हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९४१ ⇒ गुणगान ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “गुणगान।)

?अभी अभी # ९४१ ⇒ आलेख – गुणगान ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

भक्ति और देशभक्ति का अर्थ ही मेरे देश की धरती और मेरे आराध्य इष्ट, मातृ शक्ति, सदगुरु एवं परम पिता परमेश्वर का गुणगान है। तेरा तुझको अर्पण, क्या लागे मेरा।

सबसे निराली महिमा है भाई, दो अक्षर के राम की, जय बोलो सियावर राम की। राम का गुणगान करिये। राम प्रभु की भद्रता का, सभ्यता का ध्यान धरिये। नमन करना, वंदना करना, नाम लेना, मंत्र का जाप करना, अथवा प्रार्थना करना, सभी उसी ईश्वरीय शक्ति का गुणगान ही तो है।।

जो गुणवान है, सर्व शक्तिमान है, ज्ञान दाता और मोक्ष दाता है, उससे हमारा एक जन्म का नहीं, कई जन्मों का नाता है। उसका रूप भी हो सकता है, कोई आकार भी हो सकता है, और वह निर्गुण निराकार भी हो सकता है। रिश्ते में वह आपकी मां भी हो सकती है, और आपका बाप भी हो सकता है।

गुण के गाहक सहस नर !

हमारे दैनिक उपयोग के उत्पादों का विज्ञापन क्या उनका गुणगान नहीं है। हमारे नेताओं की, अमर शहीदों की, और धार्मिक उत्सवों और जुलूसों में जो जय जयकार होती है, क्या वह गुणगान नहीं है। स्तुति का अर्थ भी गुणगान ही होता है। हमारे वेदों की ऋचाओं और संस्कृत के सुभाषितों में जहां जहां नमः का प्रयोग हुआ है, वह भी गुणगान ही है।।

निंदा स्तुति मनुष्य का स्वभाव है। अपने हित और आत्म कल्याण की भावना अगर उसे किसी के गुणगान की ओर प्रवृत्त करती है तो लालच, खुदगर्जी और स्वार्थ उसे किसी की निंदा के लिए मजबूर करता है। कहीं किसी की सात्विक प्रवृत्ति है तो किसी की तामसिक। हमारे अंदर ही देवासुर संग्राम चल रहा है और हमें उसका पता ही नहीं है।

किसी की तारीफ करना, प्रशंसा करना अथवा बढ़ाई करना हमें बचपन से ही घुट्टी की तरह पिलाया जाता है। बड़ों का आदर, सदा सच बोलना, चोरी नहीं करना, किसी की निंदा नहीं करना और सदा ईश्वर का ध्यान करना। यानी सदाचार का तावीज आपको पहना दिया जाता है।।

जहां प्रेम है, वहां प्रशंसा है। गोरी तेरा गांव बड़ा प्यारा, मैं तो गया मारा, आके यहां रे ! आप इसे फिल्मी गीत कहें अथवा कविता, आखिर यह भी तो गुणगान ही है। गीत, संगीत, भजन, कव्वाली, आरती, सत्संग और प्रवचन, कहां नहीं गुणगान।

फूलों का खिलना, पक्षियों का कलरव, बच्चों का खिलखिलाना, नदी का कलकल बहना और झरनों का गिरना क्या हमें यह सोचने और गुणगान करने पर मजबूर नहीं करता, ये कौन चित्रकार है। सिर पर लाखों तारों वाला नीला आसमान छतरी की तरह तना हुआ है, पृथ्वी घूम रही है, फिर भी हम कभी स्थिर और स्थितप्रज्ञ हैं, तो कभी चंचल और चलायमान। तो क्यों न करें, सिर्फ उस सर्वशक्तिमान का गुणगान।।

आप स्वतंत्र हैं गुणगान के लिए, जिसका चाहे करें।

अपने माता पिता, बंधु सखा अथवा गुरुजन का। इस वसुंधरा का करें, मातृभूमि का करें, अपने सदगुरु का करें, अथवा अपने प्रिय नेता का। आपका विवेक सदा आपका साथ दे। बस निंदा किसी की ना करें।

बड़ा आसान है किसी का गुणगान करना, लेकिन उससे भी मुश्किल है किसी की निंदा नहीं करना। जहां निंदा का अभाव है, वहां गुणगान ही गुणगान है। आप स्वयं गुणों की खान हैं।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # २८९ ☆ गीत – तुझको चलना होगा… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘चक्र

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मानबाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान  के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंतउत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत। 

आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।

आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # २८९ ☆ 

☆ गीत – तुझको चलना होगा ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ 

धीरे – धीरे बढ़ो मुसाफिर

जीवन है अनमोल।

दुख चाहे जितने भी आएं

मुख में मिश्री घोल।।

 

चलना ही जीवन की नियति

तुझको चलना होगा।

जागो ! उठो दूर है मंजिल

देख स्थिति ढलना होगा।

 

सत, असत की बल्लरियों में

देख कहाँ है झोल।।

 

लक्ष्य बनाकर बढ़ना पथ पर

औ’ स्वयं विश्वास करो।

मृत्यु तो जीवन का गहना

मत रोना कुछ हास करो।

 

पंछीगण को देख निकट से

भोर में भरें किलोल।।

 

जो सोया है, उसने खोया

आँख खोल मत डर प्यारे।

अपनी मदद स्वयं जो करते

उस पर ही ईश्वर वारे।

 

परिभाषा जीवन की अद्भुत

सदैव तराजू तोल।।

 

संशय, भ्रम में नहीं भटकना

यह जीवन नरक बनाते।

द्वेष – ईर्ष्या वैर भाव भी

सदा अँधेरा यह लाते।

 

सच्चाई की जीत लिखी है

आगे होगा गोल।।

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २४३ – लघुकथा- प्रेरणा – ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा “प्रेरणा।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २४३

☆ लघुकथा – प्रेरणा ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ 

खुद कमा कर पढ़ाई करने वाले एक छात्र की सिफारिश करते हुए कमलेश ने कहा, “यार योगेश! तू उस छात्र की मदद कर दें. वह पढ़ने में बहुत होशियार है. डॉक्टर बन कर लोगों की सेवा करना चाहता है.”

“ठीक है मैं उस की मदद कर दूंगा.  उस से कहना कि मेरी नई नियुक्त संस्था से शिक्षाऋण का फार्म भर कर ऋण प्राप्त कर लें.” योगेश ने कहा तो कमलेश बोला, “मगर, मैं चाहता हूं कि तू उस की निस्वार्थ सेवा करें. उसे सीधे अपने नाम से पैसा दान दें.”

“नहीं यार! मैं ऐसा नहीं करना चाहता हूं ?”  यौगेश ने कहा तो कमलेश बोला, “इस से तेरा नाम होगा ! लोग तूझे जिंदगी भर याद रखेंगे.”

“हाँ यार. तू बात तो ठीक कहता है. मगर,  मैं नहीं चाहता हूं कि उस छात्र की मेहनत कर के पढ़ने की जो प्रेरणा है वह खत्म हो जाए.”

“मैं उसे जानता हूं, वह बहुत मेहनती है. वह ऐसा नहीं करेगा”, कमलेश ने कुछ ओर कहना चाहा मगर, यौगेश ने हाथ ऊंचा कर के उसे रोक दिया.

“भाई कमलेश ! यह उस के हित में है कि वह मेहनत कर के पढाई करें”, कह कर यौगेश ने अपनी आंख में आए आंसू को पौंछ लिए, “तुम्हें तो पता है कि दूध का जला छाछ भी फूंक—फूंक कर पीता है.”

यह सच्चाई सुन कर कमलेश चुप हो गया.

© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

16-07-2024

संपर्क – 14/198, नई आबादी, गार्डन के सामने, सामुदायिक भवन के पीछे, रतनगढ़, जिला- नीमच (मध्य प्रदेश) पिनकोड-458226

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com मोबाइल – 9424079675 /8827985775

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

सूचनाएँ/Information ☆ ☆ व्याख्यान : हिंदी लोकल से ग्लोबल — हिंदीतर प्रांत मातृभाषा दिवस, युवा रचनापाठ ☆ साभार – डॉ. प्रेरणा उबाळे ☆ साभार – डॉ. प्रेरणा उबाळे ☆

☆ सूचनाएँ/Information ☆

(साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समाचार)

☆ व्याख्यान : हिंदी लोकल से ग्लोबल — हिंदीतर प्रांत मातृभाषा दिवस, युवा रचनापाठ ☆ साभार – डॉ. प्रेरणा उबाळे ☆

शुक्रवार, दिनांक 6 मार्च 2026 को हिंदी विभाग मॉडर्न महाविद्यालय, शिवाजीनगर, महाराष्ट्र राष्ट्रभाषा प्रचार समिति और वैश्विक हिंदी परिवार, पुणे के संयुक्त तत्वावधान में हिंदीतर प्रांत मातृभाषा दिवस, युवा रचनापाठ और व्याख्यान का आयोजन मॉडर्न महाविद्यालय में किया गया थाl

कार्यक्रम के प्रमुख अतिथि डॉ. जवाहर कर्णावट डॉक्टर दामोदर खडसे डॉ. सुनील देवधर, डॉ. नीलम जैन, डॉ. प्रेरणा उबाळे, स्वरांगी साने के हाथों सरस्वती पूजन संपन्न हुआ और युवा पाठ कार्यक्रम का उद्घाटन हिंदी विभाग की परंपरा के अनुसार पौधे को पानी देते हुए उसे सींचकर काव्यपाठ करने वाले हमारे हिंदी के प्रिय छात्रों के शुभ करकमलों से कार्यक्रम का उद्घाटन किया गयाl

हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. प्रेरणा उबाळे ने कार्यक्रम के आरंभ में हिंदी विभाग में विभागाध्यक्षा के रूप में पिछले 10 वर्षों से अविरत चलने वाली विभिन्न गतिविधियों से परिचय कराया – जैसे, आज का शब्द, आज का मुहावरा, अरुणिमा साहित्यिक पत्रिका, राष्ट्रीय हिंदी निबंध लेखन प्रतियोगिता, विज्ञापन लेखन प्रतियोगिता, काव्यपाठ, हिंदी फिल्म क्लब, फिल्म स्क्रीनिंग, विभिन्न विषयों पर आयोजित राज्यस्तरीय कार्यशालाएं, बिदाई समारोह, पुराने छात्रों का स्नेहमिलन, विभिन्न व्याख्यानमालाएँ आदि की जानकारी अतिथि मान्यवर और उपस्थितों को दीl सभी का स्वागत उन्होंने शॉल और मॉडर्न महाविद्यालय की पत्रिका देते हुए कियाl

युवा रचना पाठ में उस्मान मोहम्मद (कश्मीर), शाहिद बशीर (कश्मीर), सदुर्शना अरूणागिरी (श्रीलंका), मुकेश रावत(कुमाऊं, हिमालय), साक्षी कांबले, योगेश काले, विद्या केलकर-सराफ (महाराष्ट्र), ने अपनी मातृभाषाओं में अनुक्रमत: कश्मीरी, तमिल, कुमाऊनी, हिंदी, मराठी, भाषा में सारगर्भित कविताएं पढ़ीl इन छात्रों की कविताओं ने सबका मन मोह लियाl इस समय हिंदी विभाग, मॉडर्न महाविद्यालय नेl युवा रचना पाठ होने के बावजूद भी हिंदी विभाग के आरंभिक समय की एक छात्रा को निमंत्रित किया थाl हिंदी विभाग के प्रथम अध्यक्ष डॉ. श्रीरंग संगोराम की छात्रा रह चुकी हैंl विद्या केलकर- सराफ (1979) ने मॉडर्न महाविद्यालय और हिंदी विभाग की स्मृतियों को तजा करते हुए अपनी कविता पढ़ीl साथ ही अनेक वर्षों बाद विभाग में आने की ख़ुशी जताईl भूतकाल और वर्तमान समय के हिंदी विभाग के छात्रों के काव्यपाठ का सुंदर मिलाप यहाँ दिखाई दियाl

डॉ. प्रेरणा उबाळे ने अतिथि मान्यवारों का परिचय करायाl इसके बाद महाराष्ट्र राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के कार्याध्यक्ष और आकाशवाणी पुणे के पूर्व सहायक निदेशक, हिंदी लेखक डॉ. सुनील देवधर ने व्याख्यान के आयोजन और हिंदी के वैश्वीकरण के संदर्भ में भूमिका सामने रखीl इस्रायल का उदाहरण देते हुए उन्होंने यह बताया कि हिब्रू भाषा कैसे अनिवार्य करने के बाद जीवंत हो उठीl

प्रस्तुत कार्यक्रम के प्रमुख अतिथि डॉ. जवाहर कर्णावट, भोपाल ने “हिंदी लोकल से ग्लोबल” विषय पर अपना व्याख्यान दियाl उन्होंने अपने व्याख्यान में कहा कि जब हमें हवा, भोजन और पानी शुद्ध चाहिए तो हिंदी शुद्ध क्यों नहीं ? उन्होंने यह प्रश्न उपस्थित किया कि हम हिंदी को देवनागरी के बजाए रोमन में क्यों लिखते हैं ? हिंदी के साथ-साथ भारतीय भाषाओं के विश्व में विस्तार की जानकारी उन्होंने प्रदान की? डॉ. जवाहर कर्णावट ने विश्व के लगभग 60 देशों में यात्रा करते हुए वहां हिंदी की स्थिति का जायजा लेकर ‘विश्व में हिंदी’ शीर्षक पुस्तक की रचना की वह पुस्तक उन्होंने हिंदी विभागाध्यक्षा डॉ. प्रेरणा को प्रदान कीl डॉ. जवाहर कर्णावट हिंदी भाषा, साहित्य के संदर्भ में संपूर्ण विश्व में अनुसंधान कार्य कर रहे हैंl उनके हिंदी से संबंधित समर्पण भाव से किए गए कार्य के कारण फिजी की संसद में उन्हें हिंदी सेवी सम्मान से सम्मानित किया जा चुका हैl

कार्यक्रम के अध्यक्ष डॉ. दामोदर खडसे, जिन्होंने भारतीय सभी मंत्रालयों, समितियों, संस्थाओं से जुड़कर हिंदी से संबंधित कार्य किया है तथा नई शिक्षा प्रणाली में भारतीय भाषाओं के संदर्भ में जिनका ठोस योगदान रहा हैl उन्होंने अपने व्याख्यान में प्रवासी हिंदी साहित्यकार तथा विदेशों में व्याप्त हिंदी की स्थिति और गति के संदर्भ में अपने अनुभव कथन किएl

इस कार्यक्रम को डॉ. नीलम जैन प्रवासी हिंदी साहित्यकार का सानिध्य प्राप्त हुआl उन्होंने अपने भाषण में भारतीय संस्कृति, अध्यात्म, प्रवासी हिंदी साहित्य और वैश्विक हिंदी के संदर्भ में सबसे संवाद कियाl साथ ही प्रस्तुत कार्यक्रम के आयोजन हेतु डॉ. प्रेरणा को बधाई दीl

कार्यक्रम का आभारज्ञापन कवयित्री, पत्रकार डॉ. स्वरांगी साने ने कियाl वैश्विक हिंदी परिवार की प्रांत संयोजक के रूप में संयुक्त तत्वाधान में हिंदी विभाग से जुड़कर इस कार्यक्रम के आयोजन में वह सक्रियता से जुटी रहीl

इस अवसर पर हिंदी विभाग, मॉडर्न महाविद्यालय के प्रा. सूरज बिरादर, रेशमा कांबले, शुभम राऊत उपस्थित थे तथा विभाग के स्नातक और स्नातक स्तर के छात्र बड़ी संख्या में मौजूद थेl इस कार्यक्रम में हिंदी कहानीकार डॉ. राजेंद्र श्रीवास्तव, नाटककार डॉ. रमेश मिलन भारतीय संस्कृति की अध्येता डॉ. ममता जैन, हिंदी कवि हितेश व्यास, मंजू चोपड़ा, श्री. देशमुख आदि हिंदी-मराठी लेखक पत्रिकाओं के कुछ संपादक, अन्य महाविद्यालयों के प्राध्यापक भी उपस्थित रहेंl संपूर्ण कार्यक्रम का संचालन डॉ. प्रेरणा उबाळे ने कियाl कार्यक्रम के अंत में काव्यपाठ करने वाले सभी छात्रों को प्रमाणपत्र देकर सम्मानित किया गयाl संपूर्ण कार्यक्रम अत्यंत सुचारू ढंग से संपन्न हुआl सभी मान्यवरो ने स्व. शंकरराव कानिटकर हिंदी विभागीय ग्रंथालय को भेंट दीl ग्रंथालय को 600 पुस्तकें प्रदान करने वाले डॉ. दामोदर खड़से और अन्य विद्वानों ने अपनी पुस्तकें संजोकर रखने पर प्रसन्नता व्यक्त कीl

साभार – डॉ. प्रेरणा उबाळे

अध्यक्ष, हिंदी विभाग, मॉडर्न महाविद्यालय, शिवाजीनगर, पुणे

संपर्क- 7028525378

≈ श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ कविता… ☆ श्री विनायक कुलकर्णी ☆

श्री विनायक कुलकर्णी

? कवितेचा उत्सव ? 

☆ कविता… ☆ श्री विनायक कुलकर्णी ☆ 

[वृत्त. वनहरिणी (मात्रा ८+८+८+८)]

मी प्रतिभेच्या प्रासादातिल शब्द हवे ते निवडत जातो

वेगवेगळ्या भाव भावना कविते मधुनी गुंफत जातो

यमक साधते नकळत माझ्या वृत्त बद्घता जमून येते

एक एक मी माझी कविता शब्द कृपेने घडवत जातो

काळ सुखाचा असतो जेंव्हा कविता माझी उजळत असते

प्रेमा मधला गंध लेवुनी मनास माझ्या सुखवत असते

क्षण दुःखाचे असता भवती कविता सुध्दा दुःखी होते

तरि आशेचा किरण होउनी धीर देत मज जगवत असते

 *

तिला शारदा बहाल करते अलंकार शब्दांचे भारी

अभंग होते कधी कविता करून येते विठ्ठल वारी

होते दोहा गीत गझल अन् ओवी सुध्दा कविता बनते

स्वातंत्र्याची मशाल बनते अन् क्रांतीची बने तुतारी

 *

ज्ञानोबाची असते वारी ही नाम्याची असे पायरी

अभंग होउन ही तुकयाचे मुक्त हिंडते दारोदारी

मुक्ताईची कान्हाईची जनामायची गाउन ओवी

दळावयाला कांडायाला घरी आणते तीर्थे चारी

© श्री विनायक कुलकर्णी

मो – 8600081092

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

Please share your Post !

