हिन्दी साहित्य – कविता ☆ भीड़ ☆– श्री माधव राव माण्डोले “दिनेश”

श्री माधव राव माण्डोले “दिनेश”

 

☆ भीड़ ☆

 

शोर है बाहर सड़कों पर……………….शायद।

कोई जुलूस निकल रहा है…….अरे यह क्या..?

सभी किसी को मार रहे है…………….शायद ।

भीड़………न्यायाधीश बन फैसला कर रही है।

हुजूम है सड़को पर………………………..शायद।

किसी सत्य को….गलत साबित करना है आज।

जन सैलाब है सड़को पर…………………शायद।

गुमराह लोग…….लोगों को गुमराह कर रहे हैं।

कुछ हरे से…..कुछ नीले से…..कुछ भगवा से।

एक नज़र से देखो तो इंद्रधनुषी से दिखते हैं।

सब कोहराम मचाकर कुछ…… सिखा रहे हैं।

कुछ नादान से….मगर मुँह पर कपड़ा बांधकर।

ये देश कि संपत्ति को….नुकसान पहुँचा रहे हैं।

शायद युवा हैं….रोज़गार की मांग कर रहे है।

कुछ नहाये-धोये……सफेद कपड़े पहने से हैं।

एक……दूसरे की ओर…… इशारा कर रहे हैं।

शायद…

ये देश के कर्ता-धर्ता हैं तो नहीं, पर लग रहे हैं।

कुछ सहमे से..कुछ उलझे…मगर असंमजस में।

शायद…

कुछ अच्छे की आस में  केन्डिल जला रहे है।

यह “भीड़”  की ताकत का दुरूपयोग तो नही है।

 

© माधव राव माण्डोले “दिनेश”, भोपाल 

(श्री माधव राव माण्डोले “दिनेश”, दि न्यू इंडिया एश्योरंस कंपनी, भोपाल में उप-प्रबन्धक हैं।)

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मराठी साहित्य – कादंबरी ☆ मित….. (भाग-2) ☆ श्री कपिल साहेबराव इंदवे

श्री कपिल साहेबराव इंदवे 

(युवा एवं उत्कृष्ठ कथाकार, कवि, लेखक श्री कपिल साहेबराव इंदवे जी का एक अपना अलग स्थान है. आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशनधीन है. एक युवा लेखक  के रुप  में आप विविध सामाजिक कार्यक्रमों में भाग लेने के अतिरिक्त समय समय पर सामाजिक समस्याओं पर भी अपने स्वतंत्र मत रखने से पीछे नहीं हटते. हमें यह प्रसन्नता है कि श्री कपिल जी ने हमारे आग्रह पर उन्होंने अपना नवीन उपन्यास मित……” हमारे पाठकों के साथ साझा करना स्वीकार किया है। यह उपन्यास वर्तमान इंटरनेट के युग में सोशल मीडिया पर किसी भी अज्ञात व्यक्ति ( स्त्री/पुरुष) से मित्रता के परिणाम को उजागर करती है। अब आप प्रत्येक शनिवार इस उपन्यास की अगली कड़ियाँ पढ़ सकेंगे।) 

इस उपन्यास के सन्दर्भ में श्री कपिल जी के ही शब्दों में – “आजच्या आधुनिक काळात इंटरनेट मुळे जग जवळ आले आहे. अनेक सोशल मिडिया अॅप द्वारे अनोळखी लोकांशी गप्पा करणे, एकमेकांच्या सवयी, संस्कृती आदी जाणून घेणे. यात बुडालेल्या तरूण तरूणींचे याच माध्यमातून प्रेमसंबंध जुळतात. पण कोणी अनोळखी व्यक्तीवर विश्वास ठेवून झालेल्या या प्रेमाला किती यश येते. कि दगाफटका होतो. हे सांगणारी ‘मित’ नावाच्या स्वप्नवेड्या मुलाची ही कथा. ‘रिमझिम लवर’ नावाचं ते अकाउंट हे त्याने इंस्टाग्रामवर फोटो पाहिलेल्या मुलीचंच आहे. हे खात्री तर त्याला झाली. पण तिचं खरं नाव काय? ती कुठली? काय करते? यांसारखे अनेक प्रश्न त्याच्या मनात आहेत. त्याची उत्तरं तो जाणून घेण्यासाठी किती उत्साही आहे. हे पुढील भागात……”

☆ मित……  (भाग 2)☆

(मन प्रीतीने भरते आणि प्रेमाचा खेळ सुरू होतो. मग कधीकाळी उजाड वाटणारं रानही मग हिरवे गार मनमोहक वाटायला लागते. एक फोटो पाहून त्यावर भाळलेला मितवर त्याचा काय बदल होतोय……..)

फोटो पाहता त्याला कधी झोप लागली ते त्याला कळलेच नाही. रात्री उशीरापर्यंत तो जागा होता. आणि थंडीचे दिवस होते. म्हणून मित सकाळी उशीरापर्यंत झोपून राहीला. पहाटेची गुलाबी थंडीत त्याला झोपणयाचा अधिक मोह चढत होता. सकाळी फोन वाजला तेव्हा त्याला जाग आली. त्याने उशाखालून मोबाईल घातला आणि न पाहताच फोन उचलला आणि तसाच अर्ध झोपेत बोलायला लागला. समोरचा कणखर आवाज ऐकून त्याची झोपच उडाली. मित ” हो पप्पा मी बसतो गाडीत. सायंकाळपर्यंत पोहोचेन घरी ” आणि फोन ठेवला.

