हिन्दी साहित्य – कविता ☆ मिट्टी को मिट्टी में मिल जाना है…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

डॉ. रामेश्वरम तिवारी

संक्षिप्त परिचय

  • हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल  (म.प्र).
  • नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए,  मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।

आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता – मिट्टी को मिट्टी में मिल जाना है…!

☆ ॥ कविता॥ मिट्टी को मिट्टी में मिल जाना है…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी

 

जीत- हार का ये खेल पुराना है,

अंत समय कर्म ही संग जाना है।

*

जीत पर फजूल जश्न मनाना है,

हार पर नाहक अश्क बहाना है।

*

ये सत्ता तो आती-जाती रहती है,

सच्चा  सुख तो राम को पाना है।

*

सुख  में साथी कई मिल जाएँगे,

दुख का भार खुद को उठाना है।

*

ये  सुंदर  तन मिट्टी की थाती है,

मिट्टी को मिट्टी में मिल जाना है।

*

हम  सब  दो दिनन के मेहमां हैं,

एक  दिन अलविदा हो जाना है।

*

कविता करना मनोरंजन नहीं है,

कवि-कर्म सुप्त-जन जगाना है।

© डॉ. रामेश्वरम तिवारी

सम्पर्क – सागर रॉयल होम्स, होशंगाबाद रोड, भोपाल-462026

मोबाईल – 8085014478

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – समानांतर ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – समानांतर ? ?

…….???

…..???

…???

पढ़ सके?

फिर पढ़ो!

नहीं…,

सुनो मित्र,

साथ न सही

मेरे समानांतर चलो,

फिर मेरा लिखो पढ़ो..!

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ हनुमान साधना संपन्न हुई. अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र दी जावेगी। 🕉️💥 

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १४९ ☆ जीने में आसानी है क्या? ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “जीने में आसानी है क्या?“)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १४९ ☆

✍ जीने में आसानी है क्या? ☆ श्री अरुण कुमार दुबे 

मुझ पर ये मनमानी है क्या

अपने पर हैरानी है क्या

 *

मरना तो आसान बहुत है

जीने में आसानी है क्या

 *

पूछ रहे मासूम परिंदे

छत पर दाना पानी है क्या

 *

घर की सब मर्यादा टूटी

रही न दादी नानी है क्या

 *

सर पर शुहरत बोल रही है

कहना मेरा सानी है क्या

 *

बन जाता मैं तेरा आशिक़

उससा तू लासानी है क्या

 *

टकराने जाते पर्वत से

तुमको मुँह की खानी है क्या

 *

हाथ सफलता कब आ जाये

तुमने किस्मत जानी है क्या

 *

बच्चे किस्सा सुनते बोलें

इक राजा इक रानी है क्या

 *

उस नादाँ को क्या समझाएं

पूछ रहा सब फ़ानी है क्या

 *

सोच अरुण हालत पे अपनी

बात बड़ों की मानी है क्या

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ हेमंत साहित्य # ५४ – तनकीद के पहले… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक रचना  – तनकीद के पहले।)

☆ हेमंत साहित्य # ५४ ☆

✍ तनकीद के पहले… ☆ श्री हेमंत तारे  

राहों की तीरगी को मिटाते रहना

चराग़ रखा है साथ जलाते रहना

कोई रूठे अपना तो ग़ज़ब क्या है

उसे मनाना, मनाना, मनाते रहना

 *

फ़िर बरपा है कहर तपिश का यारों

तुम परिंदों को  पानी पिलाते रहना

 *

तनकीद के पहले गिरेबां में झांक लेना

आसां नही इतना सही राह बताते रहना

 *

अपनी दौलत, शोहरत पे गुरूर न करना

रब से डरना,  फकीरों को खिलाते रहना

 *

मिल जाए गर कोई नाख़ुश, नाउम्मीद तुम्हें

हमदर्द हो जाना और होंसला दिलाते रहना

 *

सीखने को बहुत कुछ है ‘हेमंत’ जमाने में

बदकिस्मत हैं वो जो सीखे हैं रुलाते रहना

तीरगी       =  अंधकार, तनकीद     = उपदेश देना

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ आधुनिक जीवनशैली में बढ़ता पारिवारिक सन्नाटा… ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆

डॉ. रीटा अरोड़ा

(डॉ. रीटा अरोड़ा जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर। समाचार पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। आपका लेख-संग्रह ‘बांस का विवेक’ हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में केडीपी (KDP) पर ‘अकीरा अराता’ (AKIRA ARATA) उपनाम से प्रकाशित है। आप जनवादी लेखक संघ, हरियाणा की सक्रिय सदस्य हैं।)

☆ आलेख ☆ आधुनिक जीवनशैली में बढ़ता पारिवारिक सन्नाटा…  ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा 

“माँ, इस बार नहीं आ पाऊँगा… ऑफिस में बहुत काम है।”

कुछ पल चुप्पी रही।

“कोई बात नहीं बेटा, काम ज़रूरी है…”

फोन कट गया।

माँ ने दरवाज़े की ओर देखा – जो कई दिनों से नहीं खुला था।

पापा धीरे से बोले, “इस बार भी त्योहार… खाली ही रहेगा।”

****

आज का समाज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहाँ दो दुनियाएँ आमने-सामने हैं – एक तरफ पारंपरिक पारिवारिक संस्कार, और दूसरी तरफ आधुनिक जीवनशैली। इस टकराव में सबसे ज्यादा जो चुपचाप प्रभावित हो रहा है, वह है – परिवार का भावनात्मक ताना-बाना। बाहर से सब कुछ सामान्य दिखता है, लेकिन भीतर एक अनकहा सन्नाटा धीरे-धीरे गहराता जा रहा है।

पारंपरिक परिवारों में पले-बढ़े माता-पिता के लिए बच्चे केवल जिम्मेदारी नहीं होते, वे उनका पूरा संसार होते हैं – उनकी पहचान, उनका सपना, उनका सहारा। उन्होंने बच्चों को सिर्फ बड़ा नहीं किया, बल्कि अपनी इच्छाओं, अपने समय और कई बार अपने सपनों को भी उनके नाम कर दिया। उनके लिए परिवार का अर्थ था – साथ रहना, एक-दूसरे का सहारा बनना और हर परिस्थिति में एकजुट खड़े रहना।

लेकिन समय के साथ रिश्तों की परिभाषाएँ बदलने लगीं।

आज के युवाओं के लिए जीवन का केंद्र उनके सपने, उनका करियर और उनकी स्वतंत्रता बन गए हैं। वे आगे बढ़ना चाहते हैं, अपनी पहचान बनाना चाहते हैं – और इसके लिए घर से दूर जाना भी उन्हें सही लगता है। यह बदलाव स्वाभाविक है, लेकिन इसे स्वीकार करना हर माता-पिता के लिए आसान नहीं होता।

यहीं से शुरू होता है वह मौन संघर्ष, जो अक्सर शब्दों में सामने नहीं आता।

माता-पिता कई बार खुद से सवाल करते हैं –

“क्या हमने अपने बच्चों को यही सिखाया था कि वे हमसे दूर हो जाएं?”

“क्या हमारी परवरिश में कहीं कमी रह गई?”

असल में ये सवाल बच्चों से ज्यादा खुद से होते हैं – और शायद इसलिए ज्यादा पीड़ा देते हैं।

जब बच्चे अपने सपनों की ओर बढ़ते हैं, तो माता-पिता के लिए यह गर्व का क्षण भी होता है और एक गहरी खालीपन की शुरुआत भी। घर वही रहता है, दीवारें वही रहती हैं – लेकिन आवाजें कम हो जाती हैं, और खामोशी बढ़ जाती है। कभी जो घर हंसी और बातचीत से गूंजता था, वह अब सिर्फ घड़ी की टिक-टिक सुनता है।

बदलता सामाजिक ढांचा इस स्थिति को और जटिल बना देता है। पहले संयुक्त परिवारों में कई रिश्ते साथ होते थे – जिससे भावनात्मक सहारा बना रहता था। आज के एकल परिवारों में माता-पिता अक्सर अकेले रह जाते हैं। उनके पास बात करने वाला कोई नहीं होता, और जो कहना चाहते हैं, वह भी कह नहीं पाते।

फोन पर वे हंसते हैं –

“हाँ बेटा, हम बिल्कुल ठीक हैं…”

लेकिन फोन रखने के बाद वही सन्नाटा उन्हें फिर से घेर लेता है।

****

सबसे बड़ी विडंबना यही है कि यह दर्द अक्सर अनकहा रह जाता है। माता-पिता अपने बच्चों पर बोझ नहीं बनना चाहते, इसलिए अपनी भावनाओं को चुपचाप दिल में ही दबा लेते हैं।