Shares

मराठी साहित्य – विविधा ☆ तो आणि मी…! – भाग ९५ ☆ श्री अरविंद लिमये ☆

श्री अरविंद लिमये

? विविधा ?

☆ तो आणि मी…! – भाग ९५ ☆ श्री अरविंद लिमये ☆

(पूर्वसूत्र- वखरे साहेबांनी माझ्या डोक्यावरचं ओझं किती अलगद उतरवून घेतलं होतं! त्यांचे आभार मानून मी जायला वळणार एवढ्यांत त्यांनी मला थांबवलं.

“लिमये, माझ्या घरच्या जबाबदाऱ्या अजून पूर्ण व्हायच्यात. त्या तशा झाल्या असत्या तर मीही तुम्ही घेतलाय तसाच निर्णय घेतला असता. सोs यू आर आॅन राईट ट्रॅक. गो अहेड. ऑल द बेस्ट. एन्जॉय अॅंड बी हॅप्पी! ” ते म्हणाले होते.

त्यांचे शब्द माझ्यासाठी सदिच्छाच नव्हते फक्त तर त्यांच्या तोंडून ‘तो’ च देत असावा असे आशीर्वादही होते!)

मनाला स्पर्शून गेलेला हाच विचार सोबत घेऊन मी माझ्या केबिनमधे आलो. आता इथला आपला अन्नाचा शेर अल्पकाळाचाच. जाण्यापूर्वी सगळी कामं पूर्ण करायला हवीत. असा विचार करीत मी बसायला माझी खुर्ची ओढली एवढ्यांत माझ्या लक्षात आलं की आजच्या

इनवर्ड मेलमधे आलेलं माझ्या नावाचं एक बंद एन्व्हलप शिपायाने आधीच तिथं माझ्या टेबलवर पेपरवेटखाली ठेवलेलं होतं. पाहिलं तर ते आमच्या नागपूर रिजनल आॅफिसकडून आलेलं होतं. मी ते न फोडता तसंच बाजूला सरकवून पुन्हा त्यावर पेपरवेट ठेवून दिला. आणि माझ्या समोरची इतर महत्त्वाची कामं हातावेगळी करायला सुरुवात केली. कारण त्या पत्रात बाकी दुसरं कांही नसणार हे गृहितच होतं. याआधीही नागपूर रिजनल ऑफिसकडून मला साधारण दोन महिन्यांपूर्वी एक पत्र आलं होतंच. आमची अकोला ब्रॅंच नागपूर रिजनच्या अखत्यारीत होती आणि अकोल्याला माझी ट्रान्स्फर व्हायला निमित्त ठरलेल्या अनियमित कर्ज खात्यांबद्दल जे गंभीर प्रश्न निर्माण झालेले होते त्यामुळे होणाऱ्या बॅंकेच्या आर्थिक नुकसानीला कोण जबाबदार हे ठरवण्याचे प्रोसेस पूर्वीच सुरू झालेले होते. त्या कार्यप्रणालीचाच एक भाग म्हणून आधी आलेले ते पत्र! त्या पत्रात ‘तुम्ही तेथे मॅनेजर म्हणून कार्यरत असताना या बुडीत होऊ पहाणाऱ्या कर्जांची वसुली करण्यासाठी आवश्यक पावले उचलली गेली नव्हती असे निदर्शनास आले आहे. याबद्दलचे आपले म्हणणे आठ दिवसांच्या आत लेखी कळवावे’ असे सूचित केलेले होते. ते पत्र वाचून भीति वाटण्याऐवजी तेव्हा मला हसूच आले होते. कारण मला तो कागदी घोडे नाचवण्याचा हास्यास्पद प्रकारच वाटला होता. खरंतर या गंभीर त्रुटी मी तिथे चार्ज घ्यायच्या आधीच आॅडिटमधेच रिपोर्ट झाल्या होत्या. त्याला जबाबदार असलेल्या आधीच्या मॅनेजरची तेथून उचलबांगडीही झाली होती. आणि ती घाण उपसण्यासाठीच माझी तिथे बदली झाली होती. सेन्ट्रल ऑफिसच्या सूचनेप्रमाणे सहा कर्जखातेदारांविरूध्द क्रिमिनल केसेस् दाखल करून इतर थकीत खातेदारांविरूध्दही वसुलीच्या नोटिसा पाठवून मी पाठपुरावा सुरूही केलेला होता. त्या ब्रँचमधल्या पाच महिन्यांच्या अल्पवास्तव्यात एक जबाबदार ब्रॅंच मॅनेजर म्हणून जे करायचे ते वेळोवेळी रिजनल ऑफिस आणि सेंट्रल ऑफिस या दोघांचेही मार्गदर्शन घेऊन मी तत्परतेने केलेले होते आणि प्रत्येक खात्याबद्दलची रिपोर्टिंग्जही त्या त्या वेळी सर्व वरिष्ठ कार्यालयांना पाठवत आलो होतो. या सगळ्याची मुद्देसूद सविस्तर माहिती देऊन ‘मी माझ्या कर्तव्यात कोणतीही कसूर केलेली नसल्याने होणाऱ्या आर्थिक नुकसानीला मला जबाबदार ठरवता येणार नाही’ असे त्या पत्राला उत्तर दिले होते त्यालाही दोन महिने होऊन् गेले होते. त्यामुळेच आज मला आलेलं ते समोरच्या इन्व्हलपमधलं पत्र हे मी पूर्वी पाठवलेल्या त्या लेखी उत्तराची पोच आणि त्या प्रश्नाला रिजनल आॅफिसने दिलेली क्लिनचीट असणार याबद्दल मला शंका नव्हतीच. पण…?

पण साधारण तासाभराने मला इतर कामांमधूनच थोडा निवांतपणा मिळताच मी ते एन्व्हलप फोडून आतलं पत्र वाचलं आणि मला हादराच बसला. ते मला वाटलं होतं तसं साधं पत्र नव्हतं. ती मला आलेली एक नोटीस होती. क्षणभर कां होईना कांहीतरी अभद्र घडत असल्याच्या आशंकेने मी अस्वस्थ झालो.

‘तुम्ही सदर कर्ज खात्यांबाबतचा पाठपुरावा समाधानकारक केलेला नसल्यामुळे तुम्ही मांडलेली कैफियत स्वीकारता येणार नाही. ‘ असे नमूद करून ‘ सदर खात्यांमधील अनियमितता आणि आर्थिक नुकसानीस तुम्हाला कां जबाबदार धरू नये? ‘ अशी मला बजावलेली ती ‘शो काॅज नोटीस’ च होती.

माझी भूमिका स्वच्छ होती. त्यामुळे ते पत्र वाचल्यानंतर उमटलेली माझी पहिली नकारात्मक प्रतिक्रिया क्षणकाळच टिकली. शांतपणे विचार केल्यानंतर एक गोष्ट मला स्पष्टपणे जाणवली. माझ्या अकोला ब्रॅंचमधील वास्तव्यादरम्यान नागपूरचे तेव्हाचे रिजनल मॅनेजर आणि मी या कर्जखात्यांच्या संदर्भात सतत संपर्कात असायचो. किंबहुना सेन्ट्रल आॅफिस आणि म्हणून झोनल आॅफिस या दोन्हीकडून माझ्या इतकाच त्यांच्यामागेही या गंभीर प्रकरणांबाबतचा ससेमिरा असायचाच. मी आणि ते दोघांच्या जवळजवळ एकाचवेळी प्रमोशन मिळून ट्रान्स्फर्स झालेल्या. आज ते तिथेच असते तर हा प्रश्नच निर्माण झाला नसता. पण आता तिथे आलेले नवीन रिजनल मॅनेजर आम्हा कुणालाच ओळखत नव्हते. त्यामुळे त्यांनी चुकीच्या पध्दतीने धसाला लावलेल्या या प्रश्नात ते मलाही गुंतवू पहात होते. त्यामागे त्यांचा नेमका काय उद्देश होता ते मला समजत नव्हतं. मी कितीही निर्दोष असलो तरी ते सिद्ध करून यातून बाहेर पडणं अवघड नसलं तरी मनस्ताप देणारं आणि वेळखाऊ ठरणारंही होतं. जे करायचं ते अतिशय विचारपूर्वक आणि शांतपणे करायला हवं आणि तेही ताबडतोब हे माझ्या लक्षात आलं!

स्वेच्छानिवृत्तीसाठीची ती आकर्षक योजना, सर्वांशी मोकळेपणाने चर्चा करून त्यासाठी अर्ज करायचा मी घेतलेला निर्णय, त्यामधे सेंट्रल आॅफिसच्या नुकतेच प्रमोशन मिळालेल्या आम्हा सर्वांच्या संदर्भातल्या धोरणामुळे निर्माण झालेली अनिश्चितता हे सगळे अडसर वखरेसाहेबांशी मोकळेपणाने चर्चा केल्यानंतर दूर झालेत असं वाटलं होतं पण तो असा एक चकवाच ठरला होता तर! दु:ख माझ्या स्वेच्छानिवृत्तीत आता पुन्हा अडसर निर्माण होणार याचं नव्हतंच. आपल्यावर होणाऱ्या अन्यायाविरुद्ध आपण कांहीही करू शकत नाही याचं दु:ख होतं!

आज जवळजवळ पंचवीस वर्षांनंतर या सगळ्याच घटनांकडे वळून पहाताना मला माझ्या बाबांचे शब्द आठवतात.

