हिन्दी साहित्य ☆ धारावाहिक उपन्यासिका ☆ पगली माई – दमयंती – भाग 3 ☆ – श्री सूबेदार पाण्डेय “आत्मानंद”

श्री सूबेदार पाण्डेय “आत्मानंद”

 

(आज से प्रत्येक रविवार हम प्रस्तुत कर रहे हैं  श्री सूबेदार पाण्डेय “आत्मानंद” जी द्वारा रचित ग्राम्य परिवेश पर आधारित  एक धारावाहिक उपन्यासिका  “पगली  माई – दमयंती ”।   

इस सन्दर्भ में  प्रस्तुत है लेखकीय निवेदन श्री सूबेदार पाण्डेय जी  के ही शब्दों में  -“पगली माई कहानी है, भारत वर्ष के ग्रामीण अंचल में पैदा हुई एक ऐसी कन्या की, जिसने अपने जीवन में पग-पग पर परिस्थितिजन्य दुख और पीड़ा झेली है।  किन्तु, उसने कभी भी हार नहीं मानी।  हर बार परिस्थितियों से संघर्ष करती रही और अपने अंत समय में उसने क्या किया यह तो आप पढ़ कर ही जान पाएंगे। पगली माई नामक रचना के  माध्यम से लेखक ने समाज के उन बहू बेटियों की पीड़ा का चित्रांकन करने का प्रयास किया है, जिन्होंने अपने जीवन में नशाखोरी का अभिशाप भोगा है। आतंकी हिंसा की पीड़ा सही है, जो आज भी  हमारे इसी समाज का हिस्सा है, जिनकी संख्या असंख्य है। वे दुख और पीड़ा झेलते हुए जीवनयापन तो करती हैं, किन्तु, समाज के  सामने अपनी व्यथा नहीं प्रकट कर पाती। यह कहानी निश्चित ही आपके संवेदनशील हृदय में करूणा जगायेगी और एक बार फिर मुंशी प्रेम चंद के कथा काल का दर्शन करायेगी।”)

☆ धारावाहिक उपन्यासिका – पगली माई – दमयंती –  भाग 3 – सुहागरात ☆

(आपने अब तक पढ़ा – पगली का बचपन बीता, विवाह हुआ, ससुराल आई पगली, सुहागरात के दिन मिली नशे की पीड़ा ने एक अनकही कहानी  को जन्म दिया जिसे पगली न तो मायके में किसी को सुना सकतीं थी न तो लज्जा के चलते ससुराल में—-अब आगे पढ़े—-)

पगली अपने पति के पांवो के पास बैठी अपने दुर्भाग्य पर आंसू बहा रही थी। उसी समय पड़ोस में चल रहे किसी विवाह समारोह में नाट्यनर्तकी द्वारा गाया गया दर्द भरा गीत ढ़ोल नगाड़े की थाप पर फिजाओं में तैरता पगली के कान से टकराया था—

सुन ले पुकार सजना,
आइ तेरे द्वार सजना,
दिल में मिलन की लिए कामना।
दिल है बेकरार मेरा,
मैंने चाहा प्यार तेरा
तूं है किस जहाँ में मेरे साजना ।। 1।।

तूं है नशे में हाय,
घडी मिलन की बीती जाये,
दिल में बेकरार मेरे साजना।
ये दिल रोये जार जार,
मैं तो चाहूं तेरा प्यार,
पड़ा बेखबर है घर आंगन।। 2।।

कैसी घड़ी ये आयी,
मिल के भी मिल ना पायी,
उठ के तो देख मेरे साजना।
मैं तो हूँ कन्या कुंवारी,
तुझपे नशा है भारी,
दिल का मिलन हो कैसे साजना।। 3।।

छम छम बाजे चूड़ी पायल,
मोरा करेजवा घायल,
कैसे मिलन की करूं याचना।
सुनले पुकार  सजना,
आइ तेरे द्वार  सजना।। 4।।

इस प्रकार दर्द को लेकर फिजां में तैरती लोक नर्तकी के गीतों की आवाज़ उसके कानों मे पड़ी तो गीत का दर्द
और पगली की परिस्थितियों का सामंजस्य उसके दिल के जख्म को और गहरा कर गया। वह सिसक उठी पगली।  उसके कपोलों से बहते आंसुओं की धार मदहोश पति के पैरों पर गिर रही थी। इन परिस्थितियों में पगली को याद हो आई भैरव बाबा द्वारा सुनाई गई कृष्ण सुदामा की मित्रता की कथा। और हठात मुह से निकल पड़े ये शब्द—

पानि परात को हाथ छु यो नहि,
नैनन के जल से पग धोयो।

कितना सामंजस्य था दोनो घटनाओं में एक तरफ भगवान अपने आंसुओं से भक्त के पांव पखार रहा था तो दूसरी तरफ एक पतिव्रता अपने आंसुओं, से कलयुगी पति भगवान के चरण धो रही थी।  दोनों में भावों का अंतर था जहां दोनों मित्र भावों के सागर में गोते लगा रहे थे। वही पगली के आंसुओं और पीड़ा का कोई मोल नही था।