यह कहना आसान है कि “समय बदल गया है, हमें भी बदलना चाहिए” – लेकिन भावनाएँ इतनी सरल नहीं होतीं। सालों की परवरिश, जुड़ाव और उम्मीदों को एक झटके में बदलना संभव नहीं है।

फिर भी, इस बदलते दौर में संतुलन ही समाधान है।

माता-पिता को यह समझना होगा कि बच्चों का आगे बढ़ना उनकी परवरिश की सफलता है, असफलता नहीं। वहीं, बच्चों को भी यह नहीं भूलना चाहिए कि उनके माता-पिता केवल जिम्मेदारी नहीं, बल्कि भावनाओं से भरे इंसान हैं – जिन्हें समय, संवाद और साथ की आवश्यकता होती है।

अंततः, यह टकराव परंपरा और आधुनिकता का नहीं, बल्कि समझ और संवेदना का है। अगर दोनों पीढ़ियाँ एक-दूसरे के नजरिए को समझने की कोशिश करें, तो यह दूरी कम हो सकती है।

क्योंकि घर की खामोशी को तोड़ने के लिए बड़ी आवाज़ नहीं,

बस थोड़ा समय… और सच्चा अपनापन ही काफी होता है।

और सच तो यह है – माता-पिता का दिल कभी खाली नहीं होता, वह हमेशा अपने बच्चों से भरा रहता है…

चाहे बच्चे पास हों या दूर।

© डॉ रीटा अरोड़ा

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ६३ ☆ कविता – राम और कृष्ण एक ही हैं… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय कविता – “राम और कृष्ण एक ही हैं“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ६३ ☆

✍ कविता – राम और कृष्ण एक ही हैं… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

राम नाम में श्याम बसे हैं,

श्याम में रघुनाथ।

मेरी दृष्टि में दोनों एक हैं,

दोनों मेरे साथ॥

 

कभी अयोध्या में राम बने वो,

कभी गोकुल के श्याम।

एक ने धनुष उठाया जग में,

एक ने बजाई बांसुरी मधुर नाम॥

 

रूप बदलकर आए जग में,

एक ही उनकी बात।

मेरी दृष्टि में दोनों एक हैं,

दोनों मेरे साथ॥

 

राम बने मर्यादा पुरुषोत्तम,

श्याम प्रेम अवतार।

एक ने रावण का संहार किया,

एक ने कंस संहार॥

 

धर्म की रक्षा करने वाले,

दोनों दीनानाथ।

मेरी दृष्टि में दोनों एक हैं,

दोनों मेरे साथ॥

 

सीता-राम की पावन महिमा,

राधे-श्याम का प्यार।

एक में त्याग और तपस्या,

एक में रस की धार॥

 

भक्तों के हित दोनों दौड़े,

पकड़ कर प्रेम का हाथ।

मेरी दृष्टि में दोनों एक हैं,

दोनों मेरे साथ॥

 

राम कहूँ या कृष्ण पुकारूँ,

दोनों सुनते पुकार।

नाम अलग पर ज्योति वही है,

एक ही पालनहार॥

 

सत्येंद्र मन हरि में रमे तो,

मिट जाएँ सब घात।

मेरी दृष्टि में दोनों एक हैं,

दोनों मेरे साथ॥

© डॉ सत्येंद्र सिंह

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९८९ ⇒ च्युइंगम ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “च्युइंगम ।)

?अभी अभी # ९८९ ⇒ आलेख – च्युइंगम ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

*CENTER FRESH*

आप खुशी खुशी कुछ भी चबा सकते हो,लेकिन क्या आपने कभी गम को चबाया है ! हमारे साहित्य के वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ फरमाते हैं ;

हम सब काल के दांतों तले

चबते चले जाते हैं

च्युइंगम की तरह

कच,कच कच

बड़ा कठोर सच …

और उधर सभी पीड़ाओं का संगीत से उपचार करने वालों का मानना है कि ;

जब दिल को सताये गम

तू छेड़ सखि सरगम

सा रे ग म पा …..

हमारे जगजीत सिंह बड़े भोले हैं। वे नहीं जानते आज की पीढ़ी को। जब भी किसी खूबसूरत युवा चेहरे को मुस्कुराता देख लेते हैं,बेचारे बड़ी मासूमियत से पूछ लेते हैं ;

तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो

क्या गम है, जिसको चबा रहे हो !

