हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ कविता ☆ चरित्रहीन ☆ श्री ओमप्रकाश पाण्डेय ☆

श्री ओमप्रकाश पाण्डेय

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री ओमप्रकाश पाण्डेय जी भारतीय स्टेट बैंक से 2015 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्त.  सन 2018 से कविताओं और लघु कथाओं का नियमित रूप से लेखन. दो काव्य संग्रह “ऑंचल” और “किलकारियाँ (बालगीत संग्रह)” तथा दो कथा संग्रह “चूड़ियाँ” और “अनपढ़” प्रकाशित. लगभग तीन सौ से अधिक कहानियाँ व लघु कथाएं रचित जिनमें “मार्निंग वाक” (दस कहानियाँ), “आधुनिक विक्रम और वेताल की कथा” (दस कहानियाँ), दीदी, प्रश्न या आमंत्रण, सोंकविता , विश्वास आदि चर्चित रहीं हैं. आपके द्वारा सात सौ से अधिक कविताएँ रचित जो कई साहित्यक मंचों पर प्रस्तुत की गईं हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय कथा “चरित्रहीन“.)

 ☆ कथा कहानी ☆ चरित्रहीन ☆ श्री ओमप्रकाश पाण्डेय ☆

क्या जमाना आ गया! घोर कलयुग ! इसी को कहते हैं कि कलयुग अपने चरम सीमा पर चल रहा है ! क्या हो गया दादू ? अचानक आपको कलयुग का  याद कहाँ से आने लगा. बबलू ने दादू से पूछा. दादू यानी चौधरी रमाशंकर जी. अस्सी साल की आयु पार कर चुके हैं, वास्तविक आयु कितना है, कोई नहीं जानता, लेकिन बच्चे से लेकर बूढ़े तक, सब लोग इनको दादू ही कहते हैं और आप का बड़ा सम्मान करते हैं.

हाँ तो बात हो रहा था, कलयुग का, दादू का परिचय देने में मैं रह गया और बबलू का प्रश्न पीछे  छूट गया. बबलू ने फिर पूछा कि दादू क्या हो गया कि आप को कलयुग याद आ गया. चौधरी जी ने एक गहरा  सांस लिया और बोले कि क्या बताऊँ बेटा, अब कहने को रह ही क्या गया है. बबलू बोला नहीं दादू आपको बताना तो पड़ेगा ही. चौधरी बोले बेटा देखो पंडित रघुराज जी के परिवार के किसी बहु बेटियों  को कभी घर से बाहर अकेले निकलते किसी ने देखा है क्या ? बबलू थोड़ी देर चुप रहा फिर बोला कभी ध्यान तो नहीं दिया है, लेकिन देखा भी नहीं है.

अभी ये बातें हो ही रहा था कि रमापति बाबू भी आ गए. उन्होंने दादू का प्रश्न सुना तो रुक गये, बोले लेकिन आप यह प्रश्न पूछ ही क्यों रहें हैं, ऐसा क्या कर दिया उनके परिवार के महिलाओं ने. दादू बोले कि चिंता का विषय तो है ही , देखिये पडिंत रघुराज जी के देहांत के बाद उनकी बहु और बेटियों  को जब देखिये वे घर से बाहर निकल जाती हैं और देर रात को वापस आतीं हैं. पता नहीं कहाँ जातीं हैं और क्या- क्या करतीं हैं. रमापति बाबू ने कहा कि कहीं जाती होंगी, कोई काम रहता होगा. लेकिन जब दादू ने अपनी बात पुनः दोहरायी तो रमापति बाबू  उनके कहने का अर्थ कुछ-कुछ समझने लगे.