सुहागरात बीत चली थी, सेज पर सजी बेला और गुलाब की लडियाँ और पंखुडियां अब भी दिल में हसरतें लिए उनके मिलन की साक्षी बनने की तमन्ना सहेजे हसरत भरी आखों से देख रही थी। रात बीत चली थी।  सुहाग सेज की यह अजीबोगरीब दास्ताँ न तो ससुराल में न तो मायके में पगली अपने माँ बाप को तथा सखियों को सुना सकती थी। ये कहानी एक मात्र पगली की ही हो ऐसा नही है हजारों पगलियां आज भी समाज में घुटन और पीड़ा ले जी रही हैं जिनके दुख और पीड़ा का कोई अंत नही है।

 

 – अगले अंक में पढ़ें  – पगली माई – दमयंती  – भाग -4 – खुशियों भरे दिन 

© सुबेदार पांडेय “आत्मानंद”

संपर्क – ग्राम जमसार, सिंधोरा बाज़ार, वाराणसी – 221208

मोबा—6387407266

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विशाखा की नज़र से # 14 – कौन से पानी में तूने कौन सा रंग घोला है ☆ श्रीमति विशाखा मुलमुले

श्रीमति विशाखा मुलमुले 

 

(श्रीमती  विशाखा मुलमुले जी  हिंदी साहित्य  की कविता, गीत एवं लघुकथा विधा की सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी रचनाएँ कई प्रतिष्ठित पत्रिकाओं/ई-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती  रहती हैं.  आपकी कविताओं का पंजाबी एवं मराठी में भी अनुवाद हो चुका है। आज प्रस्तुत है उनकी एक  भावप्रवण रचना कौन से पानी में तूने कौन सा रंग घोला हैअब आप प्रत्येक रविवार को श्रीमती विशाखा मुलमुले जी की रचनाएँ  “साप्ताहिक स्तम्भ – विशाखा की नज़र से” में  पढ़ सकेंगे. )

 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # 14 – विशाखा की नज़र से

☆ कौन से पानी में तूने कौन सा रंग घोला है  ☆

 

बेरंग है सारे रंगों की अभिलाषा

हमनें गढ़ी सुविधा की परिभाषा

 

जिसनें सोखा नही हरा

हमनें कहाँ उसे हरा रंग

जिसनें जज़्ब किया नही पीला

हमनें कहाँ उसे पीला रंग

ख्वाहिशें, पर फैलाती जहाँ

उसे कहाँ आसमानी रंग

 

भगवा तो और भी कठिन है रंग

जो है लाल औ’ पीले के मध्य का परावर्तन

हरे, नीले, भगवे रंगों की

हमनें करी ख़ूब राजनीति

जबकि असल में नहीं है

यह उस व्यक्ति, वस्तु या धर्म का रंग

हमनें रंग दिया उसको वैसा

जो नहीं था उसका खुदका रंग

 

असल में होते हैं बस दो ही रंग

या तो सफ़ेद या फिर काला

दोनों में समाहित है सारे रंग

अब मत चलाना अपना कुटिल दिमाग

एक को कहना पाक, एक को नापाक

खेलना अब के ऐसी होली

रहना सफ़ेद या सोखना सब रंग

बस दिखे ना एक भी इंद्रधनुषी रंग

 

© विशाखा मुलमुले  

पुणे, महाराष्ट्र

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हिन्दी साहित्य – ☆ दीपिका साहित्य # 4 ☆ शायरी ☆ – सुश्री दीपिका गहलोत “मुस्कान”

सुश्री दीपिका गहलोत “मुस्कान”

( हम आभारीसुश्री दीपिका गहलोत ” मुस्कान “ जी  के जिन्होंने ई- अभिव्यक्ति में अपना” साप्ताहिक स्तम्भ – दीपिका साहित्य” प्रारम्भ करने का हमारा आगरा स्वीकार किया।  आप मानव संसाधन में वरिष्ठ प्रबंधक हैं। आपने बचपन में ही स्कूली शिक्षा के समय से लिखना प्रारम्भ किया था। आपकी रचनाएँ सकाळ एवं अन्य प्रतिष्ठित समाचार पत्रों / पत्रिकाओं तथा मानव संसाधन की पत्रिकाओं  में  भी समय समय पर प्रकाशित होते रहते हैं। हाल ही में आपकी कविता पुणे के प्रतिष्ठित काव्य संग्रह  “Sahyadri Echoes” में प्रकाशित हुई है। आज प्रस्तुत है आपकी अतिसुन्दर शायरियां । आप प्रत्येक रविवार को सुश्री दीपिका जी का साहित्य पढ़ सकेंगे।

☆ दीपिका साहित्य #4 ☆ शायरी ☆ 

 

मेरे ख्वाबों ख्यालो में कोई साया लहराया है, न जाने ये कौनसा मौसम आया है,

न जाने कौनसी दिशा में बह रही है हवा, न जाने माझी कौनसी नाँव लाया है,

न जाने ले जाएगा किस किनारे, यही ख्याल जहन में बार बार आया है . . .

