हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अरण्यपथ के गर्भ से ही जन्म लेता है संभावनाओं का महासागर… ☆ डॉ. उमेश चन्द्र शर्मा ☆

डॉ. उमेश चन्द्र शर्मा

(ई- अभिव्यक्ति में वरिष्ठ साहित्यकार डॉ उमेश चंद्र शर्मा जी का स्वागत. आप एक वरिष्ठ लेखक, हिंदुस्थान समाचार बहुभाषी न्यूज एजेंसी एवं संवाद एजेंसी ईएमएस से संबद्ध है, तथा श्रीमद्भागवत कथा प्रवक्ता और साहित्यकार है.  हिंदुस्थान समाचार, ईएमएस, फ्री प्रेस जर्नल एवं हिंदी फ्री प्रेस में आलेख, फीचर एवं इंटरव्यू प्रकाशित, साप्ताहिक प्रभातकिरण में स्तंभ लेखन, कुछ कहानियां सहित शताधिक कविताओं एवं गीतों का स्वांत: सुखाय सृजन.आज प्रस्तुत है नव संवत्सर पर्व पर आपका एक ज्ञानवर्धक एवं विचारणीय आलेख – अरण्यपथ के गर्भ से ही जन्म लेता है संभावनाओं का महासागर।)

☆ आलेख – अरण्यपथ के गर्भ से ही जन्म लेता है संभावनाओं का महासागर ☆ डॉ. उमेश चन्द्र शर्मा ☆

भारतीय संस्कृति के विभिन्न पर्वोत्सवों पर हमारी उत्सव धर्मिता की सहज अभिव्यक्ति होती आई है, साथ ही उत्सवी दिनों को पूरी जिंदादिली से मनाया जाता रहा है, और चूंकि हिंदू नव संवत्सर गुड़ी पड़वा हमारी गौरवमयी एवं समृद्ध सनातन संस्कृति का महत्वपूर्ण धार्मिक एवं सांस्कृतिक पर्व है, इसलिए इस पर्व पर स्वाभाविक रूप से हमारी उत्सव धर्मिता की शानदार अभिव्यक्ति हुई, जो कि सहज एवं स्वाभाविक है, ओर ऐसे रंगारंग उत्सवी माहौल में हमारी सांस्कृतिक परंपराएं भी हमें अपने महाभावो को अभिव्यक्त करने हेतु प्रेरित करती है.  अतः महान् आध्यात्मिक वैभव से युक्त पंचाक्षर “नमः शिवाय” और सनातन आध्यात्मिक संस्कृति के महानतम वंदनीय वाक्यों “जय श्री राम” और जय श्री “कृष्ण” के महाबोधि संबोधन से हम समवेत स्वरों में सनातन संस्कृति के महापर्व गुड़ी पड़वा से आरंभ नव संवत्सर २०८३ का स्वागत अभिनन्दन करते हुए सभी प्राणियों के कल्याण के निमित्त अति प्रासंगिक एवं समीचीन यह शुभमङ्गलकामना करते हैं कि “सभी सुखी हों, सभी निरोगी हों, सभी का जीवन मंगलमय हो, और किसी को भी कोई दुःख न हो.”

“सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः,

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चित् दुःख भागभवेत्.”

गुड़ी पड़वा से आरंभ नूतन संवत्सर के साए में यह शुभमङ्गलकामना की जानी भी समीचीन ही होगी कि नव संवत्सर संपूर्ण विश्व के लिए सुख समृद्धि दायक,अहिंसा, शांति और सौहार्द का संदेश वाहक तथा वैभव कारक होगा, और हम जीवन में सर्वोच्च सफलताओं की और अपने कदम बढ़ाते हुए अविरल गति से निरंतर आगे बढ़ते जाएंगे.

जीवन में सर्वोच्चता की और बढ़ने की यह संकल्प शक्ति ही यकीनन हमें एक बेहतर कल की तरफ ले जाती है, जहां से उत्कर्ष का मार्ग प्रशस्त होता है, और उस मार्ग पर चलते हुए हम अपनी मंजिल तक पहुंचने में कामयाब हो सकते है, किंतु जीवनपथ में आने वाली वास्तविकताओं को भी हम नहीं नकार सकते, इसलिए उन्हें दृष्टिगत रखते हुए ही हमें अपने उद्देश्य प्राप्ति की दिशा में अग्रसर होना होगा.

जीवन के आलोक पथ पर की ओर बढ़ते हुए मानसिक स्तर पर चाहे हम सागर की अनंत गहराइयों को पा जाएं, अथवा विंध्याचल की शैली श्रंखलाओं को अपनी फौलादी बांहों में भर लें, किंतु वास्तविकताओं की विराटता भी हमें बार बार अपनी जमीनी हकीकत बताती ही रहती है, ऐसे में जीवन की वास्तविकताओं से रूबरु होते हुए एवं एक एक दिन के मैदानी अनुभव से ही श्रेष्ठता के आयामों को छुआ जा सकता है. महान् उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु उठे कदम अंततः अपनी मंजिल पर पहुंच ही जाते हैं, किंतु जीवन पथ पर आगे बढ़ते हुए हमें यह समझना होगा कि रास्ते कभी भी सीधे सपाट नहीं हुआ करते हैं, इसलिए कठिन रास्तों से गुजरने की क्षमताएं भी हमें पहले ही विकसित करनी होगी, साथ ही हौसलों की बुलंदियों को बरकरार रखना होगा, क्योंकि एक वह हौंसला ही तो है, जो भूतकाल की असफलताओं को नई नई सफलताओं में तब्दील कर देता है, और एक मुकम्मल जहां हमारे हाथों में सौंप देता है.

