हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सलिल प्रवाह # २८६ – गीत – किसका पूजन करूँ? ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है  – “गीत – किसका पूजन करूँ?”)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २८६ ☆

☆ गीत – किसका पूजन करूँ? ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

राम अनगिनत

किसका पूजन करूँ

न पूजूँ किसको कहिए?

.

भरमाते आराम-विराम

न सत्य सूझता,

मन कहता आराम हराम

न कर्म छूटता।

कर्म करो तो मिले कर्मफल

मुक्ति न पाई-

मकड़ा जाला बुनता, घुटता,

फँसकर मरता।।

श्याम अनगिनत

किसकी बंसी सुनूँ

सुनूँ नहिं किसकी कहिए?

राम अनगिनत

किसका पूजन करूँ

न पूजूँ किसको कहिए?

.

कभी सुहाते, कभी न भाते

रिश्ते-नाते,

कभी साथ दें, कभी दगा दे

दूर हटाते।

दुश्मन नहीं पुत्र अपना ही

आग लगाता-

पुत्र मिले अर्जी ले मंदिर- मस्जिद जाते।।

काम सकाम

अकाम अनवरत

क्या कब सहिए, तहिए, गहिए?

राम अनगिनत

किसका पूजन करूँ

न पूजूँ किसको कहिए?

.

गीत-अगीत-प्रगीत

न जानूँ, नहिं रच पाता,

व्यथा-कथा तन की कहता

जन बनकर ज्ञाता।

शब्दों की ले आड़, बुद्धि

खुद ही भरमाई-

तर्क वितर्क कुतर्क सत्य सब

दूर हटाता।।

नाम अनाम सुनाम

प्रणाम कलाम सुमिरिए।

राम अनगिनत

किसका पूजन करूँ

न पूजूँ किसको कहिए?

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

१९.११.२०२५

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०४८ ⇒ || रबड़ी प्लेट || ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “|| रबड़ी प्लेट ||।)

?अभी अभी # १०४८ ⇒ आलेख – || रबड़ी प्लेट || ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

आप भले ही लड्डू को मिठाइयों का राजा मान लें, लेकिन जलेबी, इमरती और रबड़ी का नाम सुनकर ज़रूर आपके मन में लड्डू फूट पड़े होंगे। जिन्हें गुलाब जामुन पसंद है, उन्हें मावा बाटी की भी उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। होते हैं कुछ लोग, जो चाशनी से परहेज करते हैं, लेकिन रसगुल्ला देख, उनके मुंह से भी पानी टपकने लगता है।

हम तो शुगर को शक्कर ही समझते थे, लेकिन जब से सुना है, शुगर एक बीमारी भी है, हमने भी मीठे से परहेज करना शुरू कर दिया है। लेकिन चोर चोरी से जाए, हेरा फेरी से ना जाए, रबड़ी तब भी हमारी कमजोरी थी, और आज भी है।।

कुछ समय के लिए शुगर को भूल जाइए, आइए रबड़ी की बात करें। ठंडी रातों में दूध के कढ़ाव और केसरिया, मलाईदार दूध, रबड़ी मार के, मानो चाय मलाई मार के। गर्मी में मस्तानी दही की लस्सी और वह भी रबड़ी मलाई मार के। खाने वाले खाते होंगे दही के साथ गर्मागर्म जलेबी, हम तो जलेबी भी रबड़ी के साथ ही खाते हैं।

आज हम जिस रबड़ी प्लेट का जिक्र कर रहे हैं, उसके लिए हमें थोड़ा अतीत में जाना पड़ेगा। नालंदा जितना अतीत नहीं, फिर भी कम से कम पचास बरस। हमारे होल्करों के शहर इंदौर के बीचों बीच एक श्रीकृष्ण टाकीज था, जहां गर्मियों में सुबह साढ़े आठ बजे एक ठेला नजर आता था, जो हीरा लस्सी के नाम से प्रसिद्ध था। यह लस्सी केवल गर्मियों में ही नसीब होती थी। एक बारिश हुई, और वहां से ठेला नदारद।

एक श्रृंगारित ठेला, जिसमें कई शरबत की बोतलें सजी हुई, ठेले के नीचे के स्टैण्ड पर कई ताजे दही के कुंडे, ठेले के बीच टाट पर विराजमान एक बर्फ की शिला, एक विशाल तपेले में, लबालब रबड़ी और इन सबके बीच कार्यरत एकमात्र व्यक्ति हीरा और उनका चीनी मिट्टी का बड़ा पात्र और एक लकड़ी की विशाल रवई, दही को मथने के लिए। (सब कुछ हाथ से ही)

हीरा लस्सी ही उस लस्सी का ब्रांड था, जो किसी जमाने में आठ आने से शुरू होकर दस रुपए तक पहुंच गई थी। पहले कुंडे से दही निकालकर तबीयत से मथना, फिर कांच के ग्लासों में बर्फ छील छीलकर डालना, लस्सी और बोतलों में रखे शकर के केसरिया शरबत को मिलाना, और ग्लासों को लस्सी से भरना, फिर थोड़ी रबड़ी और उसके बाद लबालब लस्सी पर दही की मलाई की एक मोटी परत। लीजिए, हीरा लस्सी तैयार।।

हमारा विषयांतर में विश्वास नहीं। वहां रबड़ी प्लेट भी उपलब्ध होती थी, जो मेरी पहली और आखरी पसंद होती थी। भाव लस्सी से उन्नीस बीस, लेकिन एक कांच की बड़ी प्लेट में लच्छेदार रबड़ी, उस पर थोड़ा बर्फ का चूरा और ऊपर से गुलाब का शर्बत। एक लोहे की डब्बी में काजू, बादाम, पिस्ते का चूरा

लस्सी और रबड़ी प्लेट दोनों पर कायदे से बुरकाया जाता था। तब जाकर हमारी रबड़ी प्लेट तैयार होती थी।

हाइजीन वाले हमें माफ करें, क्योंकि हम रबड़ी प्लेट खाने के बाद हाथ नहीं धोते थे, रबड़ी और गुलाब के शरबत की खुशबू हमारे हाथों में हमारे साथ ही जाती थी और साथ ही जबान पर रबड़ी प्लेट का स्वाद भी।।

आज न तो वहां श्रीकृष्ण टाकीज है और ना ही वह हीरा लस्सी वाला। पास में बोलिया टॉवर के नीचे, उसके वंशज जरूर फ्रिज में रखी लस्सी, हीरा लस्सी के नाम से, साल भर बेच रहे हैं, लेकिन वह बात कहां।

जिस तरह शौकीन लोग, अपना शौक घर बैठे भी पूरा कर लेते हैं, हमारी रबड़ी प्लेट भी आजकल घर पर ही तैयार हो जाती है। तैयार केसरिया रबड़ी मांगीलाल दूधवाले अथवा रणजीत हनुमान के सामने विकास रबड़ी वाले के यहां आसानी से उपलब्ध हो ही जाती है, बस एक प्लेट में रबड़ी पर थोड़ा सा, मौसम के अनुकूल बर्फ और गुलाब का शर्बत ही तो डालना है, लीजिए, रबड़ी प्लेट तैयार। शौकीन हमें ज्वाइन कर सकते हैं।।

विशेष : शुगर फ्री वालों से क्षमायाचना सहित …!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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ज्योतिष साहित्य ☆ साप्ताहिक राशिफल (20 जुलाई से 26 जुलाई 2026) ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆

ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय

विज्ञान की अन्य विधाओं में भारतीय ज्योतिष शास्त्र का अपना विशेष स्थान है। हम अक्सर शुभ कार्यों के लिए शुभ मुहूर्त, शुभ विवाह के लिए सर्वोत्तम कुंडली मिलान आदि करते हैं। साथ ही हम इसकी स्वीकार्यता सुहृदय पाठकों के विवेक पर छोड़ते हैं। हमें प्रसन्नता है कि ज्योतिषाचार्य पं अनिल पाण्डेय जी ने ई-अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों के विशेष अनुरोध पर साप्ताहिक राशिफल प्रत्येक शनिवार को साझा करना स्वीकार किया है। इसके लिए हम सभी आपके हृदयतल से आभारी हैं। साथ ही हम अपने पाठकों से भी जानना चाहेंगे कि इस स्तम्भ के बारे में उनकी क्या राय है ? 

☆ ज्योतिष साहित्य ☆ साप्ताहिक राशिफल (20 जुलाई से 26 जुलाई 2026) ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆

जय श्री राम। वर्तमान युग के जागृत देवता हमारे श्री हनुमान जी के बारे में कहा जाता है कि उनका प्रताप चारों युग अर्थात सतयुग त्रेतायुग द्वापरयुग और कलयुग में फैला हुआ है। श्री हनुमान जी के प्रताप से हर तरफ उजाला हो रहा है। उनकी कीर्ति समस्त ब्रह्मांड में फैली हुई है। उनको स्मरण करने का सबसे अच्छा उपाय श्री हनुमान चालीसा का पाठ होता है। आज की श्री हनुमान चालीसा की चौपाई है:-

चारों जुग परताप तुम्हारा |

है परसिद्ध जगत उजियारा ||

इस चौपाई के संपुट पाठ करने से जातक के सभी मनोरथ सिद्ध होंगे और उसकी कीर्ति हर तरफ फैलेगी।

“नासे रोग हरे सब पीरा” नाम की पुस्तक में श्रीहनुमान चालीसा की चौपाइयों से संबंधित सभी उपायों का विस्तृत विवरण दिया हुआ है। इस पुस्तक को आप हमारे यहां से प्राप्त कर सकते हैं।

आइये अब मैं पंडित अनिल पाण्डेय आपको इस सप्ताह अर्थात 13 जुलाई से 19 जुलाई 2026 तक के सप्ताह के, ग्रहों के विचरण की जानकारी दे रहा हूं।

इस सप्ताह सूर्य और गुरु कर्क राशि में, मंगल वृष राशि में, शनि मीन राशि में, शुक्र सिंह राशि में और राहु कुंभ राशि में गोचर करेंगे। प्रारंभ में मिथुन राशि में वक्री रहेगा तथा 24 तारीख के 1:36 बजे दिन से मिथुन राशि में मार्गी हो जाएगा। आईये अब हम राशिवार राशिफल की चर्चा करते हैं।

मेष राशि

इस सप्ताह आपके सामाजिक प्रतिष्ठा में काफी वृद्धि होगी। जनप्रतिनिधियों के लिए सप्ताह बहुत अच्छा रहेगा। कर्मचारी और अधिकारियों को इस सप्ताह थोड़ा सावधान रहकर अपने कार्यों का निष्पादन करना चाहिए। कचहरी के कार्यों में आपको सावधान रहना चाहिए, जिससे आपको कोई नुकसान ना हो सके। इस सप्ताह आपको अपने संतान से सहयोग कम मिलेगा। भाग्य से आपको थोड़ा बहुत लाभ होगा। दुर्घटनाओं से आपको इस सप्ताह डरने की आवश्यकता नहीं है। इस सप्ताह आपके लिए 21 तारीख के दोपहर के बाद से लेकर 22 और 23 तारीख विभिन्न कार्यों में सफलता दायक हैं। सप्ताह के बाकी दिनों में आपको सावधान रहकर के अपने कार्यों को संपन्न करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन लाल मसूर की दाल का दान करें और मंगलवार को हनुमान जी के मंदिर में जाकर हनुमान चालीसा का तीन बार पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन बृहस्पतिवार है।

