करण्याची इच्छा, दुस-यांच्या कविता वाचून दाद, मोठेपणा मिळवायची सवय लागलेली, कवयित्री म्हणून प्रतिमा पूर्ण डागाळलेली……पण मैत्रीच्या नात्याचं काय?

काही आयोजकांच्या मते आता तिच्या या वयात तिला वाळीत टाकणं म्हणजे तिला धक्का बसून ती कोलमडून जाईल, म्हणून वाङमय चौर्य हा गुन्हा माफ करायचा का ? थोड्या थोडक्या नव्हे वीस पंचवीस चोरलेल्या कवितांच्या आधारे सगळी कारकीर्द गाजवली! बाई उच्चशिक्षित, मराठीत एम.ए. असलेली, पण कवितेची चोर नव्हे तर अट्टल दरोडेखोर! तिला वृत्ताची जाण नाही पण अनेक वृत्तबद्ध कविता अनेक वर्षे सादर केल्या इतकंच नव्हे त्या दुस-यांच्या कविता स्वतःच्या संग्रहातही छापल्या. एका कवीने “पोलिसकेस करीन” म्हटल्यावर तिने  त्याला जाहीर माफी पत्र लिहून दिले ते फेसबुक वर प्रसिद्ध झाले!

केवढी ही शोकांतिका! असे मोह का होत असतील? तिच्या बरोबर केलेल्या अनेक मैफिली आठवल्या, तिचं खोटेपण, चोरटेपण आज लक्षात आलं!

कवयित्री म्हणून ती निश्चितच बाद झाली पण मैत्री चं काय?? त्या हळूवार, अलवार  क्षणांची  साक्षीदार असलेली पण सतत काव्यक्षेत्रात दुस्वास करणारी, कुरघोडी करू पहाणारी ती……एक प्रश्नचिन्ह बनूनच राहिली आहे!

तिने मुक्तपणे माळली, दुस-याच्या बागेतली

सुंदर सुंदर फुले स्वतःच्या केसात…

आणि मिरवली

गंध स्वतःच्याच मालकीचा असल्याच्या तो-यात,

ती फुलं ही दुस-याची आणि गंधही परकाच असल्याचं समजलं सगळ्यांना

आणि बागेतल्या सा-याच फुलांनी केला  उठाव…..

तिची लूट थोपवण्यासाठी…

कवितेचे कित्येक ताटवे…   परतताहेत आता…

आपापल्या मालकांकडे  !

 

© प्रभा सोनवणे

“सोनवणे हाऊस”, ३४८ सोमवार पेठ, पंधरा ऑगस्ट चौक, विश्वेश्वर बँकेसमोर, पुणे 411011

मोबाईल-९२७०७२९५०३,  email- sonawane.prabha@gmail.com

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हिन्दी साहित्य ☆ पुस्तक विमर्श (English Review) # – स्त्रियां घर लौटती हैं – “There exists books like this that make you halt and observe” – Shri Archit Ojha ☆ श्री विवेक चतुर्वेदी

पुस्तक विमर्श – स्त्रियां घर लौटती हैं 

श्री विवेक चतुर्वेदी 

( हाल ही में संस्कारधानी जबलपुर के युवा कवि श्री विवेक चतुर्वेदी जी का कालजयी काव्य संग्रह  स्त्रियां घर लौटती हैं ” का लोकार्पण विश्व पुस्तक मेला, नई दिल्ली में संपन्न हुआ।  यह काव्य संग्रह लोकार्पित होते ही चर्चित हो गया और वरिष्ठ साहित्यकारों के आशीर्वचन से लेकर पाठकों के स्नेह का सिलसिला प्रारम्भ हो गया। काव्य जगत श्री विवेक जी में अनंत संभावनाओं को पल्लवित होते देख रहा है। ई-अभिव्यक्ति  की ओर से यह श्री विवेक जी को प्राप्त स्नेह /प्रतिसाद को श्रृंखलाबद्ध कर अपने पाठकों से साझा करने का प्रयास है।  इस श्रृंखला की चौथी कड़ी के रूप में प्रस्तुत हैं श्री अर्चित ओझा जी  के अंग्रेजी भाषा में विचार “There exists books like this that make you halt and observe” ।)

अमेज़न लिंक >>>   स्त्रियां घर लौटती हैं

 

☆ पुस्तक विमर्श #9 – स्त्रियां घर लौटती हैं – “There exists books like this that make you halt and observe” – Shri Archit Ojha  ☆

When I was in school, I remember waiting for Wednesdays because I would get to read poetry in Hindi newspapers. I would sit patiently, devouring the content and take delight in the unique arrangement of words. It used to wonder me how the simple play of some letters can bring euphoria on someone’s face. How captivating! Such power they had on people seeking peace and pleasure in literature.