 

जाते जाते वो जर्रा दे गया, पिछली दिवार पे निशां दे गया,

हर पत्ता डाली से ले गया, मुझसे मेरा सुंकू ले गया,

बेज़ार सी हो चली है ज़िंदगी, जैसे बेदर्द ज़िंदगी से रंगो को ले गया . . .

 

फ़िज़ा महक रही है आज, हर चिड़िया चहक रही है आज,

तुझसे पहले तेरे आने की खबर जो आयी, हर धड़कन धड़क रही है आज . . .

 

सुबह की पहली-पहली किरण जब पड़ी मेरे आँगन में,

लगा जैसे उसके आने का आगाज हुआ है जीवन में,

लम्हा-लम्हा गिन रही हूँ उसके इंतज़ार में,

न जाने कब होगा उसका दीदार अब के बरस सावन में . .

 

© सुश्री दीपिका गहलोत  “मुस्कान ”  

पुणे, महाराष्ट्र

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आध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता – पद्यानुवाद – अष्टम अध्याय (27) प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता

हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

अष्टम अध्याय

(ब्रह्म, अध्यात्म और कर्मादि के विषय में अर्जुन के सात प्रश्न और उनका उत्तर )

( शुक्ल और कृष्ण मार्ग का विषय)

 

नैते सृती पार्थ जानन्योगी मुह्यति कश्चन ।

तस्मात्सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भवार्जुन ।।27।।

इन दोनों के ज्ञान से योगी शांत अनन्त

तू भी अर्जुन योगी हो अंत से हो निश्चिंत।।27।।

 

भावार्थ : हे पार्थ! इस प्रकार इन दोनों मार्गों को तत्त्व से जानकर कोई भी योगी मोहित नहीं होता। इस कारण हे अर्जुन! तू सब काल में समबुद्धि रूप से योग से युक्त हो अर्थात निरंतर मेरी प्राप्ति के लिए साधन करने वाला हो।।27।।

 

Knowing these paths, O Arjuna, no Yogi is deluded! Therefore, at all times be steadfast in Yoga.।।27।।

 

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ 

ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर

vivek1959@yahoo.co.in

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – उत्क्राँति ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) 

☆ संजय दृष्टि  – उत्क्राँति

कुआँ, पेड़,

गाय, साँप,
सब की रक्षा को
अड़ जाता था,
प्रकृति को माँ-जाई
और धरती को
माँ कहता था..,
अब कुआँ, पेड़,
सब रौंद दिए,
प्रकृति का चीर हरता है
धरती का सौदा करता है,
आदिमपन से आधुनिकता
उत्क्राँति कहलाती है,
जाने क्यों मुझे यह
उल्टे पैरों की यात्रा लगती है!

हम सब यात्रा की दिशा पर चिंतन करें।

 

©  संजय भारद्वाज, पुणे

(दोपहर 1.55, 18.12.19)

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

writersanjay@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आशीष साहित्य – # 22 – वरदान और अभिशाप ☆ – श्री आशीष कुमार

श्री आशीष कुमार

(युवा साहित्यकार श्री आशीष कुमार ने जीवन में  साहित्यिक यात्रा के साथ एक लंबी रहस्यमयी यात्रा तय की है। उन्होंने भारतीय दर्शन से परे हिंदू दर्शन, विज्ञान और भौतिक क्षेत्रों से परे सफलता की खोज और उस पर गहन शोध किया है। अब  प्रत्येक शनिवार आप पढ़ सकेंगे  उनके स्थायी स्तम्भ  “आशीष साहित्य”में  उनकी पुस्तक  पूर्ण विनाशक के महत्वपूर्ण अध्याय।  इस कड़ी में आज प्रस्तुत है   “वरदान और अभिशाप।)

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☆ साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ आशीष साहित्य – # 22 ☆

☆ वरदान और अभिशाप

भगवान राम भी कर्म के कानून से नहीं बच पाए। उन्होंने एक वृक्ष के पीछे से बाली को मार डाला था, न कि लड़ाई की खुली चुनौती से। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि बाली को वरदान था कि अगर कोई उससे लड़ने के लिए उसके सामने आ जाए तो बाली को उसकी आधी शक्ति मिल जाएगी।