‘कर्ता करवता ‘तो’च. आपण फक्त निमित्तमात्र’ असं ते म्हणायचे. त्याचा नेमका अर्थ या सर्व घटनाच मला समजावून सांगू पहातायत असंच वाटू लागलं!

आज आलेलं हे पत्र वाचण्यापूर्वी फक्त तासभरच आधी मी माझ्या स्वेच्छानिवृत्तीच्या निर्णयाला वखरेसाहेबांची संमती घेऊन बाहेर पडलो होतो ते जग जिंकून आल्याच्या आनंदातच! वखरेसाहेबांना मी माझ्या या निर्णयामागची माझी भूमिका

मोकळेपणाने समजावून सांगितल्यानेच त्यांनी मनापासून आपल्याला पाठिंबा दिला असंच मला वाटलं होतं. इथं समोर हाकेच्या अंतरावर असणाऱ्या अपेक्षित अशा वळणावर वळायचं कीं आहे त्या सरळ रस्त्यानेच पुढे जात रहायचं याचा निर्णय घेणारा आता मीच आहे असंच मला वाटलं होतं! माझ्या मनात आलेल्या या ‘मी’ मधे कणभर कां होईना ‘अहं’ होताच! पण नंतर अगदी

अल्पकाळातच तो ‘अहं’ पूर्णतः नाहीसा झाला तो हे पत्र आल्यानंतर! आता मी करतो म्हणून कांहीही होणार नाहीय यांची स्पष्ट जाणीव मला झाली. मी निमित्तमात्र आहे आणि करता करवता ‘तो’च आहे हेच खरे! आता या क्षणी ‘तो’ बुध्दी देईल तसं करत जायचं आणि जे घडेल तेच ‘त्या’चा प्रसाद म्हणून स्वीकारायचं. तो अन्याय असो वा अन्यायाचं निराकरण. असं ठरवलं आणि मन शांत झालं. त्याचवेळी अचानक इंटरकाॅमवर वखरेसाहेब…!

“लिमये, तुमचा अॅप्लीकेशन फाॅरवर्ड करायला आत्ताच स्टाफ डिपार्टमेंटला पाठवलाय. आता लगेचच तुम्ही व्ही. आर. एस. घेताय ही बातमी आपल्या ऑफिसमधे षटकर्णी होईल बघा… ‘ असं म्हणून ते गंमतीने हसत होते. पण.. ते ऐकून मनाला स्पर्शू पहाणारा आनंद मात्र माझ्या हातातल्या ‘त्या’ पत्राकडे लक्ष जाताच मलूल होऊन गेला..!

या पत्राबद्दल वखरे साहेबांना आत्ताच कल्पना द्यायला हवी. माझा अॅप्लीकेशन फाॅरवर्ड होण्यापूर्वी त्यांना हे समजायलाच हवं.. ‘ मी भानावर आलो. झरकन् उठून बाहेर आलो. ‘ते’ पत्र हातात घेऊन वखरेसाहेबांच्या केबिनकडे धाव घेतली…! माझी पावलं या क्षणी प्रकाशवाटेकडे धाव घेतायत कीं मिट्ट काळोख्या अंधारवाटेकडे हे मात्र फक्त ‘त्या’लाच,… त्या कर्त्या-करवत्यालाच माहित होतं!!

क्रमश:…  (प्रत्येक गुरूवारी)

©️ अरविंद लिमये

सांगली (९८२३७३८२८८)

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ.मंजुषा मुळे/सौ.गौरी गाडेकर≈

Please share your Post !

Shares

मराठी साहित्य – जीवनरंग ☆ आत्मनिर्भर — भाग – १ ☆ डॉ. ज्योती गोडबोले ☆

डॉ. ज्योती गोडबोले 

? जीवनरंग ❤️

☆ मुखवटे — भाग – १ ☆ डॉ. ज्योती गोडबोले 

भावनाला या ऑफिस मध्ये नोकरी मिळाल्यावर तिचा आनंद गगनात मावेना. इतके दिवस तिला एमबीए असूनही मनासारखी नोकरी मिळत नव्हती. या ऑफिसचे जॉइनिंग लेटर आल्यावर भावना मनापासूम खूषच झाली.

पहिल्या दिवशी ऑफिस मध्ये गेल्यावर शेजारच्या क्युबिकल मध्ये बसलेला हसतमुख तरुण हिला बघून बाहेर आला.

हॅलो, मी भार्गव परचुरे. तुमच्या आधी सहा महिने जॉईन झालो. वेलकम टू होरायझन कंपनी.

आपल्याएवढाच असलेला हा हसतमुख तरुण बघून भावनाला हायसं झालं. त्याने सगळ्या स्टाफशी तिची ओळख करून दिली.

हे तुमचं टेबल. त्याने तिला तिचं टेबल दाखवलं आणि तो कामाला निघून गेला.

भावना मध्यमवर्गीय चौकोनी कुटुंबातली मुलगी. चार खोल्यांचा साधासुधा फ्लॅट आणि आईवडील भाऊ आणि ही असं कुटुंब.

भावना दिसायला सुरेख स्मार्ट तर होतीच. जरा महत्त्वाकांक्षी आणि उच्च रहाणीची आवड असलेली सुद्धा.

ऑफिसमध्ये भावना चार महिन्यात रुळून गेलीसुद्धा. तिची आणि भार्गवची चांगली मैत्री झाली.

अचानक ऑफिस मध्ये मुंबईहून बदलून एक स्मार्ट तरतरीत तरुण जॉईन झाला. हॅलो मी मकरंद साने.

त्याने सगळ्याना आपली ओळख करून दिली.

किती स्मार्ट होता मकरंद. किती पॉश कपडे होते त्याचे. त्याच्या परफ्यूमने ऑफिसमध्ये सुंदर गंध दरवळला.

मकरंद पण होता एमबीए. भावनाच्या पलीकडेच त्याचे टेबल होते.

आता टिफिन च्या सुट्टीत भार्गव आणि भावनाबरोबर मकरंद पण त्यांना जॉईन झाला. , मकरंदचं घर मुंबईला होतं. इथे मात्र तो एका मित्राबरोबर रूम शेअर करून रहात होता.

“मी पुण्याला कायम नाही रहाणार रे बाबा. लवकर मुंबईला जातो बघ खटपट करून. माझं स्वतःचं सुंदर घर आहे मुंबईला. मकरंद म्हणायचा.

भार्गवपेक्षा भावना पटकन आकर्षित झाली मकरंदकडे. भार्गव ला टाळून बऱ्याच वेळा ती त्याच्या मोटर सायकलच्या मागे बसून लांब लंचला जाई.

भार्गव हे निमूटपणे बघत होता.

भार्गव एकदा म्हणाला”काय भावना,, काय म्हणतोय नवा मित्र?

 बरेच वेळा दिसतेस हल्ली मकरंद बरोबर. लग्न झालंय बरं का त्याचं.

सांगितलं असेलच तुला ना. ”

“भार्गव, बरीच माहिती आहे रे तुला बाकीच्या जगाची. हो, सांगितलं आहे बरं त्याने. ”भावनाला राग आला भार्गवचा.

भार्गव हसला म्हणाला” हे बघ. ते काहीही असो. माझं प्रेम आहे तुझ्यावर. ते काही कमी होणार नाही. करतेस का लग्न माझ्याशी?

आपलं बाबा सगळं सरळसरळ असतं. मी एकुलता एक आहे.. श्रीमंत नाही पण परिस्थिती मस्त आहे आमची. जबाबदारी नाही काही. बघ. विचार कर”.

भावना म्हणाली “, काही नको. मला नाही लग्न करायचं इतक्यात. ”

भार्गव म्हणाला ओके. पण विचार करशील तेव्हा माझं नाव लक्षात असू दे म्हटलं. आपलं प्रेम आहे तुझ्यावर. ”भार्गव हसून तिथून निघून गेला.

भावनाला हसू आलं. तिला भार्गव मनापासून आवडायचा पण आता मकरंदने तिला चांगलीच भूल घातली होती.

त्या दिवशी मकरंद आणि भावना सहज लॉंग ड्राईव्हला गेले.

भावना म्हणाली, काय रे मकरंद, बायको कशी आहे तुझी?

सांगितलं नाहीस मला तिच्याबद्दल काहीही. ”

मकरंदचा चेहरा पडला. ”अग काय सांगायचं, सांगण्या सारखं काहीही नाही ग. अगदी दुर्मुखलेली आणि रडतराव आहे आमची लीना मॅडम. सतत तक्रारी.

मी म्हणून सहन करतोय बरं. पण आमचं अजिबात पटत नाही ग भावना. मला तुझ्यासारखी बायको मिळालीअसती तर किती भाग्यवान ठरलो असतो मी.

मी घटस्फोट घ्यायच्या विचारात आहे. ते सगळं झालं की करशील माझ्याशी लग्न? थांबशील ना माझ्यासाठी? ”मकरंद डोळ्यात पाणी आणून म्हणाला.

भावना म्हणाली, ते बघू नंतर. आधी म्हणतोस तसा नक्की घटस्फोट तर घे”. मकरंद म्हणाला, गेले कित्येक वर्षे माझा तिच्याशी शारीरिक संबंध पण आलेला नाही. त्याही बाबतीत सगळा उजेडच आहे लीनाच्या बाबतीत. ” 

मला तुझ्यासारखी रसिक हुशार आनंदी मुलगी हवी होती ग बायको म्हणून. ”मकरंदने सुस्कारा सोडला. भावनाला त्याच्याबद्दल मनापासून वाईट वाटलं. देव तरी कशा विजोड जोड्या जमवतो ना. तिच्या मनात आलं.

