(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)
जीवन के कुछ अनमोल क्षण
तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित।
मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी से भेंट करते हुए।
बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए।
आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय व्यंग्य – थाली का रेगिस्तान: एक विलाप।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ९२ – व्यंग्य – थाली का रेगिस्तान: एक विलाप ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’☆
(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)
हवा में घुटन थी, जैसे किसी पुरानी हवेली के तहखाने में सदियों से बंद सन्नाटा। अलख निरंजन जी अपनी मेज पर वैसे ही विराजमान थे, जैसे कोई क्रूर तानाशाह अंतिम डिक्री जारी करने वाला हो। उनके सामने बैठी सुधा के हाथ कांप रहे थे, मानो वह रसोई से कोई पकवान नहीं, बल्कि अपनी किस्मत का फैसला लेकर आई हो। अलख जी की नजरें पहली थाली पर गिरी। उन्होंने नाक सिकोड़ी, जैसे किसी ने उनके सामने कोई सड़ा हुआ तर्क रख दिया हो। “भिंडी? यह लेडी फिंगर नहीं, किसी बूढ़ी सभ्यता की सड़ी हुई उंगलियां हैं, दांतों में फंसकर मेरी हालत खराब कर देंगी।” सुधा ने चुपचाप थाली बदली। दूसरी आई तो उन्होंने उसे अपराधी की तरह घूरा। “बैंगन? यह तो बे-गुन है, शरीर में वायु का ऐसा तांडव मचाएगा कि घर भूकंप की चपेट में आ जाएगा।” उनके चेहरे पर छाई वह कुटिल गंभीरता किसी कसाई की मुस्कान जैसी थी, जो छुरी चलाने से पहले मंत्र पढ़ता है।
सिलसिला थमा नहीं, वह तो एक लंबी शवयात्रा की तरह आगे बढ़ता गया। गोभी को उन्होंने “फूलों का कब्रिस्तान” कहकर ठुकरा दिया और मटर को “हरे रंग की गोलियां” बताया जो पेट में धमाका कर सकती हैं। लौकी को देखकर वे ऐसे बिदके जैसे सामने नागिन फन फैलाए खड़ी हो—”यह तो पानी का छल है, इसमें आत्मा कहाँ है?” करेले पर तो उन्होंने अपनी पूरी दार्शनिक क्षमता झोंक दी, बोले, “इतनी कड़वाहट तो समाज में भी नहीं, जितनी इस अधम फल में है।” आलू को उन्होंने “अहंकार का प्रतीक” माना और पनीर को “धोखेबाज रईस।” कटहल उन्हें मांस का स्वांग लगा, तो टमाटर रक्त के धब्बों जैसा। अरबी को उन्होंने फिसलन भरी राजनीति का नाम दिया और मूली को सामाजिक मर्यादा का दुश्मन। सुधा की आँखों से आंसू नहीं, मानो पिघला हुआ धैर्य बह रहा था। वह बीसवीं बार रसोई की ओर गई, एक ऐसी सब्जी लेकर जिसे ठुकराने का मतलब था अस्तित्व का अंत।
सुधा ने अगली सब्जी सामने रखी—तोरई। अलख जी ने उसे छुआ और पीछे हट गए जैसे करंट लग गया हो। “यह? यह तो किसी बीमार की अंतिम वसीयत जैसी पीली और मरी हुई है। इसे खाकर तो यमराज भी रास्ता भूल जाए।” पत्नी की सहनशीलता अब अपने चरम पर थी। कमरे का तापमान गिर रहा था। अलख जी ने मेज को धक्का दिया और चीख पड़े, “सुधा, इस घर में इतनी सारी सब्जी हैं, पर एक भी ऐसी नहीं जो मेरी अंतरात्मा को तृप्त कर सके। क्या तुम चाहती हो कि मैं भूखा मर जाऊं?” दुखी होते हुए बोले। सुधा स्थिर खड़ी थी। उसने अपनी साड़ी का पल्लू कमर में खोंसा और अलख जी के बहुत करीब जाकर खड़ी हो गई। उसकी आँखों में इतना गुस्सा था कि शब्दों में बयान करना मुश्किल है। अलख जी डरकर कुर्सी से चिपक गए।
अचानक सुधा ने अलख जी के सामने एक खाली प्लेट रखी। बिल्कुल कोरी, चांदी जैसी चमकती हुई। अलख जी ने हकलाते हुए पूछा, “इसमें… इसमें क्या है?” सुधा ने एक अदृश्य निवाला तोड़ा और अलख जी के मुँह के पास ले गई। “खाओ,” उसने आदेश दिया। अलख जी ने मुँह खोला, कुछ महसूस नहीं हुआ। “स्वाद कैसा है?” सुधा ने पूछा। अलख जी की आँखें फटी की फटी रह गईं, “अरे! यह तो अद्भुत है! ऐसा स्वाद तो स्वर्ग में भी नहीं होगा! क्या है यह?” सुधा धीरे से मुस्कुराई। उसने कहा, “यह आपका अपना ‘अहंकार’ है। पिछले चालीस मिनट से आप वही तो उगल रहे थे। मैंने बस उसे ही फ्राई करके परोस दिया है। इतनी सारी सब्जियां तो केवल बहाना थीं, असली व्यंजन तो आपका वह कुतर्क था जिसे दुनिया ‘नखरा’ कहती है।” अलख जी ने प्लेट देखी, वह अभी भी खाली थी, पर उनके पेट से डकार आई। वे हतप्रभ थे कि उन्होंने बिना कुछ खाए अपना पूरा अस्तित्व ही डकार लिया था।