रमापति बाबू ने कहा कि दादू आप आधी बात कह रहे हैं. पंडित रघुराज जी के देहांत के उपरांत, उनका जवान बेटा, आनन्द का  कोविड से देहांत हो गया. परिवार में आनन्द ही एक मात्र कमाने वाला था. सरकार ने कुछ सहायता किया , लेकिन उससे कितना दिन काम चलता ! तो परिवार आर्थिक रूप से बहुत ही कठिन समय से गुजर रहा है. मैं आप से एक बात पूछता हूँ कि क्या हममें से कोई एक बार भी जा कर उनके परिवार से उनकी आर्थिक कठिनाईयों के बारे में पूछा, किसी ने कोई सहायता किया. आज महंगाई के जमाने में हर व्यक्ति किसी प्रकार से अपने परिवार का ही खर्चा चला पा रहा है, तो वह दूसरे की सहायता क्या करेगा. मैं आप ही से पूछता हूँ , आप तो पंडित जी के बहुत ही घनिष्ठ परिवारिक मित्र रहे हैं, आप ने क्या किया. दूसरी बात इस प्रकार से रोज- रोज दूसरों से सहायता की प्रतिक्षा करने की जगह, अगर उनके परिवार के महिलाओं ने ख़ुद ही पैसा कमाने का प्रयास किया है और अपने पैरों पर खड़े होने का संकल्प लिया  है, तो हमें उनके इस बात की प्रशंसा करनी चाहिए न कि उनके चरित्र पर किसी प्रकार का संदेह करना. वे पढ़ी लिखी महिलायें हैं, हमें उनके चरित्र पर अनावश्यक संदेह या प्रश्न नहीं करना चाहिए. आखिर हम अपनी लड़कियों को क्यों पढ़ाते हैं?

रमापति बाबू ने फिर आगे पूछा कि आप ने यह धारणा क्यों बना रखा है कि जो महिलाऐं अकेले घर से बाहर निकलतीं हैं, उनका चरित्र ठीक नहीं होता या उनके चरित्र पर संदेह किया जा सकता है. चरित्रवान होना या चरित्रहीन होना, एक बिल्कुल अलग विषय है. आखिर कब तक हम अपनी घर की माँ, बहन व बेटियों को अपंग बना कर रखेंगे. वास्तव में हम सबको यह प्रयास करना चाहिए कि हमारे घर की महिलाऐं, चाहे वह कोई भी हों, वे हर तरह से सशक्त होनी ही चाहिए. नौकरी करना या न करना, यह निर्णय उन  पर छोड़ दें, लेकिन अगर  वह नौकरी करना चाहती है, तो मना न करें. परन्तु अगर  किसी कारणवश वह नौकरी  नहीं करना चाहती है, तो उसे नौकरी करने के लिए बाध्य भी न करें. लेकिन वे घर से बाहर अकेले जातीं हैं, इस कारण से उनके चरित्र पर संदेह करना बहुत ही  गलत है.

दादू के चेहरे के भाव से ऐसा लग रहा था कि वे रमापति बाबू के बातों से सहमत नहीं थे. उन्हें पंडित रघुराज जी के परिवार के बारे में चिंता सता रहा था. बबलू रमापति बाबू के बात से पूरी तरह से सहमत तो था,लेकिन वह पंडित रघुराज जी के परिवार के बारे में ज्यादा नहीं जानता था, अत: कुछ बोलना उसे उचित नहीं लगा. खैर उस समय बात वहीं पर समाप्त हो गया और सब लोग अपने अपने घर चले गए.

लेकिन दादू के मन में संदेह तो बैठ ही गया था और यह संदेह उन्हें परेशान किये था. एक दिन हिम्मत कर के दादू पंडित रघुराज जी के घर चले ही गये. उनका आना जाना तो पहले से ही था. दादू पंडित रघुराज जी के पुराने मित्र थे और परिवार में सब लोग इनको जानते थे. घंटी बजाया,  थोड़ी देर बाद पंडित रघुराज जी की छोटी बेटी पुष्पा ने दरवाजा  खोला. दादू को देखते ही उसने दादू का चरण स्पर्श किया और बैठने के लिए कहा. पुष्पा ने आवाज लगाई कि मम्मी देखो दादू आये हैं. थोड़ी देर में पुष्पा की माँ मालती आ गयी और  दादू से बोली अरे भाई साहब आज इधर कैसे, आप तो लगता है कि मेरे घर का रास्ता ही भूल गए. अब दादू बोलते क्या, पंडित रघुराज जी के समय लगभग हर सप्ताह आना होता था, लेकिन कुछ तो कारण बताना ही था.  बोले अरे बहन जी अब मैं भी तो बूढ़ा हो गया हूँ, फिर कोविड ने और भी निकलना बंद कर दिया, इसीलिए नहीं आ पाया. मालती बोली बात तो आप सही कह रहे हैं.  वैसे बाहर निकलना तो मेरा भी लगभग बन्द ही हो गया है, वैसे आप के परिवार में सब लोग कैसे हैं. आप का छोटा पौत्र तो अब बड़ा हो गया होगा. मुझे भी बहुत दिन हो गया आप के घर गए हुए.