त्या दिवशी ती घरी गेली तर तिला आश्चर्याचा धक्काच बसला.

हॉलमध्ये भार्गव खुशाल तिच्या आईवडिलांशी गप्पा मारत होता.

चहा झालेला दिसत होता.

भावना आल्याबरोबर भार्गव म्हणाला “या या. तुमचीच वाट बघत होतो. आई, चहा द्या ना भावनाला. खूप काम असतं हो हल्ली आम्हाला ऑफिस मध्ये. ’ भावना ओरडून म्हणाली, तू इथं आमच्या घरी काय करतो आहेस भार्गव? ”

भावनाचे वडील म्हणाले, भावना ही काय पद्धत ग तुझी बोलायची?

सॉरी म्हण त्यांना आधी.

समोरच्या गुप्तेकाकांना त्यांचे पार्सल द्यायला आले होते हे. सहज आपलं नाव बघितलं आणि मग तुझं नाव घेऊन म्हणाले, हिच्याच ऑफिस मध्ये मी काम करतो.

आम्हीच बोलावलं त्यांना चहाला. ”

भार्गव हसत होता.

भावना अगदी ओशाळून गेली.

सॉरी हं. मला नव्हतं माहीत. ”ती नरमाईने म्हणाली. होतं असं कधीकधी भावना. भार्गव म्हणाला.

चलो बाय. भेटू पुन्हा म्हणत तो निघून गेला.

आई म्हणाली”, किती चांगला मुलगा आहे ग हा. गुप्ते काका आजारी असतात ना, त्याच्या वडिलांचे मित्र आहेत ते. हा मुलगा त्यांची औषधे न चुकता आणून देतो.

त्याला नव्हतं माहीत ग की हे तुझं घर आहे ते. ”

भावनाला अगदी गिल्टीवाटलं. सॉरी हो बाबा. चुकलंच माझं. ”

उद्या मी सॉरी म्हणेन त्याला पुन्हा. ”

त्या नंतर भावनाचे पंधरा दिवस अगदी गडबडीत गेले. वर्क लोड खूप होतं आणि मकरंद दोन आठवडे रजेवर होता. त्याचेही काम भावनालाच बघायला लागलं. हा मकरंद फोनसुद्धा का उचलत नाहीये म्हणून चिडचिड झालीच होती तिची.

त्या दिवशी लंचब्रेक मध्ये भार्गव म्हणाला, मला ऑफिसच्या कामासाठी पुढच्या आठवड्यात मुंबईला जावं लागणार आहे आपल्या हेड ऑफिसला.

भावना येतेस का तू पण मुंबईला? टाक की एक दिवस रजा.

माझं काम झालं की मस्त हिंडू. आणि आणखी एक तुला आवडेल असं काम.

ऑफिसमधून मकरंदचा पत्ता घेऊ आणि त्याला सरप्राईज म्हणून भेटून पण येऊ. आवडेल तुला? ”भार्गवने तिला आवर्जून विचारलं.

भावनाला त्याचं मनापासून कौतुक वाटलं. किती सरळ आहे हा मुलगा. माझी मकरंदशी वाढत असलेली मैत्री बघूनही हा जेलस नाही होत.

भार्गव तिला आणखीचआवडायला लागला.

“खरंच की रे भार्गव. जाऊया का आपण? येते मी तुझ्याबरोबर. मस्त आऊटिंग होईल मला बघ. आणि खरंच भेटून येऊ मकरंदला. सरप्राईज देऊ त्याला. ”भावना आनंदाने म्हणाली.

भावनाने त्या दिवशी रजा टाकली.

भार्गवला ऑफिस मुंबईला जाण्यासाठी कार देणार होतं.

मग तर काय.

भावनाला न्यायला भार्गव तिच्या घरी गेला.

भावना तयार होऊन खाली आली. “माय माय. कसली ग वंडरफुल दिसते आहेस तू या ब्लॅक टाईट्स आणि मरून टॉप मध्ये. मार्व्हलस”.

भार्गवने दिलखुलास पावती दिली.

कार मुंबईच्या दिशेने धावू लागली.

वाटेत गप्पा मारताना भावनाच्या लक्षात आलं किती हुशार आणि बहुश्रुत आहे भार्गव. इंग्लिश आणि मराठीही तो अफाट वाचतो. त्याचे जनरल नॉलेज फारच छान आहे.

नकळत तिच्या मनात आलं, मकरंद किती कमी आहे याच्यापुढे.

सिनेमाशिवाय आणि त्यांच्या गॉसिपशिवाय त्याला कशातच इंटरेस्ट नसतो. फक्त छान कपडे हॉटेलिंग आणि खरेदी यापलीकडे जग नाही मकरंदचं.

भार्गवचं ऑफीसचं काम झालं.

त्याने भावनाला एका सुंदर हॉटेल मध्ये नेलं. समुद्रकाठी असलेलं ते सुंदर हॉटेल, नारळाच्या झावळ्यानी बनवलेल्या छोट्या हट्स. आणि सुंदर जेवण. बरोबर असलेला हा उमदा हुशार तरुण. इतका आनंद आपल्याला आजपर्यंत मकरंदच्या सहवासात अनेक वेळा राहूनही मिळाला नाही असं भावनाच्या मनात आलंच. पण तरीही मकरंद ची मोहिनी काही उतरत नव्हती भावनाच्या मनावरून.

“चला. आता जायचं ना मकरंदच्या घरी? मी ऍड्रेस घेतलाय त्याचा. ” भार्गव म्हणाला.

“हो जाऊया. किती आनंद आणि आश्चर्य वाटेल ना त्याला. ’ भावना म्हणाली.

भार्गव म्हणाला “, मला बघून नाही पण तुला बघून मात्र नक्की होईल आनंद त्याला. ” भावना हसली आणि म्हणाली, “ शेवटी पुरुष ते पुरुषच. चला आता मकरंदच्या घरी.”

ड्रायव्हरने दिलेल्या पत्त्यावर बरोबर कार नेली. एका सोसायटीमध्ये रो हाऊसच्या रांगेत एका बंगल्यासमोर कार उभी राहिली. बाहेरची पाटी मात्र सांगत होती, हे कोणा कर्नल पाटणकर यांचे घर आहे. श्री व सौ पाटणकर.

– क्रमशः भाग पहिला 

© डॉ. ज्योती गोडबोले

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

Please share your Post !

Shares

मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ रेडिओ आणि मी… ☆ संगीता कुलकर्णी ☆

संगीता कुलकर्णी

? मनमंजुषेतून ?

☆ रेडिओ आणि मी ☆ संगीता कुलकर्णी ☆

(१३ फेब्रुवारी “जागतिक रेडिओ दिन” निमित्त.) 

मी सकाळी वर्तमानपत्र वाचत मोबाईल वर लावलेली गाणी ऐकत असताना ” ‘लग जा गले के फिर ये हंसी रात…’’ या सुमधुर गाण्याने माझे लक्ष वेधून घेतलं.. आज पुन्हा आठवलं नव्यानं…!

या निमित्ताने रेडिओच्या दिवसांतील माझ्य अनेक आठवणी मात्र जाग्या झाल्या… काही गोष्टी, आठवणी वस्तू अक्षरश: आपलं आयुष्य घडवतात. आणि अंशी आयुष्य बनूनच राहतात..!

रेडिओचे दिवस किती रम्य दिवस होते ते आणि त्या अविस्मरणीय आठवणी… आठवण एवढ्याचसाठी म्हटलं कारण माझ्या आयुष्यात त्याचं एक वेगळ स्थान होतं…! ती जुनी गाणी ऐकताच माझे मन नकळतच जुन्या आठवणीत रमून गेले.. आठवू लागले लहानपणीचे रम्यदिवस.. रेडिओच्या आठवणीचे..!

टीव्हीच्या आगमनापूर्वी रेडीओ या श्राव्य माध्यमाने माझ्यावर अधिराज्य केले किंबहुना तो माझा जीवन साथीच होता म्हणा ना..!

लहानपणापासून माझे व रेडिओ चे अतूट असं एक नात…!

सकाळी विविध भारतीच्या सिग्नेचर ट्यूनच्या आवाजाने जाग यायची.

सकाळची कामे उरकता उरकता ‘संगीत-सरिता’ कानावर पडायचं. हा शास्त्रीय-संगीतावर आधारित छान कार्यक्रम असायचा. एखादा राग निवडून त्याची वैशिष्ट्ये, त्याचे आरोह-अवरोह दिग्गजांच्या तोंडून ऐकायला मिळत. त्या दिवशीचे सन्माननीय अतिथी असलेले शास्त्रीय गायक, वादक त्या रागावर आधारित आपली पेशकश करत असत. त्या काळात या कार्यक्रमातून अनेक दिग्गज प्रभृती पेश झालेत हे विशेष. त्यानंतर त्या रागावर आधारित अशी एखादी धून किंवा चित्रपट गीत ऐकवलं जाई… रेडिओ सिलोन’ वरचा ‘पुराने फिल्मों के गीत’ हा कार्यक्रम…! “फौजी भाईयों की पसंद के फिल्मी गाने..! या कार्यक्रमासोबत मदमस्त गाण्यांचा सिलसिला…!