बाबांनी बोलावून घेतलं म्हणून मित घरी आला. सहा सात महिन्यानंतर तो घरी परतला होता. बाबांनी त्याला दहा -पंधरा दिवसांसाठी बोलावले होते. तसा मनमिळाऊ स्वभाव तर त्याचा होताच. पण मोठ्या शहरात शिकतो आणि उत्तम लिखाण करून ब-याच ठीकाणी त्याने बक्षिसे मिळविल्या कारणाने गावातली लोक त्याला विषेश आदराने बघायचे. त्याचं बोलणं एखाद्याला मोटिवेट करण्यासारखं असायचं. म्हणून कधी फोनवर तर कधी प्रत्यक्ष भेटून त्याची मित्रमंडळी त्यांच्याकडून कधी सल्ला तर कधी मार्गदर्शन घ्यायचे. गावात आल्यापासून त्याच्या भोवती मित्रमंडळ  असायचे. त्याला तशी क्रिकेटची ही भारी आवड होती. मित आला म्हणून सुमितने त्याला क्रिकेट खेळायला शाळेच्या मैदानावर बोलावले. खेळून झाल्यावर सर्व आपापल्या घरी परतले पण मित मात्र अजूनही तेथेच होता. शाळेच्या आवारात लावलेल्या झाडांजवळ जाऊन तो बालपणातल्या शाळेतल्या आठवणी जागा करू लागला. आणि एकटाच स्वतःशी हसत तर कधी गंभीर मुद्रेत तया झाडाचं आणि शाळेचं  निरीक्षण करू लागला. शेवटी तो एका निलगीरीच्या झाडाजवळ येऊन त्या झाडाला टेकून उभा राहिला. आणि गाणे गायला सुरवात केली. ” ऐ दिल तेरी मर्जी है क्या बता भी दे, खो ना जाऊ जूल्फो मे कही, बचा भी ले ” सुरेल अशा आवाजात तो हे गाणे गात होता. त्याचं आवडतं गाणं होतं म्हणून त्याने ते त्याच्या आवाजात रेकॉर्डही केलं होतं. बाजूलाच रस्त्यावरून जात असलेले रामदास अहिरेंनी ते सुर एकले. आणि त्यांच्याही नकळत त्यांचे पाय मित कडे वळले.

गाणं संपल्यावर त्याने डोळे उघडले. समोरचा अंधूक नजारा आणि डोळयात झालेला गारवा अनूभवून मित प्रसन्न झाला. त्याच्या चेह-यावर हलके स्मित आपसूकच पसरले. त्याचे गाणे एकून जणू वातावरणच रोमँटीक झाले होते. त्याने आजूबाजूला नजर फिरवली. तेव्हा समोर रामदासभाऊ दिसले. त्याने स्मित हसून त्यांना नमस्कार वजा मान हलवली.   “सुरेल गातोस तू. मन अगदी प्रफुल्लित करतोस बघ” असं  म्हणून रामदास भाऊंनी त्याच्या पाठीवर कौतुकाची थाप मारली. “धन्यवाद. पण तुमच्या एवढे नाही” रामदासभाऊ गावातले गीत गायन पार्टीचे संस्थापक होते. कोणाचाही घरी काही खास कार्यक्रम असला की रामदासभाऊ आणि पार्टीला हमखास बोलावणे असायचं. आणि रामभाऊही कसलीही अपेक्षा न ठेवता निस्वार्थपणे सहभागी होत. ” तुझ्या बाबांनी एकदा म्हटलं होतं. पण अपेक्षेपेक्षा अधिक गोड आवाज आहे तुझा आज रात्री छगन आबांच्या घरी गीत गायनाचा कार्यक्रम आहे. ये सहभागी व्हायला ” रामभाऊंनी जास्त न घुमवत सरळ विचारले. त्यानेही स्मित हास्य करत होकारार्थी मान हलवली. ” ये मग रात्री साडेनऊला ” आणि ते तिथून निघून गेले.

 ( क्रमशः )

© कपिल साहेबराव इंदवे

मा. मोहीदा त श ता. शहादा, जि. नंदुरबार, मो  9168471113

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आशीष साहित्य – # 23 – कर्म और फल ☆ – श्री आशीष कुमार

श्री आशीष कुमार

(युवा साहित्यकार श्री आशीष कुमार ने जीवन में  साहित्यिक यात्रा के साथ एक लंबी रहस्यमयी यात्रा तय की है। उन्होंने भारतीय दर्शन से परे हिंदू दर्शन, विज्ञान और भौतिक क्षेत्रों से परे सफलता की खोज और उस पर गहन शोध किया है। अब  प्रत्येक शनिवार आप पढ़ सकेंगे  उनके स्थायी स्तम्भ  “आशीष साहित्य”में  उनकी पुस्तक  पूर्ण विनाशक के महत्वपूर्ण अध्याय।  इस कड़ी में आज प्रस्तुत है   “कर्म और फल।)

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☆ साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ आशीष साहित्य – # 23 ☆