जीवन में आगे बढ़ते हुए कदाचित् ऐसे मोड़ भी आते हैं जब धैर्य ही हमारा आदर्श मित्र साबित होता है, क्यौकि धैर्यहीनता ही एक ऐसी बेड़ी है, जो हमारे कदमों को बरबस ही थाम लेती है, तब दिखाई दे रही मंजिल भी सहसा ही दूर दिखाई देने लगती है, ओर तब उस गतिमान समय की परिधि में आबद्ध हम लोग सहसा ही विचलित हो कर नियति पर नाराज हो जाते हैं, और तब व्यथा की विपरीतता में कह उठते हैं कि एक एक क्षण पहाड़ बन गया है, और जब खुशी का अवसर मिलता है तो कहने लगते हैं कि समय कितना जल्दी व्यतीत हो गया, ऐसा लगता है कि जैसे बात आजकल की ही हो, किंतु वह क्षण न तो पहाड़ की मानिंद था, और न ही चींटी द्वारा ले जाए जा रहे एक महीन कण की तरह अतिलघु ही था, वक्त का वह कतरा परिंदे की तरह आसमान को अपने आगोश में भर लेने के कथित मानसिक भावों से युक्त भी नहीं था, वास्तविकताओं में हमने ही उसे अपने संकीर्ण सुख दुःखों से, हानि लाभ से या फिर जय पराजय से संयुक्त कर दिया था, शायद इसीलिए वह शुचि वक्त अच्छा या खराब नाम पा गया.  दरअसल वह कालचक्र के परिक्रमा पथ का एक नन्हा सा हिस्सा था, समय का वह एक कतरा था, जिस पर दौड़ते हुए हम कभी उत्कर्ष पर पहुंचे थे, और वह भी समय का ही एक कतरा था, जिस पर चलते हुए कदाचित हम लड़खड़ाते हुए गिर पड़े थे, और तब उस गतिमान शुचि समय को हमारे ही द्वारा कई संज्ञाओं से विभूषित कर दिया गया था, जबकि समय के उसी प्रवाह ने अन्य अनगिनत लोगों को अमृत तत्व से अभिसिंचित भी किया.  निश्चित तौर पर उस एक ही समय को देखने का हमारा नजरिया तात्कालिक लाभ हानि के अल्पकालिक प्रवाह से ही संयुक्त था, शायद इसीलिए अनुभूतियां भी पृथक पृथक रूप ग्रहण कर गईं.

समय के उसी महावैभवी पथ पर एक तरफ जहां फूलों की सौंदर्य सुरभि समाई है, वहीं कंटक भी बिखरे पड़े हैं. यह वही पथ है जो एकबारगी हमें लहुलुहान कर देता है, किंतु संभावनाओं का अनन्त सागर भी तो वहीं से आकार ग्रहण करता है. यही है वह अरण्यपथ जो कठिन है, किंतु असीम संभावनाओं एवं उपलब्धियों से युक्त भी है.  शायद यही है वह उपलब्धियो से ओतप्रोत रास्ता जिस पर चलते हुए दुविधाओं की सड़ांध समाप्त हो जाती है, और उद्देश्य पूर्ण यात्रा के प्रसून खिलते हुए दिखाई देते हैं, किंतु हमें यह समझना होगा कि यात्रा की इस सुख सुरभि में कांटों की वेदना भी समाई होती है, इसलिए प्रत्येक कदम सम्हाल कर रखने की जरूरत पेश आती है, क्यौकि कठिन कंटकाकीर्ण मार्ग को, अरण्यपथ को चुन लिया है जिसने, परीक्षाओं के सिलसिले उसके समक्ष कतारबद्ध खड़े नजर आते ही हैं.  सफलताओं के ये आसान से लगने वाले रास्ते परीक्षाओं की वह पूर्व दिशा है, जिसे बादलों ने आच्छादित कर रखा है, किंतु सतत प्रयासों रुपी पुरुषार्थ उन्हें छिन्न भिन्न कर देता है, ओर सफलता रुपी स्वर्णिम प्रभात की नूतन रश्मियां प्रस्फुटित हो ही जाती है.  कठिनाइयों के उन बेतरतीब सिलसिलों से होकर ही सफलताओं के महाद्वार खुलते हैं.  यही है, वह दिव्यतम सुख की अनुभूति का महाद्वार, जहां से आसमानी बुलंदियां हमारे स्वागत समारंभ हेतु तत्पर दिखाई देती है.  यही है वह चिरंतन शाश्वत सत्य के अनुसंधान का पथ जहां पर आगे बढ़ जाने पर फिर होकर भी नहीं होने की विराट संभावनाएं दस्तक देने लगती है.  यही है वह अमृत का महाकोश, युग युगान्तर से जिसे हम खोजते आए हैं, और जिसकी छत्रछाया ने अनगिनत मानवों को महामानव के रूप में स्थापित कर दिया है.

आलोक पथ की ओर अग्रसर होते हुए तथा अपने कर्तव्य बोध, कर्मशीलता और राष्ट्र हित के महाभावों को सर्वोपरि स्थान प्रदान करते हुए हम नवोन्मेष के पथ पर सतत रूप से अग्रसर होने हेतु कृत संकल्पित हैं.

****** 

© डॉ. उमेश चन्द्र शर्मा

संपर्क- श्री लक्ष्मीनारायण मंदिर परिसर, थान्दला, जिला झाबुआ, मध्यप्रदेश (भारत)

मोबाइल-8602244004/ Email-dr.umeshchandrasharma@yahoo.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९५३ ⇒ ईमानदारी का तावीज ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “ईमानदारी का तावीज।)

?अभी अभी # ९५३ ⇒ आलेख – ईमानदारी का तावीज ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

ईमानदारी का कोई कॉपीराइट नहीं होता। सबको ईमानदार बनने का हक है। किताबों के शीर्षक और फिल्मों के शीर्षकों का भी कॉपीराइट होता है, फिर भी एक अवधि के पश्चात देवदास और दीवाना दुबारा बन ही जाती है। ईमानदारी के तावीज पर किसी और का कॉपीराइट सही, मेरी ईमानदारी मौलिक है।

गंडा-तावीज एक टोटका भी हो सकता है, मन्नत भी हो सकती है। हर तरह की बला से सुरक्षा भी हो सकती है। तावीज भूत-प्रेतों से भी रक्षा करता है। यह गले में एक इन-बिल्ट हनुमान चालीसा है, अपने आप में संकट-मोचक है।।

मनमोहन देसाई की फिल्मों में हीरो के गले में बंधा एक तावीज उसकी आजीवन रक्षा करता है, छाती पर बरसती गोली तक को वह आसानी से झेल लेता है लेकिन जब वह तावीज अपनी जगह छोड़ देता है, कयामत आ ही जाती है।

आप अपना काम कीजिए, तावीज अपना काम करेगा। उस्तादों और पहलवानों से गंडा बंधवाया जाता है। आप सिर्फ रियाज कीजिये, गंडा अपना काम करेगा। संगीत की तरह ही अब राजनीति, और साहित्य में भी गंडा-प्रथा ने अपने पाँव जमा लिए हैं।।

जब से मैंने ईमानदारी का तावीज पहना है, मेरे सभी काम आसानी से होने लग गए हैं। लोग मेरा चेहरा और आधार कार्ड तक नहीं देखते, जब ईमानदारी का इतना बड़ा चरित्र प्रमाण-पत्र गले में किसी विश्वविद्यालय की डिग्री की तरह सुशोभित है, तो फिर कैसी औपचारिकता।

जिस तरह एक ड्राइविंग लाइसेंस आपको गाड़ी चलाने की छूट प्रदान करता है, ईमानदारी का तावीज हमेशा बेईमानी और भ्रष्टाचार के लांछन से मेरा बचाव करता है। मेरी नीयत पर कोई शक नहीं करता। दुनिया मुझे दूध से धुला हुआ समझती है।।

पर हाय रे इंसान का नसीब!