ऐकलेल्या गाण्यांचा कैफ मनावर ताजा असतानाच प्रादेशिक संगीत, हवामहल, चित्रलोक, भुले बिसरे गीत, भावसरगम, फिल्मसंगीत इ. अशा एकाहून एक सरस कार्यक्रमांची रेलचेल.. अभ्यासातल्या कविता चटकन पाठ होत नसत पण रेडिओवरच्या जाहिराती, जिंगल्स आजही लक्षात आहेत. ‘ये ढेर से कपडे मैं कैसे धोऊं…’, ‘रंग जमाता है कोकाकोला…’, ‘पापा पापा आए, हमारे लिए क्या लाए…’ ‘तंदुरुस्ती की रक्षा करता है …’ वगैरे वगैरे… रेडिओवरचा खास जिव्हाळ्याचा प्रोग्रॅम म्हणजे अमीन सायानीजी यांचा ‘बिनाका गीतमाला’… ‘ जीऽऽ हां… भाईयों और बहनो ” असं आपलेपणाने अँकरिंग करणारे अमीन सयानजी केक पायदान पेश करत.. बिनाका गीतमालाचा कार्यक्रम म्हणजे गाण्यांची मेजवानीच…! गाण्यांशी माझं भावविभोर विश्व निगडीत होतंच की..! मी कागद-पेन घेऊन ती यादी लिहून काढायची. वर्षभरातच्या आपल्या आवडत्या गाण्यांशी ती ताडून पाहायची.. रेडिओमुळे अनेक गीतांचे गीतकार, संगीतकार, गायक नीट लक्षात रहायचे.

विविधभारती वर गाणे लावण्यापूर्वी अगदी स्पष्ट आणि खणखणणीत आवाजात निवेदक वा निवेदिका सांगायचे.. “आईये, अब सुनते है, आशा भोसले और किशोर कुमार की आवाज में, शैलेंद्र का लिखा गीत, संगीत से सवांरा है एस डी बर्मनने और फिल्म का नाम है… ” किती छान वाटायचं हे ऐकताना..! इतकच काय तर क्रिकेट समालोचनात सर्वात आवडते म्हणजे सुरेश, सरय्या

किती मधाळ बोलणे अन ओघवती भाषा.!

अक्षरक्षः एका मागे एक अमॄतधारांचा वर्षावव..!!

रेडिओवर गाणी ऐकतच मी लहानाची मोठी झालेली.. इतकच काय रेडिओमुळे बर्‍याच जुन्या गाण्यांशी माझा दोस्ताना ही झाला होता… ती ‘भुली-बिसरदी यादें’, ‘बेला का फूल’! … विविध भारतीवरील अनेक कार्यक्रम (तेव्हाचे आणि आताचे). कॉलेजात असताना मी ‘साज और आवाज’ खूप आवडीने ऐकायचे. काही जाहिराती तर पाठ झाल्या होत्या. जशा की…

फिनोलिक्स नं आणलं पाणी…

प्रकाशचे माक्याचे आयुर्वेदिक तेल 

असे अजून बरेच काही आहे…

खरंच..! आठवणींचे मोहोळ उठलं..

या रेडिओच कलेच्या क्षेत्रात मोठं योगदान आहे. कित्येक कलाकार या रेडिओने घडवलेत. रेडिओवर नेहमी काही ना काही कार्यक्रम होत असत. त्यात नव्या कलाकारांना संधी मिळताच त्या संधीचं सोनं करीत असत. या कार्यक्रमाच्या अमृतमंथनातून अनेक रत्ने गवसलीत… ज्यांचे नाव उच्चारताच आजही माझे हात आदरानं कानाच्या पाळीकडे आपसूकच जातात..!

खरचं… रेडीओला पर्यायच नाही. मग युट्युब असो वा काहीही..! कारण किती तरी सुंदर निवेदने, अनेक सुंदर कार्यक्रम ऐकता येतात रेडिओ वरती… रेडिओ तो रेडिओच…! रेडिओला पर्यायच नाही…!

माझ्या आयुष्याचा अविभाज्य अंग बनलेला पण मध्ये विस्मरणात गेलेला हा रेडिओ,, आता, हवा का रुख देखकर, त्यानं आता नवं रुप धारण केलंय बरं…! . एफ. एम. रेडिओ..!! एफ. एम. आले तेच वाजतगाजत. या एफ. एम. मुळे गाणी ऐकण्याच्या आवडीला पुन्हा खतपाणी मिळालंय. पुन्हा रेडिओ माझ्या जीवनाचा अविभाज्य अंग झाल्याचं पाहून मी मनोमन सुखावली..!

माझ्या आयुष्याचा अविभाज्य अंग बनलेला हा रेडिओ माझी व रेडीओची पुनर्भेट म्हटलं तर वावग ठरणार नाही..!

आज आपण टेक्नॉलॉजिमध्ये कितीही पुढे गेलो असलो आणि मनोरंजनाच्या साधनामध्ये वैविध्यता आणली तरी ‘रेडिओ’ या श्राव्य माध्यमाची जी जादू आणि विश्वासाहर्ता आहे ती आजही टिकून आहे. रेडिओ हे संवादाचे जुने माध्यम असले तरी, संवादाचे एक महत्त्वाचे माध्यम म्हणून आजही पाहीले जाते.

ज्या रेडिओने मला गाण्यांचे वेड लावले, जगातील घडामोडींचे अपडेट्स दिले.. या आणि अशा कितीतरी रेडिओच्या आठवणी मनात आजही घर करून उभ्या आहेत..

रेडिओची त्या सुवर्ण कामाची आठवण काढीत मी गुणगुणत राहिले

“दिल ढुंढता है, फिर वही, फुरसत के रात दिन, “..!!

©  संगीता कुलकर्णी 

लेखिका /कवयित्री

ठाणे मो. 9870451020

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

Please share your Post !

Shares

मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ “आजारपणाची गंमतगोष्ट…” ☆ नीता चंद्रकांत कुलकर्णी ☆

नीता कुलकर्णी

? मनमंजुषेतून ?

☆ “आजारपणाची गंमतगोष्ट…” ☆ नीता चंद्रकांत कुलकर्णी

आमच्या लहानपणी साधं सरळ आयुष्य होतं. ब्रेकफास्ट म्हणजे फोभा, फोपो किंवा पोहे… अगदी क्वचित कधीतरी रविवारी वडील पाव आणायचे. मग त्या दिवशी आम्हा तिन्ही भावंडांना चहा मिळायचा.

 इतर वेळेस आई सांगायची, ” लहान मुलांनी चहा प्यायचा नसतो. “

 यावर का? कशाला? वगैरे प्रश्न आम्ही विचारत नव्हतो. कारण वडीलधारे सांगतात ते बरोबरच असणार ही खात्री होती.

जेवणात पोळी, भाजी, भात, वरण थोडीशी कोशिंबीर. सकाळचं राहिलेलंच रात्री खायचं. त्याच्या जोडीला मुगाची खिचडी नाहीतर डाळ फळ… पानात टाकायचं नाही आणि वाया घालवायचं नाही हा नियमच होता.

त्या काळी सगळेच जण असं साधं सात्विक अन्न खात असल्याने आजारपण कोणाला फारसे नसायचेच.. आणि झाले तर अगदी साधे आजार होत असत. लगेच त्यावर आजीचे घरगुती उपचार सुरू व्हायचे…

पोट दुखण… हा आजार मधून मधून व्हायचा. त्यावर कधी, काय, किती खाल्लंय याचा विचार करून आई आणि आजी कुठलं औषध द्यायचं ते अचूक ठरवायच्या.

कधी ग्लासभर लिंबाच सरबत आजी द्यायची. वर बजावून सांगायची, ” घटाघटा पिऊ नको. थोडं थोडं थांबून घे. “

आता लक्षात येतं.. साखर, मीठ, पाणी म्हणजे ते ओरल सलाईनच असायचं. रात्री थोडंसं दूध घातलेली साबुदाण्याची खीर द्यायची. त्याने दुसरे दिवशी पोट एकदम बरे व्हायचे.

दुसरा इलाज म्हणजे तिखट बाळांतशेपा चावून खायला सांगायची. ते नको म्हटलं की उकळून त्या पाण्यात साखर घालून द्यायची.

ओवा भाजून तो हातावर चोळून लहान मुलांच्या पोटाला चोळायची. त्यानी कुरकुरणारं बाळ शांत झोपायचे.

गरम दुधात तूप घालून द्यायची. त्यांनी पोट मऊ पडतं(म्हणजे काय होत कोण जाणे) असं ती सांगायची. त्या दोघी हे कुठून शिकल्या याच आम्हाला आश्चर्य वाटायचं.

खोबरेल तेल तर बहुऊपयोगी होते. कान दुखला की चार थेंब कानात, लहान मुलांचे पोट दुखलं की कोमट करून ते बेंबीत थोडं थोडं घालायचं. केस चांगले वाढण्यासाठी रविवारी अंघोळीच्या आधी केसांना भरपूर खोबरेल तेल लावायचं. नंतर एक तासाने शिकेकाईनी केस धुवायचे.

थंडीत तेल पायाला लावायचं… तेच आमचं स्क्रीन लोशन असायचं. आणि गंमत म्हणजे त्याचे कुठले साईड इफेक्ट कधी व्हायचे नाहीत.

घसा दुखत असला की लवंग भाजून पूड करायची ती मधात खलून त्याच चाटण करून द्यायची.

सुंठ पूड विकत मिळायची. पण ती महाग असायची. आजी घरीच खलबत्त्यात सुंठ कुटायची. गरम पाण्यात साखर, सुंठपुड घालून ती प्यायला द्यायची. गवती चहा पाण्यात घालून त्याच्यात अजून काही काही घालून त्याचे काढे आम्हाला प्यायला द्यायची.