(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)
वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।
प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन
आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय हास्य – व्यंग्य “महिला आरक्षण बिल और वर्मा जी”।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # २४ ☆
☆ हास्य – व्यंग्य ☆ “महिला आरक्षण बिल और वर्मा जी” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆
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बहुत सुबह डोरवेल बजी, मैं समझ गया कि अवश्य ही किसी समस्या के साथ वर्मा जी आए होंगे। दरवाजा खोला, मेरा अनुमान सही था। वर्मा जी अंदर आकर चुपचाप पालथी मारकर सोफे पर बैठ गए। मैं अखबार पढ़ने लगा।
वर्मा जी का मौन टूट ही नहीं रहा था। कुछ देर बाद मैंने पूछा – क्या बात है वर्मा जी ? वे बोले – बहुत बुरा हुआ भाई साहब और फिर मौन हो गए ! इतने में मेरी पत्नी चाय लेकर आ गई। वर्मा जी की मुद्रा देख कर उसने भी प्रश्न किया – क्या बात है वर्मा जी आज इतनी उदासी के साथ मौन ? वे चाय की चुस्की लेते हुए बोले – भाभी जी बहुत बुरा हुआ। मैंने कहा – भाई जी, बुरा कहां हुआ ? कल आपके घर गैस का सिलेंडर आ गया है, डीजल, पेट्रोल भी मिल रहा है। ट्रंप का दिमाग दुरुस्त चलते ईरान – अमेरिका युद्ध भी समाप्त होने की ओर बढ़ रहा है और आप कह रहे हैं कि बहुत बुरा हुआ ? वे बोले – भाई साहब आज गैस, पेट्रोल, ईरान – अमेरिका की बात नहीं, मैं तो संसद में महिला आरक्षण बिल फेल हो जाने के संदर्भ में कह रहा हूं कि बहुत बुरा हुआ। मैंने कहा भाई जी इस बिल के पीछे सरकार और विपक्ष का जो भी नजरिया या राजनीति हो वह अलग बात है, लेकिन यहां मुझे फिल्म “बाजीगर” का एक डायलॉग याद आ रहा है जिसे शाहरुख खान ने हीरोइन के पिता से जानबूझ कर कार रेस हारने के बाद बोला था – “जीतने के लिए हारने वाले को बाजीगर कहते हैं”। सब जानते हैं कि मोदी जी “बाजीगर” हैं, उनकी हार के पीछे कोई राज हो सकता है ! वैसे महिला आरक्षण बिल फेल हो जाने से देश के स्वार्थी पुरुष अवश्य ही खुश हो रहे होंगे। मेरी बात सुनकर वर्मा जी का दर्द छलक पड़ा, आँखें डबडबाई आईं। वे बोले – भाई साहब, मेरे सपने तो चकनाचूर हो गए। सोचा था अपनी पत्नी को लोकसभा का चुनाव लड़ाउंगा और सरपंच पति, पार्षद पति, विधायक पति की तरह सांसद पति कहलाऊंगा, पर हाय री किस्मत। मैंने कहा – वर्मा जी, दुखी न हों 29 में न सही 34 के चुनाव तक तो महिला आरक्षण लागू हो ही जाएगा। 34 के चुनाव के लिए अभी पर्याप्त समय है आप भाभी जी के नाम से समाज सेवा और चुनाव प्रचार तो चालू कर ही दें ताकि जीत पक्की हो जाए। जब भाभी जी समाज सेविका और लोकसभा की भावी प्रत्याशी कहलाएंगी तब भी आपकी ही इज्जत बढ़ेगी। वे राहत की सांस लेते हुए बोले – भाई साहब आपने सही कहा, लेकिन 34 के चुनाव के लिए अभी लगभग 9 साल हैं इतना लंबा समय कटेगा कैसे ? मैंने कहा- भाई जी आप तो भाभी जी की समाज सेवी और भावी लोकसभा प्रत्याशी की छवि बनाने में जुट जाइए समय तो चुटकियों में बीत जाएगा, बल्कि कहीं ऐसा न हो कि समय कम पड़ जाए और आपको पछताना पड़े।
मेरी बात सुनकर वर्मा जी उठ खड़े हुए। मैंने पूछा क्या हुआ, कहां जा रहे हैं ? वे बोले – भाई साहब, देर नहीं करना चाहता, पत्नी की छवि बनाने का कार्य शुरू कर ही दूं।
(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “तिनके…”।)
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता ‘युद्ध और धुआं…‘।)
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “नेकी कर, यूट्यूब पर डाल…“।)
अभी अभी # ९७७ ⇒ आलेख – नेकी कर, यूट्यूब पर डाल श्री प्रदीप शर्मा
होते हैं इस संसार में चंद ऐसे नेकचंद, जो नेकी तो करते हैं, लेकिन नेकी की कद्र ना करते हुए उसे दरिया में बहा देते हैं। दरिया के भाग तो देखें, नेकी की गंगा तो दरिया में बह रही है और राम, तेरी गंगा मैली हो रही है, पापियों के पाप धोते धोते। फिर भी देखिए, एक संत का चित्त कितना शुद्ध है, चलो मन, गंगा जमना तीर। हम कब नेकी की कद्र करना जानेंगे।
