मराठी साहित्य – चित्रकाव्य ☆ पोपटाची चोच… ☆ रेणुका धनंजय मार्डीकर ☆

रेणुका धनंजय मार्डीकर

?️?  चित्रकाव्य  ?️?

? पोपटाची चोच… ? रेणुका धनंजय मार्डीकर ☆

भावगीत – (वर्णसंख्या १२ यति ६ व्या अक्षरावर)

☆

पोपटाची चोच वेलीत साजरी 

पानात कलिका दिसली लाजरी ||ध्रु||

*

 उन्हाळा फुलाला मानवतो फार 

 वसंत ऋतूत असतो बहार

 स्वागत गुच्छात कोयरी कोयरी 

 पानात कलिका दिसली लाजरी ||१||

*

 कुसुंबी तांबूस पिवळी पाकळी 

 बरगंडी रंगी एक एक कळी

 हिरव्या पानात सोनेरी शेंदरी 

 पानात कलिका दिसली लाजरी ||२||

*

 लटके झुंबर वेलींचे सुंदर 

 पोपट केळी ही त्यात मनोहर

 पाचूच्या कोंदणी लावण्य सुंदरी

 पानात कलिका दिसली लाजरी ||३||

*

 पोपटाचे फूल मनात भरले

 कवन त्यावर साजरे स्मरले 

 शब्दांचे मनोरे त्यात भरजरी

 पानात कलिका दिसली लाजरी ||४||

☆

© रेणुका धनंजय मार्डीकर

औसा.

मोबा. नं.  ८८५५९१७९१८

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कादम्बरी # १६६ – बुन्देली कविता – ”उनखें सत्ता, शासन चइये ” ☆ आचार्य भगवत दुबे ☆

आचार्य भगवत दुबे

(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे। 

आज प्रस्तुत हैं बुन्देली कविता – “उनखें सत्ता, शासन चइये “।)

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १६६ ☆

☆  बुन्देली कविता – “उनखें सत्ता, शासन चइये “ ☆ आचार्य भगवत दुबे ✍

☆

उनखें सत्ता, शासन चइये 

हमखें उन्ना, राशन चइये 

 *

हमें चाउने खरी मजूरी 

लबरे हमें न भाषन चइये 

 *

किसना कौ मन जिनमें रीझत 

गौयें, ग्वालें, ग्वालन चइये 

 *

जौ फिसले ईमान हमाओ 

धन की काइ न फिसलन चइये 

 *

छप्पन भोग न चाहे कान्हा 

प्रेम भरो दधि-माखन चइये 

 *

हम दाइज कौ पाप न लादें 

हमखौं बस कन्या धन चइये 

 *

तीन लोक से न्यारो अपनो 

‘भगवत’ बो बिंद्राबन चइये

☆

© आचार्य भगवत दुबे

82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा-कहानी ☆ हिस्से का श्राद्ध ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆

डॉ. रीटा अरोड़ा

(डॉ. रीटा अरोड़ा जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर। समाचार पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। आपका लेख-संग्रह ‘बांस का विवेक’ हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में केडीपी (KDP) पर ‘अकीरा अराता’ (AKIRA ARATA) उपनाम से प्रकाशित है। आप जनवादी लेखक संघ, हरियाणा की सक्रिय सदस्य हैं।)

☆ लघुकथा ☆ हिस्से का श्राद्ध ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆

☆

“भैया, पंडित जी आ गए हैं। पिताजी का श्राद्ध शुरू करवा दें?” छोटे भाई ने फोन पर पूछा।

 “हाँ, तुम सब संभाल लो। मैं पैसे भेज देता हूँ।”

 “भैया, पैसे तो हर साल भेज देते हो। इस बार सोचा था, दोनों भाई साथ बैठकर पिताजी को याद करेंगे।”

 “अरे, तुम तो वहीं रहते थे उनके पास। मैंने भी अपनी जिम्मेदारियाँ निभाई हैं।”

 “बिल्कुल भैया। लेकिन आखिरी दिनों में पिताजी तुम्हारा इंतज़ार करते रहे। कहते थे, बड़ा बेटा आएगा तो साथ खाना खाएँगे।”

 उधर कुछ पल खामोशी रही।

 “तुम्हें शिकायत है कि मैं नहीं आया?”

 “नहीं भैया, शिकायत नहीं। बस एक बात समझ नहीं आती-आज पिताजी के नाम पर हम ब्राह्मण भोज करा रहे हैं, दान कर रहे हैं, लेकिन उनके जीते-जी उनके मन की इच्छा क्यों नहीं समझ पाए?”

 “अब पुरानी बातें करने से क्या फायदा?”

 “सही कह रहे हो। पिताजी भी यही कहते थे – बच्चों के बीच मनमुटाव न रहे। शायद इसीलिए अपनी बीमारी भी छिपाते रहे।”

 फोन कट गया।

 कुछ देर बाद बड़े भाई का संदेश आया-

 “कल घर आ रहा हूँ। इस बार श्राद्ध की बची हुई रस्में नहीं, तुम्हारे साथ बैठकर पिताजी की बातें भी करेंगे।”

 छोटे भाई ने संदेश पढ़ा और पिता की तस्वीर के सामने बैठ गया।

 श्राद्ध की तिथि हर साल लौटती है, लेकिन क्या रिश्तों को जोड़ने का अवसर भी हम हर साल टालते रहेंगे?

☆

© डॉ रीटा अरोड़ा

सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर करनाल

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – सन्नाटे… ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – सन्नाटे… ?  श्री संजय भारद्वाज ?

अक्सर पढ़ते हो गीत मेरे,

कभी मेरे सन्नाटे भी सुना करो,

सन्नाटे ज़्यादा बड़े, ज्यादा गहरे होते हैं,

क्योंकि इसके मायने तुमने खुद गढ़े होते हैं।

?

© संजय भारद्वाज   

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ दि. 11 अक्टूबर 2026 से नवरात्रि साधना आरम्भ होगी। 🕉️

💥

इस साधना के लिए देवीमंत्र इस प्रकार होगा-

या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता,
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।

💥

💥 इसके साथ ही महिषासुरमर्दिनी स्तोत्रम् का एक पाठ नियमित रूप से करने का प्रयास करें। तथापि जो लोग किन्हीं कारणों से महिषासुरमर्दिनी स्तोत्रम् न कर पाएँ, वे कम से कम इसे सुनें अवश्य।

अपेक्षित है कि नवरात्रि साधना में साधक हर प्रकार के व्यसन से दूर रहे, शाकाहार एवं ब्रह्मचर्य का पालन करे।

सदा की भाँति आत्म-परिष्कार तथा मौन साधना तो साथ चलेंगी ही। 💥

≈≈हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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English Literature – Articles ☆ The Morning When Heaven Came Calling ☆ Shri Jagat Singh Bisht ☆


Shri Jagat Singh Bisht

(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker.)