एवढ्या तेवढ्याला डॉक्टरांकडे जायचं नाही हे ठरलेलं असायचं. ताप आला तर मात्र डॉक्टरांना दाखवायच.

जवळच सिंधूताई आपटे यांचा दवाखाना होता. त्यांच्याकडे गेलं की त्या आ करायला सांगून जीभ बघायच्या. श्वास आत बाहेर करायला सांगून छाती तपासायच्या. बसं ईतकच… लगेच त्यांच्याकडच्या तयार असलेल्या पांढऱ्या गोळ्यांच्या पुड्या द्यायच्या. सोबत औषधाची बाटली… त्यावर शंकरपाळ्याच्या आकाराचा पांढरा कागद डोस किती घ्यायचा याच्या खुणेसाठी चिटकवलेला असायचा. त्यातल लालसर गोड औषध आम्हाला फार आवडायचं. दोन दिवसात ताप गायबच व्हायचा.

खेळताना भावाचा पाय मुरगळला आणि सुजला होता. आईनी लगेच रक्तचंदनाची बाहुली सहाणे वर उगाळायला घेतली. त्याचा घट्ट लेप भावाच्या पायाला लावला. ” जसजसं वाळेल तसं आकसून सूज आपोआप कमी होईल. “ती म्हणाली आणि खरंच तीन-चार दिवस लेप लावल्यानंतर सूज उतरूनच गेली.

कधी पाय दुखायला लागला की आजी तिळाच तेल लावून चोळायला सांगायची. घसा दुखत असला की गरम हळद दूध ती देत असे.

“गरम तव्यावर फडक गरम करून त्याने छाती शेकली की कफ सुटतो आणि खोकला लगेच बरा होतो. “आजी हे इतकं ठामपणे सांगायची की आम्हाला ते ऐकूनच बरं वाटायला लागायचं.

पाळी आली की पोटात दुखतय म्हंटलं तर आई सांगायची,

“प्रत्येक बाईला त्या दिवसात दुखत असतं. बाईंनी तेवढं सहन करायला शिकायलाच पाहिजे. त्यासाठी औषध घ्यायचं नाही. पुढं बाळंतपणाच्या कळा सोसायला बाईच शरीर तयार होत असतं. ” आईच्या या वाक्याचा अर्थ पुढे फार उशिरा कळला.

सायकल शिकताना गुडघे फुटणार.. हे इतकं गृहीत धरलं होतं की त्याचं काहीच वाटायचं नाही. नुसतं पाण्याने धुऊनही गुडघे बरे व्हायचे.

वर आजी म्हणायची, ” पडो झडो माल वाढो”.

वडिलांची पाठ दुखायला लागली की ते भिंतीजवळ पालथे झोपत. मग मी भिंतीचा आधार घेऊन त्यांच्या पाठीवर ऊभ राहून इकडे तिकडे अस करत चेपुन देत असे. आता हा ऊपचार आठवला तरी गंमत वाटते.

सकाळी झालेला आजार आजीच औषध घेऊन संध्याकाळी एकदम बरा होऊन जायचा. शाळा बुडवली असेल तर आज बाईंनी काय शिकवलं ते विचारायला संध्याकाळी मैत्रिणीकडे पळायच. इतक सोप जगणं होत.

आत्ताही बरं वाटलं नाही की आई आजींची औषधचं आधी मी घेऊन बघते…

त्या औषधात माया, आपुलकी, प्रेम होतं. त्या औषधाने मला बरं वाटणार… ही श्रद्धा पण होती. शरीराला मनाची साथ असल्याने आजार बरे व्हायचे. आईच्या उबदार कुशीत झोपताना आईचा हात कपाळावरून फिरला की निम्म दुखणे तिथेच पळून जायचं…

किती गोड दिवस होते ते…

 म्हणूनच त्या आठवणी आज तुम्हाला वाचण्यासाठी पेटीतून बाहेर काढल्या…

©  नीता चंद्रकांत कुलकर्णी

मो 9763631255

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

Please share your Post !

Shares

मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ कालगणना आणि दिनदर्शिका… ☆ श्री जगदीश काबरे ☆

श्री जगदीश काबरे

? इंद्रधनुष्य ?

☆ कालगणना आणि दिनदर्शिका… ☆ श्री जगदीश काबरे ☆

भारतातील कालगणनेचा इतिहास हा केवळ दिवस, महिने आणि वर्षे मोजण्याचा तांत्रिक प्रश्न नसून तो मानवी संस्कृती, धर्म, शेती, राज्यव्यवस्था आणि वैज्ञानिक समज यांच्याशी घट्ट जोडलेला आहे. मानवाने ज्या क्षणी ऋतूंचे पुनरावर्तन, चंद्राची कला आणि सूर्याच्या गतीचा अभ्यास सुरू केला, त्या क्षणी कालगणनेची गरज निर्माण झाली. भारतीय उपखंडात ही प्रक्रिया अतिशय प्राचीन काळात सुरू झालेली दिसते. वैदिक काळातच दिवस, रात्र, मास, ऋतू आणि वर्ष यांचा उल्लेख आढळतो. ऋग्वेद, यजुर्वेद आणि ब्राह्मणग्रंथांमध्ये चंद्राच्या कलांवर आधारित मासांची आणि सूर्याच्या गतीवर आधारित ऋतूंची सूक्ष्म निरीक्षणे नोंदलेली आहेत. त्यामुळे भारतातील कालगणनेचा पाया हा खगोलशास्त्रीय निरीक्षणांवर आधारित होता, केवळ धार्मिक कर्मकांडापुरता मर्यादित नव्हता.

प्राचीन भारतात पंचांग ही संकल्पना विकसित झाली. पंचांग म्हणजे पाच अंगांवर आधारित कालगणना—तिथी, वार, नक्षत्र, योग आणि करण. यातील तिथी ही चंद्राच्या स्थितीवर आधारित असल्याने भारतीय पंचांग मुख्यतः चांद्र कालगणनेवर आधारित होते. अमावास्या ते पौर्णिमा आणि पुन्हा अमावास्या असा चंद्राचा एक फेरा म्हणजे एक मास अशी संकल्पना रूढ झाली. परंतु केवळ चांद्र मास स्वीकारल्यास ऋतूंचा मेळ बसत नाही, हे भारतीय खगोलशास्त्रज्ञांच्या लक्षात आले. चंद्रवर्ष हे सुमारे ३५४ दिवसांचे असते, तर सौरवर्ष सुमारे ३६५ दिवसांचे. त्यामुळे दरवर्षी सुमारे अकरा दिवसांचा फरक पडतो. हा फरक भरून काढण्यासाठी अधिक मासाची संकल्पना विकसित करण्यात आली. यामुळे भारतीय चांद्र-सौर पद्धतीचा जन्म झाला. धार्मिक सण, व्रते आणि विधी चांद्र मासांवर आधारित राहिले, तर ऋतूंची संगती राखण्यासाठी सौर गतीचा विचार करण्यात आला.

ही पंचांग व्यवस्था भारतीय समाजाच्या दैनंदिन जीवनाचा अविभाज्य भाग बनली. शेती, लग्ने, उत्सव, यात्रा, राजकीय निर्णय आणि युद्धसुद्धा शुभ तिथी-नक्षत्र पाहूनच ठरवले जात. त्यामुळे पंचांग हे फक्त दिनदर्शिका नसून समाजनियंत्रणाचे आणि सांस्कृतिक सलगतेचे साधन होते. प्रत्येक प्रांतात स्थानिक खगोलशास्त्रज्ञांनी आणि पंडितांनी आपापल्या पंचांगांची निर्मिती केली. त्यामुळे कालगणनेत एकसंघता न राहता विविधता निर्माण झाली. एकाच दिवशी वेगवेगळ्या पंचांगांमध्ये तिथीभेद आढळू लागला. ही विविधता धार्मिक दृष्ट्या स्वीकारली गेली, पण प्रशासकीय आणि वैज्ञानिक दृष्ट्या ती अडचणीची ठरू लागली.

जगाच्या इतर भागांतही कालगणनेचा विकास वेगवेगळ्या मार्गांनी झाला. प्राचीन इजिप्तमध्ये नाईल नदीच्या पुरावर आधारित सौर कालगणना विकसित झाली. बाबिलोनियन संस्कृतीत चांद्र-सौर पद्धत होती. ग्रीक आणि रोमन साम्राज्यांत सुरुवातीला चांद्र पद्धतीचा वापर झाला, पण पुढे सौर कालगणनेचे महत्त्व वाढले. रोमन सम्राट ज्युलियस सीझरने इ. स. पू. ४६ मध्ये ज्युलियन कॅलेंडर लागू केले, जे पूर्णतः सौरवर्षावर आधारित होते. मात्र या कॅलेंडरमध्ये वर्षाची लांबी थोडी जास्त धरली गेल्याने शतकानुशतके जाताना ऋतू आणि दिनांक यांत फरक पडू लागला.

हा फरक दुरुस्त करण्यासाठी १५८२ साली पोप ग्रेगरी तेराव्याने ग्रेगोरियन कॅलेंडर लागू केले. यात लीप इयरची सुधारित पद्धत स्वीकारली गेली. या कॅलेंडरमुळे सौरवर्ष आणि दिनदर्शिका यांचा मेळ अधिक अचूक बसला. सुरुवातीला हे कॅलेंडर केवळ ख्रिस्ती राष्ट्रांतच स्वीकारले गेले, पण व्यापार, वसाहतवाद आणि वैज्ञानिक संवाद यांमुळे हळूहळू ते जागतिक स्तरावर प्रचलित झाले. आधुनिक विज्ञान, उद्योग आणि जागतिक व्यवहारांसाठी एकसमान कालगणना आवश्यक असल्याने ग्रेगोरियन कॅलेंडर आंतरराष्ट्रीय मानक बनले.

