मराठी साहित्य – वाचताना वेचलेले ☆ “बाया” – कवी : विजय जोशी  ☆ प्रस्तुती – मंजुषा सुनीत मुळे ☆

मंजुषा सुनीत मुळे

📚 वाचताना वेचलेले 📖

☆ “बाया” – कवी : विजय जोशी ☆ प्रस्तुती – मंजुषा सुनीत मुळे ☆

बाया कपडे धुवायला जातात,

नदीवर निगुतीने!

 

सुख दुःखे बुचकळवतात पाण्यात,

आणि बोलतात वाहत्या पाण्याशी,

सराईतपणे मनमोकळं….

कपडे घासतात, आपटतात,

धोपटतात दगडावर,

साफ करतात कपड्यांचा मळ, आणि मनातली खळबळ सुद्धा!

 

बायका कुजबुजतात, पुटपुटतात, बडबडतात,

आपापसात,

मनाशी,

कपड्यांशी,

पाण्याशी,

दगडांशीसुद्धा.

 

विरघळून जातो सारा शीण,

नदीतल्या पाण्यात, आणि,

बाया फिरतात माघारी,

पुन्हा एका नवीन दिवसाची सुरुवात करायला,

नदीच्या पात्रात विस्तीर्ण आणि

स्वच्छ नितळ मनाने!

कवी : विजय जोशी

प्रस्तुती : मंजुषा सुनीत मुळे 

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈ 

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #३१९ ☆ ख्वाब : बहुत लाजवाब… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख ख्वाब : बहुत लाजवाब। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # ३१९ ☆

☆ ख्वाब : बहुत लाजवाब… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

‘जो नहीं है हमारे पास/ वो ख्वाब है/ पर जो है हमारे पास/ वो लाजवाब है’ शाश्वत् सत्य है, परंतु मानव उसके पीछे भागता है, जो उसके पास नहीं है। वह उसके प्रति उपेक्षा भाव दर्शाता है, जो उसके पास है। यही है दु:खों का मूल कारण और यही त्रासदी है जीवन की। इंसान अपने दु:खों से नहीं, दूसरे के सुखों से अधिक दु:खी व परेशान रहता है।

मानव की इच्छाएं अनंत है, जो सुरसा के मुख की भांति निरंतर बढ़ती चली जाती हैं और सीमित साधनों से असीमित इच्छाओं की पूर्ति असंभव है। इसलिए वह आजीवन इसी उधेड़बुन में लगा रहता है और सुक़ून भरी ज़िंदगी नहीं जी पाता। सो! उन पर अंकुश लगाना अनिवार्य है। मानव ख्वाबों की दुनिया में जीता है अर्थात् सपनों को संजोए रहता है। सपने देखना तो अच्छा है, परंतु तनावग्रस्त  रहना जीने की ललक पर ग्रहण लगा देता है। खुली आंखों से देखे गए सपने मानव को प्रेरित करते हैं करते हैं, उल्लसित करते हैं और वह उन्हें साकार रूप प्रदान करने में अपना सर्वस्व झोंक देता है। उस स्थिति में वह आशान्वित रहता है और एक अंतराल के पश्चात् अपने लक्ष्य की पूर्ति कर लेता है।

परंतु चंद लोग ऐसी स्थिति में निराशा का दामन थाम लेते हैं और अपने भाग्य को कोसते हुए अवसाद की स्थिति में पहुंच जाते हैं और उन्हें यह संसार दु:खालय प्रतीत होता है। दूसरों को देखकर वे उसके प्रति भी ईर्ष्या भाव दर्शाते हैं। ऐसी स्थिति में उन्हें अभावों से नहीं; दूसरों के सुखों को देख कर दु:ख होता है–अंतत: यही उनकी नियति बन जाती है।

अक्सर मानव भूल जाता है कि वह खाली हाथ आया है और उसे खाली हाथ जाना है। यह संसार मिथ्या और  मानव शरीर नश्वर है और सब कुछ यहीं रह जाना है। मानव को चौरासी लाख योनियों के पश्चात् यह अनमोल जीवन प्राप्त होता है, ताकि वह भजन सिमरन करके अपने भविष्य को उज्ज्वल बना सके। परंतु वह राग-द्वेष व स्व-पर में अपना जीवन नष्ट कर देता है और अंतकाल खाली हाथ जहान से रुख़्सत हो जाता है। ‘यह किराये का मकान है/ कौन कब तक रह पाएगा’ और ‘यह दुनिया है एक मेला/ हर इंसान यहाँ है अकेला’ स्वरचित गीतों की ये पंक्तियाँ एकांत में रहने की सीख देती हैं। जो स्व में स्थित होकर जीना सीख जाता है, भवसागर से पार उतर जाता है, अन्यथा वह आवागमन के चक्कर में उलझा रहता है।

जो हमारे पास है; लाजवाब है, परंतु बावरा इंसान इस तथ्य से सदैव अनजान रहता है, क्योंकि उसमें आत्म-संतोष का अभाव रहता है। जो भी मिला है, हमें उसमें संतोष रखना चाहिए। संतोष सबसे बड़ा धन है और असंतोष सब रोगों  का मूल है। इसलिए संतजन यही कहते हैं कि जो आपको मिला है, उसकी सूची बनाएं और सोचें कि कितने लोग ऐसे हैं, जिनके पास उन वस्तुओं का भी अभाव है; तो आपको आभास होगा कि आप कितने समृद्ध हैं। आपके शब्द-कोश  में शिकायतें कम हो जाएंगी और उसके स्थान पर शुक्रिया का भाव उपजेगा। यह जीवन जीने की कला है। हमें शिकायत स्वयं से करनी चाहिए, ना कि दूसरों से, बल्कि जो मिला है उसके लिए कृतज्ञता ज्ञापित करनी चाहिए। जो मानव आत्मकेंद्रित होता है, उसमें आत्म-संतोष का भाव जन्म लेता है और वह विजय का सेहरा दूसरों के सिर पर बाँध देता है।

