हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ४०४ ☆ बब्बर शेर ब्रिटिश साम्राज्य के राजचिन्ह का  रूपक ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४०४ ☆

?  आलेख – बब्बर शेर ब्रिटिश साम्राज्य के राजचिन्ह का  रूपक ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

ब्रिटेन की धरती पर प्राकृतिक रूप से कभी शेरों का बसेरा नहीं रहा लेकिन वहां के इतिहास और संस्कृति की रगों में शेर किसी स्वदेशी जीव से कहीं अधिक गहराई तक समाया हुआ है। यह एक अद्भुत विरोधाभास है कि जिस देश के जंगलों में भेड़-बकरियां और लोमड़ियां घूमती थीं वहां की राजमुद्रा पर बबर शेर की दहाड़ अंकित है। वास्तव में शेर का ब्रिटिश साम्राज्य में आगमन सैन्य वीरता और शाही गौरव की चाहत का परिणाम था।

मध्यकाल के दौरान इंग्लैंड के राजा रिचर्ड द लायनहार्ट ने अपनी अदम्य वीरता के कारण शेर को अपने ढाल पर स्थान दिया और वहीं से यह जीव ब्रिटेन की पहचान बन गया। तब शेर केवल एक पशु नहीं बल्कि एक ‘मेटाफर’ यानी रूपक था ,  संदेश था कि ब्रिटिश साम्राज्य शेर की तरह शक्तिशाली और निडर है। आज भी शाही प्रतीक चिन्ह में सुनहरी आभा लिए खड़ा शेर ब्रिटेन के आत्मविश्वास का परिचय देता है।

अनेक भव्य भवनों के प्रवेश द्वार पर प्राचीन दो  शेरों  की मूर्तियां नजर आती हैं।

ब्रिटेन के अन्य राष्ट्रीय प्रतीकों की बात करें तो वहां की विविधता और भी रोचक हो जाती है। जहां इंग्लैंड का प्रतीक शेर है वहीं स्कॉटलैंड ने एक काल्पनिक जीव ‘यूनिकॉर्न’ को अपना राष्ट्रीय पशु चुना है। प्राचीन मान्यताओं के अनुसार यूनिकॉर्न ही वह एकमात्र जीव है जो शेर को टक्कर दे सकता था। इसी प्रकार वेल्स का राष्ट्रीय पशु ‘ड्रैगन’ है जो वहां की लोककथाओं और संघर्ष की कहानियों का नायक रहा है। पक्षियों में ‘रॉबिन’ को वहां का राष्ट्रीय पक्षी माना जाता है जो अपनी सुरीली आवाज और लाल छाती के कारण सर्दियों के मौसम में भी जीवंतता का संचार करता है।

शेर का बाल कहानियों में नायक बनना भी इसी सांस्कृतिक सोच का रोचक विस्तार है। असल दुनिया में भले ही वह एक हिंसक शिकारी पशु हो लेकिन कहानियों में उसे एक न्यायप्रिय जंगल के राजा और नैतिकता के रक्षक के रूप में ढाला गया है। ब्रिटिश लेखकों ने शेर को शक्ति के ऐसे स्वरूप में पेश किया जो अन्यायी नहीं बल्कि अनुशासित है। यही कारण है कि लंदन के ट्रैफल्गर स्क्वायर पर बनी शेरों की विशाल मूर्तियां हों या बच्चों की कहानियों के पात्र यह जीव अब विदेशी नहीं बल्कि पूरी तरह ब्रिटिश मानस का हिस्सा बन चुका है। शायद शेर का ऐसा महत्वपूर्ण वर्णन वहां के शासकों को अलिखित शिक्षा देने की प्रेरणा भी सदियों से बना हुआ है।

लायंस क्लब की स्थापना में बबर शेर का नाम सिंह के राजसी सेवा भाव को प्रतिबिंबित करता है।

यह गौरवमयी यात्रा बताती है कि कोई जीव किसी देश का प्रतीक बनने के लिए वहां के भूगोल में मौजूद हो यह अनिवार्य नहीं है बल्कि वह वहां के लोगों के आदर्शों में जीवित होना चाहिए। ब्रिटेन ने शेर की हिंसक छवि के बजाय उसके राजसी गौरव को अपनाकर उसे अमर बना दिया है।

 

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

लंदन प्रवास पर

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # २१४ – अर्थतंत्र की रीढ़ को… ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “अर्थतंत्र की रीढ़ को। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २१४ – अर्थतंत्र की रीढ़ को… ☆

राजनीति में लग गया, नेताओं को रोग।

अर्थतंत्र की रीढ़ को, तोड़ रहे ये लोग।।

*

ऋण देकर उपकृत करें, बाँट रहें खैरात।

फिर उसको माफी करें, यह कैसी सौगात।।

*

जनता देती टैक्स है, सुविधाओं की आस।

सत्ताधारी कर रहे, उनको सदा निरास।।

*

बाढ़ अकाल आगजनी,तोड़ फोड़ के नाम।

करें सुरक्षा कुछ नहीं, भुगतें सब अंजाम।।

*

जात धर्म के नाम पर, तुष्टिकरण का रोग।

इनके अंदर है भरा, भंडारे का भोग।।

*

दान वीर ऐसे बने, जैसे मिली हो छूट।

अपने वोट सहेजने, कोषालय की लूट।।

*

अपराधों को रोकने, असफल हैं ये लोग।

क्षतिपूर्ति के नाम पर, पाल रखा है रोग।।

*

अर्थतंत्र कमजोर कर, हर्षित होते आज।

पैर कुल्हाड़ी मारते, सबके सिर पर गाज।।

*

अर्थ तंत्र है देश की, वह मजबूत गठान।

इससे ही बढ़ती सदा, हर मुल्कों की शान।।

*

नैतिकता पर जोर दें, तजें अनैतिक राह।

चारित्रिक पथ पर चलें, चहुँ दिश होती वाह।।

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९४५ ⇒ मंदबुद्धि ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “मंदबुद्धि।)

?अभी अभी # ९४५ ⇒ आलेख – मंदबुद्धि ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

मैं मंदबुद्धि हूं! जिनकी बुद्धि मंद होती है, उन्हें मंदबुद्धि कहते हैं। अक्ल और बुद्धि एक ही होती है, बस इसी भ्रम में लोग मुझे भी अक्लमंद समझ लेते हैं। मुझे अपने बारे में कोई भ्रम नहीं। मैं बचपन से ही ऐसा हूं।