भारतावर ब्रिटिश राजवटीत ग्रेगोरियन कॅलेंडरचा वापर प्रशासकीय पातळीवर सुरू झाला. न्यायालये, महसूल व्यवस्था, शिक्षण आणि लष्करी कारभार यासाठी इंग्रजी दिनदर्शिका वापरली जाऊ लागली. तरीही सामान्य जनतेच्या धार्मिक आणि सामाजिक जीवनात पंचांगाचे स्थान कायम राहिले. स्वातंत्र्यानंतर भारतासमोर प्रश्न उभा राहिला की, राष्ट्रीय ओळख जपणारी पण वैज्ञानिकदृष्ट्या सुसंगत अशी कालगणना कोणती असावी. पंडित जवाहरलाल नेहरू यांना वैज्ञानिक दृष्टिकोनावर आधारित आधुनिक भारत उभारायचा होता. त्याच वेळी भारतीय परंपरेची नाळ तोडायची नव्हती. याच पार्श्वभूमीवर ‘भारतीय राष्ट्रीय कालगणना’ किंवा ‘शक संवतावर आधारित राष्ट्रीय दिनदर्शिका’ तयार करण्याची कल्पना पुढे आली.

या उद्देशासाठी मेघनाथ साहा यांच्या अध्यक्षतेखाली एक समिती नेमण्यात आली. मेघनाथ साहा हे केवळ खगोलशास्त्रज्ञ नव्हते, तर विज्ञान आणि समाज यांचा मेळ घालणारे विचारवंतही होते. समितीने विविध भारतीय कालगणनांचा अभ्यास केला. अखेरीस शक संवतावर आधारित सौर कालगणना स्वीकारण्यात आली. या दिनदर्शिकेत चैत्र हा पहिला महिना मानण्यात आला आणि वर्षाची सुरुवात वसंत ऋतूशी जोडली गेली. हे महिने मराठी आणि इतर भारतीय सौर महिन्यांशी साधर्म्य राखणारे होते—चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ, श्रावण, भाद्रपद, आश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष, माघ आणि फाल्गुन. ही कालगणना पूर्णतः सौर असल्याने ऋतू आणि महिने यांचा मेळ अचूक बसत होता. १९५७ साली भारतीय राष्ट्रीय कालगणना अधिकृतपणे लागू करण्यात आली. सरकारी गॅझेट, आकाशवाणी आणि काही अधिकृत दस्तऐवजांमध्ये तिचा वापर सुरू झाला. मात्र ती सर्वसामान्य जीवनात फारशी प्रचलित झाली नाही. यामागे अनेक कारणे होती.

पहिले कारण म्हणजे जनमानसाची सवय. शतकानुशतके चालत आलेली पंचांग परंपरा आणि ब्रिटिश काळात रुजलेली ग्रेगोरियन दिनदर्शिका या दोन्हींच्या मध्ये राष्ट्रीय कालगणनेला स्वतंत्र सामाजिक अवकाश मिळाला नाही. सामान्यजनांसाठी धार्मिक सणांसाठी पंचांग आवश्यक होते आणि आधुनिक व्यवहारांसाठी ग्रेगोरियन कॅलेंडर अपरिहार्य होते.

दुसरे महत्त्वाचे कारण म्हणजे प्रशासकीय अर्धवटपणा. भारतीय राष्ट्रीय कालगणना सक्तीने लागू करण्यात आली नाही. सरकारी कार्यालयांतही तिचा वापर दुय्यम स्वरूपात राहिला. बहुतांश कागदपत्रांत ग्रेगोरियन दिनांकासोबत कंसात शक दिनांक दिला जाई. त्यामुळे लोकांना स्वतंत्रपणे ही कालगणना वापरण्याची गरजच वाटली नाही. शिक्षण व्यवस्थेतही तिचे सखोल शिक्षण देण्यात आले नाही. परिणामी नवीन पिढीला या दिनदर्शिकेशी भावनिक किंवा व्यावहारिक जडणघडण झाली नाही.

तिसरे कारण म्हणजे सांस्कृतिक आणि धार्मिक व्यवहार. भारतीय समाजात सण, व्रते आणि उत्सव अजूनही चांद्र तिथींवर आधारित आहेत. दिवाळी, होळी, गणेशोत्सव, एकादशी, शिवरात्र यांसारखे सण चंद्राच्या स्थितीवर अवलंबून आहेत. भारतीय राष्ट्रीय दिनदर्शिका सौर असल्याने ती या सणांची तिथी थेट सांगू शकत नाही. त्यामुळे सामान्य माणसासाठी पंचांग अपरिहार्यच राहिले. राष्ट्रीय कालगणना धार्मिक जीवनाशी जोडली गेली नाही.

चौथे कारण म्हणजे जागतिकीकरण. स्वतंत्र भारताने आंतरराष्ट्रीय व्यापार, कूटनीती, विज्ञान आणि तंत्रज्ञानाच्या क्षेत्रात प्रवेश केला. या सर्व क्षेत्रांत ग्रेगोरियन कॅलेंडर हेच आंतरराष्ट्रीय माध्यम होते. विमानसेवा, बँकिंग, शेअर बाजार, संगणक प्रणाली आणि इंटरनेट या सर्वांनी ग्रेगोरियन दिनदर्शिकाच स्वीकारली. अशा परिस्थितीत एक स्वतंत्र राष्ट्रीय कालगणना वापरणे व्यवहार्य वाटले नाही.

या सगळ्या प्रक्रियेमुळे आज आपण एका द्विधा स्थितीत सापडलो आहोत. धार्मिक-सांस्कृतिक जीवनासाठी चांद्र किंवा चांद्र-सौर पंचांग वापरले जाते, तर प्रशासकीय, वैज्ञानिक आणि जागतिक व्यवहारांसाठी ग्रेगोरियन सौर दिनदर्शिका वापरली जाते. भारतीय राष्ट्रीय कालगणना ही या दोहोंच्या मध्ये अडकून पडलेली आहे. ती वैज्ञानिकदृष्ट्या योग्य आणि भारतीय परंपरेशी सुसंगत असली, तरी तिचा वापर मर्यादित राहिला आहे. यातून एक महत्त्वाचा निष्कर्ष समोर येतो की, कालगणना ही केवळ तांत्रिक व्यवस्था नसून सामाजिक स्वीकारावर अवलंबून असते. कोणतीही दिनदर्शिका लोकांच्या दैनंदिन गरजांशी, श्रद्धांशी आणि व्यवहारांशी जोडली गेली नाही, तर ती कागदावरच मर्यादित राहते. भारतीय राष्ट्रीय कालगणनेच्या बाबतीत हेच घडले. ती वैज्ञानिकदृष्ट्या योग्य असली, तरी सामाजिकदृष्ट्या अपरिहार्य बनू शकली नाही.

आज आपण जी कालगणना स्वीकारली आहे ती मुख्यतः सौर मासावर आधारित आहे, कारण आधुनिक जीवनाला ऋतूंची अचूकता, वेळेची एकसंधता आणि जागतिक सुसंगती आवश्यक आहे. चांद्र कालगणना भावनिक आणि धार्मिक पातळीवर महत्त्वाची राहिली आहे, पण ती आधुनिक प्रशासनासाठी पुरेशी नाही. भारतीय राष्ट्रीय दिनदर्शिका हा एक समन्वयाचा प्रयत्न होता—भारतीय महिने आणि सौर शास्त्र यांचा मेळ घालणारा. मात्र तो प्रयत्न अपूर्ण राहिला असे म्हणावे लागेल. चंद्राच्या कलांपासून सूर्याच्या अचूक गतीपर्यंतचा मानवाचा हा प्रवास म्हणजे अंधश्रद्धेपासून निरीक्षण, गणित आणि विज्ञानाकडे झालेली वाटचाल आहे. प्रत्येक धर्माची कालगणना त्याच्या काळातील गरजांची पूर्तता करत होती. मात्र आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोनातून पाहता, सौर कालगणना हीच सर्वाधिक अचूक, स्थिर आणि सार्वत्रिक ठरते, तर चांद्र कालगणना ही सांस्कृतिक आणि धार्मिक परंपरेचा अविभाज्य भाग म्हणून आजही आपले स्थान टिकवून आहे. भविष्यात या कालगणनेचे पुनर्मूल्यांकन होऊ शकते. डिजिटल युगात अनेक कालगणना एकत्र वापरणे शक्य आहे. परंतु त्यासाठी केवळ सरकारी आदेश नव्हे, तर सामाजिक संवाद, शिक्षण आणि सांस्कृतिक पुनर्संवाद आवश्यक आहे. कालगणनेचा इतिहास आपल्याला हेच शिकवतो की वेळ मोजण्याची पद्धत ही मानवी गरजांनुसार बदलत जाते. चंद्रापासून सूर्यापर्यंत आणि स्थानिकतेपासून जागतिकतेपर्यंतचा हा प्रवास म्हणजे मानवी संस्कृतीच्या विकासाचा आरसाच आहे.

© श्री जगदीश काबरे

मो ९९२०१९७६८०

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

Please share your Post !

Shares