Authored six books on happiness: Cultivating Happiness, Nirvana – The Highest Happiness, Meditate Like the Buddha, Mission Happiness, A Flourishing Life, and The Little Book of Happiness. He served in a bank for thirty-five years and has been propagating happiness and well-being among people for the past twenty years. He is on a mission – Mission Happiness!

🌌 The Morning When Heaven Came Calling 🌌

A Celestial Experience on a Terrestrial Morning 🪷✨

˚⊱🪷⊰˚

There are mornings when one wakes up.

And then there are mornings when morning itself seems to wake up within you.

This was one such morning.

I had risen, as I often do, in that mysterious hour known in our ancient tradition as Brahma Muhurta—that hushed interval before sunrise when the world has not quite decided whether it wishes to remain in darkness or surrender itself to light.

The stars were still scattered across the sky.

The household slept.

The streets slept.

Even the birds, those tireless custodians of dawn, had not yet reported for duty.

And somewhere between the last breath of night and the first whisper of morning, I sat down to meditate.

Little did I know that the morning had prepared something for me.

Something I had not ordered.

Something no meditation manual had promised.

Something that, if narrated in a respectable gathering, might earn me either a thoughtful silence or a gentle recommendation to get some sleep.

I began with the breath.

 

🌿 Breath by Breath

I settled into Anāpāna—the simple observation of breathing.

No mantra.

No visualisation.

No celestial ambition.

Just the breath entering…

and leaving…

entering…

and leaving…

The breath, that most ordinary of miracles, became extraordinarily intimate.

The mind, which ordinarily behaves like a monkey after discovering both coffee and social media, became surprisingly quiet.

The attention gathered itself.

Almost instantaneously.

I watched the breath.

Then I began observing sensations—Vipassanā.

A sensation here.

A vibration there.

A subtle movement.

A warmth.

A coolness.

Nothing to cling to.

Nothing to resist.

Just observing.

And then something happened.

The meditation deepened.

Not gradually, as one might expect, but with an almost mischievous swiftness.

I wondered:

What is happening today?

Was this merely a particularly peaceful morning?

Or was I about to enter Dhyāna?

And then came the thought which every meditator should probably be warned against:

Am I going into Samādhi?

The moment one begins wondering whether one is entering Samādhi, of course, one is probably still very much at home.

The ego, after all, is capable of following us even into the Himalayas.

But strangely, the thought dissolved.

And I went deeper.

And deeper still.

˚⊱🪷⊰˚

🌲 And Then, Heaven Appeared

What happened next is difficult to describe because language, for all its grandeur, is a rather modest instrument.

I found myself in a landscape that seemed to belong neither entirely to earth nor entirely to imagination.

It was like a page torn from some forgotten celestial manuscript.

There were coniferous trees, tall and solemn, standing in a soft, dim light.

Between them bloomed flowers of delicate pastel shades—pink, lavender, pale yellow, soft blue—colours that seemed to have been mixed by a painter who had forgotten earthly rules.

Streams of blue water wandered through the landscape.

Not ordinary blue.

The sort of blue one imagines when a poet says blue and a painter quietly shakes his head because the word is inadequate.

And then I heard music.

A santoor.

Its notes floated through the air like tiny drops of silver.

One note.

Then another.

And another.

The sound seemed to come from nowhere and everywhere at once.

I thought of Kashmir.

I thought of the Himalayas.

I thought of temples hidden beyond the reach of maps.

And, inevitably, I thought:

Is this Dev Lok?

For a moment I felt that perhaps the old storytellers had not been exaggerating after all.

Perhaps heaven was not above us.

Perhaps it was merely concealed by the thickness of our ordinary perception.

Or perhaps the brain, having been deprived of its morning newspaper and worldly anxieties, had decided to stage its own production.

Shakespeare would have understood.

After all, he had already warned us:

«“We are such stuff as dreams are made on.”»

But was this a dream?

A vision?

A hallucination?

A figment of imagination?

Or simply the mind, in deep stillness, revealing its own hidden theatre?

I had no answer.

And meditation, fortunately, does not demand one.

👁️ A Little Experiment with Heaven

Curiosity got the better of me.

I gently opened my eyes.

Nothing.

No devas.

No apsaras.

No celestial musicians sitting behind the curtain waiting for the next performance.

No divine orchestra.

No heavenly welcome committee.

There was simply my familiar terrestrial world.

The furniture was where I had left it.

The walls had not turned into gold.

The ceiling remained stubbornly terrestrial.

I smiled.

Perhaps Heaven had closed its doors.

Or perhaps I had opened my eyes too soon.

So I closed them again.

And let the thoughts wane.

˚⊱🦌⊰˚

 

🌅 The World Became Enchanted

Something had changed.

There was now the faint suggestion of morning light.

The celestial landscape had become clearer.

The conifers stood in gentle mist.

The flowers seemed more luminous.

The blue streams glided silently through the trees.

And then I noticed something moving.

Deer.

A few of them wandered through the landscape with that effortless grace which belongs to creatures who have never attended a meeting.

They moved without hurry.

Without ambition.

Without checking the time.

Perhaps humanity invented clocks because we had forgotten how to live.

Far away I heard footsteps.

Soft.

Measured.

Almost ceremonial.

And then came music again.

Not merely the santoor this time.

There seemed to be an entire ensemble somewhere beyond the trees—flutes, strings, perhaps voices, perhaps something beyond the vocabulary of earthly instruments.

The music did not appear to be performed.

It appeared to be happening.

As naturally as water flowing.

As naturally as wind moving through leaves.

As naturally as silence itself.

I began to move slowly.

I do not remember deciding to move.

It was as if the landscape itself were moving me.

And then I saw it.

A vast pond.

Still.

Serene.

Reflecting the pale morning sky.

And around it—

the Apsaras.

Not one.

Not two.

But many.

A whole gathering.

˚⊱✨⊰˚

🪷 The Apsaras by the Blue Waters

They were unlike the apsaras of calendars and cinema posters.

There was nothing theatrical about them.

They were luminous rather than glamorous.

Some sat beside the water.

Some were reciting hymns.

Some chanted mantras in voices so soft that the sound seemed to rise directly from the earth.

Others moved gently in dance.

Not dance for an audience.

Dance without an audience.

Dance as prayer.

Their movements were slow, graceful and almost weightless.

It was as though the body had forgotten gravity.

The chanting mingled with the music.

The music mingled with the breeze.

The breeze mingled with the water.

And for one extraordinary moment, there seemed to be no boundary between sound and silence.

Between dancer and dance.

Between observer and observed.

Between myself and the mysterious world before me.

I was completely absorbed.

Lost.

And yet, strangely, I had never felt more found.

How long did I remain there?