वृष राशि

इस सप्ताह आपका अपने भाई बहनों से बहुत अच्छा संबंध रहेगा। भाई बहनों से आपको अच्छा सहयोग भी प्राप्त होगा। इस सप्ताह आपके प्रतिष्ठा में थोड़ी वृद्धि होने की संभावना है। दुर्घटनाओं से इस सप्ताह आपको डरने की आवश्यकता नहीं है। शत्रुओं से आपको सावधान रहना चाहिए। अधिकारी एवं कर्मचारियों को अपनी वाणी पर नियंत्रण रखना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए 24 और 25 तारीख सफलता प्राप्त करने के लिए उपयोगी हैं। 21 की दोपहर के बाद से लेकर 22, 23 और 26 तारीख को आपको सावधान रहकर अपने कार्यों को पूर्ण करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन चावल का दान करें और शुक्रवार को मंदिर में जाकर पुजारी जी को सफेद वस्त्रो का दान दें। सप्ताह का शुभ दिन शुक्रवार है।

मिथुन राशि

इस सप्ताह आपके पास धन आने का अच्छा योग है। आपकी कुंडली के गोचर में इस सप्ताह धन भाव में सूर्य और गुरु एक साथ विराजमान हैं। इस प्रकार आपको अपनी विद्या और राज्य की मदद से धन प्राप्त होगा। भाई बहनों के साथ संबंध थोड़े कम अच्छे रहेंगे। भाग्य से आपको ज्यादा मदद नहीं मिलेगी। कचहरी के मामलों में आपको सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह में आप शत्रुओं को आसानी से पराजित कर सकते हैं। इस सप्ताह आपके लिए 20-21 और 26 तारीख विभिन्न प्रकार के कार्यों के लिए मददगार हैं। शत्रु को पराजित करने में 24 और 25 तारीख विशेष रूप से मददगार है। सप्ताह के बाकी दिन ठीक-ठाक हैं। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन काले कुत्ते को तंदूर की रोटी खिलाएं। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।

कर्क राशि

इस सप्ताह आप आत्मविश्वास से भरपूर रहेंगे। आपके अंदर अच्छे-अच्छे विचार आएंगे। आपको संतान से सहयोग प्राप्त होगा। शत्रुओं को आप थोड़े प्रयास से ही पराजित कर सकते हैं। भाग्य से आपको मामूली मदद प्राप्त हो सकती है। कर्मचारी और अधिकारियों के लिए यह सप्ताह सामान्य है, अर्थात जैसा चल रहा था वैसा ही रहेगा। भाई बहनों के साथ संबंध थोड़े खराब हो सकते हैं। इस सप्ताह आपके लिए 21-22 और 23 तारीख विभिन्न प्रकार से लाभदायक है। 24 और 25 तारीख को छात्रों के लिए परीक्षा देना बहुत अच्छा रहेगा। सप्ताह के बाकी दिन भी ठीक-ठाक हैं। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन काले उड़द की दाल का दान करें और शनिवार को शनि मंदिर में जाकर शनि देव का पूजन करें। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।

सिंह राशि

यह सप्ताह विवाहित जातकों के लिए उत्तम है। उनके विवाह के अच्छे प्रस्ताव आएंगे। प्रेम संबंधों में वृद्धि होगी। नए-नए प्रेम संबंध बन सकते हैं। कचहरी के कार्यों में प्रयास करने पर सफलता मिल सकती है। व्यापार ठीक चलेगा। व्यापारियों को धन लाभ भी होगा। कर्मचारी और अधिकारियों को इस सप्ताह थोड़ा सतर्क रहकर कार्य करना चाहिए। जनता में आपकी प्रतिष्ठा बढ़ेगी। संतान से आपको मदद प्राप्त होगी। इस सप्ताह आपके लिए 24और 25 तारीख प्रतिष्ठा वृद्धि के लिए मददगार है। सप्ताह के बाकी दिन भी कार्यों के करने के लिए ठीक-ठाक हैं। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन हनुमान चालीसा का पाठ करें और शनिवार को दक्षिण मुखी हनुमान जी के मंदिर में जाकर कम से कम तीन बार हनुमान चालीसा का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।

कन्या राशि

इस सप्ताह आपके पास धन आने का अच्छा योग है। आपके थोड़े से प्रयासों से ही आपके पास अच्छी मात्रा में धन आ सकता है। व्यापारियों का व्यापार उत्तम चलेगा। उनको धन लाभ होगा। इस सप्ताह आपको अपने संतान से मदद नहीं मिल पाएगी। छात्रों को प्रतियोगी परीक्षाओं में अच्छे मार्क मिलने की उम्मीद कम है। शत्रु शांत रहेंगे परंतु समाप्त नहीं होंगे। भाग्य के स्थान पर इस सप्ताह आपको कर्म पर विश्वास करना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए 20-21 और 26 तारीख फलदायक है। सप्ताह के बाकी दिन भी ठीक-ठाक हैं। 24 और 25 तारीख को आपका अपने भाइयों के साथ अच्छा संबंध बनेगा। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन रुद्राष्टक का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।

तुला राशि

अधिकारी एवं कर्मचारियों के लिए यह सप्ताह काफी अच्छा रहेगा। आपको अपने कार्यालय में उचित सम्मान मिलेगा। नौकरी के लिए अगर आप परीक्षा दे रहे हैं तो उसे प्रतियोगिता में आप सफल हो सकते हैं। इस सप्ताह आपको भाग्य से मदद मिल सकती है। धन आने का सामान्य योग है। भाई बहनों के साथ संबंध पहले जैसे ही रहेंगे। दुर्घटनाओं से आपको इस सप्ताह सावधान रहना चाहिए। आपके शत्रु शांत रहेंगे परंतु समाप्त नहीं होंगे। इस सप्ताह आपके लिए 21 की दोपहर के बाद से लेकर 22 और 23 तारीख कार्यों को संपन्न करने में फलदायक है। 20 और 21 की दोपहर तक का समय कार्यों को करने के लिए कम उचित है। 24 और 25 तारीख को धन प्राप्त हो सकता है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गणेश अथर्वशीर्ष का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।

वृश्चिक राशि

इस सप्ताह भाग्य आपका भरपूर साथ देगा। भाग्य के कारण आपक कई कार्य निपटा सकते हैं। आपके जो कार्य भाग्य के कारण रुक रहे हो उनको करने का प्रयास करें। सफल होंगे। इस सप्ताह आपको अपने संतान से बहुत कम सहयोग प्राप्त होगा। कर्मचारी एवं अधिकारियों को इस सप्ताह सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए 24 और 25 तारीख कार्यों को करने हेतु लाभप्रद है। 21, 22 और 23 तारीख को आपको सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन शिव पंचाक्षरी मंत्र का जाप करें। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।

धनु राशि

इस सप्ताह आपका और आपके जीवनसाथी का स्वास्थ्य ठीक रहेगा। आप अपने शत्रुओं को कम प्रयास में ही पराजित कर सकते हैं। कर्मचारी और अधिकारियों के लिए यह सप्ताह सामान्य है अर्थात जैसे पहले से चल रहा था वैसा ही रहेगा। जनप्रतिनिधियों के लिए भी यह सप्ताह सामान्य रहेगा। व्यापारियों के लिए यह सप्ताह ठीक-ठाक रहेगा। भाई और बहनों के साथ आपके संबंधों में थोड़ा सा तनाव आ सकता है। भाग्य से इस सप्ताह आपको मदद बहुत कम मिलेगी। इस सप्ताह आपके लिए 20, 21 और 26 तारीख विभिन्न प्रकार के कार्यों के लिए परिणाम मूलक है। 24 और 25 तारीख को आपको कचहरी के कार्यों के प्रति बहुत सतर्क रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन शिव पंचाक्षरी स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।

मकर राशि

यह सप्ताह आपके जीवनसाथी के लिए बहुत अच्छा रहेगा। उनको अपने हर कार्य में सफलता प्राप्त होगी। अविवाहित जातकों के लिए विवाह के प्रस्ताव आ सकते हैं। इस सप्ताह आपको अपने संतान से विशेष सहयोग प्राप्त नहीं हो पाएगा। मामूली धन आने का योग है। इस सप्ताह आपके लिए 21, 22 और 23 तारीख विभिन्न कार्यों को करने हेतु अनुकूल है। 24 और 25 तारीख को आपको धन की प्राप्ति हो सकती है। 26 तारीख को आपको सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन भगवान शिव का दूध और जल से अभिषेक करें। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।

कुंभ राशि

यह सप्ताह अविवाहित जातकों के लिए अच्छा है। उनके विवाह के नए-नए प्रस्ताव आएंगे। परंतु इन प्रस्ताव को फाइनल करने मैं सावधानी बरतना चाहिए। अधिकारी एवं कर्मचारियों के लिए यह सप्ताह ठीक-ठाक है। इस सप्ताह आपको अपने प्रतिष्ठा के प्रति सतर्क रहना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए 24 और 25 तारीख विभिन्न प्रकार के कार्यों हेतु ठीक-ठाक है। 20 और 21 तारीख को आपको सजग रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गायत्री मंत्र का जाप करें। सप्ताह का शुभ दिन शनिवार है।

मीन राशि

यह सप्ताह आपके संतान के लिए उत्तम रहेगा। छात्रों की पढ़ाई अच्छी चलेगी। प्रतियोगी परीक्षाओं में उनको सफलता प्राप्त हो सकती है। धन आने का योग है। इस सप्ताह आपका और आपके जीवनसाथी का स्वास्थ्य पहले जैसा ही रहेगा। 24 और 25 तारीख को भाग्य आपका विशेष रूप से साथ दे सकता है। इस सप्ताह आपके लिए 20 और 26 तारीख विभिन्न प्रकार के कार्यों के लिए उपयुक्त है। 21 तारीख को दोपहर के बाद से लेकर 22 और 23 तारीख को आपको होशियारी से कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन राम रक्षा स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।

ध्यान दें कि यह सामान्य भविष्यवाणी है। अगर आप व्यक्तिगत और सटीक भविष्वाणी जानना चाहते हैं तो आपको मुझसे दूरभाष पर या व्यक्तिगत रूप से संपर्क कर अपनी कुंडली का विश्लेषण करवाना चाहिए। मां शारदा से प्रार्थना है या आप सदैव स्वस्थ सुखी और संपन्न रहें। जय मां शारदा।

 राशि चिन्ह साभार – List Of Zodiac Signs In Marathi | बारा राशी नावे व चिन्हे (lovequotesking.com)

निवेदक:-

ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय

(प्रश्न कुंडली विशेषज्ञ और वास्तु शास्त्री)

सेवानिवृत्त मुख्य अभियंता, मध्यप्रदेश विद्युत् मंडल 

संपर्क – साकेत धाम कॉलोनी, मकरोनिया, सागर- 470004 मध्यप्रदेश 

मो – 8959594400

ईमेल – 

यूट्यूब चैनल >> आसरा ज्योतिष 

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कविता ☆ गंगा माहेराची… + संपादकीय निवेदन – सुश्री ज्योत्स्ना तानवडे – अभिनंदन ☆ सम्पादक मंडळ ई-अभिव्यक्ति (मराठी) ☆

सूचना/Information 

(साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समाचार)

सुश्री ज्योत्स्ना तानवडे

🎇 अ भि नं द न  🎇 

शुभंकरोती साहित्य परिवारातर्फे आयोजित करण्यात आलेल्या वृत्त बद्ध काव्य स्पर्धेत आपल्या समुहातील ज्येष्ठ साहित्यिका सौ. ज्योत्स्ना तानवडे यांना त्यांच्या गंगा माहेराची या काव्यरचनेसाठी उत्तेजनार्थ पुरस्कार प्राप्त झाला आहे.

सौ. तानवडे यांचे ई-अभिव्यक्ती परिवारातर्फे मन:पूर्वक अभिनंदन आणि पुढील वाटचालीसाठी शुभेच्छा 💐

आज त्यांची पुरस्कार प्राप्त कविता प्रकाशित करत आहोत.