गुलज़ार के शब्दों में ‘हालात ही सिखा देते हैं सुनना और सहना/ वरना हर शख्स फ़ितरत से बादशाह होता है।’

हमारी मन:स्थितियाँ परिस्थितियों के अनुसार परिवर्तित होती रहती हैं। यदि समय अनुकूल होता है, तो पराए भी अपने और दुश्मन दोस्त बन जाते हैं और विपरीत परिस्थितियों में अपने भी शत्रु का क़िरदार निभाते हैं। आज के दौर में तो अपने ही अपनों की पीठ में छुरा घोंपते हैं, उन्हें तक़लीफ़ पहुंचाते हैं। इसलिए उनसे सावधान रहना अत्यंत आवश्यक है। इसलिए जीवन में विवाद नहीं, संवाद में विश्वास रखिए; सब आपके प्रिय बने रहेंगे। जीवन मे ं इच्छाओं की पूर्ति के लिए ज्ञान व कर्म में सामंजस्य रखना आवश्यक है, अन्यथा जीवन कुरुक्षेत्र बन जाएगा।

सो! हमें जीवन में स्नेह, प्यार, त्याग व समर्पण भाव को बनाए रखना आवश्यक है, ताकि जीवन में समन्वय बना रहे अर्थात् जहाँ समर्पण होता है, रामायण होती है और जहाल इच्छाओं की लंबी फेहरिस्त होती है, महाभारत होता है। हमें जीवन में चिंता नहीं चिंतन करना चाहिए। स्व-पर, राग-द्वेष, अपेक्षा-उपेक्षा व सुख-दु:ख के भाव से ऊपर उठना चाहिए; सबकी भावनाओं को सम्मान देना चाहिए और उस मालिक का शुक्रिया अदा करना चाहिए। उसने हमें इतनी नेमतें दी हैं। ऑक्सीजन हमें मुफ्त में मिलती है, इसकी अनुपलब्धता का मूल्य तो हमें कोरोना काल में ज्ञात हो गया था। हमारी आवश्यकताएं तो पूरी हो सकती हैं, परंतु इच्छाएं नहीं। इसलिए हमें स्वार्थ को तजकर,जो हमें मिला है, उसमें संतोष रखना चाहिए और निरंतर कर्मशील रहना चाहिए। हमें फल की इच्छा कभी नहीं करनी चाहिए, क्योंकि जो हमारे प्रारब्ध में है, अवश्य मिलकर रहता है। अंत में अपने स्वरचित गा त की पंक्तियों से समय पल-पल रंग बदलता/ सुख-दु:ख आते-जाते रहते है/ भरोसा रख अपनी ख़ुदी पर/ यह सफलता का मूलमंत्र रे। जो इंसान स्वयं पर भरोसा रखता है, वह सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ता जाता है। इसलिए इस तथ्य को स्वीकार कर लें कि जो नहीं है, वह ख़्वाब है;  जो मिला है, लाजवाब है। परंतु जो नहीं मिला, उस सपने को साकार करने में जी-जान से जुट जाएं, निरंतर कर्मरत रहें, कभी पराजय स्वीकार न करें।

●●●●

© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९८२ ⇒ बंटी और बबली ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “बंटी और बबली।)

?अभी अभी # ९८२ ⇒ आलेख – बंटी और बबली ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

कितना प्यारा नाम है बंटी और बबली ! बंटी है जहां, बबली है वहां। वैसे जरूरी नहीं कि हर बालक का नाम बंटी ही हो, और भी बहुत नाम हैं लाड़ प्यार वाले। कहीं उसे प्यार से बण्डू कहते हैं तो कहीं बिट्टू। जहां बिट्टू है, वहां फिर बिट्टी भी होगी। कहीं उसे बाबू कहते हैं तो कहीं बाबा। हमारा बाबा ही मराठी भाषियों का बाला अथवा बाळा है। बड़े होकर ये ही बाला साहेब ठाकरे और बाला साहेब देवरस कहलाते हैं। कौन जानता था बचपन का बाबू, बड़ा होकर बाबू जगजीवनराम निकलेगा।

जब बंटी की बात चली है तो क्यों न सबसे पहले “आपका बंटी” की ही बात कर ली जाए। जिन्होंने मन्नू भंडारी की कालजयी कृति आपका बंटी पढ़ी है, वे उसके बारे में मुझसे अधिक ही जानते होंगे, लेकिन जिन पाठकों ने यह उपन्यास नहीं पढ़ा, वे मेरा अभी अभी छोड़कर, पहले आपका बंटी पढ़ें।।

कोई भी उपन्यास हाथों हाथ नहीं पढ़ा जाता, लेकिन सन् १९७० में प्रकाशित यह उपन्यास आज के समय में भी कितना प्रासंगिक है, यह तो इस उपन्यास को पढ़ने के बाद ही जाना जा सकता है। इस उपन्यास के दो पक्ष हैं, एक स्त्री पुरुष के टूटते संबंध और बंटी की मनोव्यथा। बाल मनोविज्ञान पर हिंदी साहित्य में यह उपन्यास एक मील का पत्थर है।