मेरी पत्नी को ही मेरी ईमानदारी पर शक है। घर में हमेशा एक ही राग, और एक ही गाना गाया करती है। जा जा रे जा, बालमा! उसे मेरे ईमानदारी के तावीज पर रत्ती भर विश्वास नहीं। वह इन ढकोसलों को नहीं मानती। उसका मानना है कि ईमानदारी व्यवहार में होनी चाहिए, दिखावे में नहीं।

आस्था और संस्कार में द्वंद्व पैदा हो गया है। वह रूढ़ि और अंध-विश्वास के खिलाफ है। गंडे तावीज लटकाने से कोई ईमानदार नहीं हो जाता! ईमानदारी आचरण में उतारने की चीज है, गले में तमगे की तरह लटकाने की नहीं। पत्नी की बात में दम है। मैंने आव देखा न ताव! बजरंग बली का नाम, और पत्नी की प्रेरणा से ईमानदारी का तावीज तोड़ ही डाला। ईमानदारी की देवी, जहाँ भी कहीं हो, मुझे क्षमा करे।।

मेरी पत्नी चतुर सुजान है! मैंने कभी उसके इरादों पर शक नहीं किया। लेकिन जब रात को ही ईमानदारी का तावीज उतरवाया और सुबह एक दूसरा तावीज पहनने का आग्रह किया, तो मैं कुछ समझा नहीं!

वह बोली, कोई प्रश्न मत करो! चुपचाप यह तावीज पहन लो। यह देशभक्ति का तावीज है। चुनाव में बहुत काम आएगा! और उसने अपने कोमल हाथों से मुझे देशभक्ति का तावीज पहना दिया। पत्नी-भक्त तो में था ही, आज से देशभक्त भी हो गया।।

तावीज गवाह है ..!!!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ५८ ☆ कविता – मेरे घर के सामने… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय कविता – “मेरे घर के सामने“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ५८ ☆

✍ कविता – मेरे घर के सामने… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

मेरे घर के सामने

अशोक का पेड़ है

वसंत की बहार है

कोमल पत्तों की

बौछार है

बड़े कोमल और

सुनहरे पत्ते हैं

छोटी छोटी चिडियों ने

घोंसले बना लिए हैं

चीं चीं की आवाज

आती रहती है

अशोक की डालियाँ

नीचे झुक गई हैं

लालामी लिए

हरे हरे पत्तों ने

मेरे घर का दरवाजा

ढंक दिया है

मैं डालियों को

छाँटना चाहता हूँ

हँसिया लेकर

जब भी पास जाता हूँ

डालियाँ छाँटने

कोमल पत्ते

मुस्कुरा उठते हैं

और मेरे चेहरे पर भी

मुस्कान आ जाती है

हँसिया लिए घर में

चला आता हूँ

डाली पत्ते काटने की

हिम्मत नहीं होती।

 

पता नहीं लोग

पेड़ कैसे काट

देते हैं।

© डॉ सत्येंद्र सिंह

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # १०७ – पवित्र रिश्ता… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – पवित्र रिश्ता।)

☆ लघुकथा # १०७ – पवित्र रिश्ता श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

बेटा आज शाम को तुम्हें देखने लड़के वाले आ रहे हैं थोड़ा बेसन का उबटन लगा लो रागिनी ने अपनी बेटी सुमन से कहा।

सुमन चिल्ला कर बोली – “क्यों पकौड़े बनाकर मुझे ही उन्हें खिलाने वाली हो क्या?”

सुमन ने कहा- “माँ मैं जैसी हूं वैसे ही उनके सामने आऊॅंगी बनावट का श्रृंगार मुझे नहीं करना है।”

“ठीक है अच्छा अच्छा आराम कर ले” सुमन ने गहरी सांस भरते हुए कहा।

वह रसोई में चली गई नाश्ता बनाने के लिए।

उनके मन में बड़ी उलझन थी कि क्या आज इसका रिश्ता तय होगा या नहीं पता नहीं लड़का कैसा मिलेगा?

शाम को जब लड़के वाले घर पहुंचे तब सुमन एक हल्के गुलाबी रंग का सलवार कुर्ता पहनकर हल्के मेकअप के साथ उनके सामने उपस्थित हुई।

लड़के की माँ ने पूछा- ‘बेटा तुम्हें खाना बनाना आता है? ‘

“आंटी हाँ मैं थोड़ा बहुत बना लेती हूँ चाय नाश्ता अच्छे से बना लेती हूँ” सुमन ने कहा।

सुमन की माँ ने कहा- “बहन जी आजकल लड़कियाँ खाना कहाँ बनाती हैं नौकरी और काम से फुर्सत कहाँ मिलती है।”

रागिनी ने कहा – “बहन जी मेरी इकलौती बेटी है इसके पिताजी बिजनेस के सिलसिले में बाहर गए हैं हमारी खिलौने की बड़ी दुकान है।”

रागिनी ने पूछा- “बहन जी आपका बेटा क्या करता है?”

लड़के की माँ ने कहा – “मेरे पति का 2 साल पहले स्वर्गवास हो गया है पर पुलिस में बड़े अधिकारी थे उनकी जगह मेरे बेटे को नौकरी मिल गई है।“

रागिनी ने कहा- “बेटा अजय तुम हम लोगों से  बात नहीं करोगे क्या?”

“नहीं आंटी एक बात मैं आपको बता दूँ, मुझे भी काम के सिलसिले में दिनभर किसी भी समय इधर-उधर जाना पड़ता है।”

‘हाँ बेटा मैं समझ सकती हूँ” रागिनी ने कहा।

“आंटी सुमन शादी के बाद क्या नौकरी छोड़ देगी?”

तभी सुमन बोल पड़ी “मैं कोई रामायण की सीता नहीं हूँ यह बात आप अच्छे से समझ लीजिए?”

“मैं आधुनिक नारी हूँ, यदि आप राम बनके रहेंगे तो मैं सीता रहूंगी नहीं तो मैं काली बनना जानती हूँ, आगे आप स्वयं समझदार है” इतना कहकर अंदर चली जाती है।

रागिनी और लड़के की माँ एक दूसरे को देखती रहती हैं। इंस्पेक्टर  अजय  ने कहा – “रामराज्य नहीं है आज के जमाने में कहीं लेकिन आंटी मैं भी रावण तो नहीं हूँ।”

“आपकी बेटी का जब गुस्सा शांत हो जाएगा तब मैं उससे मिलने आऊॅगा। शादी एक पवित्र रिश्ता है जब हमारे मन मिलेंगे तभी शादी होगी” इतना कहकर माँ बेटे दोनों चले जाते हैं।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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सूचनाएँ/Information ☆ यूपी व सीबीएसई पाठ्यपुस्तकों में शामिल हुए डॉ. निशा अग्रवाल के निबंध एवं रचनाएं – अभिनंदन☆

 ☆ सूचनाएँ/Information ☆

(साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समाचार)