संपादक मंडळ

ई अभिव्यक्ती मराठी

शुभंकरोति साहित्य परिवार आयोजित भव्य वृत्तबद्ध काव्य स्पर्धा उत्तेजनार्थ सन्मान प्राप्त

? कवितेचा उत्सव ?

☆ “गंगा माहेराची” ☆ सौ.ज्योत्स्ना तानवडे ☆

(वृत्त – लवंगलता (८|८|८|४))

मनी घालती पिंगा अवचित फेऱ्या आठवणींच्या

फेर धरोनी नाचत थयथय गाऱ्या भिंगोऱ्याच्या ||

 *

शेतामधले कौलारू घर सदैव गजबजलेले

तीन पिढ्यांचे बंध रेशमी प्रेमळ गुरफटलेले ||

दारापुढती गोधन दावण खूण वैभवी झुलते

ढवळ्या पवळ्या खिलार जोडी घुंगुरमाळा घुमते ||

 *

सख्खे मावस आत्ते मामे चुलत नातलग सारे

एकोप्याच्या मेळाव्याला भेटण्यास येणारे ||

 *

सरस्वतीचे मंदिर मोठे जीवन घडवत जाई

संस्कारांची दिली शिदोरी वाटे दुसरी आई ||

 *

मंदिरातल्या आरतीमधे मन रेंगाळत राही

आशीर्वादे आयुष्याला कळस यशाचा पाही ||

 *

गावाकडल्या मातीमध्ये नाळ जोडली आहे

माहेराच्या घरामधुनिया प्रेमळगंगा वाहे ||

 

© सौ.ज्योत्स्ना तानवडे

वारजे, पुणे.५८

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ “स्वयंप्रामाणिकता : धर्मभयापलीकडील नैतिकता” ☆ श्री जगदीश काबरे ☆

श्री जगदीश काबरे

☆ “स्वयंप्रामाणिकता : धर्मभयापलीकडील नैतिकता☆ श्री जगदीश काबरे ☆

माणूस हा बुद्धिमान प्राणी आहे. त्याला विचार करण्याची, निर्णय घेण्याची आणि स्वतःच्या कृतींचे परिणाम भोगण्याची क्षमता निसर्गाने दिलेली आहे. तरीही शतकानुशतके माणसाने आपल्या नैतिक आचरणाचा आधार बाहेरच्या कोणत्यातरी शक्तीवर, कोणत्यातरी भीतीवर, कोणत्यातरी परलोकाच्या कल्पनेवर ठेवला आहे. धर्मसंस्काराने माणसाला प्रामाणिक बनवता येते, असा दावा केला जातो. परंतु या दाव्यात एक मूलभूत विसंगती आहे. भीतीतून निर्माण होणारी नैतिकता ही खरी नैतिकता नसते. जो माणूस केवळ देवाची किंवा धर्माची भीती बाळगून सत्शीलपणे वागतो, तो मुळात आतून अनैतिकच असतो. अशा माणसाला इंग्रजीमध्ये otherwise gentleman असे म्हणतात. कारण त्याच्या अनैतिकतेला बाहेरून एक धार्मिक आवरण चढवलेले असते. खऱ्या नैतिकतेचा उगम भीतीत नाही, तर स्वतःच्या मनाशी असलेल्या प्रामाणिकतेत आहे.

धर्म आणि नैतिकता यांचा संबंध माणसाने युगानुयुगे गृहीत धरला आहे. धर्मग्रंथ सांगतात की चांगले वाग, नाहीतर नरक भोगशील. देव पाहतो आहे, म्हणून वाईट करू नकोस. परलोकात जाब द्यावा लागेल, म्हणून इहलोकात सावध राहा. या सगळ्या शिकवणींचा आधार एकच आहे, तो म्हणजे भीती. माणसाला त्याच्या स्वतःच्या विवेकावर विश्वास ठेवण्याऐवजी एका बाहेरच्या अदृश्य शक्तीच्या नजरेची भीती दाखवून नियंत्रित करण्याचा हा प्रयत्न आहे. परंतु विचार करा, जेव्हा कोणी पाहत नसेल, जेव्हा देवही गाफील असेल असे वाटेल, तेव्हा या भीतीच्या आधारावर उभी राहिलेली नैतिकता टिकेल का? इतिहास सांगतो की ती टिकत नाही. धर्माच्या नावावर झालेले अत्याचार, धार्मिक माणसांनी केलेल्या अनैतिक गोष्टी, हे सगळे याचेच पुरावे आहेत.

मग स्वतःच्या मनाशी प्रामाणिक राहणे म्हणजे नक्की काय तर आपल्या प्रत्येक कृतीची, प्रत्येक विचाराची, प्रत्येक निर्णयाची जाणीव ठेवणे. स्वतःशीही खोटेपणाने न वागणे. आपली प्रेरणा काय आहे, आपला हेतू काय आहे, हे स्वतःपासून लपवून न ठेवणे. जेव्हा माणूस स्वतःशीच खरा असतो, तेव्हा त्याला इतरांशीही खरे राहणे सहज शक्य होते. कारण खोटेपणा खोट्या गोष्टीची एक साखळी बनवतो. एक खोटे दुसऱ्या खोट्याला जन्म देते. पण जो माणूस स्वतःशीच पारदर्शक आहे, त्याची नैतिकता आतून येते. धर्माच्या भीतीखाली जगणारा माणूस सतत दुभंगलेल्या अवस्थेत असतो. आतून काहीतरी वेगळे वाटते, बाहेरून वेगळे वागावे लागते. मनात एक असते, बोलण्यात दुसरे. कृतीत आणखी वेगळे. या दुभंगलेपणातून माणसाला कधीही आंतरिक शांती मिळत नाही. तो सतत एका अव्यक्त अपराधभावनेच्या सावलीत जगत असतो. धर्माने सांगितलेल्या नियमांची पूर्तता करण्यासाठी तो जे करतो ते मनापासून नसते, ते केवळ दंड टाळण्यासाठी असते. अशा माणसाला नैतिक म्हणता येईल का? खरे पहाता, तो केवळ नैतिकतेचे नाटक करत असतो.

परलोकाची संकल्पना आणि त्यावर आधारित नैतिकता याबद्दलही गांभीर्याने विचार करणे आवश्यक आहे. परलोक खरोखर अस्तित्वात आहे की नाही, याचा कोणताही शास्त्रीय पुरावा उपलब्ध नाही. तरीही करोडो माणसे परलोकाच्या भीतीने जगतात. स्वर्ग मिळेल म्हणून चांगले वागतात, नरकाची भीती वाटते म्हणून वाईट गोष्टी करणे टाळतात. पण हा व्यवहार आहे, नैतिकता नव्हे. ज्या माणसाला परलोकाचे बक्षीस लुभावत असते तो मुळातच नैतिक नसतोच. नैतिकता ही अटी-शर्तींवर उभारलेली नसते. खरी नैतिकता ही निःस्वार्थ असते, ती स्वतःच्या मनाशी प्रामाणिक असते म्हणून पाळली जाते, कुठल्या बक्षिसाच्या अपेक्षेने नव्हे. देवावर अंधश्रद्धा ठेवणारा माणूस हळूहळू स्वतःच्या विचारशक्तीवरचा विश्वास गमावतो. कारण त्याला सतत सांगितले जाते की, तू काहीच करू शकत नाहीस, देवाच्या इच्छेशिवाय पान हलत नाही. हे सतत कानीकपाळी पडल्यामुळे तो आपल्या स्वतःच्या क्षमतांवर शंका घेऊ लागतो. अपयश आले तर देवाची इच्छा म्हणतो, यश आले तर देवाची कृपा म्हणतो. या दोन्हींमध्ये तो स्वतःला कुठेच ठेवत नाही. मग त्याच्या आयुष्यात प्रगती होणार कशी? प्रगतीसाठी लागते आत्मपरीक्षण, स्वतःच्या चुका स्वीकारण्याची तयारी, आणि त्या बदलण्याची हिम्मत. पण जो माणूस सगळे देवावर ढकलतो, तो ही तिन्ही कारणे टाळतो.

समाजात नियम असतात, कायदे असतात. काही माणसे हे नियम केवळ पोलिसांच्या भीतीने पाळतात. काही माणसे समाजाच्या निंदेच्या भीतीने पाळतात. आणि काही माणसे धर्माच्या भीतीने पाळतात. या तिन्ही प्रकारच्या माणसांमध्ये एक साम्य आहे, ते म्हणजे त्यांच्या वर्तनाचे मूळ भीतीत आहे. भीती हे नैतिकतेचे मूळ असू शकत नाही. भीतीतून जन्मलेली नैतिकता ही एखाद्या वाळूच्या घराप्रमाणे असते, जी थोड्याशा वाऱ्याने कोसळते. याउलट, स्वतःच्या विवेकातून, स्वतःच्या जबाबदारीच्या जाणिवेतून आलेली नैतिकता ही दगडाच्या भिंतीप्रमाणे असते. ती कोणत्याही परिस्थितीत टिकते. कारण तिचा आधार बाहेर नाही, माणसाच्या आत आहे. स्वतःची जबाबदारी ओळखणे हे प्रगल्भ माणसाचे लक्षण आहे. जेव्हा माणूस म्हणतो की, माझ्या आयुष्यात जे घडते त्याला मीच जबाबदार आहे, माझ्या चुका माझ्याच आहेत, माझे यश माझेच आहे, तेव्हा तो खऱ्या अर्थाने प्रगतीच्या दिशेने कूच करतो. कारण जेव्हा माणूस आपल्या कृतींचे परिणाम स्वतः भोगायची तयारी ठेवतो, तेव्हा तो अधिक विचारपूर्वक वागतो, तो धर्माच्या भीतीशिवायही नैतिक राहू शकतो. त्याला कोणत्या धार्मिक ग्रंथाची, कोणत्या कर्मकांडाची, कोणत्याही उपासनेची गरज लागत नाही.

विवेकी माणूस म्हणजे केवळ बुद्धिमान माणूस नव्हे. विवेक म्हणजे बुद्धी आणि भावना यांचा समतोल. विवेकी माणूस हा इतरांच्या दुःखाला संवेदनशीलतेने समजतो. तो जाणतो की माझ्या कृतींचा दुसऱ्यावर काय परिणाम होणार आहे. हे जाणणे म्हणजेच सहानुभूती, आणि सहानुभूती हे नैतिक वर्तनाचे मूळ आहे. सहानुभूती ही भीतीतून येत नाही, ती मनाच्या गाभ्यातून येते. असा माणूस धर्मभयाने वागणाऱ्या माणसापेक्षा कितीतरी पटींनी जास्त नैतिक असतो. देवावर विश्वास ठेवणे म्हणजे आपली जबाबदारी एका अदृश्य शक्तीकडे सोपवणे. पण स्वतःच्या कर्तृत्वावर आत्मविश्वास ठेवणे म्हणजे जबाबदारी स्वतः उचलणे. जो माणूस स्वतःवर विश्वास ठेवतो, तो आव्हानांपुढे खचत नाही, तो स्वतःच्या चुका स्वीकारतो आणि पुन्हा त्या चुका होऊ नये म्हणून दक्ष राहतो. असाच माणूस प्रगती करतो, जीवनात अर्थ शोधतो. त्याचे नैतिक आचरण त्याच्या विकसित होत जाणाऱ्या व्यक्तिमत्त्वाचा एक घटक बनते. त्याउलट जो देवाधर्माच्या भीतीमुळे नैतिकतेने वागतो तो संधी मिळताच अनैतिक कृत्य करायला धजावतो. समाजाची रचना, लोकशाहीचा पाया, मानवी नात्यांची दृढता, हे सगळे स्वयंप्रेरित नैतिकतेवर अवलंबून असते. जर माणसे आतून नैतिक असतील, तर कोणतीही बाह्य शक्ती त्यांना अनैतिक बनवू शकत नाही.