फिल्म बंटी और बबली का, मन्नू भंडारी के आपका बंटी से कोई संबंध नहीं होते हुए भी समाज में बढ़ते तनाव, असुरक्षा और अपराध की पृष्ठभूमि में इन पात्रों के मनोविज्ञान का अध्ययन भी जरूरी हो जाता है। माता पिता का अपना व्यवहार किसी बच्चे की जिंदगी अगर बना सकता है, तो तबाह भी कर सकता है।।

एक लेखक कभी अपनी कहानी नहीं कहता। उसके आसपास बिखरी घटनाएं, दास्तान, लोगों की आपबीती, उनके कन्फेशन्स उसे अपनी कलम चलाने के लिए बाध्य कर देते हैं। हर लेखक मसीहा नहीं होता। या तो आवारा मसीहा होता है अथवा स्वदेश दीपक की तरह जिंदा ही किसी सलीब पर टंगा पड़ा होता है।

मन्नू भंडारी इतनी अकेली भी नहीं थी उस समय। राजेंद्र यादव के अलावा मोहन राकेश और कमलेश्वर एक परिवार की तरह ही तो थे। कहानियां लिखी जाती थीं, गर्मागर्म बहस चलती रहती थी और पकौड़ियां भी तली जाती थी। ममता और रवींद्र कालिया भी तब कहां अलग थे, इस लेखक समुदाय से।।

यही सच है, पर तो फिल्म रजनीगंधा बन भी गई, लेकिन आपका बंटी आज भी वहीं अकेला खड़ा है। और फिल्म में भी उसका साथ दिया भी तो किसने बबली ने। लेकिन दोनों मिलकर केवल एक मनोरंजक फिल्म ही बना पाए, इसके अलावा और कुछ नहीं।

धर्मवीर भारती भी एक समय इसी स्कूल के थे। लेकिन बाद में उन्होंने धर्मयुग में इतिहास रचा, तो कमलेश्वर सारिका में जा बैठे और राजेन्द्र यादव ने हंस का दामन थाम लिया। यह भी बुरा नहीं। जब चुक जाओ, तो संपादक बन जाओ। लेकिन यह जरूरी तो नहीं ! मनोहर श्याम जोशी ने साप्ताहिक हिंदुस्तान छोड़ने के बाद ही तो कसप, कुरू कुरू स्वाहा और हरिया हरक्यूलिस जैसी रचनाएं दी हैं।।

धर्मवीर भारती के उपन्यास पर आधारित एक फिल्म बनी थी ” एक था चंदर, एक थी सुधा”। यह फिल्म बनी जरूर, लेकिन दर्शकों को देखने को मिली मनोज कुमार की गुनाहों का देवता, जिसका भारती जी के उपन्यास से कोई लेना देना नहीं था।।

एक अच्छे लेखक का सृजन कभी सुख का सृजन नहीं हो सकता। क्योंकि लेखकीय सृजन में भोगा हुआ यथार्थ है, पीड़ा है, संत्रास है। लेखकीय पात्र बार बार अवचेतन में चिल्लाते हैं, कराहते हैं, लेखक को विचलित भी कर देते हैं। फेयरवेल टू आर्म्स जैसे उपन्यास का नोबेल पुरस्कार विजेता अर्नेस्ट हेमिंग्वे यूं ही खुद को गोली मारकर आत्म हत्या नहीं कर लेता।

किसी ने सही कहा है ;

बहुत कठिन है

डगर पनघट की।

आपका बंटी की कहानी है

हर परिवार की,

घट घट की।

लेकिन क्या करे बेचारी बबली।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिंदी साहित्य – कथा कहानी ☆ प्यास… – मराठी लेखिका – उज्ज्वला केळकर ☆ हिन्दी भावानुवाद – जस्मिन शेख ☆

जस्मिन शेख

☆ कथा कहानी ☆ प्यास… – मराठी लेखिका – उज्ज्वला केळकर ☆ हिन्दी भावानुवाद – जस्मिन शेख ☆

उज्ज्वला केळकर

जस्मीन करुना निकेतन क्रेश की सीढ़ियाँ उतरी और उसके पीछे-पीछे क्रेश के सब लोग… गेट तक चले आए।। सुनीता काफी देर से टैक्सी के साथ गेट के बाहर इंतज़ार कर रही थी। हालाँकि, जस्मीन के पैर वहाँ से हटने का नाम नहीं ले रहे थे। उसके कदम मानो थमसे गए थे। क्रेश के लिए यह क्षण ऐतिहासिक महत्व का था। पच्चीस साल पहले क्रेश ने अपनेमें समाए हुए उस छोटीसी बच्ची ने देखते ही देखते एम.बी.बी.एस. की पढ़ाई पूरी की थी। और अब आगे की पढ़ाई के लिए जर्मनी जा रही थी। क्रेश में आज सभी ने उसे अलविदा कह दिया। विदाई और उसकी यात्रा के लिए…… उसकी शिक्षा के लिए….. उसके भावी जीवन के लिए…… जनहित में समर्पित उसके जीवन उद्देश के लिए …. हार्दिक शुभकामनाएँ। इन सभी लोगों की आत्मयता उसके मन पर भारी पड़ रही थी। जैस्मिन को लगने लगा था कि उस भारीपण के नीचे उसका दम घुट रहा है। एक ओर, वह जल्द से जल्द इन सब से बाहर निकलना चाहती थी, लेकिन दूसरी ओर, उसके पैर और मन उन्ही में समा गए थे। उसे यह भी लग रहा था कि जितना ज़्यादा समय वह उनके साथ बिता सके, उतना अच्छा है। वह अपने मन की दुविधा से उलझन में थी। आज सुबह से ही, क्रेश का हर व्यक्ति उससे कुछ कहने के लिए झटपटा रहा था। समय कम था। और बात खत्म ही नही हो रही थी।