बूढ़ा होने से बुद्धि नहीं आ जाती! जो लोग अपने सफेद बाल डाई करके काले करते हैं, वे भी मौका आने पर, यह कहने से नहीं चूकते, कि हमने अपने बाल धूप में सफ़ेद नहीं किये। वैसे भी कम पोषण से भी आजकल कम उम्र में बाल सफेद होना शुरू हो जाते हैं। जिनके सर में बाल ही नहीं हैं, उन्हें ऐसे जुमलों से बचना चाहिए।।

पूत के पांव पालने में ही नजर आ जाते हैं। रही सही कसर, जन्म पत्री पूरी कर देती है। हर बच्चे की कुंडली में बल, बुद्धि और यश लबालब भरा रहता है। जब बड़ा होने पर मेरे सितारे गर्दिश में आए, और उपलब्ध जन्म कुंडली ज्योतिषी को दिखाई तो उन्हें मुझमें साढ़े साती का योग नजर आया। शनिदेव मुझ पर मेहरबान थे।

मुझे अच्छी तरह याद है, तब हर शनिवार को नगर पालिका द्वारा सड़कों की धुलाई होती थी। एक पाड़ा गाड़ी में, पानी की टंकी रखी रहती थी, जिससे एक सफाई कर्मी पहले चमड़े के मशक में पानी भरता था और बाद में उससे सड़कों की धुलाई सफाई होती थी। सड़क से लगे फुटपाथ के पास एक छोटे से स्थान में शनि महाराज विराजमान हो जाते थे। हर शनिवार को लोग शनि को तेल चढ़ाते थे। मैने कभी नहीं चढ़ाया, इसलिए शनि महाराज मुझसे नाराज़ थे।।

सुना है बादाम खाने से याददाश्त अच्छी होती है, बुद्धि तेज होती है। तब बादाम मूंगफली के भाव बिकती थी। लेकिन तब भी हम चने और मूंगफली ही खाते थे। आज तो मूंगफली भी बादाम के भाव मिल रही है। भला हो सेहत के ठेकेदारों का, जो उन्होंने हमें मीठे तेल से सोयाबीन पर ला दिया। तेल से कॉलोस्ट्रोल बढ़ता है, बादाम खाओ, याददाश्त बढ़ाओ।

वैसे मंदबुद्धि होने से मुझे कोई खास परेशानी का सामना नहीं करना पड़ा! I never stood second in my class. (जाहिर है, थर्ड ही आया हूंगा। ) मां के अनुसार मेरी आंख पर एक चोट के कारण मेरी आंखों और दिमाग पर गहरा असर पड़ा। फिर भी सूरदास और अंग्रेजी कवि जॉन मिल्टन मुझे प्रेरणा देते रहे। वैसे भी मुझे कहां स्वर्ग की आस थी।।

आज जब डिजिटल युग में भी 4-G का नेटवर्क स्लो चल रहा है, जिंदगी की गाड़ी भी बिना पटरी के चल रही है, बुद्धिमान, बुद्धिजीवी बनते चले जा रहे हैं, इंसान का शातिर दिमाग जैविक हथियारों की खोज करने में लगा है, तो मैं क्यों न राम भजन करूं। इतने भक्त तो भक्ति काल में भी नहीं हुए, जितने आज नजर आ रहे हैं। वैसे भी कपास ओटना अपने बस की बात नहीं।

जीवन में यह मलाल जरूर रहेगा कि कभी गांधीजी का चरखा नहीं चलाया और न ही कबीर की तरह कभी ताने बाने पर ध्यान दिया। हां! पांव सदा चादर में रखे और हमेशा चादर सर्फ से धोता रहा। वैसे भी इड़ा और पिंगला नाड़ियां जब सुषुम्ना में प्रवेश करती हैं तो कोई बुद्धि का प्रमाण पत्र नहीं मांगती। सुना है, स्लेट खाली हो, तो सुषुम्ना में प्रवेश जल्दी मिल जाता है।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २५९ – करुण पुकार ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा करुण पुकार”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २५९ ☆

🌻लघु कथा🌻 🛕 करुण पुकार🛕

मंदिर के पास घर निवास होने से सभी प्रकार के आराधना प्रार्थना की आवाज आती रहती है। कभी बच्चे होने का बधावा, कभी मुंडन में रोती किलकारी, कभी कन्या भोज, कभी देवी पूजन, कभी बेटी की बारात में माता पूजन, कभी बहू के आने के बाद मंदिर में चढ़ावा, और कभी किसी के अपने से बिछड़ जाने पर शांत मन से बैठ सीढियों पर बातें करना।

घंटी और साज बाजे की आवाज बदल जाती है। कभी शहनाई, कभी ढोल, कभी मृदंग, कभी मंजीरे की झनक और कभी सिसकती आँहे, सिर्फ घंटी की पुकार, परंतु ईश्वर को पाने या उनसे मन्नत करने का तरीका अलग-अलग परंतु ठिकाना सबका एक।

आज सुबह आरती वंदन के बाद घंटी की आवाज थोड़ी धीमी सी आ रही थी, परंतु शोर शराबा कुछ बाँटने का हो रहा था। मंदिर प्रांगण भीड़भाड़ से भरा था। नीचे – ऊपर, आती- जाती, सीढ़ी पर बैठी अम्मा का गीत आज ऊंचे स्वर पर कुछ प्रसन्नता पूर्वक आ रही थी – – – जो अक्सर बैठकर करुण पुकार करती रहती थी।

धीरे से सविता ने पूछा अम्मा क्या बात है। आज करुण पुकार की जगह मीठे- मीठे गीत गा रही हो। बिटिया— आज बरसों बाद मेरा बेटा अपना बेटा लेकर आ रहा है। उसने मुझे बताया है कि मंदिर में आ जाना देख लेना। बस उसी का इंतजार कर रही हूँ।

सविता आश्चर्य से देखती रही क्या?? तुम्हें ले जाएगा।

अरे कहाँ। मैंने उसे अपना बनाया था। अनाथ को लालन-पालन कर पढ़ा लिखा बड़ा किया।

बिटिया उसने मुझे अपना थोड़े ही माना था। मेरी संतान नहीं है वह।

सविता तो बस सुनकर हृदय से गमगीन हो गई। जिस बच्चे के लिए वह तड़प रही है। वह तो सिर्फ उसे एक नौकरानी (आया) समझ रहा था।

इससे तो अच्छा था वह स्वयं ही अनाथ रहती किसी अनाथ को सनाथ बनाते। उसकी करुण पुकार बाजे शहनाइयों के बीच दब गई।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १७० – देश-परदेश – Returnable Bottles ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १७० ☆ देश-परदेश – Returnable Bottles ☆ श्री राकेश कुमार ☆