☆ कर्म और फल 

क्या आपको लगता है कि भगवान हनुमान बाली को नहीं मार सकते थे? हाँ वो बिल्कुल मार सकते थे। बजरंगबली से ज्यादा शक्तिशाली कौन है? लेकिन अगर भगवान हुनमान बाली को मारते तो उन्हें भी वृक्ष के पीछे छुपकर उसे मारना पड़ता और इस कर्म का परिणाम उन्हें अपने आने वाले जीवन में भुगतान करना पड़ता। लेकिन भगवान हनुमान के लिए कर्म के नियम के कानून की एक अलग योजना थी।  क्योंकि उन्हें लोगों को भक्ति (भगवान राम की भक्ति) सिखाने में सहायता करने के लिए अमर रहना था।तो या तो भगवान राम को या भगवान हनुमान को बाली को मारने की ज़िम्मेदारी लेनी थी और भगवान राम ने यह कार्य आपने हाथों से किया जिसके लिए उन्हें वृक्ष के पीछे से बाली को मारना पड़ा। भगवान राम ने इससे पहले और बाद में कभी भी कोई नियम नहीं तोड़ा था। यह कर्मों के कानून द्वारा पूर्व-नियोजित किया गया था कि भगवान राम इस अधिनियम को करेंगे क्योंकि उन्हें अपने शरीर को छोड़ना था।  उनके त्रेता युग के उद्देश्य को पूर्ण करने के बाद, लेकिन भगवान हनुमान के जन्म का उद्देश्य अनंत काल तक लोगों को अज्ञानता से भक्ति के ज्ञान तक मार्गदर्शन करना है। तो भगवान हनुमान को कर्मों के कानून से दूर रखा जाने की योजना पहले से ही तैयार थी।

त्रेता युग हिंदू मान्यताओं के अनुसार चार युगों में से एक युग है। त्रेता युग मानवकाल के द्वितीय युग को कहते हैं। इस युग में विष्णु के पाँचवे, छठे तथा सातवें अवतार प्रकट हुए थे। यह अवतार वामन, परशुराम और राम थे। यह मान्यता है कि इस युग में ॠषभ रूपी धर्म तीन पैरों में खड़े हुए थे। इससे पहले सतयुग में वह चारों पैरों में खड़े थे। इसके बाद द्वापर युग में वह दो पैरों में और आज के अनैतिक युग में, जिसे कलियुग कहते हैं, सिर्फ़ एक पैर पर ही खड़े हैं। यह काल भगवान राम के देहान्त से समाप्त होता है। त्रेतायुग 12,96000 वर्ष का था। ब्रह्मा का एक दिवस 10,000 भागों में बंटा होता है, जिसे चरण कहते हैं:

चारों युग

4 चरण (1,728,000 सौर वर्ष)       सत युग

3 चरण (1,296,000 सौर वर्ष)       त्रेता युग

2 चरण (864,000 सौर वर्ष)          द्वापर युग

1 चरण (432,000 सौर वर्ष)          कलि युग

यह चक्र ऐसे दोहराता रहता है, कि ब्रह्मा के एक दिवस में 1000 महायुग हो जाते हैं।

जब द्वापर युग में गंधमादन पर्वत पर महाबली भीम हनुमान जी से मिले तो हनुमान जी से कहा कि “हे पवन कुमार आप तो युगों से पृथ्वी पर निवास कर रहे हो।  आप महाज्ञान के भण्डार हो, बल बुधि में प्रवीण हो, कृपया आप मेरे गुरु बनकर मुझे शिष्य रूप में स्वीकार कर के मुझे ज्ञान की भिक्षा दीजिये”। भगवान हनुमान जी ने कहा “हे भीम सबसे पहले सतयुग आया उसमे जो कार्य मन में आता था वो कृत (पूरी )हो जाती थी  इसलिए इसे क्रेता युग (सत युग)कहते थे।  इसमें धर्म की कभी हानि नहीं होती थी उसके बाद त्रेता युग आया इस युग में यज्ञ करने की प्रवृति बन गयी थी । इसलिए इसे त्रेता युग कहते थे।  त्रेता युग में लोग कर्म करके कर्म फल प्राप्त करते थे।  हे भीम फिर द्वापर युग आया । इस युग में विदों के 4 भाग हो गये और लोग सत भ्रष्ट हो गए । धर्म के मार्ग से भटकने लगे अधर्म बढ़ने लगा। परन्तु, हे भीम अब जो युग आयेगा, वो है कलियुग। इस युग में धर्म ख़त्म हो जायेगा। मनुष्य को उसकी इच्छा के अनुसार फल नहीं मिलेगा। चारों और अधर्म ही अधर्म का साम्राज्य ही दिखाई देगा।”

 

© आशीष कुमार  

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आध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता – पद्यानुवाद – नवम अध्याय (5) प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता

हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

नवम अध्याय

( प्रभावसहित ज्ञान का विषय )

 

न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम्‌ ।

भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः ।।5।।

 

सब मुझमें हो अलग है यही ईश्वरी योग

सबका पोषक प्रकाशक मैं ही यह संयोग।।5।।

 

भावार्थ :  वे सब भूत मुझमें स्थित नहीं हैं, किंतु मेरी ईश्वरीय योगशक्ति को देख कि भूतों का धारण-पोषण करने वाला और भूतों को उत्पन्न करने वाला भी मेरा आत्मा वास्तव में भूतों में स्थित नहीं है।।5।।

 

Nor do beings exist in Me (in reality): behold My divine Yoga, supporting all beings, but not dwelling in them, is My Self, the efficient cause of beings.।।5।।

 

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ 

ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर

vivek1959@yahoo.co.in

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # 27 ☆ स्त्री ब्रेल लिपि नहीं ☆ – डॉ. मुक्ता

