श्री ओमप्रकाश पाण्डेय
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री ओमप्रकाश पाण्डेय जी भारतीय स्टेट बैंक से 2015 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्त. सन 2018 से कविताओं और लघु कथाओं का नियमित रूप से लेखन. दो काव्य संग्रह “ऑंचल” और “किलकारियाँ (बालगीत संग्रह)” तथा दो कथा संग्रह “चूड़ियाँ” और “अनपढ़” प्रकाशित. लगभग तीन सौ से अधिक कहानियाँ व लघु कथाएं रचित जिनमें “मार्निंग वाक” (दस कहानियाँ), “आधुनिक विक्रम और वेताल की कथा” (दस कहानियाँ), दीदी, प्रश्न या आमंत्रण, सोंकविता , विश्वास आदि चर्चित रहीं हैं. आपके द्वारा सात सौ से अधिक कविताएँ रचित जो कई साहित्यक मंचों पर प्रस्तुत की गईं हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय कथा “चरित्रहीन“.)
☆ कथा कहानी ☆ चरित्रहीन ☆ श्री ओमप्रकाश पाण्डेय ☆
क्या जमाना आ गया! घोर कलयुग ! इसी को कहते हैं कि कलयुग अपने चरम सीमा पर चल रहा है ! क्या हो गया दादू ? अचानक आपको कलयुग का याद कहाँ से आने लगा. बबलू ने दादू से पूछा. दादू यानी चौधरी रमाशंकर जी. अस्सी साल की आयु पार कर चुके हैं, वास्तविक आयु कितना है, कोई नहीं जानता, लेकिन बच्चे से लेकर बूढ़े तक, सब लोग इनको दादू ही कहते हैं और आप का बड़ा सम्मान करते हैं.
हाँ तो बात हो रहा था, कलयुग का, दादू का परिचय देने में मैं रह गया और बबलू का प्रश्न पीछे छूट गया. बबलू ने फिर पूछा कि दादू क्या हो गया कि आप को कलयुग याद आ गया. चौधरी जी ने एक गहरा सांस लिया और बोले कि क्या बताऊँ बेटा, अब कहने को रह ही क्या गया है. बबलू बोला नहीं दादू आपको बताना तो पड़ेगा ही. चौधरी बोले बेटा देखो पंडित रघुराज जी के परिवार के किसी बहु बेटियों को कभी घर से बाहर अकेले निकलते किसी ने देखा है क्या ? बबलू थोड़ी देर चुप रहा फिर बोला कभी ध्यान तो नहीं दिया है, लेकिन देखा भी नहीं है.
अभी ये बातें हो ही रहा था कि रमापति बाबू भी आ गए. उन्होंने दादू का प्रश्न सुना तो रुक गये, बोले लेकिन आप यह प्रश्न पूछ ही क्यों रहें हैं, ऐसा क्या कर दिया उनके परिवार के महिलाओं ने. दादू बोले कि चिंता का विषय तो है ही , देखिये पडिंत रघुराज जी के देहांत के बाद उनकी बहु और बेटियों को जब देखिये वे घर से बाहर निकल जाती हैं और देर रात को वापस आतीं हैं. पता नहीं कहाँ जातीं हैं और क्या- क्या करतीं हैं. रमापति बाबू ने कहा कि कहीं जाती होंगी, कोई काम रहता होगा. लेकिन जब दादू ने अपनी बात पुनः दोहरायी तो रमापति बाबू उनके कहने का अर्थ कुछ-कुछ समझने लगे.