‘आज सिस्टर नैंन्सी यहाँ चाहिए थी।’ सिस्टर मारिया मन ही मन सोच रही थी। जैस्मीन को पढ़ाने और उच्च शिक्षा के लिए जर्मनी भेजने का सिस्टर नैंन्सी का सपना था। उन्होने यह बात कई लोगों को कई बार बताया था। वह खुशी से फुली न समाती। उसे और फादर फिलिप को…….

जस्मीन क्रेशने गोद ली हुई पहली बेटी! तब वह साढ़े तीन साल की थी। आज क्रेश परिवार काफ़ी बड़ा हो गया है। अलग-अलग उम्र की तीन साडे तीन सौ लड़कियाँ हैं। कुछ अनाथ बच्चे हैं, कुछ को उनके माता-पिता ने छोड़ दिया है, कुछ को यहाँ इसलिए लाया गया है क्योंकि वे हालात को संभाल नहीं पाईं। कुछ को आपराधिक सुधार गृह से भेजा गया है, कुछ घर से भाग गई हैं। क्रेश ने उन सभी पर अपने ममता की छाँव धरी है। उसने उन्हें जीवन दिया है, उनकी रक्षा की है, उन्हें शिक्षा प्रदान की है, हर एक के शक्ति के अनुसार!

ग्रीन टेम्पल चर्च शहर के एक बेहद ग्रामीण और पिछड़े इलाके में स्थित है। यह चर्च जर्मन मिशन द्वारा समर्थित है। फादर जर्मनसे इस चर्चा के मुख्य बिशप बनकर आए हैं। इस विश्वास के साथ कि गरीबों और ज़रूरतमंदों की सेवा करना प्रभु येशू का कार्य है, इसी विश्वास से उन्होंने अपने आस-पास के लोगों की मदद की। उन्होंने गरीबी से असमय नष्ट हो रही कलियों को जीवनदान दिया। प्रभु यीशु के संदेश को कर्म द्वारा फैलाने के उद्देश्य से उन्होंने चर्च की एक सहयोगी संस्था के रूप में निकेतन की शुरुआत की। फिर सिस्टर मारिया, सिस्टर ज्युथिका जर्मनी से आए। कुछ अन्य स्थानीय ईसाई कलीसियाओं ने भी मदद की।

फादर फिलिप ने क्रेश शुरू करने का फैसला करने के बाद, एक भिखारी दंपति से तीन या चार साल की बच्ची को गोद लिया, जिसे कुष्ठ रोग था। हम उसकी अच्छी देखभाल करेंगे, उसे खूब पढ़ाएंगे, उसका पालन-पोषण करेंगे, उसे जर्मनी भेजेंगे, लेकिन आप उससे बिल्कुल नहीं मिलेंगे, उसको अपना परिचय नहीं देंगे। भिखारी दंपति सहमत हो गए। उन्होंने सोचा होगा कि कम से कम लड़की का जीवन बेहतर होगा। फादरने डॉ. थॉमस से पूरी जांच करने को कहा। लड़की प्रभावित नहीं हुई थी। प्रभु की लीला। उसने अपने हाथों को अपनी छाती पर हाथ से क्रॉस कर लिया। बाद में उसका नमकरण हो गया। सिस्टर नैंन्सीने एक नाम सुझाया। जस्मीन, एक ऐसा फूल जो अपनी उपस्थिति से पूरे वातावरण को सुगंधित कर देता है….. जस्मीन।

जस्मीन…क्रेशने गोद ली हुई पहली लड़की । जस्मीन जो पहले सड़कों पर पली-बढ़ी थी, उस सीमित वातावरण में इतनी घबरा जाती थी कि कोई उसे छूता या कोई अगर वह पास आती भी, तो वह डर से सिकुड जाती, मेमनेकी तरह!।

जस्मीन को अपने जीवन के उन टुकड़ों को इकट्ठा करके अपनी जीवन कहानी गढ़ने का जुनून सवार हो गया था, जो उसने समय-समय पर क्रेशमें दूसरों की बातचीत से इकट्ठा किए थे। दरअसल, उसमें कभी किसी से कुछ पूछने की हिम्मत नहीं हुई। वह बहुत शर्मीली और संकोची थी, लेकिन वह हमेशा सोचती थी कि उसके माता-पिता कौन हैं। फादरने उसे पहली बार कब और कहाँ देखा था? उन्होंने उसे गोद लेने के बारे में कैसे सोचा? अगर उन्होंने यह नहीं सोचा होता, अगर उसके माता पिताने हमें उन्हें देने से इनकार कर दिया होता, तो आज हम कहाँ होते? हमारी ज़िंदगी कैसी होती?