दादू बोले घर पर सब लोग ठीक हैं, छोटका तो अब प्ले स्कूल जाता है. थोड़ी देर बैठने के बाद दादू ने कहा चलता हूँ. मालती बोली नहीं भाई साहब इतने दिनों बाद आये हैं, बिना चाय पिये आप कैसे जा सकते हैं. पुष्पा बेटी दादू के लिए चाय बनाओ, मैं तब तक पकौड़ियां छानती हूँ और भाई साहब तब तक आप अखबार पढ़िये.

खैर दादू बैठ गए, अखबार पढ़ने लगे, लेकिन मन में शंका थी कि घर का खर्चा कैसे चलता होगा. इतने में एक लड़का आया, उसने घंटी बजाया, पुष्पा ने दरवाजा खोला और उससे बोली, रुको. पुष्पा घर के अन्दर गयी और दो टिफिन कैरियर ला कर उसे दे दिया. इसी तरह दो तीन लोग और भी  आये टिफिन कैरियर ले कर चले गए. दादू कुछ- कुछ समझ रहे थे. उन्होंने पुष्पा से पूछा बेटी तुम किस कक्षा में पढ़ती हो. पुष्पा बोली दादू इंटर के बाद पढ़ाई छोड़ दिया और आज कल एक दूकान पर काम करतीं हूँ. इतने में मालती एक बड़े प्लेट में पकौड़ियां और चटनी लेकर आ गयी और बोली भाई साहब लीजिए.

दादू के चाय पीने के दौरान मालती को कई फोन आये, मालती हां , हूँ में जबाब दे कर फोन बन्द कर देती. दादू यह सब बड़े ध्यान से देख रहे थे. दादू के चेहरे का भाव देख कर मालती कुछ समझ गयी. बोली भाई साहब आजकल मैं घर में ही किचन चलाती हूँ और ये जो लोग अकेले रहते हैं , उन्हें खाना बना कर देतीं  हूँ. आजकल वे लोग जो नौकरी या पढ़ाई करते हैं, या पति पत्नी दोनों नौकरी करते हैं, वे खाना तो बना नहीं सकते, तो ऐसे लोगों को मैं खाना देतीं हूँ. एक बाई भी है, वह भी सहायता करती है. अब क्या किया जाय भाई साहब, पेट  तो भरना ही है. बेटे के अचानक मौत के बाद तो कुछ दिन बुद्धि ही काम नहीं कर रही थी कि कुछ सोच सकुं. फिर धीरे- धीरे अपने मन को समझाया कि जिन्दा तो रहना ही है! दोनों बेटियों ने पैसे के अभाव में पढ़ाई छोड़ दिया और नौकरी करने लगीं. बड़ी वाली तो एक प्राइवेट स्कूल में पढा़ती है और यह पुष्पा एक दूकान पर सेल्सगर्ल का काम करती है. किसी प्रकार परिवार का खर्चा चल रहा है.

दादू को यह सब सुन कर काटो तो खून नहीं. मन आत्मग्लानि से भर गया. उन्हें ऐसा लगने लगा कि कब जमीन फट जाये और वे उसमें समा जाये. मन तुरन्त उठ कर कमरे से निकलने को कहने लगा. किसी प्रकार से जल्दी- जल्दी चाय पी कर उठ गए और मालती को नमस्ते करते हुए कहा कि अब मैं चलूंगा. फिर बोले कभी समय मिले तो मेरे घर आओ. मालती बोली रविवार को किचन बंद रखतीं हूँ, जरूर आऊंगी. आप भी कभी बहन जी को लेकर आईये. पुराने लोग आतें हैं, तो अच्छा लगता है.

 

© श्री ओमप्रकाश पाण्डेय 

29.04.2026

संपर्क – 1901 साई आराध्य, प्लाट नंबर- 18, सेक्टर- 35F, खारघर, नवी मुंबई – 410210

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संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – चुप्पियाँ – (१२) ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – चुप्पियाँ – (१२) ? ?