डॉ.  मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं  माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं।  साप्ताहिक स्तम्भ  “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक  साहित्य” के माध्यम से आप  प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू हो सकेंगे। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी का आलेख “स्त्री ब्रेल लिपि नहीं”.  डॉ मुक्ता जी का यह विचारोत्तेजक लेख जहाँ एक ओर स्त्री शक्ति की असीम  शक्तिशाली कल्पनाओं पर विमर्श करता है वहीँ दूसरी ओर पुरुषों को सचेत करता है कि स्त्री ब्रेल लिपि नहीं, जिसे स्पर्श द्वारा समझा जा सकता है। डॉ मुक्ता जी ने इस तथ्य के प्रत्येक पहलुओं पर विस्तृत चर्चा की है।  डॉ मुक्त जी की कलम को सादर नमन।  कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें एवं अपने विचार कमेंट बॉक्स में अवश्य  दर्ज करें )    

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य – # 27 ☆

☆ स्त्री ब्रेल लिपि नहीं

सृष्टि की सुंदर व सर्वश्रेष्ठ रचना स्त्री, जिसे परमात्मा ने पूरे मनोयोग से बनाया… उसे सृष्टि रचना का दायित्व सौंपा तथा शिशु की सभी आवश्यकताओं की पूर्ति का माध्यम बनाया। भ्रूण रूप में नौ माह तक उसकी रक्षा व पालन-पोषण एक अजूबे से कम नहीं है। शिशु के जन्म के पश्चात् मां के अमृत समान दूध की संकल्पना भी किसी आश्चर्य से कम नहीं है। मां का शिशु की गतिविधियों को देखकर, उसकी आवश्यकता व सुख-दु:ख की अनुभूति करना,उसकी की सुख-सुविधा के निमित्त स्वयं गीले में सोना व   उसे सूखे में सुलाना…उसे बोलना, चलना, पढ़ना- लिखना सिखलाना व  सुसंस्कारित करना…वास्तव में श्लाघनीय है, प्रशंसनीय है, अद्वितीय है, बेमिसाल है, जिसे शब्दों में नहीं बांधा जा सकता। हां! इसके एवज़ में उसे प्राप्त होता है मातृत्व सुख जो किसी दिव्य व अलौकिक आनंद से कम नहीं है।
जयशंकर प्रसाद जी की कामायनी में मनु व श्रद्धा को सृष्टि-रचयिता स्वीकारा गया है…इस संदर्भ में अनेक पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। प्रलय के पश्चात् मनु व श्रद्धा का मिलन, एक-दूसरे के प्रति आकर्षण, वियोगावस्था में मनु व इड़ा का प्रेम व मिलन मानव को जन्म देता है और वे दोनों संसार रूपी सागर में डूबते-उतराते रहते हैं। अंत में इड़ा का मानव को सम्पूर्ण मानव बनाने के लिए श्रद्धा के पास ले जाना और उसे तीनों लोकों निर्वेद, दर्शन, रहस्य की यात्रा करवा कर जीने का सही अंदाज़ सिखलाना अलौकिक आनंद की प्रतीति कराता है, जो वास्तव में श्लाघनीय है, मननीय है। जीवन में सामंस्यता प्राप्त करने के लिए, जिस कर्म को आप करने जा रहे हैं, उसके बारे में पूरी जानकारी होना आवश्यक है, अन्यथा आप द्वारा किये गये कार्य से आपकी इच्छा कभी पूर्ण नहीं हो पाएगी…आपकी भटकन कभी समाप्त नहीं होगी और जीवन में समरसता नहीं आ पाएगी। कामायनी का जीवन-दर्शन मानवतावादी है और समरसता…आनंदोपलब्धि का प्रतीक है।
मुझे स्मरण हो रहा है वह उद्धरण… जब मानव को परमात्मा ने सृष्टि में जाने का फरमॉन सुनाया, तो उसने प्रश्न किया कि वे उसे अपने से दूर क्यों कर हैं…वहां उसका ख्याल कौन रखेगा? वह किसके सहारे ज़िंदा रहेगा? इस पर प्रभु ने उसे  समझाया कि मैं…. मां अथवा जननी  के रूप में सदैव तुम्हारे साथ रहूंगा अर्थात् संसार में मां से बढ़कर दूसरा कोई हितैषी नहीं और वह तुम्हें स्वयं से बढ़ कर प्यार करेगी… तुम्हारी अच्छे ढंग से परवरिश करेगी…तुम्हें किसी प्रकार का अभाव अनुभव नहीं होने देगी। सो!  सृष्टि-नियंता ने स्त्री-पुरूष को एक-दूसरे का पूरक बनाया है… एक के बिना दूसरा अस्तित्वहीन है, अधूरा है। वे गाड़ी के दो पहियों के समान हैं और उनका चोली-दामन का साथ है। इसमें जीवन का सार छिपा है कि मानव को पति-पत्नी के रूप में एक-दूसरे के सुख-दु:ख में साथ देना चाहिए… इसके लिए उन्होंने विवाह की व्यवस्था निर्धारित की, ताकि मानव मर्यादा में रहकर, घर-परिवार व समाज में स्नेह व सौहार्द उत्पन्न करे तथा अपने दायित्वों का बखूबी वहन करें। वास्तव में एक के अधिकार दूसरे के कर्त्तव्य होते हैं और कर्त्तव्यों की अनुपालना से, दूसरे के अधिकारों की रक्षा संभव है। दूसरे शब्दों में इसमें छिपा है… त्याग व समर्पण का भाव, जो पारिवारिक व सामाजिक सौहार्द का मूल है।