I cannot say.

Five minutes?

Half an hour?

An hour?

Meditation has a curious relationship with time.

The clock counts minutes.

The mind counts memories.

Silence counts neither.

˚⊱🌄⊰˚

🧘 The Return of the Sun

Eventually, I opened my eyes.

It was bright outside.

The sun was about to rise.

The darkness had withdrawn quietly, like an old monk leaving a temple before the congregation arrived.

Across the sky were scattered clouds.

The first rays of the sun touched them with a magnificent orange glow.

For a few moments I simply stood there.

The sky seemed to be on fire.

But it was a peaceful fire.

A fire that did not destroy.

A fire that illuminated.

Perhaps every sunrise is a little miracle.

We simply become too accustomed to miracles.

I went to the kitchen and prepared my morning ginger-lemon-honey tea.

The kettle boiled.

The ginger released its fragrance.

The lemon brought its brightness.

The honey its sweetness.

And I took a sip.

Heaven, I discovered, also tastes remarkably good in a cup of tea.

˚⊱☕🍋🍯⊰˚

🚶 The Buddha Walks Again

I stepped outside.

Something in me was still altered.

I walked slowly.

Very slowly.

It was not my usual walk.

There was no destination.

No hurry.

No mental list of things to accomplish.

My eyes were gently downcast.

My steps were quiet.

For some inexplicable reason, I thought of the Buddha walking.

Not the Buddha of statues.

Not the Buddha of books.

But the Buddha who walked upon the earth—quietly, completely, without needing the earth to applaud him.

For a few moments I felt as though his spirit had somehow descended into the ordinary morning.

Or perhaps it was the other way around.

Perhaps I had briefly risen into the stillness in which he lived.

The distinction did not seem important.

I walked towards the park.

The world was waking.

People would soon begin their daily pilgrimage towards offices, schools, markets and obligations.

The great human drama would resume.

Phones would ring.

Messages would arrive.

News would disturb.

Opinions would collide.

Someone somewhere would be angry because his tea was not hot enough.

Another would be angry because someone else was happy.

Civilisation, as always, would continue its magnificent struggle.

I simply walked.

Quietly.

Gracefully.

And returned home.

˚⊱🥣⊰˚

 🌾 Heaven and Oatmeal

Back in the kitchen, I prepared breakfast.

Oatmeal.

Milk.

Banana.

Dry fruits.

Nuts.

Honey.

A meal sufficiently wholesome to make even the most rebellious of sins feel embarrassed.

As I sat down, something rather amusing occurred to me.

I had spent the early morning wandering through what appeared to be a celestial realm.

I had seen apsaras.

Heard heavenly music.

Walked among deer.

Watched blue streams beneath coniferous trees.

And now—

I was eating oatmeal.

Perhaps this is the secret of spirituality.

One may visit the heavens before breakfast, but eventually one must still wash one’s bowl.

The Buddha would probably have approved.

After all, enlightenment does not exempt one from ordinary life.

It merely changes the way one sees it.

˚⊱📜🪶⊰˚

🪶 And Then Came Saraswati

I looked towards the window.

And there, in the quiet distance of imagination—or perhaps somewhere between imagination and reality—I fancied I could see Goddess Saraswati.

She appeared to be sitting peacefully with her veena nearby.

In her hand was a feather pen.

And, to my astonishment, she seemed to be taking notes.

I wondered what she was writing.

Perhaps:

“Subject woke up before sunrise.”

“Meditated.”

“Saw celestial beings.”

“Questionable breakfast.”

Or perhaps she was writing something more profound.

Maybe:

“Today, for a few moments, he remembered that the ordinary is extraordinary.”

That seemed more likely.

For what else is poetry but the discovery of the extraordinary hidden inside the ordinary?

˚⊱🪷⊰˚

✍️ The Celestial Experience

I finally sat down to write.

Still bewildered.

Still amazed.

Still uncertain whether I had visited another realm or merely travelled deeply within my own mind.

And perhaps the distinction is less important than we imagine.

For centuries, human beings have argued about the nature of reality.

The mystic says, Look within.

The scientist says, Observe carefully.

The philosopher says, Question everything.

The poet says, Look again.

And the Buddha, perhaps smiling at all of us, simply says:

Observe.

So I observed.

I do not know whether Dev Lok exists somewhere beyond the stars.

I do not know whether apsaras inhabit some hidden dimension.

I do not know whether the santoor I heard came from an unseen celestial orchestra or from some exquisite chamber of the human mind.

And I do not know whether, for a brief while, I had crossed a boundary between worlds—or merely crossed the boundary between ordinary consciousness and deep stillness.

But I know what I experienced.

I know that the breath became still.

The mind became quiet.

The world became luminous.

The trees became sacred.

The water became music.

The deer became poetry.

The chanting became prayer.

And silence became a language.

Perhaps Samādhi is not necessarily a place one enters.

Perhaps it is a moment in which the walls between me and the world become so thin that existence seems to whisper:

“You have been looking for Heaven in the wrong direction.”

˚⊱✨⊰˚

🌌 Heaven May Be Closer Than We Think

The morning continued.

The sun rose.

The world resumed its ordinary business.

My oatmeal disappeared.

The tea cup became empty.

The celestial music faded.

The apsaras vanished.

The blue streams returned to wherever blue streams in meditation go.

And Saraswati, having apparently completed her notes, disappeared behind the veil of daylight.

Yet something remained.

A quietness.

A wonder.

A smile.

Perhaps that is all a mystical experience is required to leave behind.

Not a certificate.

Not a miracle to display.

Not a story to prove.

Only a little more wonder in the heart.

A little less noise in the mind.

A little more reverence for the breath.

And perhaps, when we next see an ordinary morning, we may pause before calling it ordinary.

For who knows?

Perhaps the devas are still there.

Perhaps the apsaras are still singing beside the blue waters.

Perhaps the santoor is still playing among the conifers.

Perhaps Saraswati is still taking notes.

Perhaps Heaven has never really disappeared.

Perhaps—

we simply opened our eyes.

🪷🌌✨

And so I wrote down what I had seen, while the memory was still warm, the tea still fragrant, and the boundary between the celestial and the terrestrial still delightfully uncertain.

˚⊱🪷⊰˚

♥ ♥ ♥ ♥

© Jagat Singh Bisht

Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker

FounderLifeSkills

A Pathway to Authentic Happiness, Well-Being & A Fulfilling Life! We teach skills to lead a healthy, happy and meaningful life.

The Science of Happiness (Positive Psychology), Meditation, Yoga, Spirituality and Laughter Yoga. We conduct talks, seminars, workshops, retreats and training.