जिस तरह जल ही जीवन है, उसी तरह अच्छाई, जिसे हम नेकी कहते हैं, वह भी एक लुप्तप्राय सद्गुण हो चला है, इसे सुरक्षित और संरक्षित रखना ही समय की मांग है, इसे यूं ही दरिया में बहाना समझदारी नहीं।।
अच्छाई का जितना प्रचार प्रसार हो, उतना बेहतर। किताबों के ज्ञान की तुलना में व्यवहारिक ज्ञान अधिक श्रेष्ठ है। कहां हैं आजकल ऐसे लोग ;
भला करने वाले,
भलाई किए जा।
बुराई के बदले,
दुआएं दिए जा।।
हमारा आज का सिद्धांत, जैसे को तैसा हो गया है। कोई अगर आपके एक गाल पर चांटा मारे, तो बदले में उसका मुंह तोड़ दो। नेकी गई भाड़ में। देख तेरे नेकी के दरिये की, क्या हालत हो गई भगवान, कितना बदल गया इंसान।
कहते हैं, आज की इस दुनिया में बुराई और पाप बहुत बढ़ गया है। पाप का घड़ा तो कब का भर जाता। कुछ नेकी और कुछ नेकचंद, यानी कुछ अच्छाई और कुछ अच्छे लोग आज भी हमारे बीच हैं, जिनके पुण्य प्रताप से हम अभी तक रसातल में नहीं समाए। लोग भी थोड़े समझदार और जिम्मेदार हो चले हैं। नेकी की कद्र करने लगे हैं। कुछ लोग नेकी को आजकल दरिया में नहीं व्हाट्सएप पर अथवा फेसबुक पर भी डालने लगे हैं।।
व्हाट्सएप पर तो मानो फिर से नेकी का ही दरिया बह निकला है। व्हाट्सएप भी हैरान, परेशान, बार बार संकेत भी देने लगता है, forwarded many times, लेकिन नेकी है, जो बहती चली आ रही है। किसी ने नेकी को व्हाट्सपप से उठाकर फेसबुक पर डाल दिया। खूब लाइक, कमेंट और शेयर करने वाले मिल रहे हैं नेकी को। नेकी की इतनी पूछ परख पहले कभी नहीं हुई, जितनी आज सोशल मीडिया में हो रही है। हाल ही में एक मित्र ने व्हाट्सएप पर एक ग्रुप बनाया, एक बनेंगे, नेक बनेंगे और मुझे बिना मेरी जानकारी के उसमें शामिल भी कर लिया। जब मैंने पूछा, तो यही जवाब मिला, नेकी और पूछ पूछ।
टीवी पर दर्जनों धार्मिक चैनल इस नेक काम में लगे हुए हैं, कितने सामाजिक, धार्मिक और पारमार्थिक संगठन और एन.जी. ओ. नेकी की मशाल से जन जागृति फैला रहे हैं। लोग तो आजकल अपनी प्रकाशित पुस्तकें भी अमेजान पर डालने लगे हैं। हमारे मुकेश भाई अंबानी ने भी जिओ नेटवर्क की ऐसी नेकी की मिसाल पेश की है कि हमारा भी मन करता है, हम भी कुछ नेकी यू ट्यूब पर डाल ही दें। आपसे उम्मीद है आप हमारे चैनल को लाइक, शेयर और सब्सक्राइब अवश्य करेंगे।
आप भी आगे से ध्यान रखें, व्यर्थ दरिया में डालने के बजाए, नेकी करें और यूट्यूब पर बहाएं और दो पैसे भी कमाएं।।
☆ आग – भाग १ (भावानुवाद) – हिन्दी कथाकार : डॉ हंसा दीप ☆ डाॅ. मीना श्रीवास्तव ☆
डॉ. हंसा दीप
किती घोर अन्याय होता हा!
इतक्या आल्हाददायक वातावरणात घरातच राहणे ही अत्यंत कठोर शिक्षा होती. बर्फाळ दिवस उलटल्यानंतर जुलै आणि ऑगस्टमध्ये हवामान जेमतेम दोन-तीन महिने कृपावंत व्हायचे. लोक घराबाहेर पडायचे. असे कांही सुखद दिवस मुक्कामास येत नाहीत तोच आसमंताला धूर घेरून टाकत असे. लोकांना घरातच राहण्याचा सावधगिरीचा इशारा देण्यात येई. निव्वळ मोजक्या दिवसांच्या प्रखर उन्हामुळे धरतीवर इतकी उष्णता निर्माण व्हायची की जंगलात घर्षणामुळे आग लागायची. आग इतक्या भयानक वेगाने पसरायची जणू हजारो किलोमीटर व्यापलेल्या जंगलाच्या या अग्निकुंडात समिधाच अर्पण व्हायच्या! या आगीच्या दाहकतेचा अनुभव घेणारी अनेक शहरे रिकामी केली जायची. जिकडे तिकडे आग, आग आणि फक्त आगीचेच साम्राज्य.
कॅनडातील अल्बर्टा येथील जळणारी आणि जाळणारी वनराई!
वेगवान वाहणाऱ्या वाऱ्यांवर स्वार होत आगीतून निघणारा घनदाट धूर दशदिशांत स्वैर संचार करायचा आणि एडमंटन आणि कॅलगरीसह अनेक शहरांना आपल्या कवेत कवटाळून घ्यायचा. हे अग्निचक्र साधारणपणे दरवर्षी नित्यनेमाने सुरूच असायचे. वातावरण प्रदूषित करीत जाणारे हे धूम्रवलय अल्बर्टा प्रांत आणि त्याच्या पल्याड देखील विनासायास अनिर्बंधरित्या पसरत राहायचे. अग्निज्वालांचे भीषण तांडव इतके तीव्र असायचे की बहुतेक प्रभावित क्षेत्रात सरकारी प्रयत्न निष्प्रभ ठरायचे. दूरवर फैलावत चाललेले धुराचे वलय हेच दर्शवीत असायचे की आगीचे भीषण स्वरूप किंचितही कमी झाले नव्हते. ही प्रदीप्त अग्निज्वाळा वारा नेईल त्या दिशेने त्याच्या संगतीत प्रचंड आवेगाने फरफटत जात आणखीनच क्रियाशील होत होती.