शायद ऊन भिखारी की तरह हमारा शरीरभी सड जाता । शायद नही, यकीनन! हम भी सडा हुआ शरीर लेकर घसीटते हुए जिंगकी काटते रहते। उस स्थिति में हम क्या सोचते? हम सोचते की यही जीवन है, और कुछ नहीं।

हम किसी और की दुहाई देकर जीते या किसी के घृणा के कार बनते।

कई सवाल…… सवालों का एक चक्रव्यूह। हर सवाल उलझाने वाला है। वह अपने मन में जवाब ढूँढ़ने की कोशिश करती रहेगी। वह अपने मन में उस स्थिति में अपना ही रूप देखेगी। उसे हर बार अलग उत्तर मिलेगा।

स्कूल जाते समय, वह सड़क पर भिखारियों को देखती, कोढ़ियों को जो चपटी नाक, टूटी उंगलियाँ, सूजे हुए हाथ-पैर और गंदे कपड़ों के साथ ग्रीन टेम्पल के क्रेश के आसपास घूमते थे। कभी कोई ठेले पर गाड़ी खींचता या बैठकर घूमता हुआ महारोगी। वह उनके प्रत्येक चेहरे को ध्यान से देखती और उनमें अपनी समानता खोजने की कोशिश करती। वह किसकी आँखों को अपनी जैसी समझती? यह किसका रंग है? अपने माता-पिता के बारे में सोचकर उसका पूरा शरीर काँप उठता। उसके शरीर रोमांचित हो जाता था।

स्कूल जाते समय, वह उन्हें देखती हुई धिरे धिरे आगे बढती। जब वह देखती कि वे उस पर ध्यान दे रहे हैं, तो सभी भिखारी शोर मचाते।” बहन, गरीब को दो पैसे दे दो। भगवान तुम्हें अमीर बना देगा। वह तुम्हें खुश कर देगा।” वह हँस पडती। उन्हें पैसे दो और इसीलिए भगवान उन्हें अमीर बना देगा। तो फिर भगवान उन्हें सीधे पैसे क्यों नहीं देते? लेकिन फिर उसके अंतरमन पर हुये प्रभु यीशु के संस्कार उसे याद आते। गरीबों के दुख दूर करो। प्रभु यीशु जीवन भर गरीबों की मदद करते रहे। सिर्फ़ अपने लिए मत जियो। दूसरों के लिए जियो।

उसे फादर फिलिप का मधुर भाषा में दिया गया उपदेश याद आया। फिर उसने मन ही मन सोचा, “इनके फैले हुए हाथों में कुछ पैसे रख दूँ। काश ये मेरे माता-पिता होते, तो चाय की चुस्की लेते। पैसे होते, तो सब्ज़ियाँ लाकर खाते। एक पल के लिए उनके उदास और मेहनती चेहरों पर खुशी की एक चमक आ जाती।

लेकिन उसके पास पैसे नहीं थे। वह क्रेशसे अपनी ज़रूरत की किताबें और कॉपियाँ ले आती। स्कूल में उसे जो पढ़ाई का सामान चाहिए था, वो सभी मिलता, पर पैसे कभी नहीं मिलते। क्रिसमस,इस्टर जैसे मौकों पर क्रेश की तरफ़ से वहाँ जमा भिखारियों को मिठाइयाँ बाँटी जातीं। जैस्मिन उन्हें बाँटने में पहल करती। उसे लगता कि क्रेश में भिखारियोंको भरपेट खाना खिलाना चाहिए। पर वह कुछ नहीं कर सकती थी। रोज़ खाना खाते हुए जस्मिन प्रार्थना करती, “हे प्रभु, जैसे मुझे बढिया खाना मिलता है, वैसे ही मेरे माता-पिता और दूसरे लोग भी मिला दो…..और सभी लोगोंको भी. आमेन…..।”

उसे अपने माता-पिता का ज़िक्र क्यों करना पड़ता है?

कहते हैं कि प्यार और स्नेह संगति से पैदा होता है। बचपन से उसे उनकी संगति नही मिली, फिर भी उसका मन लगातार उनके बारे में क्यों सोचता रहता है? उसकी सोच उनके इर्द-गिर्द क्यों घूमती रहती है? क्या वह नहीं जानती कि इसके पीछे भी कोई ईश्वरी संकेत है? क्रेशमें सभी उसे प्यार करते हैं, लेकिन हम यहाँ अजनबी हैं।…… हम भिखारी हैं।…… उसकी यह जीवनकहानी सुनकर उसके दिल में जो भावना पैदा हुई थी, उसे वह कभी नहीं मिटा पाई।

आज शाम चार बजे क्रेश के मनोरंजन कक्ष में जस्मीनको विदाई देने के लिए एक छोटा सा कार्यक्रम आयोजित किया गया। उसकी पढ़ाई की आदतों, विनम्र और मधुर व्यवहार की खूब प्रशंसा की गई। सिस्टर मारिआने उसकी बहुत प्रशंसा की और कहा कि स्कूल की सभी लड़कियों को उस पर गर्व होना चाहिए। स्कूल की लड़कियों को उसका अनुसरण करना चाहिए। जैस्मिन भी अभिभूत हो गई।

हम कौन हैं? उन्होंने हमारे और हम जैसे कई लोगों के लिए कितना कुछ किया है? उन्होंने हमें अपने पाले में खींचने के लिए इतना कुछ क्यों किया? लोग आलोचना करते हैं। वे कहते हैं कि लोगों को धर्मसे भ्रमित करने के लिएयेसारी साजिश है। लेकिन आलोचक, जो इन्ही को दोष देते हैं, उन्होंने क्या किया है,हम जैसी लड़कियों को आश्रय और सुरक्षा देने के लिए ? उनका आंतरिक उद्देश्य केवल धर्म का प्रसार करना नहीं था। उनके हृदय में शुद्ध मानवता का एक झरना बह रहा था और उन्हें यीशु के दूत के संदेश और शिक्षाओं में अटूट विश्वास था। वह संदेश दूसरों तक पहुँचने अर्थ उन्हें अपने पाले में खिंचना नहीं हो सकता। वे अपनी मातृभूमि से दूर आए और यहीं रहे। उन्होंने यहाँ के लोगों की यथासंभव सेवा की। उन्होंने कहाँ सभी को अपने पाले में खींचा, हम उनके जन्म के ऋणी हैं।