इसलिए भगवान विष्णु के अगले अवतार, भगवान कृष्ण के रूप में इस कार्य के लिए, उन्हें जरा (अर्थ : माँ) नामक एक शिकारी के हाथों वृक्ष के पीछे से छिप कर चलाये गए तीर से मृत्यु मिली। जानते हैं वो जरा कौन था? वह बाली का अगला जीवन था, जिसने अपने पिछले जन्म में भगवान राम द्वारा छिप कर चलाये हुए तीर से मृत्यु प्राप्त की थी जिसका परिणाम स्वरूप भगवान कृष्ण की मृत्यु भी समान रूप से हुई वो भी उसी केहाथोंजिसे उन्होंने पिछले जन्म में मारा था। इसी को कर्मोंका क़ानून कहते हैं।

क्या आप जानते हैं कि कर्म का अभिशाप और कानून इतना प्रभावी है कि उसने भगवान कृष्ण के सभी राज्यों को बर्बाद कर दिया था । बेशक अगर भगवान कृष्ण चाहते, तो वे उनसे बच सकते थे, क्योंकि यह सब स्वयं उनकी अपनी माया के तहत ही रचा गया था, लेकिन यदि वह ऐसा करते, तो ऐसा लगता कि भगवान अपने द्वारा बनाये गए नियम स्वयं ही तोड़ रहे हैं, तो आम लोग उनका अनुसरण क्यों करेंगे?

भगवान कृष्ण से अधिक बुद्धिमान कौन है? कोई नहीं।

वह कुरुक्षेत्र की लड़ाई में पांडवों के साथ थे क्योंकि उन्हें पता था कि यदि पांडव उस युद्ध को हार जायँगे, तो धर्म का नुकसान होगा और कौरव कभी भी आदर्श राजा नहीं बन पायेंगे जिससे कि कौरवों के शासन में, सभी आम लोगों को भारी मुसीबतों और परेशानियों का सामना करना पड़ेगा। इसलिए धार्मिक कानून स्थापित करने के लिए, भगवान कृष्ण को पता था कि पांडवों की जीत आवश्यक है। सभी जानते हैं कि कौरव सेना के पास पांडव सेना से ज्यादा कई और शक्तिशाली योद्धा थे।

 

© आशीष कुमार  

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सूचनाएँ/Information ☆ हिंदी : घोषित राजभाषा, उपेक्षित राष्ट्रभाषा ☆ – प्रस्तुति – श्री संजय भारद्वाज

सूचनाएँ/Information

हिंदी : घोषित राजभाषा, उपेक्षित राष्ट्रभाषा

(हिंदी आंदोलन परिवार के रजतजयंती समारोह के अंतर्गत सम्पन्न हुआ आयोजन)

हिंदी आंदोलन परिवार, पुणे, राष्ट्रभाषा महासंघ, मुंबई और महाराष्ट्र राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, पुणे के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित एक दिवसीय संगोष्ठी पुणे में आयोजित की गई थी। इसका विषय था, *हिंदी : घोषित राजभाषा, उपेक्षित राष्ट्रभाषा*।

संगोष्ठी का उद्घाटन सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय में हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. सदानंद भोसले ने किया। डॉ. भोसले ने कहा कि गाँव की मंडी से लेकर संसद तक की भाषा हिंदी है तो हिंदी राष्ट्रभाषा क्यों नहीं हो सकती? हिंदी चारों भाषाकुलों के बीच सेतु का काम करती है। आज़ादी की लड़ाई में भी हिंदी ही सेतु बनी। उन्होंने लिपि के प्रचार और अधुनातन तकनीक को अपनाने पर बल दिया।

हिंदी आंदोलन परिवार, पुणे के अध्यक्ष श्री संजय भारद्वाज ने कहा कि राष्ट्रगान और राष्ट्रध्वज की तरह राष्ट्रभाषा भी एक ही हो सकती है।अपनी भाषा में शिक्षा न होने के कारण प्रतिभाओं के दमन और शोध के क्षेत्र में मौलिकता के अभाव की ओर उन्होंने ध्यान खींचा। उन्होंने कहा कि यही उपयुक्त समय है कि हम संकल्प को सिद्धि की ओर ले जाने की यात्रा आरम्भ करें।

हिंदी आंदोलन परिवार की  सहसंस्थापक सुधा भारद्वाज ने प्रस्तावना रखी। उन्होंने हिंदी की भाषागत वैज्ञानिकता और संवैधानिक स्थिति की चर्चा करते हुए विषय के विभिन्न पहलुओं पर मंथन का आह्वान किया।

महाराष्ट्र राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, पुणे के संचालक श्री ज. गं. फगरे ने अपने वक्तव्य में कहा कि हिंदी उपेक्षित नहीं है। राजनीतिक विरोध का मुकाबला भाषा के प्रचार से करना चाहिए।

राष्ट्रभाषा महासंघ, मुंबई की उपाध्यक्ष डॉ. सुशीला गुप्ता ने उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता की। उन्होंने कहा कि भाषा अस्मिता से जुड़ी होती है। हिंदी की उपेक्षा अपनी पहचान को लुप्त करने जैसा है। इस सत्र का संचालन- स्वरांगी साने ने किया।