गर्मी का सीज़न इस बार भी निर्धारित समय से पूर्व ही आ गया है। दूसरी और पश्चिम एशिया का युद्ध भीषणतम हो कर गर्मी बढ़ाने में वैसा ही कर रहा है, जैसे कि जलती आग में घी करता है।

हमारे घर में विगत कुछ वर्षों से तथाकथित “शीतल पेय” का सेवन व्हाट्स ऐप महाविद्यालय से मिले ज्ञान से बंद हो चुका है। खाना बनाने वाली गैस की कमी के चलते घर में चाय के सेवन पर प्रतिबंध की चर्चा परवान चढ़ चुकी है। इसी क्रम में शीतल पेय की यादें ताज़ा हो गई हैं।

साठ के दश्क में कोका कोला, ऑरेंज (फेंटा नहीं) और सोडा कांच की बोतलों में उपलब्ध रहता था। सोडा दो आने और अन्य चार आने में बिक्री होती थी। दुकानदार कांच की बोतल के नाम से सिक्योरिटी डिपोजिट जमा करवा लेता था। बोतल की सही सलामती पर उस राशि की वापसी संभव हुआ करती थी। बोतल के ढक्कन हटाने पर ज़रा सा भी कांच टूटने  से राशि काट कर बोतल ग्राहक को थमा दी जाती थी। कुछ अमीर विवाह आदि कार्यक्रमों से खाली बोतल घर ले आते थे। जब कभी बाजार से शीतल पेय खरीदते तो घर रखी खाली बोतल घर से साथ ही ले जाते थे, और सिक्योरिटी जमा करने से बच जाते थे। इन कांच की बोतलों को खोलने वाले छोटे से यंत्र को ओपनर कहा जाता था। हमारे जैसे किशोर तो मुंह में लगे हुए दांतों की दाढ़ के सहारे ही बोतल खोल लेते थे। पड़ोस के लोग भी हमारी सेवाएं ले कर उसकी एवज में थोड़ा सा पेय दे दिया करते थे।

मोहल्ले के परिचित दुकानदार भी किसी अन्य व्यक्ति की गारंटी देने पर सिक्योरिटी जमा करने की झंझट से मुक्त रहते थे।

अब तो प्लास्टिक युग में शीतल पेय भी विगत कुछ दशकों से प्लास्टिक की बोतलों में विक्रय किया जाता है, हालांकि बोतल खोलते ही इनकी गैस निकल जाती है, वो मज़ा नहीं आता है, जो कांच की बोतलों में हुआ करता था।

इस लेख के माध्यम से अपने मित्रों को संदेश देना चाहता हूं, कि हम जब भी उनके घर पर आएं, तो वो खाने वाली गैस की कमी के नाम पर चाय के स्थान पर शीतल पेय परोस सकते हैं। हमें कोई गुरेज नहीं है।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ श्री अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती #३२० ☆ दिव्यत्वाची शक्ती… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

 

? अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # ३२० ?

दिव्यत्वाची शक्ती… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

मी दगड कोरला देवा तू त्यात भेटला होता

अन् छन्नी हातोड्याचा आघात सोसला होता

*

देवा तू सोबत होता मी म्हणून चुकलो नाही

तू माझ्या ह्या हाताचा सन्मान राखला होता

*

मूर्तीची प्राणप्रतिष्ठा झालेली डोळ्यांदेखत

डोळ्यांचे सोने झाले मी श्वास रोखला होता

*

मज बहाल केली देवा तू दिव्यत्वाची शक्ती

पाषाण म्हणूनच मी तो नेमका जोखला होता

*

असुरांची टोळी होती मूर्तीला दगड म्हणाली

थडग्यांना पुजणारांनी तो डाव फेकला होता

*

मातेची आज्ञा झाली तू वनात गेला तेव्हा

वनवास पाच शतकांचा कलियुगी भोगला होता

*

ह्या आयोध्या नगरीचे प्रारब्ध उजळले आता

त्या जुलमी सत्तेनंतर तू उभा ठाकला होता

 © अशोक श्रीपाद भांबुरे

धनकवडी, पुणे ४११ ०४३.

ashokbhambure123@gmail.com

मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ अंतर्भाव… ☆ श्रीशैल चौगुले ☆

श्रीशैल चौगुले

? कवितेचा उत्सव ?

अंतर्भाव... ☆ श्रीशैल चौगुले ☆

थांबते जरासे घन इथे

सांडते जरासे मन इथे.

*

आसवा जराशी वाट इथे

विरते जराशी लाट इथे.

*

आठवा जरासा भाव इथे

जीवना जरासा वाव इथे.

*

टोचती जरासे घाव इथे

भेटती जरासे राव इथे.

*

पाखरा जरासे पंख इथे

कोसली जरासे रंक इथे.

© श्रीशैल चौगुले

मो. ९६७३०१२०९०.

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर ≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ कोचिंग क्लासेस आणि पालकांची हतबलता… ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

श्री विश्वास देशपांडे

🔅 विविधा 🔅

☆ कोचिंग क्लासेस आणि पालकांची हतबलता… ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

​आजकाल कोणत्याही शहरात गेले की कोचिंग क्लासेसचे बोर्ड बघायला मिळतात. टॉपर्स आणि रँकर्सचे फोटो. त्यांचे स्पर्धा परीक्षेतील सुयश म्हणजे टक्केवारी ! यालाच तुम्ही आम्ही शिक्षण म्हणतो. परंतु हे शिक्षण नव्हे किंवा संस्कारही नव्हेत. हे फक्त प्रमाणित करणे आहे. एखादा विद्यार्थी एवढं एवढं शिकला आहे किंवा हे चांगल्या गुणांनी उत्तीर्ण झाला आहे हेच त्यातून सिद्ध होतं. पण त्याने ज्ञानार्जन किती केले आहे किंवा त्याच्यावर संस्कार किती झाले आहेत, एक माणूस म्हणून जगण्यासाठी ज्या ज्या काही उपयुक्त गोष्टी आहेत त्या तो शिकला आहे का या प्रश्नांचे उत्तर दुर्दैवाने नकारार्थी येते.