चुप्पी

निरंतर सिरजती है विचार

‘सदा दूधो नहाओ, पूतो फलो’

का आशीर्वाद

केवल चुप्पी को ही

फलीभूत हुआ है!

?

© संजय भारद्वाज  

(2.9.2018, 8:11 बजे)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ १७ मई से ज्येष्ठ अधिकमास आरंभ हुआ है। इसी दिन से नारायण साधना आरंभ होगी।  इसका मंत्र है – ॐ नारायणाय नम:। 🕉️

💥 इसके साथ मौन साधना एवं आत्म परिष्कार भी चलेंगे। अपनी हर निर्बलता पर विजय पाने का साधन है आत्म परिष्कार। इसका नियमित अभ्यास रखे💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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English Literature – Poetry ☆ Freed You… ☆ Captain Pravin Raghuvanshi, NM ☆

Captain Pravin Raghuvanshi, NM

(Captain Pravin Raghuvanshi —an ex Naval Officer, possesses a multifaceted personality. He served as a Senior Advisor in prestigious Supercomputer organisation C-DAC, Pune. He was involved in various Artificial Intelligence and High-Performance Computing projects of national and international repute. He has got a long experience in the field of ‘Natural Language Processing’, especially, in the domain of Machine Translation. He has taken the mantle of translating the timeless beauties of Indian literature upon himself so that it reaches across the globe. He has also undertaken translation work for Shri Narendra Modi, the Hon’ble Prime Minister of India, which was highly appreciated by him. He is also a member of ‘Bombay Film Writer Association’.

We present Capt. Pravin Raghuvanshi ji’s amazing poem “~ Freed You ~.  We extend our heartiest thanks to the learned author Captain Pravin Raghuvanshi Ji (who is very well conversant with Hindi, Sanskrit, English and Urdu languages) and his artwork.) 

? ~ Freed You… ??

☆ 

Yes, you may leave

Fly…

I’ve freed you forever

Little did you know

when the light that once illumined you

vanished into the sombre dark

Nor did I realize

when the night itself fell asleep

thinking of you

And here I am…

Ending where I began

With a smile

I loved you enough

to let you be you,

unconditionally

We were one sky once

Now,

two stars

poles apart

But go…

Scale that sky

For the sky is not the end

It is only the beginning

And my heart —

bigger than

the endless sky

~Pravin Raghuvanshi

 © Captain Pravin Raghuvanshi, NM

Pune

≈ Founder Editor – Shri Hemant Bawankar/Editor (English) – Captain Pravin Raghuvanshi, NM ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १५३ ☆ गिला शिकवा नहीं करते… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “गिला शिकवा नहीं करते“)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १५३ ☆

✍ गिला शिकवा नहीं करते… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे 

अभी हिम्मत नहीं हारी हमारी

फ़तह की अब रही बारी हमारी

 *

न होना रार है माशूक़ से फिर

ख़ता बतलाइये सारी हमारी

 *

मुसीबत कोई आये बे-असर है

अगर रहती है तैयारी हमारी

 *

तू नामुमकिन तभी बतला रहा है

अभी देखी न दमदारी हमारी

 *

अमानत दोसतों की जान बोला

परखने आ गए यारी हमारी

 *

गिला शिकवा नहीं करते वो हरगिज़

समझते है जो लाचारी हमारी

 *

तुम्हारी हरकतों को रोक तो दूँ

खड़ी है बीच बेज़ारी हमारी

 *

सिखाया इल्म है उस्ताद का ये

ग़ज़ल में कब कलाकारी हमारी

 *

न रंभा मेनका के है ये वश का

अरुण जो तोड़ दें तारी हमारी

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ हेमंत साहित्य # ५७ – इतना बेबस भी न हो… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना  – इतना बेबस भी न हो।)