रमापति बाबू ने कहा कि दादू आप आधी बात कह रहे हैं. पंडित रघुराज जी के देहांत के उपरांत, उनका जवान बेटा, आनन्द का कोविड से देहांत हो गया. परिवार में आनन्द ही एक मात्र कमाने वाला था. सरकार ने कुछ सहायता किया , लेकिन उससे कितना दिन काम चलता ! तो परिवार आर्थिक रूप से बहुत ही कठिन समय से गुजर रहा है. मैं आप से एक बात पूछता हूँ कि क्या हममें से कोई एक बार भी जा कर उनके परिवार से उनकी आर्थिक कठिनाईयों के बारे में पूछा, किसी ने कोई सहायता किया. आज महंगाई के जमाने में हर व्यक्ति किसी प्रकार से अपने परिवार का ही खर्चा चला पा रहा है, तो वह दूसरे की सहायता क्या करेगा. मैं आप ही से पूछता हूँ , आप तो पंडित जी के बहुत ही घनिष्ठ परिवारिक मित्र रहे हैं, आप ने क्या किया. दूसरी बात इस प्रकार से रोज- रोज दूसरों से सहायता की प्रतिक्षा करने की जगह, अगर उनके परिवार के महिलाओं ने ख़ुद ही पैसा कमाने का प्रयास किया है और अपने पैरों पर खड़े होने का संकल्प लिया है, तो हमें उनके इस बात की प्रशंसा करनी चाहिए न कि उनके चरित्र पर किसी प्रकार का संदेह करना. वे पढ़ी लिखी महिलायें हैं, हमें उनके चरित्र पर अनावश्यक संदेह या प्रश्न नहीं करना चाहिए. आखिर हम अपनी लड़कियों को क्यों पढ़ाते हैं?
रमापति बाबू ने फिर आगे पूछा कि आप ने यह धारणा क्यों बना रखा है कि जो महिलाऐं अकेले घर से बाहर निकलतीं हैं, उनका चरित्र ठीक नहीं होता या उनके चरित्र पर संदेह किया जा सकता है. चरित्रवान होना या चरित्रहीन होना, एक बिल्कुल अलग विषय है. आखिर कब तक हम अपनी घर की माँ, बहन व बेटियों को अपंग बना कर रखेंगे. वास्तव में हम सबको यह प्रयास करना चाहिए कि हमारे घर की महिलाऐं, चाहे वह कोई भी हों, वे हर तरह से सशक्त होनी ही चाहिए. नौकरी करना या न करना, यह निर्णय उन पर छोड़ दें, लेकिन अगर वह नौकरी करना चाहती है, तो मना न करें. परन्तु अगर किसी कारणवश वह नौकरी नहीं करना चाहती है, तो उसे नौकरी करने के लिए बाध्य भी न करें. लेकिन वे घर से बाहर अकेले जातीं हैं, इस कारण से उनके चरित्र पर संदेह करना बहुत ही गलत है.
दादू के चेहरे के भाव से ऐसा लग रहा था कि वे रमापति बाबू के बातों से सहमत नहीं थे. उन्हें पंडित रघुराज जी के परिवार के बारे में चिंता सता रहा था. बबलू रमापति बाबू के बात से पूरी तरह से सहमत तो था,लेकिन वह पंडित रघुराज जी के परिवार के बारे में ज्यादा नहीं जानता था, अत: कुछ बोलना उसे उचित नहीं लगा. खैर उस समय बात वहीं पर समाप्त हो गया और सब लोग अपने अपने घर चले गए.
लेकिन दादू के मन में संदेह तो बैठ ही गया था और यह संदेह उन्हें परेशान किये था. एक दिन हिम्मत कर के दादू पंडित रघुराज जी के घर चले ही गये. उनका आना जाना तो पहले से ही था. दादू पंडित रघुराज जी के पुराने मित्र थे और परिवार में सब लोग इनको जानते थे. घंटी बजाया, थोड़ी देर बाद पंडित रघुराज जी की छोटी बेटी पुष्पा ने दरवाजा खोला. दादू को देखते ही उसने दादू का चरण स्पर्श किया और बैठने के लिए कहा. पुष्पा ने आवाज लगाई कि मम्मी देखो दादू आये हैं. थोड़ी देर में पुष्पा की माँ मालती आ गयी और दादू से बोली अरे भाई साहब आज इधर कैसे, आप तो लगता है कि मेरे घर का रास्ता ही भूल गए. अब दादू बोलते क्या, पंडित रघुराज जी के समय लगभग हर सप्ताह आना होता था, लेकिन कुछ तो कारण बताना ही था. बोले अरे बहन जी अब मैं भी तो बूढ़ा हो गया हूँ, फिर कोविड ने और भी निकलना बंद कर दिया, इसीलिए नहीं आ पाया. मालती बोली बात तो आप सही कह रहे हैं. वैसे बाहर निकलना तो मेरा भी लगभग बन्द ही हो गया है, वैसे आप के परिवार में सब लोग कैसे हैं. आप का छोटा पौत्र तो अब बड़ा हो गया होगा. मुझे भी बहुत दिन हो गया आप के घर गए हुए.