 परंतु आधुनिक युग में प्रेम, सौहार्द, सहनशीलता, त्याग, सहानुभूति व समर्पण आदि दैवीय भाव गुज़रे ज़माने की बातें लगती हैं…इनका सर्वथा अभाव है। रिश्तों की अहमियत रही नहीं और कोई भी संबंध पावन नहीं रहा। चारों ओर आपाधापी का वातावरण है और विश्वास का भाव नदारद है। हर इंसान स्वार्थ- पूर्ति और अधिकाधिक धन कमाने के लिये दूसरे को रौंदने व किसी के प्राण लेने में तनिक भी संकोच नहीं करता। वह मर्यादा व समस्त निर्धारित सीमाओं का अतिक्रमण कर गुज़रता है। जहां तक स्त्री का संबंध है, वह तो हजारों वर्ष से दोयम दर्जे की प्राणी समझी जाती है…हाड़-मांस की प्रतिमा, जिसके साथ पुरूष मनचाहा व्यवहार करने को स्वतंत्र है। वर्षों पूर्व उसे पांव की जूती स्वीकारा जाता था,जिसका कारण  था….उसे मंदबुद्धि अथवा बुद्धिहीन स्वीकारना।आज भी कहां अहमियत दी जाती है उसे…आज भी हर उस अपराध के लिए भी वह ही दोषी ठहरायी जाती है, जो उसने किया ही नहीं।
सो! अहंनिष्ठ पुरुष उसे मात्र वस्तु समझ, उस पर कभी भी, कहीं भी निशाना साध सकता है। अपनी वासना-पूर्ति के लिए उसका अपहरण कर, उसका शील-हरण कर सकता है, उससे दरिंदगी कर सबूत मिटाने के लिए उसके चेहरे पर पत्थरों से प्रहार  कर, उसके टुकड़े-टुकड़े कर, दूरस्थ किसी नाले या गटर में फेंक सकता है। आजकल एकतरफ़ा प्यार में  तेज़ाब का प्रयोग, उसे ज़िंदा जलाने में अक्सर किया जाने लगा है। हर दिन ऐसे हादसे सामने आ रहे हैं। उदाहरणत: हैदराबाद की प्रियंका, उन्नाव की दुष्कर्म पीड़िता, जिस पर रायबरेली जाते समय ज्वलनशील पदार्थ उंडेल दिया गया। बक्सर में भी ऐसे ही हादसे को अंजाम दिया गया। चार दिन में तीन निर्दोष युवतियां  उन सिरफिरों के वहशीपन का शिकार हुयीं और तीनों  इस जहान से रुख़्सत हो गयीं…. परंतु वे अपने पीछे अनगिनत प्रश्न छोड़ गयीं। आखिर कब तक चलता रहेगा यह सिलसिला? ऐसे जघन्य अपराधी कब तक छूटते रहेंगे और ऐसे हादसों को पुन:अंजाम देते रहेंगे?
प्रश्न उठता है, जिस पर चिंतन-मनन करने की आवश्यकता है…’ स्त्री कोई ब्रेल लिपि  नहीं, जिसे समझने के लिए स्पर्श की ज़रूरत पड़े। स्त्री तो संकेतिक भाषा है, जिसे समझने के लिए संवेदनाओं की ज़रूरत है। वह स्वभाव से ही छुई-मुई व कोमल  है, समझने के लिए स्पर्श की आवश्यकता नहीं है। वह तो छूने-मात्र से संकोच का अनुभव करती है,पल भर मुरझा जाती है। वह दया, करूणा व ममता का अथाह सागर है… जीवन-संगिनी है, हमसफ़र है, त्याग की प्रतिमा है और सेवा व समर्पण उसके मुख्य गुण हैं। बचपन से वृद्धावस्था तक वह दूसरों के लिए जीती है तथा उनकी खुशियों में अपना संसार देखती है…बलिहारी जाती है। बचपन में भाई-बहनों पर स्नेह लुटाती, घर के कामों में माता का हाथ बंटाती, भाई व पिता के सुरक्षा-दायरे में कब बड़ी हो जाती… जिसके उपरांत पिता के घर से विदा कर दी जाती है, जहां उसे पति व परिवारजनों की खुशी व सबकी आकांक्षाओं पर खरा उतरने के लिए अपने अरमानों का गला घोंटना पड़ता है। वह ता-उम्र अपने बच्चों के लिए पल-पल जीती, पल-पल मरती है और पति के हाथों हर दिन तिरस्कृत प्रताड़ित होती अपना जीवन बसर करती है…वृद्धावस्था में सब की उपेक्षा के दंश झेलती एक दिन दुनिया को अलविदा कह रुख़्सत हो जाती है।