जस्मीन के हृदय में फादर फिलिप और सिस्टर नैंन्सीके लिए कृतज्ञता का एक असीम भाव उमड़ पड़ा। जस्मीन बोलने के लिए उठी, लेकिन आज उसे बोलने के लिए शब्द नहीं मिल रहे थे। उसने बस इतना ही कहा।

इसी क्रेश ने ही मुझे उभारा है, उसके प्रति मेरा भी कुछ कर्तव्य है, लेकिन अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद, मैं यहाँ आऊँगी। इस क्रश में रहकर मैं जनसेवा करुँगी। उसने कुष्ठ रोग पर और अधिक शोध करने की मंशा भी व्यक्त की। उसके मन में फिर से विचारों की लहरें उठीं। वह सपने देखने लगी।

जब हम लौटेंगे, तो हम एक छोटा सा निकेतन, कुष्ठरोगीयोंके लिए एक साफ-सुथरी कॉलोनी और उनके लिए एक आधुनिक अस्पताल बनाएंगे। क्रेश के आसपास कोई ‘लेपर’ नहीं होना चाहिए। कोई भीख न मांगे। सभी को अपनी कॉलोनी में काम करना चाहिए और खाना चाहिए।

प्रभु यीशु, ईश्वर ने हमें अपने दृढ़ संकल्प में दृढ़ रहने की शक्ति दी है।

पर हमें आने में चार या पाँच साल लगेंगे। तब तक यहाँ कौन जीवित रहेगा ? क्या हमारे माता-पिता उनमें से होंगे? क्या हम अपने हाथों से उनकी थोड़ी सी भी सेवा कर पाएंगे?

कोई जस्मीन के बारे में बोल रहा था…,कोई उसकी सहेलियों बारे में..उसके स्कूल के दोस्तों के बारे में बात कर रहा था,…….लेकिन वह कुछ सुन नहीं पा रही थी। सामने हॉल में, एक बड़ा पोस्टर था जिसमें प्रभु यीशु एक महिला को पानी पिला रहे थे। नीचे लिखा था: ‘उन्होने दिये हुए पानी से जो तृप्त होता है, उसे फिर प्यास नहीं लगती।’

उसे फादर फिलिप्स के सर्मन की याद आई। किसी शरमोणी महिला की कहानी। प्रभु ने उस पापी महिला को दर्शन दिया। क्या उसके माता-पिता पापी थे ? तो उन्हें पानी कौन देता? यीशु उस पापी महिला को करीब लाए और उसे जीवन का जल, आध्यात्मिक जल दिया। उसकी प्यास हमेशा के लिए बुझ गई। हम तो प्रभु यीशु द्वारा दिए गए पानी में डूबे रहते हैं।सर से पाँव तक। फादरने हमें इस पानी के करीब लाए, लेकिन फिर भी हम प्यासे थे। हम बहुत प्यासे थे। हम अपने अनदेखे माता-पिता को देखने के लिए प्यासे थे। हमारी आंखें बहुत प्यासी थीं। हमारा गला सूख गया था। हम बहुत प्यासे थे। हमारा जी घबरा गया….इतनी प्यास….

क्रेश सेबाहर आते समय जस्मीन का मन इन सभी विचारों से भर गया।सुनीता उसे बार-बार जल्दी आने के लिए कह रही थी। वह जस्मीन के साथ मुंबई तक जाने वाली थी। जस्मीन टैक्सी के पास पहुँची और जैसे ही बाकी सब गेट के पास खडे रहे। टैक्सीका दरवाज़ा खोलकर अंदर बैठते वक्त उसने सामने फुटपाथ पर जाने-पहचाने भिखारियों को देखा। भिखारी माथे पर अधुरे हाथ रखे राहगीरों से रहम की भीख माँग रहे थे। जस्मीन फिर बाहर आई, टैक्सी का दरवाज़ा बंद किया, भिखारियों के पास गई, पर्ससे कुछ नोट और सिक्के उनकी थाली,कटोरोंमें डाले, और मन ही मन कहा, “मेरे अनजान माता-पिता, मेरे काम में मेरी सफलता के लिए प्रार्थना करो, मुझे आशीर्वाद दो।”

वह टैक्सी में बैठ गई। टैक्सी चल पड़ी। उसने गेट पर खड़े क्रेशके सभी लोगों और सामने फुटपाथ पर बैठे भिखारियों की ओर हाथ हिलाया। बुझ-बुझीसी चार आँखे बेबस होकर जाती हुई टैक्सी की ओर देखती रही।

♥♥♥♥

मूल लेखिका – सौ. उज्ज्वला केळकर

संपर्क – निलगिरी, सी-५ , बिल्डिंग नं २९, ०-३  सेक्टर – ५, सी. बी. डी. –  नवी मुंबई , पिन – ४००६१४ महाराष्ट्र

मो.  836 925 2454, email-id – kelkar1234@gmail.com 

भावानुवाद  – जस्मिन शेख

मिरज. मो 9881584475

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – समय ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – समय ? ?