बाहेर जाऊन मोकळी स्वच्छ हवा अनुभवू इच्छिणाऱ्या लोकांचे स्वागत करायला धुराची उबदार वाकळ सज्ज असायची. त्यांची इच्छा असो कां नसो, त्यांना एक तर या गरम पांघरुणात स्वतःला लपेटून घ्यावे लागे, किंवा त्याची ऊब नकोशी असल्यास स्वतःला घरात कोंडून घ्यावे लागे. हाच तो वन्य वणवा. मी जंगलीपणाच्या आहारी गेलेल्यांच्या पाशवी जिद्दीविषयी ऐकले होते. मात्र या वन्य वणव्याच्या जिद्दीने पेटवलेला प्रकोप प्रथमच डोळ्यांसमोर प्रकटला होता. जणू शिवशंकराने त्याचा प्रलयंकारी आग ओकणारा तिसरा नेत्र उघडलाय असा आभास होत होता. कुठल्याही उपायाने या आगीचा क्रोध शमण्याचे चिन्ह दिसत नव्हते. अनियंत्रित गुंडगिरी अंगात भिनलेल्या झुंडीसारखी ही आग कोणाच्याच आटोक्यात येत नव्हती. आता तर सैरावैरा धावणाऱ्या या अग्निज्वाळांचा जणू स्वतःवरील ताबा नष्ट झाला होता.
मेघांचा वेगळाच हट्ट होता, न बरसण्याचा. मग सृष्टी हतबल झाली. पावसाचा एकही थेंब झिरपला नाही आसमंतातून! हेलिकॉप्टरच्या मदतीने पाडण्यात आलेल्या कृत्रिम पावसाच्या सरींनी देखील कांहीच साध्य झाले नाही.
शेवटी उरली ती भडकलेली आणि करपून टाकणारी आग, आतली आणि बाहेरचीही! आतून आणि बाहेरूनही पेटलेली आग. बाहेर असलेली जंगलातील आग सर्वांना दिसत होती. पण आतल्याआत मला होरपळून टाकत धगधगणारी आग माझी स्वनिर्मित होती. त्या आगीच्या धुराने मला वेढून टाकले होते. त्या ज्वालांत मी एकटा जळत होतो, माझ्या मुलाशिवाय, लिली या माझ्या लाडक्या पत्नीशिवाय, माझ्या कुटुंबाशिवाय. शेवटी एकल माणसाची कुठली ओळख तरी असते कां?
कालपर्यंत जे कुटुंब डेरेदार वृक्ष होते, ते आज फक्त एक निष्पर्ण पोकळ खोड उरले होते, तेही घटस्फोट या शब्दाच्या साखळ्यांनी जखडलेले! संबंधविच्छेद होताच मला आता त्या प्रेमबंधनाने दोन जीवांना जोडणाऱ्या प्रत्येक धाग्याचा स्पर्श स्मरत होता. एक वेळ अशी होती की लिलीचा सुंदर चेहरा पाहिल्याशिवाय मला करमत नसे. तिकडे तीही तितकीच बेचैन असायची. या उन्मादात जगाला विसरून जात आम्ही दोघेही एकमेकांच्या प्रेमात आकंठ बुडालो होतो. आम्ही तासनतास बोलत असू. या संवादाचे चक्र कधीच थांबत नसे. आम्हाला एकमेकांचा विरह अजिबात सहन होत नसे. आमचे लग्न देखील मोठ्या थाटामाटात झाले, म्हणतात ना ‘बिग फॅट वेडिंग’, तसे!
लग्नानंतर मोहक स्मितहास्य करणारा लिलीचा चेहरा माझ्यासाठी दररोज जणू नवतीचे नजराणे घेऊन येत होता. तिचे ते खळखळणारे हास्य कानांत साठवून घेण्यासाठी माझे कान आसुसलेले असायचे. ते मधुर हास्य कायम राहावे यासाठी मी नाना क्लुप्त्या करून पाहत असे. कधी तर मी तिला तिच्या आवडत्या उपाहारगृहात घेऊन जायचो, तर कधी शॉपिंग मॉलमध्ये! या सर्वांहूनही तिला रम्य निसर्गाच्या सानिध्यात राहणे खूप आवडायचे. त्यासाठी मी दर महिन्याला तिची आवड ध्यानात घेत सहलीची योजना आखायचो. कधी कॅम्पिंग करायचे, कधी गिर्यारोहण तर कधी क्लाइंबिंग! तीही प्रणयाराधनात मागे नव्हती. ती माझ्या आवडीचे पदार्थ अगदी निगुतीने रांधायची आणि मला प्रेमाने खाऊ घालायची. ते पदार्थ आवडल्याचे निदर्शक असलेले माझे थम्सअपसहित मनमुराद हास्य बघताच तिचा चेहरा लाजेने लालेलाल व्हायचा. त्या गुलाबी दिवसांत आम्ही एकमेकांमध्ये बेभानपणे इतके हरवून जायचो की आम्हाला जगाची कसलीच पर्वा नसायची.
बेधुंद करणाऱ्या पहाटवेळा आणि अत्यंत आतुरतेने ज्यांची प्रतीक्षा केली जायची त्या उन्मत्त रात्री. प्रत्येक दिवशी हे असेच व्हायचे. कामावर जायचे अगदी जीवावर यायचे.
“ऐक ना, आज कामावरून सुट्टी घेऊ या. “
“वैद्यकीय रजा घेऊ या. ”
“नको, त्यापेक्षा वर्क फ्रॉम होम (घरून काम) करणे ठीक राहील. ”
या संभाषणानंतर आम्ही पुन्हा एकदा इतके निकट यायचो की आमच्यामध्ये शब्दाचा देखील आडपडदा येऊ शकत नसे. कामाचा कुठलाच ताणतणाव आम्हाला दिवसाढवळ्या देखील जवळ येण्यापासून रोखू शकत नव्हता. बस, एकच गोष्ट मनात भिनली होती, आम्ही पूर्ण समर्पणभावनेने एकमेकांमध्ये विलीन झालो होतो. जणू आमचे वेगळे अस्तित्वच नव्हते. प्रत्येक दिवसाचा प्रारंभ मंदगतीने होत असे, पण नंतर जसजसा तो पुढे सरकत असे, तसतसा घड्याळाच्या काट्यांच्या मागे पळत जातांना इतका व्यस्त होत असे की तो कधी संपायचा ते आम्हाला कळतही नसे. दोघांच्याही मनांत एकमेकांच्या अधिकाधिक सामिप्याव्यतिरिक्त इतर कुठलीच कामना नव्हती.