☆ हेमंत साहित्य # ५७ ☆

✍ इतना बेबस भी न हो… ☆ श्री हेमंत तारे  

कर लेते थे दीदार बन्द आंखों से कभी

अब वो बीनाई न रही, ये उम्र का सितम होगा

*

फिज़ा में तहलील महक का इशारा है

तू परीशाँ न हो, वो यहीं कहीं, आस-पास होगा

*

सुना है के वो घिरा रहता है रकीबों से

तू गर वफ़ादार है, तो ईश्क में क़ामियाब होगा

*

लाजिमी है के कोई राज पोशिदा ना रहे

किया है ईश्क, तो ऐतिमाद भी  रखना होगा

*

मलाल न कर ये वक्त भी गुजर जायेगा

चन्द लम्हों कि है बात, अब शम्स जलवागार होगा

*

इतना बेबस भी न हो, कुछ कदम और चल,

यकीन कर, अगले ख़म पर वाके मयकदा खुला होगा

*

तू खुशहाल है “हेमंत”, ये महज इत्तेफ़ाक नही

बहुत किया है धूप का सफ़र, ये उसका असर होगा

बीनाई = आंखों की रोशनी, फिज़ा = वातावरण , तहलील = घुली हुई, रकीब = मुहब्बत में प्रतिद्वंदी, पोशिदा = छिपा हुआ, शम्स = सूरज, ख़म = मोड, वाके = स्थित, ऐतिमाद = भरोसा

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ६६ ☆ लघुकथा – भरोसा… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – “भरोसा“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ६६ ☆

✍ लघुकथा – भरोसा… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

शंकर दयाल जी के रिटायर होने में दो साल बाकी रह गए हैं। उनका बड़ा बेटा राम रतन अभी बारहवीं क्लास में है। दसवीं में अच्छे अंक लाने पर भी बारहवीं में बड़ी मुश्किल से एडमिशन हुआ।

बारहवीं में अच्छे अंक लाने के लिए उसने बहुत मेहनत की और बिना कोचिंग क्लास के पचानवे प्रतिशत अंक लेकर आया। उसके पिता बहुत खुश हुए। साइंस बायोलॉजी में से उसने साइंस और मैथ्स लिया ताकि वह तकनीकी क्षेत्र में यानी इंजीनियरिंग क्षेत्र में जा सके, परंतु इंजीनियरिंग में एडमिशन से पहले नीट की परीक्षा पास करनी होती है। वह नीट की परीक्षा में शामिल हुआ, परीक्षा में अच्छे अंक लाने के लिए उसने बहुत मेहनत की। उसे पूरी उम्मीद थी की अच्छे अंकों से में पास हो जाएगा। लेकिन रिजल्ट आने से पहले पता चला की नीट का पेपर लीक हो गया और परीक्षा फल रोक दिया गया। यह देख कर उसका दिल बैठ गया। शंकर दयाल को भी चक्कर आने लगे कि इतना पैसा और मेहनत और नतीजा कुछ नहीं। भविष्य अंधकारमय लग रहा है।

ऐसी स्थिति में वह क्या करें यह समझ नहीं आ रहा। शंकर दयाल भी बहुत दुखी हुए कि उनके बेटे ने इतनी मेहनत की लेकिन वह किसी काम नहीं आई। व्यवसाय करने के लिए उनके पास इतने पैसे नहीं है कि वह कोई दुकान खोल सके या कोई अन्य व्यवसाय शुरू कर सके। उनकी समझ में नहीं आ रहा है। बड़े बेटे की इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए उन्होंने बेटी का विवाह टाल दिया। छोटा बेटा जो दसवीं में है उसके लिए क्या करें आगे पढ़ाई किस तरह करें। इसी सोच में डूबे थे कि उनकी पत्नी आई कहा चलो खाना खा लो। ईश्वर सब ठीक करेंगे उनका ही भरोसा है। जो सबके साथ होगा वही हमारे साथ होगा।

© डॉ सत्येंद्र सिंह

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १००८ ⇒ साहब बीवी और श्वान ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “साहब बीवी और श्वान।)

?अभी अभी # १००८ ⇒ आलेख – साहब बीवी और श्वान ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

ताश के बावन पत्तों में गुलाम बेगम और बादशाह के अलावा एक जोकर भी होता है जो खेल के अलावा सर्कस में भी अपना महत्व रखता है।

आपने विमल मित्र के उपन्यास पर आधारित, और मीनाकुमारी और गुरुदत्त अभिनीत फिल्म साहब बीवी और गुलाम भी देखी ही होगी। साहब अंग्रेज ने जब कलकत्ते से व्यापार के बहाने हमारे देश में प्रवेश किया था तब वे अपनी मेम साथ में लाए थे। उनकी मेम भी मेम साहब ही कहलाती थी। देश गुलामी से तो आजाद हो गया, लेकिन साहब और मेम साहब हमारी नौकरशाही व्यवस्था में रच बस गए।