जब तक तुम्हारा था,

तुमने अपना

जाना ही नहीं,

अब चाहते हो

वही सरस अभिव्यक्ति,

अतीत हो चुकी

उष्मा की पुनरानुभूति,

सुनो साथी !

यह मेरी

अहंमन्यता नहीं,

विवशता है,

मैं समय हूँ,

विस्मृत भर हो सकता हूँ,

लौट सकता नहीं..!

?

© संजय भारद्वाज  

(प्रातः 1:55 बजे, 18 मार्च 2024)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ 2 अप्रैल से  एक माह की हनुमान साधना वैशाख पूर्णिमा तदनुसार 1 मई 2026 को संपन्न होगी। 🕉️

💥 इसमें हनुमान चालीसा एवं संकटमोचन हनुमानाष्टक के पाठ किए जाएँगे। हनुमान चालीसा के 21 या अधिक पाठ करने वाले विशेष साधक तथा 51 या अधिक पाठ करने वाले महा साधक कहलाएँगे। 101 या अधिक पाठ करने वाले परम साधक कहलाएँगे। आत्म परिष्कार और मौन साधना साथ चलेंगे।💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रचना संसार # ९१ – नवगीत – मकड़ी का जाल… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆

सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीत – मकड़ी का जाल

? रचना संसार # ९१ – गीत – मकड़ी का जाल…  ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ? ?

जाल मकड़ी का बुना है,

खो गयी संवेदनाएँ।

द्वेष के फूटे पटाखे,

जल रहीं हैं नित चिताएँ।।

*

कर रहे क्रंदन सितारे,

चाँद भी खामोश रहता।

हर तरफ छाया तिमिर की,

अब नहीं कुछ होश रहता।।

आपदा की बलि चढ़े सब,

चल रहीं पागल हवाएँ।

*

शोक घर -घर हो रहा है,

मौत की छाया पड़ी है।

आँधियाँ सुनती नहीं कुछ,

झोपड़ी सहमी खड़ी है।।

छा रही है बस  निराशा,

टूटती सारी लताएँ।

*

भूलती चिड़िया चहकना,

साँस बिखरी कह रहीं अब,

कौन सुरक्षित इस जग में,

पीर अँखियाँ सह रहीं सब

संत्रासों की माया है ,

छा गईं काली घटाएँ।

© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)

संपर्क –1308 कृष्णा हाइट्स, ग्वारीघाट रोड़, जबलपुर (म:प्र:) पिन – 482008 मो नं – 9424669722, वाट्सएप – 7974160268

ई मेल नं- meenabhatt18547@gmail.com, mbhatt.judge@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुंज #३१९ ☆ भावना के दोहे – विश्व पृथ्वी दिवस ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भावना के दोहे – विश्व पृथ्वी दिवस)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # ३१९ – साहित्य निकुंज ☆

☆ भावना के दोहे – विश्व पृथ्वी दिवस ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

संकट भारी आ पड़ा, धरा बचा लो आज।

मानव प्रकृति सहेजना, फिर शोभित सब काज।।

 *

बहुत बढ़ी अवहेलना, जगत हुआ है त्रस्त।

नर जीवन अनमोल है, इसे न करना पस्त।।

 *

होती फिर बंजर धरा, पर्वत जंगल नाश।

आने वाली पीढ़ियाँ, फिर ढोएँगी पाश।।

 *

नजर जहाँ भी जा रही, बहुधा प्लास्टिक ढेर।

रोक सको तो रोक लो, क्यों? करते हो देर।।

 

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष # ३०१ ☆ गीत – नारी  का  सम्मान  करें  हम… ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका एक गीत – नारी  का  सम्मान  करें  हम आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # ३०१ ☆

गीत – नारी  का  सम्मान  करें  हम☆ श्री संतोष नेमा ☆

नारी  का  सम्मान  करें  हम |

दिल  से गौरवगान  करें  हम ||

साथ खड़े हों हर अवसर पर,

जगजाहिर पहचान करें  हम ||

*

सदियों  से  हम  जिसे  पूजते |

सुख-दुख जिसके साथ बाँटते ||

धर्मशास्त्र    गाते    यश-गाथा,

नतमस्तक   हम  वंदन  करते ||

हक़  के लिए विधान करें  हम |

नारी   का   सम्मान  करें   हम |

*

एक       तिहाई       भागीदारी |

विपक्षियों    ने   ना   स्वीकारी ||

संसद    में     प्रस्ताव   गिराया,

महिलाओं    में    गुस्सा   भारी ||

मत    इनके   संसद   में   गूँजें |

अब  इसका  संज्ञान  करें   हम ||

नारी   का   सम्मान   करें   हम |

*

जिसने  हक   इनका   ठुकराया |

उन्हें  समय ने  सबक  सिखाया ||

धैर्य –  धर्म     इनका    पहचानें,

किसने   इनका   मान   घटाया ||

अपने    दुश्मन   को    पहचानें |

कभी न अब अपमान  करें  हम ||

नारी   का   सम्मान   करें   हम |

*

साथ   समय  के  सदा  खड़ी  है |

हर  मुश्किल  से  सदा  लड़ी  है ||

छेड़ें   मत  “संतोष”  इन्हें   अब,

इनकी   जग  में  आन  बड़ी  है ||

देती    हैं   ये    सबको  इज्जत |

बस  इसका भी भान  करें  हम ||

 नारी   का  सम्मान   करें   हम |

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 70003619839300101799

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – कविता ☆ लोक कथा – लोक देवता ☆ सुश्री मंजिरी “निधि” ☆

सुश्री  मंजिरी “निधि”

(बड़ोदा से सुश्री  मंजिरी “निधि” जी की गद्य एवं छंद विधा में  विशेष अभिरुचि है और वे साथ ही एक सफल  महिला उद्यमी भी हैं। आज प्रस्तुत है आपकी  लोक कथा – लोक देवता।)

 

? लोक कथा – लोक देवता ☆ सुश्री  मंजिरी “निधि” ? ?