प्रथम सत्र की अध्यक्षता प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. दामोदर खडसे ने की। अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि हिंदी राष्ट्रभाषा थी, है और रहेगी। आम नागरिक अँग्रेज़ी के खौफ़ से दबा है। निष्ठा और समर्पण से हिंदी के पक्ष में वातावरण तैयार करना होगा।

आबासाहेब गरवारे महाविद्यालय के हिंदी विभाग की पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ. नीला बोर्वणकर ने कहा कि हिंदी के कारण प्रांतीय भाषाओं की अस्मिता पर खतरे की आशंकाओं का निर्मूलन किया जाना चाहिए। स्वाधीनता के समय ही हिंदी को राष्ट्रभाषा घोषित कर दिया जाता तो भाषा को लेकर होनेवाले विवाद खड़े नहीं होते। हिंदी विभाग, सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय में एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. शशिकला राय ने कहा कि यह मानना पड़ेगा कि भारतीय भाषाएँ दम तोड़ रही हैं। बड़े अख़बार समूह व्यापार के नाम पर भाषा के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। उन्होंने भाषा के क्रियोलीकरण पर  आपत्ति जताई। बैंक ऑफ महाराष्ट्र के सहायक महाप्रबंधक (हिंदी) डॉ. राजेन्द्र श्रीवास्तव ने राजभाषा और राष्ट्रभाषा के तकनीकी अंतर को परिभाषित किया। राजभाषा के क्षेत्र में हुए कार्यों से स्थितियों में आए सकारात्मक बदलाव की उन्होंने विशद जानकारी दी। राष्ट्रभाषा महासंघ, मुंबई के ट्रस्टी एवं संरक्षक श्री महेश अग्रवाल ने कहा कि हिंदी के राजनीतिक विरोध पर हिंदी के हितैषियों का मौन पीड़ादायक है।इस सत्र का संचालन डॉ. अनंत श्रीमाली ने किया।

द्वितीय सत्र में ‘क्षितिज’ द्वारा भाषा पर आधारित साहित्यिक रचनाओं की प्रस्तुति की गई।  *मेरी भाषा के लोग* नामक इस सांस्कृतिक आयोजन के लेखक-निर्देशक संजय भारद्वाज थे। उनके अलावा विजया टेकसिंगानी, आशु गुप्ता, अपर्णा कडसकर, रेखा सिंह, अनिता दुबे और समीक्षा तैलंग ने भी रचनाओं को स्वर दिया।

समापन सत्र में प्रतिक्रियाएँ एवं प्रश्नोत्तर हुए। इस सत्र का संचालन डॉ. ओमप्रकाश शर्मा ने किया। आभार प्रदर्शन अरविंद तिवारी ने किया।

कार्यक्रम की सफलता के लिए सुशील तिवारी, डॉ. लतिका जाधव, डॉ. पुष्पा गुजराथी ने विशेष परिश्रम किया। बेहद कसे हुए इस विचारोत्तेजक कार्यक्रम में बड़ी संख्या में श्रोता उपस्थित थे। प्रमुख उपस्थितों में माया मीरपुरी, उषाराजे सक्सेना, सत्येंद्र सिंह, डॉ. अहिरे, राजीव नौटियाल, डॉ. मेघा श्रीमाली, मीरा गिडवानी, डॉ. लखनलाल आरोही, माधुरी वाजपेयी, संध्या यादव, नीलम छाबरिया, महेंद्र मिश्र, माधव नायडू, सतीश दुबे, महेश बजाज, बीरेंद्र साह, दिवाकर सिंह आदि सम्मिलित थे।

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कोहरे के आँचल से # 20 ☆ हाथों की गलियाँ ☆ – सौ. सुजाता काळे

सौ. सुजाता काळे

((सौ. सुजाता काळे जी  मराठी एवं हिन्दी की काव्य एवं गद्य  विधा की सशक्त हस्ताक्षर हैं ।  वे महाराष्ट्र के प्रसिद्ध पर्यटन स्थल कोहरे के आँचल – पंचगनी से ताल्लुक रखती हैं।  उनके साहित्य में मानवीय संवेदनाओं के साथ प्रकृतिक सौन्दर्य की छवि स्पष्ट दिखाई देती है। आज प्रस्तुत है सौ. सुजाता काळे जी की पर्यावरण और मानवीय संवेदनाओं पर आधारित एक भावप्रवण कविता  “हाथों की गलियाँ”।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कोहरे के आँचल से # 20 ☆

☆ हाथों की गलियाँ

अपना लेखा मेहनत है
भाग्य के भरोसे क्यों रहे?
हाथ कभी क्यों फैलाए?
हम हाथ कभी क्यों जोड़े?