हर्षोल्लास आणि प्रेमानुभवांचा अमर्याद खजिना दिवसागणिक वर्धमान होतच होता. आम्ही असे आनंदलहरींवर तरंगत असतांनाच आमच्या प्रेमाच्या वेलीवर एक पुष्प उमलले. बिट्टू आमच्या आयुष्यात आला. सुखाच्या वर्तुळाचा घेर चौपट झाला. आता आम्ही दोघांचे तीन झालोत. आमच्या घराला आता खरे घरपण आले. ते जणू एक पवित्र मंदिर झाले. असे म्हणतात की कळसावर कोणीही अधिक काळ थांबू शकत नाही, त्याला खाली उतरावेच लागते. आम्ही देखील मात्र तृप्ततेच्या शिखरावर असतांनाच या पूर्णत्वास गेलेल्या घराच्या भिंतींना भेगा पडल्या. या भेगांनी भिंती अशा कांही खोलवर पोखरल्या गेल्या, की त्या भूकंप आल्यासारख्या हादरून जायला लागल्या. कदाचित आमच्या जीवनातील आनंदपर्व संपवण्याची काळालाच घाई झाली असावी. तसेही सगळ्या वेळा सारख्या थोड्याच असतात? बिट्टू सहा महिन्यांचा होता होता आमच्या प्रेमाची गंगा उलट्या दिशेने प्रवाहित होत गेली. आमच्या प्रेमाचा पतंग जितक्या वेगाने उंच उंच उडत गेला होता, त्यापेक्षा अधिक वेगाने तो खाली आला. या पतंगाची फाटून पार दुर्दशा झाली होती. आता प्रत्येक क्षणी दुसऱ्याची मदत करायला आम्ही हात आखडता घेत होतो.
कटू संवादांच्या मालिकेने घर बेचैन व्हायचे.
“रात्रभर बिट्टू रडत होता. पण तुला एकदाही उठून बघावेसे वाटले नाही की तो इतका कां रडतोय? “
“अगं, त्याला भूक लागली असेल, दूध तर तूच पाजणार होतीस ना, मी उठून काय करणार होतो? ”
“अरे, तो दरवेळी दुधासाठी उठत नाही. ”
“मग मला उठवायचे की. “
“कधीतरी स्वतः होऊन काहीतरी करायचे ना. प्रत्येक गोष्ट सांगायलाच हवी कां? कधीतरी तू समजून घ्यायला नको कां?
“बरं बाई, मी खरोखर मूर्खच आहे. तुला कोणत्या वेळी काय हवे असते हे मला समजू शकत नाही. ”
ती पाय आपटत तरातरा निघून जायची. या लहान सहान गोष्टी मोठमोठ्या मतभेदांच्या भेगांचा पाया आणखीनच मजबूत करायच्या. हातातील वस्तू जमिनीवर आदळत होत्या, त्यांचा आवाज वाढायला लागला की मी घराबाहेर निघून जायचो. हळूहळू कर्कश झालेल्या संवेदना आता धीट झाल्या होत्या. हे चिडचिड करणारे आवाज आता त्रासदायक व्हायला लागले. त्यांचे माझ्या मनावर आणि शरीरावर वाढत चाललेले ओझे मला सहन होईनासे झाले. कर्णकटू कोलाहल आता सतत माझ्या कानांशी अरेरावी करीत खोल घुसत होता. आता कुठलेही मधाळ शब्द कडव्या विषासारखे वाटायला लागले. आम्ही एकमेकांवर आरोप-प्रत्यारोपांचे तीक्ष्ण वाग्बाण चालवत असतानांच मध्येच निरागस बिट्टूचे रडणे टिपेला जात असे. कोणे एके काळी प्रेमाचे मंदिर असलेले आमचे घर जणू तिघांच्या आवाजाने कातावून जात स्वतःच उच्चरवाने आक्रोश करीत होते. प्रेमाच्या गुलाबपाण्याने शिंपलेल्या मायाळू भिंतीचे आता कठोर सिमेंट आणि मजबूत मातीच्या लिंपणाने एका भावविहीन डोलाऱ्यात कधी रूपांतर झाले ते आम्हांला कळलेच नाही.
“इतक्या जोरात ओरडत जाऊ नकोस, लिली. माझी नाही तर किमान बिट्टूची तरी काळजी घे. “
“तू इथे असतांना ओरडल्याशिवाय काहीच होत होत नाही रे! त्याशिवाय तुला ऐकायला येतं कुठे? ”
“हो, सगळी चूक माझीच आहे! “
माझं, माझं, माझं… माझ्या कानाभोवती घोंघावणाऱ्या या शब्दांनी मला धक्का बसला. मी भानावर आलो, कारण हे माझं घर नव्हतं तर समुद्रकिनारा होता. मात्र माणसांच्या गर्दीतही मी इथे एकटाच होतो. पण ते किंचाळणारे आवाज माझा पाठलाग करत होते. गरम वाळू माझ्या शरीराला खोलवर टोचत होती. मला हेच तर हवे होते. एकाच वेळी जितकी जमेल तितकी उष्णता देऊन टाक म्हणावं. उष्णतेला तोंड देण्यासाठी समुद्राचे जलसिंचन तयार होतेच. पाण्यात डुबकी मारून झाल्यावर ते सुकवण्यासाठी फिरून गरम उन्हात सूर्यस्नान. क्रिया आणि प्रतिक्रिया यांचा पाठशिवणीचा खेळ!