उन्हें कौन बतलाए। आज की पीढ़ी इतनी खुश है ,इतनी खुश है, कि कभी खुशी,कभी च्युंइगम। वह मस्ती में झूमते हुए सिर्फ किशोर के ही मस्ती भरे नगमे गाना चाहती है। गम छोड़ के मनाओ रंगरेली।

जिस तरह हाथी के दांत खाने के, और दिखाने के अलग होते हैं, ठीक उसी तरह गम भी दो तरह का होता है,खाने का और चिपकाने का। ठंड में अन्य सूखे मेवों के साथ गोंद के लड्डू बड़े स्वास्थ्य वर्धक होते हैं। नवजात शिशुओं की माता को भी कई औषधीय गुणों से युक्त,शक्तिवर्धक जापे के लड्डू खिलाए जाते हैं। बचपन में हमने भी चखे हैं। हमें तो च्युइंगम से बेहतर लगे। पसंद अपनी अपनी। ।

जुगाली के भी सबके अपने अपने तरीके होते हैं। वैसे तो मुंह चलने और जबान चलने में अंतर है,लेकिन कुछ लोग इस भ्रम में रहते हैं कि च्युइंगम से मुंह तो चलता रहता है,लेकिन जबान पर ताला लग जाता है। कुछ सयाने लोग इसे जबड़ों के व्यायाम की संज्ञा भी देते हैं। चोर,चोरी से जाए,लेकिन हेराफेरी से ना जाए। पान आप उसे खाने नहीं दो,यहां वहां थूकने नहीं दो। गुटखा हमारे स्वास्थ्य के लिए तो हानिकारक है ही,जो इनका विज्ञापन कर रहे हैं,हमारी नजर में, वे भी कम खतरनाक नहीं। खुद तो पैसा कमाओ और हमारी आदत बिगाड़ो,यह नहीं चलेगा। हम भले ही अपनी आदत नहीं सुधार पाएं,लेकिन ठीकरा तो आपके माथे पर ही फोड़ेंगे। बॉयकॉट पद्मश्री की त्रिमूर्ति।

च्युंइगम को देख,हमें अपना बचपन याद आ गया। सुबह जब टहलने जाते थे ,तो किसी भी नीम के पेड़ की नाजुक टहनियों को तोड़,उसकी दातून बना लेते थे और फिर,बस,उसे दांतों से चबाया करते थे। मसूड़ों और दांतों का व्यायाम होता था और नीम का कसैलापन शरीर में प्रवेश कर जाता था। करैला नीम चढ़े ना चढ़े, तब तो नीम ही हमारा हकीम भी था। ।

मुखशुद्धि से मन की भी शुद्धि होती है। तन और मन अगर स्वस्थ रहे सौंफ,इलायची और लौंग का सेवन बुरा नहीं। लेकिन सिर्फ खुशी के खातिर,ऐसा भी क्या किसी गम को चबाना, जो बाद में तकलीफदेह साबित हो।

आप ही आपके चिकित्सक भी हो और निःशुल्क परामर्शदाता भी। गम को चबाना,अथवा गम को गलत करना,दोनों ही गलत है। हमारे होठों पर तो आज सिर्फ तलत है। हमारे सारे गम दूर करती सरगम। हमारी प्यारी कानों के जरिए आत्मा में प्रवेश करती असली च्युइंगम। ।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # ११२ – रिश्ते जिंदा है क्या?… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – रिश्ते जिंदा है क्या?।)

☆ लघुकथा # ११२ – रिश्ते जिंदा है क्या? श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

अरे! देवर जी तुम कब आ गए आश्चर्य पूर्वक कमल जी ने कहा।

“अपनी भाभी भाई के घर में आने के लिए क्या मुझे कोई इजाजत लेनी पड़ेगी या कार्ड छपवाना पड़ेगा” नवीन बोला।

कमल जी ने कहा – “नहीं नहीं भैया मैं ऐसा नहीं बोल रही इतने दिनों तक आपने दर्शन नहीं दिया आज अचानक आप आए इसलिए मैंने ऐसा कहा।“

“भाभी भैया कहाँ है?” नवीन बोला।

“तुम्हारे भैया 13वीं का इंतजाम करने के लिए बाजार गए हैं” कमल जी ने कहा।

नवीन बोला- “तुम लोगों ने घर और खेत ले लिया है मेरे पास सिर्फ मेरा हिस्सा और दुकान है सब चीजों का बंटवारा तो हो जाना चाहिए।”