?

राजस्थान के पोकरण में तंवर वंशीय राजपूत राजा अजमल थेl राजा श्री कृष्ण जी के परम भक्त थेl इनका विवाह भाटी राजवंश की मीनल देवी से हुआl विवाह के कई वर्षो तक इन्हें संतान सुख प्राप्त नहीं हुआl भक्त की भक्ति देख कृष्ण जी प्रसन्न हुए और वर मांगने को कहाl राजा ने कृष्ण को अपने पुत्र के रूप में प्राप्त करने की इच्छा रखीl ईश कृपा से राजा को दो पुत्र प्राप्त हुएl वीरमदेव और रामदेव l रामदेव जी का जन्म भाद्रपद की शुक्ल पक्ष की दूज को हुआl इनकी शादी सोढा राजपुतानी नेतलदे से हुआl

रामदेव जी ने समाज से जाती पाती, छुआछूत, सामाजिक कुरुतियों को जहाँ समाज से निष्कासित किया वहीं गरीबों एवं दलितों का उत्थान करने की प्रमुख भूमिका निभाईl यही कारण है कि देश के भिन्न प्रांतों के लोग देवता के रूप में उनकी पूजा करने लगेl मेघवाल समुदाय जो कि राजस्थान और गुजरात में खेती, पशुपालन, कांच के काम की कढ़ाई बुनाई के लिये विशेष रूप से जाने जाते हैं एक अनुसूचित जनजाति है, रामदेव जी ने उनके उद्धार हेतु कई काम कियेl

बाबा रामदेव ने जितना हिन्दु उत्थान हेतु काम किया उतना ही मुस्लिम समाज के उत्थान हेतु भी बहुत काम किये इसलिए इन्हें दोनों ही समुदाय के लोग मानते हैंl भादवा मेला जो कि बाबाजी के जन्मदिन दिवस पर लगता है उसमें दोनों ही समुदाय सम्मिलित होते हैंl ये हिन्दुओं के भगवान और मुस्लिम समुदाय के पीर हैंl

रामसा पीर ने समाज को शान्ति और चैन से जीने की सलाह दीl जहाँ भी आपको पंच रंग का ध्वज दिखे वहाँ आपको रामसा जी का मंदिर देखने को मिलेगाl इनके ध्वज में सफ़ेद रंग – पवित्रता, सादगी और शान्ति लिये, लाल रंग शक्ति, ऊर्जा, साहस और क्रांति लिये, पीला रंग -त्याग सात्विकता, मंगल और आध्यात्मिक शक्ति लिये, नीला रंग- एकता और निष्ठा लिये और हरा रंग -शान्ति, भाईचारा और समृद्धि लिये होता हैl अर्थात ऊंच नीच का अंत और सभी में एक का ही वास हैl

रामसा जी को घोड़े पर बैठा दिखाते हैं क्यूंकि घोड़ा इनकी शक्ति और गति से लोगों तक पहुंचने का प्रतीक हैl

ऐसा कहा जाता है कि रूणिचा में राम सरोवर किनारे भाद्र पक्ष की शुक्ल पक्ष की ग्यारस को इन्होने जीवित समाधि लीl

रणुजा ना राजा, अजमलजी   ना बेटा, वीरामदे ना वीरा,

राणी हेतलना भरथार, म्हारो हेलो सांभड़ो जी

© सुश्री  मंजिरी “निधि”
बड़ोदा, गुजरात

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शशि साहित्य # २१ – कविता – मेरा रचयिता… ☆ श्रीमती शशि सराफ ☆

श्रीमती शशि सराफ

(श्रीमती शशिसुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘मेरा रचयिता।)

☆ शशि साहित्य # २१ ☆

? कविता – मेरा रचयिता…  ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ  ? ?

🫟🫟🫟🫟🫟

बड़े मनोयोग से सुना रहे थे हम ,दास्तां अपनी,

चीत्कार सुन हड़बड़ा कर होश जो आया.

यह अजनबी मंजर नया नया सा था,

यह कुछ और नहीं!!!

अपने उन्ही शब्दों को,

लहुलुहान हो, चोट खाकर लौटते देखा..

 

ना टटोल मेरे मन को,

कि दोबारा सुनाऊं हाल,

अब तो खुद से भी कुछ कहने का अब मन नहीं..

 

शिकवा तो अब किसी से, कैसा भी नहीं.

हजारों साल से खड़े पत्थरों में,

धड़कनें सुनने की झूठी ख्वाहिश…

यह खता मेरी है, किसी और की तो नहीं..

 

मेरा सारा मनुहार, यूं व्यर्थ हो गया,

सींच कर खुद को,मेरे आंसुओं से,

वह और भी मजबूत हो गया.

अब मैं हूं और सिर्फ मेरा रचयिता,

वह अच्छा-अच्छा लिख रहा..

और मैं खुश होकर पढ़ रही.

© श्रीमती शशि सराफ

जबलपुर, मध्यप्रदेश 

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares