English Literature – Poetry ☆ Horizon… ☆ Captain Pravin Raghuvanshi, NM ☆

Captain Pravin Raghuvanshi, NM

(Captain Pravin Raghuvanshi —an ex Naval Officer, possesses a multifaceted personality. He served as a Senior Advisor in prestigious Supercomputer organisation C-DAC, Pune. He was involved in various Artificial Intelligence and High-Performance Computing projects of national and international repute. He has got a long experience in the field of ‘Natural Language Processing’, especially, in the domain of Machine Translation. He has taken the mantle of translating the timeless beauties of Indian literature upon himself so that it reaches across the globe. He has also undertaken translation work for Shri Narendra Modi, the Hon’ble Prime Minister of India, which was highly appreciated by him. He is also a member of ‘Bombay Film Writer Association’.

We present Capt. Pravin Raghuvanshi ji’s amazing poem “~ Horizon ~.  We extend our heartiest thanks to the learned author Captain Pravin Raghuvanshi Ji (who is very well conversant with Hindi, Sanskrit, English and Urdu languages) and his artwork.) 

? ~ Horizon… ??

Small canvases,

they say,

are my poems.

And she, in her

   innocent wonder,

believes I shape

only her

into my verses…

Little do they know

If only I could write

her completely—

the canvas of my poetry

would expand

beyond the horizon

into infinite consciousness..!

 

(Inspired by Shri Sanjay Bhardwaj Ji’s poem क्षितिज

हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि –  क्षितिज ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

~Pravin Raghuvanshi

 © Captain Pravin Raghuvanshi, NM

Pune

≈ Editor – Shri Hemant Bawankar/Editor (English) – Captain Pravin Raghuvanshi, NM ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – समाधान… ☆ सुश्री नरेंद्र कौर छाबड़ा ☆

सुश्री नरेंद्र कौर छाबड़ा

(सुप्रसिद्ध हिंदी साहित्यकार सुश्री नरेन्द्र कौर छाबड़ा जी पिछले 40 वर्षों से अधिक समय से लेखन में सक्रिय। 5 कहानी संग्रह, 1 लेख संग्रह, 2 लघुकथा संग्रह, 1 पंजाबी कथा संग्रह 1 तमिल में अनुवादित कथा संग्रह,मराठी में अनुवादित लघुकथा संग्रह, मराठी में अनुवादित  कहानी संग्रह, कुल 12 पुस्तकें प्रकाशित।  पहली पुस्तक मेरी प्रतिनिधि कहानियाँ को केंद्रीय निदेशालय का हिंदीतर भाषी पुरस्कार। एक और गांधारी तथा प्रतिबिंब कहानी संग्रह को महाराष्ट्र हिन्दी साहित्य अकादमी का मुंशी प्रेमचंद पुरस्कार 2008 तथा २०१७। प्रासंगिक प्रसंग पुस्तक को महाराष्ट्र अकादमी का काका कालेलकर पुरस्कार 2013 । लेखन में अनेकानेक पुरस्कार। आकाशवाणी से पिछले 45 वर्षों से रचनाओं का प्रसारण। लेखन के साथ चित्रकारी, समाजसेवा में भी सक्रिय । महाराष्ट्र बोर्ड की 10वीं कक्षा की हिन्दी लोकभारती पुस्तक में 2 लघुकथाएं शामिल 2018)

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – समाधान

? लघु कथा – समाधान ? सुश्री नरेंद्र कौर छाबड़ा ?

पांचवी कक्षा में पढ़ने वाला आशीष शाम को चार बजे घर लौटता तो स्कूल बैग, यूनिफॉर्म और जूते उतारने  के बाद अलमारी में से अपना मोबाइल निकालता और डाइनिंग टेबल पर पहुंच जाता.

दादी गीता उसे गर्म गर्म नाश्ता बना कर देती. वह नाश्ता खाते-खाते लगातार मोबाइल में आ रहे गेम्स खेलने लगता. गीता जी को बहुत बुरा लगता .एक दो बार उन्होंने टोक भी दिया – “बेटा खाते समय मोबाइल को कुछ देर साइड में रख दिया करो…” लेकिन वह उनकी बात को अनसुना करके अपने मोबाइल में ही व्यस्त रहता.

आज फिर उसके मोबाइल देखने पर गीता ने कह दिया- ” बेटा, थोड़ी देर मोबाइल रख दो ना. मुझसे बात करो मैं भी तो यहीं बैठी हूं…” एकाएक वह गुस्से से भड़क उठा- ” मुझे  दो घंटे बाद ट्यूशन पर जाना है फिर मोबाइल कब देखूंगा..? और आपके साथ  मैं क्या बात करूं..? हमेशा मेरे पीछे पड़ी रहती हो मोबाइल मत देखो..…आप अपना काम करो और मुझे मोबाइल देखने दो….”

और वह फिर से मोबाइल देखने में व्यस्त हो गया. अपने पोते के व्यवहार से गीता जी भीतर तक आहत हो  गईं. उनकी आंखें भीग गईं.

रात को बेटे बहू को उन्होंने पूरा किस्सा सुनाया तो दोनों एकदम चुप हो गए और एक दूसरे का मुंह देखने लगे.

अगले दिन शाम को ऑफिस से लौटने पर बहू बेटे ने गीता जी के हाथ में एक मोबाइल फोन रख दिया और बोले – ” मां,अब आप भी अपने आप को इसमें व्यस्त कर लो… हमारे पास यही एक समाधान है…”

© नरेन्द्र कौर छाबड़ा

संपर्क –  सी-१२०३, वाटर्स एज, विशालनगर, पिंपले निलख, पुणे- ४११०२७ (महाराष्ट्र) मो.  9325261079 

Email-  narender.chhabda@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆  “कविता भी तुम्हें देखती है” – श्री जयपाल ☆ समीक्षा – श्री मोहन बेगोवाल ☆

श्री मोहन बेगोवाल

पुस्तक चर्चा ☆ “कविता भी तुम्हें देखती है” – श्री जयपाल ☆ समीक्षा – श्री मोहन बेगोवाल

पुस्तक – कविता भी तुम्हें देखती है

कवि : जयपाल

प्रकाशक: यूनिक पब्लिशर्स, कुरुक्षेत्र

मूल्य: ₹199/-

पृष्ठ: 150

☆ जयपाल की कविता, समय के सच का शब्द चित्र है — श्री मोहन बेगोवाल ☆

जयपाल जी का सद्य-प्रकाशित कविता संग्रह “कविता भी तुम्हें देखती है” समकालीन कविता के परिदृश्य में एक अत्यंत सटीक और मर्मस्पर्शी हस्तक्षेप है। यह संग्रह न केवल आज के दौर की विसंगतियों को रेखांकित करता है, बल्कि उस बेचैनी को भी स्वर देता है जिसे एक संवेदनशील नागरिक अनवरत महसूस कर रहा है।