≈ Editor – Shri Hemant Bawankar/Editor (English) – Captain Pravin Raghuvanshi, NM

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक की पुस्तक चर्चा # २१८ ☆ “अस्मि” – उपन्यासकार : सुश्री शिखा वार्ष्णेय ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  जी के आभारी हैं जो  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं।

आज प्रस्तुत है उपन्यासकार : सुश्री शिखा वार्ष्णेय जी द्वारा लिखित  “अस्मि” पर चर्चा।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा#  २१८ ☆

☆ “अस्मि” – उपन्यासकार : सुश्री शिखा वार्ष्णेय ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆/

पुस्तक : अस्मि 

उपन्यासकार : शिखा वार्ष्णेय

प्रकाशक : शिवना प्रकाशन

चर्चा : विवेक रंजन श्रीवास्तव, (लंदन)

☆ अस्मि’: अपने होने की पहचान की तलाश – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

किसी पुस्तक पर चर्चा करना केवल उसकी कथा सुनाना नहीं होता।  उसके भीतर छिपे विचारों, संवेदनाओं और जीवन-दृष्टि को समझने का प्रयास  है। मेरे लिए अस्मि ऐसी ही एक कृति है, जो एक स्त्री की कहानी कहते हुए हम सबके सामने एक बुनियादी प्रश्न रखती है,दूसरों के लिए जीते हुए क्या स्त्रियाँ अपने लिए जीना भूल जाती हैं?

‘अस्मि’ का अर्थ होता है—‘मैं हूँ’। यह छोटा-सा शब्द अपने भीतर एक बड़ा जीवन-दर्शन समेटे है। हम अपने जीवन में अनेक भूमिकाएँ निभाते हैं। किसी के माता-पिता, जीवनसाथी, बेटे-बेटी और मित्र होते हैं। इन रिश्तों के साथ जिम्मेदारियाँ जुड़ी होती हैं। लेकिन इन सबसे अलग हमारा अपना व्यक्तित्व भी है। हमारी इच्छाएँ, रुचियाँ और सपने भी हैं। क्या हम उन्हें पहचान पाते हैं? क्या हमारे जीवन में उनके लिए जगह बचती है? शिखा वार्ष्णेय का उपन्यास इन्हीं सवालों को कथा का आधार बनाता है।

शिखा वार्ष्णेय पत्रकारिता और साहित्य, दोनों से जुड़ी रही हैं। उन्होंने मॉस्को स्टेट यूनिवर्सिटी में पत्रकारिता की पढ़ाई की। लंदन में रहते हुए भी उनका लेखन भारतीय पाठकों से निरंतर संवाद करता है। ‘लंदन नामा’ जैसी स्तंभ-लेखन यात्राएँ उनके अनुभवों को पाठकों तक पहुँचाती रही हैं। यात्रा-वृत्तांत और अन्य लेखन के माध्यम से उन्होंने अपने अलग अनुभव-संसार का परिचय दिया है। अस्मि में भी बाहरी परिवेश के साथ मनुष्य के भीतर चलने वाले द्वंद्व को समझने का प्रयास स्पष्ट दिखाई देता है।

उपन्यास की केंद्रीय पात्र एला एक शिक्षित महिला है। उसका परिवार है, पति राजीव है और बेटा अंकुर है। बाहर से उसका जीवन सामान्य और व्यवस्थित दिखाई देता है। लेकिन भीतर वह अकेली है। परिवार की अपेक्षाएँ पूरी करते-करते उसकी अपनी रुचियाँ और कलात्मक अभिरुचियाँ पीछे छूट गई हैं। वह धीरे-धीरे स्वयं से दूर होती जाती है। उसके जीवन में सुविधाएँ हैं, लेकिन संतोष नहीं। अपने लोगों के बीच रहते हुए भी उसे अपने होने का एहसास नहीं मिलता।

एला की यह स्थिति उपन्यास को हमारे समय से जोड़ती है। हमारे आसपास ऐसे अनेक लोग हैं, जो दूसरों की जरूरतों का ध्यान रखते हैं, लेकिन उनकी अपनी जरूरतें अनदेखी रह जाती हैं। विशेष रूप से महिलाओं से परिवार के लिए त्याग और समर्पण की अपेक्षा की जाती है। इसमें कोई बुराई नहीं, यदि यह समर्पण उनकी अपनी पहचान को मिटाने की कीमत पर न हो। परिवार महत्वपूर्ण है, लेकिन परिवार के भीतर प्रत्येक व्यक्ति का स्वतंत्र व्यक्तित्व भी महत्वपूर्ण है।

एला मानसिक तनाव और अवसाद से गुजरती है। इसी बीच एक पैराडाइव स्पोर्ट्स दुर्घटना उसके जीवन की दिशा बदल देती है। वह एक दूरस्थ पहाड़ी गाँव में पहुँच जाती है। वहाँ के लोग उसके परिचित नहीं हैं। वे उसके परिवार, सामाजिक स्थिति या अतीत के बारे में कुछ नहीं जानते। फिर भी वे उसकी देखभाल करते हैं और उसे अपनापन देते हैं।

कथा का यह मोड़ ध्यान देने योग्य है। जिस एला को अपने परिचित परिवेश में अकेलापन महसूस होता था, उसे अनजान लोगों के बीच आत्मीयता मिलती है। यह अनुभव एक सहज प्रश्न उठाता है, क्या संबंध केवल रक्त, विवाह और परिचय से बनते हैं? या मनुष्य की संवेदना भी ऐसा रिश्ता बना सकती है, जो कभी-कभी स्थापित रिश्तों से अधिक गहरा हो?

गाँव में एला धीरे-धीरे अपने भीतर लौटने लगती है। वह चित्र बनाती है। घरों और दीवारों को रंगों से सजाती है। बच्चों के साथ समय बिताती है। अपने वनस्पति-विज्ञान के ज्ञान से गाँव के लोगों की मदद करती है। उसकी प्रतिभा अब केवल उसकी निजी रुचि नहीं रहती। वह समुदाय के जीवन का हिस्सा बन जाती है। लोग उसके काम को महत्व देते हैं। उसे लगता है कि वह उपयोगी है और उसके होने का कोई अर्थ है।

मनुष्य को केवल भौतिक सुविधाएँ नहीं चाहिए। उसे यह अनुभव भी चाहिए कि उसके जीवन का कोई उद्देश्य है। उसकी प्रतिभा का उपयोग हो रहा है। उसकी उपस्थिति किसी के लिए मायने रखती है। एला को गाँव में यही अनुभव मिलता है। वह दूसरों के जीवन में रंग भरते हुए अपने जीवन में भी रंग वापस ले आती है।

गाँव का अरलू उसे जापानी अवधारणा ‘इकिगाई’ से परिचित कराता है। इसका आशय उस उद्देश्य से है, जो हमें हर सुबह उठने का कारण देता है। जीवन में कोई ऐसा काम, संबंध या लक्ष्य होना, जिससे हम भीतर से जुड़े रहें। एला के लिए चित्रकला, बच्चों के साथ जुड़ाव और गाँव के लोगों की सहायता ऐसे ही उद्देश्य बन जाते हैं। उसे किसी बड़ी उपलब्धि की तलाश नहीं है। उसे अपने काम में अर्थ दिखाई देने लगता है।