हाथों की गलियाँ तंग रही
नसीब कहां हम ढूँढेंगे?
मिट्टी गारा उठाते सही,
हीरा कोयले से पाएँगे।

कल नसीब हम बदलेंगे ,
हाथों पर कालिख ही सही
हम मेहनत करने वाले हैं ,
आज भले ये तंग सही।

नई रोशनी यहां आएगी,
नया सवेरा वह लाएगी।
हज़ारों किरणों को लेकर,
हाथों की गलियाँ बनाएगी।

 

© सुजाता काळे,

पंचगनी, महाराष्ट्र, मोब – 9975577684

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मराठी साहित्य – कादंबरी ☆ मित….. (भाग-1) ☆ श्री कपिल साहेबराव इंदवे

श्री कपिल साहेबराव इंदवे 

(युवा एवं उत्कृष्ठ कथाकार, कवि, लेखक श्री कपिल साहेबराव इंदवे जी का एक अपना अलग स्थान है. आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशनधीन है. एक युवा लेखक  के रुप  में आप विविध सामाजिक कार्यक्रमों में भाग लेने के अतिरिक्त समय समय पर सामाजिक समस्याओं पर भी अपने स्वतंत्र मत रखने से पीछे नहीं हटते. हमें यह प्रसन्नता है कि श्री कपिल जी ने हमारे आग्रह पर उन्होंने अपना नवीन उपन्यास मित……” हमारे पाठकों के साथ साझा करना स्वीकार किया है। यह उपन्यास वर्तमान इंटरनेट के युग में सोशल मीडिया पर किसी भी अज्ञात व्यक्ति ( स्त्री/पुरुष) से मित्रता के परिणाम को उजागर करती है। अब आप प्रत्येक शनिवार इस उपन्यास की अगली कड़ियाँ पढ़ सकेंगे।) 

इस उपन्यास के सन्दर्भ में श्री कपिल जी के ही शब्दों में – “आजच्या आधुनिक काळात इंटरनेट मुळे जग जवळ आले आहे. अनेक सोशल मिडिया अॅप द्वारे अनोळखी लोकांशी गप्पा करणे, एकमेकांच्या सवयी, संस्कृती आदी जाणून घेणे. यात बुडालेल्या तरूण तरूणींचे याच माध्यमातून प्रेमसंबंध जुळतात. पण कोणी अनोळखी व्यक्तीवर विश्वास ठेवून झालेल्या या प्रेमाला किती यश येते. कि दगाफटका होतो. हे सांगणारी ‘मित’ नावाच्या स्वप्नवेड्या मुलाची ही कथा. ‘रिमझिम लवर’ नावाचं ते अकाउंट हे त्याने इंस्टाग्रामवर फोटो पाहिलेल्या मुलीचंच आहे. हे खात्री तर त्याला झाली. पण तिचं खरं नाव काय? ती कुठली? काय करते? यांसारखे अनेक प्रश्न त्याच्या मनात आहेत. त्याची उत्तरं तो जाणून घेण्यासाठी किती उत्साही आहे. हे पुढील भागात……”

☆ मित……  (भाग 1)☆

“Hi”

शेवटी तो मॅसेज आलाच ज्याची मागच्या महिन्याभरापासून मित वाट बघत होता. इंस्टाग्रामवर ” रिमझीम लवर” नाव असलेल्या त्या अकाउंटवर एका मुलीचा फोटो पाहून मित त्यावर मोहित झाला होता. कितीही झूम केला तरी फोटो फूलस्क्रीन होत नव्हता. आणि लहानशा गोलाकारात बघून त्याचे मन भरत नव्हते. म्हणून त्याने त्या अकाउंटला फाॅलो केले. प्रायवैट अकाउंट असलयामूळे “रिक्वेस्टेड” त्याच्या स्क्रिनवर दिसत होते. नाव लक्षात राहावे म्हणून त्याने स्क्रीनशाॅट काढून ठेवला. पुर्ण फोटो पाहण्याची त्याची बेचैनी काही कमी होत नव्हती. पण अशा नावाची अकाउंट्स ही मुलांची पण असतात. फेसबूक, इंस्टाग्राम किंवा अन्य सोशल मिडिया अॅप वर बनावट आय डी ओपन करून मुलींच्या शोधात असणा-या मुलांची निव्वळ टर उडवण्यासाठी, कधी कधी जवळच्या मित्राची फजिती  करण्यासाठी अशी अकाउंट तयार केली जातात. हे त्याच्या लक्षात आलेच होते. पण फक्त जाणून घ्यावे या उद्देशाने त्याने फाॅलो रिक्वेस्ट कॅन्सल केली नाही. बेचैनी एवढी होती की क्षणभर ही धीर त्याला निघत नव्हता. पण काय करणार, रिक्वेस्ट स्विकारली तेव्हाच त्याला तिची प्रोफाईल बघता येणार होती.