जी मुले केवळ शिक्षेच्या भीतीने चांगली वागतात, ती मोठी झाल्यावर पालकांच्या नियंत्रणातून बाहेर गेल्यावर बिघडण्याची शक्यता जास्त असते. जी मुले नैतिकतेचे मूल्य समजून-उमजून वागतात, ती आयुष्यभर त्या मूल्यांशी बांधील राहतात. म्हणूनच मुलांना धर्माच्या भीतीने नव्हे, तर कारण-परिणामाच्या समजुतीतून नैतिकता शिकवणे हे खऱ्या अर्थाने संस्कार करणे आहे. त्यांना सांगा की, दुसऱ्याला दुखवू नका कारण त्यामुळे त्यांना वेदना होतात, देव रागावेल म्हणून नव्हे, तर त्यांना सांगा की खरे बोला कारण खोट्याने नाती मोडतात. नरकात जाल म्हणून सतशीलतेने वागू नका तर तो तुमचा अंगभूत गुणधर्म झाला पाहिजे. हे शिक्षण मुलाला आयुष्यभर पुरते. थोडक्यात, नीतिमत्तेने जगणे हा माणसाचा अंगभूत गुणधर्म बनणे हेच खऱ्या नैतिकतेचे ध्येय आहे. हे घडण्यासाठी धर्मसंस्काराची नव्हे, तर विवेकी संस्काराची गरज आहे. माणसाला स्वतःशी प्रामाणिक राहण्याची, स्वतःच्या कृतींची जबाबदारी घेण्याची, दुसऱ्याच्या वेदनांना संवेदनशीलतेने समजण्याची सवय लागणे, हेच खरे मानवी उन्नतीचे लक्षण आहे. देवाच्या भीतीखाली वाकणारा माणूस कधीही पूर्णपणे ताठ उभा राहू शकत नाही. स्वतःच्या विवेकावर विसंबणारा माणूस मात्र कोणत्याही परिस्थितीत ताठ उभा राहतो. म्हणून स्वयंप्रामाणिकता ही धार्मिक संस्कारांपेक्षा मानवी प्रगल्भतेचा, माणसाच्या खऱ्या स्वातंत्र्याचा, आणि सच्च्या नैतिकतेचा एकमेव विश्वासार्ह आधार आहे.

 

© श्री जगदीश काबरे

(लेखक समाजचिंतक आणि वैज्ञानिक दृष्टिकोन प्रसारक आहेत.)

jetjagdish@gmail.com मो ९९२०१९७६८०

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – जीवनरंग ☆ ते दहा तास… – भाग – २ ☆ श्री दीपक तांबोळी ☆

श्री दीपक तांबोळी

? जीवनरंग ?

☆ ते दहा तास… – भाग – २ ☆ श्री दीपक तांबोळी

(“अहो मागच्या महिन्यात मी याला घेऊन एकटीच अमेरिकेत जाऊन आले, आमच्या नातेवाईकाच्या लग्नाला. हा तर आपला महाराष्ट्र आहे. इथं सोबतीची काय गरज? “

मी चुपच झालो. बाई मोठी धीट दिसत होती.) 

इथून पुढे – – 

मग आमच्या गप्पा रंगल्या. मला वाटत होतं ती एक साधी गृहिणी असावी पण फॅक्टरीच्या कामातही तिचा सक्रिय सहभाग असतो हे तिनं मला सांगितलं. फॅक्टरीच्या प्राॅडक्ट्सची, त्यांच्या प्रक्रियेची आणि मार्केंटिंगची तिला खडानखडा माहिती होती. नवऱ्यासोबत ती अनेक देशात जाऊन आली होती. एका ट्रस्टच्या माध्यमातून ती बरीच समाजसेवाही करत होती.

जसजसा मी तिच्याशी बोलत होतो तसतशी माझी नजर स्वच्छ होत होती. तिच्या सौंदर्याचा माझ्यावरचा परिणाम कमी झाला होता. त्याची जागा आता आदराने घेतली होती. इतकी धनाढ्य आणि कमालीची सुंदर असुनही तिच्या वागण्यातला नम्रपणा, साधेपणा, तिच्यापुढे मी अगदीच क्षुल्लक असतांनाही माझ्याशी बोलण्यातली तिची आपुलकी हे सर्व पाहून मी खुप भारावून गेलो होतो.

“तुम्ही फिल्म इंडस्ट्रीत का नाही गेलात? ” माझ्या नकळत माझ्या मनात खदखदणारा तो प्रश्न निघून गेला. ती मोकळेपणाने हसली. मग म्हणाली

“मला हा प्रश्न अनेकांनी विचारलाय. मला ऑफरही होत्या पण तिथं जाऊन मला प्रसिद्धीव्यतिरिक्त काय मिळालं असतं? आम्ही पिढीजात श्रीमंत. पैशाची आमच्याकडे कधीच कमतरता नव्हती. फिल्म इंडस्ट्रीत काय काय धंदे चालतात हे तुम्हांलाही वाचून माहित असेल. मला ते नको होतं. आणि प्रसिद्धी क्षणभंगुर असते. काही काळानंतर तुम्हांला कुणीही विचारत नाही. मला साधंसुधं जीवन जगायला आवडतं. सामान्य माणसांत मिसळायला, त्यांचे जगण्यामरण्याचे प्रश्न सोडवायला आवडतं. खरं सांगू मला मी सुंदर असल्याबद्दल वाईटच वाटतं. लोक माझी बुद्धीमत्ता, माझं कर्तुत्व, माझ्या भावना, माझ्यातली माणुसकी किंवा इतर काही गुण बघायलाच तयार होत नाहीत हो. ते माझ्या चेहऱ्याकडेच वेड्यासारखे बघत रहातात “

मीही तर तेच करत होतो. मला माझीच लाज वाटून मी चुप बसलो.

“थोडंसं याच्याकडे बघता का? मी जरा डिश धुऊन येते “

ती म्हणाली तसं मी भानावर येऊन होकारार्थी मान हलवली.

ती बेसिनपर्यंत पोहचत नाही तर तिचा मुलगा रडू लागला. मी त्याला शांत करायचा प्रयत्न केला पण तो थांबेना म्हणून मग मी त्याला उचलून घेतलं आणि पॅसेजमध्ये फेऱ्या मारु लागलो. काय गोड होता तो पोरगा! अगदी आईसारखा सुंदर, गोरापान, गुटगुटीत, चमकदार डोळे आणि लालचुटूक ओठांचा. एकदा जवळ घेतलं की सोडावसं न वाटणारा. रडतांनासुध्दा तो अतिशय गोड दिसत होता. मी त्याला थोपटलं तसा तो झोपून गेला.

तेवढ्यात ती आली.

“रडत होता वाटतं! ” तिनं जवळ येऊन त्याला घेतलं आणि बर्थवर झोपवलं.

थोड्यावेळाने आम्ही दोघंही झोपलो. पण झोप आमच्या नशिबातच नसावी. रात्रीतून चार वेळा तिच्या मुलाच्या रडण्याने आम्हांला जागवलं. चारही वेळा मी त्याला घेऊन पॅसेजमध्ये फेऱ्या मारल्या. गंमत म्हणजे तोही माझ्याकडे लगेच येत होता आणि थोडं फिरवलं की खांद्यावर पटकन झोपत होता.

“मागच्या आठवड्यात आम्ही स्वित्झर्लंडला होतो. तिथली थंडी त्याला मानवली नाही म्हणून सर्दीमुळे सारखा किरकिर करतोय ” तिनं स्पष्टीकरण दिलं.

सकाळ झाली. आख्खी रात्र जागरणात गेली होती. प्रत्येक आईच्या रात्री अशाच जागरणात जात असतील का? या विचाराने मी अस्वस्थ झालो. कितीही सुंदर असली तरी आई ती आईच असते. रात्र रात्र मुलांसाठी जागणारी, त्यांच्या सुखासाठी जीवाचं रान करणारी.

एक तासाने नागपूर येणार होतं. आम्ही दोघंही बसून खिडकीबाहेर पहात होतो. रात्रभर जागूनही ती तशीच फ्रेश आणि सुंदर दिसत होती.

“घरी कोणकोण असतं? “तिनं अचानक प्रश्न केला.

“मी, आईवडील, दोन लहान भाऊ आणि एक बहिण. वडिलांनी तब्येतीच्या कारणास्तव स्वेच्छानिवृत्ती घेतलीये “

“अच्छा. म्हणजे तुम्हांला नोकरीची खरी गरज आहे “

“हो तर! वडिलांच्या पेन्शनवर किती दिवस काढणार? “

तिनं लगेच पर्समधून मोबाईल काढला. कोणाशीतरी बोलली. बोलणं झाल्यावर मला म्हणाली “तुम्ही ज्या कंपनीत जाताय तिथं माझे काका मॅनेजिंग डायरेक्टर आहेत. इंटरव्ह्यू तेच घेणार आहेत. मी आताच त्यांच्याशी बोलले. तुमचं नाव सांगा मी त्यांना मेसेज करते “

मी नाव सांगितलं तिनं मेसेज केला.

“तुम्ही भेटलात की त्यांना सांगा संजनाने पाठवलंय म्हणून “

“संजना कोण? ” मी विचारलं

“मीच. माझंच नांव संजना” ती हसून उत्तरली.

“थँक्यू व्हेरी मच मॅडम अँड व्हेरी व्हेरी साॅरी”

“साँरी? कशाबद्दल? ” तिनं आश्चर्याने विचारलं

“काल तुम्ही म्हंटलात तसं इतर पुरुषांसारखं मीही तुमच्याकडे वेड्यासारखा बघत होतो. मी विसरुन गेलो होतो की तुम्ही विवाहीत आहात, एका मुलाची आई आहात. माझी चुक झाली. आय ॲम एक्स्ट्रीमली साॅरी फाॅर दॅट”

तिनं हलकसं स्मित केलं. म्हणाली. ” फरगेट इट. अशा नजरांची मला सवय झाली आहे. स्वतःची बायको सुंदर असतांनाही दुसऱ्या बायकांकडे पहाणारे अनेक पुरुष असतातच की. तुम्ही तर अनमॅरीड आहात. आणि सुंदरतेकडे बघणं वाईट नाही पण त्यात वासना नसावी. तुमच्या नजरेत ती नव्हती. हे मी पहिल्या नजरेतच ओळखलं होतं. नाहीतर मी तुमच्याशी बोललेच नसते “

थोडं थांबून ती म्हणाली “आणि काय हो रात्रभर कटकट न करता आपुलकीने तुम्ही माझ्या मुलासाठी जागताय त्याबद्दल मीही तुमचे आभार मानले पाहीजेत. खरं ना? “

“नाही नाही ” मी घाईघाईने म्हणालो “अहो तुमचा मुलगा इतका गोड आहे की त्याच्यासाठी मी एक रात्र काय दहा रात्री जागून काढायला तयार आहे ” तिनं स्मित केलं आणि प्रेमाने मुलाच्या अंगावरून हात फिरवला.

नागपूर आलं. मी खाली उतरलो. तीही माझ्यामागे मुलाला घेऊन खाली उतरली. निघण्यापूर्वी मी तिच्या मुलाकडे हात पसरले. तो लगेच माझ्याकडे झेपावला. मी त्याला जवळ घेऊन त्याचे मुके घेतले. मग त्याला तिच्याकडे दिलं. रात्रभरात या पोराने मला चांगलाच लळा लावला होता.

“बेस्ट ऑफ लक फाॅर युवर इंटरव्ह्यू. मी फोन केलाच आहे. तुम्हांला कोणतीही अडचण येणार नाही ” ती म्हणाली.

“थँक्यू व्हेरी मच “

जड अंतःकरणाने मी त्यांचा निरोप घेतला.

इंटरव्ह्यूमध्ये अगदी जुजबी टेक्निकल प्रश्न विचारुन एकशेसाठ उमेदवारातून माझी निवड करण्यात आली. त्यामागे संजनाचा तो फोनच होता हे नक्की.

संजना त्यानंतर मला कधीही भेटली नाही. पण नाशिक ते नागपूरच्या त्या दहा तासात ती माझं जन्मभराचं कल्याण तर करुन गेलीच पण आंतरबाह्य सौंदर्य कसं असतं याची खुप चांगली शिकवणही देऊन गेली.

समाप्त

© श्री दीपक तांबोळी

जळगांव

मो – 9503011250

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) –  उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित / मंजुषा मुळे/ गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ “माझी वारी ! माझा अनुभव !”- लेख क्र. ३ ☆ श्री संभाजी बबन गायके ☆

श्री संभाजी बबन गायके

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माझी वारी ! माझा अनुभव ! – लेख क्र. ३ ☆ श्री संभाजी बबन गायके 

ज्ञानबा-तुकाराम गजराचे उद्गाते नारायणबाबा!

आषाढ वद्य अष्टमीला जगदगुरू संत श्री तुकोबाराय पंढरीस प्रस्थान ठेवतात आणि दुस-या दिवशी म्हणजे दशमीला कैवल्य साम्राज्य चक्रवर्ती माऊली महावैष्णव श्री ज्ञानोबाराय पंढरीसाठी निघतात… हा केवळ योगायोग नव्हे!

तुकोबाराय हे ज्ञानोबारायांचे परमभक्त. माऊली ज्ञानोबारायांच्या जन्मानंतर (१२७५) नंतर ३३३ वर्षांनी (१६०८) मध्ये तुकोबाराय देहूत अवतरले. इंद्रायणी देहूतून पुढे अलंकापुरीस जाते!

तुकोबारायांच्या वैकुंठगमनानंतर चार महिन्यांनी मातोश्री जिजाऊ यांच्या पोटी नारायण जन्माला आले… तेच नारायणबाबा अर्थात नारायण महाराज. तुकोबारायांची अध्यात्मिक मिराशी समर्थपणे चालवणारे साधक. घराण्यात पिढ्यान पिढ्या चालत आलेली पंढरीच्या पायी वारीची परंपरा त्यांनीही अंगिकारली. तुकोबाराय देहाने सोबत नसले तरी अभंगरूपाने जग व्यापून उरले आहेत, अशी नारायण महाराजांची खात्री होती. पांडूरंग परमात्म्याच्या या परमभक्तास देहाशिवाय पंढरीची वारी घडवता येईल असा विचार त्यांच्या मनात आला. आणि त्यांनी तुकोबारायांना वारीत सोबत घेण्याचे ठरवले… नव्हे त्यांच्या सोबत वारीला जायचे ठरवले. त्यांनी तुकोबारायांच्या पादुका पालखीत ठेवल्या आणि देहूतून बाहेर पाऊल ठेवले… आणि मग त्यांच्या मनात आले असेल… माऊली सोबत असल्या तर? नारायण महाराज तुकोबारायांना घेऊन थेट अलंकापुरीत दाखल झाले… माउलींना आग्रह केला! आपण दोघेही विठोबाचे लाडके… तुम्ही एकत्रित पंढरीची वाट चालू लागलात तर सबंध मराठी मुलुख तुमच्या आगे-मागे चालत निघेल देवाच्या भेटीला!

पादुकांच्या रुपात आता ज्ञानोबा आणि तुकोबा विराजमान झाले… सोबत चालणा-या भोळ्या भाविकांनी या दोघांच्या नावाचा गजर एकत्रित करायला आरंभ केला आणि महाराष्ट्राला नवा सूर गवसला… ज्ञानबा-तुकाराम… ज्ञानोबा-तुकाराम! ज्यांना ज्ञानोबा हा शब्द उच्चारता येत नव्हता त्यांनी ग्यानबा म्हटलं… तुकाराम सर्वांना म्हणता येत होतंच!

ज्ञानोबा-तुकाराम हा जणू स्वयंभू मंत्र बनला ज्याची जादू आजही कायम आहे.. आणि मराठीचा श्वास असेल तोवर याचे तेज कमी होणार नाही!

काळाच्या ओघात, व्यवहाराच्या प्रवाहात ही परंपरा काही काळ स्थगित झाली… पंढरीनाथाच्या कृपेने ती पुन्हा सुरु झाली. मात्र ही नवी सुरुवात स्वतंत्र मार्गाने सुरु झाली. माऊली ज्ञानोबारायांचे निस्सीम भक्त हैबतबा आरफळकर यांनी आळंदीहून माउलींना स्वतंत्र पालखीत बसवले… राजाश्रय मिळवला… वैभव स्थापित केले… श्रीमंत झाला सोहळा… देहू आणि आळंदी येथून तुकोबा आणि ज्ञानोबा यांच्या दोन स्वतंत्र पालख्या स्वतंत्र मार्गाने एकाच लक्ष्याकडे चालू लागल्या… कालांतराने तुकोबारायांच्या सोहळ्यालाही साजेसे रूप आले… वाटेत काही ठिकाणी या पालख्या एकमेकांना भेटू लागल्या, समांतर चालू लागल्या आणि वाखरी मुक्कामी मोठ्या ओढीने एकमेकांना आलिंगन देत्या झाल्या… भजन मात्र तेच राहिले… ज्ञानोबा-तुकाराम! ज्ञानोबारायांसोबत वाटचाल करणा-या जीवांच्या मुखी एक परवलीचा शब्द रुजला… आणि रुळला… माऊली! तुकोबारायांच्या सोहळ्यातही माऊली-माऊली गजर नित्याचा झाला! गंगा आणि यमुना… विठ्ठल नावाच्या महासिंधुत एकत्रित झाल्या… आणि चंद्रभागेच्या वाळवंटी कैवल्याचं चांदणं कायमचं वस्तीला आलं!

दिंडी म्हणजे केवळ वाटचाल नव्हे. दिंडी म्हणजे ब्रम्हमुहूर्त ते सूर्यास्तापर्यंतचा आखीव-रेखीव, शिस्तबद्ध प्रवास… संतांच्या सहवासात, त्यांच्या साक्षीने आणि मार्गदर्शनाखाली होत असलेला! इथे संत म्हणजे राजे. तेच वैभव, तोच दिमाख आणि तेच राजस उपचार. शाही स्नान, हत्ती, घोडे, सैन्य, अब्दागिरी, पताका आणि नामाचा गजर! वारीत नामस्मरण हे मुख्य कर्म. त्याचे नेतृत्व करणारे ज्येष्ठ, अनुभवी साधक म्हणजे विणेकरी! सर्वांच्या पुढे चालणारे, भजनाचे नेतृत्व करणारे आणि स्वर-ताल यांचे सूत्रसंचालन करणारे. त्यांच्या मागे दोनच्या रांगांत पुरुष वारकरी, त्यांच्या मागे महिला, त्यांच्यामध्ये डोईवर तुळशीवृंदावन धारण केलेल्या भगिनी, शिस्त आणि संरक्षणकार्यासाठी दंडधारी चोपदार. माऊली-तुकोबाराय रथात आरूढ होण्याआधी रथांच्या मागे-पुढे शिस्तीत उभे राहते दिंडी. आणि मग नित्योपचार आरंभ होतो. इथं सगळा भार शब्द आणि तालावर. साथीला टाळांचा मधुर गजर. ज्यांच्या हाती टाळ नाहीत त्यांच्या हातात टाळी! आरंभ काकड आरतीच्या अभंगांनी… मग रूपाचे अभंग… मग विषयवार, वारानुसार निवडक अभंगांचे क्रमवार गायन. चाल साधी… चालता चालता सहजी गाता यावी अशी. चरणासाठी अर्थात तुका म्हणे, नामा म्हणे, ज्ञानदेव म्हणे इथपासून स्वतंत्र चाल लावण्याची मुभा… रागदारीचा अविष्कार करण्याची संधी… गायकांना आणि श्रोत्यांना आनंद देणारी! अट एकच शब्द केवळ आणि केवळ संतांचेच असावेत. आयुष्यभर गायले तरी पुरतील अशी अभंगसंपदा आपल्याकडे आहे. तुकोबारायांचे तर हजारो. संतपंचक अर्थात ज्ञानोबाराय, तुकोबाराय, नामदेवराय, नाथमहाराज, निळोबाराय… यांचे अभंग अगणित. जोडीला मुक्ताई, जनाई, बहिणाई आहेतच… वाट कधी सरते समजतही नाही… उपदेश आणि वाटचाल एकमेकांच्या स्वरांत स्वर मिसळून चालत राहतात. दिंड्यांना स्वतंत्र क्रमांक दिलेले असतात. रथापासून पहिली दिंडी आणि तिच्या पुढे दोन, तीन असे वाढते क्रमांक… आणि रथामागची पहिली दिंडी… आणि त्या मागे दोन, तीन अशा क्रमाने मागे. यात कुणी हस्तक्षेप करायचा नसतो. एकामागून चालायचे. दुपारच्या भोजनाच्या विश्रांतीनंतर माऊली निघायच्या आधी सर्वांनी क्रमांकाने उभे राहायचे म्हणजे रहायचेच. चोपदार सकाळी निघताना शंखनाद करतात तसा प्रत्येक वेळी प्रवास सुरु करण्यापूर्वीही करतात. त्यांच्या हातातील दंड म्हणजे इशारा… त्यानुसार थांबावे किंवा पुढे चालावे.

मुक्कामाचे ठिकाण नजरेच्या टप्प्यात येईतोवर संपूर्ण भजनी मालिकांचे आवर्तन पूर्ण होते. यात आंधळा, पांगुळ, वासुदेव, भारुडे, गौळणी सर्व ओळीने हजेरी लावून जातात. मग अवतरतो हरिपाठ… माऊली ज्ञानोबारायांचे शब्दवैभव, विचारसंगती मिरवणारा… याची चाल ठरलेली. हरिपाठ सुरु करा असा निरोप एकमेकांना दिला जातो आणि संपूर्ण सोहळा या पाठ असलेला हरी उच्चारत वाट चालतात. समाधी संजीवन हरिपाठ… या शब्दांपाशी अवघा सोहळा काहीसा थबकतो… स्वत:भोवती एक प्रदक्षिणा घेतली जाते. एवढ्यात पालखी तळ समीप येतो. मानाचा अश्व ‘समाज आरतीचा’ आदेश घेत दौडत येतो… त्याच्यासाठी दिंड्या मधून मार्ग देत राहतात… आरतीच्या तालावर वारकरी दिवसाच्या चालीचे कष्ट विसरून जातात… माऊली, तुकोबाराय, तसेच इतर सर्व संत… नेमून दिलेल्या मुकाम्माच्या ठिकाणी जातात… वारकरी तंबू-राहुट्या शोधतात… आणि स्थिरावतात. प्रवचन सेवा होते… स्वयंपाक होत आलेला असतो… नैवेद्य जातो… भोजनाच्या पंगती पडतात… अंधार गडद होत असतो… नेमाचे वारकरी एका तंबूत हरीजागरासाठी जमा होतात… आणि पापण्या जडावलेले इतर वारकरी पुन्हा अभंगवाणी अनुभवत निद्रेच्या अधीन होतात! … उद्या नवा गाव… पण शब्द हेच… ज्ञानोबा-तुकाराम!

(नारायणमहाराज आणि हैबतबाबा यांचे उपकार डोंगराएवढे… त्यांनी स्वर्गीही नसलेला हा सुखसोहळा मराठी मातीत रुजवला… दोघेही वंदनीय. माहितीमध्ये काही त्रुटी संभवतात. सांगायचे राहून गेले असेलच… क्रमही चुकलेला असेल… पण वारी अनुभवली असल्याने काही लिहिता येते आहे.)