गरम वाळू माझ्या शरीराला खोलवर टोचत होती. मला हेच तर हवे होते. एकाच वेळी जितकी जमेल तितकी उष्णता देऊन टाक म्हणावं. उष्णतेला तोंड देण्यासाठी समुद्राचे जलसिंचन तयार होतेच. पाण्यात डुबकी मारून झाल्यावर ते सुकवण्यासाठी फिरून गरम उन्हात सूर्यस्नान. क्रिया आणि प्रतिक्रिया यांचा पाठशिवणीचा खेळ!
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– क्रमशः भाग पहिला
हिन्दी कथालेखिका : डॉ. हंसा दीप
संपर्क – Dr. Hansa Deep, 22 Farrell Avenue, North York, Toronto, ON – M2R1C8 – Canada
☆ मोक्ष… भाग – २ – लेखिका : भारती ठाकूर ☆ प्रस्तुती – शशी नाईक-नाडकर्णी ☆
(खूप विचार केल्यानंतर एक युक्ती मला सुचली. कै. परांजपे यांच्या मुलाला मी इथे काय चर्चा चालू आहे लोकांमध्ये ते फोनवर सांगितलं. त्याला मी सांगितलं, की ‘ वडलांच्या चितेला अग्नी देणे हे मुलगा म्हणून माझं कर्तव्य आहे. आमचे सगळेच नातेवाईक अंत्यसंस्कारासाठी इथे पोहोचू शकणार नाहीत. माझी आई सुद्धा येऊ शकत नाहीये. अशावेळी किमान मला अस्थिकलश घेऊन जाता यावा म्हणून तरी पार्थिव शरीराचे दहन होणे आवश्यक आहे. ’– असे तू त्या स्वामीजींना सांग. महत्त्वाची गोष्ट म्हणजे या वादात मी जिंकले. गावकरी आणि ते स्वामीजी नर्मदा किनाऱ्यावर कै. परांजपे यांचा अंत्यसंस्कार करण्यास तयार झाले.) — इथून पुढे – –
संध्याकाळी अंधार पडू लागला तसे अंत्यक्रियेसाठी लोक जमू लागले. कोणी फुलं हार तर कुणी उदबत्ती असं घेऊन आले. विशेष म्हणजे थोड्याच वेळात बँड पार्टी सुद्धा पोचली. परिक्रमावासीचा नर्मदा किनारी मृत्यू होणे हे भाग्याचं लक्षण आहे. तो दुःखाचा नाही तर आनंदाचा क्षण आहे म्हणून हा बँड बाजा.. खूपच गहिवरून आलं होतं मला. रात्री साडेनऊच्या सुमारास परांजपे यांचा मुलगा, मुलगी आणि जावई तसेच श्री. वाळुंजकर तिथे पोहोचले. कुणीही बोलण्याच्या मनस्थितीत नव्हतं. निशब्दपणे एकमेकांच्या भावना आमच्यापर्यंत पोहोचत होत्या. वाजत गाजत अंत्ययात्रा नर्मदा किनाऱ्यावर गेली. कार्तिकी पौर्णिमेचा चंद्र अगदी माथ्यावर आलेला होता.
त्यांच्या मुलीला – पूजाला सोबत म्हणून मी आश्रमातच थांबले. भांबावली होती बिचारी. थोड्याच वेळात माझ्या लक्षात आलं ही सगळी मंडळी अंत्ययात्रेला गेलीत पण आश्रमातले स्वामीजी आणि त्यांचे गावातच राहणारे एक परिचित हे दोघे मात्र आश्रमातच थांबले आहेत. न राहवून मी विचारलं त्यांना, “ दिवसभर तुम्ही इतकं सहकार्य केलं. मग आता अंत्यविधीसाठी का नाही गेलात? ” कदाचित जलसमाधी दिली नाही म्हणूनही स्वामीची गेले नसावेत असं मला क्षणभर वाटून गेलं. पण ते म्हणाले, “हम कैसे जा सकते है? हमारा असली काम तो अब चालू होगा | इन लोगोने भोजन नही किया है।भोजन की तयारी भी तो करनी है |” दोघांनीही आंघोळी केल्या आणि स्वयंपाकाला लागले. त्यांनी दाल बाटी चा बेत केला. कमी वेळात जास्त माणसांसाठी स्वयंपाक करायचा असेल तर दालबाटीला पर्याय नसतो.
अंत्यविधी झाल्यानंतर मंडळी परतली. त्यात गावकरीही होते. त्या सगळ्यांना स्वामीजींनी आणि त्यांच्या त्या गावातल्या सहकाऱ्याने प्रेमाने जेवू घातलं. दुसऱ्या दिवशी अस्थिकलश घेऊन कै. माधव परांजपे यांचे चिरंजीव शांतिशआणि लेक- जावई पुण्याला परतले.
अशीच एक घटना गेल्या वर्षी घडली. दिलीप गोखले हे माझी नाशिक ची मैत्रीण सौ. माधुरी माटे हिचे बंधू.