परंतु आजकाल वातावरणच असे निर्माण झाले आहे. या सगळ्या कोचिंग क्लासेसच्या जाहिराती पाहून पालकांना सुद्धा आपल्या मुलांना अशा प्रकारच्या कोचिंग क्लासेस मध्ये घालावे असे वाटते. त्यातही ज्या चांगल्या संस्था असतात त्यांची फी भरमसाठ असते. अनेक पालकांना ती परवडत नाही. प्रसंगी कर्ज काढून पालक आपल्या मुलाला अशा कोचिंग क्लासेसमध्ये दाखल करतात. उद्देश एकच असतो की त्याने परीक्षेमध्ये किंवा स्पर्धा परीक्षांमध्ये उत्तम प्रकारे यश मिळवून चांगली शाखा किंवा चांगली नोकरी मिळवावी. हे क्लासेस विद्यार्थ्यांना परीक्षार्थी बनवतात. इंग्रजांच्या काळात इंग्रजांना जसे इंग्रजी मानसिकता तयार झालेले भारतीय कारकून हवे होते तशाच प्रकारचे परीक्षार्थी नोकरीच्या दृष्टिकोनातून हे क्लासेस घडवतात.

शाळा महाविद्यालयांमध्ये विद्यार्थ्यांची उपस्थिती कमी होत चालली आहे आणि कोचिंग क्लासेस भरभरून वाहत आहेत. एखाद्या शिक्षकाने विद्यार्थ्यांना कितीही चांगल्या पद्धतीने शाळेत किंवा महाविद्यालयात शिकवण्याचा प्रयत्न केला तरी मुलांचे तिकडे लक्ष नसते. त्यांची एकाग्रता होत नाही याचा अनुभव मी स्वतः घेतला आहे. तर अभ्यासक्रमातील काही भाग शिकवत असताना हे आमच्या क्लासमध्ये शिकवले गेले आहे म्हणून मुले लक्ष देत नाहीत अशी दुर्दैवी परिस्थिती आहे. बऱ्याच ठिकाणी तर शिक्षण संस्था आणि कोचिंग क्लासेस यांच्या संगनमताने हे कोचिंग क्लासेस सुरू असतात. त्यातून काही संस्थाचालक आपले उखळ पांढरे करून घेतात.

सकाळचे सहा वाजले की गाढ झोपलेल्या मुलाला आईचा आवाज ऐकू येतो. ” उठ रे बाळा, आज टेस्ट आहे ना ?” बिचारा मुलगा डोळे चोळत विचार करतो, ‘शाळेची टेस्ट की क्लासची?’ आता शाळा आणि क्लास या एकाच नाण्याच्या दोन बाजू झाल्या आहेत. फरक फक्त इतकाच की, शाळा ‘ संस्कार ‘ द्यायचा प्रयत्न करते आणि क्लासेस देतात ‘ रँक ‘ आणि घेतात पैसे मोजून ! अशा रीतीने आपला लाडका बाळ रँक होल्डर होतो !

पूर्वी मुलं शाळेतून आली की दप्तर एका कोपऱ्यात फेकून मैदानाकडे धावायची आणि पालकांना त्यांना घरी बोलावून आणावे लागायचे. खेळण्यामुळे त्यांचे शारीरिक आणि मानसिक आरोग्य उत्तम राहायचे. पण आता सगळेच बदलले आहे. शाळेतून किंवा महाविद्यालयातून घरी आल्याबरोबर त्यांना कोचिंग क्लासेसला जावे लागते. या सगळ्या धावपळीत आपल्या मुलाचे बालपण किंवा तारुण्य कोमेजून जात आहे याची जाणीव पालकांना अभावानेच होते. सकाळी शाळा किंवा कॉलेज आणि नंतर कोचिंग क्लासेस यातच त्याचे बालपण, ऊर्जा आणि आनंद हरवून जातो. खरं म्हणजे नवीन ज्ञान शिकण्याचा जो आनंद असतो तो अशा या वातावरणामध्ये कसा मिळणार ?

स्पर्धा परीक्षांच्या वाढत्या स्पर्धेत कोचिंग क्लासेसची मदत घेणे इथपर्यंत ठीक आहे. एखादा कठीण विषय समजून घेण्यासाठी किंवा परीक्षेचे तंत्र आत्मसात करण्यासाठी क्लासेस नक्कीच उपयुक्त ठरतात. पण अडचण तेव्हा येते जेव्हा कोचिंग क्लासेस हे शाळा-कॉलेजांना ‘पर्याय’ ठरू लागतात. शाळेची जागा कोचिंग क्लासेस घेऊ शकत नाहीत. शाळा हे ते ठिकाण आहे जिथे आपण जगायला शिकतो, मित्र जोडतो आणि संघभावना शिकतो. जेव्हा क्लाससाठी शाळा बुडवली जाते किंवा शाळा केवळ नावापुरती उरते, तेव्हा शिक्षणाचा मूळ हेतूच हरवतो. क्लासेसने केवळ अभ्यासातील उणिवा भरून काढण्याचे काम करावे, ते शिक्षणाचे ‘मुख्य केंद्र’ बनू नयेत. क्लासेसने त्यांना पूर्णपणे परीक्षार्थी बनवले आहे. ही मुलं विज्ञानाचे नियम तोंडपाठ करतात, पण पावसाचा आनंद घ्यायला त्यांना वेळ नसतो. त्यांना गणितातले ‘प्रॉब्लेम्स’ सोडवता येतात पण आयुष्यातला एखादा प्रॉब्लेम आला की मात्र ते गोंधळून जातात.

​पालकांनी हे लक्षात घ्यायला हवे की, मुलाला ‘स्पर्धक’ बनवण्याआधी त्याला एक समृद्ध ‘विद्यार्थी’ म्हणून शाळेत घडू देणे जास्त गरजेचे आहे. शाळा हेच मुख्य व्यासपीठ असायला हवे आणि कोचिंग हे केवळ त्याला दिलेले एक पूरक पाठबळ असावे. पालकांनी मुलांच्या निकालाच्या टक्केवारीपेक्षा त्यांच्या आनंदाची टक्केवारी मोजायला शिकावे. क्लासेस लावण्यापूर्वी त्यांच्या आवडीची ‘क्लास’ ओळखा.

​आयुष्याची खरी परीक्षा वर्गाच्या बाहेर असते, तिथे कोणताही क्लास कामाला येत नाही, तिथे फक्त तुमची जिद्द आणि शाळेत शिकलेले मूलभूत संस्कारच कामी येतात. शेवटी, शाळा आपल्याला ‘आयुष्य’ नावाच्या मोठ्या परीक्षेसाठी तयार करत असते! शिक्षण संस्थांनी देखील या सगळ्या गोष्टी लक्षात घेऊन आपल्या शाळा महाविद्यालयातून उत्तम प्रकारचे शिक्षण, संस्कार मिळतील याकडे लक्ष द्यावे आणि विद्यार्थी मोठ्या प्रमाणात शाळा महाविद्यालयांकडे पुन्हा कसे वळतील यासाठी प्रयत्न करावेत.

© श्री विश्वास देशपांडे

चाळीसगाव

प्रतिक्रियेसाठी ९४०३७४९९३२

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – काव्यानंद ☆ “तुझा तूच त्याचा..” – कवी : दिवाकर बुरसे – रसग्रहण : अज्ञात ☆ प्रस्तुती – श्री सुहास रघुनाथ पंडित ☆

श्री सुहास रघुनाथ पंडित

? काव्यानंद ?

☆ “तुझा तूच त्याचा..” – कवी : दिवाकर बुरसे – रसग्रहण : अज्ञात ☆ प्रस्तुती – श्री सुहास रघुनाथ पंडित ☆

राष्ट्रीय सुरक्षितता सप्ताह

प्रतिवर्षी ४ ते १० मार्च या काळात ‘राष्ट्रीय सुरक्षितता सप्ताह’ देशभर साजरा केला जातो. औद्योगिक क्षेत्रात याचे विशेष महत्व आहे. या वर्षीच्या- आजच्या ४मार्चला सुरू होत असलेल्या – सुरक्षितता सप्ताहानिमित्त वाचकांना एका कवितेची अल्पशी भेट आणि सर्वांना सुरक्षित जीवन लाभावे ही ईश्वरचरणी ‘यंत्रदासा’ची मनोमन प्रार्थना.

श्री दिवाकर बुरसे

☆ तुझा तूच त्राता ☆

पहा मानवा, यंत्रक्रांतीमुळे आज

मानेवरी बैसली जोखडे

सुरक्षीतता पाहणे काम तूझे

जरी ध्यान कोणी न दे त्याकडे।।धृ।।

 *

जसा लागला शोध चक्रा-गतीचा

जगाने गती घेतली केवढी

कुणाला नसे थांबण्या वेळ आता

मढ्यांना इथे स्वस्थता तेवढी!

अशा जीवघेण्या प्रवाहातुनीही

तुला जायचे पैलतीराकडे

सुरक्षीतता पाहणे काम तूझे

जरी ध्यान कोणी न दे त्याकडे।।१।।

 *

किती वादळी वेग हे वाहनांचे

तयातून जाणेच आहे सुखे

वितीचे तुझे पोट! जे जाळण्याला

पडे खेळणे अग्निसंगे इथे

तरी पाळ सारे इशारे दिलेले

जराही नको वागणे वाकडे

सुरक्षीतता पाहणे काम तूझे

जरी ध्यान कोणी न दे त्याकडे।।२।।

 *

पहा, वाहते गोगलीशंख पाठी

ढके वादळी उंटनाका सुखे

अती दक्षतेने चले सूरवंट

मधूमक्षिकांची पहा कौतुके

वनी अस्वलेभाकऱ्या साठवीती

मनू का असे हीन त्यांच्या पुढे?

सुरक्षीतता पाहणे काम तूझे

जरी ध्यान कोणी न दे त्याकडे।।३।।

 *

तुझा तूच त्राता, नसे अन्य कोणी

मनी जाण हे सत्य जे सांगतो

अती दक्षतेने सदा वागतो जो

तयाचीच चिंता हरी वाहतो!

न घे काळजी देह, यंत्रा-धनाची

असा जीव देवा कदा नावडे

सुरक्षीतता पाहणे काम तूझे

जरी ध्यान कोणी न दे त्याकडे।।४।।

🙏🏽

©️ यंत्रदास

दिवाकर बुरसे, पुणे

संपर्कः ९५५२ ६ २ ९२ ४ ५

वरील कवितेचे कौतुक करणाऱ्या अनेक प्रतिक्रिया आजवर प्राप्त झाल्या आहेत. त्यातली वानगी म्हणून पुढील रसग्रहणात्मक प्रदीर्घ प्रतिक्रिया वचकांनाही आवडावी. दुर्दैवाने प्रतिक्रिया देणाऱ्या रसिकाचे नाव मात्र ठाऊक नाही. त्या अज्ञात रसिक वाचकाचे मनःपूर्वक आभार!

🪷

तुझा तूच त्राता — सजगतेचा जागर

रसास्वाद : अज्ञात

१९९२ साली लिहिलेल्या या कवितेतील विचार आणि संदेश आजच्या काळाशीही सुसंगत आहेत.

ही कविता म्हणजे केवळ शब्दरचना नाही;

ती कारखान्याच्या सायरनसारखी कर्णकर्कश नाही,

तर अंतर्मनात घुमणारी सावधानतेची घंटा आहे.

४ ते १० मार्च या कालावधीत देशभर साजरा होणाऱ्या राष्ट्रीय सुरक्षितता सप्ताहाच्या भावनेला साजेशी ही रचना, National Safety Council यांच्या ध्येयवाक्याला काव्यरूप देते—

“Safety First” हे केवळ फलकावरचे वाक्य नाही;

ते जगण्याची पद्धत असायला हवी.

यंत्रयुगातील मानवा, थांब क्षणभर!

मानेवरी बैसली जोखडे

ही ओळ वाचताक्षणी आपण स्वतःला एखाद्या वेगवान कन्वेयर बेल्टवर उभे असल्याचे पाहतो.

यंत्रांनी आपले आयुष्य सुलभ केले,

पण वेगाच्या मोहाने आपणच स्वतःला जोखडात अडकवून घेतले नाही ना?

कवी येथे उपदेश देत नाही—

तो आरसा दाखवतो.

वेग, प्रवाह आणि पैलतीर

मढ्यांना इथे स्वस्थता तेवढी!

ही ओळ चटका लावते.

जीवंत राहायचे असेल, तर सदैव जागृत राहावे लागेल.

जीवन हा प्रवाह आहे;

परंतु पैलतीर गाठायचे असेल, तर पोहता आले पाहिजे—

आणि पोहताना नियम पाळले पाहिजेत.

सुरक्षितता म्हणजे भीती नव्हे;

तीच खरी शौर्याची जननी आहे.

 

अग्नीशी खेळणाऱ्यांची प्रार्थना

वितीचे तुझे पोट! जे जाळण्याला

पडे खेळणे अग्निसंगे इथे

उद्योगक्षेत्रातील कामगारांचे हे जिवंत चित्र आहे.

उपजीविकेसाठी जोखीम स्वीकारावी लागते;

पण जोखीम आणि निष्काळजीपणा यात फरक आहे.

हेल्मेट, हातमोजे, इशारे, नियम—

हे केवळ औपचारिकतेचे भाग नाहीत;

ते जीवाचे कवच आहे.

Safety First म्हणजे

काम थांबवणे नव्हे,

तर काम जिवंत राहून पूर्ण करणे!

 

जीवसृष्टी विवेके चाले

गोगलगाय कवच घेऊन फिरते.