डॉ. निशा अग्रवाल

🌹 यूपी व सीबीएसई पाठ्यपुस्तकों में शामिल हुए डॉ. निशा अग्रवाल के निबंध एवं रचनाएं – अभिनंदन 🌹

शिक्षा जगत में गौरव का क्षण

नई शिक्षा नीति व समकालीन विषयों पर आधारित लेखन को मिला व्यापक स्थान

शिक्षा जगत के लिए यह गौरव का विषय है कि जयपुर की प्रख्यात शिक्षाविद् एवं पाठ्यपुस्तक लेखिका डॉ. निशा अग्रवाल की रचनाओं को माध्यमिक शिक्षा परिषद, उत्तर प्रदेश द्वारा निर्धारित नवीन पाठ्यक्रम के अंतर्गत कक्षा 9 से 12 की सामान्य हिंदी पाठ्यपुस्तकों में शामिल किया गया है। इन रचनाओं में निबंध, गद्यांश, पद्यांश, संस्मरण एवं अन्य शैक्षणिक विषयवस्तु को स्थान मिला है। नगीन प्रकाशन द्वारा प्रकाशित इन पुस्तकों का संपादन वरिष्ठ लेखक सर्वेश कांत वर्मा ने किया है। इसके अतिरिक्त, सीबीएसई बोर्ड के पाठ्यक्रम के अंतर्गत कक्षा 9 एवं 10 की हिंदी व्याकरण की पुस्तकों में भी उनकी विषयवस्तु को सम्मिलित किया गया है।

डॉ. निशा अग्रवाल के चर्चित निबंध ‘नई शिक्षा नीति’ तथा ‘शिक्षित बेरोजगारी’ समकालीन शिक्षा व्यवस्था के महत्वपूर्ण पक्षों को सरल, सटीक एवं प्रभावशाली भाषा में प्रस्तुत करते हैं। इन रचनाओं में नई शिक्षा नीति के उद्देश्य, प्रमुख तत्व, प्रभाव एवं चुनौतियों का समग्र विश्लेषण किया गया है, वहीं शिक्षित बेरोजगारी की समस्या के कारणों एवं संभावित समाधानों पर भी सारगर्भित दृष्टिकोण प्रस्तुत किया गया है। उनकी यह लेखनी विद्यार्थियों के लिए न केवल ज्ञानवर्धक, बल्कि प्रेरणादायक भी सिद्ध हो रही है।

उल्लेखनीय है कि डॉ. अग्रवाल अब तक 30 से अधिक पुस्तकों की रचना कर चुकी हैं। उनकी कृतियों में सीबीएसई बोर्ड की कक्षा 3 से 5 तक की अंग्रेज़ी एवं विज्ञान की पाठ्यपुस्तकें भी शामिल हैं। इसके अतिरिक्त ‘इवोल्यूशन ऑफ इंडियन एजुकेशन’, ‘समावेशी शिक्षा’, ‘शिक्षा का बदलता स्वरूप’, ‘कला शिक्षा’, योग शिक्षा, बाल शिक्षा में नवाचार तथा योग एवं आत्मबोध जैसे विविध विषयों पर आधारित उनकी पुस्तकें शिक्षा जगत में विशेष स्थान रखती हैं।

डॉ. निशा अग्रवाल द्वारा एक शोध ग्रंथ भी तैयार किया गया है, जिसे सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ गुजरात के सामाजिक विज्ञान विभागाध्यक्ष प्रो. डॉ. जनक सिंह मीणा के निर्देशन में विकसित किया गया। साथ ही उनकी एक अन्य महत्वपूर्ण कृति ‘सौहार्द शिरोमणि संत सौरभ पांडेय’ के जीवन, विचारों एवं समाजसेवा पर आधारित एक प्रेरक पुस्तक है, जो उनकी बहुआयामी लेखन क्षमता को दर्शाती है।

धौलपुर जिले के बाड़ी (पिपरेट) निवासी जगदीश प्रसाद मंगल की सुपुत्री डॉ. निशा अग्रवाल शिक्षा के क्षेत्र में निरंतर सक्रिय भूमिका निभा रही हैं। नई शिक्षा नीति के अंतर्गत प्रारंभ किए गए इंटीग्रेटेड टीचर एजुकेशन प्रोग्राम (ITEP) पर भी उनकी चार पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, जो शिक्षक शिक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान मानी जा रही हैं।

शिक्षा के क्षेत्र में डॉ. निशा अग्रवाल का योगदान अत्यंत अनुकरणीय एवं सराहनीय है। उनकी रचनाएँ न केवल विद्यार्थियों को ज्ञान प्रदान कर रही हैं, बल्कि उन्हें सामाजिक सरोकारों के प्रति जागरूक करते हुए नई दिशा भी दे रही हैं।

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – मराठी कविता ☆ कवितेच्या प्रदेशात # ३०७ ☆ चैत्र गौर… ☆ सुश्री प्रभा सोनवणे ☆

सुश्री प्रभा सोनवणे

? कवितेच्या प्रदेशात # ३०७ ?

☆ चैत्र गौर… ☆ सुश्री प्रभा सोनवणे ☆

हे दुर्गादेवी… जगत जननी

सा-या संसाराची वरदायिनी

*

तू शक्ती.तू अंबिका..तू सौदामिनी

माझ्या मनावर सदा तुझी मोहिनी

*

तू सौंदर्या, मृगनयनी , सुकेशिनी

सती, शैलपुत्री,चंडिका, शुभांगिनी

*

आई पार्वती,उमा,गौरी,कात्यायनी

अनेक नावे… परी तू माझी भवानी

*

कलियुगातली तू आहेस तारिणी

अवघ्या विश्वाची तू ….उद्धारिणी

*

आम्ही तहानलेले… तू तरंगिणी

तू कालरात्री आणि तूच शिवानी

*

चैत्र नवरात्रीत तूच माझी स्वामिनी

सदा तू प्रसन्न असावेस या जीवनी

© प्रभा सोनवणे

संपर्क – “सोनवणे हाऊस”, ३४८ सोमवार

पेठ, पंधरा ऑगस्ट चौक, विश्वेश्वर बँकेसमोर, पुणे 411011

मोबाईल-९२७०७२९५०३,  email- sonawane.prabha@gmail.com

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ हे मृत्यो… ☆ श्री सुहास रघुनाथ पंडित ☆

श्री सुहास रघुनाथ पंडित

? कवितेचा उत्सव ?

 

☆ हे मृत्यो... ☆ श्री सुहास रघुनाथ पंडित 

फक्त एकदा मला पाहू दे हिमशिखरांच्या उत्तुंग राशी

फक्त एकदा मला पाहू दे तोरण गगनी इंद्रधनुष्यी

फक्त एकदा मला पाहू दे वसंत पुलकित हिरवी राने

फक्त एकदा मला ऐकू दे वसंतातले कोकीळ गाणे

 *

निळ्या नभातील रंगपंचमी मला पाहू दे फक्त एकदा

गिरीशिखरातील निर्झर संगीत मला ऐकू दे फक्त एकदा

शिशिरामधला पहाट वारा मला घेऊ दे फक्त एकदा

रेशीम वस्त्रे चंद्राची ती मला लेऊ दे फक्त एकदा

 *

कोसळणा-या सहस्रधारांमध्ये नाहू दे फक्त एकदा

अन् मातीच्या कुशीत शिरूनी मला राबू दे फक्त एकदा

फक्त एकदा मला पाहू दे अवघ्या सृष्टीमधला ईश्वर

फक्त एकदा मला मरु दे इथले जगणे सरल्यानंतर

© श्री सुहास रघुनाथ पंडित 

सांगली (महाराष्ट्र)

मो – 9421225491

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ पत्र लेखन + अभिनंदन – सुश्री विभावरी कुलकर्णी ☆ सम्पादक मंडळ ई-अभिव्यक्ति (मराठी) ☆

सूचना/Information 

(साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समाचार)

सुश्री विभावरी कुलकर्णी

🌺  अ भि नं द न  🌺

कर्मयोगिनी महिला संस्था, पुणे यांनी ‘पत्रलेखन स्पर्धा’ आयोजित केली होती. या स्पर्धेत आपल्या समुहातील साहित्यिका विभावरी कुलकर्णी यांच्या पत्रलेखनास प्रथम पुरस्कार प्राप्त झाला आहे.

ई-अभिव्यक्ती मराठी परिवारातर्फे विभावरी कुलकर्णी यांचे मनःपूर्वक अभिनंदन आणि पुढील लेखनासाठी शुभेच्छा 💐💐

आजच्या अंकात वाचूया त्यांचे प्रथम पुरस्कार प्राप्त रचना – “पत्रलेखन…”

संपादक मंडळ

ई अभिव्यक्ती मराठी

☆ ☆ ☆ ☆

🔅 विविधा 🔅

☆ पत्रलेखन ☆ विभावरी कुलकर्णी

(प्रथम पुरस्कार प्राप्त)

****

आदरणीय मॅडम,

सप्रेम नमस्कार.

आज तुम्ही आमच्यात देहरूपाने नसलात, तरी तुमची आठवण आल्याशिवाय एकही दिवस जात नाही. आपली पहिली भेट झाली तेव्हा जणू काही जन्मांतरीचे ऋणानुबंध असावेत, असा भास झाला होता. तुमच्या भेटीमुळे कोड्यासारखे गुंतागुंतीचे वाटणारे माझे आयुष्य एखाद्या सुंदर फुलासारखे उलगडत गेले. तुम्ही मला आयुष्याचा खरा उद्देश समजावून सांगितलात आणि त्यामुळेच मला जीवनाची एक नवी दिशा सापडली.

आज मी जी काही यशस्वी ‘रेकी मास्टर’ आहे, ते केवळ तुमच्यामुळेच. तुम्ही दिलेली दीक्षा, तुमची शिकवण आणि तुम्ही करून घेतलेली प्रात्यक्षिके माझ्या यशाचा पाया ठरली. तुमच्या मार्गदर्शनाखाली मी विविध ध्यानाचे (Meditation) प्रकार शिकले. तुमच्या सान्निध्यात आल्यावरच मला जाणीव झाली की माझी ज्ञानाची झोळी किती रिकामी होती. प्रत्येक शिष्याला समान वागणूक आणि समान ज्ञान देण्याची तुमची वृत्ती आम्हा सर्वांसाठी प्रेरणादायी होती.

रेकीचा खरा अर्थ आणि या पवित्र प्राणशक्तीचा उपयोग कसा करावा, याचे पूर्ण ज्ञान तुम्ही मला दिलेत. पंचमहाभूते, त्यांची उपयुक्तता आणि त्यांची ऊर्जा कशी प्राप्त करावी, हे तुम्ही आम्हाला प्रत्यक्ष अनुभवातून शिकवलेत. रेकीचा उगम आणि त्यामागचे शास्त्र तुम्ही इतक्या सोप्या पद्धतीने समजावून सांगितले की, त्यामुळेच मला आज समाजसेवेची संधी प्राप्त झाली आहे. तुम्ही दिलेल्या शिकवणीचा उपयोग मी आज लोकांसाठी करत आहे आणि त्याचे सकारात्मक परिणामही दिसून येत आहेत.

कृतज्ञतेत कसे राहावे, आभार मानण्याचे महत्त्व काय असते, चराचर सृष्टीशी स्वतःला कसे जोडून घ्यावे आणि भूतदया कशी असावी, सर्वात राहून अलिप्त कसे असावे, लोभ – मोह दूर कसे ठेवावेत, निरपेक्ष वृत्तीने सेवा कशी करावी.

हे संस्कार तुम्ही माझ्यावर बिंबवलेत. आजही एखादा कठीण प्रसंग समोर उभा ठाकला की, तुमच्या नोट्स आणि तुमची शिकवण मला मार्ग दाखवते. आजही मनातल्या प्रश्नांची उत्तरे तुमच्या आठवणींतून मिळतात. आपल्यात गुरु-शिष्या पलीकडचे एक अतूट नाते निर्माण झाले होते. आपण दोघींनी मिळून मेडिटेशनवर एक पुस्तक लिहायचे ठरवले होते, पण काळाने ती इच्छा अपूर्णच ठेवली.

तुमची शिकवण आणि तुमचे आशीर्वाद सदैव माझ्या पाठीशी आहेत, याची मला खात्री आहे. ते आशीर्वाद असेच कायम लाभोत, हीच ईश्वरचरणी प्रार्थना.

सदैव आपल्या कृतज्ञतेत,

तुमची शिष्या,

विभावरी

—–

© विभावरी कुलकर्णी

मेडिटेशन,हिलिंग मास्टर व समुपदेशक, संगितोपचारक.

सांगवी, पुणे

📱 – ८०८७८१०१९७

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – जीवनरंग ☆ जलसाक्षर… भाग – २ ☆ श्री सुनील देशपांडे ☆

श्री सुनील देशपांडे

🌸 जीवनरंग 🌸

☆ जलसाक्षर… भाग – २ ☆ श्री सुनील देशपांडे

(22 मार्च रोजी जागतिक जलदिन साजरा केला जातो. या जलदिनाच्या निमित्ताने नाशिक येथील महाराष्ट्र शासनाच्या जलसंपदा विभागाने एक कथा स्पर्धा आयोजित केली होती. त्या कथा स्पर्धेतील माझी पारितोषिक प्राप्त कथा. जलदिनानिमित्ताने रसिकांसमोर सादर.)

(आणि या सर्व गोष्टी आपण उद्यापासून आपल्या घरात करायच्या असा त्यांने दीर्घ संकल्प केला. या संकल्पनेवर विचार करीतच वाचू रात्री शांत झोपी गेला.)

इथून पुढे  

सकाळी ब्रेकफास्टच्या टेबलवर वाचून जाहीर केले की आपण आदर्श जलसाक्षर कुटुंब व्हायचे. आजपासून शॉवर बंद. फक्त एक बदली पाण्यातच अंघोळ करायची. वसू वसकन ओरडली “ते तुमचं जलसाक्षर वगैरे तुमचं तुम्ही बघा. मला मनसोक्त शॉवर घेतल्याशिवाय स्वच्छच वाटत नाही.शी! एक बादली म्हणे! आणि तुम्हाला काय ती थैरं करायची ना ती तुमच्यापुरती ठेवा. आम्ही निरझर ठीक आहोत” वासूने जलतज्ञाचे म्हणणे परोपरीने समजावून देण्याचा प्रयत्न केला, पण जलतज्ञा एवढी प्रतिभा शक्ती त्याच्याकडे नव्हती व मुळातच तो नवरा असल्याने साहजिकपणे वसूला आपलं म्हणणं पटवून देऊ शकला नाही. नेहमी प्रमाणेच सपशेल पराभव पत्करून गप्प बसण्याशिवाय त्याच्याकडे दुसरा पर्याय काय असणार होता? आता सू बरोबरच्या चर्चेचा निष्कर्ष काही वेगळा नसणार हे आमच्या चरणाक्ष वाचकांनी ओळखले असणारच. सासू म्हणजे प्रत्यक्ष बायकोची आई! तिच्यासमोर तोंड उघडणे त्याला आजपर्यंत जमले नव्हते ते आज कसे जमेल? त्यामुळे त्या आघाडीवर संपूर्ण शांतताच. पण सखू मोलकरीण जेव्हा धुणे भांडी होईपर्यंत नळ तसाच चालू ठेवून पाणी वाया घालवीत होती त्यावेळी मात्र वरील सर्व अपयशाचा राग एकवटून तो तिच्यावर ओरडला “आधी पाणी बंद कर. येथून पुढे असे पाणी वाया घालवलेले मला चालणार नाही.” असे काहीसे मोठ्या जोशात बोलून आपण निदान एक तरी शौर्यकृत्य करू शकतो याचे समाधान वाटून विजयी मुद्रेने तो ऑफिसला गेला. ऑफिसला गेल्यावर त्याने शिपायाला पंखा चालू करून पाणी आणायला सांगितले पाण्याचा ग्लास समोर आल्यावर त्याने शिपायाला सांगितले पाणी फक्त अर्धा ग्लास द्यावे शिपायाने लगेच अर्धा बेसिन मध्ये ओतला आणि त्याच्यासमोर ठेवला. वासू म्हणाला 

“अरे ते पाणी वाया का घालवतोस? अनेक लोक अर्धा ग्लास पाणी पिऊन अर्धा वाया घालवतात. आपणाला पाणी वाचवले पाहिजे. जलसाक्षर झालं पाहिजे.”

“हे बगा सायेब, तुमाला अर्धा ग्लास पाणी पायजे होतं, ते मिळालं ना? उरलेल्याचं काय झालं तुमाला काय करायचंय? समजा कुणाला अर्धा ग्लास नाही, पूर्ण हवा तर मी काही येरझारे घालत बसू काय? ते जमायचं नाय! आणि माझं वागणं खटकत असंल तर तुमी सोत्ता पाणी घेत जावा आजपासून.” 

पुन्हा दुपारी असाच ऑफिसमधील कलिग्ज कडूनही चेष्टाचा विषय बनलेला व जलसाक्षरतेच्या जागृती मध्ये सपशेल अपयशी ठरलेला आपला कथा नायक खिन्न मनाने घरी परतला. तिथेही वेगळंच संकट त्याची वाट बघत होतं. 

दारातून आत आल्या आल्या चहा सुद्धा न देता वसू त्याच्यावर ओरडली “तुमचं ते जलसाक्षरता वगैरे बंद करा बघू आधी! साऱ्या शहराचा ठेका काय तुम्ही घेतलाय का? तुम्ही आज सकाळी सखूवर ओरडला. ती काम सोडून चालली होती. आता काय धुणं भांडी तुम्ही करणार का? त्या जलसाक्षरते साठी? एक तर कामाला बाई मिळत नाही. तुम्ही असलेल्या बायांना पळवून लावा. मी कशीबशी तिची समजूत घातली, पण घरच्या बाबतीत अक्कल पाजळू नका! काय कोणाला जलसाक्षर करायचं ना ते ऑफिसमध्ये करा. घरी नको‌.”

आपल्या जलसाक्षरता मोहीमे मध्ये असाच चारी मुंड्या चितपट झालेला वासू श्रांत व क्लांत मनाने झोपी गेला. 

वासू सकाळी उठला कालच्या संपूर्ण दिवसाची नकारात्मकता त्याच्या मनात अजूनही भरून राहिली असल्याने त्याला निरुत्साही वाटत होते. अंगात थोडी कणकण असावी असेही त्याला वाटू लागले. कुणाशीही न बोलता चहा पिऊन तो आराम खुर्ची बाल्कनीत टाकून, आज फिरायला जाण्याचे रहित करून, आराम खुर्चीत विसावला. आज सिकलीव्ह टाकण्याचा निर्णय घेत डोळे मिटून शांत पडून राहिला. सखुबाई अजून आली नव्हती. आज ती आली नाही तर घडणाऱ्या महायुद्धाला कसं तोंड द्यायचं याचा तो विचार करू लागला आणि तो अधिकच अस्वस्थ होऊ लागला. घरातही सगळीकडे वादळापूर्वीची शांतता पसरली होती.