ते नर्मदा परिक्रमेत आहेत हे समजलं होतं. अशी अनेक मंडळी परिक्रमेत असतात. प्रत्येक वेळी भेट होऊ शकतेच असेही नाही. मुळात लेपा, भट्याण आणि छोटी खरगोन या ठिकाणी आमच्या ज्या गरीब कुटुंबातील मुलांसाठी निशुल्क शाळा चालतात त्याचे व्यवस्थापन आणि आर्थिक जुळवाजुळव यामध्येच वेळ इतका जातो की परिक्रमावासी आमच्याकडे लेपाला आले तरी त्यांच्याशी फार गप्पा गोष्टी होऊ शकतात असं नाही. नंतरही प्रत्येकाशी फारसा संपर्क राहतोच असेही नाही. त्यामुळे दिलीप गोखले येऊन गेले असतील आमच्याकडे पण मला नाव आठवत नव्हतं. एक दिवस भल्या पहाटे माधुरीचा फोन आला. तिचा भाऊ दिलीप नरसिंगपूर जवळच्या एका आश्रमात रात्री झोपेतच हृदयविकाराचा झटका येऊन मृत्यू पावला. त्याचं कुटुंब मुंबईला तर माधुरी नाशिकला. दोन्ही कुटुंबांनी लवकरात लवकर नरसिंगपूरला पोहोचायचं ठरवलं तरी दीड दोन दिवस लागणार होते. श्री दिलीप गोखले यांच्या मोबाईल मध्ये मुलाचा नंबर मिळाला म्हणून संपर्क तरी झाला. एकटेच परिक्रमा करत होते. म्हणून पोलिसांनी पोस्टमार्टेम करावं लागेल असं सांगितलं. आता काय करायचं? माधुरी आणि तिचे नातेवाईक काळजीत होते. माझ्याशी फोनवर संपर्कही चालू होता. अचानक मला आठवलं, महिनाभरापूर्वीच नरसिंगपूरचे डॉक्टर चांदोरकर व त्यांच्या पत्नी आमच्याकडे लेपाला येऊन गेले होते. त्यांचा परिचय झाला होता. त्यांना मी फोन केला. ही अडचण सांगितली. तर म्हणाले आता तुम्ही कुठलीच काळजी करू नका. या पुढची सर्व जबाबदारी माझी. माझा फोन नंबर दिलीप गोखले यांच्या नातेवाईकांना द्या. विशेष म्हणजे पोस्टमार्टेम करून घेण्यापासून तर पार्थिवाला बर्फाच्या पेटीत ठेवून स्वतःच्याच दवाखान्यात ठेवणे ही सोय त्यांनी केली. दुसऱ्या दिवशी दिलीप गोखले यांचे नातेवाईक तिथे पोहोचले तर बर्मानघाट येथे अंत्यसंस्काराची सर्व सोय आधीच तयार होती. मानवता म्हणून ही सोय करणं, त्यांच्या नातेवाईकांच्या राहण्याची भोजनाची सोय करणं हे मी समजू शकते. पण प्रसंग ओळखून त्यांच्या परतीच्या प्रवासा साठी रेल्वेचे आरक्षण करणे – जे मला कदाचित सुचलं देखील नसतं, ती व्यवस्थाही डॉक्टर चांदोरकर यांनी करून ठेवली होती.
नर्मदा परिक्रमा करत असताना एक महंत मला म्हणाले होते, “ नर्मदा परिक्रमा केलीत म्हणजे तुमचा सीमित परिवार असीम परिवार होतो. ” याचा अनुभव या अशा प्रसंगातून येतो.
नर्मदा परिक्रमा करत असताना परिक्रमावासी जर मृत्यू पावला तर त्याला स्वर्ग प्राप्ती होते अथवा मोक्ष मिळतो असे म्हणतात. स्वर्ग आणि मोक्ष ही काय भानगड आहे हे आपण स्वतः मेल्याशिवाय कसं कळणार? अशा वेळी मात्र मला विनोबाजींनी केलेली मोक्षाची व्याख्या आठवते. विनोबा म्हणतात, मोक्ष म्हणजे काय? मोहाचा क्षय म्हणजे मोक्ष. ही व्याख्या मला मनापासून पटते. कारण भौतिक आयुष्यात कुठलाच मोह उरलेला नसतो म्हणून हे लोक परिक्रमेला येतात.
मला मात्र मोक्ष म्हटला की स्वामी विवेकानंद यांची आठवण येते. ते म्हणत मी साधना भलेही करत असेन. पण ती मोक्षासाठी नाही. जोपर्यंत या देशातला एखादा बेवारशी कुत्रा देखील उपाशी आहे तोपर्यंत मी मोक्षप्राप्तीची कामना करणार नाही. स्वामी विवेकानंद माझे आदर्श! त्यांच्या या संकल्पात मला थोडी भर घालावीशी वाटते. माझ्या स्वतःच्या बाबतीत. जोपर्यंत या देशातला गरीबातला गरीब मुलगा अथवा मुलगी शिक्षित होत नाही तोपर्यंत मलाही मोक्ष नको. अगदी मी नर्मदा किनार्यावर रहात असले तरी.
– समाप्त –
लेखिका : भारती ठाकूर
नर्मदालय, लेपा पुनर्वास (बैरागढ) जिल्हा खरगोन, मध्य प्रदेश.
प्रस्तुती : शशी नाडकर्णी-नाईक
≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈
☆ “समिधाच सख्या या!!” – लेख क्र. ३. ☆ प्रा.भारती जोगी ☆
गौतम बुद्ध यांची पत्नी – यशोधरा.
अबला जीवन हाय! तेरी यही कहानी,
आंचल में है दूध और आंखोंमें पानी!
हे उद्गार आहेत… हिंदी कविवर्य मैथिलीशरण गुप्त यांच्या एका प्रसिद्ध रचनेतील!
एक रात्र… शाक्य गणराज्याच्या राजपुत्र सिद्धार्थ ची पत्नी *यशोधरा* सुशील, सौंदर्यवती, जिच्या प्रसव वेदना अजुनही ताज्या च आहेत मनात… एक दिवसाचा नवजात पुत्र राहुल मातेच्या कुशीत आश्वस्त होऊन गाढ झोपलेला… यशोधरा ही क्लांत पण पुत्र जन्माच्या आनंदात,
पुढील आयुष्याच्या स्वप्नात शांत, निश्चिंत मनाने झोपलेली! आणि… अशावेळी अघटित घडते… तीन प्रसंग
जरा, मृत्यू आणि व्याधी बघून व्यथित झालेला सिद्धार्थ, जीवनाचं सत्य शोधायला… पत्नी यशोधरा, पुत्र राहुल, राजसी ऐश्वर्य, आणि परिवार या सगळ्याचा त्याग करून… दूर निघून जातो. सुंदर पत्नी, नवजात पुत्र यांचा मोह ही त्याला थांबवू शकत नाही. नंतर त्याला कठोर तपश्चर्येनंतर ज्ञानप्राप्ती होते, तो *गौतम बुद्ध* होतो. त्याची कथा इतिहासात, आणि आध्यात्मिक इतिहासात नोंदली गेली. पण… *यशोधरेचं* काय? जिला तो न भेटताच, तिचा साधा निरोप ही न घेता… निर्मोही बनून, तिला मागे नवजात पुत्रासह सोडून गेला??