आज कित्येकदा मितने मोबाईल डाटा चालू करून इंस्टाग्राम नोटीफिकेशन चेक केले होते. एव्हाना सर्वच अॅपची नोटीफिकेशन त्याने बंद करून ठेवली होती. पण आज त्याने ती पुन्हा चालू करून पुन्हा पुन्हा तपासत होता. त्यांच हे बदलणं त्याच्या गृपच्या मुलांनाही नविन होतं. काहीतरी विचारांत राहणारा, शांत शांत एका कोप-यात राहणारा, आणि कोणाचा फोन आल्याशिवाय मोबाईलला न बघणारा मित  आज मात्र मोबाईलला खुपदा चालू करून पाहत होता.

रात्रीच्या जेवणानंतर नित्य सवयीप्रमाने शत पावली करण्यासाठी कॅटीनबाहेर गेला. चालता चालता न राहवून त्याने  पुन्हा मोबाईल डाटा चालू केला.  आणि फायनली त्याला ती नोटीफिकेशन मिळाली “रिमझिम लवर अॅक्सप्ट युवर फ्रेंड रिक्वेस्ट”. ती पाहून तो आनंदुन गेला. अवघ्या काही तासांत त्याची रिक्वेस्ट अॅक्सेस्ट झाली होती. अती उत्साह न दाखवता नेहमीप्रमाणे शांत डोकं ठेऊन तो रूमवर जाऊन बेडवर पडून निवांत फोटो पाहावे असा विचार करून तो रूमवर परतला. आणि कोणाशीही न बोलता आपल्या रूममध्ये घुसला. संघरत्न, महेश आणि मित अशा तिघांची ती रूम होती. संघरत्नला उत्कृष्ट वाद्य वाजवता येत असल्याने त्याच्या बेडच्या आजूबाजू गिटार वगैरे असं त्याचं आवडतं साहित्य पडलेलं होतं. मित रूममध्ये आला तेव्हा संघरत्न कोणती तरी धुन वाजवण्यात मग्न होता. तसाच महेशही उत्तम कलाकार आणि तो छान डान्सरही आहे हे त्याचे कपडे केसांची स्टाईल आणि त्याच्या वागण्यावरून  कोणीही ओळखून घेईल. मित आला तेव्हा संघरत्न त्याला म्हटला “मित अरे बघ तूझ्या नव्या नाटकासाठी मी नविन धून तयार करतोय. ती जरा एकून सांग मला कशी झालीय ते. तुला काही सुधारणा हव्या असतील तर त्या ही सुचव.” पण मित त्याची कोणतीही गोष्ट ऐकण्याच्या मनस्थितीत नव्हता. म्हणून त्याने स्मित हसून त्याला म्हटले “अरे बाळं तू आज पर्यंत ज्या धून बनवलेल्या आहेत त्या कधी फेल गेल्या आहेत का? छानच असेल ही पण. तू सुरु ठेव” मितचे असं उत्तर देणं त्याला आवडलं नाही. त्याने रागाने गिटार बाजूला ठेवली. तेव्हा मित त्याच्या जवळ बसला. “अरे डार्लिंग, रागवतोय कशाला.” संघरत्न थोडा चिडलाच होता. ” रागावतोय म्हणजे मी एवढी मेहनतीने ती धून तुझ्यासाठी बनवली आणि हारामखोरा, तू इग्नोर करतोय” आणि त्याने मान तशीच रागात वळवली. त्याची मान स्वत कडे करण्याचा प्रयत्न करत मित त्याला म्हणाला. ” अरे मेरी जान. आय लव यू बोल दे एक बार” पण तो काही मानत नव्हता. म्हणून मितने मोबाईल घेतला आणि त्याच्यापुढे केला. ” अरे बघ इंस्टाग्रामवर एक मुलगी भेटलीय. खुप सुंदर आहे यार तीने आत्ताच फ्रेंड रिक्वेस्ट अॅक्सेस्ट केली म्हणुन……” त्याचं बोलणं अपूर्णच सोडत संघरत्नने मोबाईल त्याच्या हातातुन घेतला. आणि म्हटला “काय? साल्या गुपचूप गुपचूप तू अशी कारस्थाने करतोयस आणि आम्हाला माहितीसुध्दा पडू देत नाही. दाखव कोण आहे ती, कशी आहे” मित ” अरे सावकाश. मी पण पाहिलं नाही तीला अजून पुर्ण” मितने त्याच्या हातातून मोबाईल परत घेतला. आणि नोटीफिकेशन आॅन केली. स्क्रिनवर “रिमझिम लवर” नावाचं अकाउंट दिसतं होतं. साधारण आठराएक फोटो पोस्ट केले होते. अधीर असलेल्या मितने पटकन एक फोटोवर क्लिक केले. फोटो फूलस्क्रीन दिसत होता. फोटो पाहताच त्याच्या अंगावर शहारा उठला. त्याचं. ह्रदय जणू बाहेर निघून नाचू लागलं होतं. तो हसत होता कि आणखी काही. हे त्यालासुद्धा कळत नव्हतं. त्याच्या चेह-यावरचे नेमके भाव काय आहेत हे सांगण्या पलिकडचे होते.  एवढं सुंदर देखणं रूप, जणू तारूण्याची ती मिसालच होती. ते बारीक-बारीक छोटे डोळे, लांबसडक काळेभोर दाट केसं, दिसायला सडपातळ पण सौंदर्याची खाणच होती ती. तिचे ते स्मित अधिकच मोहत होते. हसतांना गालावर पडलेली खळी तीला शोभून दिसत होती. जास्त नाही पण उंच सडपातळ असलेली ती लावण्यवतीच भासत होती. तीला पाहताच त्याचं ह्रदय प्रेमाच्या सागरात हेलकावे खाऊ लागलं होतं. त्याची दिवानगी फोटोगणिक वाढतच होती. संघरत्नचंही काहीसं असंच होतं. पण मितला त्या फोटोत पुर्णपणे बुडालेलं पाहून त्याने खांदा मारत म्हटले  ” अरे साल्या, कुठे भेटला हा कोहिनूर तूला.” मित फक्त स्मित देत होता. संघरत्नला कळाले कि त्याच्या मनात काय सुरू आहे. तो त्याला चिडण्यासाठी म्हटला ” काय? डायरेक्ट विकेट…….” मितने लाजून खाली मान घातली. संघरत्न ” अबे तू पण …….”