जहाँ आज के पूंजीवादी युग का ‘बुलडोजर’ मानवीय संवेदनाओं को कुचलने पर आमादा है, वहीं जयपाल जी की कविताएँ मनुष्यता को केंद्र में लाने का सार्थक प्रयास करती हैं। ये कविताएँ केवल शब्द-शिल्प नहीं, बल्कि व्यवस्था की आक्रामकता के विरुद्ध एक ‘नैतिक ढाल’ के रूप में खड़ी होती हैं। कवि की लेखनी सत्ता और विद्रूपताओं के बीच फँसे साधारण मनुष्य की रक्षा की गुहार लगाती है।

श्री जयपाल

(सुप्रसिद्ध लेखक श्री जयपाल जी पंजाब शिक्षा विभाग से सेवानिवृत्त अध्यापक हैं। आपका एक कविता संग्रह ‘दरवाजों के बाहर‘  आधार प्रकाशन  से प्रकाशित। (इस संग्रह पर कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र में शोधकार्य), कुछ कविताएं पंजाबी में  अनुदित (पुस्तक रूप में प्रकाशित)।पत्र-पत्रिकाओं में लगातार रचनाएं प्रकाशित। देस-हरियाणा पत्रिका (कुरुक्षेत्र) के सह संपादक  प्रदेशाध्यक्ष- जनवादी लेखक संघ हरियाणा।)

संग्रह की विशेषता इसकी वे छोटी कविताएँ हैं, जो अपने कलेवर में लघु हैं किंतु प्रभाव में बेहद तीक्ष्ण। जैसा कि अक्सर कहा जाता है, ‘घाव करे गंभीर’—ये कविताएँ पाठक को केवल झकझोरती नहीं, बल्कि उसे आत्म-मंथन और सामाजिक चेतना के उस पड़ाव पर ले जाती हैं जहाँ वह व्यवस्था से प्रश्न करने का साहस जुटा पाता है।

इन कविताओं में सत्ता के उन विविध रूपों की शिनाख्त की गई है जिनका सीधा प्रभाव मानवीय नियति पर पड़ता है। कवि ने बड़ी ही सूक्ष्मता से रेखांकित किया है कि कैसे वर्तमान परिवेश में व्याप्त ‘भय’ धीरे-धीरे मानवीय प्रवृत्तियों का हिस्सा बनता जा रहा है। इन अमानवीय स्थितियों के बीच भी जयपाल जी की कविताएँ ‘मनुष्यता की तलाश’ को जीवित रखती हैं।

यह संग्रह पारंपरिक साँचों को तोड़कर एक नया मार्ग प्रशस्त करता है। पुस्तक के शुरुआती 20 पृष्ठों में समाहित विद्वानों के लेख पाठक को कविताओं की पृष्ठभूमि समझने में मदद करते हैं। संग्रह की अनूठी विशेषता यह है कि अधिकांश कविताएँ ‘स्नैपशॉट’ (लघु बिम्ब) शैली में हैं और प्रत्येक कविता के साथ एक संबंधित चित्र दिया गया है, जो कविता के प्रभाव को द्विगुणित कर देता है।

“कविता भी तुम्हें देखती है” मात्र एक साहित्यिक कृति नहीं, बल्कि एक जागरूक लेखक का वैचारिक घोषणापत्र है। संग्रह की 150 पृष्ठों की यह यात्रा पाठक के मन में केवल उत्तर ही नहीं छोड़ती, बल्कि अनिवार्य ‘सवाल’ भी खड़े करती है। जब कविता वाक्य की परिधि लांघकर ‘असर’ करने लगे, तो समझ लेना चाहिए कि कवि समय की नब्ज थामने में सफल रहा है।

जयपाल जी की सादगी भरी भाषा पाठकों के सीधे हृदय में उतरती है और उन्हें अपने परिवेश के प्रति अधिक सचेत बनाती है।जयपाल जी की कविताओं की सबसे बड़ी शक्ति यह है कि जब कविता समाप्त होती है, तब पाठक के भीतर एक ‘वैचारिक विस्फोट’ होता है। ये रचनाएँ पाठक की चेतना को इस कदर झकझोरती हैं कि वह स्वयं को उन दृश्यों का हिस्सा मानने लगता है। जिसे समाज अक्सर अनदेखा कर देता है। यहाँ कविता वाक्य की परिधि लांघकर साक्षात जीवन बन जाती है।

जब कविता केवल कल्पना न रहकर ‘आज के दौर का दस्तावेज’ बन जाती है, तो वह साहित्य के साथ-साथ इतिहास और समाजशास्त्र का भी हिस्सा हो जाती है।जयपाल जी को इस शानदार उपलब्धि के लिए हमारी ओर से भी बहुत-बहुत बधाई!

समीक्षा – श्री मोहन बेगोवाल

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सलिल प्रवाह # २६९ – कविता – जोगी जी ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है अप्रतिम रचना  जोगी जी)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २६९ ☆

जोगी जी ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

सदाचार का डालिए,

चौक रंगीला द्वार।

सद्भावों की फाग गा,

मेटें सब तकरार।।

जोगी जी सा रा रा रा

बाधाओं की लकड़ियाँ,

दें होरी में बार।

पीर गुलेरी सब जलें,

बचे न एकऊ खार।।

जोगी जी सारा रा रा

राजनीति की होलिका,

करे नहीं तकरार।

नेता-अफसर कर सकें, लोकनीति से प्यार।।

जोगी जी सारा रा रा

भुज भरकर मिलिए गले,

बढ़े खूब अपनत्व।

संसद से दूरी मिटे,

बढ़े खूब बंधुत्व।।

जोगी जी सा रा रा रा

सुख पिचकारी दें भिगा,

रंग हर्ष का, डाल।

मस्तक पर शोभित रहे,

यश का लाल गुलाल।।

जोगी जी सा रा रा रा

हिंदी मैदा माढ़िए,

उर्दू मोयन डाल।

देशज मेवाएँ भरें,

गुझिया बने कमाल।।

जोगी जी सा रा रा रा

परंपरा बेसन बने,

नवाचार हो तेल।

खांय-खिलाएँ पपड़ियाँ,

जी भर होली खेल।।

जोगी जी सा रा रा रा

कविता पिचकारी बना,

भरें छंद का रंग।

रस-लय की ठण्डाई पी,

करें गीत गा जंग।।

जोगी जी सा रा रा रा

फाग कबीरा गाइए, भर मस्ती में झूम।

ढोल-मँजीरा बजाएँ, खूब मचाएँ धूम।।

जोगी जी सा रा रा रा

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

१३.३.२०२५

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९३० ⇒ कुम्हार का गधा ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “कुम्हार का गधा।)