– लेख क्र. ३ 

© श्री संभाजी बबन गायके 

पुणे

9881298260

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ “वसुली अशीही” ☆ श्री मंगेश मधुकर ☆

श्री मंगेश मधुकर

? मनमंजुषेतून ?

☆ “वसुली अशीही…” ☆ श्री मंगेश मधुकर

गेले तीन दिवस सतत पडणाऱ्या पावसाचा जोर रात्रीपासूनच वाढलेला. सलग पाऊस असूनही आश्चर्य म्हणजे अजून लाइट गेले नव्हते. सकाळी सातची वेळ, रविवार असल्यानं बाहेर जाण्याची गरज आणि इच्छा दोन्ही नव्हतं. म्हणून निवांत होतो इतक्यात दूध संपलंय, आणावं लागेल अशी शुभवार्ता सौंकडून आली. छत्री घेऊन निघालो. धुवाधार पावसामुळे जो तो आपापल्या घरात असल्यानं सोसायटीत सामसूम मात्र गेटजवळ भर पावसात रेनकोट घालून चक्क एकजण कार धुताना दिसला. ते पाहून हसायला आलं. दिवसेंदिवस लोकांच्या वागण्यातला विचित्रपणा वाढत चाललाय. कुठं, कोण, कसं वागेल याचा नेम राहिला नाही. दूध घेऊन घरी जाताना गाडी धुणं सुरूच होतं. तुफान पावसात इमानेइतबारे गाडी धुणाऱ्याजवळ गेलो. माझ्याकडे पाहत तो हसला.

“काय झालं. असं का पाहताय”

“रागावू नका. एक विचारू” मी.

“माहितीये, काय विचारणार?”

“पावसात गाडी धुणं विचित्र वाटत नाही.”

“गाडी धुण्याचे पैसे घेतो”

“इतरवेळी ठीक आहे पण जोरात पाऊस आहे तरीही?”

“नाईलाज!!”

“म्हणजे”

“पैशेवाल्यांपुढे अक्कल चालवायची नसते”

“कळलं नाही”

“रोज गाडी धुण्याचे साहेब पैसे देतात. पावसामुळे दोन दिवस गाडी धुतली नाही”

“बरोबर केलंत”

“त्यामुळे साहेब संतापले. आता दोन दिवसांचे पैसे कट करणार असं म्हणाले म्हणून भर पावसात गाडी धुतोय.”

“साहेब, फारच हुशार दिसतायेत”

“अति…” म्हणत पावसाच्या पाण्यानं भरलेली बादली भसकन गाडीवर ओतत त्यानं राग व्यक्त केला.

– – पैसे पुरेपूर वसूल करून घेण्याची वृत्ती वाढतीये.

 

© श्री मंगेश मधुकर

मो. 98228 50034

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक ७७ आणि ७८ ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

श्री विश्वास देशपांडे

? इंद्रधनुष्य ?

☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक ७७ आणि ७८ ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

श्लोक क्र. ७७ — – 

करी काम नि:काम या राघवाचे ।

करी रूप स्वरूप सर्वा जिवांचे ।

करी छंद निर्द्वंद्व हे गूण गाता ।

हरिकीर्तनी वृत्तिविश्वास होता ।।७७।।

अर्थ : या राघवाच्या प्राप्तीची मनापासून कामना कर. सकल प्राणिमात्रांच्या ठायी असलेले त्याचे रूप स्वत:मध्येही पहा. त्याचे गुणगान करण्याचा छंद लागला की सारे भेद, द्वंद्व नाहिसे होतील.

(नि:काम – निष्काम होऊन/निरिच्छ वृत्तीने, निर्द्वंद्व – सुखदुःखाच्या पलीकडे जाणे /द्वैतभाव नष्ट होणे, हरिकीर्तन – परमेश्वराचे गुणगान करणे)

विवेचन : परमेश्वर प्राप्तीची इच्छा असणाऱ्या साधकाने कसे वागावे ते समर्थ या श्लोकामध्ये आपल्याला सांगतात. आपण सामान्य प्रापंचिक माणसे आहोत. आपल्या मनात निरनिराळ्या इच्छा, वासना वेळोवेळी उद्भवत असतात. जोपर्यंत वासना आहेत, तोपर्यंत परमेश्वर प्राप्ती होणार नाही. आपण परमेश्वराची प्रार्थना, ध्यान करतो ते सुद्धा मनात काहीतरी इच्छा ठेवूनच. त्यामुळे एक वेळ आपल्या त्या कामना पूर्ण होतील पण ईश्वर मात्र आपल्यापासून दूरच राहील. म्हणून इतर सर्व वासनांचा त्याग करून मला अन्य काही नको. फक्त परमेश्वर हवा आहे अशा अनन्य भावनेतून जर आपण त्याचे गुणगान केले तर त्याचा एक परिणाम असा होईल की हळूहळू आपल्या इतर वासना नाहीशा व्हायला लागतील. देहबुद्धी कमी होईल.

त्या गोष्टीचे मात्र आपल्याला सतत ध्यान लागले पाहिजे. त्याचा छंद किंवा वेड लागले पाहिजे. असे झाले म्हणजे आपल्या अंतर्यामी असणारा ईश्वर हळूहळू या विश्वात सर्वत्र विद्यमान आहे याची जाणीव होईल. तो जसा माझ्यात आहे तसाच सर्व प्राणीमात्रात देखील आहे याची जाणीव दृढ होत जाईल. तो केवळ सजीवात नसून निर्जीवात किंवा सृष्टीच्या कणाकणात त्याचे अस्तित्व आहे हे जाणवेल. भक्त प्रल्हादाचे उदाहरण आपल्याला माहिती आहे. प्रल्हादाचा पिता हिरण्यकश्यपू देवांना आपला शत्रू समजत होता. पण अशा या असुराचा मुलगा प्रल्हाद मात्र विष्णूचा भक्त होता. जेव्हा हिरण्यकश्यपूने त्याला विचारले, ” कुठे आहे तुझा ईश्वर? ” तेव्हा त्याने सांगितले की तो या सर्व चराचरात भरून राहिला आहे. मग हिरण्यकश्यपूने विचारले की या निर्जीव अशा खांबात देखील तो आहे का? तेव्हा प्रल्हादाने होय उत्तर दिले. नंतर त्याच स्तंभातून परमेश्वराने नरसिंह रूप धारण करून दुराचारी अशा हिरण्यकश्यपूचा वध केला.

पैठणच्या ब्रह्मवृंदासमोर ज्ञानदेवांनी सर्वांभूती एकच ईश्वर आहे हे रेड्याच्या मुखातून वेद वदवून सिद्ध केले. संत एकनाथांनी तृषार्त अशा गाढवाला गंगेचे पाणी पाजून त्याचा आत्मा शांत केला आणि सर्वांचा आत्मा एकच आहे याचा प्रत्यय लोकांना आणून दिला. भगवंताच्या भक्तीने या सगळ्या संतांच्या मनातील द्वंद्व नाहीसे झाले होते.

त्याप्रमाणे हरिनामाचे गुणगान केले की आपल्याही जाणिवा हळूहळू सूक्ष्म व्हायला लागतात. मनातील द्वंद्व नाहीसे होते. या जगामध्ये विविध रंग आणि रूपात तोच नटलेला आहे याचा साक्षात्कार होतो. जसे वेगवेगळ्या भांड्यात भरून ठेवलेले पाणी त्या भांड्याच्या आकारात राहते. पण पाणी एकच असते. सोन्याचे दागिने विविध प्रकारचे आणि आकाराचे असतात. पण त्यातील सोने एकच असते. त्याप्रमाणेच या विश्वात परमेश्वरच सगळीकडे भरून राहिला आहे ही जाणीव दृढ होत जाते. संत ज्ञानेश्वर म्हणतात, ” हे विश्वची माझे घर, ऐसी मती जयाची स्थिर, किंबहुना चराचर आपणचि जाहला. ” अशी साधकाची अवस्था होते. म्हणून आपण निर्वासन होऊन फक्त एका परमेश्वराचीच वासना धरावी असे समर्थांचे सांगणे आहे.

स्वसंवाद :: 

१. माझी आजची भक्ती किंवा प्रार्थना ही देवाला काहीतरी ‘मागण्यासाठी’ (सकाम) आहे, की मी केवळ त्याच्या ‘स्वरूपासाठी’ (निष्काम) त्याची आराधना करतोय?

२. संतांनी गाढवात किंवा खांबातही देव पाहिला; मी माझ्या दैनंदिन जीवनात माझ्या आजूबाजूच्या माणसांमध्ये, प्राण्यांमध्ये तोच ईश्वरी अंश पाहू शकतो का?

३. माझ्या मनातील ‘आपले-परके’, ‘चांगले-वाईट’ हे द्वंद्व किंवा भेद नष्ट व्हावेत म्हणून माझ्या ठायी रामनामाचा ‘वृत्तीविश्वास’ दृढ झाला आहे का?

४. ज्ञानेश्वर माऊलींनी म्हटल्याप्रमाणे “हे विश्वचि माझे घर” ही भावना माझ्या मनात रुजण्यासाठी मी माझ्या संकुचित विचारांचा ‘छेद’ (त्याग) करायला तयार आहे का?

– – – – 

श्लोक क्र. ७८ – – 

अहो ज्या नरा रामविश्वास नाही ।

तया पामरा बाधिजे सर्व काही ।

महाराज तो स्वामी कैवल्यदाता ।

वृथा वाहने देहेसंसारचिंता ।।७८।।

अर्थ : ज्या मनुष्याचा परमेश्वरावर विश्वास नाही, त्या माणसाला (पामराला) सर्व प्रकारची संकटे त्रास देतात. भगवंत महाराज म्हणजे राजांचा राजा आहे, या विश्वाचा स्वामी म्हणजे मालक आहे, तो कैवल्यदाता म्हणजे मोक्ष देणारा आहे. असा हा सर्वशक्तिमान परमेश्वर आपली काळजी वाहण्यास समर्थ असताना आपण उगाच देहाची आणि संसाराची चिंता करीत बसतो.

(पामर – क्षुद्र /हीन /दीन /दुबळा, बाधणे – त्रास होणे, कैवल्यदाता – मोक्ष देणारा, वृथा – व्यर्थ)

विवेचन : आधीच्या श्लोकात समर्थांनी श्रीरामावर निष्काम श्रद्धा ठेवून त्याचे नामस्मरण केल्यास मनातील द्वंद्व नाहीसे होते. सर्व जीवांच्या मध्ये तो एकच परमात्मा व्यापून राहिला आहे असा साक्षात्कार होतो असे सांगितले आहे. या श्लोकात ज्याचा रामावर विश्वास नाही अशा माणसाचा खरपूस समाचार समर्थ घेतात. अशा माणसाला ते पामर म्हणतात. पामर म्हणजे क्षुद्र, हीन. गरीब आणि पामर यात फरक करता येतो. गरीब माणूस आपल्या कर्तृत्वाने स्वतःची उन्नती करून घेऊ शकतो. पामर हा त्या दृष्टीने महामूर्ख म्हणावा लागेल. कारण आपले हित कशात आहे हे त्याला कळत नाही. ज्यांची परमेश्वरावर श्रद्धा नाही, अशा माणसांना समर्थ पामर म्हणतात. मग तो ऐहिक दृष्ट्या भलेही श्रीमंत असेल, पण पारमार्थिक दृष्ट्या अभागी आणि हीन दीन.