साहब का एक दूसरा नाम नौकरशाह भी होता है। नौकरशाह, एक ऐसा साहब होता है, जिसका बिना नौकर के काम नहीं चलता। आज की लोकतांत्रिक व्यवस्था में आप किसी से गुलामी तो नहीं करवा सकते लेकिन अगर कोई मानसिक रूप से गुलाम है तो उसका कोई इलाज नहीं।।

हर व्यक्ति आजकल अपने अधिकारों और दायित्व के प्रति सजग है। गए जमाने नौकरों से बेगार करवाने के। साहब के रिटायर होते ही नौकरशाही का ताना बाना इस तरह बिखर जाता है मानो किसी ने मधुमक्खी के छत्ते को छेड़ दिया हो। कब तक वाहन, बंगले और ड्राइवर की सुविधा रहेगी। कभी तो बंगला खाली करना पड़ेगा। बेटी बेटे अच्छा हुआ, समय रहते विदेश सेटल हो गए। आजकल तो साहबों की औलादें भी बिगड़ने लगी हैं।

जिस तरह डूबते को तिनके का सहारा होता है, एक सेवानिवृत्त अफसर दंपति को एक अदद श्वान का सहारा होता है। वह बेचारा साहब का आदेश भी सुन लेता है और डांट खाने पर भी पूछ हिलाता रहता है।

साहब का दिल ही जानता है एक मंत्री के आगे उनकी क्या हालत हो जाती थी। आज उन्हें अपने श्वान से सहानुभूति है। एक सेवामुक्त साहब और मेम साहब का अगर कोई अपना है,  तो बस यही एक बेजुबान श्वान।।

आज महानगरों के जंगल में ऐसे कई साहब बीवी हैं जिनके बुढ़ापे और अकेलेपन का सहारा सिर्फ एक श्वान है। बुढ़ापे की लाठी आजकल औलाद नहीं,  एक वॉकिंग स्टिक ही होती है। एक जानवर वैसे भी इंसान से ज्यादा वफादार होता है। कानून भी आजकल यही कहता है। अगर घर में कोई नौकर रखो तो सावधानी के लिए पहले नजदीक के थाने में उसकी पूरी जानकारी दो।

युवा पीढ़ी हो अथवा कोई वरिष्ठ नागरिक, हर परिवार में कुत्ता पालना एक जरूरत है अथवा फैशन, यह कहना इतना आसान नहीं। हमारी लुप्त होती मानवीय संवेदनाओं की ओर यह स्पष्ट संकेत है। क्या हम इतने आत्म केंद्रित हो गए हैं कि केवल एक मूक प्राणी से ही हमारा संवाद संभव है।

स्वार्थ, राजनीति, राग द्वेष और एकाकीपन भले ही इसके लिए जिम्मेदार हो, लेकिन आर्थिक आधार कतई नहीं। लोग भले ही किसी कुत्ते को मुंह नहीं लगाएं, लेकिन रोज सुबह आगे कुत्ता और पीछे उसकी डोर थामे, उन्हें आसानी से घूमते देखा जा सकता है। एक और बुकर पुरस्कार साहब बीवी और श्वान। अनुवाद जारी है।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # ११५ – जीवन की छाँव… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – जीवन की छाँव।)

☆ लघुकथा # ११५ – जीवन की छाँव श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

गर्मियों के दिन के 12:00 बजे थे  बालकनी में झूले में बैठकर रामचंद्र जी अखबार पढ़ रहे।

और अपने गांव को और पुराने दिनों को याद कर रहे थे।

तभी उनकी पत्नी कमला ने आवाज दिया- “अंदर आ जाओ दोपहर में बाहर क्यों बैठे हो  लू चल रही है?”

“कच्चे आम का पन्ना बनाया है अंदर आओ बैठकर पी लो यह गाँव नहीं है जो आम के पेड़ के नीचे बैठे रहते थे?”