वासूला जरा डुलकी लागली आणि बेलच्या आवाजाने जाग आली. उशिरा का होईना सखुबाई आल्यामुळे त्याचा जीव भांड्यात किंवा अक्षरशः धुणंभांड्यात पडला असेही म्हणायला हरकत नाही. सखुबाईची तब्येत बरी नसावी. आल्या आल्या सासूने विचारले 

“काय झालं? वसू ss जरा सखुबाई साठी चहा टाक आणि मलाही टाक घोटभर तिच्याबरोबर” 

आणि संभाषण सुरू झालं 

“अवो, काय सांगू? आज पयलं पाणी आलं उशिरा, ते सुदा थेंब थेंब, काल पाणीबंदीचा दिवस, त्यामुळं पाण्यापाई भांडाभांड सुरू, कसंतरी चार बादल्या पाणी मिळालं. ते सुदा मारामारी करून. जीव मेटाकुटीला आला बघा. त्यात एका बाईनं कळशी मारली फेकून, कंबर दुखायला लागली. आता असं रोजच झालं तर काय करायचं आजीबाई? ” “सखू अगं यंदा धरणातलं पाणी आता संपायला आलंय. नगरपालिकेनं तरी कुठून आणायचं पाणी? आता आमच्याकडे बोरिंग आहे म्हणून चाललंय. पण ते सुद्धा किती पुरेल उन्हाळ्यात कुणास ठाऊक? अगं, जावईबापू तुला काल बोलले ते का आमच्यासाठी बोलले? आम्हाला पाणी थेंबा थेंबानं किंवा टँकरनं भरावं लागतं का? ते लागतं तुम्हालाच! आमच्या लहानपणी गावाकडं हौदभर पाणी आम्ही मुली हसत मजेत विहिरीचं ओढून भरायचो. त्यामुळे मला पाण्याचे महत्व कळतं. मी अजूनही कधी शॉवर घेतला नाही. एका बादलीत अंघोळ करते आणि माझं लुगडं मी स्वतः अर्धी वारली पाण्यातच धुवून टाकते. होय की नाही? हे बघ आपल्या गावाची लोकसंख्या समज दहा लाख. एका कुटुंबात चार माणसे धरली तर अडीच लाख कुटुंबं. आमच्या सारखी फ्लॅट बंगल्यात राहणारी निदान एक लाख कुटुंब तरी असतील. त्यांच्या घरी तुझ्यासारख्या बाया काम करतात ना? ” 

तेवढ्यात वसूनं चहा आणून ठेवला. आणि तीही आईच आईचं बोलणं ऐकू लागली. 

*सखू घे, चहा घे आणि ही गोळीही घे, अंग दुखायचं कमी होईल. तर मी असं म्हणत होते, या एक लाख घरांमध्ये तुझ्यासारख्या बायांनी जर पाच बादल्या पाणी वाचवलं. फक्त त्रास काय तर सारखा नळ चालू बंद करायचा. तेवढाच ना? पण तुझ्या या दुखण्यापेक्षा कमीच नाही का? जर एका कुटुंबात पाच तर एक लाख कुटुंबात पाच लाख बादल्या पाणी वाचेल ना? आता जावईबापू रोज चार बादल्या पाणी वाचवतात. वसु आणि सू नं निदान तीन-तीन बादल्या पाणी वाचवलं तर आमच्या दहा बादल्या. अशा एका घरातून पंधरा बादल्या पाणी वाचलं, तर एकूण 15 लाख बादल्या पाणी वाचलं ना? म्हणजे जर तुमच्या घरी पाच बाटल्या पाणी लागत असेल, तर तुमच्यासारख्या तीन लाख कुटुंबाची सोय होईल की नाही? मग हा वैताग मारामाऱ्याच बंद नाही का होणार? मी बाई फार शिकले नाही. पण अजूनही पाणी वाचवायचे अनेक मार्ग या तज्ञ लोकांना माहीत असतात. जावईबापू हुशार आहेत. जास्त शिकलेले आहेत. ते अशा तज्ञांची भाषणे ऐकून आपल्याला जे सांगतात ते आपल्याच भल्यासाठी ना? उलट त्यांचे कडून अशी भाषणे आपण समजून घेतली आणि ते उपाय आचरणात आणले तर! आपलाच सगळ्यांचा सर्व शहरवासीयाचा फायदा होणार आहे, होय की नाही! ”

आजीबाई खरं आहे तुमचं म्हणणं, मला पटलं बर का! काल मला साहेबांच्या बोलण्याचं वाईट वाटलं, पण आता पटलं की त्यांचं बोलणं आमच्यासाठीच होतं. आम्ही जर हित पाणी वाचवलं, तर आमचाच फायदा होईल. मी चुकले आजीबाई. साहेबांना सांगा चुकी झाली म्हणून. मी आजपासून पाणी वाचवणार नक्की! ” 

“आता कसं? आता तू हेच तुझ्या जवळच्या सर्व बायांना सांगायचं बरं का? आणि तुम्ही आम्ही सर्वांनी मिळून पाण्याची बचत करायची, म्हणजे हा पाण्याचा प्रश्न सोपा होऊन जाईल” 

वसू सुद्धा आईचं बोलणं ऐकून म्हणाली “आई माझं सुद्धा चुकलंच. मी सुद्धा हे म्हणाले तसेच वागीन! ” या सर्व जाणांमध्ये सू कशी मागे राहील?

“आजी मी तुझ्यासारखंच माझ्या सर्व मित्र-मैत्रिणींना सांगेन” 

असं म्हणत क्लासला पळाली. बाल्कनी मध्ये हे ऐकणाऱ्या वासू च्या डोक्यात जलसाक्षरतेचा प्रकाश पडत होता आणि सासूच्या अभिमानाने त्याचा उर भरून आला होता! एवढ्यात वसु बाल्कनीत आली आणि वासूला बघताच

 “आज असे का बसलात? बरं नाही का वाटंत? चला करू आत मध्ये बसा मी चहा आणते”

असं म्हणत चहा बेडरूम मध्ये घेऊन आली आणि म्हणाली 

“अहो माझं चुकलं बरं! मला माफ करा ना प्लीज! ” 

वसु म्हणाला “इतक्या दुरून माफी कशी करता येईल? त्यासाठी जवळ यावे लागेलच ना? ” 

“चला चावट कुठले” 

असं म्हणत असतानाच वाचू ने तिला माफ केले. 

आता वासूने वसूला कसे माफ केले असेल हे आमच्या चाणाक्ष वाचकांनी ओळखले असेलच!

वासू आणि वसू सारखे माफीनामे तुमच्या आमच्या ही घरात घडोत. अशी ही जलसाक्षरतेची साठा उत्तरांची कहाणी पाचा उत्तरी सुफळ संपूर्ण!!!

– समाप्त –

© श्री सुनील देशपांडे 

 फोन :९६५७७०९६४०

 ई मेल : sunil68deshpande@outlook.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर ≈

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मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ गावजत्रा… ☆ श्री दिवाकर बुरसे ☆

श्री दिवाकर बुरसे

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✦ गावजत्रा… ✦ श्री दिवाकर बुरसे ☆

चैत्र प्रतिपदा म्हणजे गुढीपाडवा झाला की महाराष्ट्रातील गावोगावच्या उत्सवांना आरंभ होतो. 

रब्बीची पिके घरी येवून पडलेली असतात. बुरुडाकडून आणलेल्या, गोमयाने अंतर्बाह्य लिंपून उन्हात खडखडीत वाळवून निर्जंतुक केलेल्या धान्यांच्या कणग्यांची पोटे नवधान्यांनी तट्ट भरल्यावर त्यांच्या तोंडी कडुनिंबाच्या पानांचे तोबरे भरून, वर राख आणि शेणांनी ती तोंडे लिंपली जातात. आता अश्विनापर्यंत तोंडे बंद!