असा माणूस आर्थिक दृष्ट्या भलेही सधन असेल पण प्रपंचात येणाऱ्या संकटांनी तो खचून जातो. प्रपंचातील संकटांचे तडाखे भल्याभल्यांना सोसवत नाहीत. छोट्यामोठ्या गोष्टींनीही अशी माणसे विचलित होतात. समर्थांच्या शब्दात सांगायचे तर अशा माणसांना संसार आणि त्यातील अडचणी बाधक ठरतात. पण ज्यांची रामावर श्रद्धा आहे, अशा माणसांना प्रपंचातील संकटे विचलित करीत नाहीत. त्यांना संकटे येत नाहीत असे नाही. पण भगवंतावर सर्व भार टाकल्यामुळे त्यांना अशा गोष्टींचा त्रास होत नाही.

या श्लोकात भगवंताच्या गुणांचे वर्णन करताना समर्थ तीन विशेषणे वापरतात. तो ‘महा ‘राज आहे, स्वामी आहे आणि कैवल्यदाता आहे. महाराज म्हणजे महान राजा. राजांचा राजा. रामराज्य होऊन आज हजारो वर्षे लोटली तरी रामराज्याची कल्पना आजही लोकांना भावते. रामराज्य म्हणजे आदर्श राज्य होते. राम हा आदर्श राजा. दुसरी गोष्ट म्हणजे तो या चराचराचा स्वामी आहे. इंग्रजी शब्द वापरायचा तर तो ‘ सुप्रीम पॉवर ‘ आहे. या विश्वाचा निर्माता, पालनकर्ता आणि संहारकर्ता तोच आहे. तिसरी गोष्ट म्हणजे तो कैवल्यदाता आहे. कैवल्यदाता म्हणजे मुक्ती किंवा मोक्ष देणारा. ज्याने ज्याने रामनाम घेतला, तो तरून गेला. मग तो वाल्या कोळी असेल, भक्त प्रल्हाद असेल, रामनाम घेणारी शबरी असेल किंवा अहिल्या असेल. हनुमंत आणि बिभीषण हे रामाचे भक्त तर चिरंजीव झाले.

थोडक्यात सांगायचे झाले तर श्रीराम म्हणजे कल्पवृक्ष आहेत. कल्पवृक्ष हा इच्छिलेले देणारा असतो. त्याच्या सावलीत बसून आपण काय मागायचे हे आपल्यावर आहे. तो आपल्याला जन्म मृत्यूच्या फेऱ्यातून मुक्ती देणारा आहे. कैवल्य प्रदान करणारा आहे. असा हा भगवंत आपल्या पाठीशी असताना आपण देहाची आणि संसाराची व्यर्थ चिंता वाहत असतो. माझे कसे होईल, माझ्या मुलाबाळांचे, नातवंडांचे कसे होईल अशी चिंता आपण करीत बसतो. तर कोणाला या जगाचे कसे होईल अशा प्रकारची चिंता. अशा अनेक प्रकारच्या चिंतांनी सामान्य माणूस गोंधळून जातो.

समर्थ म्हणतात, ‘ मनी मानवा व्यर्थ चिंता वाहते, अकस्मात होणार होऊन जाते. ‘ प्रारब्धानुसार जे घडायचे असते, ते घडणारच असते. आपण मात्र व्यर्थ चिंता करीत बसतो. त्यापेक्षा आपण त्याच्यावर विश्वास ठेवून सर्व भार त्याच्यावर सोपवावा. याचा अर्थ मात्र असा नाही की आपल्या वाट्याला आलेले कर्म न करता स्वस्थ बसायचे. अर्जुनाला कर्तव्यप्रवण करण्यासाठीच तर भगवंताने गीता सांगितली ना! तेव्हा त्याच्यावर विश्वास ठेवून आपल्या वाट्याला आलेले निहित कर्म उत्तम प्रकारे करावे. तोच पुरुषार्थ आहे. इतर गोष्टी परमेश्वरावर सोपवाव्यात. तुकाराम महाराज म्हणतात, “घालू देवासीच भार, देव सुखाचा सागर. “मग देहाच्या आणि प्रपंच्याच्या चिंता आपल्याला सतावणार नाहीत.

स्वसंवाद :: 

१. “माझे कसे होईल? माझ्या कुटुंबियांचे कसे होईल? ” या विचारसरणीत अडकून मी समर्थांनी म्हटल्याप्रमाणे प्रपंचाची ‘वृथा’ (व्यर्थ) चिंता करत बसलो आहे का?

२. संकटाच्या काळात मी एका ‘पामरा’सारखा विचलित होऊन खचून जातो, की भगवंतावर संपूर्ण भार टाकून खंबीरपणे परिस्थितीचा सामना करतो?

३. कल्पवृक्षाप्रमाणे असणाऱ्या श्रीरामाच्या चरणी आल्यावर मी त्याच्याकडे केवळ तात्पुरती ऐहिक सुखे मागत आहे, की चिरंतन शांती आणि मोक्षाची आस धरतो आहे?

४. तुकाराम महाराजांनी म्हटल्याप्रमाणे, “देव सुखाचा सागर” आहे यावर माझा पूर्ण विश्वास आहे का? मी माझे निहित कर्म करून उरलेला भार त्याच्यावर सोपवायला शिकलो आहे का?

– क्रमशः श्लोक श्लोक ७७ आणि ७८

© श्री विश्वास देशपांडे

चाळीसगाव

प्रतिक्रियेसाठी ९४०३७४९९३२

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ “अवयवदान…” ☆ श्री सुनील देशपांडे ☆

श्री सुनील देशपांडे

? इंद्रधनुष्य ?

☆ “अवयवदान…”  ☆ श्री सुनील देशपांडे ☆

जुलै महिना हा अवयवदान प्रबोधन महिना म्हणून नोटो म्हणजेच भारत सरकारच्या आरोग्य विभागाने जाहीर केला आहे. त्यानिमित्ताने एक लेख – – जास्तीत जास्त लोकांमध्ये तो पसरवून लोकांना अवयवदानाबाबत जागृत करण्यासाठी मी सर्वांना आवाहन करीत आहे.

आपलं शरीर हे एक अजब असं स्वयंचलित यंत्र आहे. सदर यंत्रामध्ये दोन केंद्रे आहेत. त्यातलं एक ऊर्जा केंद्र आणि दुसरं आज्ञा केंद्र. या ऊर्जा केंद्राला आपण हृदय असे म्हणतो आणि आज्ञा केंद्राला आपण मेंदू असे म्हणतो. या दोन्ही केंद्राद्वारे आपल्या शरीरातील सर्व व्यवहाराचे नियंत्रण होत असते. आपल्या शरीराचे वेगवेगळे भाग असतात. जसे की हात, पाय, डोकं, नाक, कान, डोळे वगैरे. या सर्व शरीराच्या भागांना अवयव असे म्हणतात. आत्ता मी सांगितले ते सर्व शरीराचे बाह्य अवयव आहेत. त्याचप्रमाणे शरीराच्या आत मध्ये विविध भाग असतात उदा. यकृत, जठर, फुफ्फुस, हृदय, मूत्रपिंड, स्वादुपिंड, वगैरे. या सर्व शरीराच्या आत मध्ये असलेल्या भागांना अंतर्गत अवयव असे म्हणतात. आपलं संपूर्ण शरीर हे बाह्य अवयव आणि अंतर्गत अवयव यांचे द्वारे बनलेले असे अजब यंत्र आहे.

यंत्राचा जेव्हा एखादा भाग बिघडतो तेव्हा यंत्रातला तो भाग काढून दुसरा भाग बसवून ते यंत्र पुन्हा चालू केले जाते. यंत्राचे सुट्टे भाग कंपन्यांकडून विकत मिळतात. त्यामुळे यंत्राचा बिघडलेला भाग दुसऱ्या भागाने बदलून ते यंत्र पुन्हा कार्यरत करता येते. परंतु शरीर हे एक असे अजब यंत्र आहे की त्या यंत्राचा कोणताही भाग कोणत्याही कारखान्यात किंवा शरीराबाहेर कोठेही तयार होत नाही किंवा तयार करून मिळत नाही. शरीराचा भाग हा मानवाच्या शरीरातच तयार होतो आणि तो शरीरातच उपलब्ध असतो.

वर्षानुवर्षे मानवाच्या आत्तापर्यंतच्या इतिहासात बऱ्याच वर्षांपूर्वीपर्यंत मानवाच्या शरीरातला एखादा भाग बिघडला की मानवाचे आयुष्य संपून तरी जाते किंवा त्या मानवाला अपंगत्व किंवा काहीतरी शारीरिक कमतरता निर्माण होते.

बिघडलेल्या अवयवामुळे निर्माण होणारी कमतरता अथवा मृत्यू ही गोष्ट असाहाय्यपणे सहन करण्याशिवाय त्या माणसाकडे व त्याच्या कुटुंबीयांकडे पर्याय राहिलेला नसतो.

परंतु आधुनिक वैद्यकशास्त्राने यातील अनेक व्याधींवर संशोधन करून त्यामध्ये नवीन उपचार पद्धती निर्माण केली आहे त्या उपचार पद्धतीला अवयव प्रत्यारोपण असे म्हणतात.

प्रत्यारोपण म्हणजे खराब झालेल्या अवयवाच्या ठिकाणी तो अवयव काढून दुसरा चांगला अवयव बसवणे. परंतु त्यासाठी दुसरा चांगला अवयव उपलब्ध असणे आवश्यक असते आणि आपण पाहिलेच आहे की कोणताही मानवी अवयव कोणत्याही दवाखान्यात किंवा कारखान्यात बनविता येत नाही. तो दुसऱ्या माणसाच्या शरीरातूनच उपलब्ध झाल्यास, तेही चांगल्या गुणवत्तेचा अवयव उपलब्ध झाल्यास खराब झालेल्या अवयवाच्या जागी बदलून बसवता येतो. पण हे कसं घडणार? त्यासाठीच आवश्यक आहे ते म्हणजे ‘अवयवदान’

अवयवदान म्हणजे आपल्या शरीरातील चांगल्या अवयवाचे दुसऱ्याच्या शरीरातील खराब अवयवाच्या ठिकाणी बसवण्यासाठी आपल्या चांगल्या तऱ्हेने कार्यरत असलेल्या अवयवाचे दिलेले दान. हे अवयवदान दोन प्रकाराने करता येते

एक जिवंतपणी आणि दुसरे मृत्यूनंतर.

आता आपण त्याचा उहापोह करूया.

कोणताही अवयव मला माझ्या जगण्यासाठी माझ्या शरीरामध्ये उपलब्ध असावा लागतो. तो नसल्यास माझ्या जीवनाचे काय होईल? आणि त्यामुळे मी एखादा अवयव जिवंतपणे कसा बरे देऊ शकेन? हा महत्त्वाचा प्रश्न आहे.

जिवंतपणी कोणतीही व्यक्ती आपल्या जवळच्या नातेवाईकांना काही अवयवांचे दान करू शकते ते अवयव म्हणजे

१) दोन पैकी एक किडनी म्हणजेच मूत्रपिंड.

२) लिव्हरचा म्हणजेच यकृताचा काही भाग.

३) फुफ्फुसाचा काही भाग,

४) स्वादुपिंडाचा काही भाग,

५) आतड्याचा काही भाग.

६) गर्भाशय

कोणत्याही व्यक्तीचे आयुष्य एका किडनी वर म्हणजेच मूत्रपिंडावर व्यवस्थित व्यतीत होऊ शकते. त्यामुळे एक किडनी दान केल्याने त्याला कोणताही शारीरिक धोका संभवत नाही. त्याच प्रमाणे इतर ज्या अवयवांचे काही भाग आपण दुसऱ्या शरीरात प्रत्यारोपित करतो ते अवयव दोन्ही शरीरात काही कालावधीनंतर पूर्ण आकार धारण करून संपूर्ण पणे कार्यरत होतात. तशी शक्यता असेल तरच डॉक्टर अशा अवयवांचा काही भाग काढून घेण्यास मान्यता देतात. त्यामुळे एखाद्याच्या शरीरातून असे काही भाग काढून घेतल्यास त्याला पुढील आयुष्यात कोणताही शारीरिक धोका संभवत नाही.