मधमाशी शिस्तीत उडते,

भविष्यासाठी अन्नसंग्रह करून ठेवते.

अस्वल साठवण करते.

निसर्गातील प्रत्येक जीव सावध आहे.

मग बुद्धिमान मानवच निष्काळजी का?

प्रश्न टोकदार आहे;

पण तो टोचण्यासाठी नाही—

जागवण्यासाठी आहे.

 

तुझा तूच त्राताघोष नव्हे, मंत्र

ही कविता शेवटी घोषणेत परिवर्तित होते.

धृपदाची पुनरावृत्ती म्हणजे जणू प्रत्येक शिफ्टच्या सुरुवातीला घेतलेली सुरक्षिततेची प्रतिज्ञा—

सुरक्षीतता पाहणे काम तुझे

जरी ध्यान कोणी न दे त्याकडे.

कोणी पाहो वा न पाहो,

सीसीटीव्ही असो वा नसो,

देवावर श्रद्धा असो वा नसो—

सजगतेची जबाबदारी स्वतःचीच आहे.

अती दक्षतेने सदा वागतो जो

तयाचीच चिंता हरी वाहतो

हे वाक्य म्हणजे तर एक सुभाषितच आहे

येथे श्रद्धा आणि शिस्त यांचा सुंदर संगम आहे.

देव सहाय्य करतो—

पण आधी आपण स्वतःच स्वतःला सहाय्य केले पाहिजे.

 

काव्यवैशिष्ट्यांचा तेजोमय आविष्कार

घोषवाक्यात्मक क्षमता – प्रत्येक कडवे जणू पोस्टरवर उमटावे असे!

प्रातिनिधिक प्रतिमा – यंत्र, वाहन, अग्नी, प्राणी—जीवनाच्या सर्व क्षेत्रांना स्पर्श.

सरळ पण परिणामकारक भाषा – वाचक थेट संवादात ओढला जातो.

प्रेरणादायी स्वर – भीती नव्हे, आत्मविश्वास जागवणारा.

हो, काही ठिकाणी कविता प्रचारात्मक भासते;

पण सुरक्षिततेसारख्या विषयात तोच तिचा अलंकार ठरतो.

कारण येथे सौंदर्यापेक्षा प्राण महत्त्वाचा आहे.

 

अंतिम संदेश

ही कविता वाचून मनात एकच ओळ घुमत राहते—

Safety First म्हणजे Life Always.

तुझा तूच त्राता

हे केवळ एक शीर्षक नाही,

तो जीवनरक्षणाचा मंत्र आहे.

कारखान्यात, रस्त्यावर, प्रयोगशाळेत, घरात—

जिथे जिथे जोखीम आहे,

तिथे तिथे ही कविता जपमाळेसारखी अंतरात असावी.

🪷

सजग राहूया.

सुरक्षित राहूया.

प्रत्येक दिवसाच्या सुरुवातीला स्वतःलाच सांगूया—

सुरक्षीतता पाहणे काम माझे!

🙏🏽🙏🏽🙏🏽

दिवाकर बुरसे, पुणे

संपर्कः ९५५२ ६ २ ९२ ४ ५

प्रस्तुती – श्री सुहास रघुनाथ पंडित

सांगली 

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – जीवनरंग ☆ टॅटू… (अनुवादित) इंग्रजी लेखिका : मेलिसा म्याककिनी ☆ मराठी अनुवाद  – श्री मकरंद पिंपुटकर  ☆

श्री मकरंद पिंपुटकर

? जीवनरंग ?

☆ टॅटू… (अनुवादित) इंग्रजी लेखिका : मेलिसा म्याककिनी ☆ मराठी अनुवाद  – श्री मकरंद पिंपुटकर 

(परदेशामध्ये मद्यपान आणि अंमली पदार्थांचे सेवन या व्यसनांची तीव्रता भीषण आहे. अनेकजण यातून बाहेर पडण्यासाठी – व्यसनमुक्त होण्यासाठी प्रयत्न करतात. काहीजण यशस्वी होतात, तर काही पुन्हा पुन्हा त्या व्यसनांच्या विळख्यात सापडतात. आजची कहाणी या व्यसनमुक्तीच्या लढ्याबद्दलची…)

मी एक यशस्वी टॅटू आर्टिस्ट आहे – लोकांच्या अंगावर, त्याच्या आवडीप्रमाणे गोंदवून देतो. पुण्यात कँपात माझा स्टुडिओ आहे. भयंकर बिझी असतो मी. खोऱ्याने पैसा ओढतो, त्याहीपेक्षा महत्त्वाचं, म्हणजे मी अजरामर कलेला जन्म देतो. तुमच्या अंगावरचा मी कोरलेला टॅटू – माझी कला – तुमच्या शरीरावर कायम वास्तव्य करून राहते. एकदा टॅटूचं नक्षीकाम – डिझाईन ठरलं, रंगसंगती ठरली, मी कामाला सुरुवात केली आणि मी माझी सिगारेट शिलगावली, की मग मी माझ्याच धुंदीत असतो.

टॅटू तयार झाला की ग्राहकापेक्षा मलाच जास्त खुशी होत असते. मग ती खुशी सेलिब्रेट करण्यासाठी, सिगारेटचा आणखी एक झुरका ! माणसाला आयुष्यात आणखी काय पाहिजे ?

– – हां, माझ्या गर्लफ्रेण्डला माझं हे असं सिगारेट पिणं आवडत नाही. पण कलाकाराची आणि कलेची नशा काय असते, हे तिला काय समजणार ? आणि अर्थात, मला काही धूम्रपानाचे व्यसन नाहीये. माझा माझ्यावर पूर्ण ताबा आहे. असो.

आज दुपारी ४ वाजता एक महिला माझ्या टॅटू स्टुडिओमध्ये आली. अपॉइंटमेंट नव्हती घेतलेली तिनं. ‘मी तिच्या हातावर एक टॅटू काढू शकतो का ?’ असं तिनं विचारलं.

“कसा टॅटू हवा आहे तुम्हाला ?” थोडा मोकळा वेळ होता माझ्याकडे, म्हणून मी विचारलं.

तिने मला तिच्या फोनवर एक फोटो दाखवला. त्यावर ३९२ आकडा लिहिलेला होता. “ ३९२. माझ्या मनगटावर. साधी काळी शाई. तुम्ही हे आत्ता करू शकता का? ”

– – मी तिच्याकडे पाहिले. ती रडत होती. रडून रडून डोळे लाल झालेले, सुजलेले. हात थरथरत होते.

“ हो, मी ते करू शकतो. पण मी विचारू का – हे ३९२ म्हणजे काय? ”

ती माझ्या खुर्चीवर बसली. तिने एक दीर्घ श्वास घेतला.