दादू बोले घर पर सब लोग ठीक हैं, छोटका तो अब प्ले स्कूल जाता है. थोड़ी देर बैठने के बाद दादू ने कहा चलता हूँ. मालती बोली नहीं भाई साहब इतने दिनों बाद आये हैं, बिना चाय पिये आप कैसे जा सकते हैं. पुष्पा बेटी दादू के लिए चाय बनाओ, मैं तब तक पकौड़ियां छानती हूँ और भाई साहब तब तक आप अखबार पढ़िये.
खैर दादू बैठ गए, अखबार पढ़ने लगे, लेकिन मन में शंका थी कि घर का खर्चा कैसे चलता होगा. इतने में एक लड़का आया, उसने घंटी बजाया, पुष्पा ने दरवाजा खोला और उससे बोली, रुको. पुष्पा घर के अन्दर गयी और दो टिफिन कैरियर ला कर उसे दे दिया. इसी तरह दो तीन लोग और भी आये टिफिन कैरियर ले कर चले गए. दादू कुछ- कुछ समझ रहे थे. उन्होंने पुष्पा से पूछा बेटी तुम किस कक्षा में पढ़ती हो. पुष्पा बोली दादू इंटर के बाद पढ़ाई छोड़ दिया और आज कल एक दूकान पर काम करतीं हूँ. इतने में मालती एक बड़े प्लेट में पकौड़ियां और चटनी लेकर आ गयी और बोली भाई साहब लीजिए.
दादू के चाय पीने के दौरान मालती को कई फोन आये, मालती हां , हूँ में जबाब दे कर फोन बन्द कर देती. दादू यह सब बड़े ध्यान से देख रहे थे. दादू के चेहरे का भाव देख कर मालती कुछ समझ गयी. बोली भाई साहब आजकल मैं घर में ही किचन चलाती हूँ और ये जो लोग अकेले रहते हैं , उन्हें खाना बना कर देतीं हूँ. आजकल वे लोग जो नौकरी या पढ़ाई करते हैं, या पति पत्नी दोनों नौकरी करते हैं, वे खाना तो बना नहीं सकते, तो ऐसे लोगों को मैं खाना देतीं हूँ. एक बाई भी है, वह भी सहायता करती है. अब क्या किया जाय भाई साहब, पेट तो भरना ही है. बेटे के अचानक मौत के बाद तो कुछ दिन बुद्धि ही काम नहीं कर रही थी कि कुछ सोच सकुं. फिर धीरे- धीरे अपने मन को समझाया कि जिन्दा तो रहना ही है! दोनों बेटियों ने पैसे के अभाव में पढ़ाई छोड़ दिया और नौकरी करने लगीं. बड़ी वाली तो एक प्राइवेट स्कूल में पढा़ती है और यह पुष्पा एक दूकान पर सेल्सगर्ल का काम करती है. किसी प्रकार परिवार का खर्चा चल रहा है.
दादू को यह सब सुन कर काटो तो खून नहीं. मन आत्मग्लानि से भर गया. उन्हें ऐसा लगने लगा कि कब जमीन फट जाये और वे उसमें समा जाये. मन तुरन्त उठ कर कमरे से निकलने को कहने लगा. किसी प्रकार से जल्दी- जल्दी चाय पी कर उठ गए और मालती को नमस्ते करते हुए कहा कि अब मैं चलूंगा. फिर बोले कभी समय मिले तो मेरे घर आओ. मालती बोली रविवार को किचन बंद रखतीं हूँ, जरूर आऊंगी. आप भी कभी बहन जी को लेकर आईये. पुराने लोग आतें हैं, तो अच्छा लगता है.
© श्री ओमप्रकाश पाण्डेय
29.04.2026
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