तो चकित होता. संघरत्न जेवढा मितला ओळखत होता. त्याला माहीत होतं प्रेम वगैरे या गोष्टींत मितला रस नव्हता. त्याच्या बाबांचं म्हणनं होतं की त्याने इंजिनियरींग करावं पण मितला लिखाणात फार रस होता. त्याने त्याच्या बाबांना सरळ सांगीतलं होतं कि त्याला लेखक, दिग्दर्शक व्हायचंय. त्याच्या निर्णयाचा सम्मान करत त्याच्या बाबांनी त्याला विद्यापिठात ड्रामा डिपार्टमेंटला प्रवेश घ्यायला परवानगी दिली होती. बाबांचा विश्वास सार्थ ठरवत मितने आतापर्यंत अनेक चांगल्या कथा लिहून त्यांना स्वतःच दिग्दर्शित करून अनेक बक्षिसांवर उत्कृष्ट दिग्दर्शक आणि लेखक म्हणून नाव कोरले होते. त्याने अनेक भयकथा, प्रेमकथा, प्रेरणादायी कथा लिहिल्या होत्या. त्याच्या शालेय जीवनात त्याने एक काव्य संग्रह ही प्रकाशीत केला होता. त्याला प्रेमकथा लिहीण्याची विशेष आवड होती. हे सांगणे अतिशयोक्तीचे नव्हते कि एवढ्या प्रेमकथा लिहीणारा मित अजूनही कोणत्या मुलीच्या प्रेमात पडला नव्हता. पण या मुलीचा फोटो पाहून तो तिच्यावर भाळला हे मात्र खरे होते. त्याने ते सर्वच फोटो कितीतरी वेळा झूम करून पाहिले होते.

 ( क्रमशः )

© कपिल साहेबराव इंदवे

मा. मोहीदा त श ता. शहादा, जि. नंदुरबार, मो  9168471113

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आध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता – पद्यानुवाद – अष्टम अध्याय (26) प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता

हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

अष्टम अध्याय

(ब्रह्म, अध्यात्म और कर्मादि के विषय में अर्जुन के सात प्रश्न और उनका उत्तर )

( शुक्ल और कृष्ण मार्ग का विषय)

 

शुक्ल कृष्णे गती ह्येते जगतः शाश्वते मते ।

एकया यात्यनावृत्ति मन्ययावर्तते पुनः ।।26।।

 

शुक्ल कृष्ण दो मार्ग हैं जग के ज्ञात महान

एक में तो निर्वाण है अन्य में फिर निर्माण।।26।।

 

भावार्थ : क्योंकि जगत के ये दो प्रकार के- शुक्ल और कृष्ण अर्थात देवयान और पितृयान मार्ग सनातन माने गए हैं। इनमें एक द्वारा गया हुआ (अर्थात इसी अध्याय के श्लोक 24 के अनुसार अर्चिमार्ग से गया हुआ योगी।)– जिससे वापस नहीं लौटना पड़ता, उस परमगति को प्राप्त होता है और दूसरे के द्वारा गया हुआ ( अर्थात इसी अध्याय के श्लोक 25 के अनुसार धूममार्ग से गया हुआ सकाम कर्मयोगी।) फिर वापस आता है अर्थात्‌जन्म-मृत्यु को प्राप्त होता है।।26।।

 

The bright and the dark paths of the world are verily thought to be eternal; by the one (the bright path) a person goes not to return again, and by the other (the dark path) he returns.।।26।।

 

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ 

ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर

vivek1959@yahoo.co.in

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