रामचंद्र जी ने कहा कमल-” तुम्हें तो पता है कूलर, ए.सी सूट नहीं करता।”

रामचंद्र जी ने गंभीर स्वर में कहा- “कमला इधर आओ मेरे पास बैठो चलो हम गाँव चलते हैं कुछ दिनों के लिए।”

कमला ने कहा- “अब गाँव में क्या रखा है घर की साफ सफाई करनी पड़ेगी बेटे बहू के साथ यही जब रहते हैं हम ठंड में चलेंगे। “

रामचंद्र जी ने कहा- “देखो कमला तुम बातें मत बनाओ तुम्हें नहीं जाना तो मैं जा रहा हूँ यहाँ तो पेड़ फल हुए आम देखने को तरस जा रहा हूँ।”

वैसे तुम्हारी बातों से मुझे शीतल छाया मिलती है लेकिन यहाँ पर घूमने फिरने भी कहाँ  जाऊॅं पार्क में जाओ तो इतनी भीड़ है।

कमला ने मुस्कुराते हुए कहा-

“क्या तुम्हें गाँव में भी छाँव मिलेगी वहां भी तो विकास हो रहा है।”

रामचंद्र जी ने कहा- इस नव विकास के ऑंधी में जीवन की छाँव खोती जा रही है, उनकी ऑंखों से ऑंसू बहने लगते हैं।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – मराठी कविता ☆ कवितेच्या प्रदेशात # ३१६ ☆ गजल… ☆ प्रभा सोनवणे ☆

प्रभा सोनवणे

? कवितेच्या प्रदेशात # ३१६ ?

☆ गजल ☆ प्रभा सोनवणे ☆

सोसला  दुष्काळ हा, आता तरी,

पावसाच्या बरसु दे झरझर सरी

*

जातिधर्माचे कशाला दाखले

वाढते आहे विषमतेची दरी

*

तू किती नाकारल्या काळ्या मुली

भांडते रात्रंदिनी गोरी परी

*

कष्ट करणे टाळले वरचेवरी

देत आहे कोण भाजी भाकरी ?

*

ना इथे ना राहते आहे तिथे

भेटला मज विश्वव्यापी तो हरी

© प्रभा सोनवणे

संपर्क – “सोनवणे हाऊस”, ३४८ सोमवार

पेठ, पंधरा ऑगस्ट चौक, विश्वेश्वर बँकेसमोर, पुणे 411011

मोबाईल-९२७०७२९५०३,  email- sonawane.prabha@gmail.com

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) –  उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित / मंजुषा मुळे/ गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – कवितेच्या उत्सव ☆ घे भरारी… ☆ जयश्री पाटील ☆

जयश्री पाटील

 

? कवितेच्या उत्सव ?

☆ घे भरारी… ☆  जयश्री पाटील ☆

सांगतोना ग वारसा आपण सावित्रीचा

मग का विसर पडतो तुला तिच्या कर्तुत्वाचा

*

शिकलोना ग आपण विज्ञान शाळेमध्ये

नाही का ग घेतले ज्ञान तर्कशास्त्रामध्ये

*

सिक्सथ सेन्स असतो म्हणतात ना ग स्त्रीयांना

कुठे हरवतो तो भोंदू बाबांच्या पाया पडताना

*

सत्ता अधिकार पैसा असते का मर्यादा त्याला

स्वत्व गमावून हे सारे हवे आहे का ग तुला

*

शक्तीचा जागर करतो ना ग आपण नवरात्रात

दाखव सामर्थ्य दृष्टांशी खंबीर होऊन लढण्यात

*

मती नको ग तुझी ठेवू कुठे तू गहाण

कर जरासा नेहमी एक विचार महान

*

मुलगा हवा म्हणून नको नादी कोणाच्या लागू

दबावाला कोणाच्याही तू नको कधी बळी पडू

*

दत्तक पुत्र घेऊनी लढली लक्ष्मी रणांगणी

सावित्री ही झिजली समाजसेवा करूनी

*

छत्रपती शाहू सयाजी होते दत्तक पुत्र

रयतेसाठी त्यांनीच धरले सुधारणेचे छत्र

*

सायासाने मिळाला आहे स्त्रियांना मोकळा श्वास

घे भरारी सोडून दे तू तो अंधश्रद्धेचा बंदीवास

 

© जयश्री पाटील

विजयनगर.सांगली.

मो.नं.:-8275592044

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित / मंजुषा मुळे/ गौरी गाडेकर≈

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