उपन्यास का संदेश उपदेश के रूप में नहीं, बल्कि एला के अनुभवों के माध्यम से सामने आता है। अपने जीवन को अर्थ देने के लिए हमेशा किसी बड़ी सफलता या सामाजिक मान्यता की आवश्यकता नहीं होती। कभी-कभी किसी बच्चे को सिखाना, किसी घर की दीवार पर रंग भरना या किसी जरूरतमंद की सहायता करना भी जीवन को नई दिशा दे सकता है।

लेकिन इस कथा का वास्तविक संघर्ष तब सामने आता है, जब एला का बेटा अंकुर उसे खोजते हुए गाँव पहुँचता है। वह चाहता है कि उसकी माँ उसके साथ लौट चले। उसकी चिंता स्वाभाविक है। वह माँ से प्रेम करता है और उसे सुरक्षित देखना चाहता है। दूसरी ओर, एला अब उस जीवन में लौटने के लिए तैयार नहीं है, जिसमें वह अपनी पहचान खो बैठी थी। वह अंकुर को समझाती है कि गाँव ने उसे वह आत्मीयता और उद्देश्य दिया है, जिसकी उसे तलाश थी।

अंकुर के लिए माँ के निर्णय को स्वीकार करना आसान नहीं है। लेकिन वह कुछ समय गाँव में बिताता है। धीरे-धीरे उसे समझ आता है कि उसकी माँ यहाँ सचमुच खुश है। अंततः वह उसके निर्णय का सम्मान करता है।

मेरी दृष्टि में यह उपन्यास का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष है। यहाँ प्रेम और अधिकार के बीच का अंतर सामने आता है। हम अपने प्रियजनों के लिए निर्णय लेना चाहते हैं, क्योंकि हमें लगता है कि हम उनके लिए बेहतर जानते हैं। लेकिन क्या प्रेम का अर्थ उनकी ओर से जीवन चुनना है? या उनके निर्णय को समझने और स्वीकार करने का प्रयास करना भी प्रेम है?

एला का निर्णय हमें रिश्तों की एक नई व्याख्या की ओर ले जाता है। परिवार से जुड़ाव का अर्थ अपने व्यक्तित्व का विसर्जन नहीं होना चाहिए। किसी स्त्री का माँ या पत्नी होना उसकी पहचान का एक हिस्सा है, संपूर्ण पहचान नहीं। उसे अपनी रुचियों, अपने निर्णयों और अपनी खुशी के लिए भी जगह चाहिए। यह बात केवल स्त्रियों के लिए नहीं, हर उस व्यक्ति के लिए महत्वपूर्ण है, जो सामाजिक अपेक्षाओं के बीच अपने भीतर की आवाज खो देता है।

हिंदी साहित्य में स्त्री-अस्मिता और आत्मनिर्णय पर गंभीर लेखन हुआ है। मन्नू भंडारी और कृष्णा सोबती जैसी लेखिकाओं ने स्त्री के स्वतंत्र व्यक्तित्व और उसकी आंतरिक दुनिया को अपनी रचनाओं में स्थान दिया।

 शिखा वार्ष्णेय की अस्मि इस व्यापक साहित्यिक विमर्श को आज के जीवन, प्रकृति और सामुदायिक संवेदना के संदर्भ में प्रस्तुत करती है। इसकी विशेषता यह है कि एला की पहचान केवल विचार या विद्रोह से नहीं बनती। वह अपने काम, अपनी कला और दूसरों से जुड़ाव के माध्यम से स्वयं को खोजती है।

उपन्यास में पहाड़ी गाँव भी केवल कथा की पृष्ठभूमि नहीं है। वह ऐसे जीवन का प्रतीक है, जहाँ एला अपने व्यक्तित्व को व्यक्त कर पाती है। वहाँ सुविधाएँ कम हैं, लेकिन आत्मीयता है। यह कहना उचित नहीं होगा कि गाँव का जीवन हर समस्या का समाधान है या शहर का जीवन संवेदनहीन है। उपन्यास का संकेत अधिक सूक्ष्म है। मनुष्य को ऐसा परिवेश चाहिए, जहाँ उसे सुना जाए, उसके काम का सम्मान हो और उसे अपनी राह चुनने की स्वतंत्रता मिले।

यहाँ प्रकृति की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो जाती है। प्रकृति के निकट रहते हुए एला अपने भीतर की आवाज सुन पाती है। वह जीवन को केवल जिम्मेदारियों की सूची के रूप में नहीं देखती। उसे अपने आसपास के छोटे-छोटे कामों में आनंद मिलने लगता है। इस तरह उपन्यास आत्म-खोज को प्रकृति, कला और सामुदायिक जीवन से जोड़ता है।

अब प्रकाशक शिवना प्रकाशन की चर्चा भी जरूरी है। किसी पुस्तक को पाठकों तक पहुँचाना साहित्यिक प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है। शिवना प्रकाशन ने हिंदी की विभिन्न विधाओं में पुस्तकों के प्रकाशन के साथ प्रवासी लेखकों की रचनाओं को भी मंच दिया है। प्रवासी साहित्य हिंदी को नए अनुभवों और नए परिवेश से जोड़ता है। भाषा किसी एक देश की सीमा में बंद नहीं रहती। वह जहाँ भी रची जाती है, वहाँ के जीवन और संवेदना से समृद्ध होती है। इस दृष्टि से ऐसे प्रकाशन और साहित्यिक आयोजन हिंदी के विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

 मैं कहूँगा कि अस्मि का महत्व केवल एला की कहानी में नहीं, बल्कि उस प्रश्न में है जो यह पाठक के सामने छोड़ती है। क्या हम अपने प्रियजनों को उनकी स्वतंत्र पहचान के साथ स्वीकार कर पाते हैं? क्या हम अपनी जिम्मेदारियाँ निभाते हुए अपने लिए भी कुछ बचा पाते हैं? और क्या हम यह समझते हैं कि जीवन का अर्थ केवल दूसरों की अपेक्षाएँ पूरी करना नहीं है?