यह है औरत की कहानी… परंतु आजकल 85% बालिकाएं अपनों द्वारा छली जाती हैं और उनकी गलत आदतों का शिकार होती हैं। बड़े होने पर मनचलों द्वारा उन्हें बीच राह रोक कर फब्तियां कसना, बसों आदि में गलत इशारे करना,उनके शरीर का स्पर्श करना, बेहूदगी करना, व्यंग्य-बाण चलाना … उनके विरोध करने पर अंजाम भुगतने को तैयार रहने की धमकी देना, उन्हें बीच बाज़ार बेइज़्ज़त व बेआबरू करना, सरे-आम अपहरण कर निर्जन स्थान पर ले जाकर उससे दुष्कर्म करना आदि आजकल सामान्य सी बात हो गई है। इसके साथ उनके साथ होने वाले भीषण व जघन्य हादसों का चित्रण हम पहले ही कर चुके हैं।
काश! हम बच्चों को अच्छे संस्कार दे पाते… प्रारंभ से बेटी-बेटे में अंतर न करते हुए, बेटों को अहमियत न देते, उन्हें बहन-बेटी के सम्मान करने का संदेश देते, आपदाग्रस्त हर व्यक्ति की सहायता करने का मानवतावादी पाठ पढ़ाते, रिश्तों की अहमियत समझाते, तो वे सामान्य इंसान बनते, जिनमें लेशमात्र भी अहंनिष्ठता का भाव नहीं  होता। उनका गृहस्थ जीवन सुखी होता। तलाक अर्थात् अवसाद के किस्से आम नहीं होते। हर तीसरे घर में तलाकशुदा लड़की माता-पिता के घर में बैठी दिखलायी न पड़ती। आज कल तो युवा पीढ़ी विवाह रूपी बंधन को नकारने लगी है और समाज में ‘तू नहीं और सही’ का प्रचलन बढ़ने लगा है, जिसका मुख्य कारण है…अहंनिष्ठता व सर्वश्रेष्ठता का भाव होना,भारतीय संस्कृति की अवहेलना करना व मानव-मूल्यों को नकारना।
वास्तव में अहं ही संघर्ष का मूल है, जिसके कारण दोनों ही समझौता नहीं करना चाहते और परिवार टूटने के कग़ार पर पहुंच जाते हैं। जीवन रूपी गाड़ी को सुचारू रूप से चलाने के लिए समर्पण व त्याग की आवश्यकता है। शायद! इसीलिए स्त्री को सांकेतिक भाषा की संज्ञा से अभिहित किया गया है… जैसे वह  बच्चे के मनोभावों व संकेतों को समझ, उसकी प्रत्येक आवश्यकता की पूर्ति करती है, वैसे ही उसे भी अपेक्षा रहती है कि कोई उसे समझे, जीवन में अहमियत दे और उसके अहसासों व जज़्बातों को अनुभव करे। वह अपनत्व चाहती है तथा उसे दरक़ार रहती है कि कोई उसकी भावनाओं की कद्र करे। वह केवल स्नेह की अपेक्षा करती है, जिसे पाने के लिए वह सर्वस्व समर्पित करने को तत्पर रहती है। उस मासूम को तो पिता के घर में ही यह अहसास दिला दिया जाता है कि वह घर उसका नहीं, वह यहां पराई है तथा पति का घर ही उसका अपना घर होगा। परंतु वहां भी सी•सी• टी• वी• कैमरे लगे होते हैं, जिनमें उसकी हर गतिविधि कैद होती रहती है और वह सब की उपेक्षा-अवहेलना की शिकार होती है। अंत में उसे पुत्र व पुत्रवधू के संकेतों को समझ, उनके आदेशों की अनुपालना करनी पड़ती है और उसकी तलाश का अंत इस जहान को अलविदा कहने के पश्चात् ही होता है।
अंत में मैं यह कहना चाहूंगी कि रिश्ते तभी मज़बूत होते हैं, जब हम उन्हें महसूसते हैं अर्थात् जब हम संवेदनशील होते हैं, एक-दूसरे के सुख-दु:ख को अनुभव करते हैं, तभी रिश्तों में प्रगाढ़ता आती है। औरत को समझने के लिए संकेतों अथवा संवेदन- शीलता की आवश्यकता होती है। जिस दिन हम यह सोच लेंगे कि हर इंसान में कमियां होती हैं। उसे उनके साथ स्वीकारने से ही ज़िंदगी में सुक़ून प्राप्त हो सकता है और वह  सुख-शांति से गुज़र सकती है। समाज में सौहार्द, समन्वय व सामंजस्यता और अपराध-मुक्त साम्राज्य की स्थापना हो सकती है।
सो! स्त्री ब्रेल लिपि नहीं, जिसे स्पर्श द्वारा समझा जा सकता है। वह वस्तु नहीं है, जिसे समझने के लिए उलट-फेर व उसकी चीर-फाड़ करना आवश्यक है। वह तो मात्र चिंगारी है, जो जंगलों को को जलाकर राख कर सकती है…उसके हृदय का लावा किसी भी पल फूट सकता है तथा सब कुछ तहस-नहस कर सकता है। इसलिए उसके धैर्य की परीक्षा मत लेना। वह केवल नारायणी ही नहीं, उसमें दुर्गा व काली की शक्तियां भी निहित हैं, जिन्हें यथा समय संचित कर वह पल भर में रक्तबीज जैसे शत्रुओं का मर्दन कर सकती है। इसलिए उसे गुप्त अबला व प्रसाद की श्रद्धा समझने की भूल मत करना। वह असीम- अनन्त साहस व विश्वास से आप्लावित है, जिसके शब्दकोष में असंभव शब्द नदारद है। इसलिए उसे छूने का साहस मत करना… वह सारी क़ायनात को जलाकर राख कर देगी और सृष्टि में हाहाकार मच जायेगा।

© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत।

पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी,  #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com

मो• न•…8588801878

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – सपना ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) 

☆ संजय दृष्टि  –  सपना  

बहुत छोटा था जब एक शाम माँ ने उसे फुटपाथ के एक साफ कोने पर बिठाकर उसके सामने एक कटोरा रख दिया था। फिर वह भीख माँगने चली गई। रात हो चली थी। माँ अब तक लौटी नहीं थी। भूख से बिलबिलाता भगवान से रोटी की गुहार लगाता वह सो गया। उसने सपना देखा। सपने में एक सुंदर चेहरा उसे रोटी खिला रहा था। नींद खुली तो पास में एक थैली रखी थी। थैली में रोटी, पाव, सब्जी और खाने की कुछ और चीज़ें थीं। सपना सच हो गया था।

उस रोज फिर ऐसा ही कुछ हुआ था। उस रोज पेट तो भरा हुआ था पर ठंड बहुत लग रही थी। ऊँघता हुआ वह घुटनों के बीच हाथ डालकर सो गया। ईश्वर से प्रार्थना की कि उसे ओढ़ने के लिए कुछ मिल जाए। सपने में देखा कि वही  चेहरा उसे कंबल ओढ़ा रहा था। सुबह उठा तो सचमुच कंबल में लिपटा हुआ था वह। सपना सच हो गया था।

अब जवान हो चुका वह। नशा, आलस्य, दारू सबकी लत है। उसकी जवान देह के चलते अब उसे भीख नहीं के बराबर मिलती है। उसके पास फूटी कौड़ी भी नहीं बची है। एकाएक उसे बचपन का फॉर्मूला याद आया। उसने भगवान से रुपयों की याचना की। याचना करते-करते सो गया वह। सपने में देखा कि एक जाना-पहचाना चेहरे उसके साथ में कुछ रुपये रख रहा है। आधे सपने में ही उठकर बैठ गया वह। कहीं कुछ नहीं था। निराश हुआ वह।

अगली रात फिर वही प्रार्थना, फिर परिचित चेहरे का रुपये हाथ में देने का सपना, फिर हड़बड़ाहट में उठ बैठना, फिर निराशा।

तीसरी रात असफल सपने को झेलने के बाद भोर अँधेरे उठकर चल पड़ा वह शहर के उस चौराहे की तरफ जहाँ दिहाड़ी के लिए मज़दूर खड़े रहते हैं।

आज जीवन की पहली दिहाड़ी मिली थी उसे। रात को सपने में उसने पहली बार उस परिचित चेहरे में अपना चेहरा पहचान लिया था।

सुनते हैं, इसके बाद उसका हर सपना सच हुआ।

 

©  संजय भारद्वाज, पुणे

प्रात: 9.50, 24.12.19

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

writersanjay@gmail.com

 

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हिन्दी साहित्य – साहित्य निकुंज # 27 ☆ ☆ स्व डॉ गायत्री तिवारी जन्मदिवस विशेष ☆ माँ तुम याद बहुत आती हो ☆ डॉ. भावना शुक्ल

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची ‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत है उनकी  ममतामयी माँ  (कथाकार एवं कवयित्री  स्मृतिशेष डॉ गायत्री तिवारी जी ) के चतुर्थ जन्म स्मृति  के अवसर पर एक अविस्मरणीय कविता  ‘माँ तुम याद बहुत आती हो।)

 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – # 27 साहित्य निकुंज ☆

☆ माँ तुम याद बहुत आती हो

 

माँ तुम याद बहुत आती हो

बस सपने में दिख जाती हो .

पूछा है तुमसे, एक सवाल

छोड़ गई क्यों हमें इस हाल

जीवन हो गया अब वीराना

तेरे बिना सब है बेहाल

कुछ मन की तो कह जाती तुम

मन ही मन क्यों मुस्काती हो ।

 

माँ तुम याद बहुत आती हो

बस सपने में दिख जाती हो .

मुझमे बसती तेरी धड़कन

पढ़ लेती हो तुम अंतर्मन

 

तुमको खोकर सब है खोया

एक झलक तुम दिखला जाती .

जाने की इतनी क्यों थी जल्दी

हम सबसे क्यों नहीं कहती हो ।

 

माँ तुम याद बहुत आती हो

हम सबको तुम तरसाती हो ।

 

 

© डॉ.भावना शुक्ल

सहसंपादक…प्राची

wz/21 हरि सिंह पार्क, मुल्तान नगर, पश्चिम विहार (पूर्व ), नई दिल्ली –110056

मोब  9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

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मराठी साहित्य – समाजपारावरून साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ पुष्प तेवीस # 23 ☆ कँलेंडर ☆ – कविराज विजय यशवंत सातपुते

कविराज विजय यशवंत सातपुते

 

(समाज , संस्कृति, साहित्य में  ही नहीं अपितु सोशल मीडिया में गहरी पैठ रखने वाले  कविराज विजय यशवंत सातपुते जी  की  सोशल मीडिया  की  टेगलाइन माणूस वाचतो मी……!!!!” ही काफी है उनके बारे में जानने के लिए। जो साहित्यकार मनुष्य को पढ़ सकता है वह कुछ भी और किसी को भी पढ़ सकने की क्षमता रखता है।आप कई साहित्यिक,  सांस्कृतिक  एवं सामाजिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं ।  इस साप्ताहिक स्तम्भ के माध्यम से वे किसी न किसी सामाजिक  अव्यवस्था के बारे में चर्चा करते हैं एवं हमें उसके निदान के लिए भी प्रेरित करते हैं।  आज प्रस्तुत है श्री विजय जी की एक सामयिक कविता  “कँलेंडर ”।  आप प्रत्येक शुक्रवार को उनके मानवीय संवेदना के सकारात्मक साहित्य को पढ़ सकेंगे।  )

☆ साप्ताहिक स्तंभ –समाज पारावरून – पुष्प तेवीस # 23 ☆

☆ कँलेंडर ☆

 

डिसेंबर संपता संपता ….