– – “ माझी मुलगी – चार दिवस गायब होती, काल मला ती सापडली. ड्रग ओव्हरडोसने तिचा मृत्यू झाला होता. पण मला याची आठवण ठेवायची आहे, की तिने व्यसनमुक्त राहण्याचे खूप प्रयत्न केले होते. तब्बल ३९२ दिवस तिने नशा केली नव्हती. प्रयत्नपूर्वक, संयम ठेवून, ती सलग ३९२ दिवस व्यसनमुक्त राहिली होती. ते ३९२ दिवस – तो निग्रह, ते प्रयत्न महत्त्वाचे होते. ”

काय बोलावे हे मला कळत नव्हते. मी फक्त मान डोलावली. मी टॅटू काढायची तयारी सुरू केली.

– – इकडे ती बोलतच राहिली. तिला मोकळं व्हायचं होतं.

“ बोलणारे बोलतील की तिने पुन्हा ड्रग्स घेतलीच, त्यातच ती मेली. ती अपयशी ठरली. तुम्ही कधीच नशा करणे सोडून देऊ शकत नाहीत. पण ते हे मान्य करणार नाहीत की तिने ३९२ दिवस ड्रग्सना स्पर्शसुद्धा केला नव्हता. ती व्यसनमुक्तीच्या बैठकांना – सभांना गेली होती. तिला नोकरी मिळाली होती. ती पुन्हा चित्रं काढू लागली होती. ३९२ दिवस ती पुन्हा एकदा माझी मुलगी होती. इतरांना फक्त तिचा शेवटचा एक व्यसनाधीन दिवस आठवेल. पण मला तिचे सोबर व्यसनमुक्त ३९२ दिवस आठवतील. ”

… तिचा आवाज कातर झाला. “ हा टॅटू मला तिच्या त्या ३९२ सोनेरी दिवसांची आठवण करून देईल. तिने लढा दिला. हे आकडे मला सांगतील – तिने प्रामाणिकपणे प्रयत्न केला. ”

मी टॅटू पूर्ण केला. साधे आकडे… ३९२. तिच्या मनगटाच्या आतल्या बाजूला. जिथे ती दररोज पाहू शकत होती.

तिने माझी फी दिली. आणि त्याशिवाय मला खूप जास्त टिप दिली. ती निघून जाऊ लागली. पण अचानक मागे वळली आणि तिनं विचारलं – “ माझं आणखी एक काम कराल का, प्लीज ? या टॅटूचं हे स्टेन्सिल तुम्ही तुमच्या शो-केसमध्ये ठेवू शकाल का? ३९२? आणि जर कोणी इथे व्यसनाशी झुंजत आला असेल किंवा एखाद्याने व्यसनामुळे कोणाला गमावले असेल, तर त्याला तुम्ही हे टॅटू कमी दरात गोंदवून देण्याची ऑफर देऊ शकाल का? मग तो किंवा ती कितीही कमी दिवस व्यसनमुक्त राहिला असला तरी… १०० दिवस. १० दिवस. १ दिवस. किती दिवस हे महत्त्वाचे नाही. पण मनापासून केलेल्या प्रयत्नांची नोंद घेतली जाते हे जगाला कळू द्या. “

– – मी उत्तर देण्यापूर्वीच ती निघून गेली.

मी ते ‘३९२’ चे स्टेन्सिल माझ्या काउंटरच्या मागे एका फ्रेममध्ये ठेवले. त्याखाली लिहिले :

” तुमचे / जीवलगांचे व्यसनमुक्त दिवस गोंदवून घ्या – मोफत. आकडा कितीही लहान असो वा मोठा असो. कोणताही आकडा. कारण तुमचा प्रयत्न महत्त्वाचा असतो, प्रत्येक दिवस महत्त्वाचा असतो. “

… खरं सांगू, मला अजिबात वाटले नव्हते की कोणी या फोटोकडे गंभीरपणे लक्ष देईल.

एका महिलेने तिच्या मुलीच्या सलग ३९२ दिवस व्यसनमुक्त राहण्याची आठवण म्हणून हातावर ३९२ आकडा गोंदवून घेतला होता. तिच्या विनंतीवरून, कोणाला आपल्या / जीवलगांच्या व्यसनमुक्त राहण्याचे आकडे गोंदवून घ्यायचे असले तर ते मी मोफत गोंदवून देईन असा बोर्ड मी माझ्या टॅटू स्टुडिओमध्ये लावला.

– – – आणि तीन दिवसांनी, एक माणूस आत आला. त्याला तो बोर्ड दिसला. तो हमसून हमसून रडू लागला. मला समजेच ना तो का रडत आहे ते…

” तो बोर्ड – तुम्ही १, २७९ गोंदवून देऊ शकाल का? “.. त्याने मला विचारले.

” नक्कीच. कोणासाठी?”

” माझा सख्खा भाऊ. त्याला दारूचे व्यसन होते. पण त्याने शपथ घेतली होती, त्याने निर्धाराने दारू सोडली होती. सलग १, २७९ दिवस – जवळजवळ चार वर्षे त्याने दारूच्या थेंबालाही स्पर्श केला नव्हता. दुर्दैवाने गेल्या आठवड्यात एका कार अपघातात त्याचा मृत्यू झाला. दारू सोडलेल्या माझ्या भावाला, एका दारू पिऊन गाडी चालवणाऱ्या ड्रायव्हरने उडवले. माझ्या भावाने तिथेच प्राण सोडले. “

… मी मोफत टॅटू काढला. मला मिठी मारून तो ढसाढसा रडला.

– – – बातमी पसरली. इंस्टाग्राम, टिकटॉक, यु ट्यूब, लोकांनी या गोंदवण्याला अमाप प्रसिद्धी दिली.

प्रत्येकाचे वेगळे आकडे, प्रत्येकाची वेगळी कहाणी. ४७ दिवस. ६ दिवस. १, ८२३ दिवस. २ दिवस.

एका महिलेने “१४ तास” टॅटू काढला.

“१४ तास ?” मी आश्चर्याने विचारलं.

“ड्रग्सच्या ओव्हरडोसने मृत्यू होण्यापूर्वी माझ्या मुलाने सलग १४ तास ड्रग्स घेतली नव्हती. प्रत्येकजण म्हणतो की १४ तास हा काही मोठा कालावधी नाही. पण ते खरं नाही. त्याने प्रयत्न केला. १४ तास त्याने प्रयत्न केला. “…

… मी तिच्या खांद्यावर १४ तास टॅटू काढला. ती संपूर्ण वेळ रडत राहिली. काम संपवल्यावर, तिने टॅटू पहिला आणि कुजबुजली, “आता सगळ्या जगाला कळेल की त्याने प्रयत्न केला, त्याने प्रामाणिक प्रयत्न केला. “

काल कोणीतरी आले आणि म्हणाले “शून्य दिवस गोंदवता येईल का ?”