Years passed by and I forgot what it was like to be that person again. The rush we feel today to keep on moving forward, without pausing to be attentive towards every day things, without smiling at them and when it’s time to get old, lamenting “If only, I had stopped a bit.”

Thankfully there exists books like this that make you halt and observe.

Reading Vivek Chaturvedi’s book felt like being transported to the fields of sunflowers, oleander, mangoes, berries, guavas, basal leaves and marigolds, being surrounded by the fragrances these little things create, unknowingly, unapologetically being themselves; soaking in the aroma of Earth after the first rain, running back to home from school, celebrating festivals, resting in the sun during Summer, flying kites, racing with friends, waiting for the rainy days and when the rainy season came, then craving for the winters and those warm blankets, seeing a father’s tears when his daughter is leaving her home to make another one her own, conversing with mothers who never seem to get tired of nurturing their kids, waking up early to see the sunrise, gardening, chit-chatting with the neighbors, visiting fairs, persisting to buy toys that will be played only for a few days, laughing with friends without any reason, believing in funny superstitions, sitting under a tree, mourning when it was taken down in the name of development, sending letters without stamping them, appreciating the calmness of the moon on a peaceful night, caring for pets and weeping in the corner, lest somebody sees; when they leave us saying goodbyes.

Reading this book felt like living the childhood, the life once again and that there is no place for regrets.

There were a number of instances which took me by surprise with their lucidity and easy-going manner. All the 56 poems have their own distinctive charisma. It was difficult for me to select my favorites but following lines in these poems would stay with me. I’m providing English translation for the titles, so the readers can adore the magnificence of the author’s creativity. Here are a few lines, I hope they don’t get lost in translation:

  1. Women Return their Homes: A home too, is a child for a woman, that grows a little more, every day.
  2. The domestic/household women have been treated like pencils: Thrown with anger and boredom, dropped down from the desk and mentality, a bit of nib got saved, but the lead inside is broken, still they were picked up and employed for selfish purposes again and again.
  3. Where are you: The kids who were locked inside their homes are now playing in the mud, rolling and laughing, a tuft of grass has started growing through a crack in the concrete, where are you?
  4. Typist: I said “Courage”, and she wrote it once, I said “courage” again, and the whole page got filled with that one word!
  5. Dad: All your life, many icy storms went through you, and you did not let any of them touch us. Dad, you were Himalayan.

I believe that of all the literature in the world, Hindi poetry is a genre that you cannot get enough of. They take time to build upon you. They sing a song that means multiple things to different people, according to the life they have seen. Some years back, I read a poem by a Russian Poetess about how much she loved Hindi and reading this book, kept reminding me of why I also love Hindi so much.

I admired how nature was the core and strength of this book. Finding similarities between the nature and human activities, it warms the heart and develops imagination. More than that, I’m grateful for it brought the observer in me back again. It made me notice things around me, every day, mundane, normal things that nobody pays attention to.

Though the title says Women Return their Homes, the book carries insightful and smart observations, poems about environment, seasons, motherhood, parenting, friendship, love, home, children, elders, mythology, women empowerment and the society. You read a few lines and realize the richness of experiences these poems posses. I will turn back to this book again and again for its brevity, clarity and the wisdom it contains.

I wish that English translation of these poems would also be published some day, so that English speakers can take delight in the beauty that the author has fabricated.

If, like me, you haven’t been around Hindi poetry for a while, this book will remind you to go back to your roots, appreciate and feel the charm again in observing the effortless joy our surroundings carry.

If you have been around Hindi poetry for a while, this book will solidify the faith that Hindi Literature’s future is in gifted hands.