आयुष्याच कोरं पान……..

उगीच भरल्या सारखं वाटतं,

शिशिराच्या पानगळीत सुद्धा

वसंत वैभवात मन रमतं…….!

 

किती सहज  उलटतो पाने ……

संकल्पाने सालंकृत…

कार्येप्रवणतेने आलंकृत…

एक एक स्मृती  सजवतो…

हृदयाच्या कोंदणात . . . . !

 

मागील पानांवर,

पुन्हा पुन्हा जाते नजर..

आठवणींची हळवी जर,

तिलाच असते कदर कृतीशील स्मरण नोंदी,

झळकतात पानावर

शब्दांचा  पारा, कधी गडद ,कधी धूसर

नजर वर्तमानात पण मन मात्र गतकाळावर.  . . . !

 

काही चौकटी  उगाच  ठसतात मनात

अन ताज्या होतात विस्मृती…….

आकडेवारी बदलत नाही . . .

बदलतात संदर्भ कागद, शाई अन पानांचे . .

मानवी  नात्यांचे नात्यातील रंगाचे  . . . !

 

सुख-दुःखाच्या चौकटी ………

आनंदाश्रूंच्या स्नेहधारा……..

मान-अपमानाचा वर्षाव……….

विश्वास- बेईमानीचा संघर्ष ………

विसरता येत नाही. . . . !

 

खऱ्या-खोट्याचे ठोकताळे ……….

हव्या-नकोशा आठवणी …

प्रेम-प्रितीच्या वंचना . .  वल्गना  …

आपल्या माणसांचे वाढदिवस ……..

गावातल्या जत्रा,  उरूस,  मेळे

विसरता येत नाही. . . . . !

 

ऊन-सावलीच्या चौकटी ……..

जगवतात जीवन तरू…………

याच कॅलेंडरच्या जीर्ण पानात

सुई, दोरा टोचलेल्या  आठवात

दिवस रात्रीच्या ऋतूचक्रात .. . !

 

कुणीतरी येत, कुणीतरी जातं

स्वभाव तोच आठवण बदलते

आकडे तेच तिथी वार बदलेला

आठवणींचा ओला श्वास

पानापानावर थांबलेला.. !

 

शब्दाचं कुटुंब कागदावर सजलेलं

आठवणींच गोकुळ मनामध्ये नटलेलं

भूत, भविष्य, वर्तमान, पानामध्ये सामावलेलं

नवीन वर्ष,  नवीन कॅलेंडर,  प्रतिक्षेत थांबलेलं

निरोप आणि स्वागताला सदानकदा  आसुसलेलं.. !

 

© विजय यशवंत सातपुते

यशश्री, 100 ब दीपलक्ष्मी सोसायटी,  सहकार नगर नंबर दोन, पुणे 411 009.

मोबाईल  9371319798.

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हिन्दी साहित्य – ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # 18 ☆ लुप्त हुआ अब सदाचरण है ☆ – श्री संतोष नेमा “संतोष”

श्री संतोष नेमा “संतोष”

 

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. 1982 से आप डाक विभाग में कार्यरत हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं.    “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष”  की अगली कड़ी में प्रस्तुत है उनकी एक अतिसुन्दर भावप्रवण  कविता  “लुप्त हुआ अब सदाचरण है”. आप श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार पढ़  सकते हैं . ) 

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # 18 ☆

☆ लुप्त हुआ अब सदाचरण है ☆

लुप्त हुआ अब सदाचरण है

बढ़ता हर क्षण कदाचरण है

 

आशाओं की लुटिया डूबी

स्वार्थ सिद्धि में नर हर क्षण है

 

निशदिन बढ़ते पाप करम अब

कलियुग का ये प्रथम चरण है

 

अपनों की पहचान कठिन है

चेहरों पर भी आवरण हैं

 

झूठ हुआ है हावी सब पर

सच का करता कौन वरण है

 

कब तक लाज बचायें बेटी

गली गली में चीर हरण है

 

देख देख कर दुनियादारी

“संतोष” दुखी अंतःकरण है

 

© संतोष नेमा “संतोष”

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.)

मोबा 9300101799

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आध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता – पद्यानुवाद – नवम अध्याय (4) प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता

हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

नवम अध्याय

( प्रभावसहित ज्ञान का विषय )

 

मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना ।

मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेषवस्थितः ।।4।।

मुझ अरूप में जगत का है सारा विस्तार

मै न किसी पर आश्रित सब मेरे आधार।।4।।

भावार्थ :  मुझ निराकार परमात्मा से यह सब जगत्‌ जल से बर्फ के सदृश परिपूर्ण है और सब भूत मेरे अंतर्गत संकल्प के आधार स्थित हैं, किंतु वास्तव में मैं उनमें स्थित नहीं हूँ।।4।।

 

All this world is pervaded by Me in My unmanifest aspect; all beings exist in Me, but I do not dwell in them.।।4।।

 

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ 

ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर

vivek1959@yahoo.co.in

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