(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆.आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे।
आज प्रस्तुत हैं बुन्देली कविता – “उनखें सत्ता, शासन चइये “।)
साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १६६ ☆
☆ बुन्देली कविता – “उनखें सत्ता, शासन चइये “☆ आचार्य भगवत दुबे
(डॉ. रीटा अरोड़ा जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर। समाचार पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। आपका लेख-संग्रह ‘बांस का विवेक’हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में केडीपी (KDP) पर ‘अकीरा अराता’ (AKIRA ARATA) उपनाम से प्रकाशित है। आप जनवादी लेखक संघ, हरियाणा की सक्रिय सदस्य हैं।)
☆ लघुकथा ☆ हिस्से का श्राद्ध ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆
☆
“भैया, पंडित जी आ गए हैं। पिताजी का श्राद्ध शुरू करवा दें?” छोटे भाई ने फोन पर पूछा।
“हाँ, तुम सब संभाल लो। मैं पैसे भेज देता हूँ।”
“भैया, पैसे तो हर साल भेज देते हो। इस बार सोचा था, दोनों भाई साथ बैठकर पिताजी को याद करेंगे।”
“अरे, तुम तो वहीं रहते थे उनके पास। मैंने भी अपनी जिम्मेदारियाँ निभाई हैं।”
“बिल्कुल भैया। लेकिन आखिरी दिनों में पिताजी तुम्हारा इंतज़ार करते रहे। कहते थे, बड़ा बेटा आएगा तो साथ खाना खाएँगे।”
उधर कुछ पल खामोशी रही।
“तुम्हें शिकायत है कि मैं नहीं आया?”
“नहीं भैया, शिकायत नहीं। बस एक बात समझ नहीं आती-आज पिताजी के नाम पर हम ब्राह्मण भोज करा रहे हैं, दान कर रहे हैं, लेकिन उनके जीते-जी उनके मन की इच्छा क्यों नहीं समझ पाए?”
“अब पुरानी बातें करने से क्या फायदा?”
“सही कह रहे हो। पिताजी भी यही कहते थे – बच्चों के बीच मनमुटाव न रहे। शायद इसीलिए अपनी बीमारी भी छिपाते रहे।”
फोन कट गया।
कुछ देर बाद बड़े भाई का संदेश आया-
“कल घर आ रहा हूँ। इस बार श्राद्ध की बची हुई रस्में नहीं, तुम्हारे साथ बैठकर पिताजी की बातें भी करेंगे।”
छोटे भाई ने संदेश पढ़ा और पिता की तस्वीर के सामने बैठ गया।
श्राद्ध की तिथि हर साल लौटती है, लेकिन क्या रिश्तों को जोड़ने का अवसर भी हम हर साल टालते रहेंगे?
(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