एला की यात्रा हमें याद दिलाती है कि स्वयं को पहचानना स्वार्थ नहीं है। यह अपने जीवन के प्रति सजग होना है। जब व्यक्ति अपने भीतर के संसार से जुड़ता है, तभी वह दूसरों से भी अधिक सच्चाई और संवेदना के साथ जुड़ पाता है।

‘अस्मि’ का सार शायद इसी एक वाक्य में है—मैं दूसरों के लिए हूँ, लेकिन मेरा अपना होना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

शिखा वार्ष्णेय जी को इस संवेदनशील उपन्यास के लिए हार्दिक बधाई।

 

चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १११६ ⇒ बड़े भाग, बैंक जॉब पायो ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “बड़े भाग, बैंक जॉब पायो…“।)

?अभी अभी # १११६ ⇒ आलेख – बड़े भाग, बैंक जॉब पायो ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

हम जहाँ शिक्षण ग्रहण करते हैं, उस स्थान को alma mater कहते हैं ! संसार एक विश्व-विद्यालय है, मुझे वास्तविक व्यावहारिक ज्ञान तो तब ही प्राप्त हुआ, जब मेरी एक राष्ट्रीयकृत बैंक में नियुक्ति हो गई। अतः मैं उसे ही alma mater मानता हूँ। जब शब्दों के अर्थ बदल रहे हैं, तो मुहावरे भी क्यों पीछे रहें।

वैसे मुझे कोई खास खुशी नहीं हुई थी, इस नियुक्ति से ! पढ़ने-पढ़ाने और लिखने का शौक तब से ही लग गया था, जब पिताजी के लिए, अहिल्या लाइब्रेरी से, पढ़ने के लिए किताबें लाता था। गुरुदत्त को छोड़ शरद, बंकिम, आचार्य चतुरसेन, बिमल मित्र और रेणु, प्रेमचंद के साहित्य से अच्छा लगाव हो गया था। शौकत थानवी, फिक्र तौंसवी, और जी पी श्रीवास्तव तो मानो सराफे के चाट हो गए थे। मुझे खेद है कि जासूसी उपन्यास तो ठीक गुलशन नंदा तक कभी मेरी नज़रों में चढ़ ना सके। बहुत कोशिश की पढ़ने की, बस पन्ने पलटकर रह गया। हां ! चंद्रकांता संतति न जाने कैसे, पूरी पढ़ गया।।

करेला और नीम चढ़ा ! बचपन से ही मेरी आँखों पर चश्मा चढ़ा था। छोटा मोटा नहीं, आचार्य रामचंद्र शुक्ल वाला, बिल्लोरी काँच वाला। माँ बताती थी, किसी मंदिर के घंटे की निशानी थी, जिसने नज़र और याददाश्त दोनों कमज़ोर कर दी।

मेरी नज़र भले ही कमज़ोर थी, नीयत ठीकठाक थी। स्कूल कॉलेज में कभी किसी कन्या को नज़र उठाकर नहीं देखा, नज़र नीची रखकर ही देखा। जिनकी नज़र नीची होती है, वे नज़र कम ही मिलाते हैं। ज़िन्दगी के नजारे देखना हो तो, नज़र उठानी भी पड़ती है, किसी से मिलानी भी पड़ती है। वर्ना खयाली पुलाव बनाते रहिये, कोई निगाह आप पर नज़र नहीं उठाएगी।।

हम यूँ ही बैंक-कर्मी नहीं बन गए ! बड़े अरमान थे डॉक्टर, इंजीनियर बनने के।

पर क्या करें, गणित कमज़ोर था। गणित छोड़ बायोलॉजी का दामन पकड़ा। वहाँ भी फिजिक्स, केमिस्ट्री ने साथ नहीं दिया। बीएससी रिटर्न हुए, कला-वाणिज्य महाविद्यालय की ओर रुख किया। तब और विकल्प था ही क्या हमारे पास ? कोई बीबीए, एमबीए का कोर्स नहीं, शहर में कोई कोचिंग इंस्टीटूट नहीं। ले देकर बीए, बीकॉम कर लो।

तब कॉमर्स विषय को हम हीन दृष्टि से देखते थे। जो हमारे साथ के छात्र ढंग से बीए नहीं कर पाए, एलएलबी पास करके वकील बन गए और हम आयएएस बनने के चक्कर में ना घर के रहे ना घाट के। और तब का हमारा पूरा घान का घान बैंकों और एलआयसी की ओर दौड़ पड़ा। बीए, बीकॉम, बीएससी हो या एमएससी ! चलो बुलावा आया है, बैंक, एलआईसी ने बुलाया है।।

नौकरी के 30 साल कैसे निकल गए, कुछ पता ही नहीं चला। आज लगता है, मानो एक फ़िल्म चल रही हो। खट्टे-मीठे अनुभव, सहयोगियों का प्रेम और अपनापन और ग्राहकों के रूप में कुछ विलक्षण व्यक्तित्वों से प्रगाढ़ परिचय, किसी की दुआ और किसी का आशीर्वाद शायद जीवन की सबसे बड़ी कमाई रही।

तब बैंक और एलआईसी वालों की शादी बड़ी आसानी से हो जाती थी। डॉक्टर, इंजीनियर न सही, बैंक वाला तो है। लड़का लोन भी ले लेगा, और हर तीन साल में बीवी बच्चों को एलटीसी पर घुमाने भी ले जाएगा। शुरू शुरू में तो सैलरी फ़ॉर सविंग और ओ टी फ़ॉर रोटी का रिवाज था। लेकिन हमारे जैसे संतों के पाँव पड़ते ही सब बंटा-धार हो गया। अब तो बैंकें ही मर्ज़ हो रही हैं और आदमी मशीन होता जा रहा है।।

एक नौकरीपेशा इंसान को कभी तो रिटायर होना ही है। मनोरंजन के लिए टीवी तो था ही, अब तो 4-G एंड्रॉइड फ़ोन भी मुट्ठी में आ गया है। फेसबुक के जरिये नये नये मित्र सम्पर्क में आते हैं। बड़ा आश्चर्य हुआ जब अधिकतर फेसबुक मित्रों को बैंक से जुड़ा देखा। जब तक सेवारत रहे, केवल काम-धंधे, पे- रिवीजन और डीए की बातें ही होती रहीं। अब रिटायरमेंट के बाद उनकी असली प्रतिभा का पता चला।

कितने कवि, लेखक, चिंतक, साहित्यकार और व्यंग्यकार कभी बैंककर्मी रहे हैं, जानकर मन प्रसन्न हो गया। विश्व में, यत्र तत्र सर्वत्र कभी बैंक से जुड़े लोग, छाए हुए हैं। हम सबके प्रिय प्रतिभाशाली फेसबुक मित्र श्री सुरेंद्र मोहन, भी स्टेट बैंक से जुड़े थे। आज वे हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी अध्य्यनशीलता, साहित्यिक ज्ञान, और सृजनशीलता से बहुत से फेसबुक मित्र परिचित रहे हैं। ऐसे कई मित्रों से मिलना और फिर बिछुड़ना अफ़सोसजनक तो होता है, लेकिन फिर भी हम भाग्यशाली हैं कि फेसबुक के माध्यम से ही सही, एक दूसरे के करीब आ सके। आज पीछे मुड़कर देखें, तो बस यही मन में आता है, बड़े भाग, बैंक जॉब पायो, और उन्हीं साथियों को पुनः फेसबुक पर पायो। सभी बैंक के वर्तमान, भूतपूर्व और अभूतपूर्व फेसबुक मित्रों, सहयोगियों का अभिवादन।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ चुभते तीर # १४८ – चमड़े की पुरानी नाल – ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – चमड़े की पुरानी नाल।)  