उरलेल्या धान्यांच्या खरेद्या-विक्र्या होऊन शेतकऱ्यांच्या कनवटीला चार पैसे खुळखुळू लागतात. सगळीकडे आनंदीआनंद असतो. मुलं, नातवंडांना नवी कापडं, नातींना परकर-पोलकी- गवानं, तान्ह्याला आंगडी, टोपडी, कुंच्या, करगोटं आणि घरधणीन, सुना, लेकींना लुगडी-चिरे-चोळ्या घ्यायच्या असतात. जमलं तर कारभारणीला एखादा सोन्याचा डागही करायची इच्छा असते घरधन्याची. 

गावातील सार्वजनिक ग्रामदैवतांच्या मंदिरात नामसप्ताह आयोजित केले जातात. अखंड नामसंकीर्तनाखेरीज रोज संध्याकाळी वारकरी कीर्तने होतात. आठवडाभर ग्रामस्थ विठूभजनात मग्न राहतात. रामनवमी उत्साहाने पार पडते. हनुमानाचा जन्मोत्सव होतो. रामाला आणि हनुमंताला वाहिलेल्या मोगरा-दवण्याचा सुगंध मंदिराच्या गाभाऱ्यापासून प्रवेशद्वारापर्यंत पुढे आठवडाभर दरवळत असतो. गावभर सुंठवडा वाटला जातो. एकूण मजा असते, आनंदी आनंद असतो.

आमच्या माळशिरस (भुलेश्वर) गावाचा भैरवनाथाचा उत्सव प्रतिवर्षी चैत्र बारशीला (चैत्र शु. द्वादशी) असतो. सकाळी सहा वाजता ग्रामदैवत, ‘पुण्याचे वेरुळ’ म्हणून देशभर प्रसिद्ध असलेल्या भुलेश्वराला महाभिषेक, सात वाजता गावातील भैरवनाथाला महाभिषेक केला जातो. दुपारी बारा वाजता पाण्याची कावड नाचवत भुलेश्वरला नेली जाते. नंतर देवाच्या तांदळ्यावर (शिवपिंडीवरील दंडगोलाकार शाळिग्राम) जलधारा धरून अभिषेक केला जातो. रात्री साठेआठला गावात छबिना निघतो. ढोल-लेझिम पथके नाचतात. तरुण देहभान विसरून नाचतात, वाजवतात, नामगजर करतात. महिला, मुली, बालके नवी वस्त्रे लेऊन, नटूनथटून सहभागी होतात.

गावात पारावर, चौकात विविध वस्तू, मिठाया, खेळणी, कपडे, खाद्यपदार्थांची हाटेले इ. फिरत्या विक्रेत्यांनी आपापली दुकाने थाटलेली असतात. बाया घोळक्याने बाजारात फिरत, हसंत खिदळत, कलकल करीत खरेदी करीत असतात. एक लेकरु कडेवर, दुसरं बोटाला धरलेलं, तिसरं जरा थोरलं, आईच्या मागून ढकलंत घरंगळंत चालल्यासरखं चाललेलं, गर्दीतून चाँवचाँव करीत वाट काढीत पुढं पुढं जात असतात. लेकरासाठी जिलबी, गुडीशेव, भेळ, गारेगार घेत असतात. 

जत्रेच्या निमित्ताने घरोघरी सोयरेधायरे, व्याही मंडळी, मित्रमंडळी, पाहुण्यांचे आगमन झालेले असते. गोडाधोडाच्या जेवणावळी झडत असतात. आग्रह करकरून वाढले जाते. सारा दिवस धामधुमीत जातो. 

या दोन-चार दिवसाच्या धामधुमीत उपवर किंवा उपवधू कन्या-पुत्रांच्या विवाहासाठी योग्य उमेदवाराची चाचपणी, टेहाळणी काही धूर्त, चाणक्ष पालक करून घेतात. आपल्या कुटुंबासाठी सुयोग्य, आनुरूप सून-जावई हेरून ठेवतात. काही व्यवहारी मंडळी जमीन, घर खरेदी-विक्रीच्या व्यवहारासाठी सूतोवाच्य करून ठेतात, जुजबी बोलणी करून घेतात. विवाहाचे आणि जमीन, घर खरेदी विक्रीचे प्रत्यक्ष व्यवहार नंतर सोईने संपन्न होतात.

दुसऱ्या दिवशी, म्हणजे चैत्र शु. त्रयोदशीला घरोघरी सामिष भोजने होतात. दुपारी चिंचेच्या बागात कुस्त्यांचे फड उभे राहतात. पंचक्रोशीतले मल्ल त्यात सहभागी होऊन आपापल्या क्रिडा नैपुण्याचे प्रदर्शन करतात. प्रथम लहान मुलांच्या कुस्त्या होतात. त्यांच्यावर कौतुक म्हणून रेवड्या उधळल्या जातात. उधळलेल्या रेवड्या हस्तगत करण्यासाठी त्यांच्यावर पोरा-टोरांच्या, प्रेक्षकांच्या उड्या पडतात. मोठ्या तरुणांच्या कुस्त्यांमधे विजेत्याला रोख रकमांची पारितोषिके दिली जातात. हौशी कुस्तीप्रेमी गावकरी पारितोषिकांच्या बोल्या लावतात. उत्तरोत्तर खेळ रंगत जातो. प्रेक्षकांपैकी काही जण विजयी वीरांना खांद्यावर घेऊन नाचवतात, मिरवतात. रात्री पारावरील मोकळ्या मैदानावर उभारलेल्या रंगमंचावर एखादे लोकनाट्य (तमाशा) रंगते.

नमन, गण-गौळण, लावणी, बतावणी झाली की मुख्य वगाला आरंभ होतो. ढोल्या विविध ताल व लयकाऱ्या वाजवून ढोलकीवरील आपले प्रभुत्व वारंवार सिद्ध करतो. पायपेटी वादक त्याच्या करामती दाखवतो. नृत्यांगनांचा लयबद्ध पदन्यास, गिरक्या, फिरक्या, मुरक्या, ठुमके आणि अदकारीला प्रेक्षक टाळ्या, शिट्ट्या वाजवून, डोईचे फेटे हवेत उडवून भरभरून दाद देतात. मावशी मजा आणते. सोंगाड्या आपल्या अंगविक्षेपांनी आणि द्विअर्थी शाब्दिक कोट्यांनी धमाल उडवतो, प्रेक्षकांना खळखळून हसवतो. असे हे उत्तरोत्तर रंगलेले लोकनाट्य पहाटे पहाटे संपते. गावकरी पुढील वर्षभर पुरेल येवढ्या आनंदाची साठवण मनात करीत आपापल्या घरी परततात.

 

© श्री दिवाकर बुरसे

पुणे

संपर्कः ९२८४३००१२५, ९५५२६२९२४५

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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