मी चक्रावलो.

“शून्य?”

त्याने होकार दिला.

… “ माझी मुलगी कधीच पूर्णतः व्यसनमुक्त झाली नाही. पण तिने अनेक वेळा ड्रग्स सोडण्याचा मन:पूर्वक प्रयत्न केला. चार वेळा ती व्यसनमुक्ती केंद्रात दाखलही झाली होती. पण तिला ते जमलं नाही. अवघ्या २३ व्या वर्षी तिचे निधन झाले. सगळे म्हणतात की तिने प्रयत्न केले नाहीत. पण तिने केले. तिने खूप प्रयत्न केले. लाखो प्रयत्न. अनंत प्रयत्न. त्या शून्य संख्येखाली एक छोटं इन्फिनिटी (अनंत) “” चिन्ह गोंदवू शकता का? कारण जरी लोकांना दाखवण्यासाठी तिच्याकडे व्यसनमुक्त दिवस नव्हते तरी तिचे प्रयत्न अनंत होते. “

… एरवी मी टॅटू काढायचो, आणि गोंदवून घेणारा रडायचा. आज तो टॅटू गोंदवताना मी रडलो. अनंत चिन्हासह शून्य…. अशा मुलीसाठी जी यशस्वी झाली नाही, पण जिने कधीही प्रयत्न करणे थांबवले नाहीत.

दोन दिवसांपूर्वी एक सतरा वर्षांची मुलगी आली – तिच्या वडिलांसोबत.

“ तुम्ही ९१ दिवस करू शकता का? माझ्यासाठी. मी ९१ दिवस ड्रग्स घेतली नाहीयेत. मला हे लक्षात ठेवायचं आहे. पुढच्या वेळी जेव्हा मला ड्रग्स घ्यावीशी वाटतील तेव्हा मी हा टॅटू पाहीन. मी ९१ पर्यंत पोहोचले होते, मग मी ९२ पर्यंतही पोहोचू शकते याचं भान ठेवण्यासाठी. “

… टॅटू काढून झाल्यावर तिच्या वडिलांनी माझे हात हातात धरले. ” तुझ्या शाईने तू लोकांचे जीव वाचवत आहेस, त्यांना निर्व्यसनी राहण्यास प्रेरणा देत आहेस. “

– – ती मुलगी दर ३० दिवसांनी परत येते. मी तिच्या ९१ आकड्याच्या पुढे एक लहान टॅली मार्क जोडतो. ती आता १५१ दिवसांपर्यंत पोहोचली आहे.

– – – 

मी हे व्यसनमुक्तीचे टॅटू काढू लागलो त्याला वर्ष होऊन गेलं होतं. जिच्यामुळे या उपक्रमाला सुरुवात झाली, ती ३९२ टॅटूवाली आई काल परत आली.

… ” मला तुम्हाला काहीतरी दाखवायचे होते, ” ती म्हणाली. तिने तिचे मनगट दाखवले, त्यावर मी गोंदवलेला ३९२ होता. त्याच्यावर एक नवा नंबर गोंदवला होता, “१. ” फक्त नंबर १.

मी प्रश्नार्थक नजरेने तिच्याकडे पाहिले.

ती अश्रू ढाळत हसली.

” माझी मुलगी वारली, त्याला एक वर्ष झाले. एक वर्ष मी तिच्याशिवाय जगले आहे. मला कोणीतरी सांगितले की मी आता माझ्या स्वतःसाठी टॅटू काढावा. लेकीच्या मृत्यूचं हलाहल मी वर्षभर पचवलं त्याची आठवण म्हणून. “

… ती गेली. मी समोरच्या भिंतीकडे पहात राहिलो. व्यसनमुक्तीच्या आकड्यांचे टॅटू – ० पासून, १४ तासांपासून ते ६, २४७ दिवसांपर्यंतचे आकडे… प्रत्येक आकडा अशा व्यक्तीची कहाणी आहे ज्याने प्रयत्न केला. त्यांच्या लढाईची कहाणी आहे. प्रत्येक आकडा महत्त्वाचा आहे. ज्याने व्यसनमुक्त होण्याचा प्रयत्न केला त्यांच्यासाठीही आणि त्यांच्या जीवलगांसाठीही.

… आणि ते व्यसनमुक्त दिवस, ते प्रयत्न, तो निर्धार – लक्षात ठेवण्यास पात्र आहेत. चिन्हांकित…. सन्मानित….

मी हे सुरू केले कारण एका दुःखी आईने मला तिच्या मुलीची ३९२ दिवसांची झुंज लक्षात ठेवण्यास सांगितले. आता मला असे शेकडो दिवस आठवत आहेत – अशा शेकडो झुंजी माझ्या मनावर गोंदवल्या गेल्या आहेत. प्रत्येक आकडा मला एकच गोष्ट सांगतो : प्रयत्न करणे महत्त्वाचे आहे. लढणे महत्त्वाचे आहे. जरी तुम्ही हरलात तरी लढा महत्त्वाचा आहे. फक्त तुमच्यासाठीच नव्हे, तुमच्या जीवलगांसाठीही.

… आणि हा सगळा प्रवास आठवताना, मी स्वतः काय करायला पाहिजे हे अचानक मला लख्ख लक्षात आलं. मी माझ्या गर्लफ्रेंडला बोलावून घेतलं, ती आल्यावर तिला म्हटलं, ” मी एक स्पेशल टॅटू काढतोय, आणि तो काढताना मला तू साक्षीदार हवी आहेस. “

… मी माझ्याच हातावर गोंदवून घ्यायला सुरुवात केली – “१”. तिने माझ्याकडे प्रश्नार्थक नजरेने पाहिलं.

“ सिगारेट फुंकणे हेही व्यसन आहे. आजपासून मी सिगरेट सोडली. आणि आजच्या दिवसाची आठवण म्हणून हा टॅटू. “

तिच्या डोळ्यातील अश्रू मला दाद देत होते…

… ३९२ ने सुरू झालेला प्रवास एका आणखी महत्वाच्या टप्प्यावर पोचला होता.

(मेलिसा मॅककिनी यांच्या फेसबुक वॉलवरील कथेचा स्वैर अनुवाद)

अनुवादक / लेखक : मकरंद पिंपुटकर

चिंचवड

मो ८६९८०५३२१५   

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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