☆  चुभते तीर # १४८ – व्यंग्य  – चमड़े की पुरानी नाल ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार

कस्बे के सबसे पुराने राजकीय पशु चिकित्सालय के मुख्य बरामदे की चौखट के पास मोटी कील के सहारे लोहे की नाल जड़ी चमड़े की एक घिसी हुई पुरानी पट्टी पिछले बीस सालों से लटकी हुई थी जिसकी सिलाई वक्त और धूप की मार से उधड़ चुकी थी। उस खुरदरी नाल पर कभी बेसहारा बैलों और घोड़ों के खुरों को घाव से बचाने वाले स्नेह की चमक थी जो अब गर्द और सीलन की परत में बिल्कुल खो चुकी थी। उस चौखट के ठीक नीचे ईंटों के टूटे चबूतरे पर हर सुबह सात बजते ही हरदेव काका अपनी बांस की पुरानी लाठी टेककर आकर बैठ जाते थे। सफेद खद्दर का फटा कुर्ता और कंधे पर मैला गमछा डाले हरदेव काका दिन भर उस पुरानी नाल को अपनी पथराई आँखों से एकटक निहारते रहते थे। अस्पताल परिसर में सुबह से ही आधुनिक पशु एम्बुलेंस गाड़ियों, विदेशी नस्ल के पालतू कुत्तों के ब्यूटी पार्लर उत्पादों और पशु कल्याण बोर्ड के बड़े अफसरों की चमकती गाड़ियों का तांता लगा हुआ था। मंच से मूक पशुओं के प्रति करुणा और दया पर लंबे-चौड़े भाषण लाउडस्पीकरों पर गूँज रहे थे पर उन नए डॉक्टरों और सूट-बूट पहने अफसरों को बरामदे के कोने में लटकी उस घिसी हुई पुरानी नाल से कोई मतलब नहीं था। अस्पताल का पुराना ग्वाला सुखराम जब भी हाथ में चारे का गट्ठा लिए उधर से निकलता तो काका की उस शांत और निश्चल मूरत को देखकर सिहर उठता था। काका बहुत ही कांपती आवाज में उससे पूछते “क्यों रे सुखराम आज विश्व पशु दिवस के इस मेले में इस पुरानी नाल से किसी बूढ़े बैल के खुर का दर्द नापने का कोई हुक्म आया क्या या आज भी सिर्फ मंच पर भाषणों की घास ही चरवाई जा रही है?” सुखराम बस अपनी नजरें नीची कर लेता और एक ठंडी गहरी साँस भरकर चुपचाप आगे बढ़ जाता था।

चिकित्सालय में हाल ही में राजधानी के पशुपालन सचिवालय से नए मुख्य पशु चिकित्सा अधिकारी बनकर आए साहब अनिमेष अग्निहोत्री बहुत ही कड़क, आधुनिक वेटरनरी सर्जरी के विशेषज्ञ और प्रशासनिक अनुशासन के पक्के अफसर माने जाते थे। अनिमेष साहब जब भी अपनी चमकती हुई सरकारी गाड़ी से उतरकर नए वातानुकूलित ऑपरेशन थियेटर का मुआयना करने निकलते तो उनकी नजर सबसे पहले उसी चबूतरे पर बैठे हरदेव काका पर जाकर टिक जाती थी जिनकी आँखें हमेशा उस चौखट पर लटकी पुरानी नाल पर जमी रहती थीं। अनिमेष साहब को विश्व पशु दिवस के इतने बड़े भव्य सरकारी जलसे और विदेशी पेट क्लिनिकों के दौर में किसी फटेहाल बुजुर्ग का इस तरह रोज आकर एक कबाड़ चमड़े की पट्टी के आगे हाथ जोड़ना दकियानूसी सोच और अस्पताल के अनुशासन को बिगाड़ने जैसा लगता था। जब दोपहर के समय मुख्य सत्र समाप्त हुआ और बड़े-बड़े अतिथि वीआईपी लाउंज में भोजन के लिए चले गए तो अनिमेष साहब अपने सुरक्षाकर्मियों को वहीं छोड़कर सीधे हरदेव काका के पास पहुँच गए। अनिमेष साहब ने अपनी रौबदार आवाज में बहुत ही तीखे लहजे में पूछा “काका आप इस उम्र में रोज यहाँ आकर मुख्य रास्ते में क्यों बैठते हैं, अगर आपको कोई पशुपालक किसान पेंशन या मुफ़्त टीके की पर्ची बनवानी है तो भीतर ओपीडी काउंटर पर जाइए, इस तरह बाहर बैठकर चौखट पर लटकी एक बेकार लोहे की नाल को घूरने से इस देश की सड़कों पर घूमती लावारिस गायों का पेट नहीं भरने वाला है।” हरदेव काका ने बहुत ही शालीनता से अपने दोनों हाथ जोड़े और कांपती आवाज में बोले “अधिकारी साहब मैं किसी मुफ़्त के टीके या पेंशन की भीख के लिए यहाँ नहीं बैठा हूँ, मैं तो बस उस दिन की बाट जोह रहा हूँ जब इस नाल में वह खोया हुआ दर्द वापस लौटेगा जो किसी जमाने में इसी चौखट पर मुझसे छीना गया था।”

अनिमेष साहब को काका का यह जवाब किसी दार्शनिक पहेली जैसा लगा और उन्होंने अचरज से पूछा “काका आप किस खोए हुए दर्द की बात कर रहे हैं, सरकार तो हर साल इस पशु दिवस पर करोड़ों का बजट जारी करके आवारा पशुओं के लिए आधुनिक गौशालाएं बनवा रही है, फिर आपकी इस पुरानी घिसी नाल का क्या रहस्य है?” पास खड़े वयोवृद्ध सेवानिवृत्त पशुधन प्रसार अधिकारी पंडित सोमेश्वर जी जो पिछले चालीस सालों से उस अस्पताल के हर खुर और हर घाव के गवाह रहे थे, वे तुरंत आगे बढ़े और बोले “चिकित्सा अधिकारी साहब काका की बात को पागलपन मत समझिए, जब बीस साल पहले इस पूरे इलाके में बूढ़े और बीमार बैलों को कसाईखानों में धकेलने की क्रूरता चरम पर थी तब काका के इकलौते बेटे मानस ने इसी चौपाल पर खड़े होकर मूक पशुओं के प्राणों की सबसे बड़ी मशाल जलाई थी।” अनिमेष साहब ने उत्सुक होकर पूछा “मानस ने ऐसा क्या किया था जिसका नाता आज तक इस लोहे की नाल से जुड़ा हुआ है?” पंडित सोमेश्वर ने एक लंबी साँस भरकर बताना शुरू किया “साहब मानस उस समय पूरे प्रदेश का सबसे मेधावी और संवेदनशील युवा पशु चिकित्सक था, जब व्यापारी काम से छूटे बूढ़े बैलों को भूखा मारकर लावारिस छोड़ देते थे तब मानस ने रात-रात भर जागकर उनके रिसते खुरों पर यही नाल बांधी थी, उसने इस नाल को चौखट पर टांगकर कसम खाई थी कि जब तक इस कस्बे के अंतिम मूक जानवर को जीने का अधिकार नहीं मिलेगा तब तक वह किसी बड़ी विदेशी लॉबी के आगे घुटने नहीं टेकेगा।”