त्याच्या मागे यशोधरा आणि राहुल कसे राहिले? त्यांचं काय झालं? याची कुठेच नोंद नाही. सिद्धार्थ च्या तपात तिचंही… एक पत्नी, एक सून, एक माता म्हणून योगदान उपेक्षितच राहिलं ना!
यशोधरा फक्त सिद्धार्थ ने सोडून दिलेली पत्नी नाहीच मुळी!! तिचेही अधोरेखित करावेत असे किती तरी पैलू आहेतच की!!
यशोधरा… मौनातल्या दृढतेची आणि धीरोदात्त, खंबीर, निग्रही आणि एका सच्च्या क्षत्राणीची कहाणी… म्हणजे यशोधरा!! सिद्धार्थ ची पत्नी… येवढीच तिची ओळख पुरेशी नाहीच! तिला बुद्धाच्या छायेतून, सावलीतून बाहेर काढून बघितलं तर लक्षात येते ती तिच्या परिपक्वतेची, समंजसपणाची आणि एका आदर्श पत्नी आणि मातेच्या आदर्शाची उंची, खोली आणि व्याप्ती!! आपल्या पतीला राजकुमार ते बुद्ध या परिवर्तित रूपात, संयमाने, धीराने, स्थिर चित्त होऊन बघणं सोपं नाही ना एका पत्नी साठी?? पण हे परिवर्तन तिनं पेललं समर्थ पणे! तिने तिचं विरहाचं दु:ख, तिच्या अनावर भावनांचा आवेग… आक्रोशात नाही व्यक्त होऊ दिला.
तिने अत्यंत शांत आणि समजदार भूमिकेतून, सिद्धार्थ ने स्वीकारलेल्या मार्गाकडे बघितलं… आणि तिच्या लक्षात आलं की, सिद्धार्थचा हा मार्ग त्या दोघांना त्यागणं यापेक्षा त्या दोघांपेक्षा ही काहीतरी, मोठं, महान, महत्त्वाचं असं मिळवणं यासाठी होता.
आणि बस्स्… त्याच क्षणी यशोधराने ही भगवी वस्त्रे परिधान करून, राजसी वस्त्रालंकार त्यागून.. दिवसातून एकदाच भोजन करण्यास सुरुवात केली… तिने ही पत्नी धर्म पालन करंत, पतीच्या तपात स्वतः च्या तपाच्या समिधा अर्पण करंत, त्याला मौन साथ देत जणू पाठबळंच दिलं. त्याच्या बुद्ध होण्याच्या मार्गात ती आक्रोशाची, ऊलाहनेची धोंड न होता… त्याच्या आध्यात्म प्रवासातील खरी *अर्धांगिनी* होत… *सहधर्मचारिणी* सिद्ध झाली… सिद्धार्थ ची सिद्धा झाली! योग्याची योगिनी झाली. त्याग आणि प्रेम दोन्ही ही हातात हात घालून चालू शकतात, हे सिद्ध केलं यशोधरेने!
पती असा न सांगता सोडून गेला… उरात न मावणारं, उर फुटून बाहेर येणारं दु:ख होतंच की… पण यशोधरेने समजावलं स्वतःला…
अब कठोर हो वज्रादपि ओ कुसुमादपि सुकुमारी,
आर्य पुत्र दे चुके परीक्षा, अब है मेरी बारी!!
आणि दाखवून दिलं की… खरं प्रेम स्वार्थाचा पलीकडचं असतं! खरा वारसा तोच… जो आत्म्याला शांती आणि मोक्षा कडे घेऊन जाईल. तिला पती ने दिलेला हा वारसा कळला, पटला ही… आणि तिने तोच वारसा मग पुत्र राहुल यालाही देऊन त्यालाही भिक्षू/ भिख्खू बनण्याच्या वाटेवर चालण्याचं सामर्थ्य त्याच्या पावलांत देत, चालायला शिकवलं.
यशोधरेला फक्त एकच सल मनात बोचला की, पती तिला न सांगता गेला. तिचा स्वाभिमान दुखावला! एक पत्नी ची वेदना उरी दाटली की… पतीचा तिच्यावर येवढा ही विश्वास नव्हता की ती एक क्षत्राणी आहे… जी आपल्या पतीला औक्षण करून, मंगल तिलक लावून, त्याच्या यशाची कामना करते आणि अभिमानाने त्याला निरोप देते! पण सिद्धार्थ ने तिला आणि राहुल ला आपल्या मार्गातील बाधा मानले. ती तिच्या सखी जवळ हेच म्हणंत राहिली…
सखी वे मुझसे कहकर जाते, कह, तो क्या वे मुझे अपने पथ की बाधा पाते?
त्याने तिला ओळखलंच नाही… याचं मात्र तिला दु:ख खूप च झालं. स्वाभिमान दुखावला तिचा. पण तरीही तिने नंतर बुद्धांकडूनच पुत्राला ही बौद्ध धर्माची दिक्षा देवविली आणि स्वतः ही घेतली. अरहंत पदापर्यंत ही जाऊन पोहोचली. भद्रकात्यायनी या नावाने ही ओळखली जाते.
अशी ही अलक्षित… पण… स्त्री जातीला महिमा आणि गरिमा मंडित करणारी… परित्यक्ता नाहीच… तर… तपस्विनी, त्यागमयी, तेजोमयी शलाका… जी चैतन्य युक्त, चेतलेलीच ठेवू यात.