?अभी अभी # ९३० ⇒ आलेख – कुम्हार का गधा ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

एक समय था जब गधा इतना अकेला नहीं था। सबसे बड़ा बोझ अकेलेपन का होता है। क्या दिन थे वे भी, जब एक गधा भी पीठ पर बोझा लादे शान से कुम्हार के साथ चलता था। लेकिन समय का फेर देखिए। आज कुम्हार भी उसका साथ छोड़ गया। एक कुत्ते की तरह वह भी न कुम्हार के घर का रहा, न ईंट के भट्टे का। एक कुत्ते के तो फिर भी दिन बदल गए, लेकिन बेचारे गधे को तो किसी ने घास तक नहीं डाली।

अगर आपकी याददाश्त अच्छी हो तो आपने भी यदाकदा एक गधे को कुम्हार के मटकों के साथ सजा धजा सड़कों पर निकलते देखा होगा। गधे की पीठ पर एक रस्सियों की जाल में ठंडे पानी के मटके लदे हुए रहते थे। कुम्हार पति पत्नी दोनों मटके बेचने, गधे के साथ ही निकलते थे। कुम्हार पति मटकों की होम डिलीवरी करता और कुम्हार की पत्नी गधे और मटकों की रखवाली करती हुई आवाज लगा लगाकर मार्केटिंग करती थी।।

गधा शुरू से ही मेहनती रहा है। गधा हम्माली के लिए तो वह अभिशप्त है ही, लेकिन आज उसके नसीब में बोझा ढोना भी नहीं लिखा है। जो पूछ परख उसकी गांव में कभी थी, वह आज शहरों में कहां। बेचारी गऊ माता तक को इन शहरियों ने आवारा पशु समझ गोशाला में पहुंचा दिया तो उसकी क्या औकात। उसकी हालत तो एक कुत्ते और सुअर से भी गई बीती हो गई है। कुछ कस्बे टाइप जिलों में उसे आज भी सड़कों पर विचरने की छूट मिली हुई है, लेकिन वह कोई गाय या कुत्ता नहीं, जो कोई उस पर तरस खाकर दो रोटी ही डाल दे। वह तो पूरी तरह से घास पर ही निर्भर है। सबका मालिक एक होगा, लेकिन आज एक गधे का कोई मालिक नहीं।

जब आज मजदूर को ही मजदूरी नहीं मिल रही है तो बड़े बड़े डंपर, और आइशर वाहन छोड़, कौन गधे की पीठ पर ईंटें लादेगा। कुम्हार ने भी एक चार पहिए वाला ठेला खरीद लिया है, ऐसे में यह चार पांव वाला गधा किस काम का।

एक गधे से तो टट्टू और खच्चर अच्छा जो किसी काम तो आता है। एक व्यस्त घोड़ा भले ही घास से यारी ना करे, लेकिन एक उपेक्षित गधे के पास तो घास से यारी के अलावा कोई विकल्प ही नहीं बचा है। सरकार को सबके रोजगार की चिंता है, एक गधा कहां का मतदाता है जो सरकार उसके भी रोजगार की घोषणा करे।।

केवल एकमात्र कृश्न चंदर ही ऐसे लेखक हुए हैं जिन्होंने न केवल एक गधे की आत्मकथा लिख इस प्राणी को अमर किया, अपितु उसे संसद तक में प्रवेश दिलवा दिया।

ईश्वर की इस सृष्टि में कोई प्राणी अनुपयोगी नहीं। अतः कोई आश्चर्य नहीं अगर पुस्तक मेले की तरह गधों का भी मेला लगता हो, उनकी भी खरीद फरोख्त होती हो। अजी गधों की तो बोली भी लगती है। जरूर गधों में भी कुछ श्रेष्ठ गधे होंगे, जो पारखी निगाहों से बच नहीं पाते होंगे।।

गधा न तो किसी सम्मान का भूखा है तथा न ही इसमें अस्मिता बोध ही है। एक कुम्हार शायद इसके मनोविज्ञान से वाकिफ हो, वैसे किसी कुत्ते अथवा गाय की तरह इसे इसके नाम से पुकारा जाए, तो भी यह किसी को ज्यादा भाव नहीं देता।

काश इसे यह पता होता कि इसकी कुछ खूबियों के कारण कुछ इंसानों की इस प्राणी से तुलना की जाती है। अगर इसे यह बात पता भी चल जाए, तो भी शायद इसके मुंह से ये शब्द तो फिर भी कतई ना निकले ;

गधा खुश हुआ ..!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ दोहे फागुन के ☆ प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे ☆

प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे

☆ दोहे फागुन के ☆ प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे

फागुन आया देह में, जागी आज उमंग।

मन उल्लासित हो गया, फड़क उठा हर अंग।।

*

फागुन लेकर आ गया, प्रीति भरा संदेश।

जियरा को जो दे रहा, मिलने का आवेश।।

*

फागुन की अठखेलियाँ, होली का पैग़ाम।

हर कोई लिखने लगा, चिठिया प्रिय के नाम।।

*

फागुन की मदहोशियाँ, छेड़ें मीठी तान।

हल्का जाड़ा कर रहा, अनुबंधों का मान।।

*

सरसों में आकर्ष है, महुये में है काम।

पवन नेह ले कर रहा, कर्म आज अविराम।।

*

फागुन लिए तरंग है, सबकी बदली चाल।

मौसम ने ऐसा किया, कुछ तो आज कमाल।।

*

बहके-बहके लोग हैं, संयम रहा न आज।

फागुन करने लग गया, हर दिल पर तो राज।।

*

फागुन रंगारंग है, बजें आज तो चंग।

संतों के मन भी चढ़ा, साहचर्य का रंग।।

*

यौवन है हर भाव पर, टूटे सारे बंध।

है स्वच्छंद मधुमास अब, अवमानित सौगंध।।

       

© प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे

प्राचार्य, शासकीय महिला स्नातक महाविद्यालय, मंडला, मप्र -481661

(मो.9425484382)

ईमेल – khare.sharadnarayan@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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ज्योतिष साहित्य ☆ साप्ताहिक राशिफल (2 मार्च से 8 मार्च 2026) ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆

ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय

विज्ञान की अन्य विधाओं में भारतीय ज्योतिष शास्त्र का अपना विशेष स्थान है। हम अक्सर शुभ कार्यों के लिए शुभ मुहूर्त, शुभ विवाह के लिए सर्वोत्तम कुंडली मिलान आदि करते हैं। साथ ही हम इसकी स्वीकार्यता सुहृदय पाठकों के विवेक पर छोड़ते हैं। हमें प्रसन्नता है कि ज्योतिषाचार्य पं अनिल पाण्डेय जी ने ई-अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों के विशेष अनुरोध पर साप्ताहिक राशिफल प्रत्येक शनिवार को साझा करना स्वीकार किया है। इसके लिए हम सभी आपके हृदयतल से आभारी हैं। साथ ही हम अपने पाठकों से भी जानना चाहेंगे कि इस स्तम्भ के बारे में उनकी क्या राय है ? 

☆ ज्योतिष साहित्य ☆ साप्ताहिक राशिफल (2 मार्च से 8 मार्च 2026) ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆

मैं पंडित अनिल पाण्डेय ने आपसे वादा किया था कि मैं हर सप्ताह आपको श्री हनुमान चालीसा के चौपाइयों के संपुट पाठ से होने वाले होने वाले मंत्रवत फल के बारे में आपको बताऊंगा। इसी श्रेणी में आज की चौपाई है।

“राम दूत अतुलित बल धामा, अंजनि पुत्र पवनसुत नामा।। “

हनुमान चालीसा की इस चौपाई के संपुट पाठ करने पर हनुमत कृपा से आत्मिक और शारीरिक बल की प्राप्ति होती है।

अगली चौपाई के संपुट पाठ से प्राप्त होने वाले फल के बारे में इस वीडियो के अंत में बताया जाएगा।

अब मैं आपको इस सप्ताह ग्रहों की स्थिति के बारे में बताऊंगा। इस पूरे सप्ताह सूर्य, मंगल, राहु और वक्री बुध कुंभ राशि में रहेंगे। वक्री गुरु मिथुन राशि में और शनि मीन राशि में गोचर करेंगे। शुक्र प्रारंभ में कुंभ राशि में रहेगा तथा एक तारीख के 11:46 रात से मीन राशि में प्रवेश करेगा। आईये अब राशिवार राशिफल की चर्चा करते हैं।

मेष राशि

इस सप्ताह सावधानी पूर्वक कार्य करने पर आपको कचहरी के कार्यों में सफलता प्राप्त हो सकती है। आपको अपने संतान का अच्छा सहयोग प्राप्त होगा। भाई बहनों के साथ नरम-गरम संबंध रहेंगे। गलत रास्ते से धन आ सकता है। इस सप्ताह आपके लिए 7 और 8 तारीख विभिन्न प्रकार के कार्यों के लिए सफलता दायक है। चार तारीख के दोपहर के बाद से पांच और 6 तारीख को आपको सावधान रहकर कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन राम रक्षा स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।

वृष राशि

इस सप्ताह आपके पास धन आने का योग है। थोड़े से प्रयास से ही आपके पास धन आ सकता है। कर्मचारी और अधिकारियों के लिए यह सप्ताह मिश्रित फल वाला होगा। आपको अपने साथियों का सहयोग कम मिलेगा। आपके कार्यालय में सावधान भी रहना चाहिए। भाई और बहनों के साथ संबंध ठीक-ठाक रहेंगे। इस सप्ताह आपके लिए दो-तीन और चार तारीख कार्यों को करने के लिए मददगार है। 7 और 8 तारीख को आपको बहुत सचेत रहकर कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।

मिथुन राशि

अगर आप अधिकारी या कर्मचारी हैं तो आपके लिए यह सप्ताह अच्छा रहेगा। स्वास्थ्य ठीक-ठाक रहने की संभावना है। पिताजी और जीवनसाथी का स्वास्थ्य भी ठीक रहेगा। कचहरी के कार्यों में सावधान रहें। भाई बहनों के साथ संबंध ठीक रहेंगे। माता जी का स्वास्थ्य थोड़ा खराब हो सकता है। भाग्य के स्थान पर अपने परिश्रम पर विश्वास करें। इस सप्ताह आपके लिए चार-पांच और 6 तारीख कार्यों को करने के लिए लाभदायक है। सप्ताह के बाकी दिन भी ठीक-ठाक है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन तांबे के पात्र में जल अक्षत और लाल पुष्प लेकर भगवान सूर्य को जल अर्पण करें। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।

कर्क राशि

इस सप्ताह आपका आपके माता जी और पिताजी का तथा जीवनसाथी का स्वास्थ्य ठीक रहेगा भाग्य से आपको मदद मिलेगी दुर्घटनाओं से बचने का प्रयास करें धन आनंद धन आने की उम्मीद है भाई बहनों के साथ संबंधों में तनाव बढ़ सकता है। शत्रु शांत रहेंगे परंतु समाप्त नहीं होंगे इस सप्ताह आपके लिए साथ और आठ मार्च किसी भी कार्य को करने के लिए फलदायक है सप्ताह के बाकी दिन भी ठीक-ठाक है इस सप्ताह आपको चाहिए कि आपका दिन प्रतिदिन आदित्य हृदय स्त्रोत का पाठ करें सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।

सिंह राशि

इस सप्ताह आपका स्वास्थ्य ठीक रहेगा। भाग्य से सामान्य मदद ही मिल पाएगी। थोड़े बहुत धन की उम्मीद की जा सकती है। भाई बहनों के साथ संबंधों में कोई विशेष प्रगति नहीं होगी, अर्थात जैसे संबंध चल रहे हैं वैसे ही रहेंगे। कर्मचारियों को उनके सहकर्मियों की मदद मिलेगी। इस सप्ताह आपको अपने परिश्रम पर ज्यादा यकीन करना पड़ेगा। व्यापारियों का व्यापार ठीक चलेगा। इस सप्ताह आपके लिए दो, तीन और चार तारीख कार्यों को करने के लिए अनुकूल है। सप्ताह के बाकी दिन भी ठीक-ठाक हैं। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गाय को हरा चारा खिलाएं। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवार है।

कन्या राशि

अविवाहित जातकों के लिए यह सप्ताह काफी अच्छा रहेगा। विवाह के नए-नए प्रस्ताव आएंगे। प्रेम संबंधों में वृद्धि एवं नए प्रेम संबंध बनना भी संभव है। आपके माता-पिता और जीवनसाथी का स्वास्थ्य ठीक रहेगा। भाग्य से थोड़ी मदद मिल सकती है। कचहरी के कार्यों में ध्यानपूर्वक कार्य करने से सफलता मिल सकती है। आपके स्वास्थ्य में थोड़ी खराबी हो सकती है। इस सप्ताह आपके लिए 5 और 6 तारीख कार्यों को करने के लिए उपयुक्त है। दो-तीन और चार के दोपहर तक का समय सावधान रहने का है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन लाल मसूर की दाल का दान करें तथा मंगलवार को हनुमान जी के मंदिर में जाकर हनुमान जी का पूजन करें। सप्ताह का शुभ दिन शुक्रवार है।

तुला राशि

इस सप्ताह आपका, आपके जीवन साथी का और माता जी तथा पिताजी का स्वास्थ्य ठीक रहेगा। भाग्य से मामूली मदद मिल सकती है। आपको इस सप्ताह अपने पुत्र पर ध्यान देना चाहिए। छात्रों की पढ़ाई में काफी उथल-पुथल रहेगी। शत्रुओं से संधि करने का यह सबसे अच्छा समय है। अगर आपके कोई शत्रु हैं तो आपको इस समय संधि के लिए प्रयास करना चाहिए। कचहरी के कार्यों में कोई भी रिस्क ना लें। इस सप्ताह आपके लिए सात और आठ मार्च किसी भी कार्य को करने के लिए परिणाम दायक हैं। चार-पांच और 6 तारीख को आपको होशियार रहकर कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन हनुमान चालीसा का पाठ करें तथा शनिवार को दक्षिण मुखी हनुमान जी के मंदिर में जाकर कम से कम तीन बार हनुमान चालीसा का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन शनिवार है।

वृश्चिक राशि

यह सप्ताह आपके पुत्र के लिए काफी अच्छा रहेगा। उसको तरक्की मिल सकती है। छात्रों की पढ़ाई उत्तम चलेगी। कर्मचारीयों और अधिकारियों के लिए यह सप्ताह ठीक है। उनको अपने साथियों और अधिकारियों से सहयोग प्राप्त होगा। जनप्रतिनिधियों के लिए यह सप्ताह थोड़ा कम ठीक है। उनके प्रतिष्ठा में कमी हो सकती है। इस सप्ताह आपके लिए 2-3 और 4 तारीख कार्यों को करने के लिए शुभ हैं। सात और 8 तारीख को आपको कोई भी कार्य बहुत सजगता पूर्वक करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन काली उड़द का दान करें तथा शनिवार को शनि मंदिर में जाकर शनि देव का पूजन करें। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवार है।

धनु राशि

इस सप्ताह आपके प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी। जनप्रतिनिधियों के लिए यह सप्ताह अच्छा रहेगा। उनका जन सम्मान बढ़ेगा। भाई बहनों के साथ संबंध ऊंच नीच के चलेंगे। भाग्य इस सप्ताह आपका साथ देगा। लंबी यात्रा का भी योग बन सकता है। कर्मचारीयों और अधिकारियों को इस सप्ताह सतर्क रहकर कार्य करना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए चार-पांच और 6 मार्च लाभप्रद हैं। सप्ताह के बाकी दिन भी ठीक-ठाक हैं। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन रुद्राष्टक का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन बृहस्पतिवार है।

मकर राशि

इस सप्ताह आपके पास धन आने की उम्मीद है। मात्र थोड़ी कम हो सकती है। भाई बहनों के साथ संबंध ठीक रहेगा। आपके पराक्रम में वृद्धि होगी। पेट के रोग में आराम मिल सकता है। आपको अपने संतान से इस सप्ताह कोई सहयोग प्राप्त नहीं हो पाएगा। भाग्य से कोई विशेष मदद नहीं मिलेगी। इस सप्ताह आपके लिए 7 और 8 तारीख कार्यों को करने के लिए उचित हैं। दो-तीन और चार तारीख को आपको सचेत रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन भगवान शिव का दूध और जल से अभिषेक करें। सप्ताह का शुभ दिन शनिवार है।

कुंभ राशि

आपके थोड़े से प्रयासों से ही इस सप्ताह आपके पास धन अच्छी मात्रा में आ सकता है। आपको इस सप्ताह अपने प्रतिष्ठा के प्रति सतर्क रहना चाहिए। जीवनसाथी का स्वास्थ्य उत्तम रहेगा। माता और पिताजी का स्वास्थ्य भी ठीक रहेगा। आपको अपने संतान से सहयोग प्राप्त हो सकता है। दुर्घटनाओं के प्रति सतर्क रहें। इस सप्ताह आपके लिए दो-तीन और चार तारीख के दोपहर तक का समय परिणाम दायक है। चार की दोपहर के बाद से लेकर 5 और 6 तारीख को आपको होशियार रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन भगवान शिव का दूध और जल से अभिषेक तथा रुद्राष्टक का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन शनिवार है।

मीन राशि

इस सप्ताह आपका आत्मविश्वास काफी अच्छा रहेगा। स्वास्थ्य भी ठीक रहेगा। अपने आत्मविश्वास के कारण आप कई स्थानों पर सफलता प्राप्त कर सकते हैं। आपका और आपके माता-पिता जी का स्वास्थ्य ठीक रहेगा। जीवनसाथी को थोड़ी परेशानी हो सकती है। कचहरी के काम कार्यों में बहुत सावधान रहें। इस सप्ताह आपके लिए चार की दोपहर के बाद से लेकर 5 और 6 तारीख कार्यों को करने के लिए उचित हैं। सप्ताह के बाकी दिनों में आपको सजग रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन शिव पंचाक्षरी मंत्र का जाप करें। सप्ताह का शुभ दिन बृहस्पतिवार है।

आईये अब हम श्रीहनुमान चालीसा के आज की दूसरी चौपाई के बारे में चर्चा करते हैं।

आज की दूसरी चौपाई है:-

“महाबीर बिक्रम बजरंगी, कुमति निवार सुमति के संगी। “

इस चौपाई के संपुट पाठ करने से व्यक्ति की मानसिक स्थिति ठीक होती है।

ध्यान दें कि यह सामान्य भविष्यवाणी है। अगर आप व्यक्तिगत और सटीक भविष्वाणी जानना चाहते हैं तो आपको मुझसे दूरभाष पर या व्यक्तिगत रूप से संपर्क कर अपनी कुंडली का विश्लेषण करवाना चाहिए। मां शारदा से प्रार्थना है या आप सदैव स्वस्थ सुखी और संपन्न रहें। जय मां शारदा।

 

 राशि चिन्ह साभार – List Of Zodiac Signs In Marathi | बारा राशी नावे व चिन्हे (lovequotesking.com)

निवेदक:-

ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय

(प्रश्न कुंडली विशेषज्ञ और वास्तु शास्त्री)

सेवानिवृत्त मुख्य अभियंता, मध्यप्रदेश विद्युत् मंडल 

संपर्क – साकेत धाम कॉलोनी, मकरोनिया, सागर- 470004 मध्यप्रदेश 

मो – 8959594400

ईमेल – 

यूट्यूब चैनल >> आसरा ज्योतिष 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ जि  व  ल  ग ! ☆ श्री प्रमोद वामन वर्तक ☆

श्री प्रमोद वामन वर्तक  

? कवितेचा उत्सव ?

🙏जि  व  ल  ग ! 🙏☆ श्री प्रमोद वामन वर्तक ☆

आता थांबवीन म्हणतो

जरा शब्दांशी खेळणे,

त्यांनी तरी किती नाचावे

सदा माझ्या मनाप्रमाणे!

*

कशी कोण जाणे याची

लागली शब्दांना कुणकुण,

रागावून सोडले त्यांनी

माझ्या डोक्यातील ठाणं!

*

गेले असेच दोन दिवस

सरल्या दोन रात्री,

तेपरतणे शक्य नाही

मज याची झाली खात्री!

*

पण आज पडली अवचित

थाप डोक्याच्या दारावर,

उघडून पाहता दिसले

माझेच मला जुने मैतर!

*

गळा भेट होता आमची

दोघे मनोमनी सुखावलो,

नाही सोडणार साथ कधी

एकमेका वचन देते झालो!

एकमेका वचन देते झालो!

© प्रमोद वामन वर्तक

संपर्क – दोस्ती इम्पिरिया, ग्रेशिया A 702, मानपाडा, ठाणे (प.) 400610 

मो – 9892561086 ई-मेल – pradnyavartak3@gmail.com

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ मराठीच बोलू कौतुके… ☆ सुश्री संगीता कुलकर्णी ☆

सुश्री संगीता कुलकर्णी

? विविधा ?

☆ मराठीच बोलू कौतुके ☆ सुश्री संगीता कुलकर्णी ☆

!! माझा मराठाची बोलू कौतुके |

  परि अमृतातेही पैजा जिंके !!

                                – संत ज्ञानेश्वर

भाषा ही कोणत्याही मानवी सामाजिक जीवनाचा आधार आहे. ते परस्पर संवादाचे जसे प्रभावी माध्यम आहे तसेच ते ज्ञानसंचय, ज्ञानप्रदानाचे ही महत्त्वाचे माध्यम आहे. संस्कृती, इतिहास, आचार-विचाराचे महत्त्वाचे साधन म्हणून भाषेकडे पाहिले जाते. मराठी हि महाराष्ट्राची राजभाषा आहे. महाराष्ट्राची ती मातृभाषा आहे..

मराठी भाषेला साधारणतः लिखित साहित्याचा बाराशे वर्षांचा इतिहास लाभला आहे. महाराष्ट्रात आणि जगात पंधरा कोटी लोक मराठी भाषा बोलतात. प्राचीन कालखंडापासून अतिशय दर्जेदार साहित्याची निर्मिती मराठी भाषेतून झालेली आहे. ज्ञानेश्वर-लीळाचरित्र, तुकारामांची गाथा, नामदेवांची-अभंगवाणी, बखर, पोवाडे ही प्राचीन मराठी भाषेची खरी ओळख असून त्यांची ख्याती सातासामुद्रांपलीकडे पोहोचली असून यांचा अनेक भाषांत अनुवादही झाला आहे. आधुनिक युगात निबंध, कथा, कविता, कादंबरी, नाटक व ललित गद्य तसेच दलित, ग्रामीण, स्त्रीवादी आणि आदिवासी साहित्यातून देशभर आणि जगभर मराठीची स्वतंत्र अशी  ओळख निर्माण झाली आहे.

समाजातील दिन-दलित, वंचित, उपेक्षित घटकांच्या मनोव्यथेचा पहिला हुंकार मराठी साहित्यातूनच उमटला. अभिजनांच्या साहित्य जाणिवांपेक्षा बहुजनांच्या जीवन वेदनेला स्थान देणारे मराठी साहित्यच आहे.

शिक्षणाची प्रक्रिया अधिक गतिमान करण्यासाठी मातृभाषेसारखे दुसरे साधन असूच शकत नाही म्हणूनच महाराष्ट्रात उच्चशिक्षण मराठी भाषेतून

दिले जावे…. मराठी भाषेत अकराव्या शतकापासून संतानी सातत्याने ज्ञानाची क्रांती केली आहे. मराठीतील लोकवाङ्मय व लोकसंस्कृतीच्या खुणा मराठीतून विविधतेने नटलेल्या दिसतात… अनेक श्रेष्ठ संत मंडळींनी आपल्या बोलीतून मराठी भाषेला सजविले, फुलविले व मोठे केले.. विसाव्या  एकविसाव्या शतकातील अनेक थोर लेखक,कवींनी आपल्या

शब्दसामर्थ्यामधून मराठी भाषा समृध्द केली पण हीच आपली मातृभाषा कुठेतरी मागे पडते आहे हे विधान सर्वत्र ऐकायला मिळते आणि ह्या मागे एक आर्त कळकळ असते ती आपल्या मातृभाषेवरील प्रेमाची, आस्थेची… मुळात भाषा कशासाठी तर संवाद साधण्यासाठी, भावना, विचार मांडण्यासाठी, ते जतन  करून ठेवण्यासाठी, विकासासाठी… आणि मग जेव्हा हीच भाषा मागे पडते तेव्हा फक्त भाषा नाही तर एक संपूर्ण मानव समुह , एक संस्कृती मागे पडते.

जागतिकीकरणाच्या युगात मराठी भाषा नवनव्या आव्हानांना सामोरी जाऊन, कधी त्यात सामावून तर कधी सामर्थ्याने अनेक क्षेत्रात प्रभावीपणे पदार्पण करताना दिसते आहे. या भाषिक संक्रमणाच्या युगातही मराठीने आपले स्वतंत्र अस्तित्व टिकवून ठेवले आहे. कला, संस्कृती, क्रीडा, न्यायालयीन व वैधक कामकाज, गणित, विज्ञान, उपयोजीत मराठी, संगणक, वृतपत्रे, आकाशवाणी, दूरदर्शन, मोबाईल इत्यादी अनेक क्षेत्रांत मराठी भाषा आपले स्वतंत्र अस्तित्व टिकवून आहे.  नव्या क्षेत्राची परिभाषा मराठीने आत्मसात केली आहे. या पुढेही मराठी भाषेला नव्या नव्या क्षेत्रात पदार्पण करण्यासाठी सजग रहावे लागणार आहे हे नक्की..

!!लाभले आम्हास भाग्य बोलतो मराठी

जाहलो खरेच धन्य ऐकतो मराठी !!

खरंच हे दिवस महाराष्ट्रात आहेत का? मातृभाषा आहे म्हणून मराठीचं कौतुक आहेच. पण बऱ्याचदा असं होतं की मुलं मराठी कुटुंबातून आलेली असली तरी त्यांच्यावर इंग्रजीचा प्रभाव जास्त असतो. अगदी उलट परिस्थिती जेव्हा इतर भाषिक लोक एकत्र येतात तेव्हा असते. तेव्हा खंत वाटते की आपलं आपल्या मातीशी असलेलं नातं तुटतंय का? महाराष्ट्राच्या मातीशी असलेले घट्ट ऋणानुबंध टिकवून ठेवणारी आपली मातृभाषा आहे. जिचा गोडवा अवीट आहे जिने राष्ट्रीय ख्यातीचे पुरस्कारविजेते लेखक-कवी घडवले जिने बॉलीवूडकरांनाही भुरळ घातली ती भाषा बोलण्यात कमीपणा वाटण्याचं काही कारणच नाही. दुसऱ्याची वाट न पाहता स्वतःपासून सुरुवात केली पाहिजे असे मनापासून नमूद करीन.. तसंच कॉलेजच्या मराठी वाङ्मयमंडळांची ही व्याप्ती वाढली पाहिजे तरच जास्तीत जास्त मराठी साहित्य जनमानसांत पोहोचेल व मराठी केवळ कागदापूर्तीच मर्यादित न राहता सगळ्यांच्या मनामनात राहील. मातृभाषेमधून जे संस्कार मनावर, बुद्धीवर होतात ते कुठेतरी आत्म्यात रुजत असावेत.. मातृभाषेत विचारांची जडणघडण झाली तर माणूस प्रत्येक गोष्टीचा विचार करायला लागतो आणि हळूहळू सगळ्या समाजाचीच

विचारसरणी बदलते. त्यामुळे मराठीचा अभिमान बाळगणे हा संकुचितपणा असा विचार करणारे आम्ही भाषेच्या डबक्यातच अस्तित्व असणारे बेडूक नसून एका विचारी आणि सर्वसमावेशक राज्याचे नागरीक आहोत हे सांगायला नकोच.

आमच्या मराठीची पीछेहाट होण्यामागे दुसरं तिसरं कोणी जबाबदार नसून आम्हीच आहोत. आम्हीच मराठी बोलायला टाळायला लागलो. अश्याने बाकीच्या भाषा बोकाळल्या आणि आम्ही त्यांचा उदो उदो करत रहिलो.

अहो या मराठीने तिचं गाऱ्हाणं सांगावं तरी कोणाला ? झोपेचं सोंग घेतलेल्यांना की खरंच या विषयाचं गांभीर्यच न उमगणा-यांना ? मराठीचं बोलण कळेल तरी का या इंग्रजाळलेल्या मराठी फकिरांना ?

मराठीच मराठी राहिली नहिये. तिची कक्षा रुंदावी, तिची प्रगती व्हावी असं तिलाही वाटत असणारचं ना ? पण मग काय कुठलीही भेसळ सहन करावी का तिने ? मराठीचं शुद्धीकरण करायला प्रत्येक पिढीत सावरकर जन्माला येतीलच असं नाही ना..! सावरकरांनी मराठीला इंग्रजी राजवटीत वाचवलं, सावरलं आणि पुन्हा उभं केलं. मराठीत कित्येक शब्द सावरकरांनी रुजू केले. पण ते इंग्रजीतून अथवा इतर प्रांतीय भाषांमधून नाही तर तिचं मूळ जिच्यात होतं अशा संस्कृतमधून..

किती श्रीमंत ही मराठी.. ज्ञानदेव तुकोबारायांसारखे संत मराठीच्या छायेत वाढले. तर या मराठीच्या अंगाखांद्यावर माडगुळकर, कुसुमाग्रज, शांता शेळके, सुरेश भट, भा.रा तांबे, आरती प्रभू अश्या अनेक महान कवींची कविता खेळली, बागडली. व. श्री. ना. पेंडसे, पु. काळे, जी. ए. कुलकर्णी, शं. ना. नवरे, अशा कित्येक कथाकारांच्या गोष्टीचं कथेत रुपांतर झालं. भारुड, जात्यावरच्या ओव्या, गोंधळ असे गेय साहित्य प्रकार, ज्ञानेश्वरी, दासबोध, गाथा असे ग्रंथ या मराठीने प्रत्येक मराठी

मनापर्यंत पोहोचवले. हे साहित्य पुढल्या पिढीला सांगण्याचा प्रयत्न केला तर त्यांना कुठपर्यंत झेपेल हे कोणास ठाऊक?.. . कारण हे समजायला मराठी गाभा लागतो. आणि हे साहित्य श्रुती, स्मृती या माध्यमांमधून जर पुढे गेलं नाही तर हे सगळं कुठेतरी लुप्त होण्याची फार दाट शक्यता आहे .. मनाला लागलेली एक रूखरूख..

कुठलीही भाषा शिकायला फारसा काळ  लागत नाही. त्या भाषेत प्रभुत्व मिळविण्याची इच्छा असेल तरीही नाही… त्यासाठी मुलांना इंग्रजी शाळांमध्येच शिकविण्याचा आग्रह का ? या सगळ्या अट्टाहासात मुलांचा आत्मविश्वास तर बळी पडत नाहीये ना?  न्यूनगंड तर निर्माण होत नाहीये ना ? असा विचार या पालकांनी वेळीच केलेला बरा.

मराठीच्या उत्कर्षासाठी झगडणं हा आमचा मराठी धर्म. महाराष्ट्रात मराठी बोलून जर समोरच्याला कळत नसेल तर आम्ही मराठी सोडण्याची नाही तर समोरच्याने मराठी शिकण्याची गरज आहे असं माझ्यासारख्या मराठी माणसाचं ठाम मत आहे. यातून मराठीचं अस्तित्व टिकून राहील आणि त्या निमित्ताने एक नवीन भाषा शिकण्याचं भाग्यही शिकविणा-याला  लाभेल असे मला वाटते..सध्या इंग्रजी आणि हिंदी ची लाट आहे. पण जेंव्हा प्रयत्नांती मराठीच पारडं जड होईल ना  तेव्हा हेच इंग्रजाळलेले मराठी पुन्हा मराठीच्या लाटेत निर्विकारपणे का होईना सामील होतील अशी आशा मनी आहे.

 

 ©  सुश्री संगीता कुलकर्णी 

लेखिका /कवयित्री

ठाणे मो. 9870451020

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ “माझी भाषा… माझा समज…” ☆ श्री कौस्तुभ परांजपे ☆

श्री कौस्तुभ परांजपे

? विविधा ?

☆ “माझी भाषा… माझा समज…” ☆ श्री कौस्तुभ परांजपे

नुकत्याच झालेल्या मराठी भाषा गौरव दिनाच्या निमित्ताने बरेच काही चांगले, विनोदी वाचायला मिळाले. आणि मराठी भाषेवरच्या प्रेमाच्या लाटेने थोडी उसळी घेतली… 

आणि बोलतांना मराठीत असलेले, लपलेले, लपवलेले, आणि गैरसमज करून घेतलेले अर्थ व त्यामुळे होणारी गंमत लक्षात आली.

घरात बोलत असतानांच साध वाक्य, तुम्ही चहा आधी घेणार, कि भांडी घासून झाल्यावर. आता सांगा यात चहा घेणार… म्हणजे मिळणार का आपल्या हाताने घेणार… आदर आणि स्वावलंबन दोन्ही अर्थ यात काठोकाठ भरलेले आहेत. कदाचित हे अर्थ जितके काठोकाठ भरलेेेले आहेत तेवढा चहा पण कपात भरलेला नसतो. त्यातही आपण थोडी कपात करतो. या बरोबरच भांडी कोण घासणार… याचा उल्लेख नसला तरी बरोबर समजत. पण वाक्यात गंमत आहे.

असंच दुसरं वाक्य. काही कळलं का. आता यात विचारणा, प्रश्न, आणि असलेल्या बुध्दी बद्दल शंका… सगळ्या भावना यात आहेत. मग ते वाक्य आपल्यासाठी असेल, किंवा आपण म्हंटल असेल. पण प्रसंग, परिस्थिती, शब्दावर दिलेला जोर, आणि अर्थातच चेहर्‍यावर असणारा भाव यामुळे काय म्हणायचं ते लक्षात येतच. याच धर्तीवर असणारं आणखीन एक वाक्य, काही गरज नाही. यात राग आणि सौजन्य दोन्ही आहे. पण हे वाक्य सौं. च असेल, तर सौजन्य असेलच असही नाही. परिस्थितीनुसार याचा अर्थ आपण आपला लावायचा असतो. जमेल का हे पण याच अर्थाने ऐकायला येणारं वाक्य. यात क्षमतेवर विश्वास जाणवतच नाही. काहीवेळा काळजी, तर काहिवेळा उपरोध जाणवतो.

लक्ष कुठे आहे तुमचं हे तर लक्ष्यवेधी वाक्य आहे. यात आपण काय सांगतो या कडे लक्ष नाही. किंंवा ज्याची गरज आहे ते सोडून नेमकं कशाच निरीक्षण चाललं आहे हे लक्षात आणून दिल जातं. यावेळी लक्ष आणि लक्ष्य दोन्ही विचलित झालेलं लक्षात येत.

तुम्ही काय देणार यात अपेक्षा, कौतुक, आनंद, आश्चर्य याच बरोबर अपेक्षित असलेल काहि मिळणार नाही याची जवळपास खात्रीच असते. फक्त वेेळ, व शब्दांच्या सुरावरुन यात काय आहे ते समजून घ्याव लागतं.

एखादं काम पूर्ण केल्यावर आपण सहज म्हणतो, झालं. यात काम पूर्ण केल्याचा आनंद किंवा समाधान असतं. पण हे काम मी करु का… अशी विचारणा आपणहून केली, आणि त्यावर झालं… अस उत्तर आल, तर मात्र त्या झालं याचा अर्थ आपल्याला वेगळा सांगावा लागतच नाही. यात आनंद किंवा समाधान सापडणारच नाही. जाणवेल ती फक्त निराशा… 

आपण मराठीत बोलत असलो तरी काही इंग्रजी शब्द आपण आपलेच म्हणून सर्रास वापरतो. कदाचित एकदा आपलं म्हंटल की दूर लोटायच नाही हा मराठी बाणा यात असेल. किस हा शब्द मराठीत आणि इंग्रजीत लिहितांना वेगळा आणि अर्थही वेगळा असला तरी, व आपण बोलतांना किस याचा मराठी अर्थच घेतला तरी वाक्य कस ऐकतो त्यावरून ऐकतांना गंमत वाटते.

आज दोन्ही वेळेस ऊपवास आहे. मग… किस सकाळी करु कि रात्री चालेल… अस विचारल तर… गंमत वाटणारच. आणि समजा ऊत्तर दिल… सकाळीच कर. रात्रीच रात्री बघू… तर… किंवा एखाद्या गोष्टीबद्दल नको तितकी चर्चा सुरु असेल तरी म्हणतो, बास आता… किती किस पाडायचा… 

बोलीभाषा मराठीच असली तरी पुणं, मुंबई, कोल्हापूर, नागपूर, मराठवाडा, नाशिक, खान्देश इथली वेगळी आहे. आमच्याकडे काहि लोकांना ळ चा उच्चार ड असा करायची सवय आहे. लिहीतांना ळ लिहीला तरी उच्चार ड असा करतात. यात काही चूक आहे अस वाटत नाही. आमच्या वर्गात नेमाडे, भोळे, काळे अशी आडनांव असणारे होते. या सगळ्यांनाच एक जण बोलवत होता. पण तो म्हणाला नेमाडे, भोडे, काडे. सगडेच्या सगडे संध्याकाडी या. समजल तरी ऐकतांना गंमत वाटायची. एक म्हण आहे. उथळ पाण्याला खळखळाट फार. आता हिच म्हण याने म्हंटली तर ती उथड पाण्याला खडखडाट फार अस म्हणेल. खळखळाट आणि खडखडाट किती विरुद्ध अर्थ आहे. पण हिच गंमत आहे.

अशा खूप गोष्टी असतील. पण भाषेत प्रेम, ओलावा, गंमत आहे कारण ती माझी आहे.

©  श्री कौस्तुभ परांजपे

मो 9579032601

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ.मंजुषा मुळे/सौ.गौरी गाडेकर≈

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