हरदेव काका ने सोमेश्वर जी की बात को आगे बढ़ाते हुए अपनी कांपती उँगलियों से उस नाल के चमड़े को छुआ और बहुत ही मार्मिक स्वर में बोले “हाँ साहब मेरे मानस ने उस दिन इस चबूतरे पर खड़े होकर मुझसे कहा था कि बापू यह नाल केवल लोहे का टुकड़ा नहीं बल्कि बेजुबानों के आंसुओं की ढाल है, उसने वादा किया था कि जिस दिन वह दिल्ली से राष्ट्रीय पशु संरक्षण बोर्ड का सबसे बड़ा अभयारण्य आदेश लेकर लौटेगा उस दिन वह खुद आकर इस नाल पर सरसों का तेल लगाएगा और अपने हाथों से मुझे देश के सबसे बड़े पशु सेवा मंच पर मुख्य अतिथि बनाएगा।” अनिमेष साहब के मन में एक गहरा कौतूहल जाग उठा और उन्होंने तुरंत अभिलेखागार में जाकर उस बीस साल पुरानी पशु रक्षा फाइल को खंगाला। जैसे ही अनिमेष साहब ने उस गोपनीय फाइल के आखिरी पन्नों को पढ़ा, उनके पैरों तले जमीन खिसक गई क्योंकि उसमें साफ लिखा था कि बीस साल पहले जब मानस ने अवैध वधशालाओं और पशु अंगों की तस्करी की पोल खोली थी तो बहुराष्ट्रीय पशु चारा और लेदर एक्सपोर्ट कंपनियों के सिंडिकेट ने उस आंदोलन को कुचलने के लिए मानस को अपनी अंतरराष्ट्रीय पेट फूड और लेदर कॉर्पोरेशन का मुख्य प्रबंध निदेशक और पच्चीस प्रतिशत की गुप्त साझेदारी देकर खरीद लिया था। मानस ने अपने सारे आदर्शों और उस नाल का वास्ता ताक पर रखकर उन समझौतों पर दस्तखत कर दिए और उसी पैसे के दम पर देश का सबसे बड़ा अरबपति मीट प्रोसेसिंग टाइकून बन गया जो आज उसी कस्बे के बूढ़े जानवरों को काटकर विदेशी पालतू कुत्तों के लिए डिब्बाबंद खाना बनाने का सबसे बड़ा कारखाना चला रहा था। अनिमेष साहब जब कांपते कदमों से बाहर आए और उन्होंने रुँधे गले से काका से कहा कि मानस तो खुद बेजुबानों का सबसे बड़ा कसाई बन चुका है, तो काका ने रोते हुए कहा “साहब मुझे सब पता था कि मेरा बेटा बिक चुका है, मैं तो रोज यहाँ यह देखने आता हूँ कि जो लोग मंच पर बैठकर विश्व पशु दिवस पर मूक प्राणियों पर दया का पाखंड करते हैं, जब वे अपनी ही जड़ों और अपने ही ग्वाले बाप की इस नाल को मुनाफे की भट्टी में झोंककर जानवरों की हड्डियों का व्यापार करते हैं तो क्या इस बहरे समाज को उस बिकी हुई करुणा के कफन से उठती हुई बदबू का अहसास होता है या नहीं।” अनिमेष साहब सुन्न होकर उस लटकी हुई नाल को ताकते रह गए और पूरा पशु चिकित्सालय उस बेबस पिता के आंसुओं के सन्नाटे में डूबकर शर्मसार हो गया।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # २३८ – रिश्तों में खट्टास का ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “रिश्तों में  खट्टास का”। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २३८ ☆

☆  रिश्तों में  खट्टास का ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

☆

रिश्तों में खट्टास का, बढ़ता जाता रोग ।

समय अगर बदला नहीं, तो रोएँगे लोग ।।

*

लोभ मोह में लिप्त हैं, आज सभी इंसान ।

ऊपर बैठा देखता, समदर्शी भगवान ।।

*

अगला पिछला सब यहीं, करना है भुगतान ।

पुनर्जन्म तक शेष ना, कभी रहेगा जान ।।

*

जीवन का यह सत्य है, ग्रंथों का है सार ।

जो बोया तुमने सदा, वही काटना यार ।।

*

संस्कृति कहती है सदा, यह मोती की माल ।

गुथी हुयी उस डोर से,  टूटे ना हर हाल ।।

*

रिश्तों में बंधकर रहें, हँसी खुशी के साथ ।

बरगद सी छाया मिले, सिर पर होवे हाथ ।।

*

रिश्ते नाते हैं सदा, खुशियों के भंडार ।

सदियों से हैं रच रहे, उत्सव के संसार  ।।7

☆

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २८० – शुभ नवरात्रे ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है नवरात्र पर्व पर विशेष कविता  “शुभ नवरात्रे”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २८० ☆ 

🌻कविता🌻 शुभ नवरात्रे ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

☆

आओं हे जगतारिणी, भक्त खड़े हैं द्वार।

दीप जोत ले आरती, बोल रहे जयकार।।

शिव शक्ति हे साधिका, शिव शंकर है नाथ।

नैना सुंदर आपकी, ढेरों प्यार दुलार।।

*

पावन सुंदर रूप है, नव दुर्गा अवतार।

पाँव पखारे नीर से, श्रद्धा भक्ति अपार।।

नव दुर्गा नव रूप को, जोड़े दोनों हाथ।

पल- पल खुशियाँ बाँटती, जग की पालनहार।।

*

सर्व शक्ति माँ शारदा, अनुपम हैं शृंगार।

अष्ट भुजा से शोभिता, देख रहीं संसार।।

नमन तुम्हें हे मंगला, कुल कुंटुब के साथ।

चरणों में अब माथ है, कर दो बेड़ापार।।

☆

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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