एखाद्या स्त्रीचे गर्भाशय चांगल्या रीतीने कार्यरत असून त्या स्त्रीला पुढे मूल नको असल्यास त्या स्त्रीच्या शरीरातून गर्भाशय काढून ज्या स्त्रीच्या शरीरात गर्भाशय नाही किंवा असलेले गर्भाशय नीट कार्यरत होऊ शकत नाही अशा स्त्रीच्या शरीरात ते प्रत्यारोपित करता येते व त्यामुळे त्या स्त्रीला मूल होऊ शकते.

जिवंतपणी वरील प्रमाणे सर्व अवयव दान करून गरजू रुग्णाच्या आयुष्यात आनंद फुलवता येतो आणि दात्याला कोणताही शारीरिक धोका नसतो हे जाणून घेतले पाहिजे.

यातील दुसरा भाग म्हणजे मृत्यूनंतरचे अवयवदान.

अनेक वर्षापासून मृत्यूची व्याख्या ही हृदयक्रिया बंद पडल्यानंतर मृत्यू होतो अशीच आहे. त्यामुळे सहसा हृदयक्रिया बंद पडली की मृत्यू आला अशी व्याख्या केली जायची. सर्व धर्मांनी ही हृदयक्रिया बंद पडल्याने मृत्यू होतो अशीच मृत्यूची व्याख्या केली होती. परंतु आपण या लेखाच्या सुरुवातीला सांगितल्याप्रमाणे. आपल्या शरीराची दोन नियंत्रण केंद्रे असतात त्यातील पहिले हृदय असते. परंतु दुसरे एक नियंत्रण केंद्र म्हणजे मेंदू. ज्याप्रमाणे हृदय बंद पडल्यानंतर मनुष्याचा मृत्यू होतो त्याचप्रमाणे मेंदू बंद पडल्यानंतरही माणसाचा मृत्यू निश्चित असतो. म्हणूनच मृत्यू दोन प्रकारचे असतात हे आता आधुनिक विज्ञानाने सप्रयोग सिद्ध केलेले आहे. हृदयाचा मृत्यू आणि मेंदूचा मृत्यू – – – 

– – हृदयाचा मृत्यू झाल्यानंतर फक्त तीन मिनिटांमध्ये शरीरातील सर्व अंतर्गत अवयव बंद पडतात आणि पूर्णपणे निरुपयोगी ठरतात. परंतु बाह्य अवयवांपैकी नेत्र आणि त्वचा या दोन अवयवांच्या बाबतीत अपवाद ठरू शकतो. मृत्यूच्या घटकेनंतर साधारणपणे सहा तासापर्यंत हे अवयव खराब होत नाहीत. अर्थात सर्वसामान्यांच्या भाषेत रूढ झाले म्हणून जरी आपण त्यांना अवयव म्हणत असलो तरी तांत्रिक शास्त्रीय भाषेत त्यांना उती म्हणजेच टिशू असे संबोधले जाते. या टिशूंचे वैशिष्ट्य म्हणजे त्यांचा रक्ताशी संबंध नसतो त्यामुळे कोणत्याही माणसाच्या टिशू कोणाही माणसाच्या शरीरास प्रत्यारोपण करता येतात त्यासाठी रक्तगट जुळण्याची आवश्यकता नसते….. त्यामुळे मृत शरीरामधील कॉर्निया व त्वचा म्हणजेच स्किन हे दोन टिशूवर्गीय अवयव मृत्यूनंतर सहा तासाच्या आत काढून घेऊन दुसऱ्याच्या शरीरावर प्रत्यारोपण करण्यासाठी वापरता येतात. त्यामुळे कोणत्याही व्यक्तीला अवयवदान करायचे असल्यास त्याच्या मृत्यूनंतर किमान नेत्र व त्वचा दान करता येतेच…… शरीराचे अंतर्गत अवयव मात्र एका विशिष्ट परिस्थितीमध्येच प्रत्यारोपणासाठी उपयोगी ठरू शकतात आणि त्या परिस्थितीतच ते दान करता येतात. त्याबद्दल आपण विस्तृत चर्चा करू.

कल्पना करा की माझा अपघात झालेला आहे आणि त्या अपघातामध्ये माझ्या मानेला जोराचा मार बसलेला आहे आणि मी बेशुद्ध असून मला दवाखान्यात ऍडमिट केलेले आहे. या परिस्थितीत ऍडमिट केल्या केल्या कोणत्याही दवाखान्यामध्ये डॉक्टर प्रथम पेशंटला अति दक्षता विभागात ठेवून त्याला व्हेंटिलेटर लावतात. कारण त्याच्यावर उपचार करत असताना मधूनच त्याचा श्वास बंद पडू नये याची काळजी घेण्यासाठी हा व्हेंटिलेटर लावला जातो. व्हेंटिलेटर हे एक कृत्रिम श्वसन यंत्र असते आणि या यंत्रांमुळे माणूस स्वतः श्वसन करण्यास सक्षम नसेल तर या यंत्राद्वारे कृत्रिमरीत्या त्याचा श्वासोच्छ्वास चालू ठेवता येतो. जर श्वासोच्छ्वास चालू असेल तरच हृदयाचे कार्य चालू ठेवता येते. अशा परिस्थितीत डॉक्टर जेव्हा रुग्णावर उपचार करत असतात त्यावेळी जर पेशंटची मानेच्या मागील बाजूस असलेली ब्रेन स्टेम म्हणजेच मेंदूस्तंभ नावाची ही कांडी तुटलेली असेल तर पेशंटचा मेंदूशी संपर्क पूर्णपणे नष्ट होतो. तसेच जर डोक्याच्या कवटीला मार लागला असेल आणि मेंदूमध्ये रक्तस्त्राव झाला असेल तरीही मेंदूचे कार्य बंद पडू शकते.

अपघात न झालेल्या रुग्णाला सुद्धा जर ब्रेन हॅमरेज मुळे मेंदूत रक्तस्त्राव झाला असेल तर.

म्हणजेच कोणत्याही कारणामुळे एकूणच शरीराचा मेंदूशी संपर्क तुटणे किंवा मेंदूचे कार्य रक्तस्त्राव होऊन बंद पडणे या दोन्ही स्थितीला ब्रेन डेड म्हणजेच मेंदू मृत्यू किंवा मस्तिष्क स्तंभ मृत्यू असे संबोधले जाते. सर्वसामान्यांच्या भाषेत मेंदू मृत्यू असे आपण म्हणू शकतो.

ही स्थिती अत्यंत महत्त्वाची असते यावेळी मेंदूचे कार्य बंद असले तरीही व्हेंटिलेटर चालू असल्याने रुग्णाचा श्वासोच्छ्वास कृत्रिमपणे का होईना चालू असतो, त्यामुळे हृदयक्रिया चालू असते. त्यामुळे माने खालील सर्व शरीर हे रक्ताभिसरणामुळे जिवंत आहे असे वाटण्याची शक्यता असते. छातीमध्ये हृदयाची धडधड स्पष्टपणे दिसू शकते पण तरीही मेंदू मृत झालेला असेल तर व्हेंटिलेटर काढल्या काढल्या त्या रुग्णाचा मृत्यू 100% निश्चित असतो. म्हणजेच ब्रेन डेड याचा अर्थ जिवंत सदृश्य मृत्यू असेही आपण म्हणू शकतो.

हा खरा मृत्यू आहे किंवा नाही हे तपासण्यासाठी अपनी या नावाची एक टेस्ट असते ही टेस्ट चार डॉक्टरांची सरकार नियुक्त समिती सहा तासाच्या अंतराने दोन वेळेला करते. दोन्ही वेळेला ती टेस्ट पॉझिटिव्ह आली तर या समितीतर्फे त्या रुग्णास ब्रेन डेड असे घोषित केले जाते. ब्रेन डेड म्हणजे शंभर टक्के मृत्यूच.

अशा जिवंत सदृश्य मृत्यू परिस्थितीमध्ये माने खालील शरीरामधील सर्व अंतर्गत अवयव कार्यरत असतात. सामान्य यांत्रिक भाषेत म्हणायचे तर ते वर्किंग कंडिशन मध्ये असतात. असे कार्यरत अवयवच फक्त एका शरीरातून काढून दुसऱ्या शरीरात प्रत्यारोपित करता येतात.

याचा अर्थ असा रुग्ण मृत्यूशयेवर हॉस्पिटल मधील आयसीयू मध्ये असल्यास व डॉक्टरांच्या समितीने त्याला ब्रेन डेड घोषित केले असल्यास मगच त्याचे अवयव प्रत्यारोपणासाठी उपलब्ध होऊ शकतात. परंतु त्याही परिस्थितीत ब्रेनडेड रुग्णाच्या वारसांनी अवयव प्रत्यारोपणासाठी मान्यता दिलेली असणे कायद्याने आवश्यक असते.

– – – आता आपण असे समजू की वरील सर्व परिस्थिती सकारात्मक आहे. जेव्हा असे असेल तेव्हा शरीरातील अनेक अवयव प्रत्यारोपणासाठी उपलब्ध असतात. डॉक्टर त्यातील कोणकोणते अवयव योग्य स्थितीत आहेत ते पाहून मगच कोणते अवयव प्रत्यारोपित करावयाचे हे ठरवतात. परंतु सर्वसाधारणपणे जर सर्व अवयव सुस्थितीत असतील तर प्रामुख्याने पुढील अवयव हे मृत्युपंथाला लागलेल्या रुग्णाचे प्राण वाचवू शकतात म्हणून त्यांना लाइफ सेविंग किंवा प्राण रक्षक अवयव असे म्हणतात ते मुख्यतः पुढील प्रमाणे हृदय, फुफ्फुसे, यकृत, स्वादुपिंड, दोन्ही किडनी म्हणजेच मूत्रपिंडे.

परंतू त्याशिवायही आतडी, गर्भाशय, रक्तवाहिन्या, कानाचे ड्रम, हृदयाची झडपे, हाडे, कूर्चा, बोन मॅरो वगैरे तसेच बाह्य अवयवांपैकी दोन्ही डोळे, त्वचा, दोन्ही हात वगैरे असे एकूण 50 पेक्षा जास्त अवयव आणि मुख्यतः उती म्हणजेच टिशू प्रत्यारोपणासाठी उपयोगी पडू शकतात. त्यामुळे प्रत्येक मृत व्यक्तीच्या नातेवाईकांनी विशेषत: वारस नातेवाईकांनी जर अवयवदानास संमती दिली, तर अनेक रुग्णांना त्याचा फायदा होऊ शकतो. आपल्या देशात दरवर्षी पाच लाख रुग्णांचा मृत्यू हा त्यांना प्रत्यारोपणासाठी अवयव उपलब्ध न झाल्याने होत असतो. यातले कित्येक मृत्यू आपण फक्त आपल्या संकल्पाने आणि आपल्या वारस नातेवाईक यांनी केलेल्या संकल्पपूर्ती ने आपण वाचवू शकतो.

आज आपण अवयवदान / देहदानाचा संकल्प करूया आणि या संकल्पाची माहिती आपल्या कुटुंबियांना आणि मित्र व नातेवाईक यांना देऊन त्यांनाही या कार्यात सहभागी करून घेऊया. या माणुसकीच्या कार्यासाठी आपल्याला सजग राहता येईल आणि अनेकांचे प्राण वाचवले याचे पुण्य पदरी पाडून घेता येईल.


लेखक : सुनील देशपांडे

उपाध्यक्ष, दि फेडरेशन ऑफ ऑर्गन न्ड बॉडी डोनेशन.

संचालक, मृत्युंजय ऑर्गन फाउंडेशन.

मो  ९६५७७०९६४०

ईमेल : sunil68deshpande@outlook.com

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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