 

 – Archit Ojha

© विवेक चतुर्वेदी, जबलपुर ( म प्र ) 

ई-अभिव्यक्ति  की ओर से  युवा कवि श्री विवेक चतुर्वेदी जी को इस प्रतिसाद के लिए हार्दिक शुभकामनायें  एवं बधाई।

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मराठी साहित्य – ☆ साप्ताहिक स्तंभ –केल्याने होत आहे रे # 23 ☆ इंगळ्यांची मंजुळा ☆ – श्रीमति उर्मिला उद्धवराव इंगळे

श्रीमति उर्मिला उद्धवराव इंगळे

(वरिष्ठ  मराठी साहित्यकार श्रीमति उर्मिला उद्धवराव इंगळे जी का धार्मिक एवं आध्यात्मिक पृष्ठभूमि से संबंध रखने के कारण आपके साहित्य में धार्मिक एवं आध्यात्मिक संस्कारों की झलक देखने को मिलती है. इसके अतिरिक्त  ग्राम्य परिवेश में रहते हुए पर्यावरण  उनका एक महत्वपूर्ण अभिरुचि का विषय है।  श्रीमती उर्मिला जी के    “साप्ताहिक स्तम्भ – केल्याने होत आहे रे ” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है  अपनी सासु माँ को समर्पित उनकी  एक अतिसुन्दर कविता  “इंगळ्यांची मंजुळा”।  कविता का प्रकार – मुक्तछंद है। श्रीमती उर्मिला जी की कवितायेँ हमारे सामजिक परिवेश को रेखांकित करती हैं। उनकी मनोभावनाएं आने वाली पीढ़ियों के लिए अनुकरणीय है।  ऐसे सामाजिक / पारिवारिक साहित्य की रचना करने वाली श्रीमती उर्मिला जी की लेखनी को सादर नमन। )

☆ साप्ताहिक स्तंभ –केल्याने होतं आहे रे # 23 ☆

ज्या घरात आजी-आजोबा,म्हणजे सासू सासरे,दीर जावा ,नणंदा , बाळगोपळ  आहेत असं घर गोकुळच असतं.सासरे घराचा कणा असतात तर सासूबाई  आपल्या घरातल्या चालीरीती,रुढी परंपरा चढून जाण्यासाठीचा जिना असतात.

आपण जेव्हा लग्न होऊन सासरी येतो तेव्हा पतीनंतर सगळ्यात पहिली चांगली ओळख होते ती सासूबाईची. त्यांचे मुळे आपल्या खऱ्या सासरच्या  आयुष्याची सुरुवात होते. घरातल्यांची आपले कुलाचार कुल परंपरांची ओळख होते , ती केवळ आणि केवळ सासुबाईंमुळेच.अशाच माझ्या सासूबाईं त्यांचं नाव ” मंजुळा ” त्यांची ओळख मी माझ्या कवितेतून करुन देते आहे.:-

 काव्यप्रकार:-मुक्तछंद

 शीर्षक:- “‘इंगळ्यांची मंजुळा “

 

मंजुळाबाई मंजुळा, सासुबाई

माझ्या मंजुळा !

मंजुळा त्यांचं नाव अन् वडगाव

आमचं गाव !

बरं कां म्हणून त्या ” ‘वडगावच्या

इंगळ्यांची मंजुळा ” !!१!!

 

गोरा गोमटा रंग त्यांचा ,

ठेंगणा ठुसका बांधा !

त्या होत्या आमच्या घराण्याचा

सांधा !!२!!

 

गोड गोड खायची सवय त्यांना

भारी !

लग्नकार्यात उठून दिसे

त्यांची भारदस्त स्वारी  !!३!

 

शिक्षणात होत्या अडाणी,

पण होत्या अगदी तोंडपाठ

त्यांच्या आरत्या अन् गाणी  !!४!!

 

जरब होती बोलण्यात,

रुबाब होता वागण्यात!

पण खूप खूप माया होती त्यांच्या

अंतरंगात  !!५!!

 

 

अहेवपणी मोठ्ठ कुंकू कपाळावर

शोभे छान !

गावातल्या साऱ्याजणी द्यायच्या

त्यांना मान !

पाणीदार मोत्यांची नथ शोभे

त्यांच्या नाकात !

नवऱ्यासह सारेजण असायचे

त्यांच्या धाकात  !!६!!

 

म्हणायच्या त्या नेहमी !…..

डझनभर माझ्या नातींचा

अभिमान लयी भारी !

सुंदर माझ्या चिमण्या घेतील

पटापट भरारी !

अशा माझ्या सासुबाई वाटायच्या

खूप करारी !

पण होती आम्हांवर त्यांची मायेची

पाखर सारी !!

त्यांची मायेची पाखर सारी !!

त्यांची मायेची पाखर सारी !!७!!

 

©️®️उर्मिला इंगळे

 

दिनांक:-१८-२-२०२०

 

!!श्रीकृष्णार्पणमस्तु !!

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