कमल जी ने कहा- “ठीक है देवर जी मैं भी यही चाहती हूँ लेकिन दुकान और घर का एक बहुत बड़ा हिस्सा तो आपके ही कब्जे में है जहाँ आप हमें जाने भी नहीं देते अभी पिताजी को गुजरे दो ही दिन हुए हैं। हम पर पहाड़ टूट पड़ा है और आप हमें आकर इस तरह बोल रहे हैं कम से कम 13 दिन तो रुक जाना था।”

नवीन बोला “भाभी रोने धोने का नाटक तो तुम बहुत अच्छा कर लेती हो गरीब बनाकर सबसे हमदर्दी लेकर पूरे समाज में हमारी बदनामी कर रही हो कि हमने सबसे ज्यादा हिस्सा ले लिया।”

रोते हुए कमला ने कहा – “अब हमारा तुम्हारा कैसा नाता चले जाओ अभी मैं तुमसे बात करने के मूड में नहीं हूँ, कुछ दिन बाद हम आराम शांति से बैठेंगे दीदी लोग को  बुला लेंगे।  दो बहने भी है तुम्हारी और फिर तय करेंगे कि किसी क्या मिलना चाहिए सारी पिताजी की विरासत में तुम्हारा ही हक  है।”

नवीन ने कहा- “ठीक है देखता हूँ, कैसे तुम सब हिस्सा लेते हो? नवीन गुस्से से बड़बड़ाता हुआ गया।”

कमल जी कहती है कि “हे भगवान इस दुनिया में क्या रिश्ते नाते जिंदा है? जाना सबको है छोड़कर लेकिन फिर भी लोग कैसे लड़ते हैं।”

 

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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सूचना/Information ☆ संपादकीय निवेदन ☆ श्री विश्वास देशपांडे – अभिनंदन ☆ सम्पादक मंडळ ई-अभिव्यक्ति (मराठी) ☆

सूचना/Information 

(साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समाचार)

? श्री विश्वास देशपांडे – अभिनंदन ?

💐 संपादकीय निवेदन 💐

आपल्या समूहातील ज्येष्ठ लेखक श्री. विश्वास देशपांडे यांनी लिहिलेल्या आनंदयात्री रवींद्रनाथ या पुस्तकाला नुकताच तितीक्षा इंटरनॅशनल, पुणे यांच्या तर्फे दिला जाणारा – – 

उत्कृष्ट ग्रंथ पुरस्कार” हा मानाचा पुरस्कार प्राप्त झाला आहे.

आपल्या सर्वांतर्फे श्री विश्वास देशपांडे यांचे मनःपूर्वक खूप अभिनंदन, आणि त्यांच्या यापुढील अशाच दैदीप्यमान साहित्यिक वाटचालीसाठी असंख्य हार्दिक शुभेच्छा.

आजच्या अंकातील ‘ पुस्तकावर बोलू काही ‘ या सदरात करून घेऊ.. या पुरस्कारप्राप्त पुस्तकाचा थोडक्यात परिचय.

संपादक मंडळ

ई-अभिव्यक्ती (मराठी)

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – मराठी कविता ☆ कवितेच्या प्रदेशात # ३१३ ☆ आहे तर आहे… ☆ सुश्री प्रभा सोनवणे ☆

सुश्री प्रभा सोनवणे

? कवितेच्या प्रदेशात # ३१३ ?

☆ आहे तर आहे ☆ सुश्री प्रभा सोनवणे ☆

तो नाही माझा तरी पण

आकर्षण… आहे तर आहे

ही प्रीती कसली,

खुळा मोहाचा क्षण …आहे तर आहे

गोपाळा आहेस

 वेणूच्यानादा मध्ये बुडलेला

मातीची नांगरण करण्या

संकर्षण… आहे तर आहे

येथे नाही राहिले–

कोणावाचूनी कोणाचे रे

आयुष्या, नशिबी अटळशी

ही वणवण.. आहे तर आहे

© प्रभा सोनवणे

संपर्क – “सोनवणे हाऊस”, ३४८ सोमवार

पेठ, पंधरा ऑगस्ट चौक, विश्वेश्वर बँकेसमोर, पुणे 411011

मोबाईल-९२७०७२९५०३,  email- sonawane.prabha@gmail.com

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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